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वयं र ाम:

वयं र ाम:
ाचीन युग क पृ भूिम पर आधा रत
एक महान् मौिलक उप यास

आचाय चतुरसेन
ISBN : 9788170281351
सं करण : 2014 © आचाय चतुरसेन
VAYAM RAKSHAMAH (Novel) by Acharya Chatursen

राजपाल ए ड स ज़
1590, मदरसा रोड, क मीरी गेट– द ली–110006
फोन: 011–23869812, 23865483, फै स: 011–23867791
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www.rajpalpublishing.com
सकलकलो ािसत–प य–सकलोपधा–िवशु –मखशतपूत– स मू त–
ि थरो त–होमकरो वल– योित य ितमुख– वाधीनोदारसार– थिगतनृपराज य–
शतशतप रलु ठन् मौिलमािण य रोिचचरण–ि यवाचा–मायतन–साधुच रतिनके तन–
लोका यमागत –भारत–गणपितभौम महाराजािभध– ीराजे सादाय जातश वे
अ गणत ा ये पु याहे भौमे माघमासे िसते दले तृतीयायां वै मीये
कलाधरे रशू यने ा दे िनवेदयािम सा िल: वीयं सािह य–कृ तं ‘वयं र ाम:’ इित
सामोदमहं चतुरसेन:।
अंतव तु
पूव िनवेदन
1. ितल–तंदल

2. तू न थम है, न अि तम
3. अब से सात सह ा दी पूव
4. मनुभरत
5. लय
6. व ण ा
7. आ द य
8. दै य–दानव
9. देवासुर–सं ाम
10. व पािण दै ये
11. वणपुरी लंका
12. लघु अिभयान
13. दानव मकरा
14. जल–देव
15. वाचे पु षमालभेत
16. सु बा ीप म
17. मधुयािमनी
18. वण–लंका म
19. इ
20. तारकामय
21. आयावत
22. मानव
23. पु रवा और उसके वंशधर
24. वा ा
25. देवे –न ष
26. पौरव
27. दाशराज–सं ाम
28. आनत
29. उ रकोशल
30. अनाय जन
31. रा से रावण
32. रावण का भारत– वेश
33. द डकार य
34. असुर का देश
35. वैजय तीपुरी
36. मायावती
37. असुर का िव म
38. श बर–सं ाम
39. सहगमन
40. ग धव क नगरी म
41. ग धवपुरी से थान
42. कि क धापुरी म
43.
44. देवािधदेव
45. देव–साि य
46. गु ाद् गु तमम्
47. लंग पूजा
48. माया का वष–न
49. ेय और ेय
50. आरोह त पम्
51. राजकु मार का दूषण
52. िनकु भला–य ागार
53. अ तःपुर म
54. सूपनखा
55. िव ुि न
56. मातृवध
57. ितगमन
58. यमिज ना
59. अ मपुरी का यु
60. विश –िव ािम
61. हैहय कातवीय सह ाजुन
62. मािह मती का यु
63. रावण क मुि
64. मधुपुरी
65. आयावत म वेश
66. धनुष–य
67. सावभौम रावण
68. उरपुर
69. सारं सुरमि दरम्
70. अमरावती म
71. लंका क ओर
72. रं ग म भंग
73. सुभ वट
74. र –कू ट ीप
75. राम
76. म थरा का कू ट तक
77. कै के यी का ी–हठ
78. वन–गमन
79. हरण
80. जटायु का आ मय
81. अशोक वन म
82. वार वे म
83. इ –मोचन
84. ऐ ािभषेक
85. सुलोचना
86. अशोक वन
87. हा सीते!
88. बािल–वध
89. सीता क खोज म
90. सागर–तरण
91. लंका म अ वेषण
92. सीता–सा मु य
93. परा म का संतुलन
94. अिभगमन
95. ि य–िनवेदन
96. अिभयान
97. जग यी का कामवैक य
98. राजसभा
99. शर यं शरणम्
100. रणभेरी
101. र ा–कवच
102. राम– ूह
103. सं ाम
104. हष–िवषाद
105. तुमुल यु
106. महातेज कु भकण
107. जगदी र का वैक य
108. रथी का अिभगमन
109. मेघनाद अिभषेक
110. देवे का औ सु य
111. धूज ट के साि यम
112. अिभसार
113. देवदूत
114. समागम
115. वैदह
े ी–वैक य
116. कू ट योग
117. जनरव
118. रथी –वध
119. व पात
120. देवानु ह
121. सीदतु देव:!
122. सुसंवाद
123. अ पािण रावण
124. िवश यासंजीवनी
125. सि ध–िभ ा
126. िचतारोहण
127. वध
पूव िनवेदन

मेरे दय और मि त क म भाव और िवचार क जो आधी शता दी क अ जत


ा–पूंजी थी, उस सबको मने ‘वयं र ाम:’ म झ क दया है। अब मेरे पास कु छ नह है।
लुटा–िपटा–सा, ठगा–सा ा त– लांत बैठा ।ं चाहता –ं अब िव ाम िमले। िचर न सही,
अिचर ही। पर तु यह हवा म उड़ने का युग है। मेरे िपता ी ने बैलगाड़ी म जीवन–या ा क
थी, मेरा शैशव इ ा टांगा–घोड़ पर लुढ़कता तथा यौवन मोटर पर दौड़ता रहा। अब
मोटर और वायुयान को अित ा त कर आठ सह मील ित घंटा क चाल वाले राके ट पर
पृ वी से पांच सौ मील क ऊंचाई पर मेरा वाध य उड़ा चला जा रहा है। िव ाम िमले तो
कै से? इस युग का तो िव ाम से आचूड़ वैर है। ब त घोड़ को, गध को, बैल को बोझा
ढोते–ढोते बीच राह मरते देखा है। इस सािह यकार के ानय क पूणा ित भी कसी
दन कह ऐसे ही हो जाएगी। तभी उसे अपने तप का स पूण पु य िमलेगा।
गत यारह महीन म दो–तीन घंट से अिधक नह सो पाया। स भवत: ने भी
इस थ क भट हो चुके ह। शरीर मुझा गया है, पर दय आन द के रस म सराबोर है। यह
अभी मेरा पैसठवां ही तो बस त है। फर रावण जगदी र मर गया तो या? उसका
यौवन, तेज, दप, दु साहस, भोग और ऐ य, जो म िनर तर इन यारह मास म रात– दन
देखता रहा ,ं उसके भाव से कु छ–कु छ शीतल होते ए र िब दु अभी भी नृ य कर उठते
ह। गम राख क भांित अभी भी उनम गम है। आग न सही, गम राख तो है।
फर अभी तो मुझे मार खानी है, िजसका िनमं ण म पहले दे चुका ।ं मार तो
सदैव खाता रहा ।ं इस बार का अपराध तो ब त भारी है। ‘वयं र ाम:’ म ा वेदकालीन
जाितय के स ब ध म सवथा अकि पत–अत कत नई थापनाएं ह, मु सहवास है,
िववसन िवचरण है, हरण और पलायन है। िश देव क उपासना है, वै दक–अवै दक अ ुत
िम ण है। नर–मांस क खुले बाजार म िब है, नृ य है, मद है, उ मुख अनावृत यौवन है।
यह सब मेरे वे िम कै से बदा त करगे भला, जो अ ीलता क संभावना से सदा ही
च कायमान रहते ह।
पर तु म तो भयभीत नह ।ं जैसे आपका िशव–मि दर म जाकर िशव– लंग
पूजन अ ील नह है, उसी भांित मेरा िश –देव भी अ ील नह है। उसम भी धम–त व
समावेिशत है। फर वह मेरा नह है, ाचीन है, ाचीनतम है। सनातन है, िव क देव,
दै य, दानव, मानव आ द सभी जाितय का सुपूिजत है।
सय क ा या सािह य क िन ा है। उसी स य क ित ा म मुझे
ा वेदकालीन नृवंश के जीवन पर काश डालना पड़ा है। अनहोने, अिव ुत, सवथा
अप रिचत त य आप मेरे इस उप यास म देखगे; िजनक ा या करने के िलए मुझे
उप यास पर तीन सौ से अिधक पृ का भा य भी िलखना पड़ा है। 1 फर भी आप अव य
ही मुझसे सहमत न ह गे। पर तु आपके गु से के भय से तो म अपने मन के स य को मन म
रोक रखूंगा नह । अव य क ग ं ा और सबसे पहले आप ही से।
सािह य जीवन का इितवृ नह है। जीवन और सौ दय क ा या का नाम
सािह य है। बाहरी संसार म जो कु छ बनता–िबगड़ता रहता है, उस पर से मानव– दय
िवचार और भावना क जो रचना करता है, वही सािह य है। सािह यकार सािह य का
िनमाता नह , उ ाता है। वह के वल बांसुरी म फूं क भरता है। श द– विन उसक नह ,
के वल फूं क भरने का कौशल उसका है। सािह यकार जो कु छ सोचता है, जो कु छ अनुभव
करता है; वह एक मन से दूसरे मन म, एक काल से दूसरे काल म, मनु य क बुि और
भावना का सहारा लेकर जीिवत रहता है। यही सािह य का स य है। इसी स य के ारा
मनु य का दय मनु य के दय से अमर व क याचना करता है। सािह य का स य ान
पर अवलि बत नह है, भार पर अवलि बत है। एक ान दूसरे ान को धके ल फकता है।
नये आिव कार पुराने आिव कार को र करते चले जाते ह। पर दय के भाव पुराने नह
होते। भाव ही सािह य को अमर व देता है। उसी से सािह य का िचर स य कट होता है।
पर तु सािह य का यह स य नह है। असल स य और सािह य के स य म भेद है।
जैसा है वैसा ही िलख देना सािह य नह है। दय के भाव क दो धाराएं ह; एक अपनी
ओर आती है, दूसरी दूसर क ओर जाती है। यह दूसरी धारा ब त दूर तक जा सकती है–
िव के उस छोर तक। इसिलए िजस भाव को हम दूर तक प च ं ाना है, जो चीज़ दूर से
दखानी है, उसे बड़ा करके दखाना पड़ता है। पर तु उसे ऐसी कारीगरी से बड़ा करना
होता है, िजससे उसका स य– प िबगड़ न जाए, जैसे छोटे फोटो को ए लाज कया जाता
है। जो सािह यकार मन के भाव के छोटे–से स य को िबना िवकृ त कए इतना बड़ा ए लाज
करके कट करने क साम य रखता है क सारा संसार उसे देख सके , और इतना प ा रं ग
भरता है क शताि दयां–सह ाि दयां बीत जाने पर भी वह फ का न पड़े, वही स ा और
महान् सािह यकार है।
के वल स य क ही ित ा से सािह यकार का काम पूरा नह हो जाता। उस स य
को उसे सु दर बनाना पड़ता है। सािह य का स य य द सु दर न होगा तो िव उसे कै से
यार करे गा? उस पर मोिहत कै से होगा? इसिलए स य म सौ दय क थापना करनी
पड़ती है। स य म सौ दय क थापना के िलए, आव यकता है संयम क । स य म जब
सौ दय क थापना होती है, तब सािह य कला का प धारण कर जाता है।
स य म सौ दय का मेल होने से उसका मंगल प बनता है। यह मंगल प ही
हमारे जीवन का ऐ य है। इसी से हम ल मी को के वल ऐ य क ही देवी नह , मंगल क
भी देवी मानते ह। जीवन जब ऐ य से प रपूण हो जाता है, तब वह आन द– प हो जाता
है और सािह यकार ा ड के येक कण को ‘आन द– पममृतम्’ के प म िचि त
करता है इसी को वह कहता है ‘स यं िशवं सु दरम्’।
‘वैशाली क नगरवधू’ िलखकर मने िह दी उप यास के स ब ध म एक यह नया
मोड़ उपि थत कया था क अब हमारे उप यास के वल मनोरं जन क तथा च र –िच ण
भर क साम ी न रह जाएंग।े अब यह मेरा नया उप यास ‘वयं र ाम:’ इस दशा म
अगला कदम है। इस उप यास म ा वेदकालीन नर, नाग, देव, दै य, दानव, आय, अनाय
आ द िविवध नृवंश के जीवन के वे िव मृत पुरातन रे खािच ह, िज ह धम के रं गीन शीशे
म देखकर सारे संसार ने उ ह अ त र का देवता मान िलया था। म इस उप यास म उ ह
नर– प म आपके सम उपि थत करने का साहस कर रहा ।ं ‘वयं र ाम:’ एक उप यास
तो अव य है; पर तु वा तव म वह वेद, पुराण, दशन और वैदिे शक इितहास– थ का
दु सह अ ययन है। आज तक क मनु य क वाणी से सुनी गई बात, म आपको सुनाने पर
आमादा ।ं म तो अब यह काम कर ही चुका। अब आप कतनी मार मारते ह, यह आपके
रहम पर छोड़ता ।ं उप यास म मेरे अपने जीवन–भर के अ ययन का सार है, यह म पहले
ही कह चुका ।ं
उप यास म ा यात त व क िववेचना मुझे उप यास म थान– थान पर
करनी पड़ी है। मेरे िलए दूसरा माग था ही नह । फर भी येक त य क स माण टीका के
िबना म अपना बचाव नह कर सकता था। अत: ढाई सौ पृ का भा य भी मुझे अपने इस
उप यास पर रचना पड़ा। अपने ान म तो म सब कु छ कह चुका। पर अ तत: मेरा
प रिमत ान इस अगाध इितहास को सांगोपांग नह कर सकता था। सं ेप म मने
सब वेद, पुराण, दशन, ा ण और इितहास के ा क एक बड़ी–सी गठरी बांधकर
इितहास–रस म एक डु बक दे दी है। सबको इितहास–रस म रं ग दया। फर भी यह
इितहास–रस का उप यास नह ‘अतीत–रस’ का उप यास है। इितहास–रस का तो इसम
के वल रं ग है, वाद है,अतीत–रस का । अब आप मा रए या छोिड़ए, आपको अि तयार है।
एक बात और, यह मेरा एक सौ तेईसवां थ है। कौन जाने, यह मेरी अि तम
कलम हो। म यह घोिषत करना आव यक समझता ं क मेरी कलम और म खुद भी काफ
िघस चुके ह। यारे पाठक, लगुडह त िम यह न भूल जाएं।

ानधाम– ित ान
शाहदरा, द ली
26 जनवरी, 1955
–चतुरसेन

1.उ भा य इसी उप यास के शारदा काशन, भागलपुर ारा कािशत दूसरे सं करण म
देखा जा सकता है।
वयं र ाम:
1. ितल-तंदल

क ल-कू ट के समान गहन यामल, अनावृत, उ मुख यौवन, नीलमिण-सी योितमयी


बड़ी-बड़ी आंख, तीखे कटा से भरपूर–िजनम म िस , लाल डोरे ; मदघू णत दृि ,
क बु ीवा पर अधर िब ब-से गहरे लाल, उ फु ल अधर, उ वल हीरकाविल-सी धवल
द तपंि , स पु , ितिबि बत कपोल और लय-मेघ-सी सघन, गहन, काली, घुंघराली
मु कु तलाविल, िजनम गुंथे ताज़े कमल-दल–शतदल, क ठ म वणतार- िथत गुंजा-
माल; अनावृत, उ मुख, अचल यौवन-युगल पर िनर तर आघात करता आ अंशुफलक,
मांसल भुजा म वणवलय और ीण क ट म वणमेखला; र ा बरमि डत स पु
जघन-िनत ब, गु फ म वण-पजिनयां, उनके नीचे हेमतार- िथत क छप चम-उपानत्-
आवृत चरण-कमल। स : कशोरी।
नृ य कर रही थी चतु पथ पर। िवषधर भुजंिगनी के समान दोन अनावृत भुज-
मृणाल हवा म लहरा रहे थे। उं गिलयां, चम टका खंजरी पर मृद ु आघात कर चरणाघात के
सम पर विनत कर रही थ । चार ओर आबाल-वृ ; नर-नागर, नर-नाग, देव-दै य-
ग धव- क र- असुर-मानुष, आय- ा य।
ब त देर तक वह नृ य करती रही, गाती रही, हंसती रही, हंसाती रही, लुभाती,
रझाती रही । सभीनर-नाग, देव-दै य, असुर-मानुष, आय- ा य िवमोिहत हो उस क ल-
कू ट गहन यामल अनावृत उ मुख यौवन के िवलास को देख हष म हो गए। नृ य क
समाि पर बािलका पर वण-ख ड बरसाने लगे। कसी ने आंख से िपया वह प- वाल,
कसी ने हंसकर आ मसात् कया उसे, कसी ने वणदान देते ए पश कया उसका
कमल-कोमल करतल। कसी पर उसने ूपात कया, कसी पर कटा पात। कसी पर
बं कम दृि दी और कसी को देखकर हंस दी।
वण-ख ड कमर म बांधे चमकोष म रखे, और वण-पजिनय को क छपचम-
उपानत् पर कं क रत करती ई वह चली म क हाट पर। ब जन िवमोिहत-िवमूढ़ हो
उस उ म अनावृत उ मुख यौवन को आंख से पीते आगे-पीछे इधर-उधर चले। म क
हाट पर जाकर उसने पीठ-पु ष से कहा–‘‘दे म !’’
‘‘ला वण।’’
‘‘कै सा वण?’’
‘‘वह, जो अभी चमकोष म बांधा है।’’
‘‘वह तो मातृ-चरण के िलए है।’’
‘‘तो म यहां कहां है?’’
‘‘इन भा ड म या गरल है ?’’
‘‘ वण जो नह देते उनके िलए गरल है।’’
-poison ‘‘तो गरल ही दे।’’
‘‘गरल देने क नगरपाल क आ ा नह । म लेना हो तो ले।’’ पीठ-पु ष ने दांत
िनकाल दए!
‘‘ला फर, म दे।’’
‘‘तो ला वण।’’
‘‘अरे मूढ़, कै सा वण?’’
‘‘म या य ही बंटता है, शु क दे।’’
‘‘नृ य या देखा नह तूने ?’’
‘‘ य नह , ने को अव य देखना पड़ा, पर इसम मेरा दोष नह । तू मेरी हाट के
सामने आकर य नाची ?’’
इतने म एक त ण भीड़ से आगे आया। उसका कशोर वय था, उ वल याम वण,
काकप ीवा पर लहरा रहे थे, कमर म कृ णािजन, क धे पर धनुष-तूणीर, हाथ म शूल,
िवशाल व , बड़ी-बड़ी आंख, श त ललाट, भीगती मस, कुं िचत भृकु ट, के ह र-सी क ट,
कठोर पंडिलयां, अभय मु ा, सुहासिस अिभनि दत मुख ी।
त ण ने एक वण पीठ-पु ष के सामने फककर कहा–‘‘ वण, म देता –ं उसे तू
म दे।’’
पीठ-पु ष ने हंसकर वण को परखा और मंजूषा म रखकर म भा ड उठाकर
त णी को दे दया। भा ड को मुँह म लगाकर त णी गटागट म पीने लगी। आधा भा ड
पीकर उसने तृ होकर सांस ली, जीभ से ह ठ को चाटा–हंसी, फर दो कदम आगे बढ़,
अपना अनावृत, उ मुख यौवन त ण के व व से िब कु ल सटाकर घू णत, मदरं िजत
कटा त ण पर फक, दोन भुजा म म -भा ड थाम, ऊंचा कर उसे त ण के ह ठ से
लगाकर कहा–‘‘अब तू पी।’’
त ण ने अपनी भुजा म त णी को समेट िलया। एक ही सांस म वह सारा म
पी गया। फर उसने त णी के लाल-लाल ह ठ पर अपने म िस अधर रखकर
कहा–‘‘अब चल।’’ त णी हंस दी। उ वल हीरकाविल के समान उसक धवल द तपंि
िबजली-सी क ध उठी। उसने म भा ड फक त ण के कं ठ म अपनी भुजव लरी डालकर
कहा–‘‘चल।’’
दोन पर पर आ लंिगत होकर एक ओर को चल दए। नर-नाग-देव-दै य-असुर-
मानुष-आय- ा य सब नर-नागर पीछे रह गए।
त ण ने पूछा–‘‘तेरा ाम यहां कहां है ?’’
‘‘उस उप यका म, अजना के तट पर।’’
‘‘और गो ?’’
‘‘गो भी वह है।’’
‘‘कब वह आया है ?’’
‘‘इसी शरद् ॠतु म।’’
‘‘कहां से ?’’
‘‘का यप सागर-तट से।’’
‘‘का यप सागर-तट पर या तेरा पुर है ?’’
‘‘वहां मातृकुल रहता है।’’
‘‘ कस पुर म ?’’
‘‘िहर यपुर म।’’
‘‘तू या असुर-कु ल से है ?’’
‘‘नह , दै य-कु मारी ,ं और तू ?’’
‘‘म ॠिषकु मार ।ं पर मातृकुल मेरा भी दै यकु ल से है।’’
‘‘और िपतृकुल ?’’
‘‘आय- ा य।’’
‘‘कहां का है तू ?’’
‘‘आं ालय का।’’
‘‘तो यहां बिल ीप म कै से घूम रहा है ?’’
‘‘तेरे ही िलए!’’–त ण ने हंसकर उसे और कसकर अपने व से सटा िलया।
त णी ने उसे ठे लते ए कहा–“िधि वप , स य कह।’’
‘‘अब तो स य यही है, म तुझ पर िवमोिहत ।ं ’’
‘‘कब से ?’’
‘‘इसी ण से।’’
‘‘तो उधर चल।’’
‘‘ या ाम म ?’’
‘‘नह , उप यका के उस अंचल म।’’
‘‘वहां या है ?’’
‘‘िवजन वन है, सघन छाया है, एक सरोवर है, उसम शतदल कमल िखले ह।
च वाक, सारस का आखेट वहां ब त है। िहरण भी ह। आखेट अ छा होगा। आखेट खाएंगे
और रमण करगे, चल।’’
‘‘चल।’’
दोन उस गहन वन म घुस गए।
2. तू न थम है, न अि तम

उप यका का वह ा त िवजन और सघन था। वहां िनमल जल का सरोवर था,


सरोवर म शतदल कमल िखले थे। ताल-तमाल-िह ताल क सघन छाया म म या क धूप
छनकर–शीतल होकर सोना-सा िबखेर रही थी। म द पवन चल रहा था। सरोवर म
च वाक, सारस, हंस आ द नाना िवहंग थे। त णी एक िवशाल शा मली वृ के नीचे सूखे
प पर लेट गई। हंसते ए उसने कहा–‘‘अब तू आखेट ला।’’
त ण ने धनुष पर हाथ डाला। गदन ऊंची कर इधर-उधर देखा। वह ल बे-ल बे
डग भरता आ वन म घुस गया। एक ह रण और कु छ प ी मारकर वह लौटा। त णी ने
फु त से अरणी िघसी–सूखे धन म अ याधान कया। त ण ने आखेट के मांस-ख ड कए।
दोन ने मांस भून-भूनकर खाना आर भ कया। त णी ब त भूखी थी, वह च- चकर
मांस खाने लगी। कभी आधा मांस-ख ड खाकर वह त ण के मुंह म ठूं स देती, कभी उसके
हाथ से छीनकर वयं खा जाती। खा-पीकर तृ होकर वह त ण क जांघ पर िसर रखकर
लेट गई। दोन भुजाएँ ऊंची करके उसने त ण क क ट लपेट ली। वह बोली–‘‘बड़ा
ह तलाघव है तुझम।’’
‘‘मुझे यास करना ही न पड़ा। आखेट सहज ही िमल गया।’’ त ण ने हंसकर
कहा।
‘‘तू कस कु ल का आय है ?’’
‘‘वै वण पौल य ।ं ’’
‘‘तूने कहा था–तेरा मातृकुल दै यकु ल है।’’
‘‘हां।’’
‘‘कहां का ?’’
‘‘लंका का। लंकापित सुमाली दै य का दौिह ।ं ’’
‘‘अरे वाह ि य!’’–त णी हष लास से चीख उठी। आन दाितरे क से उसने ध ा
देकर त ण को भूिम पर िगरा दया। फर उसके व -व पर अपने अनावृत उ मुख यौवन
युगल ढालकर त ण के अधर चूमकर बोली–‘‘सुपूिजत है तू।’’ उसे अपने म िव -सा
करता आ युवक बोला–‘‘तू या लंकािधपित सुमाली को जानती है ?’’
‘‘सुपूिजत है लंकािधपित दै ये सुमाली का कु ल। मेरा िपता दै ये का सेनापित
था। िहर यपुर के देवासुर-सं ाम म उसने िव णु से यु कया था।’’
त ण ने दोन भुजा म उसे लपेट व म दबोच िलया और उसके सघन जघन को
अपनी सुपु जंघा म आवेि त करते ए बोला–‘‘तब तो तू मेरी ही है।’’
उसने अपना िशिथल गा जैसे त ण को अपण करते ए सुरा-सुरिभत आवेिशत
गम ास लेते ए कहा–‘‘आज म तेरी ।ं तू व छ द रमण कर।’’
‘‘और आज के बाद ?’’ त ण ने अपने दांत त णी के दांत पर रगड़ते ए कहा।
‘‘जैसा मेरा मन होगा। जैसा मुझे चेगा।” उसने ने िनमीिलत कर िलए।
तमाल क सघन छाया म से छनकर अपरा क सुनहरी धूप उनके अनावृत,
िववसन स पु टत अंग पर पड़ रही थी। सरोवर म प ी कलरव कर रहे थे। दोन िन ल,
िन प द उस िवजन वन म पणश या पर एक-दूसरे म समाए ए से, आन दाितरे क से तृ -
सु -िव मृत पड़े थे। त णी ने त ण के कान म अधर लगाकर कहा–‘‘अब उठ।’’
त ण ने त णी के ह ठ पर ह ठ रखकर व पर भार डालते ए ह ठ ही म
कहा–‘‘ठहर तिनक।’’
‘‘अब नह । देखता नह , सूय क करण ितरछी हो चल ।’’
उसने धके लकर त ण को अपने से पृथक् कया और हंसती ई उसे ख चकर जल
म धंस गई।
दोन िववसन िवजन वन के अगम जल म ड़ा करने लगे। अमल नील जल
आ दोिलत हो उठा। दोन एक-दूसरे के पूरक–एक-दूसरे के एका त सा ी थे। दोन के मु
यौवन कभी जल-तल पर और कभी जल-गभ म िमथुन मीन-से िवचरने लगे। कभी त णी
जल म डु बक लगाती–त ण उसे ढू ंढ़ लाता। कभी दोन तैरने चले जाते दूर तक। कभी
दोन संि हो तैरते। कभी उनके व पर पर टकराते, कभी अधरो । कभी त णी जल
क बौछार त ण पर मारती। कभी त ण उसके िववसन-अनावृत गा को दोन बिल
भुजा म िसर से ऊंचा उठाकर ज़ोर से कलकारी मारता।
सूय ि ितज पर झुक चला। ा त- ला त त णी त ण का हाथ थाम जल से
िनकली। जल-िब दु दोन के अंग पर ढर-ढरकर मोती क भांित इधर-उधर भूिम पर
िबखरने लगे।
वह एक िशलाख ड पर अलस भाव से उ ान लेट गई। अपरा न क पीली धूप
उसके स पूण िवव गा पर फै ल गई। त ण भी वह आ खड़ा आ। जल उसके लौहगात
से टपक रहा था। उसके बा पाश म ब त-से शतदल कमल पु प थे। उ ह उसने त णी पर
िबखेर दया। त णी ने उसके गात को भरपूर दृि से पीते ए कहा–‘‘कमनीय है तू रमण,
ि य है, ि यतम है। आ, शृंगार दे मुझ।े कपोल पर लो -रे णु मल दे, कु च को शैलेय से
िचि त कर, सघन जघन को अरिव द-मकर द से सुरिभत कर, चरणतल को ला ारं िजत
कर, कु तल वृ म ये शतदल कमल गूंथ, पंडिलय म मृणाल मसल। आ, मेरे िनकट आ,
प रर भण दे मुझ,े िव ा त कर, ओ ि य–ि यतम !’’
त ण ने िविधवत् रमणीय रमणी को शृंगा रत कया। कु च को शैलेय से िचि त
कया। कपोल से लो -रे णु मला, अधर पर ला ारस दे के श म कमल गूंथे। जघन को
मकर द से सुरिभत कया। भुजा म मृणाल-वलय लपेट दए। वह रमणीय रमणी
शृंगा रत हो, मू तमती सा य-वन ी-सी दप उठी। त णी का शृंगार स प करके त ण ने
हंसते-हंसते पूछा–‘‘अब और तेरा या ि य क ं ?’’ त णी ने अपनी भारी-भारी पलक म
बं कम कटा भरकर, त ण को आपाद िववसन देख, दांत म लाल-लाल जीभ को दबाकर
सी कार-सा करते ए म द वर म कहा–‘‘अब प रर भण दे, आ याियत कर, चु बन कर,
सवाग चु बन कर।’’ उसने दोन भुज-मृणाल ऊंचे फै ला दए। त ण ने आ लाद-अितरे क से
आवेिशत-सा हो सा य-वन ी-सी उस कमनीय कािमनी को अपनी बिल बा म अधर
उठाकर व म समेट िलया और उसके येक अंग के अगिणत चु बन ले डाले।
आन दिवभोर हो रमणी ने अपनी भुजव लरी त ण के क ठ म लपेट शत-सह ितचु बन
िलए। वह जैसे त ण के अंग- यंग म स पूण धंस गई। जगत् जैसे खो गया।
अ तंगत सूय क रि म रि मयां वन ी को रं िजत करने लग । त ण ने धीरे से
रमणी को िशलाख ड पर बैठाकर अधोव दे नीवी ब धन कया। वयं क टब ध पहना–
मृगािजन धारण कया, फर उसके ला ारं िजत चरणयुगल गोद म लेकर क छप चम-
िन मत उपानत् चरण म डाल चमर ु बांधने लगा। त णी ने चरण-नख का त ण के व
पर आघात करके कहा–
‘‘कमनीय है तू रमण।’’
‘‘सच ?’’
‘‘सच, ऐसा और नह देखा।’’
‘‘और भी देखे ह तूने ?’’
‘‘ब त।’’
‘‘ कतने।’’
‘‘मने िगने तो नह ।’’
‘‘इतने ही से यौवन म ?’’
‘‘मुझे इसम अिभ िच है।’’
‘‘काहे म ?’’
‘‘िनत नए यौवन के आ वादन म।’’
‘‘पर अब तो तू मेरी है ?’’
‘‘वाह, ऐसा भी कभी होता है? म दै यक या ,ँ दै यबाला क यह मयादा नह
है।’’
‘‘कै सी मयादा ?’’
‘‘जहां मेरा मन होगा, रमण क ं गी।’’
‘‘और म ?’’
‘‘तू कमनीय है, रमणीय है, तेरा मातृकुल और िपतृकुल व र है, तेरा सहवास
सुखकर है, तू भी आ जब जी चाहे।’’
‘‘म तुझे यार करता ।ं ’’
‘‘ यार या होता है ?’’
‘‘जो ाण म ाण का िवलय करता है।’’
‘‘तो तू यार कर, अनुमित देती ।ं क तू तू ही पहला पु ष नह है, तुझसे पहले
ब त आ चुके ह, तू ही अि तम नह है, और अनेक आएंग।े ’’
त ण के ने से अि फु लंग िनकलने लगे। ोध से उसके नथुने फू ल गए। उसने
त णी के चरण गोद से िगराकर उसे ज़ोर से िशलाख ड पर धके ल दया और खड़े होकर
कहा–‘‘नह , अब और नह आएंग।े अब जो तुझे छु एगा उसी के साथ तेरा भी म त ण वध
क ं गा। मेरी यह मयादा है क एक ी एक ही पु ष क अनुबि धत हो।’’
ध ा खाकर िगरने से त णी को आघात लगा। उसका शृंगार खि डत हो गया।
उसने स पणी क भांित चपेट खाकर उठते ए वेग से त ण के व पर पदाघात कया।
पदाघात खाकर त ण लुढ़कता आ भूिम पर िगर गया। उसके उठने से थम ही त णी ने
फर पदाघात कया– फर कया– फर कया। त ण का सारा शरीर धूल म भर गया। उसके
मुख से खून झरने लगा। इससे तिनक भी िवचिलत न होकर त णी ने भुजंिगनी क भांित
फू कार करते ए कहा–‘‘दै यकु लपित क कु मारी पर मयादा बांधने वाला तू होता कौन है
रे अधम ?’’ पदाघात के िलए फर उसने चरण उठाए।
त ण उछलकर एक ओर खड़ा हो गया। मुख का र प छकर उसने कहा–‘‘तेरे
साथ मने रमण कया है–अब तेरा वध नह क ं गा। पर तू मेरी है-के वल मेरी। पश तो दूर,
अब तू कसी पु ष का यान भी नह कर सकती।’’
‘‘रमण कया है तो रमण क भांित बात कर, मूखता न कर। मुझे भी तेरा िव ह
वीकार नह है, म तुझ पर स ।ं ’’
‘‘तो मांग ले।’’
‘‘ या ?’’
‘‘जो तुझे चािहए।’’
‘‘मुझे देगा तू ?’’ वह ज़ोर से अ हास कर उठी।
‘‘दूग
ं ा, मांग ले।’’ त ण ने आवेश म कहा।
‘‘इस मरकत-मेखला पर इतराता है तू !’’ त णी ने उसक कमर म बंधी महाघ
मरकतमिण क मेखला को हाथ से छू कर कहा।
‘‘तो यही ले।’’
‘‘िधि वप , तू दाता है क याचक ?’’
‘‘तेरे यार का याचक ।ँ ’’
‘‘तो याचक ही रह। दाता का द भ न कर।’’
उसने आगे बढ़कर त ण क कमर म बांह डाल दी और हंसकर कहा–‘‘आ चल,
ाम चल, एक भा ड म पी आ।’’
‘‘ ाम आऊंगा, पर म पीने नह , तुझे हरण करने।’’
‘‘यह कै सी बात ?’’
‘‘यह मेरी सं कृ ित है-र –सं कृ ित। कु मारी का हरण हमारे िलए वैध है–हरण क
ई कु मा रयां हमारी अनुबंिधत होती ह।’’
‘‘और तू मुझे अनुबि धत करे गा? तेरा साहस तो कम नह है रे , रमण।’’
‘‘म रमण नह , रावण ,ं पौल य वै वण रावण। भूलना नह यह नाम।’’
वह तेज़ी से एक ओर को चल दया। त णी अके ली उस िवजन वन म खड़ी, उसे
अिनमेष देखती रही। अ धकार उप यका को अपने अंक म समेट रहा था।
3. अब से सात सह ा दी पूव

अब से सात सह ा दी पूव जब बाली ीप के िवजन वन म सरोवर के तट पर


दै यबाला का अिभसार स प आ तब तक नृवंश म िववाह-मयादा दृढ़-ब नह हो पाई
थी। नर-नाग-देव-दै य-असुर-मानुष-आय- ा य सभी म ऐसे ही मु सहवास का चलन
था। उन दन भारत क भौगोिलक सीमाएं भी आज के जैसी न थ । आं ालय से लेकर
आं ीप तक–बाली, यव ीप, वण ीप, लंका, सुमा ा आ द ीप-समूह थल-संि थे
और इन ीप म नर-नाग-देव-दै य-दानव-असुर-मानुष-आय- ा य सभी नृवंश के जन
एकसाथ ही रहते थे। कु श ीप भी तब तक भारतवष से भूिम–संि था। उस समय तक
िव य के उस पार भारतवष के उ रापथ म आयावत था, िजसम सूयम डल च म डल
नाम से दो आय रा यसमूह थे। सूयम डल म मानव-कु ल और च म डल म इला से बना
एलकु ल रा य करता था। उ रापद से ऊपर भारतवष के सीमा त पर िपशाच , ग धव ,
क र , देव और असुर के जनपद थे। एलावत आ द य का मूल थान था, उरपुर और
अि प न म देव का आवास था और उनके पास का यप तट पर चार ओर दूर तक असुर,
ग ड़, नाग, दानव, दै य के ख डरा य फै ले ए थे।
िजस त ण ने दै यबाला को पौल य रावण वै वण कहकर अपना प रचय दया
था, उसी क बात कहते ह। वह मेधावी और तप वी त ण उन दन आ ालय महा ीप से
अपने साहिसक वीर सािथय सिहत उ र-पि म ीप-समूह को जय करता आ वण
लंका क ओर जा रहा था। उसने भारत के सम त दि णी ीप-समूह –अंग ीप (सुमा ा),
यव ीप (जावा), मलय ीप (मलाया), शंख ीप (बो नयो), कु श ीप (अ का) और
वाराह ीप (मेडागा कर) पर अिधकार कर िलया था। अब उसक नजर चार ओर समु से
िघरी ई, बड़े-बड़े सोने के ासाद से सि त ई वणलंका पर थी, िजसे उसने अपनी
राजधानी बनाने को चुना था। उन दन लंका का अिधपित इस त ण का सौतेला भाई
लोकपाल धनेश वै वण कु बेर य राज था।
आजकल िजस महा ीप को आ ेिलया कहते ह, उस काल म उसका नाम
आ ालय था। उन दन भारत और आ ेिलया के बीच इतना अ तर था। लंका और
मेडागा कर क भूिम भी ब त िव तृत थी तथा भारत को आ ेिलया से जोड़ती थी। उन
दन ये सब ीप भारत के अनु ीप माने जाते थे तथा इन ीप का, जो एक-दूसरे से िमले-
जुले थे, िवशाल भू-भाग लंका महारा य के अ तगत था।
िजस समय क घटना हम इस उप यास म व णत कर रहे ह, उससे कु छ दशा दी
पूव ही का यकु जपित कौिशक िव ािम ने अपने पचास प रजन को दि णार य म
िनवािसत कर दया था। उन दन ऐसी प रपाटी आयावत म थी। आयजन दूिषतजन को
दि णार य म िनवािसत कर दया करते थे। इन िनवािसत जन के दि णार य म ब त
जनपद थािपत हो गए थे। इन बिह कृ त पचास कौिशक प रजन के सब प रवार
दि णार य म ही न बसकर आगे आं ालय तक चले गए और वह बस गए। आय स यता
और सं कृ ित के कारण ही उनके जनपद सुसं कृ त और सुस प हो गए और इन प रवार
ने वहां क मूल जाितय से स पक थािपत कर अपने को आं घोिषत कर दया तथा उस
महा ीप का नाम भी आं ही रख िलया। इस जनपद का मुख पु ष मिहदेव कहलाने
लगा। िजस समय क घटना हमारे इस उप यास म व णत है, उस समय से कु छ थम
आं ालय का मिहदेव तृणिब दु था। तृणिब दु मनुपु न र यि त का पु था। इसी के काल
म देव ष पुल य वहां गए और मिहदेव तृणिब दु के अितिथ बने। उन दन सभी आय-
अनाय जाितय म राजस ा और धमस ा संयु ही थी। अिधकांश म ऐसा ही होता था।
तृणिब दु भी धम और रा य का अिधकारी था। ऋिष पुल य आय और युवक थे, सु दर
और सु िति त थे। संयोगवश उनका तृणिब दु क क या से ेम हो गया। तृणिब दु ने
अपनी पु ी इलिवला उ ह याह दी तथा उनसे वह रहने का अनुरोध कया। पुल य भी
वह अपना आ म बना प ी सिहत रहने लगे।
काला तर से तृणिब दु क क या इलिवला से पुल य को पु आ। पु का नाम
उ ह ने िव वा रखा और य से वेद पढ़ाया। उन दन आय का एकमा सािह य वेद था।
वह भी िलिखत न था, न आज क भांित चार वेद के प म प रपूण था। के वल थोड़ी-सी
अ त- त ॠचाएं थ जो क ठगत रहती थ तथा क ठपाठ ही ॠिषकु मार पढ़ते थे। आयु
पाकर उनम जो नवीन ॠचा का सजन कर सकते थे, वे वयं ॠिषपद धारण करते थे।
युवा होने पर इस त ण को भर ाज ने अपनी क या दे दी। उससे वै वण का ज म आ।
वै वण बड़ा तेज वी, मेधावी और उ साही त ण था। तृणिब दु और पुल य के समु ोग से
आय द पाल ने उसे धनेश कु बेर का पद दे लोकपाल बना दया। पु पक िवमान भी उसे
भट कया। िपता के परामश से वह दि ण समु के कू ल पर ि कू ट पवत पर बसी ई
अपनी राजधानी लंकापुरी म रहकर परम ऐ य भोगने लगा। इस समय यह नगरी सूनी
पड़ी थी। उसके चार ओर सुदढ़ृ दुग था। गहरी खाई थी। अ -श और वणमिण वहां
भरपूर थे। वै वण कु बेर ने लोकपाल होकर नगरी को फर से बसाया। उसे उ त कया
और देव, ग धव, य , अ सरा और असुर-दानव से स प कया।
वा तव म यह नगरी दै य क थी। हेित और हेित नामक दो स प दै य सरदार
थे। हेित ने काल दै य क बिहन भया से िववाह कया था। उससे उसे िव ु के श नामक पु
उप आ, िजसका िववाह स या क पु ी सालकटंकटा से आ। उससे सुकेश नामक पु
उ प आ। उसे िव ावसु गंधव ने अपनी पु ी वेदवती दे दी, िजससे उसके तीन पु ए–
माली, सुमाली और मा यवान्। ये तीन भाई बड़े वीयवान और तेज वी ए। अवसर
पाकर इ ह तीन भाइय ने दि ण समु -तट पर ि कू ट सुबेल पवत पर तीस योजन चौड़ी
और सौ योजन िव तार क लंकापुरी बसाई और उसे िविवध भांित स प कया।
िहर यपुर का अतोल िहर य ला-लाकर उ ह ने सुवण ही के दी ासाद का िनमाण
कया। धन, र , मिण से वे ासाद आपूयमाण कए। इ ह नमदा नाम क ग धव ने अपनी
प-यौवनस प ा तीन पुि यां दे द । ग धवपुि य से मा यवान् को सात पु और एक
पु ी ई। सुमाली को यारह पु और चार पुि यां । माली के चार पु ए। इसी कार
इन तीन भाइय का दै य-प रवार वृि गत होकर सुपूिजत आ। स पदा भी ब त बढ़ी।
अपने बल परा म से इन तीन भाइय ने पु -पौ -प रजन के साथ आसपास के ीप
को िविजत कर अतोल मिण, मािण य, वण एक कर िलया।
इसी समय तृतीय देवासुर-सं ाम का संकट आ उपि थत आ। इस सं ाम का मूल
कारण का यप सागर तट म ा वे वण क खान थ , जो िहर यक यप को ा ई थ
और िजन पर अभी तक दै य ही का अिधकार था। िजस समय समु -मंथन आ और देव ,
असुर तथा नाग ने िमलकर थम बार का यप सागर को पार कया तो भा य से दै य ही
को ये वण खान िमल । धमत: उ ह का उन पर आिधप य रहा। पर तु देव के नेता िव णु
ने छल-बल से वह ा सुवण हिथया िलया। वह ल मी शायद वही थी। इस पर ि तीय
देवासुर-सं ाम आ और िहर यक यप क मृ यु ई। पर तु इसके बाद िहर यक यप के
पु लाद ने िव णु से मै ी-सि ध कर ली तथा देव क ओर से दै य को िव णु ने यह
वचन दया क अब दै य का र पृ वी पर नह िगरे गा।
पर तु िहर यपुर और वहां का सारा वण-भ डार दै य ही के अिधकार म था।
दै य उसके कारण अिधक स प थे। यह बात देव के नेता िव णु को ब त खल रही थी।
उसका तक यह था क दै यपित िहर यक यप का वंश और उसका वंश एक ही दादा क
स तान ह। दोन ही के दादा मरीिच-पु क यप ह। अत: हम आधा वण- देश और
का यप सागर-तट िमलना चािहए। उधर िव णु (सूय) पु वैव वत मनु (एलम) का
िनवास छोड़ भारत म आयावत क थापना कर चुके थे। इसिलए दै य का यह जवाब था
क थम तो सूय (िव णु) का मूलवंश यहां अब है ही नह , दूसरे वण- देश हमारे दादा
का पैतृक नह है, हमारा अपना अ जत है। इसम से आधा हम देव को य द? झगड़ा
बढ़ता ही गया। लाद क मै ी कु छ काम न आई और थम लाद-पु िवरोचन का
समर- े म देव ने वध कया। फर तुमुल देवासुर-सं ाम म देव क छल-बल से जय ई।
बिल ब दी आ। ये तीन दै य-ब धु भी इस िवकट सं ाम म सेना सिहत परािजत ए। इस
सं ाम म इनके सारे भट और प रजन मारे गए। बड़ा भाई माली तो रणभूिम म ही काम
आया। सुमाली और मा यवान् सब सहायक सेना और प रजन का िवनाश तथा दै यराज
के पतन से हत भ, िवि और शोक त हो, ल ा, ोभ, भय तथा लािन के मारे लंका
लौटे ही नह –पाताल म जाकर िछप गए। कु छ लािन से और कु छ देव के भय से उनका
साहस लंका म जाने का न आ। आजकल िजस थान को अबीसीिनया कहते ह, उन दन
वही पाताल कहाता था। सुमाली के इस थान को आज भी सुमालीलड कहते ह। वह थान
अ का के पूव भाग म है। इससे लंका िचरकाल तक सूनी, उजाड़ और अरि त, िबना
वामी क नगरी क भांित िवप ाव था म पड़ी रही। उसी सूनी लंका पर वै वण ने
लोकपाल धनेश कु बेर होकर आय नेता और देव क सहमित से अिधकार कर िलया।
ब त काल बीतने पर सुमाली फर अपने गु वास से कट आ। इस समय
सुमाली वृ हो चला था। उसके साथ उसक षोडशी पु ी कै कसी और यारह पु थे। वे
सभी त ण थे। उसक इ छा थी क वह कसी कार अपनी लंका का उ ार करे और उसी
म अपने इस िति त दै यवंश को फर से थािपत करे । पर तु अि के समान तेज वी
कु बेर लोकपाल को देख उसका साहस न आ। वह सोचने लगा क अब म ऐसा कौन-सा
काम क ं िजससे मेरे कु ल क भलाई हो। उसने दूरद शता से िवचार कर अपनी ाणािधका
पु ी कै कसी से कहा–‘‘हे पु ी, तू प और गुण म ल मी के समान है। अब तू युवाव था को
ा ई है। म चाहता ँ क जापित के वंश म उ प पुल य के पु िव वा मुिन के पास
जा और उसको पित बनाकर कु बेर के समान तेजवान् पु उ प कर। जब तक तू ऐसा न
करे गी, हम ब धनमु न ह गे।’’ इस कार कै कसी को सब आगा-पीछा समझा-बुझाकर
उसने उसे पुल य-पु िव वा के पास उसके आ म म भेज दया। कै कसी ने िव वा के
पास जाकर कहा–‘‘हे तपोधन, म दै य महासेनापित सुमाली क क या ं और आपके पास
िपता क आ ा से पु - ाि क अिभलाषा से आई ।ं ’’ िव वा मुिन अधेड़ाव था म थे।
इस पसी त णी दै यबाला के ये वचन सुन और उसका ता य देख मोिहत हो गए।
उ ह ने उसका ताव वीकार कर िलया और उसे अपने िनकट आ म म रख िलया।
सुमाली दै य भी पु सिहत वह िव वा के आ म म जाकर रहने लगा। सुमाली बड़ा
दूरदश और राजनीित पु ष था। इस काय से उसका स ब ध जापित के वंश से थािपत
हो गया। अब वह पु ी के पु क धैयपूवक ती ा करने लगा। समय ा होने पर िव वा
को कै कसी से तीन पु और एक पु ी ई। पु म रावण, कु भकण और िवभीषण तथा
पु ी शूपणखा। िव वा ने तीन पु को िविधवत् वेद पढ़ाया। पर तु इन बालक के नाना
सुमाली क तो कु छ दूसरी ही अिभसि ध थी। ये बालक अपने मामा के साथ खेलते-खाते
बड़े होने लगे। रात- दन उ ह के साथ रहने लगे। उन सब पर नाना सुमाली का भाव
रहा। इन सबके बीच माता कै कसी का िनय ण। इस कार माँ-मामा-नाना इस मातृकुल
का ही सां कृ ितक भाव इन बालक पर िपतृकुल क अपे ा अिधक रहा। दै यकु ल म
मातृकुल क धानता क पर परा थी ही। िव वा मुिन ने इस बात पर अिधक यान नह
दया। एक बार धने र कु बेर पु पक िवमान पर चढ़कर अपने िपता से िमलने आया।
कै कसी ने उसे दूर से दखाकर रावण से कहा–‘‘अपने भाई धने र कु बेर को देख और
अपनी ओर देख। इसक अपे ा तू कतना दीन-हीन है। मेरी अिभलाषा है क तू उ ोग
करके इसके समान हो जा।’’ माता के ये वचन सुन तथा कु बेर का ऐ य देख रावण को बड़ी
ई या ई। उसने क ं ार भरके कहा–‘‘माता, तू िच ता न कर, म अपने इस भाई के समान
ही नह , इससे भी बड़ा बनकर र ग ँ ा।’’ अब य ही रावण और उसके भाई युवा ए, उनके
नाना सुमाली ने अपनी पैतृक नगरी लंका लेने के िलए उ ह उकसाया। ब धा सुमाली
रावण को छाती से लगाकर और ल बी-ल बी उसास लेकर कहता–‘‘अरे दौिह , म तुझसे
या क ,ँ हम तीन भाइय ने अपने भुजबल से िहर यपुर क अतुल स पदा, को ट भार
वण इस लंकापुरी म लाकर इसे स प कया। इसके ह य-सौध सब िहर यपुर के अनु प
वण ही से िन मत कराए, उसे मने सब भाँित सुपूिजत, सु िति त कया। पर तु भा यदोष
से वह मेरी वण लंका अब मेरी न रही। आज य द वह मेरी होती, तो पु , तू ही उसका
वामी और अिधपित होता। वह सब धन-र , मिण-मािण य िहर यमय सौध-ह य सब
तेरे ही तो ह। पु , तू ही उनका वामी है। वहाँ के सब वण-भ डार, श ागार एवं वैभव
का म तुझसे कहाँ तक वणन क ँ । आज तुझे, ाण से ि य अपने दौिह को, अनाथ क
भाँित देख मेरी छाती फटती है। पर तु म कहता –ँ ‘‘पु , एक दन तू ही लंका का
अधी र, दि ण का लोकपाल और इन सब ीपसमूह का वामी होगा, सवजयी, यश वी
नरपित होगा। म तेरे अंग म ऐसे ल ण देख रहा ँ और मेरे ये पु तेरे मामा ह त,
अक पन, िवकट, किलकामुख, धू ा , द ड, सुपा व, महाबल, सं ा द, ह त और
भासकण तेरे अधीन म ी ह गे।’’ रावण मह वाकां ी, साहसी और मेधावी था। इस
कार नाना और मामा से बार बार उकसाये जाने से उसके मन म महारा य संगठन क
आकां ा उ प हो गई। उसम तीन र का िम ण था। जापित के वंश का सव म आय
र , बिह कृ त ा य र और दै य र । वह अपने भाइय , िम और त ण को लेकर
आं ालय से िनकला। उसका धान सलाहकार उसका नाना सुमाली उसके साथ था।
सुमाली के दो पु ह त और अक पन तथा मा यवान् के पु िव पा तथा मारीिच
सहोदर मि य क भाँित उसके साथ थे। वह एक-एक करके सब ीपसमूह को जय
करता आ इस समय यव ीप म आ प च ँ ा था।
यहाँ त कालीन वातावरण और ाचीन इितहास पर थोड़ा काश डालना
आव यक है। उस िव तृत ागैितहािसक युग का य ि त् द दशन कराने के बाद हम
अपने उप यास को आगे चलाएँगे।
4. मनुभरत

हमारे पा ा य गु ने हम बचपन म पढ़ाया था क आय लोग खानाबदोश


गड़ रय क भाँित भ े छकड़ म अपने जंगली प रवार और पशु को िलए इधर से उधर
भटकते फरा करते थे। पीछे लोग ने प थर के नुक ले हिथयार से काम लेना सीखा।
मानव क इस स यता को वे यूिथल स यता कहते ह। इनम कु छ सुधार आ तो फर
‘िचिलयन’ स यता आई। इन हिथयार-औज़ार क स यता के समय का मनु य अिधक
अंश म नर-वानर ही था। उसम वा तिवक मनु य व का बीजारोपण नह आ था।
‘मु टे रयन’ –स यता के प ात् ‘रे निडयन’ स यता का ादुभाव आ। इस समय लोग म
मानवोिचत बुि का िवकास होने लगा था। फर इसके बाद स यताएँ वा तिवक
स यताएँ कहला । इनम से पहली स यता नव-पाषाणकालीन कही जाती है। इस युग का
मनु य अपने ही जैसा वा तिवक मनु य था। यह यूिथल स यता से लेकर नव-पाषाण
स यता तक का काल पाषाण-युग कहलाता है।
पाषाण-युग के बाद मानव-जाित म धातु-युग का ादुभाव आ। धातु-युग का
ार भ ता युग से होता है। नव-पाषाण युग के अ त तक मनु य क बुि ब त कु छ
िवकिसत हो गई थी। इसी समय कृ िष का आिव कार आ। कृ िष ही स यता क माता है।
आय ही संसार म सबसे थम कृ षक थे। कृ िष के उपयोगी थान क खोज म आय पंजाब
क भूिम म आए। इसी का नाम स िस धु देश रखा। वे सारे स िस धु देश म फै ल गए।
पर तु उनक स यता का के सर वती-तट था। सर वती-तट पर ही आय ने ता युग क
थापना क । यहाँ उ ह तांबा िमला और वे अपने प थर के हिथयार छोड़कर तांबे के
हिथयार को काम म लाने लगे। इस ता युग के िच न अ वेषक को ‘चा -डेर ’ तथा
‘िवजनौत’ नामक थान म खुदाई म िमले ह। ये थान सर वती- वाह के सूखे ए माग
पर ही ह। मैसोपोटािमया तथा इलाम म यही स यता ोटोइलामाइट स यता कहाती है।
सुमे जाित ोटोइलामाइट जाित के बाद मैसोपोटािमया म जाकर बसी है। सुमे स यता
के बाद िम क स यता का उदय आ। िस पुरात विवद् डॉ. डी. टेरा, जो अमे रकन
िव ान् ह, िनि त प से िस धु- देश को प थर और धातु-युग म िमलानेवाला कहते ह,
ता -स यता के बाद कांसे क स यता आई। कांसे क स यता संभवत: सुमे रयन लोग क
थी। उनका यह भी कहना है क कांसे क स यता वाली ये सुमे -ख ी (िहटाइट) टन-
िम ी आ द जाितय क स यताएं कसी अ य अ ात देश म तांबे क स यता म िवकिसत
ई थ । मैसोपोटािमया के उर-फरा- कश तथा इलाम के सुसा और तपा-मु यान आ द
देश म उ ह खुदाई म कांसे क स यता के नीचे ता -स यता के अवशेष िमले ह।
मैसोपोटािमया म जहां-जहां इस ोटोइलामाइट कही जाने वाली ता -स यता के िच न
िमले ह, उसके और सुमे जाित क कांसे क स यता के तर के बीच म कसी ब त बड़ी
बाढ़ के पानी ारा जमी ई िचकनी िम ी का चार फु ट मोटा तर ा आ है। यूरोपीय
पुरात ववे ा का यह मत है क िम ी का यह तर उस बड़ी बाढ़ ारा बना था, िजसको
ाचीन थ म नूह क लय कहते ह। ता युग क ोटोइलामाइट स यता के अवशेष इस
लय के तर के नीचे ा ए ह। इसका यह अथ लगाया गया क इस लय से थम ही
ोटोइलामाइट स यता का अि त व था। इस स यता के अवशेष के नीचे कु छ थान म
िन ेणी क पाषाण-स यता के िच न ा ए ह। यह पाषाण-स यता अ य त िन
ेणी क थी। इसम ोटोइलामाइट स यता के िवकिसत होने के कु छ माण नह िमले। इस
पर से पुरात व के इन िव ान ने यह िन कष िनकाला है क ोटोइलामाइट लोग अपनी
ता -स यता के साथ कसी अ य देश से इलाम और मैसोपोटािमया म आकर बसे थे। यहाँ
आकर उ ह ने यहाँ क मूल िनवासी पाषाण-स यता वाली जाित को न कर दया और
वयं यहाँ बस गए। ये खेती करते, पशु पालते तथा ऊनी व पहनते थे। तांबे के हिथयार
और औज़ार इ तेमाल करते थे। ये कस देश के मूल िनवासी थे, इसका पता ये महानुभाव
पुरात ववे ा नह लगा सके ह। यह जाित इस लय म न हो गई। लय के बाद एक
जाित कह से कांसे क स यता वाली आई और मैसोपोटािमया म बस गई। यही जाित
सुमे कहाई। डॉ टर कफोट, डी मागन, डॉ. ल डन आ द िव ान ने यह िनणय दया है।
पर तु यह ोटोइलामाइट जाित कौन थी, लय के बाद वह कहाँ चली गई, इसका कु छ
पता ये महानुभाव नह पा सके ।
इसके बाद सर जान माशल ने िस ध के आमरी देश क खुदाई क । उ ह ने उस
ता -स यता को आमरी-स यता का नाम दया और भूगभ म ा अनेक व तु के सा य
से उ ह ने यह िन कष िनकाला क ोटोइलामाइट स यता तथा आमरी-स यता एक ही
है। यही स यता स िस धु म सर वती-तट पर िवकिसत ई थी। वा तव म ये लोग आय
ही थे जो िबलोिच तान और ईरान होते ए इलाम तथा मैसोपोटािमया म लय के बाद
जाकर बस गए थे।
अब म इन सब पुरात ववे ा क इन गवेषाणा पर हफ मारने क धृ ता
करता ।ं िजन सू को हाथ म लेकर म आगे बढ़ना चाहता ,ं उनम इन पा ा य िव ान
के व णत थान सुषा, एलम, स िस धु, लय, और इन देश म जाितय के आवागमन
क मा यता के अित र ॠ वेद, ा ण, िव णु-पुराण, म यपुराण तथा अ य पुराण
के अ त त-अ वि थत वणन ह। इ ह सू पर म इस ागैितहािसक काल के कु छ
धुंधले रे खािच यहाँ उपि थत करता ।ँ म इन आगत आ ा ता-समागत जन के नाम-
धाम-जाित तथा उनके और भी मह वपूण िववरण यहाँ उपि थत क ँ गा, िजनके मूल
व पुराण आ द म ह, और िजनका समथन प शया, अरब, अ का, िम और अरब
तथा म य एिशया के ाचीन इितहास से होता है।
सबसे पहले म समय-िन पण के स ब ध म यह कहना चाहता ँ क पुराण म
ाचीन समय का िवभाग म व तर क गणना के अनुसार कया गया है। म व तर को
छोड़कर अतीत काल क ि थित जानने का कोई और उपाय नह है। पर तु पुराण म यह
काल-गणना इतनी बढ़ा-चढ़ाकर क गई है क उनक व णत काल-गणना बेकार ही है।
पर तु म व तर के कथन से हम यह लाभ अव य आ क वैव वत मनु से पहले हम छ:
म व तर िमलते ह। इतने ही आधार को लेकर, िजसम जो घटनाएँ व णत ह, उनका पूवापर
स ब ध िमलाकर म उसी के आधार पर यह काल-गणना कर रहा ।ं
ईसा से कोई चार हज़ार वष पूव भारतवष के मूल पु ष वायंभुव मनु उ प ए।
इनक तीन पुि यां तथा दो पु ए। पु के नाम ि य त और उ ानपाद थे। ि य त के
दस पु ए। इ ह ि य त ने पृ वी बाँट दी। ये पु अ ी को उसने ज बू ीप (एिशया)
दया। इसे उसने अपने नौ पु म बांट दया। बड़े पु नािभ को िहमवष-िहमालय से अरब
समु तक देश िमला। नािभ के पु महा ानी-सव यागी ॠषभदेव ए। ॠषभदेव के पु
महा तापी भरत ए–िज ह ने अ ीप जय कए और अपने रा य को नौ भाग म बांटा।
इ ह के नाम पर िहमवष का नाम भारत, भारतवष या भरतख ड िस आ। इसके
अन तर इस ि य त शाखा म पतीस जापित और चार मनु ए। चार मनु के नाम
वारोिचष, उ म, तामस और रै वत थे। इन मनु के रा यकाल को म व तर माना गया।
चा ुषा रै वत म व तर क समाि पर छ ीसवां जापित और छठा मनु, वायंभुव मनु के
दूसरे पु उ ानपाद क शाखा म चा ुष नाम से आ। इस शाखा म ुव, चा ुष मनु, वेन,
पृथु, चेतस आ द िस जापित ए। इसी चा ुष म व तर म बड़ी-बड़ी घटनाएँ ।
भरत वंश का िव तार आ। राजा क मयादा थािपत ई। वेदोदय आ। इस वंश का
थम राजा वेन था। इस वंश का पृथु वै य थम वेद ष था। उसने सबसे थम वै दक म
रचे। अगम भूिम को समतल कया गया। उसम बीज बोया गया। इसी के नाम पर भूिम का
पृ वी नाम िव यात आ। इसी वंश के राजा चेतस ने ब त-से जंगल को जलाकर उ ह
खेती के यो य बनाया। जंगल साफ कर नई भूिम िनकाली। कृ िष का िवकास कया। इन
छह मनु के काल का समय–जो लगभग तेरह सौ वष का काल है–सतयुग के नाम से
िस है। म व तर-काल म वह िस लय ई जब क का यप सागर तट क सारी पृ वी
जल म डू ब गई। के वल मनु अपने कु छ प रजन के साथ जीिवत बचा।
सतयुग को ऐितहािसक दृि से दो भाग म िवभ कया जाता है–एक ि य त
शाखा-काल, िजसम पतीस जापित और पाँच मनु ए। दूसरा उ ानपाद शाखा-काल,
िजसम चा ुष म व तर म दस जापित और राजा ए।
सां कृ ितक दृि से भी इस काल के दो भाग कए जाते ह। एक ा वेद काल–
उ तालीसव जापित तक; दूसरा वेदोदय काल–इसके बाद। भूिम का बंटवारा,
महाजल लय, वैकु ड का िनमाण, भूसं कार, कृ िष, रा य- थापना वेदोदय तथा भारत
और प शया म भरत क िवजय इस काल क बड़ी-बड़ी सां कृ ितक और राजनीितक
घटनाएं ह। वेदोदय चा ुष म व तर क सबसे बड़ी सां कृ ितक घटना है। सबसे बड़ी
ऐितहािसक घटना प शया पर आ मण भी इसी युग क है।
चा ुष मनु के पांच पु थे। अ यराित, जान तपित, अिभम यु उर, पुर और
तपोरत। उर के ि तीय पु अंिगरा थे। इन छह वीर ने प शया पर आ मण कया था।
उस काल म प शया का सा ा य चार ख ड म िवभ था, िजनके नाम सु द, म , वरवधी
और िनशा थे। पीछे हरयू (िहरात) और व त (काबुल) भी इसी रा य म िमल गए थे। यहाँ
पर ि य त शाखा के वारोिचष मनु के वंशज रा य कर रहे थे। जान तपित महाराज
अ यराित च वत कहे जाते थे। आसमु ि तीश थे। भारतवष क सीमा के अि तम देश
और प शया का पूव ा त जो स यिगदी के नाम से िव यात है, उस समय स यलोक
कहाता था। उसी के सामने सुमे के िनकट वैकु ठधाम था, जो देमाब द–एलबुज पवत पर
अभी तक ‘इरािनयन पराडाइस’ के नाम से िस है। देमाब द तपो रया ा त म है। इसी
ा त के तपसी िवकु ठा और उसके पु वैकु ठ थे। वैकु ठधाम उ ह क राजधानी थी।
च वत महाराज अ यराित जान तपित के दूसरे भाई का नाम म यु या अिभम यु
था। ाचीन प शयन इितहास म उ ह मै यु और ीक म ‘मैमनन’ कहा गया है। अजनेम म
अिभम यु (Aphumon) दुग के िनमाता तथा ाय-यु के िवजेता यही अिभम यु ह। िस
पुराण-का ‘ओडेसी’ म इ ह अिभम यु महाराज क शि त वणन क गई है। इ ह ने ही
सुषा नाम क नगरी बसाई, जो सारे संसार म ाचीनतम नगरी थी। इसका नाम म युपुरी
था। अ यराित के तृतीय भाई उर थे। इ ह ने अ का, सी रया, बैबीलोिनया आ द देश को
जीता और ईसा से 2000 वष पूव इ ह के वंशधर ने अ ाहम को पददिलत कर पूव िम
म अपना रा य थािपत कया। इस कथा का संकेत ईसाइय के पुराने अहदनामे म िमलता
है। आज भी उर बैबीलोिनया का एक देश है। िस उवशी अ सरा इसी उर देश क
थी। ईरान के एक पवत का नाम भी उरल है। उरफाउरगंज नगर है। उसका उरखेगल देश
है। उरिमया देश भी है, जहां जोरा टर का ज म आ था। अ का म भी एक ा त रायो-
िड-ओरो है। उर-वंिशय के ईरान म–उर, पुर और वन–ये तीन रा य थािपत ए।
उर के दूसरे भाई पुर थे। अब भी एलबुज के िनकट इनक राजधानी पुरिसया है।
इ ह के नाम पर ईरान का नाम प शया पड़ा। पुर और उर के भाई तपोरत थे। इ ह ने
‘तपोरत’ नाम से अपना रा य थािपत कया जो अब तपो रया ा त कहाता है। वहां के
िनवासी अब तपोरत कहाते ह। इस देश म वैकु ठ है, जो देमाब द पवत पर है। तपसी
वैकु ठधाम थी। तपोरत के राजा आगे देमाब द कहाने लगे, िज ह हम देवराज कहते ह।
आजकल इस तपो रया भूिम को मजां दरन कहते ह।
जान तपित अ यराित के वंशज अराट ह। आरमेिनया इनका ा त है। अराट ने
आगे असुर से भारी-भारी यु कए ह। अराट पवत भी अ यराित के नाम पर ही है।
सी रया का नागर अ यरात (Adhrot) भी इ ह के नाम पर है।
उर के पु अंिगरा थे, िज ह ने अ का को जय कया। अंिगरा-िप यूना के
िनमाता और िवजेता यही थे। अंिगरा और म यु क िवजय –यु और अिभयान –के
वणन से ईरानी-िह ू धम थ भरे पड़े ह।
इन छह भरत ने ईरान पर इतना उ आ मण कया था क वहां के सब जन
और शासक उनसे अिभभूत हो गए। उनके सव ाही और भयानक आ मण से पददिलत
होकर वे उ ह अिहत देव–दु:खदायी अह रमन और शैतान कहकर पुकारने लगे। अवे ता म
अंिगराम यु–अह रमन कहा गया है। बाइिबल म उ ह शैतान कहा गया है। िम टन के
‘ वग-नाश’ क कथा म इसी िवजेता को शैतान कहा गया है। पा ा य देश के पुराण-
इितहास इ ह छह िवजेता क दि वजय के वणन से भरे ए ह। पा ा य पुराण-
सािह य म इ ह िवकराल देव और सैटािनक हो ट का अिधनायक कहा गया है। ये छह
अमर अनिहतदेव क भांित ईरान के ाचीन उपा यदेव हो गए थे। इ ह क िवजय-गाथा
िम टन ने चालीस वष तक गाई है। पा ा य इितहास-वे ा इस आ मण का काल ईसा से
तेईस सौ वष पूव बताते ह। हमारा अनुमान है क लय के कु छ ही वष पूव चा ुष का यह
आ मण ईरान के िनवासी अपने ही भाईब धु पर आ था और इनके वंशधर वह बस
गए थे। यही कारण है क भारतीय पुराण म इनके पूवज का वंशवृ तो है, पर तु इनके
वंशज का वंश-िव तार नह है। इनका वंश-िव तार इन िविजत उपिनवेश के ाचीन
इितहास म िमलता है।
5. लय

मसीह से लगभग ब ीस सौ वष पहले यह जगद्िव यात लय ई थी, िजसका


वणन संसार क सब ाचीन पु तक म है। इस लय का वणन हमारे ा ण- थ तथा
पुराण म तो है ही, ाचीन प शया के इितहास-लेखक जैनेिसस ने भी इस स ब ध म ब त
कु छ िलखा है। यह लय संभवत: वतमान मेसोपोटािमया और प शया के उ र-पि म
देश म ई थी। पाठक य द न शे म यान से देखगे तो उ ह पता लगेगा क प शया का
यह भाग दि ण म फारस क खाड़ी और उ र म का यप सागर से दबा आ है। प शया के
पि मो र कोण म जो अरमीिनया देश है, वहां के बफ ले पवत से फरात नदी
िनकलकर मेसोपोटािमया म आई है, जो मेसोपोटािमया क खास नदी है। यह नदी ब त
बड़ी और िव तार वाली है। मेसोपोटािमया म और भी न दयां ह। शतुल अरब ऐसी नदी है
िजसम समु म चलने वाले जहाज आ-जा सकते थे। कहते ह ाचीन बसरा नगर, जो ईसा
क छठी या सातव शता दी म बसाया गया था, म एक लाख बीस हजार नहर थ , िजनम
नाव चलती थ । इससे हम समझ सकते ह क ये न दयां समु के समान ही गहरी और बड़ी
थ । संभवत: बफ के बांध टू टकर इसी दजला नदी म बाढ़ आई और उस देश को, जो
फारस क खाड़ी और का यप सागर के बीच है, समूचा डु बो दया। इस भू थल म कु छ ऐसे
थल थे जो समु तल से अठारह हजार फ ट ऊंचे थे। वहां संभवत: जल नह प चं ा। पर तु
वृ वन पित और मनु य, पशुप ी इस देश के भी न हो गए। पैले टाइन का वह भाग,
जो फारस क खाड़ी के पि म-दि ण म है, समु से के वल छ: हजार फ ट ऊंचा है। वह
सवथा जलम हो गया और वहां के सब जीव-ज तु वन पित न हो गए। वह न होने
वाली जाित अराट थी जो महाराज अ यराित जान तपित क वंशज थी। दि ण स का
नाम उन दन उ र म था। यह से म –मेडज े –ईरान म आए थे, िजनके म पित वंशधर
महारथी श य महाभारत सं ाम म सि मिलत ए थे।
इस लय म सारा ईरान जलम हो गया और वह मृ युलोक बन गया। उस लय
का कारण वहां के कसी वालामुखी का िव फोट था। वालामुखी के िव फोट से बफ क
च ान टू ट ग और दलजा नदी का उ म, का यप सागर और फारस क खाड़ी इन सबने
िमलकर ईरान को जलम कर दया। का यप सागर देश म एक थान बाकू है, जहां अब
भी पृ वी से अि िनकलती है। इस अि -दृ य को देखने िसक दर भी गया था। यहअि
दृ य संभवत: उसी वालामुखी के िव फोट का अवशेष है। शतपथ ा ण म तथा
म यपुराण म इस लय क जो घटना व णत है, उसम िलखा है क मनु के हाथ एक
मछली–म य लगी िजसने उसक र ा क । इस म य का भी इितहास सुिनए। यह मनु
संभवत: म यु–अिभम यु या उसके वंशधर थे। बाइिबल म तथा अवे ता म इसे ‘नूह’ का
नाम दया गया है। बेबीलोिनयन द तकथा के अनुसार लय से पूव बेबीलोिनया म म य
जाित के ही लोग का रा य था। यह ाचीन जाित िचरकाल से उस देश पर शासन करती
थी। यह जाित िस नािवक थी। लय के समय म यु ने इसी जाित के कसी नेता क
सहायता से अपने प रवार क ाण-र ा क होगी।
म यु ने सुषा नगरी बसाई और उसे अपनी राजधानी बनाया था। पुराण तथा
ाचीन प शया के इितहास से इस पुरी के वैभव का बड़ा भारी वणन है। यह िस नगरी
बेरखा नदी के तट पर थी, जो उस काल म स यता का के थी। संभवतः सुषा तक लय
का जल नह प च ँ ा। फर भी नगरी लय के बाद उजड़ गई। ब त लोग मर गए–शेष उसे
छोड़कर चले गए। इस उजड़ी ई नगरी पर धूल के तर जमते चले गए। काला तर म यह
तर पांच फ ट मोटा हो गया।
6. व ण ा

लय का जल बेरखा नदी-तट पर बसी सुषा नगरी तक नह प च ं ा था। फर भी


कु छ लोग मर गए, कु छ छोड़कर चले गए। सुषा नगरी, जो म युपुरी भी कहाती थी, उजाड़
और वीरान ब त दन तक पड़ी रही। उस पर पांच फ ट मोटा धूिल- तर जम गया। इसके
बाद जब वायंभुव मनु के अि तम जापित द का अिधकार समा आ, तब द क
पु ी अ दित का पु व ण; सूय का सबसे बड़ा भाई, सुषा नगरी म आया। उसने उसे
खुदवाकर साफ कया–धूल-िम ी दूर क । ऊंची-नीची भूिम समतल क । के ए जल को
नहर खुदवाकर समु म बहा दया और सुषा- देश और मेसोपोटािमया म आ द य क
बि तयां बसा ।
पाठक को ात हो, अ दित से मरीिच को बारह पु ए, जो आ द य कहाए।
व ण उनम सबसे बड़े और सूय सबसे छोटे थे। पर तु आगे चलकर जैसे सूयकु ल ने आय
जाित का िनमाण कया, उसी कार व ण ने सुमेर जाित को ज म दया। यह सुमेर जाित–
सुमेर-स यता क तारक और ईरान क ाचीन शासक ई। संसार के पुरात विवद्
डॉ टर कफोट और ल डन आ द कहते ह क ोटोइलामाइट स यता का ही िवकिसत
प सुमे -स यता है; अथात् ोटोइलामाइट स यता से ही सुमे -स यता का ज म आ।
ोटोइलामाइट जाित लय के कारण वदेश वापस चली गई और वहां इसक स यता का
िवकास आ। इस िवकिसत स यता का ही नाम सुमे -स यता आ। सुमे जाित फर
ोटोइलामाइट लोग के िनवास- थान पर इलाम और मेसोपोटािमया म बस गई।
ोटोइलामाइट जाित का वदेश कौन था और वह लय के बाद कहां चली गई, तथा कहां
से पुन: सुमे -स यता को लेकर मेसोपोटािमया म आ गई, संसार के पुरात विवद् अभी इस
का उ र नह दे पाए ह, पर तु इस का उ र हमारे पुराण म है, और वह यह क
िजसे ोटोइलामाइट जाित कहा गया है वह चा ुष जाित थी, िजसके छ: महारिथय ने
बलोिच तान और ईरान होते ए इलाम और मेसोपोटािमया को जय करके अपने रा य
थािपत कए थे तथा वह भारतवष के ही दि ण-पि म इलाके म उससे पूव िवकिसत ई
थी तथा सुमे -स यता के सं थापक–एक कार से दुबारा नई सृि रचने वाले–सूय के
ये भाई, व ण थे, और उ ह ही ा के नाम से िव यात कया गया है। यह एक माक
क बात है क के वल सूय के ही वंशघर भारत म आय-जाित म संग ठत ए। पर तु शेष
यारह आ द य ईरान, िम , पैले टाइन, अरब और चीन, ित बत तक फै ल गए। इन सबने
देव जाित का संगठन कया। सं ेप म देव का अथ है–आ द य। म युपुरी व ण के काल म
सुषा के नाम से िव यात रही, पीछे इ पुरी अमरावती के नाम से िव यात ई।
पा ा य जन व ण को लाड येटर कहते ह–िजसका अथ है देवकतार ा।
अवे ता म व ण को अ ं द कहा है। इलोिहम–इलाही भी व ण ही को कहते थे। इलाही
या इलोिहम का अथ है इलावत के उपा य देव–व ण। शातपथ ा ण म और जैनेिसस के
इितहास म समान प से कहा गया है क व णदेव ने पृ वी और आकाश को सम कया।
व ण ने लय के के ए जल को समु से नहर खुदवाकर बहा दया–समु क सीमा
बांधी–जल को अिधकार म कया–पृ वी को सूखी, नम और उपजाऊ बनाकर उसम बीज
बोए। इसी से व ण को जल का देव कहते ह।
उन दन अरब और फारस के बीच का सारा इलाका सुषा थान कहाता था। इसी
को छल देश–चि डया कहते थे। व ण का एक नाम अवे ता म ‘उरम द’ भी िस है।
नवीन सृि रचने और देव का–आ द य का ये पु ष होने से व ण को ा कहा जाता
है, तथा जल का िवभाजन करने से नारायण कहा गया। जल को सं कृ त म नीर भी कहते
ह। ीनार– ीर-सागर–िसरी का समु –प शया क खाड़ी और उरमजसागर का नाम था।
म य पुराण के अनुसार ा ने ा ड के अथात् अपने रा य के दो ख ड कए–एक
ऊपर का पाव य देश-ख ड, दूसरा नीचे का भूिमख ड। ऊपर का ख ड वग और नीचे का
भूिम कहाया। ठीक इसी पुराण के अनुसार ही, जैनेिसस आ द पा ा य पुराण-शा ी भी
कहते ह। व ण या अवे ता म ा को ‘उरम द’ कहा गया है। यह ‘उर महा य’ का
िबगड़ा नाम है जो पुराण म आया है। पुराण म -संकट का उ लेख है। यह वह घटना
है जब ा ने जल को दो समु म िवभािजत कया। अं ेज़ इितहासकार जैनेिसस कहता
है–‘इलाही ने कहा है क जल से जल पृथक् होना चािहए।’ इसके िलए एक श द अं ेजी का
है Ordeal; इस श द का अथ कोश म िलखा है–जल और अि क परी ा। जैनेिसस कहता
है–‘इलाही ने कहा– वग के जल को एक जगह एक होने दो और शेष पृ वी को सूखने
दो।’
ाचीन ईरानी इितहासकार और अवे ता दोन ही म वीकार कया गया है क
व ण लोग व ण को ही सृि का रचियता मानते ह। ाचीन ईरान के कापाडोिसया ा त
म इ और व ण क शपथ के िशखालेख िमले ह। व ण के इस समूचे सा ा य का नाम
पहले अमरदेश था और सुषा का नाम अमरावती भी था। अब भी वहां के ाचीन अमर के
वंशधर क अमरे ह जाित बसती है। पीछे मनुपु ी इला के नाम पर इस देश का नाम
एलम या इलावत आ। आजकल यह देश करमान इलाका कहाता है : यही सुमे -
स यता का के सुमे -सा ा य था। यह थान फारस क खाड़ी के ऊपर है। जैनेिसस ने
प शया के इितहास म इसे शीनार भूिम–शीशतान कहा है। पुराण म इसे ीनगर िलखा
है। फारस क खाड़ी ही ीर-सागर कहाती थी। जोरा टर व ण के उपासक थे। इनके समय
म प शया म व ण ही महाराज, महा उपा य, देव, िवधाता, कहे जाते थे। इसी धम को
ईरानी लोग अनइटा रयािन म कहते थे।
व ण ा के पु अंिगरा और भृगु ए, जो देव ष तथा याजक कु ल के सं थापक
ए। अंिगरापु बृह पित देव के याजक ए। भृगु को दै यपित िहर यक यप ने अपनी
पु ी द ा दी और दानवराज पुलोम ने अपनी पु ी पौलोमी। द ा से भृगु को शु -
का –उशना िस पु आ, जो दै य-दानव-कु ल का याजक आ। शु का एक पु अि
आ। उसका पु च । च िस च वंश का मूल पु ष आ। दूसरा पु व ा आ
िजसका पु िस िश पी आ। देव म उसका नाम िव कमा और दै य म मय िस
आ। पौलोमी क संतान म यवन, ॠचीक, जमदि और परशुराम ए।
7. आ द य

चेता के पु द ने साठ क या का दान कया। उसने तेरह क यप को, दस यम


को, स ाईस च को, चार अ र नेिम को, दो भृगुपु को, दो कृ शा को और दो अंिगरा
को द । आज के िव का स पूण नृवंश इ ह क संतित है।
अ दित से क यप ने बारह पु उ प कए। ये बारह आ द य के नाम से िस
ए और इनके कु ल का संयु नाम आ द य-कु ल पड़ा। इनम जो देव-भूिम म रहे, वे देव
कहाए, और जो भारतवष म आए वे आय कहाए। व ण सबसे ये थे और िवव वान्
सबसे छोटे। िवव वान् का ही नाम सूय था। असुर याजक भृगुवंशी शु -उशना के पु व ा
ने अपनी पु ी रे णु सूय को याह दी। रे णु का ही नाम सं ा और अि नी भी था। वह जैसी
पवती ी थी, वैसी पग वता भी थी। िवव वान् का रं ग याम था और वह सु दर भी
न था। इससे वह मािननी सदैव ही सूय का ितर कार करती रहती थी। काल पाकर सूय से
इस ी के एक पु आ जो वैव वत मनु के नाम से िस आ। इसके बाद यम और यमी
दो जुड़वां स तान । अभी ये तीन बालक ही थे क कसी बात पर ठनककर रे णु पित से
गु सा हो िपता के घर चली गई। तीन ब को अपनी मुंहलगी दासी सवणा को स प गई।
सवणा भी बड़ी प-लाव यवती ी थी। वह नव-यौवना भी थी। सं ा क मुंहलगी थी।
शी ही यह िवव वान् क कृ पापा ी हो गई और फर ेयसी बन वािमनी क ही भांित
ठाठ से रहने लगी। समय पाकर िवव वान् से सवणा के गभ से एक पु , दो क याएं ।
पु का नाम शनै र रखा गया, और तपती तथा िवि क या का। वैव वत मनु अपनी
िवमाता के नाम पर साव ण मनु भी कहाया। क तु सवणा एक तो दासी थी, दूसरे
िवव वान् का ेम और आदर पाकर उसका मन बढ़ गया था। फर यह वाभािवक था क
वह सं ा क स तान क अपे ा अपनी ही संतित से अिधक ममता रखती थी। यम उ
वभाव का बालक था। उसे िवमाता का यह प पात सहन नह आ और एक दन बात -
ही-बात म गु सा होकर यम ने िवमाता सवणा को लात मार दी। सवणा इस पर आपे से
बाहर हो उठी और उसने यम क टांग तोड़ दी।
घर क कलह िवव वान् तक प च ं ी। सब बात सुनकर उसे बड़ा ोध आया। उसने
सवणा को इस बात पर ब त लानत-मलामत दी क वह य सब बालक से समान ेह
नह रखती। अ तत: िवव वान् उससे ु होकर रे णु को लाने के िलए उ ै: वा पर सवार
होकर अपने सुर व ा के घर असुर-भूिम म गया। ससुराल म जाकर उसने अपनी
मानवती ी रे णु को अ य त कृ श, दीन, जटाधा रणी तथा हाथी के शु ड से िथत
पि नी क भांित मिलन और संत पाया। व ा ने दामाद का ब त स कार कया, अपनी
पु ी क उपे ा करने पर उलाहना भी दया। रे णु के साथ ब त मान-मन वल आ।
अ तत: उस मानवती प ी को स कर सूय ने उसे शृंगार कराया और वयं भी ग ध,
पु प, र ाभरण धारण कर, अपनी ि यतमा रे णु को उ र कु के मनोरम देश म उसका
मन बहलाने और उसके साथ िवहार करने के िलए ले गया। आजकल का कु द तान
आरमीिनया के नीचे का देश ही उन दन उ र कु कहाता था और सूय िवव वान् का
सुर व ा, जो िव कमा के नाम से भी िव यात िश पी था, इस रयासत का वामी था।
इसक राजधानी का नाम ‘वन’ था। सूय के उस तेज वी अ को देख रे णु ब त स ई
और वयं उस पर सवार होकर वन-िवहार करने लगी। िवव वान् हंस-हंसकर उसे िचढ़ाने
के िलए ‘अि नी-अि नी’ कहकर पुकारने लगे। यह उ र कु म िवहार करते ए उसने
फर दो जुड़वां बालक को ज म दया, जो आगे चलकर अि नीकु मार के नाम से िव यात
ए और बड़े वीर यो ा, िच क सक तथा ॠिष ए। ये अ य त पवान् थे। इ ह ने कर ,
वय और विश को अपना िम बनाया। सुदास को उनक ी सुदव
े ी ा करने म
सहायता क । अ धे और लंगड़े परावृज को चंगा कया। िव पला क टू टी ई टांग अ छी
कर दी। ब मती को सोने का हाथ लगा दया। ॠ ना के नकली ने लगाए। रे मा,
ब दन, क व, अ तक, म यु, सुच त, पृि गु, अि , ेतय, कु स, यय, वसु, दीघ वस,
औिशज, क ीवान्, रसा, तृशोक, मा धाता, भर ाज, अितिघ व, दवोदास, कशोजु,
तृषद यु, व , उप तुत, किल, व, पृथुराज ष, सपु, मनु, सयात्, िवमद, आिध , सूभर,
ॠत तूप, कृ शानु, पु कु स, वशाि त, पु षाि त, अ यवन, आ द ग य-मा य जन
से िम ता क । द यु से यु भी कए। ये दोन अि नीकु मार कहाते थे, पर तु इनके
वा तिवक नाम नास य और द थे।
िवव वान् के ये पु यम माता-िपता दोन क अपने ित उपे ा के भाव से
ब त िख ए। अपने शुभाचरण से देव म यह धमराज कहाने लगे थे। समथ होने पर ये
अपने ताया व ण के पास चले गए। उ ह ने इ ह िपतृलोक का अिधपित और लोकपाल
बना दया और ये नरक नामक नगर बसा वहां रहने लगे। अपवत वतमान ईरान का एक
देश था–जो कलातनादरी के िनकट था। आजकल इसे अवद या अिववद–दोज़ख–कहते ह।
िजस समय यम ने वहां जाकर अपने नवीन रा य क थापना क , उस समय से कु छ पूव
ही महा जल- लय हो चुका था। वहां के अिधकांश लोग उस जल- लय म मर चुके थे,
इसिलए यम के रा य को मृ युलोक कहने लगे। इ ह ने ाचीन ईरान और यूनान क
ॠचाएं तैयार क । इ ह ने द ाचेतस के कु ल क दस क या को हण कया। इनक
एक प ी सं या से सां य जाित के अ ज ए जो इितहास म सीिथयन िस ए। इ ह के
वंश के नीप व पाल के वंशधर ने िम और यूनान म फै लकर िम का थम राजवंश
2188 ई. पू. म और असुर का थम राजवंश 2059 ई. पू. म थािपत कया। आगे नीप-
वंश को जनमेजय ने िविजत कया। सम त असुर- देश म फै ली ई वसु, म , भानु, घोष,
सां य, हंस, िव कमा, मनीिष, िवड़, ण, मंगोल, रमण, धर, हयताल आ द शाक ीपी
जाितयां यम के ही वंश क ह। ये अपने पूवज तथा कु लदेव सूय क उपासक थ । सूय ही को
ये नृवंश का पू य पु ष मानती थ । कु शान-हयताल, जो इितहास म हाइट- न और तुक
बताए गए ह, यम के ही वंशधर ह।
वसु के आठ पु वसु कहाए। इनम ये का नाम धर था। धर का पु आ, जो
देव-दै य-पूिजत महाबली दुधष देव आ। िवड़ और ह वाह, धर के ये दो और पु ए।
अि भी आठ व तु म एक था। उसका पृथक् अि वंश चला। सां य के पु हंस संभवत:
जमन ह। हयताल का राज ईरान म था। धर के पु के उ रािधकारी म त् गण िहरात
आ द देश के िनवासी थे।
आज भी ईरान का ‘यमथल’ थान यम क मृित नई करता है। ईरानी इितहास म
‘यमिशद’ का नाम िव यात है। ईरानी लोग उसी नाम पर अपने नाम ‘जमशेद’ रखते ह,
यमिशद क पूजा करते ह।
िस है क यमी ने यम से िववाह करने क याचना क थी, िजसे यम ने
अ वीकार कर दया था। दै य-कु ल म भाई-बहन, माता-पु म िववाह का चलन था।
देवकु ल म भी वैयि क िववाह का रवाज न था। सारी जीवन- णाली सामूिहक थी।
स पि भी सामूिहक थी। इसिलए यौन-स ब ध भी यौथ थे। यह वा तव म वे यावृि न
थी, य क शरीर का े ता और िव े ता कोई न था। यौन स ब ध पर कोई रोक-टोक न
थी। जहां पु ष के िलए भिगनी-गमन और मातृ-गमन भी कोई दोषपूण नह माना जाता
था, वहां ी के िलए ातृ-गमन और िपतृ-गमन म भी कोई दोष न था। उस युग म एक
गभ से उ प होने वाली संतान अपने को भाई-बहन करके न जान सकती थ । औरस से
उ प भाई-बहन का आपस म कसी कार का यौन स ब ध नह हो सकता था। पर यह
कोई जान ही न सकता था क कौन कस औरस से उ प है।
यही कारण था क संतान का प रचय मां के नाम अथवा कु ल से होता था। उस
युग म देव और दै य म कोई भी ि कसी ि का िपता हो सकता था। य कहना
चािहए क एक ाम के सब लोग िपता कहे जा सकते थे। भिगनी-गमन बाद तक भी
जायज़ रहा।
शिन का दूसरा नाम ुितकमा भी था। उसे यूनान देश का रा य िमला। यूनान का
हैलीओडे रा यवंश शिन ही के खानदान म था। सूय क चार राजधािनयां थ : आ द य
नगर, क यप नगर, इ वन और डार। उसने बेबीलोिनया, सी रया और िम को जय
करके ि िव म क उपािध पाई थी। आगे चलकर आ द य का यह कु ल सारे ही संसार म
ाप गया िजसम सबसे अिधक िव तार सूय ही का आ। सी रया-िनवासी और अरब
ाचीन काल से सूय के उपासक ह। प शया के डेजट के िनवासी ाचीन काल म ‘आ द य’
कहलाते थे। अदन म आद का िव िव ुत मि दर था जो सोने-चांदी क ट से बना था,
और छत म मोती और र जड़े थे। ‘आद’ अरबी भाषा म सूरज ही को कहते ह। ‘आदम’,
िजसक कथा बाइबल म है, सूय का ही नाम था। ‘अरब’ या ‘यारा’ भी अरबी भाषा के सूय
ही के नाम ह। अरबी म आद एक गो भी है। संभव है, सूयवंशी अरब कसी ाचीन बात
को सूय के समान पुरातन कहा करते ह । अरब म एक खोट ा त भी है। खोट सूय ही का
नाम है। अदन का ाचीन नाम आ द यपुर था और यह सूय क एक राजधानी थी।
8. दै य–दानव

द क सबसे बड़ी पु ी दित थी। उसका वंश दै य वंश कहलाया। दित के मरीिच
से चार पु ए–िहर यकिशपु, िहर या , व ांग और अ क।
िहर यकिशपु के चार पु ए– लाद, अनु लाद, लाद और सं लाद।
लाद के चार पु ए–आयु मान्, िशिव, वा किल और िवरोचन। िवरोचन का
पु बिल आ। बिल के ब त पु ए, ये पु बाण आ। बाण अजेय यो ा था। उसे
महाकाल कहते थे। व ांग का पु तारक था। ये सब अपने-अपने समय के तापी दै य
राजा ए।
िहर या के उ कू र, शकु िन, मूतसंतापन, महानािभ, महाबा और कालनाभ ये
परा मी पु ए, िजनके पु -पौ का अन त िव तार आ।
द क तीसरी क या दनु भी क यप को ही दी गई थी। दनु को क यप से श बर,
शंकर, एक क, महाबा , तारक, वृषपवा, पुलोमा, िव िचि मय आ द पु ए। वृषपवा
क पु ी श म ा से ययाित का याह आ। पुलोमा और कािलका नामक दो क याएं भी दनु
को , िजनके पृथक् वंश पौलोम और कािलके य चले। ये सब दानव वंश कहाए।
िहर यकिशपु क एक बहन थी, िजसका नाम संिहका था। वह दानव िव िचि को याही
थी। इसके वंश म श य, वातािप, नमुिच, इ वल, नरक, कालनाभ, च योधी, रा आ द
तेरह वीर पु ए। ये सब सिहके य कहाए, िजनम रा अ य त भयंकर िस आ। िनिवत
और कवच, जो सं लाद के वंश म थे, तप वी हो गए।
का यप सागर-तट से लेकर गज़नी, िहरात, हरम, कुं जशहर, खुरासान, बुखारा,
गलदमन, शंकारा, इक, शाकटा रया, वशपुर, वा पोरस, कश आ द देश म इसी दै य-वंश
का िव तार आ। वृषपवा सी रया का राजा था।
िहर यकिशपु ने अपनी नई राजधानी िहर यपुर बसाई थी, जो एक स प नगरी
हो गई थी। उधर उसका भाई िहर या बेबीलोन का अिधपित था। दै य और दानव के
और भी रा य आसपास थे। इस कार समूचे एिशया माइनर का देश इन दो महाशि य
म बंटा आ था। एक तरफ दै य-दानव के रा य थे, दूसरी ओर आ द य के , जो देव कहाते
थे। बल के संतुलन म दै य ही का पासा ऊंचा था, य क एक तो वे ये थे, दूसरे उनके
रा य स प थे। उनका संगठन अि तीय था। पर तु इस भूिम म दो जाितयां और भी
िनवास करती थ : एक ग ड़ और दूसरी नाग। दित, अ दित, दनु–इन तीन ि य के
अित र क यप क दो ि यां और थ –एक क ,ू दूसरी िवनता। क ू क संतान म छ बीस
नाग वंश चले। नाग म शेष, वासु क, कक ट, त क, धृतरा , धनंजय, महानील, अ तर,
पु पद त, शंखरोमा आ द बल राजा थे। िवनता के दो पु थे–ग ड़ और अ ण। अ ण के
दो पु ए–स पाित और जटायु। इनके भी अनेक पु ए।
9. देवासुर–सं ाम

देव , दै य तथा उनके िम के रा य का य - य िव तार होने लगा, य - य


ऐसे राजनीितक और आ थक कारण उ प होने लगे क इन दायाद बा धव का िम -भाव
से िमल-जुलकर रहना असंभव हो गया।
िहर यकिशपु क राजधानी िहर यपुरी का यप सागर तट पर थी। प शया का लूट
या लट देश जहां है और िजसे कबीर भी कहते ह, वही काला तर म न दनवन िस
आ। का यप सागर क जो भूिम आजकल औ सस या पार-द रया कहाती है, उसी के
ऊपरी भाग म दाह- थान या न दनवन था। इसी महाम भूिम को ेट डेज़ट और सा ट
डेज़ट भी कहते ह। यह सव थम वण क खान का पता लगा, िजसे ा कर दै य का नाम
िहर यकिशपु पड़ा। इसी के कारण थम देवासुर-सं ाम आ, िजसक पर परा लगभग
तीन सौ वष तक चलती रही। चौदह दा ण देवासुर-सं ाम इस बीच म ए तथा देव,
दै य, आ द य जो पर पर दायाद बा धव थे, िचरश ु हो गए।
ब त-सा वण पाकर और अपने बलवान् भाई िहर या क सहायता से
िहर यकिशपु ने चार ओर अपने रा य क सीमाएं बढ़ानी आर भ क । अनेक देवलोक को
िविजत कया। देव को मार भगाया। इससे देव पर िहर यकिशपु का भारी आतंक छा
गया। इस समय तक स पूण उ र-पि म का फारस और समूचा अफगािन तान
िहर यकिशपु के अधीन हो चुका था। बेबीलोन और उसके आसपास के देश उसके भाई
िहर या के अिधकार म थे। देवगण चार ओर से दबते चले जा रहे थे और िव णु इससे
ब त चंितत थे। वे देव का संगठन करके येक मू य पर वण थान तथा दै यभूिम को
अिधकृ त करना चाह रहे थे।
इस समय यूरोप के उ री-पि मी देश म जो नारवे ीप है, उसे उस काल म
कोलावराह या के तुमाल ीप कहते थे–आजकल भी उस अंचल को कोला पैिन सुला ( ीप)
कहते ह। यहां कोला–वराह-वंिशय का रा य था। अित ाचीन काल से यहां यह जाित
रहती थी। आज तक भी यहां के िनवासी कोल–को ट-कै ट कहाते ह। उनके नाम भी वाराह
के नाम पर होते ह। लय-काल के बाद वराह-राज से व णदेव को एकाणव के जल से
पृ वी को उबारने म बड़ी सहायता िमली थी। तभी से देव के इस जाित से मै ी-स ब ध
हो गए थे। अब देव के उकसाने से वाराह ने आ मण करके िहर यकिशपु के वीर भाई
िहर या को मार डाला और बेबीलोन पर सूयपु मनु के ि तीय पु नृग का आिधप य
हो गया। वाराह के वंश क एक शाखा नृग के साथ िमल गई और उसक उपािध देवपु
कहाई। आगे चलकर ईरान के े प इसी वंश म ए, जो देवपु कहाते तथा वाराह क
मू त पूजते थे। यही सूयवंशी नृग नृ संहदेव के नाम से िव यात ए और िहर या के
िनधन से दुबल िहर यकिशपु को नृ संह ने अपने बल परा म से आ ा त करके मार
डाला। नृ संह या नृग के वंशज आज भी ईरान म रहते ह और नृि टो कहाते ह। नृ संह के
सै य-संचालन के िशलािच और िशलालेख लुलवी और बेबीलोिनया ा त म िमले ह।
नृि टो जाित के लोग का यप सागर के उ री तु क तान से फारस क खाड़ी तक फै ले ए
थे। ईरानी इितहासकार नृगवंिशय के अिधनायक का नाम ‘नरमिसन’ बताते ह, वहां
नरमिसन क अध संह मू त है। नरमिसन एक ा त का नाम भी िस आ जो इ टखर के
िनकट परसा ा त म है। वा तव म खर के इ ट िहर यकिशपु ही थे। इ टखर का अथ है–
मूलपु ष। यही इ टखर िहर यकिशपु क दूसरी राजधानी थी। इ टखर म इ तखारी जाित
अब भी रहती है। नरमिसर या नरमिसन नृ संहदेव ही का अप ंश है।
िहर यकिशपु का वध सुमना पवत पर आ था। यह पवत का यप सागर के िनकट
ही है। इसी के पास देमाब द थान है, िजसे ईरािनयन वग कहा जाता है। प शया के
ाचीन इितहास म नृ संह के इस अिभयान को नरमिसन के नेतृ व म नृि ट का िवजय-
अिभयान कहा गया है, िजसका एक िभि िच लुलवी ा त म बगदाद व करमनशाह के
म यवत देश म िमला है। इसम नृ संह सूय का झ डा िलए सै य-संचालन कर रहे ह।
परसा ा त ही म परसी राजधानी है जहां यमराज का संहासन जमशेद का त त है, िजस
पर संह और िगरिगट के िच बने ह। नृग का िच न िगरिगट था। पुराण म संकेत भी है
क नृग शापवश िगरिगट हो गए थे।
दै य ने दानव को अपने साथ िमलाकर अपना बल बढ़ाया। उसी कार नाग
और ग ड़ को आ द य ने अपने साथ िमलाकर संग ठत कया। व ण इस समय ईरान के
सबसे बड़े कता, धता, िवधाता और राजा थे। सभी लोग उ ह अपना ये मानते थे। इ ह
का नाम ा, अ लाह, इलाही, इलौही, कतार आ द था। आजकल िजसे करमान देश
कहते ह, वही उनक राजधानी सुषा थी। उधर ीरसागर–प शया क खाड़ी म उनके छोटे
भाई सूय का आिधप य था, तथा अपवत म उनके भतीजे सूयपु यम का अिधकार था, एवं
यवन यूनान म उनके दूसरे भतीजे शनै र का रा य था।
नाग के रा य सी रया, कोचा र तान, हसनअ दाल, पाताल, अबीसीिनया और
तु क तान म थे। तु क तान उनक सबसे बड़ी राजधानी थी। ग ड़ का देश ग ड़-धाम था,
िजसे आजकल गरडेिशया कहते ह। यह तु क तान के ऊपर है। य िप ग ड़ और नाग दोन
ही जाितयां आ द य क िम और सहायक रह , पर ये दोन जाितयां पर पर श ु रह ।
ग ड़ नाग के िलए काल व प ही रहे।
दै य के साथ इस िव ह के नेता िव णु ही थे। व ण िमलकर रहना ही ठीक
समझते थे। इस बढ़ती ई कलह को रोकने के िलए व णदेव ने एक य कया। उ ह ने
एक महाय का आयोजन कया िजसम सब दै य , दानव और देव को आमि त कया
गया। उस समारोह म मरीिच, अंिगरा, पुल य, पुलह, तु आ द याजक और द
जापित, बारह आ द य, यारह , दोन अि नीकु मार, आठ वसु, म ण, शेष,
वासु क आ द बड़े–बड़े नाग, ता य, अ र नेिम, ग ड़, वा िण आ द युगपु ष आए। अिभ,
च , बृह पित और िपतृजन भी आए। शनै र, यम-धमराज तथा िव िचि , िशिव, शकु ,
के तमान, रा , वृ आ द अनेक दानव आए।
यहां देव-दै य म राजल मी के स ब ध म ब त कु छ िववाद आ। दै य ने
कहा–‘‘हमारा अपराध नह है। देव ने हम पर अ याय से आ मण कया और हमारी
वणल मी छीन ली है। हमारे छोटे भाई होने पर भी देव ने दै य का र बहाया है। ये
सदैव हमसे अपमािनत होते और मारे जाते रहगे परं तु आप हमारे सबके िपतामह ह।
आपके य म हम चुपचाप य को देखगे। देव से िव ह नह करगे। य समा होने पर
वणल मी के िवषय म हमारा देव से िवरोध-िव ह होगा। अभी हम आप आ ा क िजए
क य म हम या सेवा कर। अपने कत का िनणय करने म हम समथ ह– वत ह।’’
दै य के इन गव ले तथा रोषपूण श द को सुनकर िव णु ने से सलाह ली। तब
ने कहा–‘‘इस समय आप चुप रह। ये सब दै य, ा-व ण से िनयि त ह। हमारे
बा धव ह। इस समय आप कु छ बोलगे तो ये ु हो सकते ह। आपने इनक ल मी हरण
क है। अत: इ ह ु करना उिचत नह ह। य क समाि पर यु , िव ह या सि ध जो
कु छ होगा, देखा जाएगा।’’
व ण ने भी दै य को समझा-बुझाकर शा त कया और कहा–‘‘देव के साथ
िवरोध-भावना याग दो और िम भाव से य म भाग लो।’’ दै य ने कहा–‘‘देव हमारे
छोटे भाई ह, उ ह यहां हमारी ओर से कोई भय नह है। आप अपना य स प क िजए।’’
अ तत: ब त वाद-िववाद के बाद दै य के नेता िहर यकिशपु के पु लाद से देव क
सि ध ई। िव णु ने वचन दया क अब दै य का र पृ वी पर नह िगरे गा। इसके बाद
लाद ने भी िव णु क िम ता का वचन दया। इस कार देव और दै य म एक बार
सि ध हो गई।
10. व पािण दै ये

दै यबाला के रमण से तृ और लात के आघात से ह षत रावण ल बी-ल बी डग


भरता आ नगर क दि ण दशा म ि थत समु -तट क ओर बढ़ता चला गया। समु -तट
से कु छ हटकर छोटी-बड़ी च ान क ओट म वन के एक दुगम देश म उसका िशिवर था।
िशिवर तक आने म ब त रात बीत गई। आकर उसने देखा–आग पर समूचा भसा भूना गया
है, और दै य-दानव अब भोजन क तैयारी कर के वल उसी क ती ा म बैठे ह। म -भा ड
भरे धरे ह। बड़ी-बड़ी अि रािश य -त जल रही है। रावण के वहां प च ं ते ही एक वृ
दै य ने आगे बढ़कर उसका क धा थामकर कहा–‘‘इतना िवल ब करके तूने हम िच ता म
डाल दया, पु !’’
‘‘िच ता काहे क , मातामह ?’’
‘‘पु , अपना देश नह है? वन, वाट, वीथी अ ात ह, और तू हमारे ाण से भी
अिधक मू य का है।’’
त ण ने हंसकर वृ का हाथ पकड़ िलया। कहा–‘‘ब त म करना पड़ा,
मातामह, भोजन दो।’’
‘‘पहले क ठ िस कर।’’ वृ दै य ने एक असुर को संकेत कया। असुर ने म -
भा ड लाकर तुत कया। समूचा भा ड एक ही सांस म पीकर एक बड़ा-सा छु रा ले त ण
भसे क ओर बढ़ा। उसने मांसख ड काटा। फर तो सभी असुर भसे पर िपल पड़े। वे
अ धाधु ध म पीने और मांस खाने लगे। वे हष-आवेग से चीखने-िच लाने, छीना-झपटी
करने और आपस म रे लमपेल करने लगे। देखते-ही-वह समूचा भसा और वे सब के सब
म -भा ड उनक उदरदरी म समा गए। खा-पीकर िनवृ होकर वृ दै य त ण के िनकट
िखसक आया। वह सुमाली था। उसने ख चकर त ण को अंक म भरकर छाती से लगाकर
कहा–‘‘पु , ब त दन के हमारे मनोरथ अब पूरे ह गे। ये सब ीप-समूह हमने जय कर
िलए। यह बाली ीप भी आज रात जय आ समझ! पर तु अब तू सामने इस वण-लंका
को देख। मेरी इस लंका म अब तेरा भाई कु बेर रहता है। वह हमारा नह , देव -आय का
बा धव है। आय और देव ने उसे धनेश बनाकर अपना लोकपाल िनयु कर दया है। वह
हमारे ही धन से स प है। हमारी ही लंका म सु िति त है। यह म अब नह सह सकता।
िव णु का अब हम भय रहा ही नह । अब य द कु बेर धनपित राज़ी से मेरी लंका तेरे िलए
छोड़ दे तो ठीक है, नह तो हम उसे श से मार तुझे लंकाधी र बनाएंग।े पु , तू ही डू बते
ए दै य वंश का सहारा है।’’
त ण रावण नाना क बात सुनकर चुप हो गया। वह गहरे सोच म पड़ गया। इस
पर सुमाली ने कहा–‘‘अब या सोच रहे हो, पु ? तुझे िच ता कस बात क है !’’
रावण ने कहा–‘‘मातामह, कु बेर मेरा बड़ा भाई है, कै से म उससे ऐसा ताव क ं
?’’
इस पर रावण का मामा ह त उ ेिजत होकर बोला–‘‘अरे भािगनेय, वीर पु ष
म भाईचारा नह होता।’’
सुमाली ने भी उसे बढ़ावा देते ए कहा–‘‘िन स देह, दित और अ दित दोन
सगी बहन ही तो थ । दोन ही जापित क यप क प ी थ । पर अ दित से देव और दित
से दै य का कु ल चला। अपने परा म से तथा मातृप से ये होने से सारी पृ वी दै य ही
के अिधकार म थी। पर िव णु ने छल-बल से दै य का नाश करके देव को आगे बढ़ाया।
इसीिलए हम यह कोई नई मयादा नह थािपत कर रहे ह।’’
इतना कहकर सुमाली ने अपने ये पु ह त क ओर ममभे दनी दृि से देखा।
ह त ने कहा–‘‘यही तो बात है, भािगनेय, फर तेरे साथ तो हमारा–सब दै य-दानव का
र भी है, बल भी है। फर लंका तो हमारी ही है। यायत: उस पर तो हमारा ही अिधकार
है। अत: इस स ब ध म तुझे सोचने-िवचारने क कोई बात नह है।’’
मामा के ये वचन सुनकर रावण ने कहा–‘‘तो मातुल, तु ह अब हमारे दूत बनकर
लंका जाओ और िजस कार ठीक समझो, कु बेर धनपित से ताव करो।’’
सुमाली ने कहा–‘‘ऐसा ही हो। पु ह त, तू यह मत भूलना क य द लंका हमारे
ह तगत न ई–तो फर दै य को कह खड़े रहने को थान नह है। मने बड़ी साधना क है
और ब त दूर तक िवचार कया है। अब मेरी जीवन-भर क तप या को फलीभूत करना
तेरा काम है, ह त !’’
ह त ने कहा–‘‘आज ही, अभी म लंका को तरणी ारा थान करता ,ं और
आशा करता ,ं आगामी वार से पहले ही आ उपि थत होऊंगा। तब तक आप सब बाली
ीप पर ही रहना तथा बाली ीप को अिधकृ त करने म िवल ब न करना।’’
‘‘िवल ब कै सा, पु , हम तो आज रात ही यह अिभयान कर रहे ह।’’
सुमाली ने सािभ ाय पु को देखा, और फर रावण क ओर देखकर कहा–‘‘नगर
तो तूने देख ही िलया ?’’
रावण ने हंसकर कहा–‘‘देख िलया, सब राह-बाट देख आया ।ं क तु मातामह,
हम अभी एक और अिभयान करना है।’’
‘‘कहां रे ?’’
‘‘उधर, पवत क उप यका म, अजना-तट पर एक ाम है।’’
‘‘असुर का है ?’’
‘‘न, दै य का।’’
‘‘कहां के ह वे ?’’
‘‘का यप-सागर-तट से आए ह।’’
‘‘पर तु दै य का है, तो िव ह य ?’’
‘‘ऐसे ही। वह फर क ग ं ा। तो मातुल, शुभा ते स तु प थान: !’’
ह त ने चम का क टब ध कमर म लपेटा और शूल हाथ म लेकर वह खड़ा आ।
‘‘एक यो ा ले ले साथ।’’ सुमाली ने कहा।
नह , एकाक ही जाऊंगा, यो ा यहां कम ह। यहां उनक आव यकता है।’’ ह त
यह कहकर अंधकार म िवलीन हो गया।
रावण ने खड़े होकर कहा–‘‘चलो, अब हम भी चल। सब यो ा तैयार हो जाएं।’’
उसने अपने साथी सुभट पर दृि डाली, और परशु क धे पर रख चल पड़ा। उसके पीछे
दै य, दानव, असुर, यो ा शि शूल, ख ग, परशु, ॠि , पाश, मूसल, गदा, प रघ, बाण,
धनुष, द ड ले चले। सबके पीछे वृ ा दै ये लंकापित सुमाली–व पािण था।
11. वणपुरी लंका

ह त ने लंका म वेश कया। जब वह िवशाल नगर ार पर प च ं ा तो उसने


देखा– ार पर दृढ़ लौह-कपाट लगे ह। कपाट म मोटी-मोटी अगलाएं लगी ह। अगला
पर िवराट उपलय जड़े ए ह। ऊपर क बु जय पर अि भुशुि डकाएं रखी ह। नगर के
परकोटे के भीतरी भाग म वणखिचत द कारीगरी िचि त है। बीच-बीच म मिण-मूंगे
जड़े ह। परकोटे के बाहर िवशाल खाई जल से प रपूण है। खाई पर ार तक िवशाल
फलकमाग है–िजनम दुभध सुदढ़ृ सं मय लगे ह। सं म वण के ख भ और वणवे दय
पर आधा रत ह। ाचीर पर दुजय सुभट चौकसी कर रहे ह।
ह त ने सोचा–इस दुभध–सुपूिजत, सुरि त लंकापुरी पर आ मण करने का
साहस देव, दै य, नर, नाग कोई भी नह कर सकता। लंका के चार ओर समु , वन और
खाई तथा दुभध ाचीर, िवशाल चतु पथ पर अ , रथ, गज पर आ ढ़ यो ा–य –
क र, देव-दै य, नगरजन–मिण-मािण य-मु ा-सि त अभय–आनि दत मु ा म म –
आ-जारहे ह।
नगर क वीथी, पथ, चतु पथ, राजपथ पार करता आ ह त धनपित कु बेर के
अलौ कक द ासाद के स मुख जा खड़ा आ। उस ासाद का वैभव देख ह त
आ यच कत रह गया। ासाद के संह ार पर वैडूयमिण और मू यवान मु ा क
कला मक िच कारी थी। वहाँ के ख भे कु दन के बने थे। ऊपर जाने के िलए फ टकमिण
क र ज टत सी ढ़यां थ । ठौर-ठौर पर य शाला और वे दकाएं सुसि त थ िजनम
अनेक आसन रखे ए थे। वह भ ासाद म दराचल के समान िवशाल था।
ह त ने साहस करके उस द ासाद म वेश कया। ार पर उसे कसी ने न
रोका। वह सात क को पार करता आ चला गया। सातव क म उसने देखा–एक
िवराटकाय पु ष वण क माला पहने और हाथ म वज़नी लोहे का मु र िलए बैठा है।
अि क लपट के समान उसक िज वा थी। उसके बड़े-बड़े लाल-लाल ने थे। होठ
िब बाफल के समान और दांत बड़े पैने थे। गदन शेर के समान और नाक उभरी ई। वह
ब त मोटा-ताजा था, तथा उसक खूब घनी काली दाढ़ी थी। उस यमराज के समान िवराट
कालपु ष के िवकराल प को देखकर ह त कांप गया। पर तु उस पु ष ने, जैसे मेघ गरजे
उस भांित गजना करके कहा–‘‘तू कौन है, और द पित लोकपाल कु बेर धनेश के इस
आवास म तेरे आने का कारण या है ?’’
‘‘ सीदतु सीदतु द पित लोकपाल धनेश कु बेर !’’ ह त ने दोन हाथ उठाकर
कहा।
उस पु ष ने संदहे से उसक ओर देखकर कहा–‘‘ क तु अपना अिभ ाय िनवेदन
कर ! या तू लंका का नागर है ?’’
‘‘नह , म आगत पु ष ं ?’’
‘‘य है ?’’
‘‘नह , र ।ं ’’
‘‘कहां का ?’’
‘‘आ ालय का।’’
‘‘आह, वह तो धनेश द पाल के मातृकुल का देश है !’’
‘‘म धनेश द पाल के मातृकुल का पु ष ।ं ’’
‘‘तो तेरा वागत है! मातृकुल से तेरा या स ब ध है ?’’
‘‘म धनेश द पाल का मातुल ।ं ’’
‘‘अहा, मातुल !’’ वह पु ष अ हास करके हंस दया। ‘‘एिह एिह, अपने ज म से
कस कु ल को ध य कया, मातुल ?’’
‘‘म दै यपित सुमाली का पु ,ं और धनेश द पाल क िवमाता कै कसी का
अनुज।’’
‘‘अिभवादन करता ,ं अिभन दन करता !ं क तु या कहकर आपको पुका ं ?’’
‘‘मेरा नाम ह त है, म धनेश द पाल के अनुज र पित रावण का अमा य ।ं
र पित रावण का संदश े लेकर ही म धनेश द पाल के चरण म उपि थत आ ।ं ’’
‘‘ वि त, य पित द पाल अभी सोमरस पान करने न दन वन गए ह। अब उनके
आने का समय हो रहा है। महापरा मी द पाल धनेश के आते ही म उनसे आपका
शुभागमन िनवेदन करता ।ं तब तक आप यहां र पीठ पर बैठकर िव ाम क िजए या
यथे छ महालय म िवचरण क िजए। शु , सा रका, च वाक, को कल आ द िवहंग म मन
बहलाइए।’’
ह त उस पु ष के वचन से आ त हो, चार ओर घूम- फरकर उस सौध को
देखने और मन म यह सोचने लगा–‘यह सारी ही स पदा मेरे िपता क है, अत: म ही
इसका वा तिवक वामी ।ं पर तु कालिवपाक से यह धनेश कु बेर इसका अिधपित बना है
और म अप रिचत अितिथ क भांित यहां उपि थत ।ं ’’
ह त अभी इन बात पर िवचार कर ही रहा था क उसने देखा–एक
मिणकांचनिन मत रथ पर च मा के समान एक काि तमय पु ष िसर पर करीट, कान म
कु डल और कमर म मेखला धारण कए, अनेक द ांगना अ सरा और ग धव से
िघरा चला आ रहा है। अनेक क र और ग धव नृ य करते और गाते चले आ रहे ह। उस
तेज वी पु ष के तेज से ही जैसे वह थान आलो कत हो रहा था।
रथ से उतरते ही ार-पु ष ने आगे बढ़कर उस द पु ष को अिभवादन कर
कहा–‘‘धमावतार, यह महा मा ह त, दै य-पित सुमाली का पु , आपक िवमाता कै कसी
का अनुज, और आपका िति त मातुल यहां उपि थत है। यह आपके अनुज आयु मान्
रावण का संदश े लेकर देव के स मुख आया है। आगे देव माण ह।’’
ारपु ष के इतना कहते ही, लोकपाल द पित कु बेर दोन भुजा पसारकर अपने
वणतार से िझलिमल उ रीय को तथा कुं िचत घन-सघन कृ ण काकप को सुरिभत हवा
म फहराता आ हंसकर बोला–‘‘आओ मातुल, इस वण लंका म आपका वागत है!
किहए, मेरे िपतृचरण तो कु शल से ह? और मेरा ि य भाई रावण स है न? मेरे सब-
स ब धी, िम ब धु सुखपूवक ह न ?’’
ह त ने हाथ जोड़कर िवनय क –‘‘धनेश द पाल कु बेर, आपक कृ पा से सब
कु शल ह। म आपक सेवा म आपके ि य अनुज रावण का स देश लेकर आया ।ं ’’
‘‘अहा, रावण, वह मेरा वीर भाई ाण से भी अिधक ि य है। कहो म उस
ि यदश रावण का या ि य क ं ? मेरे ि य अनुज क या अिभलाषा है िजसे म पूण क ं
?’’
ह त ने कहा–‘‘देव धनपित, अपने अ ज के चरण म अनुगत रावण ने अनेक
बार अिभवादन करने के बाद मुझे देव-चरण म यह िवनीत िनवेदन करने के िलए भेजा है
क लंकापुरी और लंका–सा ा य हम दै य का है। इसिलए इसे आप हम लौटा द तो ठीक
है। यह एक धम क बात है। इसम हमारा-आपका ेम भी बना रहेगा।’’
ह त क बात सुनकर धनेश कु छ ण चुप रहा। फर उसने धीरे -से
कहा–‘‘मातुल, रावण दश ीव के शौय का बखान हम सुनते रहते ह। उस आयु मान् ने
हमारे आस-पास के सभी ीप जय कर िलए ह। यह ठीक है क पहले यह लंकापुरी आपके
िपता दै यराज सुमाली क थी। पर तु िजस समय मेरे िपता ने िनवास के िलए यह
लंकापुरी मुझे दी थी, उस समय यह सूनी थी। यहां कोई राजा नह था। मने ही इसे फर
बसाकर धन-जन से स प कया है। य िप तु हारे -हमारे आचार म अ तर है, तुम र -
सं कृ ित के ित ाता हो और म य -सं कृ ित का। पर तु इससे या? हम सब दायाद-
बा धव तो ह ही तथा इस लंकापुरी म इस समय देव, दै य, क र, असुर, नाग सभी जाित
के जन रहते ह। सबका समान ही अिधकार है। इससे तुम मेरे अनुज रावण से कहो क इस
मेरी बसाई ई लंका म वह भी आकर सुख से रहे। बाधा कु छ नह है। लंका जैसी मेरी है–
वैसी उसक भी है, य क अभी िपता ने रावण के साथ हमारा कोई बंटवारा नह कया
है, अभी तक हमारे िपता का सारा धन और रा य िबना बंटा आ ही है।’’
धनपित कु बेर के ये सारग भत और युि यु वचन सुनकर ह त के मुख से बोल
नह िनकला। वह नीची गदन कए कु छ सोचता रह गया।
कु बेर ने ह त का खूब आ मीयता से स कार कया और सब भांित पूिजत कर उसे
िवदा कया।
12. लघु अिभयान

दै य का वह छोटा-सा दल िनःश द, नीरव, समु -तट से तिनक हटकर घाटी म


टेढ़े-ितरछे माग से ती गित से नगर क ओर बढ़ रहा था। दल के आगे रावण क धे पर
भीमकाय परशु रखे चल रहा था। उसके पीछे वृ ा दै य सेनापित सुमाली था। दै य
दल क ये काली-काली छायाएँ चतुथ क च - योित म िहलती ई-सी िविच तीत हो
रही थी। दै य के इस दल को िवकट िनजन तथा ऊबड़-खाबड़ माग म चलने से कु छ भी
क नह हो रहा था। दल का येक भट िवजय के िव ास से ओत- ोत था।
सुमाली ने आगे बढ़कर रावण के क धे पर हाथ रखा। रावण ने तिनक कान पीछे
झुकाकर कहा–‘‘कु छ और आदेश है, मातामह ?’’
‘‘नह पु , सब पूव-िनयोिजत है। क तु तेरे भट यथासमय उपि थत िमलगे न?
ऐसा न हो क वे सब उ सव के ड़दंग म म पान कर म हो जाएं।’’
‘‘ऐसा न होगा, मातामह! उनका नेतृ व मातुल अक पन कर रहे ह।’’
‘‘तब ठीक है, हमारे म -भा ड भी नागराज को समय पर िमल जाएंगे। पर तु
पु , ठीक ण आने तक धैय रखना। इन नाग को म भली-भांित जानता ।ं िवष और म
इ ह अिभभूत नह करते। ये द ौषिध सेवन करते ह तथा सोमपान करते ह। इसी से एक
कार से वे सब मृ युंजय ह।’’
‘‘िच ता न क िजए, मातामह, रावण का यह परशु कसी मृ युंजय क आन नह
मानता और फर हम उनके ाण लेने से या योजन है! हम तो ीप पर अिधकार चाहते
ह। य द नाग हमारी र -सं कृ ित को वीकार कर ल, तो हमारी ओर से वे ही ीप पर
शासन कर।’’
‘‘यह पीछे देखा जाएगा, पु –पहले यु , पीछे राजनीित। यह देखो, सामने ही पुर
है। आशा करता ं नगर- ार पर हम अपने भट िमल जाएंगे।’’
‘‘ ार के िनकट ही हमारे भट िछपे ए ह।’’
‘‘तो अब हम सावधान रहना चािहए।’’
‘‘आप के वल दल का पृ भाग संभािलए। म सब िनबट लूंगा। नगर म हमारे िम
ब त ह। राजसभा म भी हमारे िम ह। सब दै य, असुर, दानव और रा स तो अपने िम
ह ही। य , देव और ग धव भी िवरोध न करगे। फर नर, नाग ही रहे। सो उनका बल ही
या है !’’
‘‘ठीक है, पर पु , श ु को कभी लघु न िगनना, सावधान रहना !’’
उ र म रावण ने वृ नाना का हाथ कसकर पकड़ तिनक मु करा दया। दै य
आ त हो गया।
कु छ ठहरकर रावण ने हंसकर कहा–‘‘मातामह, आप तो नागपित के िपता के िम
ह। व नाभ आपका तो वागत ही करे गा।’’
‘‘नह तो या! और जब म उससे क ग ं ा क यह द पित धनेश कु बेर का अनुज–
दशानन रावण है, तो वह सस म तुझे अ यु थान देगा।’’
‘‘ वि त, तो हमारे सव प र अ ये म -भा ड ह।’’
‘‘ये र मिण भी अ ही समझ, पु ! जब हम यह सब वण, र मिण और म -
भा ड उसे मै ीभाव से भट करगे, तो आन द से उ म होकर वह हमारी ही लाई ई सुरा
का सब सिचव-सिहत पान करे गा। इन नाग को हमारे मसालेदार म ब त ि य ह, और
मेरी बनाई ई सुवािसत म जो एक बार पी लेगा, उसे भूलेगा नह , वह असंयत हो
जाएगा। बस, हम य ही उन सबको मदम और असावधान देखगे, अपने काय स पूण कर
लगे।’’
‘‘इससे उ म युि या हो सकती है, मातामह! क तु आप या नागपित
व नाभ को पहचानते ह ?’’
‘‘न, उसका िपता मेरा कृ पापा तथा िम था, उसक एक बार असुर के िव
स मुख यु म मने सहायता क थी। व नाभ यह जानता है और हम िम -भाव से आया
जान, हमारा स कार करे गा।’’
‘‘तो हम उसे जय करके िम ही बना लगे, मातामह !’’
‘‘जैसा संयोग होगा। वध भी करना पड़ सकता है। देख, यह स मुख ही तो
नगर ार है। अब सब कोई सावधान हो जाओ। म आगे चलकर ार खुलवाता ।ं ’’
वृ असुर आगे बढ़ा। अव ार पर आकर उसने पुकारा–‘‘अनव कपाटं ारं
देिह, ारं देिह, ारं देिह !’’
ारपाल ने गोखे से िसर िनकालकर कहा–‘‘कौन हो तुम ?’’
‘‘नागराज के स माननीय अितिथ ह। या तू नह जानता, आज नागराज हमारी
अ यथना करे गा? बोल, तुझे आदेश िमला है ?’’
“आदेश नह िमला है। िच न है ?’’
‘‘िच भी देख ले।’’ बूढ़े दै य ने बगल से एक नर संहा िनकालकर जोर से फूं का।
इधर-उधर िछपे ब त-से दै य ने आकर उस सुभट का िसर काट िलया और ार खोल
दया।
सभी दै य नगर म घुस गए। ार-अवरोधकता यु करने लगे। पर तु रावण ार
पर का नह , वेग से अपने सुभट को संग िलए राज ासाद क ओर बढ़ता चला गया। जो
दो-चार नाग सुभट ार-र ा म उपि थत थे, उ ह मारकर असुर ने ार अिधकृ त कर
िलया। कसी को यह बात कान -कान न सुनाई दी।
अब भेरी और नगाड़े बजाते ए दै य राज ार म घुस गए। ासाद म कसी ने
उनका िवरोध नह कया। कु छ इधर-उधर िबखरकर भीड़ म िमल गए। ासाद म ब त
भीड़-भाड़ थी। ब त लोग ासाद म आ-जा रहे थे। लोग ठौर-ठौर म पान करके कोलाहल
मचा रहे थे। ये असुर भी जहां-तहां इनम घुसकर कोलाहल मचाने और म पीने-िपलाने
लगे। वा तव म आज नाग संव सर-समारोह मना रहे थे। राज ासाद खूब सजा था। िविवध
वा के िननाद और लोग के शोर से कान नह दए जाते थे। सभा-भवन और म डप खूब
ठाठ से सजाए गए थे। सारे सभा-म डप म रं ग-िबरं गी पताकाएं फहरा रही थ । बीच म
र -ज टत म डप था, उस पर वणतार-खिचत व पड़ा था। सभा म नर, नाग, दै य,
दानव, असुर, देव, सभी उपि थत थे। नागराज का संहासन संहल के बड़े-बड़े मु ा से
सजाया गया था। वहां अनेक कार के सुग ध- जल रहे थे।
सभा-म डप के एक कोने म वादक का एक दल मधुर वा बजा रहा था। कु छ देर
बाद एक ौढ़ पु ष वण-िवमान पर सवार सभाम डप म आया। द ा गनाएं वह वण-
िवमान उठाए ए थ । ब त-सी वारविनताएं उसके आगे मंगलगान करती आ रही थ ।
िवमान के चार ओर शु वसना कु मा रकाएं मंगलिच न िलए लाज-िवसजन करती चल
रही थ । यही भोिगराज नागपित व नाथ था।
व नाभ के सभाम डप म आते ही सब बाजे बड़े जोर से बज उठे । संह ार पर
दु दुिभ गजने लगी। सभी लोग जयजयकार करते उठ खडे़ ए और घुटन पर हाथ टेक खड़े
रह गए। भोिगराज के स मुख सीधा खड़ा होने का कसी को आदेश न था। ठीक इसी समय
म डप के बाहर दूसरी ओर दु दुिभ बज उठी। और एक ही ण बाद व व दशानन
रावण हाथ म भीमकाय परशु और दै यपित सुमाली िवकराल ख ग िलए लाल व पहने
सभाम डप म आ खड़े ए। इन दो महातेज वी पु ष को देखकर सभा भीत-च कत रह
गई। जो वा सभा म बज रहे थे, त ध हो गए। आग तुक श ु ह या िम , यह कोई भी न
जान सका। नागराज व नािभ घूर-घूरकर रावण क व मुि म गहे ए परशु को देखने
लगा।
पर तु इसी समय दै य सुमाली ने आगे बढ़कर कहा–‘‘ वि त नागराज, म दै य
सुमाली ं और यह आयु मान् दशानन रावण मेरा दौिह तथा द पित धनेश कु बेर का
अनुज है। रावण का कु छ अिभ ाय है, िजसे वह अभी िनवेदन करे गा। अभी आप हमारी यह
ेहभट वीकार क िजए।’’ इतना कहकर दै य-पित ने संकेत कया। दै य अनुचर ने म -
भा ड ला-लाकर नागराज के स मुख धर दए। र –मिणय क मंजूषाएं भी नागराज के
स मुख खोल द ।
यह मू यवान ेहभट देख नागपित स हो गया। वह संहासन छोड़ उठ खड़ा
आ। आगे बढ़कर उसने रावण को छाती से लगाकर िसर सूंघा और आंख म आंसू भरकर
ग द होकर कहा–‘‘ वागत भ , जैसे लोकपाल धनेश मेरा िम है, वैसा ही तू है। तेरे िपता
िव वा मुिन को म जानता ।ं ’’ फर उसने दै ये क ओर मुंह फे रकर कहा–‘‘दै यपित,
आप तो मेरे पू य िपतृ ही ह। िपतृ-चरण ने आपसे मै ी-लाभ कया है। आपका वागत,
यह आसन है, िवरािजए !’’
नागपित ने दै ये सुमाली और दशानन रावण को अपने साथ संहासन पर
बैठाया। संहासन पर बैठते ही व दीजन ने नागराज क व दना क । क र और ग धव
गाने लगे। अ सराएं नृ य करने लग । इसके बाद नागराज के आदेश से म पान चला।
मरकत के पा म म भर-भरकर नाग ने अितिथय के हाथ म दए।
म पीकर दै य सं ह षत ए। अवसर पाकर सुमाली ने दै य को संकेत कया।
दै य ने म -भा ड से म उं डेल-उं डेल नाग को िपलाना आर भ कर दया। नागराज ने
हंसकर सुमाली दै य के हाथ से सुवािसत म लेकर िपया। धीरे -धीरे पान म संयत भाव
लोप होने लगा तथा म भी नाग के मि त क म प च ं कर ऊधम मचाने लगा। इसी समय
सब बाजे ज़ोर-ज़ोर से बज उठे । नृ यांगना ने भावनृ य आर भ कया। येक नृ यांगना
हाथ जोड़ दोन हाथ के अंगूठे नाक से लगाकर थम नागराज को और फर उसके मा य
अितिथय को णाम करती–तब नृ य करती। अनेक कार के स ा नृ य, िवलास नृ य
और भाव-नृ य होते रहे। फर भंिगमा-नृ य होने लगे। येक नृ य-नाटक म गायक और
वादक के साथ कहानी भी चलती थी। इसके बाद यु ािभनय आ। देवासुर सं ाम क
भूिमका चलने लगी। धीरोदा पा अिभनय करने लगे। म पान धूम-धाम से चल रहा
था। नागराज आन दाितरे क से ब त-सा म पी चुके थे। दै य उ ह ढाल-ढालकर और भी
म देते जा रहे थे। सुमाली उ ह बढ़ावा दे रहा था। अक मात् बाहर ब त-सा गोल-माल
सुनाई दया। और सावधान होने से थम ही चार ओर से दै य सुभट भारी-भारी ख ग,
परशु, ि शूल, मु र िलए सभा-मंडप म घुस आए और लगे मार-काट करने! देखते-ही-
देखते नाग का िव वंस होने लगा। चार ओर कोलाहल मच गया। नागराज ने िवि मत
होकर रावण क ओर देखकर कहा–‘‘पु , यह या ?’’ रावण ने अपना परशु उठाया। वह
उछलकर संहासन पर खड़ा हो गया। हवा म उसने चार ओर परशु िहलाकर ज द-ग भीर
वर से गरजकर कहा–‘‘वयं र ाम: !’’
उसने फर हवा म परशु िहलाया। संकेत से उसने दै य को रोका। णभर को
मार-काट क गई। पर तु दै ये सुमाली अपना िवकराल ख ग नागराज के िसर पर
तानकर खड़ा हो गया।
रावण ने कहा–‘‘सब कोई सुने, आज से यह बाली ीप र -सं कृ ित के अधीन
आ। हम रा स इसके अधी र ए। जो कोई हमसे सहमत है, उसे अभय! जो कोई सहमत
नह है, उसका इसी ण िशर छेद होगा। पहले तुम, नागराज, अपना म त कट करो।
य द तुम हमारी र -सं कृ ित वीकार करते हो तो हमारी ओर से इस ीप के वामी तु ह
हो।’’
‘‘ क तु पु यह कै सा अ याचार है! यह तो िव ासघात है।’’
‘‘इस कार क बात िम ता-िवरोधी ह, नागराज! जहां समान बल नह होता,
वहां पर युि यु ही ेय कर है, ऐसा नीित का वचन है। कहो तुम, या तु ह र -सं कृ ित
वीकार है ?’’
ोध-अिभभूत होकर नागराज ने हाथ झटककर कहा–‘‘नह ।’’
और उसी ण व पाल क भांित रावण का कु ठार नागराज के क ठ पर पड़ा।
उसका िसर कटकर दूर जा पड़ा। सि त संहासन खून से लाल हो गया। इसके साथ ही
सब दै य नाग पर िपल पड़े। न जाने कहां से दै य के दल बादल जैसे भूिम फाड़कर
िनकल-िनकलकर आने लगे। कु छ ण म ही नाग का सफाया हो गया। बचे ए नाग,
ग धव, य ने रावण क अधीनता वीकार कर ली। नागराज के कटे ए िसर को उठा,
उसी के र से रावण के म तक पर ितलक देकर तथा उसे र लुत संहासन पर बैठाकर
दै ये सुमाली ने िवकराल ख ग हवा म िहलाते ए जोर से िच लाकर कहा–‘‘वयं
र ाम: !’’ दै य , नाग , दानव , ग धव , य ने एक-दूसरे से यही वर विनत कया।
बाली ीप म रावण क आन फर गई। नाग के उस भ ासाद को रावण और उसके
साथी दै य ने अिधकृ त कर, अ त:पुर पर अपने पहरे बैठा दए। इस समय तीन पहर रात
तीत ई थी।
13. दानव मकरा

भोर होते ही रावण ने र ा बर धारण कया। गोह-चम के द ताने पहने।


कृ णािजन व पर बांधा। िसर पर करीट, पैर म चम-र ु के दृढ़ उपानह। कमर म दुकूल
और उस पर मरकतमिण का क टब ध। क धे पर धनुष और हाथ म वही िवकराल परशु–
िजसका नाग-र अभी सूखा न था।
उसने अपने मामा अक पन को बुलाकर कहा–‘‘मातुल, नागपित क अ शाला से
सव े चार अ त रयां छांट लो, और नागराज का वणरथ मेरे िलए तैयार करो। उसे
शि , शूल, प रघ, बाण और तोमर से सि त कर शी उपि थत करो।’’
अक पन के जाने पर उसने वृ दै य सुमाली से कहा–‘‘मातामह, एक छोटा-सा
अिभयान है, म जाता ,ं बाली ीप और नागराज के अवरोध का आप यथा िच िवघटन
कर लीिजए।’’
सुमाली ने कहा–‘‘तुझे या कु छ भट चािहए, पु ?’’
‘‘नह , मातुल अक पन मेरे साथ ह।’’
सुसि त रथ आ उपि थत आ। वह मिण-कांचन के सहयोग से, िविच
िच कला ारा, िव कमा ने बनाया था। चमफलक और चमर ु से वह बंधा था। उसम
सह वणघं टकाएं लगी थ , िजनक णन विन शत-सह मर के गुंजन क भांित
कणि य थी।
काले रं ग क चार अ त रयां, जो उसम जुती थ , वे िव ुत् क भांित चपल थ ।
उनके कान खड़े थे और थूथन बड़ी-बड़ी थ । वे अपने खुर से भूिम को खोद अपनी आतुरता
कट कर रही थ ।
रावण रथ पर सवार आ और अक पन ने व गु ली। अ त रयां वायुवेग से चल ।
रावण के संकेत पर, पवत क उप यका क दशा म अजना-तट क ओर।
देखते-ही-देखते वन, वीथी, हाट, माग, पीछे रहते चले गए। पा व म समु को
गजन करते छोड़ समु -गजना से होड़-सी करती ई रथ क वण-घि टकाएं णन- विन
करती ई चली जा रही थ –धनुष से छू टे ए साठ टंक के बाण के समान वेग से, सीधे
अजना-तट क ओर–जहां रावण क अिभसार-नाियका–वही, उ मुख, अनावृत यौवन
वाली दै यबाला थी, िजसने रावण के व पर तन-िव ेप के बाद लात मारकर उसे
स प कया था, और िजसने उसके महाघ मरकत के क टब ध के दान को अ वीकार कर,
कल अ तंगत सूय के साि य म एक भा ड म पीने के िलए उससे अनुरोध कया था।
वह उ मुख, अनावृत यौवन, वह चरणाघात, वह उ मु हास और जलगभ का
िवलास, जैसे शतसह मुख से रावण के व व को आ दोिलत कर रहा था। उसे एक-एक
ण का िवल ब भी स न था। वह असंयत-सा कह रहा था–‘‘सप, मातुल! सप !’’ और
दै य अक पन क चमर ु के कड़े आघात शपाशप अ तरी क पीठ पर पड़ रहे थे, िजनसे
तािड़त हो उनके खुर जैसे भू- पश छोड़ वायु म अधर उड़े चले जा रहे थे।
अजना का तट आया। तट पर एक सघन मनोरम वन था। वन म अनेक ताल,
तमाल, िह ताल के वृ थे, ह रण थे, प ी थे, उनका कलरव था। थान- थान पर वहां इस
समय अि दाह हो रहा था। कु छ हाथ-पैर-गदन कटे शव पड़े थे। ि य के शंखचूड़,
गुंजामाल, व ख ड, वणवलय टू टे-फू टे इधर-उधर पड़े थे। टू टे ए शि , परशु, ख ग
और मरे -अधमरे पशु िससक रहे थे।
रावण ने रथ से उतरकर देखा। उसने कहा–‘‘मातुल, यहाँ तो िवकट सं ाम आ
तीत होता है। सभी शव गम ह। यु स भवत: अभी आ है। देखो तो, कोई जीिवत पु ष
भी है िजससे घटना का ान हो।’’
अक पन ने बारीक से देखा। एक बूढ़े असुर म अभी ाण थे। उसी ने टू टे-फू टे वर
म बताया क दानव के एक दल ने आ मण करके उनका ाम-गो लूट िलया है। ाम का
सब वण, अ और ि याँ वे लूट ले गए ह तथा सब जीिवत पु ष को बांधकर ब दी बना
ले गए ह। दै य ने बताया–‘‘वे दि ण दशा म समु तीर-तीर गए ह।’’
रावण ने कं ृ ित भरी। रथ पर खड़े होकर दि ण दशा क ओर देखा। उसने उसी
दशा क ओर परशु उठाकर कहा–‘‘चलो तो मातुल! देखो, वह धूल उठ रही है।’’
और अ त रयां उसी दशा म उड़ चल । अधीर होकर रावण रथ पर खड़ा होकर
भाव से उधर देखने लगा। देखते-देखते धूल का बवंडर िनकट होता गया। थोड़ी ही देर
म देखा–दानव का एक स प संग ठत दल सब दै य , ी-पु ष को रि सय म बाँधे,
उनका अ - वण गठ रय म लादे, उनका पशु-धन आगे कर प रघ, शूल, कृ पाण, शि ,
ख ग हवा म उछालता वन के गहनतम देश म बढ़ता जा रहा है।
आगे बढ़कर रावण ने ललकारा। साथ ही उसने दश बाण दस-दस टंक के छोड़े।
बाणिव होकर दानवदल घूमा। उ ह ने देखा–एक दुधष त ण यो ा द रथ पर आ ढ़
धंसा चला आ रहा है।
दलपित ने दानव को तुर त ूहब खड़े होने क आ ा दी। बि दय और आहत
को दूर खड़ा कया। पलटकर उसने पुकारकर कहा–‘‘यह अकारण हम पर आ मण करके
वैर करने वाला महाभाग कौन है? इस अकारण के वैर का कारण या है? वह कहे क हम
उसका बाण से स कार कर, या मधुपक से ?’’
रावण ने कहा–‘‘म र ािधप वै वण रावण –ं इन सब ीप समूह का वामी!
तुमने मेरे ीप पर अनाचार कया है। कहो तु हारा ाम, गो कहां है ?’’
‘‘इसी ीप के उस ओर हमारा ीप है और गो भी है। पर तु तुम कै से इस ीप के
वामी हो? ीप का अिधपित व नाभ है। वह हमारा िम है।’’
‘‘व नाभ का िसर इसी परशु से मने गत राि काटकर ीप पर अपना अिधकार
कया है। सो अब तक तुमने य द रा सपित रावण दश ीव का नाम न सुना हो, तो अब
सुनो, और जान लो, क आज से यह बाली ीप र -सं कृ ित के अधीन है। हम रा स इसके
अधी र ह। जो कोई हमसे सहमत है, उसे अभय! जो सहमत नह है, उसका इसी परशु से,
इसी ण िशर छेद होगा !’’
दानवे का नाम मकरा था। वह बाली ीप के आस-पास के छोटे-छोटे ीप का
वामी था। नागराज का वह िम था। वह एक तेज वी यो ा था। उसने कहा–‘‘अरे ,
िव वा के पु , तू तो बड़ा ही धृ दीख पड़ता है। या दानव से भी तू भय नह खाता? तू
वीर और ि यदशन है, पर तूने हमारे िम नागपित व नाभ को मारा है, इसका दंड म
तुझे दूग
ं ा। इसके अित र तूने मेरे काम म यवाय कया है। आज म तेरे ही वा द मांस
का भोजन क ं गा। बोल, मरने से थम तू या चाहता है? म मकरा दानवराज ।ं कह,
तुझ श ु का या ि य क ँ ?’’
‘‘दानवराज मकरा , भले िमले। आपका नाम मने सुना है। यु ं देिह! म आपसे
यु मांगता ।ं पर आप िवरथ ह, इसिलए म रथ पर नह लडू ग ं ा।’’
रावण रथ से कू द पड़ा। दानव ने कहा–‘‘नह , िव वा मुिन के पु , तू रथ पर ही
रह! हम िवरथ ह, पर सं या म ब त ह। तू एकाक है, सो रथ पर अयु नह है।’’
पर तु रावण ने वीकार नह कया। अक पन क बात भी नह मानी। उसने
कहा–‘‘मातुल, तुम खड़े रहकर मेरा यु देखो !’’
इतना कहकर वह अपना परशु घुमाता आ, दानव के दल म घुस गया और
रणो म हो दानव के िसर अपने परशु से काटने लगा। दानव भी तोमर, िभि दपाल आ द
श ले रावण पर टू ट पड़े। पर तु रावण इससे तिनक भी भयभीत न आ। यह देख
दानवे ने पांच तोमर से रावण पर हार कया। इससे रावण र म सराबोर हो गया।
पर तु उसे तिनक भी संभलने का अवसर न दे दानवे ने यमद ड के समान भारी मु र
घुमाकर रावण के व पर हार कया। इससे रावण र -वमन करने लगा और थोड़ी ही
देर म मू छत हो पृ वी पर िगर गया। दानव-सेना हष से ची कार कर उठी। मकरा ने
कहा–‘‘अब इस म गय द को लौह-शृंखला म बांध लो !’’ पर तु इसी समय रावण
चेतन आ। ोध से थरथराता रावण फणी क भाँित क ं ार करके खड़ा आ और उसने
च ड वेग से मकरा पर शि चलाई। शि के छाती पर लगते ही दानवे घूमकर
पृ वी पर िगर गया। यह देख हाय-हाय करते ब त से दानव ने अपने राजा को घेर िलया।
ु रावण ने उनका इस कार दलन करना ार भ कया क वे, िजसका िजधर स ग
समाया, भाग खड़े ए।
इसी समय दानवे क मूछा टू टी। उसने अपनी भागती ई सेना का िनवारण
कया। फर रावण से कहा–‘‘वीर िव वापु , तू ध य है! तेरे वीर व पर म स ।ं पर तु
तुझ एकाक िवरथ रथी से हम सबका यु करना यायसंगत नह है। इसिलए वीर, तू
हमम से िजसे चाहे, उसी से यु कर।’’ रावण ने मुंह का र प छते ए कहा–‘‘ऐसा
ही सही। तब दानवे मकरा वयं ही मेरे साथ यु करके मेरी ित ा बढ़ाएं।’’
यह सुनकर दानवे ने कहा–‘‘तथा तु !’’ दोन वीर गदा लेकर पर पर गुंथ गए।
उनक गदाएं जब आपस म टकराती थ तो उनम से अि फु लंग िनकलता था तथा बड़ा
घोर श द होता था। दोन वीर एक-दूसरे के व को ताक-ताककर वार करना चाहते थे।
पर तु दोन म से कोई कसी को अवसर न देता था। ब त देर तक यह अस यु होता
रहा। अ त म अवसर पाकर दानव मकरा ने गदा घुमाकर रावण के व पर हार कया।
हार से गदा के दो टु कड़े हो गए। रावण दद से कराहकर भूिम पर िगर गया और र -
वमन करता आ मू छत हो गया। दानवे मकरा ने उसे अ छी तरह रि सय से
जकड़कर बांध िलया।
यह देख अक पन रथ को याग हाथ म शूल ले आगे बढ़ा। दानवे मकरा ने
कहा–‘‘अब तु ह ाण देने से या योजन है, वीर? हमने अपने परा म से यु म
वै वण रावण को ब दी कया है। तु ह उिचत है अपनी नगरी को लौट जाओ।’’ रावण ने
मूछा भंग होने पर अपने बंधन देख अक पन से कहा–‘‘मातुल, मातामह से कहना–मकरा
दानव ने मुझे यु म ब दी बनाया है।’’ अक पन भी कु छ सोचकर क गए। दानव
रावण को बांधकर सब बि दय के साथ समु -तीर पर ले चले। समु -तट पर तरिणयाँ
बंधी थ । अपने बि दय और लूटे साज-सामान के साथ दानवे मकरा दलबल-सिहत
तरिणय पर चढ़ अपने ीप क ओर चल दया।
14. जल–देव

दानव का यह दल अपने बि दय और लूटे ए माल को लेकर तरिणय म बैठ


तेज़ी से समु -गभ म अ सर होने लगा। बि दय के बीच रि सय से बंधी ई अपनी ेयसी
उस त णी को रावण ने अपने प रजन के साथ बैठे देख िलया। रावण को देखते ही त णी
क आंख चमकने लग । उसने पास बैठे एक बूढ़े दै य के कान म कु छ कहा। दै य ने आंख
उठाकर रावण को देखा।
छाती म करारी चोट लगने और र -वमन के कारण रावण अ व थ और िमत
हो रहा था। पर तु उसने अके ले ही दानवे से, रथा ढ़ होने पर भी िवरथ होकर, यु
कया था। इसिलए दानवे ने उसे आदरपूवक सब बि दय से पृथक् बैठाया तथा पीने को
एक भा ड म भी दया। पर तु रावण ने अ वीकार करते ए कहा–‘‘सभी बि दय के
समान म भी ,ं अनु ह मुझे नह चािहए !’’ दानवे ने फर आ ह नह कया। धीरे -धीरे
सूय अ त होने लगा और सागर म भी तूफान के िच न कट होने लगे। तरिणय पर सभी
पाल चढ़ा दए गए। ब दी ि यां और धन क मंजूषाएं बीच म रख ली ग । सभी तरिणय
को एक म बांध दया गया। देखते-ही-देखते वायु का वेग बढ़ गया। च ड वायु ह क
व तु को उठाती और भारी व तु को िगराती लय-गजना करने लगी। सागर म
चट् टन क भांित बड़ी-बड़ी लहर उठकर ु तरिणय को आकाश म उछालने और िगराने
लग । ब दी और अब दी सभी जन ची कार करने लगे। सबके कोलाहल से वह समु का
गजन-तजन और भी भयावह हो उठा। चम-र ु के सुदढ़ृ ब धन टू टने लगे। तरिणयां दूर-
दूर बहने और उलट-पलट होने लग । दानवे ने बि दय को ब धनमु करके अपनी-
अपनी सुर ा करने को उ सािहत कया। इसी ण वह तरणी िजसम असुर ब दी थे, एक
पवत के समान लहर पर ब त ऊंची चढ़कर पलट गई। लहर के थपेड़ से उसके टु कड़े-टु कड़े
हो गए। तरणी के सब आरोही महासागर के उस लय-तूफान म खो गए। सबसे पृथक् बंधे
रहने के कारण रावण ब धनमु न हो सका। रावण क अिभसार-सखी उस दै यबाला ने
िगरते-िगरते यह देखा। पवत-समान िवशाल एक लहर ने उसे ब त ऊंचा उछालकर दूर
फक दया था। वह उस अन त सागर के सघन अ धकार म आंख फाड़-फाड़कर अपने चार
ओर अपने रमण को देखने लगी। समु -जल क सारी बौछार चार ओर से उसक आंख
को अ धा कर रही थ । लहर के थपेड़े उसे ि थर रहने नह देते थे। वह बार-बार अपना
व ऊपर उठा अपने ि यतम को िनहार रही थी। एकाएक एक तरं ग ने रावण को उछाला
और फर वही जल-गभ म उसे ले गई। यह देख दै यबाला ने अपनी कमर म छु पा आ छु रा
दांत म दबाया और डु बक ली। दुधष यास के बाद उसने रावण को पकड़ा। रावण मू छत
था। उसने झट उसके ब धन काटे और वेग से धके लती ई लहर के सहारे उसे ले चली।
इसी समय एक का फलक बहता आ उसके हाथ लग गया। उसने ज़ोर लगाकर रावण के
शरीर को उस पर टेक दया, और एक भुजा से उसे संभालती ई तथा दूसरी से लहर को
काटती ई वह महासागर से क ठन जीवन-यु करने लगी।
थोड़ी ही देर म रावण क मूछा भंग ई। इससे दै यबाला अ य त आशाि वत हो
उसके िब कु ल िनकट आकर बोली–‘‘साहस कर रमण, और अपने भार को ठीक तरह से
इस का -फलक पर रख !’’
रावण ने अपने भार को ठीक तरह का -फलक पर डाला। फर एक हाथ से उसे
िनकट लाते ए बोला–‘‘तूने मेरी ाण-र ा क है।’’
‘‘मातृचरण को खोकर, ह त! एक ही ण म मुझे तू दखाई पड़ा और माता भी। म
एक ही क र ा कर सकती थी–सो मने तुझे ही सहायता दी। तू चेतन है, व थ है–म इससे
स ।ं पर तू इन दानव म कै से आ फं सा, रमण ?’’
‘‘तेरे ही िलए। एक भा ड म पीने के िलए तेरा िनम ण था, और तुझे हरण
करने का मेरा आ ह था। इसी से तेरे ाम म आया था। पर जब देखा, मेरे अिभसार को
कोई और ही हर ले गया तो म संयत न रहा, दानव का मने पीछा कया।’’
‘‘तू तो रथी था, िवरथ य आ? रथ पर रहते या वे तुझे पराभूत कर सकते ?’’
‘‘पर वे सब तो िवरथ थे। िवरथ से रथ लेकर यु करना मेरी मयादा नह ।’’
‘‘तेरे पराजय के शौय से म आनि दत ,ं रमण।’’
‘‘ क तु परािजत कया कसने ?’’
‘‘दानवे ने तो।’’
‘‘न, तूने।’’
‘‘वह या आज? न-न, उसी िवजन वन म सरोवर के तीर पर।’’
‘‘उसी क खीझ उतारने तो तेरे ाम आया था।’’
‘‘सो यहां तक साथ है।’’ दै यबाला हंस दी।
तूफान गजन-तजन कर रहा था–लहर आकाश-पाताल एक कर रही थ , पर ये
युगल वीर जलदेव को लात से ितर कृ त करते दल क घु डी खोलते जाते थे।
‘‘अभी आगे भी साथ रहेगा।’’ रावण ने लापरवाही से कहा।
‘‘कब तक भला ?’’
‘‘इसका उ र तो पीछे–इस जलदेव से र ा होने पर दया जाएगा। अभी तू
अिधक यास न कर, का -फलक पर सहारा ले चुपचाप तैरती चल। िच ता न कर।’’
‘‘मुझे भय था क अब कहां तू िमलेगा।’’
‘‘एक ण भी मने तुझे नह भुलाया और अवकाश पाते ही म तेरे िलए भागा
आया ।ं ’’
‘‘तू वीर है, रमण !’’
‘‘ क तु आज रात ही कह जल-समािध ई तो ?’’
‘‘म स ,ं हो जाए।’’
‘‘नह , मेरा काय अभी स पूण नह आ। म इस दानव को जय कए िबना लौटूंगा
नह ।’’
‘‘ या तू इतना स प है, ऐसी तेरी साम य है ?’’
‘‘अभी बहती चल, अपने को डाल दे इस का -फलक पर। और मेरे क ठ म डाल दे
अपने भुज-मृणाल ! बस, िच ता न कर।’’
दोन ही उस अगम महासागर म उस ु का -फलक के सहारे तैरते जा रहे थे।
आहत और अश रावण थक गया था। पर उसका साहस अपूव था। इसी समय अचानक
त णी ने ची कार करके कहा :
‘‘वह काली व तु या है, देख !’’
रावण ने िसर उठाकर देखा, भुनभुनाते ए कहा–‘‘तरणी है।’’ दोन ने यास
करके तरणी को अिधकृ त कर िलया। वह उलट गई थी। उसे सीधा कया और वयं उस पर
चढ़कर उसने त णी को भी ख च िलया। और फर िगर गए त णी पर िन े , पर पर
संि , आब , मू छत !

समु शा त था और तरणी जलतरं ग पर िथरकती अपनी राह पर जा रही थी,


तीर क ओर।
15. वाचे पु षमालभेत

य ही दोन क मूछा भंग ई, उ ह ने देखा–सूय क चमकती ई सुनहरी धूप म


दोन तीर क रे ती पर पड़े ह, और ब त–से दानव ने उ ह घेर रखा है।
रावण उठकर बैठ गया। त णी को स बोिधत करके उसने कहा–‘‘हम कहां ह ?’’
‘‘स भवत: दानव के ीप म।’’
रावण ने आंख उठाकर अपने चार ओर खड़ी भीड़ को देखा। उनम आबाल-वृ
सभी थे। ब त का रं ग गोरा और मुख सु दर था। अपने को ब धनरिहत देख रावण हंसा;
उसने हंसकर युवती से कहा–‘‘देखना यह है क हम ब दी ह या अितिथ।’’
इस समय श धारी दानव क एक टोली वहां आई। टोली के नायक ने अपना
शूल रावण के व पर रखकर कहा–‘‘चलो, दानवे क सेवा म।’’
रावण ने संिगनी क ओर देखा और चुपचाप खड़ा आ। दानव क एक टोली
दोन बि दय को घेरकर ले चली। टेढ़े-मेढ़े रा ते पार करते ए वे एक पवत पर चढ़ने लगे।
बि दय के पीछे ब त-से दानव आबाल-वृ थे। सभी कौतूहल से पूण थे। शी ही यह दल
उस छोटी-सी पहाड़ी के िशखर पर चढ़ गया। िशखर पर एक छोटा-सा मैदान था। मैदान
के बीच -बीच जलदेव क िवकराल मू त थी। उसके आगे दो यूप थे। दानव ने दोन
बि दय को यूप से कसकर बांध दया। थोड़ी देर म दानवे मकरा गाजे-बाजे के साथ
आया। दानवे के साथ ही उसक मिहषी भी थी। मिहषी ौढ़ाव था क थी। कभी वह
सु दरी रही होगी। उसके अंग पर र -मिण- वण का बा य था। वह सुकोमल चमस ा से
सि त थी। दानवपित मकरा ने भी म तक पर, भुजा पर, व पर वण धारण कया
था। उसके एक हाथ म वण-द ड था, दूसरे म मिणकलश। वह धीरे -धीरे कोई म पाठ
करता आ रहा था। उसके साथ एक ठगने कद का वृ पु ष था। उसक खूब बड़ी ल बी
सफे द दाढ़ी थी। वह कमर म ा चम पहने था। उसके हाथ म ब त बड़ा ख ग था।
दोन पु ष यूप के आगे आकर क गए। दानवे ने मिहषी-सिहत देवता का पूजन
कया। फर दोन बि दय को मु कर ान कराकर उ ह नवीन व धारण कराए।
हिव या खाने को दया। इसके बाद दानवे ने मिहषी सिहत हवन कया। अि -
दि णा करके उसने बिल का पूजन कया। वृ दाढ़ीवाला ि चरक था। उसने
म पाठ करते ए कहा :
‘‘वाचे पु षमालभेत।’’
दै ये ने अंजिल म जल भरकर कहा–‘‘वा देवतायै पु षं पूरकम् आलभेत।’’
इतना कहकर उसने अंजिल का जल रावण के िसर पर िछड़क दया।
दाढ़ीवाले पु ष ने फर दि णा कर कहा–‘‘ ती ायै कु मारीम्।’’
दै ये ने उसी भांित अंजिल म जल भरकर कहा–‘‘ ती ायै ल ध य व तुनो
लाभा ती णािभामािन यै कु मारीमनूढां क यामालभेत।’’
इसके बाद दाढ़ीवाले पु ष ने पुकारकर कहा–‘‘पशु लाओ।’’
तुर त ही गाय, घोड़ा आ द सात ा य पशु और ह रण आ द सात जंगली जीव
रि सय से बांधकर लाए गए। दाढ़ीवाले पु ष ने म पाठ कया :
‘‘पशूनेवाव धे स ा या: पशव: स ार या: स छदां युभय याव यै।’’
इसके बाद उसने र सी लेकर म पाठ करते ए बिल–जीव को बांधना आर भ
कया।
पु ष ने म पाठ कया :
‘‘आददे ॠत य वा देव हिव: पाशेनाऽऽरभे सािव ेण रशनामादाय पशोदि णा
बा वौ प रवीयो वमु कृ य आददे।’’
इन म को पढ़कर दानवे ने रावण क तथा मिहषी ने दै यबाला क दािहनी
भुजा र सी से बांधकर ऊपर को ख ची।
चरक ने फर म पाठ कया :
“दि णेऽध:िशरिस पाशेना णया ितमु य धषा मानुषा िन यमु रतो यूप य
िनयुनि दि णत एकादशाननान्।’’
यह म पाठ होने पर उ ह ने वही र सी िसर क तरफ ले जाकर पीछे से पैर को
भी बांध दया। व य का अंग जकड़ गया।
चरक ने अ य पशुआ को भी इसी भांित दूसरे यूप से बांध दया, िजससे वे िहल-
डु ल न सक।
अब उ ह ने म पाठ कर फर अि हो कया।
चरक ने उठकर ख ग उठाया और म पढ़ा :
‘‘व ो वै विधित: शा यै पा त्...।’’
और एक पशु का िसर एक ही बार म धड़ से जुदा कर दया। उसका मांसख ड
लेकर यजमान दै ये और मिहषी ने आ ित दी।
इसी कार म पाठ करके एक-एक कर सभी पशु को मार–मारकर य करना
आर भ कर दया।
इस समय ब त-से दानव वहां आ जुटे थे। उनम ब त–से उन मारे ए पशु क
खाल उधेड़–उधेड़कर उनका मांस साफ करके बड़े–बड़े भा ड म भरकर चू ह पर चढ़ाने
लगे। चरक ने म पाठ कया–‘‘सुकृता छिमतार: कृ व तूत मेघं शृतपाकं पच तु।’’
इसके बाद अब दानवे मकरा िवकराल खा डा हाथ म लेकर रावण के स मुख
आया। उसने कहा–‘‘अरे िव वा मुिन के पु , वाणी के देवता के िलए, जल के देवता के
िलए, अल य व तु उपल ध होने के िलए म तेरी बिल देता ।ं अ त र के देव स ह !
जल के देवता स ह । तुझे वग िमले। यह पूत ख ग तुझे पूत करे ।’’
मिहषी ने दै यबाला के स मुख आकर कहा :
‘‘ल ध ती ा देवता के िलए तुझे बिल देती ।ं ’’
उसने अपने ख ग क नोक से उसे छू ते ए अ त उस पर फके । इसके बाद चरक ने
उ ह पु पमाला अ पत क और सौ ामिण सुरा दी। ब त-से बाजे जोर से बज उठे ।
सुरा पीकर रावण चेतन आ। आस िवपि को उसने देखा। सामने दूर समु के
शा त जल पर ि ितज के उस छोर पर जाकर उसक आंख ठहर गई। आशा और उ लास से
उसका दय धड़कने लगा। उसने देखा–नील जल-रािश पर सुदरू ि ितज के पास ेत– ेत
ध बे दीख रहे ह। उसने ने के संकेत से दै यकु मारी को भी बता दया। उसके होठ के
फु रण से तथा ने के आ लाद से वह समझ गई क कु छ आशाजनक संदश े है। थोड़ी ही
देर म उसने देखा–ब त-से पोत अपने पाल उड़ाए इधर बढ़े आ रहे थे।
दानव का उधर यान न था। वे जोर-जोर से बाजे बजा और िच ला रहे थे। चरक
म पाठ कर रहा था। नरबिल क पूरी तैयारी हो चुक थी। ख ग म पूत कए जा रहे थे।
कु ड म ब त-सी चब , ितल, मांस और धन जल रहा था। बड़े–बड़े भा ड म बिल ए
पशु का मांस पकाया जा रहा था। उस भीड़भाड़ म सब कु छ अ वि थत–सा दीख रहा
था।
अब चरक क आ ा से दै ये ख ग लेकर रावण का वध करने आगे बढ़ा। यूप से
ब रावण ने अपनी आंख फै लाकर फर िव तृत समु क ओर देखा। अनिगनत तरिणयां
ती गित से चली आ रही थ । रावण ने कहा :
‘‘दानवे से मेरा एक अनुरोध है। वह धमानुबि धत है।’’
‘‘वह या है, कह?’’
‘‘म मुिनकु मार ,ं मुझे वेदपाठ करना है।’’
‘‘सो तू कर, पर अिधक समय म ठहर नह सकता।’’
‘‘वेदपाठ से दानवे का भी क याण होगा। चरक से पूछो।’’
चरक ने दाढ़ी पर हाथ फे रकर कहा–‘‘िव वा मुिन का पु ठीक कहता है, वह
वेदपाठ करे ।’’
रावण ने उ वर से वेदपाठ करना ार भ कया। पर तु तरिणयां अभी ब त दूर
थ।
मकरा ने कहा–‘‘बस, अब और नह ठहर सकता।’’ वह ख ग लेकर आगे बढ़ा।
रावण क दृि म था ाप गई। दै यबाला क दृि भी उ ह तरिणय पर थी।
संकट समुपि थत देखकर उसने कहा–‘‘म कु मारी ,ं दै यक या ,ं ल ध क ाि के
िलए पहले मेरी बिल हो।’’
चरक ने हाथ उठाकर कहा–‘‘कु मारीमनूढां क यामालभेत।’’
उसने मिहषी क ओर संकेत कया और य पूत ख ग मिहषी को दया। मिहषी
ख ग लेकर आगे बढ़ी। रावण कु छ ित या करे , इससे थम ही दानव–मिहषी का ख ग
बिल पर पड़ा। दै यबाला का िसर कटकर नीचे लटक गया। धड़ से र क धारा उमड़
चली। रावण के ने म अ धकार छा गया। यूप को उखाड़ने और ब धनमु होने के उसके
सारे ही य िनरथक गए। दानव ने देखते-ही-देखते दै यबाला का िसर काटकर य -वेदी
पर चढ़ा दया। चरक ने म पढ़ा–‘‘आदद ॠत य वा देव हिव:।’’
देखते-ही-देखते दै यबाला के छटपटाते शव के दानव ने टु कड़े-टु कडे़ कर डाले।
मांस–ख ड को एक बड़े भा ड म भरकर पाक करने के िलए आग पर चढ़ा दया। चरक ने
म पढ़ा–‘‘शु लोदन: शु लपु पं शु लस वजा: स दीपा: स वि तका: स
वा टका: स श कु िलका: स ज बुिडका: स मु तका: ग धं पु पं ता बूलं मांस,ं
सुरा भ ं च बिलदात :। तत: स प ते शुभम्।”
रावण का सारा अंग जड़ हो गया। इस काम म ब त समय तीत हो गया। अत:
रावण के भाव–प रवतन को कसी ने नह देखा। अब चरक ने म पढ़ा–‘‘वाचे
पु षमालभेत।” मकरा चरक के हाथ से पूत ख ग लेने को आगे बढ़ा। पर तु इसी समय
एक बाण चरक के हलक और तालु को फोड़ता आ िनकल गया।
मकरा ने देखा–अनिगनत रा स ने चार ओर से वह य - थल घेर िलया है,
और वे चार ओर से बाण-वषा करते तथा दानव का िनदय संहार करते बढ़े चले आ रहे
ह। यह देखते ही मकरा ने अपनी बगल म पड़ा नर संहा फूं का। पाव य उप यका तथा
नगरवीिथय से सह दानव के दल िनकल-िनकलकर रा स से िभड़ गए। एक तुमुल
सं ाम िछड़ गया। मकरा वही म –पूत य –ख ग िलए क ं ार कर श ु पर िपल
पड़ा। अक मात् अक पन उछलकर शि लेकर मकरा के स मुख आया। रावण ने
िच लाकर कहा–‘‘उसे मेरे िलए छोड़ दो, मातुल! दानवे मेरा पशु है।’’ और ण-भर ही
म उ मु होकर रावण ने अक पन के हाथ से शि लेकर मकरा के दय म ल दी।
पर तु मकरा उछलकर बगल म हट गया। इससे हार पूरा न पड़ा। अब वह एक प रघ
लेकर रावण पर दौड़ा। रावण ने व के समान तोमर के िनर तर आघात से मकरा को
जजर कर दया। मकरा ल -लुहान होकर भूिम पर िगर गया। इस पर अनिगनत दानव
ने शि , प रघ, शूल, मु र लेकर रावण पर संयु आ मण कया। यह देख सुमाली दै य
गदा हाथ म ले उन पर टू ट पड़ा। दै यपित क भीषण गदा क चोट से दानव झटपट मरने
लगे। मकरा उनक लोथ म ढंप गया। पर तु रावण ने उसका पैर ख चकर बाहर
िनकाला, फर उसे अपने िसर के चार ओर घुमाया और भूिम पर दे मारा। मकरा का
िसर फट गया। फर भी वह मरा नह । पड़े–ही–पड़े उसने रावण का पैर ख चकर उसे िगरा
दया। अब दोन यो ा पर पर गुंथ गए। रावण ने मकरा का कवच नाखून और दांत से
चीर डाला तथा दोन वीर िनर हो मु और लात से एक-दूसरे को मारने तथा गुंथकर
लुढ़कने लगे। रावण ने ोधो म होकर इस कार दानव को मथा जैसे आटा गूंधा जाता
है। मकरा ने बल लगाकर रावण को दूर धके ल दया। पर तु रावण ने उछलकर एक लात
दानव क छाती म मारी। लात खाकर दानव र -वमन करने और कराहने लगा। अब
रावण ने मु े मार–मारकर उसक पसिलयां तोड़ डाल । दानव क जीभ बाहर िनकल
आई, वह हांफने लगा। उसके नाक-कान और मुख से र क धार बह िनकली। इसी समय
रावण ने अपनी व भुजा म उसे िसर से ऊपर उठा िलया और धधकते ए िवराट
हवन-कु ड म फक दया।
दानवे मकरा का ऐसा भयानक अ त देख दानव चार ओर भयभीत होकर
भागने लगे। उन भागते ए दानव को रा स ने झटपट मारना आर भ कर दया। शेष
दानव ने श भूिम पर रख, भूिम म िगरकर िणपात कया। रावण ने हाथ का ख ग
हवा म ऊंचा उठाकर कहा–‘‘वयं र ाम:! सब कोई सुनो, आज से यह सु बा ीप और
दानव के सब ीपसमूह र -सं कृ ित के अधीन ए। हम रा स इसके अधी र ए। जो
कोई हमसे सहमत है उसे अभय; जो सहमत नह है उसका इसी ण िशर छेद हो।’’
सभी आबाल–वृ दानव ने भूिम पर लोटकर र पित रावण क अधीनता
वीकार कर ली। रा स ने वह सु दर ीप, ह य, सौध, वण, र , रा य अपने अधीन कर
िलया। ीप म सव रावण क दुहाई फर गई।
16. सु बा ीप म

दानव के उस ु ीप का नाम सु बा था। वह छोटा-सा ीप बाली ीप के


दि णांचल म थोड़ा पूव क ओर मुड़कर था। भारतीय महासागर म जो असं य अ ात
छोटे-छोटे ीपसमूह ह, उनम से एक यह था। ीप ाकृ ितक सौ दय से ओत– ोत था। सारे
ीप क प रिध एक योजन से भी कम थी। ीप के बीच –बीच एक ल बी-चौड़ी झील थी,
िजसम चार ओर से झरने का पानी आकर जमा होता था। झील के चार ओर दानव के
पुर थे। ीप का आकार अंडे के समान था। ीप चु बक प थर का था, इससे जलयान और
तरिणयां ब धा यहां नह आती थ । जलम चु बक य च ान से टकराकर उनके डू ब जाने
का भय था। पर तु दानव यहां िनभय आते–जाते थे। दानव क यहां स प बि तयां थ ।
उनके घर प े , राजमाग श त और पुर म थान- थान पर हरे -भरे उपवन थे, िजनम
अनेक मौसमी फल और फू ल लगे थे। ीप का जलवायु अ य त वा य द था। पुर, घर,
ह य, सौध, वन, बाग, उपवन, उ ान, तड़ाग, राजमाग सभी कलापूण थे। ऐसा तीत
होता था, दानव अ य त कला ेमी ह–स प भी ह। उनक स प ता का तो यही माण
यथे था क दानव तथा उनक पि य के अंग पर ब त–से वण-आभूषण थे। र ाभरण
भी वे पहने थ । दानव-क याएं दै य के समान कृ णवणा नह होती थ । उनका रं ग तपाए
सोने के समान तथा उठाव आकषक होता था। दै य क अपे ा वे स य और सुसं कृ त भी
थे। दानव जैसे वीर थे, जैसे हंसमुख और कला ेमी थे। संगीत-नृ य उ ह अ य त ि य था।
उनक भाषा कणमधुर थी। और वे ाकृ त बोलते थे। इस ीप के िनवासी अ य त प र मी
और सिह णु थे। वे दोपहर क धूप और गम क परवाह न करके अपने काय म त रहते
थे। ब त-से दानव भात क सुनहरी धूप म अपने खेत , बगीच और खिलहान म काम
कर रहे थे। नगर–हाट म प यक भी थे, िश पी भी थे। वे सभी अपने-अपने काम म त
थे। ि यां भी पु ष ही के समान प र मशीला थ । ये दानव जैसे व थ और प र मी थे,
वैसे ही हंसमुख और िमलनसार भी थे। उ र के िच न उनम कट थे।
सु दर भात था। भात के इन ण म समु –तट क कृ ित-शोभा देखते ही
बनती थी। सव एक माधुयपूण आलोक छाया था। सुदरू ि ितज पर फै ले ए फे िनल
सागर क ग भीर तंरग पर भातकालीन सूय क रि म करण िथरक रही थ । लाल-
पीली आभा से उद्भािसत आकाश अन त क ओर एक धूिमल रे खा बनाता आ समु से
जा िमला था। इसके नीचे सफे द प ी जहां–तहां जल ड़ा-रत थे। पछवा हवा कु छ वेग से
बह रही थी, और उसके झ क से तटवत वृ झूमते ए एक सी कार-सा कर रहे थे। बल
वात के थपेड़ से आ दोिलत महासागर क वार क रौ लहर ग भीर गजन–तजन करती
ई अनवरत गित से तटवत काली और लाल-लाल च ान से टकरा रही थ । सारा
उपकू ल ेत भाग से भरा था।
रावण अपनी अिभसा रका उस दै यबाला का अपनी ही आंख के स मुख िनधन
देख अ य त िथत आ। दानव का दलन करने तथा मकरा क जीिवत आ ित देने से
उसका ोध य िप कम हो गया था, पर उसका मन शोक–द ध हो रहा था। वह इस समय
एकाक समु –तीर पर िच शा त करने और व थ होने के िलए आया था। वह आज
अपने वभाव के िवपरीत दुिखत था। रह-रहकर उसे दै यबाला के साहस और उ सग क
याद आती थी। य िप बिल–मांस के साथ उस बाला का मांस भी उसने सब रा स के
साथ खाया था, और यह उसके िव ास के अनुसार उसके ित सबसे अिधक पिव
वहार था, पर तु उस ि यतमा का अभाव उसे इस समय खटक रहा था।
इसी समय उसने देखा, एक दीघकाय दानव उसक ओर चला आ रहा है। उसके
साथ ही एक परम सु दरी सलोनी बाला है। दानव ब त ल बा और कृ शकाय था। उसक
साथ वाली बाला अनूढ़ा थी। तपाए ए सोने के समान उसका रं ग था। ीण क ट और
थूल िनत ब थे। वह सोलह सुल ण से यु थी। उसके के श काले, सघन, िचकने और
घुंघराले थे। वे पाद-चु बन कर रहे थे। भ ह जुड़ी ई, जंघाएं रोम-रिहत, गोल; दांत सटे
ए थे। ने के समीप का भाग, ने , हाथ, पैर, टखने और जंघाएं सब समान और उभरे
ए थे। नख अंगुिलय क गोलाई के समान गोल थे। ह त-तल उतार-चढ़ाव वाला,
िचकना, कोमल और सु दर था। उं गिलयां समान थ । शरीर क काि त मिण के समान
उ वल थी। तन पु और िमले ए थे। नािभ गहरी थी तथा उसके पा -भाग ऊंचे थे।
व थल और दोन पा व उतार-चढ़ाव वाले थे। शरीर के रोम कोमल थे। दोन चरण क
उं गिलयां और तलुए, ये बारह भूिम से भाली–भांित सट जाते थे। हाथ-पैर लाल थे। उनम
यव क रे खाएं थ । म द मु कान िनर तर उसके होठ पर खेल रही थी। ऐसी ही सुल णा
सुकुमारी दानव क वह बेटी थी।
दानव ने धीरे –धीरे रावण के िनकट आकर उसे ‘ वि त’ कहा। लाज से िसकु ड़ी ई
तथा शोभा और कोमलता से प रपूण उस बाला को नीची आंख कए उस दानव के पास
खड़ी देख एक बार रावण चम कृ त हो गया। उसने दानव से कहा–‘‘महाभाग! आप कौन ह,
और मेरे िनकट आने म आपका या योजन है?’’
‘‘आप िव वा मुिन के पु रावण पौल य ह न?’’
‘‘वही ।ं ’’
‘‘तो मेरा आप ही से काम है, र राज!’’
‘‘आपने या र -सं कृ ित वीकार कर ली है?’’
‘‘िन संदहे , और म आपके अधीन ।ं ’’
‘‘तो महाभाग, यह वै वण रावण पौल य आपका या ि य कर सकता है?
पर तु आप कौन ह? पहले यह किहए।’’
‘‘म दनुपु मय ।ं ’’
‘‘आप जापित के वंश के ह, म आपको अिभवादन करता ।ं ’’
‘‘तो सौ य रावण, मेरी कथा सुनो।’’
‘‘सुन रहा ।ं ’’
‘‘का यप सागर–तट पर िहर यपुर के िनकट मेरा पुर है, और म दै यपित
िवरोचन का बा धव ।ं कदािचत् तुमने सुना हो, एक हेमा नाम क अ सरा उरपुर क
िनवािसनी थी। उसे देव ने मेरे िलए दे दया था। िचरकाल तक म उसके साथ आन द से
रहा। पर तु आज चौदह वष बीत रहे ह, वह मुझे छोड़कर फर देव के पास चली गई।
उसके सुख-िवलास के िलए मने एक अित सु दर नगर क रचना क थी, जो वणमय था।
उसम मने उस सु दरी के िलए मिण-महल बनवाया था, जो आज चौदह वष से सूना है। म
उस ि या के िवरह से ाकु ल, असमय ही वृ हो गया ,ं और ीप- ीप म भटक रहा ।ं
‘‘यह क या उसी के गभ से उ प ई है। अब यह युवती ई। तुम ॠिष-पु हो,
िव मशील हो तथा जापित के वंश का र तुमम है, इससे म यह अपनी सुल णा क या
तु ह देता ।ं मेरे पास ब त वण-र है–वह सब भी म तु ह देता ।ं मेरे दो पु , इस
क या के भाई, बड़े वीर और मेधावी ह, राज–सभा के िनयम को जानते ह–उ ह भी म
तु हारी सेवा म िनयु करता ।ं अब तुम यह मेरा उपहार वीकार करो, मुझे स ह षत
करो, अनुबि धत करो!’’
बूढ़े दानव क यह बात सुनकर रावण ने कनिखय से चरण-नख से भूिम कु रे दती
ई उस नव कसलय–कोमल त व गी बाला क ओर देखा तो उसका स पूण ता य
जागृत् हो गया।
रावण ने पूछा–‘‘महाभाग, आपक इस क या का नाम या है?’’
मय दानव ने कहा–‘‘इसका नाम म दोदरी है।’’
‘‘तथा तु महाभाग, अि विलत करो, म उसक सा ी म धमपूवक आपके
क यार को हण क ं गा।’’ बूढे़ दानव ने त काल सूखी सिमधाएं चुन ल और अि -
पाषाण से अ याधान कया। रावण ने क या का हाथ पकड़कर कहा–‘‘गृ ाािम ते
सौभग वाय ह तम्।’’ दानव मय ने एक अमोघ शि उसे भट देकर कहा–‘‘ वि त,
तु हारा क याण हो, पौल य मुिनकु मार, यह द शि लो। इसके रहते तुम िव म
अजेय हो। अब म चला।’’
वृ दानव एक ओर जाकर पवत-शृंखला म गायब हो गया।
रावण ने नववधू क ओर देखकर कहा–‘‘वरं ूिह।’’
वधू ने ितरछी दृि से उसक ओर देखकर कहा–‘‘अलमलम्। ा सवम्।’’
तब रावण ने अपने उ रीय के छोर से बाला का उ रीय बांध िलया और ख ग
कोष से ख च उसक धार बाला के चरण-नख से छु आकर उसे अंक म समेटते ए
कहा–‘‘चलो फर, र कु लमिहषी म दोदरी!’’
और दूसरे ही ण स :िविजत दानव क वह सुर य पुरी, ासाद, ह य, सौध
सब रं ग-िबरं गी पताका और दीपाविलय से िचि त-िवभूिषत, िविवध वा और हष-
कोलाहल से आपूयमाण हो गए।
17. मधुयािमनी

व गितका, ीणकलेवरा, िवमलसिलला शैल नदी के समान दानव क बेटी


म दोदरी क देहयि थी। माधुय और सौकु माय का उसम िविच सामंज य था। दानव के
राज ासाद म मिणा–मािणा य और शृंगार-स ा क कमी न थी। दािसय और चे टय का
भी अभाव न था। रावण क आ ा से दानवे का मिणमहालय म दोदरी के िलए सि त
कया गया। एक सह दानव कु मा रयां उसक सेवा-शु ूषा के िलए िनयु कर दी ग ।
उ ह ने कृ शांगी म दोदरी को सुगि धत उबटन लगा, सुगि धत जल से ान कराया। के श
म मधूि छ –मृगमद लगा, चोटी गूंथ, उनम मु ा गूंथे। कपोल पर रो सं कार कया,
म तक पर हीरक-च , कान म नीलमिण-कु डल और क ठ म महाघ मु ा क माला
धारण कराई। कोमल ौम कं चुक से उ त तन-ब ध कए। व पर कुं कु म–क तूरी–अग
का लेप कया। भाल पर गोरोचन क ी दी। अधरो को ता बूल-रं िजत कया। स पणी
के समान उसक पदचुि बनी वेणी लटकने लगी। इ -नीलमिण क मेखला धारण करने से
उसक क ट क शोभा सागर के समान हो उठी। उसक उ वल धवल द तपंि , उसके
लाल अधरो से य कं िचत् सी कार-सा करते ए ास के साथ िनकलती ई, अ ितम
सुषमा- सार कर रही थी। उसके कमल के समान बड़े–बड़े नयन म काजल क रे खा ऐसी
तीत होती थी, जैसे नई कटार पर फर धार चढ़ा दी गई हो। उसक बं कम भ ह के नीचे
म दर दृि मद-वषा कर रही थी। वह पूण च के समान सुषमा वाली कृ शोदरी, नख–
िशख शृंगार कर, िव ुत िव वापु मुिनकु मार रावण पौल य के साि य म जाने के
कारण लाज के भार से िसकु ड़ी-सी जा रही थी।
इस कार अकि पत, अत कत रीित से ाणर ा होने, अपनी अिभसार-नाियका
का देखते-देखते ही वध होने तथा दानव के ीप के साथ दानवपु ी म दोदरी को ा
करने के कारण रावण एकबारगी ही अ त- त हो उठा। अभी वह व थ नह था। पर तु
द व पा म दोदरी के िलए उसका स पूण ता य िवकल हो रहा था। मनोरम सा य
वेला थी। बल परा मी रावण उस समय मदवन म िवचरण कर ीप क सुषमा देख
रहा था। च मा क करण पवतीय देश म रजत-कण िबखेर रही थ । शीतल-मंद-सुगंध-
समीर से िहल-िहलकर, वृ से झड़-झड़कर पु प िबखर रहे थे, िजनके कारण वहां का
देश पु पमय हो गया था। चार ओर पवत क छोटी–बड़ी पर पर गुंथी ई शृंखलाएं,
उनके बीच म काि तमान् क णकार के सघन वन, कद ब, मौलिसरी, च पा, नागके सर,
अशोक, आम, के वड़ा, िचर जी, ना रयल और कटहल के वृ शोभा दे रहे थे। रावण ारा
अभय पाए ए सुभट दानव ता य से प रपूण मदमाती ि य के साथ जहां–तहां िवहार
कर रहे थे। मधुर क ठ वाली क रय क वर–लहरी वायु म तैर रही थी, िजससे रावण
का ता य शत–सह मुख होकर जाग रहा था। ासाद म अ सराएं तथा दानव–
कशो रयां राजमिहषी म दोदरी का शृंगार करती ई वीणा, मृदग ं , मुरज, मुरली के साथ
को कलक ठ से गान कर रही थ । मौलिसरी और बकु ल के पु प क भीनी महक से
वातावरण सुरिभत हो रहा था। वस त क मकर द-ग ध और िविवध पु प के सौरभ से
रावण म त हो गया। वह सुवािसत म पी-पीकर कामद ध हो िवरिहय के समान ल बी-
ल बी सांस लेने लगा।
आकाश म च ोदय आ। कभी वह च मा क ओर देखता, कभी दूर तक फै ले ए
सागर–िव तार को।
इसी ण लाज के भार से िसकु ड़ी, पु पभार से लदे वृ त क शोभा वाली म दोदरी
को सिखय समेत धीरे –धीरे मदवन म आते देखा। वह अधीर होकर दोन हाथ फै लाकर
आगे बढ़ा क तु कु छ सोचकर जहां का तहां रह गया। इस समय म दोदरी के अंग पर जैसे
छह ॠतुएं वास कर रही थ । िविवध पु प के मनोरम और कलापूण आभूषण धारण
कए, िज ह क रय और दानव-कु मा रय ने गूंथा था। वह मू तमती वन ी दीख रही
थी। उसक देह म अंगराग लगा था, के श म क पवृ के फू ल गुंथे थे। उसके ने ऐसे थे जो
बरबस मन को ख च लेते थे। पु िनत ब, पूणच -सा मुख, धनुष-सी बांक भ ह, गजराज
क सूंड़-सी सटकारी जंघाएं और नवप लव से भी कोमल उसके हाथ अनायास ही देखने
वाले के मन को मोह लेते थे।
एक चेटी ने कहा–“भतृदा रके , देखो, वह सागर-तीर पर धवल रमणीय सारस
क पंि कै सी भली लग रही है!’’
‘‘मनोरम है, क तु म िमत ;ं आओ; यहां माधवी लताम डप म िव ाम कर।’’
म दोदरी लताम डप म रखी फ टक-िशला पर बैठ गई। सिखय ने उसे चार
ओर से घेर िलया। इसी समय एक चेटी ने आड़ म खडे़ रावण को देख िलया।
उसने म दि मत संकेत करते ए कहा–“अरे , वह कौन है?’’
म दोदरी ने बड़े-बड़े कमल-से ने उठाकर देखा–उसके ने लाज और चाह से भर
गए।
म द मु कान के साथ उसने कहा–‘‘आयपु ही तो ह। अब या क ं ?’’
रावण ने भी यह देखा। वह धीरे –धीरे आगे आया। म दोदरी ने खड़ी होकर कहा :
‘‘जय वायपु ! इदमासनम्।’’
‘‘अये म दोद र! आ यताम्।’’
‘‘यदायपु आ ापयित।’’ दोन फ टक-िशला पर बैठे। चे टयां दूर िखसक ग ।
म दोदरी ने कहा–‘‘आपका मुख जल से भरे ए मेघ के समान अ ुि ल है, इसका या
कारण है?’’
‘‘आहा, काशकु सुम रे णु आंख म िगर गया, उसी से!’’
म दोदरी ने भाव से चेटी को पुकारकर कहा–‘‘अरी, सुखोदक लाओ!’’
चेटी दौड़कर गई। सुखोदक ले आई। रावण ने मुख– ालन कया। वह मन म
सोचने लगा–यह नवोढ़ा बाला मेरे मन क स ी था सुन या कहेगी? य तो यह धीर
वभाव क दीख पड़ती है, पर तु ी- वभाव ही अधीर है। इसी से ि या से मुझे झूठ
बोलना पड़ रहा है।
इसी समय चेटी ने आकर िनवेदन कया–‘‘समु -गृह म श या सि त है।’’
सिखय ने रावण के संकेत से म दोदरी को उठाया और समु -गृह क ओर ले
चल । समु -गृह के ार पर जाकर सब ठठक ग । रावण ने हाथ पकड़कर म दोदरी को
भीतर िलया। सखी चे टयां लौट ग । ासाद म मंगल-वा बज रहे थे तथा नृ यांगनाएं
मंगल-गान कर रही थ । क म सुगि धत तेल के दीप बड़े-बड़े दीपाधार पर जल रहे थे।
कृ शोदरी म दोदरी को अंक म भरकर रावण ने उसके शतसह चु बन ले डाले। फर उसने
उसक आंख म आंख डालकर कहा–‘‘ ाणसिख! या यह व नह है? या सचमुच ही
तुम, मू तमती कौमुदी, आज मेरे साि य म हो? तब या दानव मकरा ने मेरी बिल नह
दी? वह सब व था?’’
म दोदरी ने पलक म मु कान भरके कहा–‘‘स य था। मने आपको बिलयूप म बंधे
देखा।’’
‘‘तब तुमने यह भी आशा क थी क यह यूपब बिलपु ष तु हारा पित होगा?’’
‘‘आशा नह , कामना क थी, िपतृचरण से मने आ ह कया था, वे तु हारी र ा
कर।’’
‘‘ फर?’’
‘‘दानवे मकरा ने िपतृचरण का अनुरोध नह माना। इसी से िपतृचरण ने
अपने बा धव दानव से िव ोह कया। उ ह ने दानवे के िव तु हारे प म यु कया
था।’’
‘‘कहां? यह तो उ ह ने कहा नह ।’’
‘‘न कहने से या, िपतृचरण आ म ाघा नह चाहते।’’
‘‘म उनका उपकृ त ;ं या म उनका कु छ ि य कर सकता ?ं ’’
‘‘य द तुम मातृचरण का उ ार कर सको।’’
‘‘कहां ह वे?’’
‘‘उरपुर म, देव के साि य म।’’
‘‘ कसके ?’’
‘‘वा ण के ।’’
‘‘ क तु...’’
‘‘ या?’’
‘‘वहां वे या वे छा से ह?’’
‘‘म नह जानती; जब वे ग , म ब त छोटी थी।’’
‘‘कोई स देश िमला?’’
‘‘नह ।’’
‘‘अ छा, समय पर याद दलाना। द पाल वा ण को देखूंगा म!’’
‘‘अनुगृहीताि म।’’
‘‘ या तुम मुझे पाकर स ई, ि ये?’’
‘‘यह तो अिधक से भी अिधक है।’’
‘‘तुमने पहले कभी मेरा नाम सुना था?’’
‘‘के वल ण-भर मने तु ह बिल-यूप म बंधा आ देखा था, उसी ण मने अपने को
तु हारे पादप म अ पत कर दया।’’
‘‘य द म बिल हो जाता।’’
‘‘तो म भी..।”
रावण ने यार-छलकती आंख से म दोदरी क ओर देखकर कहा :
‘‘अप रिचता ही?’’
‘‘और या...।’’
‘‘ या और ने भी कदािचत् यही सोचा।’’
‘‘कौन?’’
‘‘वह दै यबाला।’’
‘‘वह बिल?’’
‘‘हां, ि य!’’
‘‘कौन थी वह?’’
“अिभसार-सखी! दो दन पूव उसे थम ण देखा, णय आ, िव ह आ, ब दी
आ। जलदेव से उसने मेरे जीवन क र ा क , और यहां बिल-यूप म बंधे-बंधे अपना
जीवन दे मेरे ाण क र ा क ।’
‘‘अहा, सुपूिजता है वह दै यबाला! अिभन दन करती ।ं इसी से आयपु के ने
वा पाकु ल ह?’’
‘‘इसी से। कल भोर म उस ता मा क मृित से िवकल–िवद ध जब म शू य
दय, शू य दृि से सूने सागर क लहर को देख रहा था, द ांगने, तूने न जाने कहां से
पा रजात कु सुम किलका–सी कह से अवत रत होकर मेरे िवद ध ाण को शीतल कर
दया। कह सुभगे, कस देव क कृ पा से ऐसा आ?’’
‘‘जलदेव क कृ पा से–िजसे तुमने जीिवत दानवे क आ ित दी!’’ वह हंस पड़ी।
कु द-कली-सी धवल द तपंि से रावण ने िवमोिहत हो म दोदरी को व से लगाकर
कहा–‘‘उस जलदेव क जय हो!’’
‘‘अरे , यह या कह दया!’’
‘‘ या आ?’’
‘‘अनथ, अनथ!’’
‘‘कै सा?’’
‘‘तुमने जलदेव का जय-जयकार कया।’’
‘‘तो फर?’’
‘‘जलदेव तो द पित व ण ह। वा णेय ने मेरी माता का हरण कया है। उ ह तो
तुमने िवम दत करने का वचन दया है।’’
‘‘अव य दया है क तु उनके िवम दत होने पर जो नए जलदेव ह गे उनक जय,
जय!’’
‘‘वे कौन?’’
‘‘तेरे िपतृचरण, वै वण रावण पौल य के अकारण िम ।’’
‘‘तुम ध य हो, आयपु !’’
‘‘पर तु म आय नह ।’’
‘‘आयपु !’’ म दोदरी रावण के व से जा लगी।
‘‘अ छा, अभी यही सही। भिव य म मुझे र पित कहना।’’
ि ध चांदनी रात थी। समु क आन ददायक वायु के झ के आ-आकर युगल
द पित के दयो लास को आ दोिलत कर रहे थे। रावण मु ध दृि से म दोदरी को देख
रहा था, जो च यो ा क रजत- भा म हीरकमिण-सी दप रही थी।
दानव क याएं अल य रहकर मंगल-गान कर रही थ । संह ार पर बादल क
गजना के समान नगाड़े बज रहे थे। रावण अतृ दृि से ल ावनिमता, ीण क ट वाली
म दोदरी को दृि से मानो पी रहा था। म दोदरी ने म द मु कान से कहा :
‘‘अब या सोच रहे हो?’’
‘‘तू ही कह।’’
‘‘उसी महाभागा अिभसार सखी क बात।’’
‘‘नह , तेरी।’’
‘‘मेरी या?’’
‘‘तेरा कु सुम-कोमल, अमल-धवल-तरल गा है; जैसे छू ने से ही मैला हो
जाएगा।’’
म दोदरी ने बं कम कटा करके पित क ओर देखा, फर हंसकर कहा, ‘‘छू कर
देखो।’’
‘‘इतना तो यथे नह होगा, ि ये!”
‘‘यथे कतना होगा?’’
‘‘तुझे समूची ही य द म अपने म समा पाऊं तो।’’
‘‘तो?’’
‘‘आह, परम सुख क उपलि ध हो!’’
‘‘परम सुख क उपलि ध करो तुम।’’
‘‘तेरी अनुमित है, पर मेरा साहस कहां है!’’
‘‘दानवे मकरा क जीिवत आ ित देने म सब समा हो गया?’’
‘‘नह । देख रहा ,ं तुझे आ ा त करने यो य साहस मुझम कभी का है ही नह ।’’
म दोदरी रावण के व से आ लगी। उसने मृदल ु क ठ से कहा–‘‘म तो तु हारी
अनुगता ,ं दासी ।ं मुझसे तु ह सुखोपलि ध हो, तो अहोभा य!’’
रावण ने म दोदरी का चु बन िलया और फर कहा :
‘‘सब कु छ अिनवचनीय-सा तीत हो रहा है।’’
‘‘ या?’’
‘‘जैसे आज तेरे साि य म मेरा अहं गला जा रहा है... म जैसे खोया जा रहा ।ं ’’
‘‘ऐसा ही तो म अनुभव करती ,ं आयपु !’’
‘‘ या तेरे िलए भी यह नई अनुभूित है?’’
‘‘है तो।’’
‘‘अहा, तो चल, वह पु पश या है, सुखासन है, सुरिभत म है, वास ती पवन है,
ाण म ाण के लय होने का ण है!’’ उसने उस अिन दानवनि दनी कृ शोदरी
म दोदरी को दय से लगाकर कहा :
‘‘समापो दयािन नौ!’’
18. वण–लंका म

स पूण वस त बीत गया। उसी मनोरम ीप म ताल, तमाल, िह ताल क सघन


छाया वाले थल से प रपूण उस र य थली म नववधू दानवनि दनी म दोदरी के साथ
रावण ने व छ द मधुकाल तीत कया। कभी मिणमहल के ितिबि बत क म, कभी
उ वल फे नरािश से भरे ए समु -तट पर, कभी िवहंगजन-कू िजत वन थली म, कभी
कसी शीतल पवत क उप यका म, कभी उस शा त-ि ध झील के िनमल जल म
ितिबि बत च के कांपते ए ितिब ब के साि य म, युगल ेिमय ने अपने मधु-
दवस यापन कए। दोन ने दोन म ाण का िवलय कया। दोन ने दोन को अपना
आ मापण कया। रावण और म दोदरी का संयोग–शौय और ृंगार का संयोग था। अभाव
म भाव क पू त थी। कु िलश-कठोर पौ ष नारी क आंच पाकर िपघलकर मोम हो गया।
यह र पित रावण, िजसने अब तक अपने उद जीवन म परशु और धनुष ही पश कया
था, इस रमणीर दानव-नि दनी कृ शोदरी म दोदरी को पश कर आ याियत हो गया।
स पूण वस त क मधुयािमनी सुवािसत म , सुधा-संगीत और पु पव लरी-सी
ि या के मृद-ु मधुर आ लंगन म तीत ई। यह उसने मातुल ह त ारा कु बेर धनपित
का िनम ण पाया। उसने अपने नाना से परामश कर सब मनोरथ संक प सोच-िवचार
लंका म वेश करने का िनणय कया। धूत सुमाली ने देखा, यही वह वण ण है। अब सभी
पा वत ीप जय कर िलए गए थे। सभी जगह रावण क र -सं कृ ित क दुहाई फर गई
थी। देव, दै य, दानव, नाग, असुर, य , जो रावण क र -सं कृ ित वीकार कर लेता था,
वही रा स नाम से अपने को स बोिधत करता था। इस कार रा स क एक नई संयु
महाजाित संग ठत हो चली थी, िजसम भारतीय महासागर के दि णांचल म फै ले ए
ीप म बसने वाले देव, दै य, दानव, नाग, असुर, य –सभी सि मिलत थे। सभी का एक
ही नारा था–‘‘वयं र ाम:।’’ इसी नारे के नाद पर रावण के िवकराल परशु के नीचे
दि णांचल म फै ली ई सारी ही असुर जाितयां एक सू म गुंथ रही थ । यह सू था ‘र -
सं कृ ित’ और उसका तोता था रावण पौल य–रा स का अिधपित।
उसने उन ीप के रा य- ब ध, व था और सुर ा का उ कृ ब ध कया।
दानव के इस ीप-समूह का रा यािधकारी मामा अक पन को बनाया, तथा बाली ीप,
यव ीप, मलय ीप का रा यभार िव त रा स को देकर, सुमाली को संग ले, रावण ने
ब त-से िव त और सुभट रा स के साथ तरिणय म बैठ, ीप से ा ब त-सा वण
र साथ ले लंका क ओर थान कया। सुमाली दै य क िचर अिभलाषा स पूण ई।
लंका म रावण का कु बेर ने यथावत् स कार कया। उसे पृथक् महल रहने को दया। ेम
और सौहाद से सब सुिवधाएं तुत कर द । साथ ही ब त-सी धन-स पदा भी दी। उसने
प कहा–“भाई, यह लंका जैसी मेरी है, वैसी ही तु हारी भी है। इसिलए मेरे रा य म तुम
सुख से रहो।’’
पर तु रावण के तो उ े य और दृि कोण ही कु छ और थे। वह न के वल दि ण क
इन सब अनाय जाितय को एक सू म बांधकर एक सि मिलत नई जाित रा स क
बनाना चाहता था, वरन् वह आय और अनाय के भेद को भी न कर देना चाहता था,
वा तव म उसम आय और अनाय दोन ही र का िम ण था, इसिलए वह चाहता था
क दोन जाितयां सब भेदभाव भूलकर एक हो जाएं। इसीिलए उसने वै दक-अवै दक सारी
था और पर परा को िमला-गलाकर ‘र -सं कृ ित’ क थापना क थी।
‘वयं र ाम:’ उसका नारा था। वह कोई रा य का वैसा लोलुप न था, पर तु शौय-
िव म उसम ब त था। वह जानता था, जब तक लंका पर रा स का अकं टक रा य न हो
जाएगा, रा स क यह जाित िति त नह होगी। इसी से वह सुमाली के बढ़ावे म आ
गया।
पर तु अब, जब उसने लंका क समृि देखी, कु बेर का वैभव देखा, सौध, ह य,
वीथी, राजमाग देख,े मिणर और वण के भ डार देखे, नगर-कोट राज– ासाद, न दन
वन, अशोक वन, और हाट देख,े तो वह लंका पर मोिहत हो गया। उसने यह दृढ़ िन य कर
िलया क लंका क के वल भाौगोिलक ि थित ही नह , उसक राजनीितक ि थित भी ऐसी
है क इसी ीप से सारे दि ण-तट पर रा स का अनुशासन कायम कया जा सकता है।
पर तु कु बेर उसक सबसे बड़ी बाधा था। कु बेर ही य , य जाित भी उसके
उ े य क पू त म ब त बड़ी बाधा थी। रावण ही क भांित कु बेर द पाल ने भी य क
एक नई जाित देव, दै य, दानव, असुर और नाग म से संग ठत क थी। उसका नारा
था–‘वयं य ाम:’ अथात्, हम भोगगे। इसका अिभ ाय यह था क िव के भोग-ऐ य हम
भोगगे। यह नारा बुरा न था। फर धनपित कु बेर कसे नह चेगा! बस, ब त-से नाग,
देव, दै य, असुर उसक य -सं कृ ित के अधीन हो गए। य का काम खूब भोग-िवलास
करना, म पीना, खूब खाना-पीना और मौज करना था। कु बेर ने सभी य को धन-
स पदा से स प कर दया था। इसी से लंका म य खूब मौज-मजा करते थे। द पित
कु बेर क छ छाया म उ ह कसी बात का भय न था। पर तु रावण ने आकर उनक सारी
व था ही भंग कर दी। उसके नव-दीि त रा स ‘वयं र ाम:’ का नारा लगाते, जहां-
तहां उप व करते, य को िचढ़ाते, कभी-कभी मारपीट भी कर बैठते थे। श ाघात भी
होने लगे। य पित ने समझा था क जैसे शाि तपूवक हम यहां रहते ह उसी तरह रावण भी
रहे, खाए-िपए, मौज-मजा करे । सभी तो कहते ह–वयं य ाम:! ब त अ छा मूलम है।
तभी तो नाग, असुर, देव, दै य, दानव ने अपने कु लधम का य जाित म संग ठत होना
पस द कया है। फर यह रावण य नए उप व खड़ा करता है? यह नई ‘र -सं कृ ित’
या बला है?
धीरे -धीरे लंका म ब त उप व होने लगे। वहां का वातावरण ब त ु ध हो उठा।
य लोग रा स से डरकर घर म िछपकर बैठने लगे। रा स जहां कसी इ े -दु े य को
देखते, वे ‘वयं र ाम:’ का नारा उठाते। समथन न होने पर प रघ, शूल, परशु चलाकर उसे
मार डालते। फर भून-पकाकर खा डालते थे, धीरे -धीरे रा स के ये अ याचार इतने बढ़
गए क एक बार धनपित कु बेर ने रावण से बातचीत क । कु बेर ने कहा–आयु मान् रावण!
तू यह या अनथ करता है! नगर के शा त जीवन को अशा त बनाता है! तुझे िच ता या
है? रहने को तेरे पास महालय है। धन-धा य, दास-दास का अभाव नह । खा-पी और मौज
कर। हम य क यही सं कृ ित है। यही नारा है–‘वयं य ाम:’।
रावण ने कहा–आप ये ह, पू य ह, पर तु हम आपसे सहमत नह ह। खाना-
पीना, मौज करना जीवन का ुव येय नह । मेरा नारा है–‘वयं र ाम:’। हम जापित के
वंशधर ह। एक ही िपता क यप से िभ -िभ माता से दै य, दानव, नाग, असुर और
आ द य क उ पित ई। हम दायाद बा धव ह। म नह चाहता क आ द य, देव, दै य,
दानव, नाग, असुर अपनी पृथक् जाित बनाएं, उनम संघष हो, यु हो। म िव म नृजाित
को एक ही सं कृ ित के अधीन करना चाहता ं और वह सं कृ ित मेरी थािपत क ई र -
सं कृ ित है। हम कहते ह–‘वयं र ाम:’ और हमारी संयु जाित है–‘रा स’।
‘‘पर तु हम तो य ह। हमारा नारा भी पृथक् है। हम तुमसे सहमत नह ह।’’
‘‘आप मेरे ये ाता ह, पू य ह, इसी से आपको छोड़ता ।ं नह तो मेरा एक यह
भी िनयम है क हमसे–हमारी र -सं कृ ित से–जो सहमत है, वह अभय। जो सहमत नह
है, उसका उसी ण हम परशु से िशर छेद करते ह; जैसा क हमने नागराज व नाभा और
दानवे मकरा का कया।’’
‘‘तो आयु मान्! यह तो प यु -िनम ण है। मने तुझे इसिलए तो लंका म
बुलाया नह है।’’
‘‘आपने मुझे लंका म बुलाकर अपनी ही मयादा क र ा कर ली। आप य द ऐसा
न करते तो म वयं आता–उसी कार जैसे म अ य ीप म गया ।ं ’’
‘‘समझ गया, आयु मान्, मुझसे यु चाहता है।’’
‘‘नह , बस आप हमारी र -सं कृ ित वीकार कर ल।’’
‘‘पर तु म य पित, द पाल धनेश कु बेर ।ं ’’
‘‘सो ठीक है, वह रह। के वल आप किहए–‘वयं र ाम:’।’’
‘‘नह , तु ह कहो–‘वयं य ाम:’।’’
‘‘वयं र ाम:।’’
‘‘वयं य ाम:।’’
‘‘नह ।’’
‘‘नह ।’’
‘‘तो आपक सेवा म मेरा यह परशु है।’’ रावण ने अपना िवकराल परशु कु बेर के
स मुख हवा म घुमाया।
कु बेर ने भी अपना व लेकर उसे वायु म घुमाकर कहा–‘‘तु हारे इस परशु का
जवाब मेरी यह गदा है।’’
इसी समय सुमाली झपटता आ आकर दोन ु सरदार के बीच म खड़ा हो
गया। उसने दोन के श का िनवारण करके कहा–‘‘ऐसा नह र पित! ऐसा नह
य पित!’’
‘‘तो फर कै सा?’’ कु बेर ने कहा।
‘‘आप दोन के बीच एक मयादा है। रावण आपका अनुज है–छोटा भाई है।’’
‘‘इसी से मा करता ।ं इसी से मने उसे अपनी लंका म आने दया।’’
‘‘लंका आपक नह , मेरी है। पर तु इस बात को जाने दीिजए। इस का कै से
िनराकरण हो, इसका िनणय अपने पू य िपता पर छोिड़ए। उनसे जाकर परामश लीिजए।
वे जैसा कह वही क िजए। आप दोन ही के वे समान िहतैषी ह। िपता ह।’’
कु बेर ने कहा–‘‘तथा तु!’’
रावण ने भी कहा–‘‘तथा तु!’’
कु बेर ने कहा–‘‘वयं य ाम:।’’
रावण ने कहा–‘‘वयं र ाम:।’’
दोन एक-दूसरे को घूरते ए ु और ु ध अपने-अपने िनवास पर चले गए।
कु बेर सब बात का आगा-पीछा समझ और रावण तथा उसके साथी रा स का उ त
वभाव देख पु पक पर सवार हो अपने िपता िव वा मुिन के आ म म आ ालय म
प च ं ा। िपता का िविधवत् पूजन कर, ब ांजिल हो कु बेर ने कहा–‘‘रावण को मने अपना
अनुज समझ लंका म आदर सिहत बुला थान दया था। अब वह वहां िनत नए उप व
मचा रहा है। उसने वहां एक र -सं कृ ित थािपत क है, वह परशु ऊंचा करके कहता
है–‘वयं र ाम:।’ जो कोई असहमत होता है, उसका त काल िशर छेद कर देता है। मुझसे
वह यु करने को तैयार है और उसके साथी रा स ने य के नाक म दम कर रखा है। न
रावण न उसके ये रा स, लंका म कसी क आन मानते ह। िजनका जी चाहे, उसी का िसर
काट लेते ह। देखते-ही-देखते ब त-से लंका के शा त, िश िनवासी देव, दै य, असुर, नाग,
दानव उसी र -सं कृ ित म सि मिलत होकर ‘वयं र ाम:’ का नाद करते और जो िवरोध
करे उसी का िसर काटते फरते ह। बालक और छोटा भाई जानकर मने उसे अभी द ड नह
दया है।’’
सारी बात सुनकर दूरदश िव वा मुिन बोले–‘‘पु तुमने जो कहा, वह मने सुना।
इस स ब ध म सब बात म जानता ।ं अब तुम मेरी बात यान से सुनो! यह रावण ब त
खटपटी, उ - वभाव और उ ाकां ी है। उसके पास वीर का अ छा दल है। उ ह क
सहायता से उसने भारत सागर के सभी ीप-समूह को जीत िलया है। ऐसी अव था म अब
लंका म अके ला तु हारा रहना सुर ा के िवचार से ठीक नह है।
‘‘दूसरी बात यह क सब झगड़ क जड़ उसका नाना सुमाली और उसके पु
उसके साथ ह। यह लंका तो पु , पहले सुमाली दै य ही क थी। जब मने वहां तु ह बसाया
था, तब सुमाली का कु छ पता ही नह था। म जानता था क वह िहर यपुर के देवासुर-
सं ाम म मारा गया। अब यह न जाने कहां से धरती फोड़कर िनकल आया। इसक पु ी ने
मुझसे ॠतुकामना क –सो मने धम के िवचार से वह वीकार कर ली। इसी से यह रावण
और इसके भाई-बहन उ प ए। मने इ ह वेद पढ़ाया, पर ये सब मेरे भाव म नह –अपने
नाना और मामा के भाव म ह। वही उसे उकसाकर ले गया और लंका पर उसका दांत है।
लंका के िनवासी भी सब उ ह के भाई-ब धु दै य, असुर, नाग और दानववंशी ह। इससे
पु , तेरे भले क बात म तुझसे कहता ं क तू इस उप वी से यु के झंझट म न फं स। तू
लंका को छोड़ दे और ग धमादन पवत पर अलकापुरी बसा, वह सुख से रह। वह थान
बड़ा मनोरम है। शंकर का साि य है। म दा कनी–गंगा है, यमुना है। वहां अनेक सरोवर ह
िजनम अनेक कमल िखले ह। वहां भांित-भांित के रं गे-िबरं गे पु प सुशोिभत ह। देवता,
ग धव और क र जो वहां ह, देव क उपजाितयां ही ह। उनसे तेरी सं कृ ित का मेल भी
है। इससे पु , तू यही कर। लंका को छोड़ दे। यह रावण दश ीव बड़ा अिभमानी और ोधी
है। वह न कसी क सुनता है, न कसी मा य-अमा य को मानता है। इसीिलए मेरी तु ह
यह िहतकारी सीख है।’’
और कु बेर ने यह सीख मान ली। इसका मम वह समझ गया। उसने चुपचाप लंका
खाली कर दी। अपने य को तथा सब स पदा को लेकर वह पु पक िवमान म चढ़
ग धमादन पवत पर चला गया और वहां अलकापुरी बसाकर िनवास करने लगा।
रावण ने भी उससे अिधक छेड़-छाड़ नह क । उसे अपने सब, धन, र और
प रजन सिहत चला जाने दया। कु बेर के लंका छोड़ते ही रा स ब त स ए। रावण
ने आ ा दी-िजसे हमारी र -सं कृ ित वीकार नह , वह लंका छोड़ दे, नह तो उसका
िशर छेद होगा। सभी देव, दै य, दानव, असुर, नाग ने उसक र -सं कृ ित वीकार कर
ली। ‘वयं र ाम:’ का मूल म लंका का ुव येय बना। अब लंका को सुदढ़ृ -सुग ठत कर
िव त रा स को रा य के िभ -िभ भाग दे, अपने यारह मामा को राजसिचव बना
वह रावण लंकापित, रा से पद पर अिभिष आ, म दोदरी उसक राजमिहषी।
19. इ

य द आप यान से प शया के न शे के पि म क ओर झुकते ए उ र म का यप


सागर के िनकटवत भूख ड पर नजर डालगे, तो आप देखगे क का यप सागर का स पूण
दि णी तट काके शस पवत- ेिणय क शृंखला से आ छा दत है। यह पर जा जया देश है
और उसी के नीचे उप यका म एक थान ‘अजरबेजान’ है, जो आजकल सोिवयत रा य
क सीमा म है। इसका ाचीन नाम ‘आयवीयान्’ था।
लय के बाद इस थान का नाम आयवीयान् इसिलए पड़ा क लय के बाद ही
इस भूख ड पर व ण के नेतृ व म आ द य ने लय म बचे ए प रवार को थािपत कया
था। यह पर अि नदी है, िजसके तट पर लय के बाद अि ॠिष ने अपना उपिनवेश
थािपत कया था। अि भृगुपु शु के पु थे। शु भी दै य के याजक थे, आजकल,
काके शस पाव य ा त ाचीन काल म ‘देमाब द’ कहलाने लगा था, जो देव थान का
िबगड़ा आ प था, और िजसके स ब ध म इस प र छेद म चचा क जाएगी।
िजस थान पर अि का उपिनवेश था, उसका नाम अि प न था। आज वह
थान ‘ए ोपेटन’ के नाम से िस है। इस देश म जो नदी ‘आ ीक’ िस है, वह नदी
हमारे पुराण म िव यात अि नदी थी। अि क यह भूिम तपोवन या तपोभूिम कहाती
थी। इसी थान पर आज भी ‘वन’ नाम का ाचीन नगर है। माक क बात है क इस
‘ए ोपेटन’ देश का ‘देमाब द’ पवत सारे संसार म एक ऐसा थान है जहां रात- दन सूय
अ त नह होता। रात- दन काश रहता है। इस तपोभूिम को आजकल ‘तपु रया’ ा त
कहते ह, जो वा तव म तपपुरी का िबगड़ा आ प है। ईरान के िनवासी इस थान को
‘पैराडाइज’ या वग कहते ह। इसके आस-पास का देश ‘मीिडया’ देश के नाम से िस
है। पुराण म अि का थान–‘परे ण िहमव तम्’ कहा है। इसका अथ ‘अपवत’ है। प शयन
इितहास म ए ोपेटन और अजरबेजान को आ ीक नदी के तीर पर का यप सागर के िनकट
बताया गया है। यह पर बैकु ठ, बिह त और स यलोक भी था। पुराण म इस भूिम को
‘कामधराधरा’ कहा गया है। िजसके समथन म प शयन इितहासकार इसे उपजाऊ फल से
लदी ई बताते ह। यह सोम पैदा होता था। यह क पत थे, जो यथे फल देते थे। यहां के
िनवािसय क जाित और गो आज भी अि यस है।
यह पर, अपवत म तपोभूिम के िनकट का यप सागर-तट के कसी ाम म कसी
कौिशक ामपित के वीय से एक क या को गभ रह गया। उसने अपवाद के भय से िछपकर
कसी गोशाला म चुपचाप पु को सव कया। बालक के ज म के बाद उसके िपता ने न
पु को वीकार कया, न उस क या को। उसने बालक को मार डालने क चे ा क ।
आयु पाकर उस बालक ने पैर पकड़कर िपता को मार डाला और वयं उस ाम
का पित बन गया। शी ही यह साहसी, परा मी वहां के आ द य का नेता बन गया।
व ण और िव णु को उसने अपने ऊपर स कर िलया, और अपने इलाके के पि म देश
के िम ु और उ , उमा, आ द बेबीलोिनया जाित के ज थेदार से उसने िम ता कर ली।
पर तु उ र के दै य और दानव उसके िवरोधी हो गए और उनसे उसके िव ह भी ार भ
हो गए।
इस साहसी त ण ने इ क पदवी धारण क । उसने अपने पड़ोसी और िम
बेबीलोिनयन स ाट क भांित अपने को देव कहना ार भ कर दया। बेबीलोिनयन
स ाट् देव कहाते थे तथा सोमपान का भारी उ सव कया करते थे; उ ह क देखा-देखी
इ ने देवभूिम म अपनी पूजा चिलत क तथा बेबीलोिनयन लोग क भांित सोमपान
क प रपाटी देव म चलाई। अब तक उस ा त के सब अ दित-पु आ द य ही कहाते थे;
अब उसने उस भूिम का नाम देवभूिम रखकर देवभूिम के सब िनवािसय को ‘देव’ सं ा दे
दी, और वह वयं देवराट् बन गया।
इस समय तक वेद क कु छ ॠचा का िनमाण हो चुका था, और कु छ ॠिष
ॠचा का िनमाण करते जाते थे। इसी काल म मै ाव ण विश ने ॠ वेद क कु छ
ॠचा का िनमाण कया था और एक िविश वै दक िविध आ द य म चिलत क थी।
पर तु विश के ही सौतेले भाई नारद ने–जो व ण का पु था–भृगु से स पक म आकर
कु छ ॠचाएं बनाकर वेद क वामिविध चिलत क । धीरे -धीरे विश और नारद, दोन म
वै दक िविध और ॠचा को लेकर अ छा-खासा िववाद होने लगा। नारद एक भु खड़
और आवारागद मनमौजी कृ ित के ॠिष थे। शी ही वे विश का िवरोध करने और
वेदिविध म वामिविध क थापना करने के कारण वामदेव के नाम से भी िस हो गए।
इ ने इन नारद अथवा वामदेव को अपना िम बना िलया, और उसे मधु और पुर कार
देकर उनसे अपनी तुित म एक समूच-े सू क रचना करा ली, जो आगे चलकर ॠ वेद का
एक सू हो गया। नारद वामदेव को जब, दूसरे ॠिषय ने, जो वैसे ही भु खड़ थे, इ के
ारा पुर कृ त होते देखा, तो उ ह ने भी इ क तुित म रचनाएं रच । इस कार इ ने
नारद और दूसरे िम क सहायता ले देवभूिम म एक नई वै दक सं कृ ित क न व डाली।
य िप इ का यह ाधा य आ द य को पस द न था। पर तु इ एक खटपटी और धूत
ि था। उसने आ द य के नेता िम ाव ण को ल लो-च पो के ारा और दूसरे आ द य
को मान-पुर कार देकर अपने अनुकूल कर िलया, और उसका यह ढंग देवलोक म इतना
पस द कया गया क उसके अनुकरण पर िम , व ण, यम, अि आ द द पाल ने भी
अपनी-अपनी तुित क ॠचाएं ॠिषय से बनवा ।
इ का यह रा य दै य और दानव क रा य-सीमा से लगा आ था, जो
का यप सागर-तट पर दूर तक फै ले ए थे। य िप ये देव, दै य, दानव पर पर स ब धी
और दायाद बा धव थे, तथािप उनम सां कृ ितक एकता न थी–िव ह ही था। पर तु फर
भी कौटु ि बक स ब ध उनम चिलत थे। इ ने पुलोमा दै य क पु ी से िववाह कया था।
फर भी दै य और दानव से उसके यु -िव ह चलते ही रहे। दै य लोग दितपु होने के
कारण अपने को े और ये समझते थे। आ द य म व ण क नीित तो सम वयमूलक
ही थी। पर तु आ द य िव णु से, जो क अ य त मह वाकां ी था, दै य के संघष-िव ह
वग- ाि पर आर भ हो चुके थे, िजसम इ ने यथे आ ह द शत करके िव णु को
भािवत कया था। इसी िव ह के फल व प िहर यक यप का वध आ। य िप लाद
से िव णु ने संिध कर ली थी, पर तु िव ह बढ़ते ही गए और इस समय तक चार देवासुर-
सं ाम हो चुके थे। अब अक मात् ही पांचव देवासुर-सं ाम का संयोग आ जुटा।
20. तारकामय

यह पांचवां देवासुर-सं ाम तारकामय के नाम से िस आ। पाठक को मरण


होगा क भृगु के पौ और शु के पु मह ष अि थे, जो देवलोक म अित िति त और
िस थे। उनके पु का नाम च था। आज भी ईरान म च क पूजा होती है, तथा वहां
चा वंश का ही चार है। च ही वहां का राजिच न है। ईरानी लोग रोज़ा या त को
सोम कहते ह। स भवत: यह रोज़ा सोम चा ायण त है। ईरान म सोमधारा नगर, सोमस
नदी और ीस म सोमास ीप है। यह च क ही ित ा म है। का यप सागर-तट पर
ज म होने से च का नाम अ बुिध भी िव यात आ।
च असुर-याजक कु ल म होने के कारण अ य त िति त पु ष माने गए। वे
िव ान् और वीर के नेता थे। िच क सा, औषिध और वन पितय के गुण-दोष को भी
जानते थे। वे वन पितय के वामी कहाते थे। द ने इ ह स ाईस क याएं दी थ । व णदेव
को इनसे यार था। अि के ये िम थे। च इ के अिभ िम थे और उसने च को
देवभूिम म वन पितय का वामी िनयु कया था। इस कार च इ के ही पास
देवभूिम म रहते थे।
देव के याजक अंिगरा-पु बृह पित थे। उनक ी का नाम तारा था। बृह पित
क प ी तारा से च का गु ेम-स ब ध हो गया, और एक दन अवसर पाकर च
तारा को भगा ले गया। इस बात को लेकर जो झगड़ा आर भ आ, उसका आगे चलकर
एक िवराट् प हो गया। बृह पित का प सब देव और इ ने िलया और च का प
सब दै य और दानव ने। घातक देवासुर-सं ाम आ। इस यु म देव हारे , पर तु लाद
का पु िवरोचन इस यु म काम आया। यही यु पांचव, तारकामय, देवासुर-सं ाम के
नाम से िस आ।
अ त म सि ध ई। तारा बृह पित को लौटा दी गई। पर तु जब तारा वापस आई,
तो वह गभवती थी। आ हपूवक पूछने पर तारा ने वीकार कया क गभ च का है। च
ने तारा को लौटाते समय देव से यह शत करा ली थी क पु का ज म होने पर उसका पु
उसे लौटा दया जाए। इस शत के कारण तारा के पु - सव करते ही वह बालक च मा
को दे दया गया।
इस बालक का नाम बुध आ। युवा होने पर सूयपु वैव वत मनु ने अपनी पु ी
इला उसे याह दी, और तपोभूिम का वह देश, जो आ द य के अिधकार म था, इसे दहेज
म दे दया। तब से यह देश इलावत कहाया। िजसे ाचीन प शया के इितहास म एलम
कहा गया है, और िजसके कारण व ण को प शयन इितहास म ‘इलोही‘ अथवा ‘इलाही’
के नाम से पुकारा गया। इला के नाम पर, मातृगो के आधार पर यह वंश भी ‘एल’ के
नाम से िस आ। तपोभूिम के अित र वह असुर- देश भी, जहां के अिधपितय का
याजक च कु ल था, इलावत ही के नाम से िव यात आ। इस कार वह सारा असुर-
देश, जो भारत के उ र-पि म म था, तथा आधुिनक िगलिगत के समीप तक का भूभाग
एवं एिशयाई स का दि ण-पि म भाग और ईरान का पूव भाग समूचा ही इलावत देश
के अ तगत था।
21. आयावत

च पु बुध असुर-याजक ॠिषकु ल म होने से सब दै य-दानव म िति त था,


अब सूयपु मनु क पु ी से िववाह हो जाने से उसक और भी ित ा बढ़ी और देव-भूिम
तथा असुर-भूिम पर एक कार से उसका पूरा अिधकार हो गया। पर तु बुध के ज म-
स ब धी अपवाद और देव-दै य के वैमन य के कारण दोन ही सुर-दामाद-बुध और
मनु–को वहां रहना अस हो गया और वे पि मो र के दुजय दरा को पार करते ए
इलावत को याग भारत म चले आए। भारत म आकर मनु ने तो सरयू-तीर अयो या नगरी
बसाकर अपने िपता के नाम से सूयवंश क ग ी थािपत क , और बुध ने अपने िपता च
के नाम पर च वंश क थापना करके गंगा-यमुना के संगम पर ित ान नगरी बसा,
अपनी राजधानी बसाई।
नृवंश म यह एक नई थापना थी क िपता के नाम पर नए कु ल और नए वंश
थािपत ए। भारत म आकर दोन ही कु ल ने वेद को अंगीकार कया तथा वण-मयादा
और प रवार- व था चिलत कर आय जाित क एक नवीन सं कृ ित थािपत क , जो
वै दक थी। इस आय सं कृ ित म अनेक नई बात का समावेश था। थम तो यह क उसम
िववाह-मयादा दृढ़ब क गई थी, और कु ल-पर परा िपतृमूलक िनि त क गई थी। यहां
तक क य द वीय कसी अ य पु ष का भी अनुदान िलया हो, तो भी स तित का िपता उस
ी का िववािहत पित ही माना जाएगा। दीघतमा ॠिष ने तो यह काम अपना पेशा ही
बना िलया था। विश और दूसरे ॠिषय ने भी इस कार दूसर क पि य को वीयदान
दया और उसक स तान अपने िपता के कु ल-गो को चलाने वाली िस ई।
इस प रपाटी से आय जाित के संगठन को ब त लाभ िमला। वह एक संग ठत
जाित बनती गई। यह वाभािवक था क उनके रा य, स पि आ द सब वैयि क होते गए
और देखते-देखते आयावत म मानव और ऐल के महारा य का िव तार हो गया।
आय म धीरे -धीरे इन दोन वंश क उ र भारत म अनेक शाखाएं फै ल , जो
च म डल और सूयम डल के नाम से िव यात ई । दोन म डल का संयु नाम
आयावत पड़ा।
22. मानव

मनु का नाम िवमाता के नाम पर साव ण मनु और िपता के नाम पर वैव वत मनु
िस आ। वा तव म मनु ने ही आय जाित क थापना क , िजसम िपतृमूलक कु ल-वण-
व था और वेद- ामा य क िवशेषता थी। अ य वै दक ॠिषय के अित र
व ण,सूय,यम,शिन आ द क भांित मनु भी म ा वेद ष थे । पर तु उ ह ने
द ड व था और राज व था का शा सा रत कया, जो मानव धमशा कहाया। मनु
के नौ वंशकर पु ए जो सूयवंश क नौ शाखा के मूलपु ष थे। इ ह के वंशज मानव
कहाए। सं ेप म यह कहा जा सकता है क के वल सूयवंशी ही अपने को ‘मानव’ कह सकते
ह, दूसरे नह ।
मनु के इन वंशकर पु म न र य त, नाभाग, धृ , शयाित, करे षु और पृ ु के
पृथक् -पृथक् कु ल चले; िजनम नाभाग और शयाित के कु ल अिधक िस ए। इस कु ल म
भी अनेक म ा ॠिष ए। मानव का सातवां कु ल नाभाने द का था। इसका पु
भालन दन वै य हो गया। पर तु वह ॠिष था। नाभाने द को कोई रा य नह िमला,
उसके पु भालन दन को कु छ धन िमला, उससे उसने वै यवृि अिधकृ त कर ली।
भालन दन का पु व सि य भालन दन वै य ॠिष था। पृ ु क स तान शू हो गई।
मनु के आठव पु का कु ल ांशु का है। यही कु छ पीछे वैशाली का यात कु ल
आ। इसी कु ल म च वत म त् राजा आ।
मनु का सबसे ये पु इ वाकु अयो या म रहा। यही सूयकु ल िस आ, और
ब त िस आ। इस कु ल क अनेक शाखाएं चल । इसी कु ल म उ तालीसव पीढ़ी म
राम ने ज म िलया। िस पु ष म िवकु ि , शशाद, ककु थ, आद, युवना , बृहद ,
मा धाता, पु कु स, अ बरीष, रघु, अज और दशरथ ए।
इस कु ल क तीसव पीढ़ी म अनर य राजा आ। उसक पृथक् ग ी उ र कोशल
क दूसरी शाखा थािपत ई। िव यात ैया ण, स य त और ह र इसी शाखा म
ए। राम से के वल एक ही पीढ़ी पहले बा ने उ र कोशल वंश क तीसरी नई शाखा
थािपत क , िजसम सगर और भगीरथ ए। पतीसव पीढ़ी म अयुतायुस ने दि ण कोशल
राजवंश क न व डाली, िजसम ॠतुपण, सुदास, िम सहक माषपाद राजा िस ए।
यह रा य वतमान रायपुर, िवलासपुर और स भलपुर के आसपास था। इसक राजधानी
ीपुर थी। इसी वंश क िवदेह म मैिथल शाखा इ वाकु के भाई ने थािपत क , िजसम
िनिम, िमिथ, जनक सीर वज, वीतह िस राजा ए। मैिथल क एक शाखा मूल
शाखा से सतीसव पीढ़ी म बसी, िजसम कु श वज कृ त वज, आ द ए। तीसरी मैिथल
शाखा ॠतुिजत् क फटी िजसम सीर वज जनक–राम के सुर ए।
दि ण कोशल राजवंश के राजा ॠतुपण के यहां नल ने गु वास कया था। नल
उ र पांचाल-नरे श के स ब धी थे, उनक पु ी इ सेना पांचाल-नरे श के पु मु ल को
याही थी, जो वेद ष थे।
मु ल के पु व के पु और पु ी दवोदास और अह या थे। अह या का याह
शर त गौतम से आ था। इ वाकु के बाद तीसरी पीढ़ी ही म िवदेह का सूयवंश थािपत
हो चुका था िजसक तीन ग यां थ –एक मैिथल, दूसरी संका य, तीसरी ॠतुिजत्।
मनु के नौ कु ल मानव कहाते थे। पर तु इ वाकु क सबक सब शाखा के कु ल
सूयवंशी कहाते थे। उनका नाम सूयम डल था।
23. पु रवा और उसके वंशधर

च -पु बुध अपने सुर वैव वत मनु के साथ भारत म आ बसे थे–यह पाठक
जानते ह। उ ह ने गंगा-यमुना के संगम पर ित ान नगरी बसा च दवंश क थापना क
थी। बुध बड़े भारी अथशा ी और हि तशा ी थे। अपने दादा दै य-गु शु से उ ह ने ये
िव ाएं सीखी थ । उनके पु पु रवा और भी तापी ए। उ ह अपने िपता का ित ान
का रा य तो िमला ही, िपतामह का इलावत का रा य भी िमला। अत: उनका मह व
असुर- देश से आयावत तक ापक हो गया। उ ह ने चौदह ीप जय कए। के वल इतना
ही नह , पु रवा म ा ॠिष भी थे। वे बड़े ही तेज वी, स यवान्, अ ितम व पवान्
और दानशील थे। उ ह ने अनेक य ाि य का आिव कार कया था। पु रवा के दादा च
ने उ ह एक द रथ दया था, िजसका नाम सोमद था। यह रथ ह रण-के तन का था।
उनके ासाद का नाम मिणह य था।
मरीिच-पु सूय और द पित व ण भाई भी थे और बा धव भी। व ण दै यगु
शु के दामाद थे और सूय शु पु व ा के दामाद। इस कार व ण सूय के फू फा हो गए
थे। एक बार ऐसा आ क मरीिच-पु सूय ने उरपुर क अ सरा उवशी को अपने िवलास-
क म बुलाया। देवलोक म ऐसी ही प रपाटी थी। उ ह ने वैयि क कु टु ब- था पूणतः
थािपत नह क थी। धन-स पि , ी–पु , कसी पर भी देवलोक म ि गत अिधकार
न था। सब कु छ सावजिनक था। उवशी सोलह शृंगार कर मरीिच-पु सूय के पास िवलास-
क म जा रही थी। छह ॠतु म िखलने वाले सुगि धत पु प के आभूषण पहने, देह म
अंगराग लगाए, के श म अ लान पा रजात-पु प गूंथे, वह अपूव शोभा क िनिध लग रही
थी। उसके बड़े-बड़े ने आकषक थे। उसका च िब ब-सा मुख, बं कम भ ह, गजराज क
सूंड़ के समान जंघाएं, सुडौल भारी िनत ब और वण-कलश से सुढार कु च को देख
ािणमा म काम-संचार हो रहा था। माग म उसे द पाल व ण िमल गए। उस समय
उवशी के ृंगार और प-वैभव को देख द पाल व ण काम-िवमोिहत हो गए और उसे
अपने िवलास-क म चलने को कहा। पर तु उवशी ने िवन भाव से द पाल व ण को
कहा–‘‘देव, इस समय तो मेरी यह देह आपके छोटे भाई सूयदेव के अधीन है। उ ह के िलए
मने यह ृंगार कया है। उ ह के बुलाने पर म उ ह रित-संतु करने को जा रही ।ं
इसिलए आपका मनोरथ म पूरा नह कर सकती।’’ पर तु व ण ने उसका अनुनय वीकार
नह कया । उसे जबद ती अपने िवलास-क म ले गए । व ण-देव क सेवा से िनवृ
होकर जब वह सूयदेव के िनकट प च ं ी, उस समय उसका ृंगार खि डत हो गया था,
आभूषण िततर-िबतर हो चुके थे, पु पाभरण दल-मल कर ीहीन हो गए थे। उसक दशा
म गज ारा मिथत कमिलनी क -सी हो रही थी। उसक यह दशा देख और इतने िवल ब
से आने के कारण सूयदेव अ य त ु ए। वह पीपल के प े क भांित कांपती ई सूयदेव
के चरण म िगर गई, और कहा–‘‘हे सु त, मेरा दोष नह है, मने आप ही के िलए शृंगार
कया था, और आप ही के पास आ रही थी क आपके भाई और फू फा द पाल व ण मुझे
जबद ती पकड़कर अपने िवलास-क म ले गए। अवश मुझे यह शृंगार उ ह अ पत करना
पड़ा।’’ इस पर अ य त ु होकर सूयदेव ने कहा-“अरी दुराचा रणी,मुवास वादा करके
दूसरे के पास य गई?” उ ह ने उसे देवलोक से िनकाल दया। काल पाकर उसने एक
बालक को सव कया और फर नवीन शृंगार कर सूयदेव को स कर उ ह तृ कया।
सूयदेव के औरस से भी उसे एक पु क उपलि ध ई। काला तर म वे दोन बालक युवा
होने पर मह ष अग य और मह ष विश के नाम स िस ए। काला तर म सूय से
उसने एक अिन सु दरी क या को भी ज म दया, जो यौवन का साद पाकर अपनी
माता से भी अिधक द पा ई। उरपुर के िनवासी देव उस फु टत कु दकली-सी
सुकुमारी–उस उवशी पर मु ध हो उठे । उन दन ऐसी ही प रपाटी थी। अ सराएं नगर–
वधू होती थ । इसी से इस अ सरा का नाम भी माता के नाम क भांित ‘उवशी’–उर म
रहने वाली–देवलोक म िस हो गया। इस नवीना पर ब त लोलुप दृि पड़ने लगी, पर
यह बड़ी मािननी थी। इसने कसी को भी अपना शरीर अपण नह कया।
उ ह दन दै य क राजधानी िहर यपुर म के िशय का एक स प यूथपित
रहता था। उन दन बेबीलोिनया और इलावत के बीच का सारा इलाका के शी लोग के
अधीन था। के शी िस घुड़सवार थे—संभवतः वतमान क ज़ाक इ ह के वंशधर ह। इस
के शी यूथपित ने देवता को परा त कर ब त याित ा क थी। उसका बा बल असीम
था। ब त दन से उसक दृि उर नगर-िनवािसनी इस उवशी पर थी। पर सूय के भय से
वह उससे दूर ही रहता था, फर भी वह उसे हरण करने क ताक म था। उन दन असुर-
देश का उर नगर बड़ा िस नगर था। आज भी प शया म िहर यपुर के थान पर
‘िहरन’ नगर बसा है, तथा वह पर उर नगर भी अभी तक है। दैवसंयोग से उसे एक
अवसर िमल गया। उर नगर के बाहर वन म िवचरण करती ई अके ली देवबाला उवशी
को उसने घेरकर पकड़ िलया और उसे बलात् हरण करके िहर यपुर क ओर ले भागा। संह
के पंजे म फं सी ह रणी क भांित उवशी उसके अंक म फं सी छटपटाने तथा बाज प ी के
पंज म फं सी कु कुटी क भांित िच लाने लगी। संयोग ऐसा आ क इसी समय महाराज
पु रवा उसी राह से रथ पर सवार जा रहे थे। उ ह ने उवशी का दन सुना। सुनकर
उ ह ने उस के शी का पीछा कर उसे ललकारा। अपने काम म ाघात पाकर के शी यूथपित
ु हो अपना िशकार छोड़ पु रवा पर झपटा। दोन महावीर म तुमुल सं ाम िछड़ गया
और बड़े भारी यास के बाद पु रवा ने के शी को मार डाला।
यूथपित के शी से छु टकारा पाकर उवशी भय से पीली, कांपती ई राजा के पास
आ खड़ी ई। उसने मौन हो के वल वा पाकु ल ने से राजा के ित कृ त ता कट क । वह
राजा के प और शौय पर रीझ गई। राजा उसे रथ म बैठाकर उरपुर म आया तथा उसे
देव के सुपुद कर दया। उवशी के मुख से घटना का पूरा िववरण सुन तथा महाराज
पु रवा का शौय, वंश और व प देख देव ने उ ह ही उवशी दे दी। अि को सा ी कर
महाराज पु रवा उवशी को अपने मिणह य म ला उसके साथ िवलास करने लगे। पु रवा
ने साठ वष उवशी के साथ कालयापन कया। इस बीच उवशी से उसके आठ तेज वी पु
उप ए। ब त वृ होने पर एक दन महाराज पु रवा मृगया-िवनोद करने प रवार-
सिहत नैिमषार य वन गए। वहां कु छ ॠिष य कर रहे थे। उनके य -वाट िहर यमय थे।
िहर यमय य -बाट देख राजा को लोभ हो आया । उसने कहा–“अरे ॠिषयो, िहर यमय
य -वाट रखने से तु हारा या योजन है? यह वण राजा का है। तुम मृत् वाट से य
करो।’’
ॠिषय ने िवरोध कया। इस पर ॠिषय से राजा का िव ह हो गया। िव ह म
ॠिषय के हाथ से राजा मारा गया।
पु रवा के आठ पु म ये आयु का पु न ष था। न ष बड़ा ही तापवान्
राजा आ। उसका िववाह िपतृक या िवरजा से आ था। उसने पृ वी के राजा को
जीतकर च वत पद पाया। स भवत: वही थम आय च वत नरे श था।
24. वा ा

मनु और बुध का इलावत छोड़कर भारत म चला आना इ के िलए एक ि य और


मह वपूण कारण बन गया। वह मह वाकां ी और खटपटी तो था ही, अब वह इस समय
देव का एकमा कता-धता और नेता बन गया। िव णु म अब िवरोध क साम य नह रही
थी और उसका उ रािधकारी भारत म आयावत क थापना कर चुका था। इस कार एक
बल ित पध उसके माग से हट गया था। अब उसने भी अपने सा ा य के िव तार पर
दृि डाली।
इस समय इलावत म एक बड़ी घटना घटी। पाठक इ क मह वाकां ा को भूले
न ह गे। वह इस समय देव का नेता बन गया था। पाठक यह भी जानते ह क इलावत के
पि म देश के िम ु और दि ण के उस ओर उमा आ द बेबीलोिनयन जाित क
रयासत उसक िम थ तथा उ र के प शयन बल श ु थे। अत: उसने अब पूव क ओर
अपना सार कया और पंचिस धु क सीमा पर अपनी देव-सेना लेकर आ धमका। उस
समय, वतमान िस ध और पंजाब के उस संयु े को, िजसे आज पा क तान कहते ह,
स िस धु कहते थे। उसका अिधपित असुर-याजक भृगुवंशी– व ा का पु वृ था। यह
दास का नेता था। वृ बड़ा धमा मा, तेज वी और बलवान् था। मरीिच-पु सूय तथा
िव णु वृ को ब त मानते थे। वृ का तेज अप रसीम था। स िस धु देश म उन दन
दास के अनेक ख डरा य थे, िजनका नेता और अिधपित वृ था।
इ से व ा का िम भाव न था, ष े ही था। इसी बहाने को लेकर इ ने वृ पर
चढ़ाई कर दी। इ पर सूय-िव णु क कृ पा थी। उनसे इ ने प कह दया क आप इस
मामले से दूर रह, म वृ का वध कर उसके रा य को जय क ं गा। वृ िव णु को ब त
मानता था। सारे दास ही िव णु को वृ का बहनोई समझकर मान करते थे। यह कसी को
आशा न थी क िव णु क सलाह से सब काम करने वाला इ उस पर आ मण कर देगा।
पर तु सूय-िव णु बड़े दीघदश थे। उ ह ने सोचा, हमारे पु मनु और दामाद बुध
भरतख ड म आय-रा य थािपत कर चुके ह। अत: यह अ छा ही है, य द स िस धु म देव
क जय हो जाए। इससे आयावत और देवलोक दोन ही पर पर स बि धत हो जाएंगे तथा
दै य और असुर से यु के समय देव और आय पर पर सहायता कर सकगे। इ ह सब
बात को िवचारकर िव णु ने चु पी साध ली।
दुभा य से दास म पर पर फू ट थी। उनके सब ख डरा य वत थे। इसी से वे
स प होने पर भी अपना सा ा य न बना सके । इसी से इ को उ ह न करने म ब त
सुिवधा िमली। उसने व ा के पु ि िशरा िव प को अपना पुरोिहत बनाने का लोभन
दे, अपने िपता से व ला देने को राजी कर िलया। िव प व ा का ये पु असुर का
भानजा था। इ ने दास म से दवोदास और सुदास–तुवशु और यदु को अपने साथ
िमलाकर उ ह अभय-वचन दया। अण और िच रथ नामक दो भरत-राजा ने उसका
िवरोध कया; इस पर उसने उ ह मरवा डाला।
इ बड़ा खटपटी और ू र था। अपनी काय-िसि के िलए वह सब कु छ कर
गुजरता था। उसने इस अिभयान म म त से सि ध कर उ ह भी अपने साथ ले िलया।
आजकल का िबलोिच तान उन दन म त का ही देश था। इ ने बड़ी बुि मानी से यह
यु -योजना बनाई थी। देव और असुर के दो अयो य नगर थे। उनके बीच म इ ने उरग,
करो ट, पय सहारी, मदनयुत और मह त–ये पांच र क सैिनक-के िनयत कए। इस
कार यह दसवां महत् देवासुर सं ाम स िस धु म िछड़ गया। दास म फू ट होने पर भी
वृ ने ऐसा िवकट यु कया क देवसेना िछ -िभ हो गई और इ यु भूिम छोड़कर
भाग खड़ा आ। अब सब िख और खि डत देवगण म दराचल के िशखर पर एक हो वृ
को जय करने के स ब ध म परामश करने लगे।
इ ने कहा, “देवगण, इस समय हम परािजत और खि डत ह। हमारे साम य का
य हो चुका है। वृ हमसे ब त बल है। वह बड़ा िव मशाली है। वह देव-दै य सभी से
पूिजत है, इसिलए इस स ब ध म हम या करना चािहए इस पर िव णु का परामश लेना
िहतकर होगा।’’
िव णु ने देव को सलाह दी, ‘‘अ छा यही है क वृ से सि ध कर ली जाए। वह
अजेय पु ष है और उसक पीठ पर परा मी दै य-दानव का वंश है। दास भी कम
िव मशाली नह ह। फर वैजय तपुर का ितिम वज श बर उसका िम है, इन सब बात
पर िवचार कर उससे सि ध कर लो।’’
देव को िव णु क सलाह पस द आई। उ ह ने वृ के पास सि ध के दूत भेजे। दूत
म ॠिषगण भी थे–देवगण भी। वृ ने देव-दूत का अ य-पा से स कार करके कहा, ‘‘हे
ॠिषयो, हे देवो, आपके आने का या अिभ ाय है? म या करके आपको स क ं ?’’
ॠिषय और देव ने कहा–‘‘हमारे आने का अिभ ाय यह है क यह देवासुर-
सं ाम समा हो जाए। देव-दै य सभी दायद-बा धव ह, ब धुभाव से रह। आप कृ पाकर
देवराट् से सि ध कर लीिजए।’’
वृ ने कहा–‘‘दो तेज वी पु षा म िम ता नह हो सकती।’’
‘‘ क तु एक बार तो स न का संग हो ही जाए, पीछे जो होगा वह होगा। स संग
ही हमारी ाथनीय व तु है। स संग से िम ता दृढ़ होती है। धीर पु ष के िलए िम ता
संकट म सहारा देती है, अथक के समय वही धन प हो जाती है। स न का समागम
अमू य और योजनीय है। आप धीर, वीर, स यवादी और ानी ह। आपका पिव याजक
कु ल है। आप देव-दै य दोन के पू य पु ष ह, धम और सू मदश ह। इसी से हम िव ास
कर आपक सेवा म आए ह।’’
ॠिषय और देव के ये वचन सुन वृ ने हंसकर कहा–‘‘इ बड़ा कु टल है। वह
पीछे िव ासघात करे गा–उसका िव ास या? अत: आप स य ही मुझसे िम ता चाहते ह,
तो म स ।ं पर तु सूयदेव हमारे बहनोई और आपके बा धव ह। वे हमारे बीच रह।’’
देव ने वीकार कया। इ और वृ म सि ध हो गई। इ ने बड़ा िश ाचार
कट कया। देवगण दास से िहलिमलकर सोमपान करने और हास-िवलास करने लगे।
इ भी वृ के साथ जनिवहार, मृगया और जल- ड़ा करने लगा। पर तु वह वृ को
मारने क घात म था। अवसर पाकर उसने एक दन समु -तीर पर उसे असावधान देख
व - हार से मार डाला। फर संकेत पाते ही सब देव-गण श ले-लेकर दास पर िपल
पड़े। दास असावधान और ने िवहीन हो गए थे। फर भी उ ह ने डटकर यु कया। पर तु
उनके पास अ न थे। देव को अ दौड़ाते देख वे भयभीत हो गए। उ ह ने अ और
यो ा को कोई िविच जीव समझकर पलायन करना आर भ कया। नमुिच दास ने ि य
तक को ख ग लेकर यु म भेजा। पर तु नमुिच का यु थली म िनधन आ और अ त म
देव ने दास के दोन अयो य नगर को जलाकर खाक कर डाला तथा वृ का दास-
सा ा य िछ -िभ कर दया।
आज उ ह दो अयो य नगर के वंसावशेष मोइनजोदड़ो और हड़ पा के नाम से
िव यात ह, िजनक खुदाई आज हो रही है और इस तापी आ ा ता इ के घोड़ से खुदी
ई दास क वह भूिम नये-नये रह य को कट कर रही है। आगे इलावत म प रवतन
होने के कारण इ , उनके अनुयायी देव और सहायक म त का नामोिनशान भी प शया
और बलूिच तान म नह रहा, पर तु भारत म मोहनजोदड़ो और हड़ पा के रह यमय वंस
पुकार-पुकारकर उस अितपुरातन घटना क सा ी दे रहे ह।
अपने भाई वृ के मरने पर वा ा िव पब त ु आ। इस पर इ को इस
बात का भय उ प हो गया क कह िव प िव ोह न खड़ा कर दे। िव प वा ा
साधारण पु ष न था। वह असुर-याजक कु ल का था–देव-दै य सभी का वह पू य था।
इसिलए इ ने अपने अनुगत त को बुलाकर कहा, ‘‘तू सोते ए िव प का िसर काट
डाल!’’
‘‘ क तु इसके कं धे बड़े मोटे ह, ये मेरी कु हाड़ी से न कटगे।’’
‘‘डर मत, तेरी कु हाड़ी पैनी और दृढ़ है।’’
‘‘पर तु मेरी कु हाड़ी बेकार हो जाएगी।’’
‘‘नह होगी।’’
‘‘आप भयंकर काम कराना चाहते ह, आपको इस ू र कम के करने म लाज नह
आती?’’
‘‘लाज कै सी रे , मन वी कायाथ कमिसि को थम देखते ह।’’
‘‘ क तु यह ॠिषपु है, याजक है, इसे मारने म आपको ह या का भय नह
है?’’
‘‘म क ठन कम करके पीछे उससे छु टकारा पा लूंगा। तू अपना काम कर।’’
‘‘यह तो घोर कृ य है।’’
‘‘म तुझे य -बिल के पशु का िसर य -भाग म दूग ं ा। वह सदैव तेरे वंश को िमलता
रहेगा, तू इसका िसर काट।’’
इस पर त ने कु हाड़े से ि िशरा िव प का िसर काट िलया। इस पर बड़ा
ह ला मचा और जगह-जगह लोग इ को ‘ हा- हा’ कहने और िव ोह करने लगे।
इससे भयभीत होकर इ भागकर िछप गया।
25. देवे –न ष

इ के इस कार पलायन करके िछप जाने से देव-लोक म अ व था फै ल गई।


अ त म देव ने न ष को ही ऐ ािभषेक कराकर इ ासन पर बैठा दया। सभी दैव-दै य,
ॠिष, िपतृगण, दानव और असुर ने एकमत हो च वत न ष को इ वीकार कर
िलया। इ -पद पाकर अब राज ष न ष ि भुवन के वामी हो गए। वे अ सरा के साथ
न दनवन म िवहार करने लगे। उ ह ने कै लास, िहमवान्, म दराचल, ेतपवत, स ा ,
महे , मलय आ द पवत , समु , न दय म िविवध भांित िवहार कया। सब कार ऐ य
और िवलास के साधन पा, द ांगना और अ सरा से साि य म रहकर महावीयव त
न ष ड़ा और कामभोग म रत रहने और सोमपान करने लगे।
अब उ ह ने इ ाणी पौलोमी शची को शृंगार करके अपनी श या पर आने क
आ ा दी।पर तु पौलोमी शची ने न ष क अंकशाियनी होना वीकार नह कया। उसने
कहा–“म अपने ि य देवराट् इ क प ी ।ं म उसी क श या पर आ सकती ।ं ’’
न ष ने कहा–‘‘म ही अब देवराट् इ ।ं म देवलोक और मनु य-लोक का वामी
।ं इ ाणी अब मेरी भो या है। यह मयादा के िवपरीत नही है।’’
इ ाणी ने कहा–‘‘आपने मेरे पित को न यु म जीता है, न उसने मुझे जुए के दांव
म हारा है। फर कै से आप मुझ पर अिधकार रखते ह?’’
क तु न ष ने अपना हठ नह छोड़ा। देव ने समझा-बुझाकर पौलोमी शची को
न ष के पास भेजने का िन य कर िलया। देव-याजक आंिगरस बृह पित ने भी न ष को
समझाया क पौलोमी शची के साथ बला कार करना ठीक नह है। पर तु न ष ने यही
कहा–‘‘वह मेरी िविजत व तु है। उस पर मेरा वैसा ही अिधकार है, जैसा इ के इ ासन
पर।’’
आंिगरस बृह पित ने कहा–‘‘देवराज, स होकर ोध रो कए। स िजए।
इ ाणी पुलोमा दै यराज क पु ी है। उसने देवराट् का वरण कया था। इसिलए आप उस
पर बला कार न कर।’’
न ष ने कहा–‘‘देवराट् बड़ा ही िनि दत, ग हत पु ष था। उसने िपतृवध कया,
यितय को कु को िखलाया और ह या क । म देवराट् ,ं फर य नह शची मुझे
पितभाव से हण करे गी? या म इ नह ?ं ’’
बृह पित ने कहा–‘‘आप महातेजवान् ह, इ से भी बढ़कर ह?’’
‘‘तो शची को मेरी श या पर आना चािहए।’’
िववश देव ने शची को न ष के पास भेज दया। ोध और शोक से अिभभूत शची
पौलोमी आंसू बहाती न ष के पास जा खड़ी ई। पर तु उसने न ष क श या का आरोहण
वीकार नह कया। न ष के आ ह और अनुनय सभी को उसने अ वीकार कर दया।
उधर न ष के इस काय से देव, दै य, ॠिष सभी अ स हो गए। अ त म देव ने िमलकर
न ष को इ पद से युत कर दया और उसे देवलोक से िन कािसत कर दया।
न ष का छोटा भाई रिज बड़ा परा मशील त ण था। उसने देवासुर-सं ाम म
देव का प लेकर िवकट यु कया था। देवासुर-सं ाम से थम रिज से दै य ने अपने
प म होकर यु करने क ाथना क थी। तब रिज ने यह शत रखी थी क य द दै य मुझे
अपना इ बनाएं तो म अपने सौ प रजन सिहत उनका प लेकर देव से यु क ं ।
पर तु दै य ने प कह दया क हमारा इ लाद है और हम उसी के इ पद के िलए
देव से यु करते ह। इस पर रिज ने देव का प िलया। इ ने रिज से कहा–‘‘आप ही
सब देव के इ ह और म आपका पु ।ं ’’ इससे स होकर रिज ने इ के िलए यु
कया। पर पीछे इ के भाग जाने और ि िशश को मरवा डालने के कारण देव और
ॠिषय ने उसके बड़े भाई न ष को ही इ बना दया था। अब न ष को इ ासन से युत
कर देवलोक से िनकाल देने पर ु होकर रिज ने इ ासन पर जबद ती अिधकार कर
िलया और अपने सौ प रजन को देवलोक क सारी व था दे दी। उसके भय से इ
इधर-उधर मारा-मारा फरने लगा। तब उसने आंिगरस बृह पित से कहा–‘‘हे देवगु , आप
कसी तरह रिज से मेरा इ ासन मुझे दलाइए।’’ बृह पित ने तब युि कर चावाक-दशन
का िनमाण कया, िजसम वाद- ितवाद- योजन से संयु , वेद-िवरोधी तक और
अिततक से संयु हेतुवाद िनिहत था। उसने उसी के अनुसार राज-काज चलाने क रिज
को सलाह दी। इसके प रणाम व प रिज से सब देव-ऋिष िबगड़ गए और उसके प रजन
म भी राग ष े उ प हो गया, उनम फू ट पड़ गई। फल व प फर बारहवां देवासुर-सं ाम
आ।
इस कार बारह देवासुर-सं ाम होने के बाद रिज क जय के साथ उनक समाि
ई। ये देवासुर-सं ाम तीन सौ वष तक िनर तर चलते रहे और प रणाम अ त म यह आ
क देव तथा दानव का सारा भाईचारा टू ट गया। वे दायाद-बा धव न रहकर अब पृथक्
वतं जाितय म िवभािजत हो गए। उनके पार प रक रोटी-बेटी-स ब ध भी ब द हो
गए।
26. पौरव

न ष का बड़ा पु ययाित ॠिष था। ययाित और दूसरे पु उसके उ रािधकारी


ए। ययाित बड़े भारी धमा मा, म ा और समथ पु ष थे। इनका सै यबल भी असीम
था। इ ह ने पृ वी को जीतकर धमराज थािपत कया। ये अिभमानी थे। इनक दो ि यां
थ –एक दै य-याजक शु क क या देवयानी, दूसरी दै यराज वृषपवा क क या श म ा।
देवयानी से यदु और तुवशु दो पु तथा श म ा से अनु, ु यु और पु , ये तीन पु ए।
पु रवा, न ष और ययाित तीन ही वेद ष थे। पाठक को मरण होगा क पु रवा का वंश
असुर-याजक अि से स बि धत था। अब ययाित का िववाह दै यराज क पु ी तथा
दै यगु क पु ी से होने तथा वैव वत मनु क पु ी के कु ल म होने के कारण वे दै य और
आय के सब कु ल म सुपूिजत हो गए। वे बड़े भारी शासक और दृढ़िच पु ष थे। इनक
से िम ता हो गई। ने इ ह एक द रथ दया। यह रथ जनमेजय ि तीय तक उनके
वंशधार के पास रहा। पीछे बृह थ ारा जरास धा को िमला। इनके पांच पु भी वंशधर
ए। पर तु इसी समय एक खेदजनक असाधारण घटना हो गई। एक बार चै रथ वन म
मृगया करते ए उसक भट िव ाची अ सरा से हो गई। राजा िव ाची के प-यौवन को
देखकर मोिहत हो गया और उससे रित क याचना क । िव ाची ने कहा–‘‘हे धमा मा,
आप सब धम के ाता–महाराज ह। म ग धव ं और िपतृसं ा म हमारी कु ल पर परा है।
तुम भाया प म अि क सा ी देकर मुझे हण करो तो म तु हारे साथ रित करने म
स ।ं ’’ राजा ने यह बात वीकार कर ली और अ याधान कर अि क सा ी म
िव ाची को हण कया। पर तु वृ और म दवीय िशिथलेि य ययाित उस कामो म ा,
पग वता, मुखरा नाियका िव ाची के साथ रित करने म असमथ रहा। इस पर िव ाची
ने उसक हंसी उड़ाई और कहा–‘‘राज्न, धमा मा होकर, यह जानते ए भी क तुम वृ
और िशिथलेि य—हतकाम पु ष हो, तुमने मेरे यौवन को कलं कत कया। अब कहो,
कु लवती होकर म कै से कस पु ष से रित-याचना क ं ? इससे तु हारा इसी म भला है क
तु ह इसका ब ध कर दो िजससे कु ल-मयादा भी रहे और धम भी रहे।’’
ययाित ने सोच-िवचार कर एक उपाय ि थर कया। उस काल म असुर म ऐसा
करना िन दनीय नह िगना जाता था। उसने एक-एक कर अपने पांच पु से अनुरोध
कया क वे अपना यौवन मुझे द अथात् मेरे थान पर िव ाची को रित-दान कर। पर तु
ययाित के चार पु ने मातृगामी होना वीकार नह कया। क तु पांचवां पु पु राजी
हो गया और उसने रित-दान म िव ाची अ सरा को संतु कर दया।
इस घटना से ययाित को बड़ी लािन और ोभ उ प आ। वह आप ही आप
कहने लगा–‘‘हाय-हाय! कामोपभोग से कामशाि त नह होगी। भोग-तृ णा ाण का नाश
करने वाली है। इससे इसे थम ही से याग देना अ छा है। यह कै सा आ य है क शरीर
जीण होने पर भी कामतृ णा जीण नह होती।’’
इस कार ययाित के मन म घोर लािन ई, और अपने पु को रा य बांट
भृगुतुग पर अ -जल याग ाण यागने जा बैठा और अ त म वह ाण याग दए।
महाराज ययाित चौदह ीप के वामी थे। उ ह ने अपना रा य इस कार अपने
पु को बांट दया—दि ण पूव के भूभाग का रा य तुवशु को दया। जहां आजकल रीवां
रयासत है। चंबल के उ र, यमुना के पि म क दशा म ु यु को दया। गंगा-यमुना के
ार के उ र म अनु को रा य दया और ईशान म च बल-बेतवा और के न का म यवत
देश यदु को। अ त म म य देश म पु को रा य दे, उसे अपनी धान ग ी दी। इस कार
पु , ु , अनु, तुवशु और यदु इनके पृथक् -पृथक् रा य थािपत हो गए और उनके मु य
घराने के शासक ययाित के सबसे छोटे पु पु ए। उ ह के नाम पर पौरव वंश चला। पु
ित ान म राजधानी बना, गंगा-यमुना के म यवत ाबे पर शासन करने लगे।
27. दाशराज–सं ाम

ना ष ारा देवलोक को अिधकृ त करने क बात पाठक भूले न ह गे। न ष को


जब अपमािनत करके देव ने देवलोक से िनकाल दया तो उसके भाई रिज ने ना ष को
लेकर बलात् उस पर अिधकार कर िलया। रिज और देव म घनघोर यु आ, िजसम
असुर -दै य ने रिज का साथ दया। असल म दै य का असुर-भूिम–अपवत–से एक कार
से बिह कार ही हो गया था। इससे देव के ित असुर इस कार खीझ गए थे क वे यु का
कोई अवसर ही न चूकते थे। ना ष के ाब य और असुर के सब रा य क सहायता से
बिल ना ष देवभूिम को छोड़ते न थे। उनके भय और अ याचार से तंग तािड़त देव
मारे -मारे फरते थे। इ क भी बड़ी दुदशा हो गई थी। वह सव मुंह िछपाता फर रहा
था। अब उसने पैजवन सुदास को उभारा। पाठक जानते ह क वृ -यु म सुदास को इ ने
िम वत् माना तथा उसे रा यािधकार दया था। सुदास इ के इस उपकार को भूला न
था। फर इ ने विश को समझा-बुझाकर सुदास के पास भेज दया था। विश के कहने
से सुदास इ के िलए यु करने को स हो गया। पर तु के वल इ ही के िलए नह
सुदास ययाित-पु के रा य-िव तार को भी सहन नह कर सकता था।
रावी नदी का नाम उन दन प णी था। प णी के दोन कनार पर सुदास का
रा य था, जो उ र पांचाल रा य कहाता था। सुदास िपजवन के पु थे। िपजवन राजा न
थे, पर तु च ड यु क ा थे। सुदास को िस वै दक िवजयी महाराज दवोदास ने गोद
िलया था तथा अपना पु बनाया था। दवोदास मु ल के पु व के पु थे। ये व
िवदभ के राजा नल के नवासे थे। पांचाल देश म मु ल, सृ य, बृह पु, िमला और
जयीनर के ख डरा य थे, िजनके मुख सुदास थे। सुदास को गौरव इ क सहायता से ही
ा आ था। अब वही इ देवलोक से हो मारा-मारा फर रहा था। सवण का रा य
इनक रा य-सीमा से िमला आ था। उधर आयावत पर ही देवलोक क भांित ना ष का
ाब य हो रहा था। जो सीमाएं ययाित ने पु को दी थ , वे उनसे स तु न थे। इन सब
कारण से दाशराज महासं ाम क भूिमका बंधी। न षवंिशय ने यदु, तुवशु, अनु और
ु यु थे तथा ना ष के सहायताथ मनुभरत और ब त-से अनाय राजा एक ए थे। इन
अित र ना ष के झ डे के नीचे भागव, पुरोदास, प थ, भलान, आलन, िशव, िवशात;
कवष, यु यामिध, अज, िश ु और च ु आए थे। दानव वा चन अपने एक लाख दानव को
लेकर आया था। ब त से िस यु जाित के मुिखया भी आए थे। के वल पौरव ने इस यु म
भाग नह िलया था। द युराज वा चन ही इस संयु महासै य का नेता था।
सुदास क सहायता इ और अनेक आय राजा ने क । इस तुमुल सं ाम म
ना ष ने रावी नदी को दो भाग म िवभ करके उसे पार करने क चे ा क , क तु सुदास
ने त काल धावा बोल दया िजससे दबाव म पड़कर ना ष क ब त-सी सेना नदी म डू ब
मरी। कवष और ु यु वंशी डू ब मरे । अनु और ु यु के िछयासठ सेनानायक और छ:
हजार वीर सेनापित खेत रहे। राजा वा चन के एक लाख पांच सौ सैिनक मारे गए। इस
यु म सात दुग सुदास के हाथ लगे। यु यामिध का उसने यु थल म वध कया। अब िश ु
और च ु ने अधीनता वीकार कर ली। भृगु लोग सवथा परा त हो गए। तुवशु, और या व
का अहंकार चूण आ। कु छ ना ष ने कर देना वीकार कया। पुरोदास, भृगु और ु यु ने
अधीनता वीकार कर ली। इस यु म इ स जाितय के वैकण परािजत ए। सुदास ने
श ु के सात दुग और जीती ई सा गी यु को दे दी। अज, िश ु और च ु ने सुदास को
कर दया।
ि व के पचास हजार मनु य मारे गए। इस यु म धनुष, बाण, ख ग, ढाल,
कवच, िशला ेपक और आ ेया का योग आ। बरछ और भाल का भी योग आ।
िनिशत बाण चलाए गए। इस यु को जय कर सुदास ने पूव क ओर बढ़कर भेद से यु
कया। भेद के साथ अज, िश और प थ ने यमुना के कछार म सुदास का सामना कया,
पर तु परािजत ए। भेद का भारी खजाना लूट िलया गया और कले छीन िलए गए। यु
क समाि पर िवजयो सव आ, िजसम पराशर, विश और स ययात को ब त-सा दान
दया गया। देववात अ याव तन चायमान ने य ावती नदी पर वृचीनव को हराया तथा
सृ य को तुवशु का देश दया। चायमान ने बीस घोड़े तथा दािसयां भार ाज को द । ये
चायमान मनुभरत म पृथुवंशी थे। दवोदास ने भी भर ाज को धनी बना दया। सृ य के
पु ने भी भर ाज को दान-मान से स कृ त कया। इस कार यह उस काल का सबसे बड़ा
यु समा आ, िजसका बड़ा भारी सां कृ ितक भाव आय और आयावत पर पड़ा।
विश ने इस यु म सुदास क ब त सहायता क थी। सुदास ने भी उ ह ब त
धन, गौ-दान दया। पर तु कसी कारण से विश उनसे नाराज होकर पौरव संवण के पास
चले गए। संवण को एक बार सुदास हरा चुके थे। वही वैर उभाड़कर विश उसे सुदास पर
चढ़ा लाए। तब संवण ने यु े म स मुख यु म सुदास का वध कया।
अब उ र पांचाल म अजमीढ़ के पु बृहद ने दि ण पांचाल का नया रा य
थािपत कया। भरत के पौ सुहो ने काशी म एक पौरव रा य क थापना क थी, िजसे
दुदम हैहय ने आ ा त कया । पीछे तापी तदन तालजंघ के पु वीितह को हैहय
क राजधानी म घुसकर हराया। पीछे वीितह ॠिष हो गए। िस वेद ष गृ समद्
वीितह के द क पु ए। तदन राम के रा यारोहण म भी आए थे। तदन के पु व स
ने ित ानपुर के कौशा बी ा त को अपने रा य म िमला िलया। काशी क शाखा म
सुहो के पु बृहत् ने का यकु ज म पौरव रा य क थापना क । इ ह के पु ज ु थे,
िज ह तापी सूयवंशी मा धाता क पौ ी याही थी। यदु को च बल, बेतवा और के न
वाला देश िमला था। इससे दो पु ए– ो ु और सहसिजत्। इनके दो वंश चले–पहले से
यादव–वंश, दूसरे से हैहय-वंश। वे य नह करते थे तथा उ ह ने असुर से िववाह-संबंध
थािपत कए थे। यदुवंशी हय मधु दै य का दामाद आ। पीछे इस वंश म शिशिब दु
िस य कता आ। इसके पु यामघ ने दि ण म ॠ पवत पर मृि कावती बसाकर
राजधानी बनाई। हैहय ने अपने भाई-ब द यादव से उनके पैतृक रा य छीनकर साहंजनी
और मािह मतीपुरी बसाई। पीछे सूयवंशी शयात भी इ ह म िमल गए। इसके बाद भागव
से हैहय का िव ह आ। तुवशु का वंश उ री िबहार म रा य करने लगा। इस वंश म
िस य कता म त् च वत आ। इ ह ने दीघतमा ऋिष के चाचा संवत से य कराया।
इ ह ही िहमालय म भारी खजाना िमला। म त् से कु छ ही पूव मा धाता ने पौरव कु ल को
रा य युत कया था। अब म त् ने अपना तुवशु वंश राजकु मार दु य त को गोद लेकर
पौरव कु ल म िमला दया। इस वंश क शाखाएं–पा ड् य, चोल और के रल–दि ण म फै ल
ग ।
ु यु के वंशधर अंगार को आगे मा धाता ने परािजत कया। इससे यह वंश और
पीछे हटकर गा धार तक प च ं ा। पीछे इ ह ने मा धाता के पु पु कु स को सप रवार
ब दी बनाया। ब दी-अव था म ही सद यु का ज म आ। समय आने पर इसी सद यु ने
ु को च बल के कनारे करारी हार दी। इसके बाद यह वंश और भी पि म क ओर
हटकर ले छ देश म चला गया। कु छ ु यु वंशी महाभारत म आ बसे, जहां वे भोज
कहलाए। अनु को गंगा-यमुना के ाबे का उ री भाग िमला था। इस वंश का राजा
महामनस पंजाब क ओर बढ़ा। वह च वत तथा सात समु का वामी ि स आ।
इसने िस धु, सौवीर, कै के य, म , वा लीक, िशव और अ ब रा य क थापना क । इस
वंश के राजकु मार ितित ु ने पूव क ओर आकर अंग रा य वतमान भागलपुर के िनकट
थािपत कया। इसी वंश के राजा बिल क रानी सुदे णा को अ धे वेद ष दीघतमा ने
वीयदान दे पांच पु उ प कए जो मश: अंग, बंग, क लंग, सु ब और पौ रा य के
सं थापक ए। इसी वंश के ि स नरे श लोमपाद दशरथ के िम थे।
दीघतमा, वीितह , जमदि , राम, परशुराम, िशिव, यदु, ु यु, अनु और तुवशु
नाम वेद म ब त िव यात ह। गा धार म रावलिप डी और पेशावर के िजले लगते थे।
उसम त िशला और पु करावती मुख थे। आजकल इसे चारस ा कहते ह। कै के य लोग
गा धार और ास के म यवत े म थे। उशीनर, कै के य और म क आनव ही थे। यह वंश
देर तक म य पंजाब म रा य करता रहा। उ र म िहमालय के उस पार था। दि ण म
का रा य यालकोट के िनकट था। इन रा य क पांच ेिणयां थ –सा ा य, भौ य,
वरा य, वैरा य और रा य। उन दन राजा क रािनय क भी चार ेिणयां थ –
वरा य, मिहषी, प रवृ ा, बावाता, पालागली–मु य रानी मिहषी, ेमहीना प रव ा,
मु य ेिमका बावाता और अि तम–म ी क क या–पालागली। महान स ाट का
ऐ ािभषेक होता था। इन बड़े–बड़े राजवंश के अित र उस काल म गा धार, मूजव त,
म य तृ सु, भरत, भृगु, उशीनर, चे द, िव, पांचाल, कु , सृ या, धर, पारावत आ द
वंश क अनेक छोटी-बड़ी ग यां भरतख ड म थािपत थ ।
28. आनत

वैव वत मनु के इस पु शयाित थे। इ ह ने गुजरात ा त म ख भात क खाड़ी के


पास अपना आनत रा य थािपत कया था। शयाित बड़े भारी स ाट् ए। पीछे इनका
ऐ ािभषेक आ। शयाित के पु का नाम आनत था, उसी के नाम पर इस रा य का नाम
भी आनत रखा गया था। शयाित क एक पु ी सुक या नाम क थी, िजसे भूगुपु यवन
ॠिष को याहा गया था। भृगु ॠिष अित िति त, देव-असुर-पूिजत थे। उनके तीन पु -
शु ,अि और यवन िव यात पुरोिहत याजक ए।शु और अि असुर-याजक थे, शु
िहर यकिशपु और बिल के पुरोिहत थे, िजनके पु सु द और मकर द को दै यपित
िहर यकिशपु ने अपने पु लाद का िश क िनयत कया था। शु वृषपवा दानव के भी
पुरोिहत थे। शु और वृषपवा दोन क क याएं देवयानी और श म ा यताित को याही
थ । शयाित ने यवन को अपनी पु ी सुक या याह दी, उ ह अपना पुरोिहत भी बना
िलया। यवन आनत रा य के दामाद और गु बनकर राजसी ठाठ से रहने लगे। शयाित
क गणना वेद षय म थी। यवन और सुक या क स तान ही म दधीिच, औव, ॠचीक,
जमदि और परशुराम उ प ए।
कु छ काल बाद पु यजन रा स के राजा मधु ने इस रा य पर अिधकार कर
िलया। मधु यादव क शाखा म कु तरा य का वामी था। मधुपुरी उसी ने बसाई, पीछे
िजसका नाम मथुरा िस आ। मधु साहस करके लंका से रावण के रं गमहल म से रावण
के नाना सुमाली के बड़े भाई मा यवान् क पु ी कु भीनसी को चुरा लाया था। पीछे रावण
के ोध से बचने के िलए उसने रा स–धम वीकार कर िलया था। फर मधु ने हैहय से
भी वैवािहक स ब ध थािपत कए। अ त म यह रा य हैहय के रा य म िमल गया।
भागव लोग भी शयाित क भांित हैहय के पुरोिहत बने रहे। हैहय ने उ ह खूब स मािनत
कया तथा धन भी खूब दया। पीछे हैहय को िनर तर क चढ़ाइय और यु के कारण
धन क बड़ी आव यकता पड़ी। उ ह ने जा से धन मांगा। इसी भांित भागव से भी मांगा।
पर तु भागव ने धन देने से इ कार कर दया। थम तो उ ह ने आनत के रा य पर अपने
दायाद होने का अिधकार द शत कया, पुरोिहत और गु पद का भी अिधकार मांगा।
ब त हठ करने पर कहा–‘‘धन हमारे पास नह है।’’ इस पर भागव और हैहय म
झगड़ा हो गया, भागव ने अपना धन भूिम म िछपा दया। हैहय ने उनके घर खोद डाले।
फर उ ह लूट िलया। घर को खोदने से ब त धन िमला। इस पर ु होकर उ ह ने
भागव को मार डाला। उनक ि य के गभ फाड़ डाले। उनम के वल एक औव बचकर
िनकल भागे और सुमे -भूिम म का शु के आ य म रहने लगे। पीछे औव ही के नाम पर
सुमे -भूिम का नाम ‘अरब’ पड़ा।
उनके साथ ही उनक सगभा प ी भी थी। काला तर म उसने पु सव कया,
और समय पाकर वह उसी भूिम म बढ़कर गु वास म ही युवा आ। उसका नाम ॠचीक
रखा गया। युवा होने पर औव ने उसे सब ऊंच-नीच समझाकर मािह मत के रा य से दूर
सर वती-तीर पर आ म बनाकर रहने क आ ा दी। सर वती-तट पर बस जाने के कु छ
काल ही बाद का यकु ज के राजा गािध ने उ ह अपनी पु ी स यवती याह दी। समय
पाकर िजस समय स यवती ने पु सव कया, उसी समय उसक माता ने भी कया।
स यवती के पु का नाम ज मदि आ और गािधपु का िव ािम । दोन मामा-भांजे
सर वती-तट पर ॠचीक ॠिष के आ म म पलने और िश ण पाने लगे। औव ने अपने पु
ॠचीक को वेद बनाया था। ॠचीक ने भी अपने पु और साले को वेदिवद् बनाया।
फलत: जमदि और िव ािम उसी समय यातनामा पु ष हो गए थे। आगे चलकर दोन
मामा-भांज ने िमलकर वेद क ॠचाएं बना और वेद ष िस ए।
यह वह काल था जब आय के रा य ने गंगा और यमुना के तट छू िलए थे। दै य
और असुर अनाय मधुपुरी (मथुरा) से पीछे हटते और नमदा-तट पर अपने आवास बनाते
जाते थे। सर वती और दृष ती का म यवत देश आय का के थल बनता जा रहा था।
सूय और च वंश के ख डरा य के अित र यहां यदु, पु , भरत, तृ सु, तुवशु, ु ुं, ज ु
जाितय के जनपद थािपत हो चुके थे। उधर वाराणसी के गंगा-तट से नमदा तक आय के
यो ा आगे बढ़ते जा रहे थे। नए-नए रा य क थापना हो रही थी।
िव ािम के िपता गािधन् ज ु वंश के राजा थे। एक बार ॠचीक उनके यहां आए
और एक सह यामकम घोड़े गािध को देकर उनक पु ी स यवती मांग ली। इस कार
गािधपु ी से उनका िववाह आ।
उस युग म भृगुवंश महामिहमावान् था ही। यवन के सौतेले भाई उशनस शु
जहां सब दै य के याजक गु थे, वहां महामिहमावान् ययाित के सुर भी थे। ये ययाित
भी साधारण राजा न थे, अिपतु, पु , यदु, अनु, ु यु और तुवशु इन पांच वंश के मूल
पु ष थे। य िप उनके आचार आय से िभ थे, पर तु इससे उनक ित ा म कमी नह
आती थी। हैहय से िव ह होने पर उ ह ने यदु, तुवशु और ु यु का आ य िलया।
ॠचीक ॠिष का असुर याजकवंशी होने से आयावत के बाहर दूसरी जाितय पर भी भारी
भाव था।
जमदि का िववाह इ वाकु वंश क राजकु मारी रे णुका के साथ आ था। उनके
पांच पु ए, सबसे छोटे परशुराम थे। परशुराम उद कृ ित के थे। ॠचीक ॠिष ने हैहय
ारा अपने कु लनाश और अपमान क इतनी भावना उनके मन म भर दी क त ण
परशुराम का र खौलने लगा और उसने शा के साथ श क भी संपूण िश ा ा
क । संयोग से ही एक दुघटना के कारण परशुराम का उ वभाव कट हो गया। परशुराम
क माता रे णुका का मृि कावती के राजा िच रथ के साथ गु संबंध अक मात् कट हो
गया। जमदि य शा त पु ष थे, पर इस घटना से वे इतने उ ेिजत ए क उ ह ने अपने
पु को आ ा दी क वे तुर त ही अपनी माता का िसर काट ल। सभी पु इस जघ य काय
को न कर सके । क तु परशुराम ने परशु उठा खट से माता का िसर काट िलया।
जब सर वती-तीर पर जमदि के आ म म यह खेदजनक घटना घट रही थी,
हैहय का बल ताप भारत पर छा रहा था। उनका रा य मथुरा से नमदा-तट के देश
म फै ल गया था। उधर ख भात से काशी तक उनका िव तार था। कोई भी अके ला आय
राजा उनके स मुख आने का साहस न कर सकता था। इस कार से समूचे म य देश का
वामी हैहय कातवीय सह ाजुन था। इसके रा य का िव तार पूव म चम वती (च बल)
नदी, पि म म समु , दि ण म नमदा और उ र म आनत तक था। उसक िवपुल
पोतवािहनी सेना थी और उसका हयदल अजेय था। वह तापी, साहसी और मानी था।
फर शयाित भी उसके साथ थे।
हैहय से हारकर यादव याम अपना पैतृक रा य छोड़कर मृि कावती म िवदभ
के िनकट जा िछपा। सूयवंशी राजा बा औव ॠिष के आ म म आ िछपा। िव ािम के
पु लौिह का का यकु ज रा य उ ह ने न कर दया। के वल अयो या का सूयवंशी रा य
इनके उ पात से बचा रहा।
पर तु परशुराम िव ािम क बिहन के पौ और इ वाकु राजा के दौिह तथा
ग रमामय भृगुवंश के उ रािधकारी थे। वे हैहय को अपना िचरश ु समझते थे और य -
य वे सह ाजुन क याित तथा शौय-चचा सुनते जाते थे, उनके मन म उससे मुठभेड़
करने क इ छा बल होती जाती थी। उ ह ने यादव को अपना साथी बना िलया था। ये
दोन वल त पु ष इन दन पर पर टकराने के िलए शि -संचय कर रहे थे।
संयोगवश जगदि क ी रे णुका क बिहन सह ाजुन को याही थी। इस कार
य िप जमदि सह ाजुन के साढू थे, फर भी ाचीन वंश-वैर तो था ही। अब जो उ ह ने
अपनी प ी का वध कर डाला, तो इससे ु होकर सह ाजुन ने चढ़ाई करके जमदि का
आ म जला डाला, गौएं लूट ल और मनु य को मार डाला। इस पर िपता क आ ा से
परशुराम ने अपने मौसा–इस िव यात यो ा सह ाजुन को स मुख यु म मार डाला।
कु िपत होकर सह ाजुन के उ रािधकारी हैहय ने परशुराम क अनुपि थित म िनर
जमदि को मार डाला। इस पर ु हो हैहय का बीजनाश करने का संक प कर
परशुराम ने िनर तर क ठन यु करके हैहय वंश का समूल उ छेद करके सम तक तीथ म
उनके र से पांच कु ड भरे ।
29. उ रकोशल

अयो या क मु य उ र कोशल क ग ी पर िजस समय दशरथ अबाध शासन कर


रहे थे, उसी समय उ र कोशल-वंश के कु छ शाखा–रा य भी ब त स प थे, िजनका
उ लेख हम कर चुके ह। इ ह म एक रा य अनर य ने थािपत कया था। यह अनर य
राजा दशरथ से छ:-सात पीढ़ी थम िस धु ीप राजा का पु था। यह रा य का यकु ज के
िनकट कह था। इस शाखा का ैया ण राजा वेद और तापी था। ैया ण का पु
स य त था, िजसका ि शंकु नाम युवराज-काल ही म िस हो चुका था। इसका कारण
यह था क उससे तीन गु तर अपराध हो चुके थे। थम तो उसने एक ॠिष क
नवप रणीता वधू के साथ बला कार कया। दूसरे , चा डाल के साथ रहने तथा खाने-पीने
लगा। तीसरे , कु लगु विश क एक गाय मारकर वह खा गया। इन तीन गु तर अपराध
के कारण उसके िपता ने उसे ि शंकु का दुनाम दया और कु लगु विश क सलाह से उसे
यौवरा य-पद से युत कर दया। ि शंकु िपता का कोपभाजन तथा रा यािधकार से युत
होकर वन म भाग गया।
काला तर म ैया ण क मृ यु ई पर तु ि शंकु को रा य नह िमला। मं ी,
विश ही राज चलाने लगे। इसी समय एक भयंकर बारह वष का अकाल पड़ा, िजससे
जा विश से अस तु हो गई। इस समय घात पाकर का यकु ज नरे श िव ािम ने इस
रा य पर आ मण कर दया। विश ने शबर और ले छ क सेना सं ह कर िव ािम
को परािजत कया। यु म पराजय से लि त और लांिछत होकर िव ािम अपने रा य
म नह लौटे–वन म चले गए। रा य पर उनका पु अिधकारी हो गया। वन म ि शंकु ने
िव ािम क अ छी आवभगत क । उ ह ब त सहायता प च ं ाई। उनके प रवार का
पालन कया। इसके बाद िव ािम और ि शंकु के सि मिलत उ ोग से ि शंकु अपने
िपता क ग ी पर आसीन आ। इस पर विश ि शंकु और िव ािम दोन ही के वैरी बन
गए, पर तु रा य के मं ी और पुरोिहत बने ही रहे। कु छ दन बाद ि शंकु ने य करना
चाहा, पर तु विश ने य कराने से साफ इ कार कर दया। इस पर ि शंकु ने िव ािम
से ॠि वज बनकर य कराने को कहा। िव ािम राजी हो गए। पर तु विश का िवरोध
साधारण न था। वे एक सह वटु क के कु लपित थे। वेद-िनमाता ॠिष थे। राजम ी थे।
उनके भाव से कोई ॠिष और देवता ि शंकु के य म नह आया। इस पर िव ािम ने
कु िपत होकर कहा–‘म नए देवता क थापना क ं गा।’ अ त म देवता ने य -भाग
हण कया, पर तु इस रा य क पुरोिहताई विश ने छोड़ दी–िव ािम उसके पुरोिहत
हो गए।
वह रा य यागकर विश उ र पांचाल-नरे श सुदास के रा य म प च ं े और उस
राजा के मं ी और पुरोिहत बन गए। दश राजा के यु म विश ने सुदास क बड़ी
सहायता क । उसे िजताया तथा अपने हाथ से उसका रा यािभषेक कया। पर तु कु छ काल
बाद यहां भी िव ािम ने बाधा उपि थत कर दी। सुदास ने य कराने को िव ािम को
बुलाया। य के म य म विश पु शि ने िव ािम को िन र कर दया। इस पर
िव ािम ने शि को अवसर पाकर जीिवत ही जलवा दया। झगड़ा इतना बढ़ा क
सुदास ने विश प रवार के सौ पु ष को मरवा डाला।
अब विश िख होकर दि ण कोशल-नरे श क माषपाद के यहां चले गए। वहां
िव ािम ने एक िविच युि क । कं कर नामक एक रा स को राजा का अ तरं ग िम
बना दया। उसके संसग से उस राजा को नर-मांस खाने का च का लग गया और उस
रा स क सलाह म आकर राजा क माष-पाद विश के सब पु को खा गया।
विश वहां से भी हटकर अब हि तनापुर के राजा संवत के रा य म आए। संवत
को एक बार सुदास ने यु म हराया था। वही वैर उकसाकर विश ने संवत को सुदास से
िभड़ा दया, िजसम सुदास मारा गया।
इसके बाद विश फर उ र कोशल क अपनी जगह पर आ गए। इस समय तक
ि शंकु क मृ यु हो चुक थी और अब उनके पु ह र रा यािधकारी ए थे। ह र
बड़े यो ा और दानी थे। इ ह ने अ मेध य कया। य म इ ह ने िव ािम को बुलाना
चाहा, पर तु विश ने इसका घोर िवरोध कया। िव ािम ने भी वह सुना। इस अपमान
को उ ह ने मन ही म रखा। इसी समय एक िविच घटना घटी। ह र के कोई पु नह
आ। तब उ ह ने व ण क उपासना क और ित ा क क म थम पु को व ण को
बिल दूग ं ा। काला तर म पु उ प आ और उसका नाम रोिहता आ। पर तु ह र
ने व ण को पु क बिल नह दी। इससे उसे जलोदर का रोग हो गया और उसका कारण
‘संक प-छेदन’ से व णदेव का कोप ही माना गया। ब त सोच-िवचार के उपरा त विश
क सलाह से यह िनणय आ क पु के थान पर कसी अ छे कु ल का दूसरा लड़का बिल
देने से भी व णदेव संतु हो सकते ह। इस पर खोज-खाजकर भृगुवंशी अजीगत वेद ष को
लाया गया और उसने एक हजार गाय लेकर अपने मंझले पु शुन:शेप को बिल होने के
िलए बेच दया।
संभवत: इस काय म विश क अिभसि ध थी, य क यह बालक िव ािम का
भािगनेय था। बालक िव ािम के पास जाकर ब त रोया-पीटा और कहा–मेरे दु
लालची िपता ने मुझे बिल होने के िलए बेच दया है, आप मुझे बचाइए।
िववश िव ािम य म आए। चालाक से विश इस य म ॠि वज नह बने
थे। अया य–आंिगरस को बनाया था। जब बालक को लाल व पहनाकर बिल थल पर
लाया गया, तो कोई पुरोिहत उसे यूप से बांधने को राजी नह आ। िजस पर अजीगत
वेद ष ही और गाय लेकर इस काम को भी तैयार हो गया और उसने लड़के को यूप से बांध
दया। पर तु िव ािम के भाव से व ण ने िबना बिल के य क पूणता मान ली और
शुन:शेप बच गया। बच जाने पर अजीगत वेद ष–‘हा पु ! हा पु !’ कहकर उसक ओर
दौड़ा। तब उस बालक ने घृणापूवक उसे िपता मानने से इ कार कर दया और वह
िव ािम का पु बन गया।
30. अनाय जन

अनाय क भी भारत और भारत क सीमा पर उन दन अनेक जाितयां थ ।


इनम मिहष, किप, नाग, मृग, ॠ , ा य, आ जक, रा स, दै य, दानव, क कट, महावृष,
वा लीक, मूंजवन आ द मुख थ । इनका संयु नाम अनाय था। क तु कु छ जाितय को
यातुधान, द यु और िस यु भी कहा गया।
मानवशाि य का कहना है क आजकल शु तम आय के वंशधर के वल क मीर,
पंजाब और राज थान क कु छ जाितयां ह। गंगा-यमुना क घा टय और िबहार क
जाितय म आय और िवड़ का िम ण है। क कट गया ा त के िनवासी थे। गुजरात,
िस ध, ब बई म सी दयन तथा िवड़ क िमि त जाितयां ह। नेपाल, भूटान, आसाम
आ द म मंगोल- िवड़ का िम ण है। वाय सीमा ा त के लोग तु क ह, िज ह तुक -
ईरानी भी कहा जाता है।
मैसूर ा त ही मिहषम डल था। अ य त ाचीन काल म यहां आय क
िवरोिधनी मिहष जाित रहती थी। रावण के काल म हैहय कातवीय अजुन यहां रा य करते
थे। किप या वानर का रा य कि क धा म था। वतमान टोड़ा जाित के लोग, जो दि ण
भारत म ह, संभवत: इ ह के वंशधर ह। ॠ भी उ ह ा त म एक जाित थी। ये वा तव
म िवड़ जाितय के बा धव थे। किपय क राजधानी कि क धा ब त स प थी और
वहां का वामी बाली अजेय यो ा था। नाग म शेष, वासु क, त क, धृतरा आ द मुख
राजा थे। इनके वंश दि ण के ीप-समूह म तथा समु ी तट- ा त म रा य करते थे।
पाताल नाग-लोक कहाता था। संभवत: िस ध म एक नगर पाताल नामक था, जहां
वासु क रा य करता था। वहां से बेबीलोन तक भारतीय ापार होता था। पूव बंगाल के
समु -तट पर भी नाग क बि तयां थ । छोटा नागपुर का उ री अंचल इनका मु य के
था। नाग के वैवािहक स ब ध आय और अनाय म समान भाव से होते थे। सव थम
का यप सागर का म थन देव , दै य और नाग ने ही िमलकर कया था। उ ंक ॠिष ने
अपने खोए ए कु डल कसी नाग, नरपित से ही छीने थे। लंका के समु क रि का सुरसा
नागमाता थी, िजससे हनुमान क मुठभेड़ ई थी। बिल को कै द करके आ द य ने नाग ही
के संर ण म पाताल भेजा था। आय युवना और हय ने अपनी बिहन धू वण नाग को
याही थी। उसी क पांच क या का िववाह हय के द क पु यदु के साथ आ था।
आ तीक इ ह का पु था। नाग का यह वंश ब त आधुिनक काल तक भारत म चलता
रहा। कृ ण ने वृ दावन के िनकट कालीय नाग को परािजत कया और उसे वहां से खदेड़कर
समु -तट पर बसने को िववश कया था। रामपु कु श ने भी एक नागक या से िववाह
कया था। आगे चलकर महाराज जनमेजय से नाग का घोर यु आ, िजसने अनिगनत
नाग को हवनकु ड म जीिवत ही झ क दया था। इितहासकार कहते ह क नाग ने ही
कु शान वंश को परािजत करके भारत म अपना सा ा य थािपत कया था। इसी वंश का
दौिह तृतीय वाकाटक नरे श था।
दै य , दानव और नाग का जो प रचय हम दे चुके ह, आय से उनके कौटु ि बक
स ब ध भी थे। ये आ द य के दायाद बा धव थे–इससे इनम और आय तथा देव म ब त-
कु छ सां कृ ितक सा य था। लाद और बिल िस य कता थे। उनके आय के साथ
स ब ध भी होते थे। पुलोमा दै य क क या शची पौलोमी इ को याही थी। उसक क या
जय ती थम शु उशना को याही थी। वृषपवा दै य क क या श म ा का िववाह ययाित
से आ था। दै य-दानव का मेल था, यह बात भली भांित कही जा चुक है। आ द य से
उनक लड़ाई ब त करके जातीय थी–धा मक नह । पर तु रा स ने उनके साथ धमयु
छेड़ दया था।
ा य बिह कृ त- यारिहत आय थे। महावृष, मूंजवन, वा लीक, पंजाब, दि णी
जन थान, पि मी पंजाब और पूव अफगािन तान म रहते थे। पारावत रावी-तट पर,
आ जक भारत के उ र-पि म म रहते थे। संभवतः वतमान भील, ग ड, संथाल, सौर,
कोल, उस काल के किप, मिहष, ॠ , रा स, कोल आ द जाितय ही के वंशधर ह।
दि णार य म य िप बिह कृ त आय ही जाते थे, पर तु वहां कु छ आयजन वे छा
से भी बस गए थे। अग य मुिन राम के दि णार य म जाने से पूव ही वहां पर आय का
एक उपिनवेश थािपत कर चुके थे। शरभंग ॠिष तथा परशुराम भी यहां रहते थे।
जन थान म ब त-से ॠिष आ म बनाकर रहते थे। पुल य के वंशज तो वहां थे ही। इस
कार इस काल म, िजसका वणन इस उप यास म है, दि ण का आयावत से ब त घिन
स ब ध हो चुका था। ये सभी आय ॠिष-मुिन बिह कृ त आयजन क बड़ी भारी सहायता
करते थे।
सं ेप म, उस काल म दै य-दानव ेत पवत–सफे द कोह पर, देवगण सुमेर पामीर
पर, रा स लंका और दि णार य म, िपशाच-य िहमालय के अंचल म, ग धव और
अ सरा हेमकू ट–कराकु रम पर, नाग और त क िनषध–िन सा पहाड़ पर, ॠिष नीलांचल
म, िपतृ शृंगवान् पवत पर, जो सुमे से पि म और का यप सागर के िनकट है, रहते थे।
काला तर म इन थान म हेरफे र आ। भूतगण भूटान म रहते थे।
हमने पीछे बताया क आय के भारत म आने से पूव मनुभरत का भारतवष म
रा य था। िजस भूभाग म यह मनुभरत रा य करते थे, वह भरतख ड कहाता था। ि य त
के पु नािभ को यह देश िमला था और पीछे भरत के नाम पर उसे भारत नाम दया गया
था। इन भरत के भी यहां के अनाय से ब त यु ए। संभवतः वारोिचष म व तर म
चै वंशी राजा सुरथ कोला नामक ा त का वामी था। उसी से संभवतः मिहष के नेता
मिहषासुर का यु आ। राजा भयभीत हो जंगल म भाग गया और उसक मिहषी
दुगादेवी ने स मुख यु म मिहषासुर का वध कया। इसी वीर देवी ने शु भ और िनशु भ
नामक दो असुर सरदार तथा च ड-मु ड नामक उनके दो सेनापितय का हनन कया।
पीछे यही राजा सुरथ दै य मधु-कै टभ के साथ लय-काल म िव णु-सूय से लड़े थे।
इस समय भी आयावत के बाहर भरतख ड के पि मो र ख ड म मनुभरत , के
तथा पूव के आयजन के जनपद और रा य थे। दि णार य म बिह कृ त , आय तथा
समागत अनाय क नई जाितयां बस रही थ । इस कार िजस समय रा से रावण
अपना नवीन सावभौम धमरा य थािपत करने का उ ोग कर रहा था, अयो या क मु य
ग ी पर दशरथ रा य कर रहे थे। दशरथ महान यो ा और तापी राजा थे। उनक तीन
मिहिषयां थ । थम–दि ण कोशलािधपित भानुमान् क पु ी कौश या। दूसरी–मगध-
राजकु मारी सुिम ा। तीसरी–उ र-पि मी आनव-नरे श के कय क पु ी कै के यी। दशरथ ने
िस धु, सौवीर, सौरा , मत यु, काशी, दि ण कोशल, मगध, अंग, बंग, क लंग और िवड़-
नरे श को जीता तथा दवोदास क सहायता क थी और वैजय ती के कु लीतर के वंशधर
ितिम वज श बर असुर को, जो रावण का साढ़ था, मारा था। अंग-नरे श लोमपाद इनके
िम थे। अब राम यौवरा य पा रहे थे।
आयावत म इस काल म सूयवंशी राजा के अित र उ र कोशल क दूसरी
शाखा म ह र -रोिहता , तीसरी शाखा म सगर, दि ण कोशल रा य म सुदास या
िम सह क माषपाद, िवदेह म सीर वज, िवदेह क संका य शाखा म धम वज, वैशाली म
मित, शयात शाखा म मधु यादव रा य कर रहे थे। सूयवंश क इन ग य के अित र
जो समृ राजवंश थे, उनम मुख च वंश था, िजसक मु य ग ी पर ित ान म
सावभौम, िवदभ म धृितम त, उ र पांचाल म शौनक सुदास, दि ण पांचाल म िचरा ,
मगध म सुध वा, काशी म ॠतु वज, मािह मती म सह ाजुन, मालव म दुजय तथा उ री
िबहार म सुबा रा य कर रहे थे। दुजय सु तीक, लोमपाद और यु ािजत् भी इसी काल के
नरे श थे। इन रा य म िवचरने वाले ॠिषय म विश , िव ािम , वामदेवॠ य-शृंग,
िम भ का यप,सामका ,देवा ,मधु छ दस्, ितदश,गृ समद,अलक और भर ाज मुख थे।
31. रा से रावण

रावण ने अब अपनी अजेय साम य और बल ितभा से लंका का महारा य सुदढ़ृ


कया। मय दानव क पु ी म दोदरी से िववाह करके उसने दै यपित िवरोचन क दौिह ी
व - वाला से अपने भाई कु भकण का और ग धव के राजा शैलूष क पु ी सामा से
िवभीषण का िववाह कया। इससे ये दोन बल और िति त कु ल भी उसके स ब धी बन
गए। रा स जाित का भली भांित संगठन कर वह र -सं कृ ित का ित ाता हो गया। इस
तेज वी महापु ष ने अपने को समु का र क घोिषत कर रा से क उपािध धारण क
और अपने बा बल से लंका महारा य क थापना कर ली, िजसके अ तगत यव ीप,
सुमा ा, मलाया, कु श ीप और मेडागा कर आ द सात महा ीप तथा अ य अनिगनत छोटे-
छोटे ीपसमूह भी थे। उसने अपने नाना सुमाली को अपना धान सलाहकार बनाया तथा
वण, ह त,महोदर,मारीच,महापा व,महादं ,य कोष,दूषण,खर,ि िशरा, दुमुख,
अितकाम, देवा तक, अक पन आ द महारथी, रणम , नीितव त, यशव त, अनुगत,
उ वंशीय रा स को अपना म ी, सेनापित, नगरपाल आ द बनाया। ये सब म ी और
सेनापित राजनीित के महापि डत थे। वयं रावण भी नीित और वेद का महान् पि डत
था। वह दुमद रावण अके ला ही अजेय यो ा और नीितिवशारद था। अब कु भकण जैसे
वीर भाई, ऐसे यो य म ी और सेनानायक को पाकर उसका बल ब त बढ़ गया। शी ही
उसे पु र क उपलि ध ई। उसका नाम रखा मेघनाद। वह ि तीया के च मा क तरह
बढ़कर सब शा तथा श म िनपुण हो गया। रावण के इस पु म भी िपता का शौय
और तेज था। इसके अित र दूसरी पि य से रावण को ि िशरा, का।
देवा तक,नरा तक,अितकाम,महोदर,महापा व आ द अनेक और पु भी ए,जो महाकाल
के समान दुजय यो ा थे। रावण के रनवास म अनेक दै य, दानव, नाग और य -वंश क
सु दर रयां थ । रावण ने मेघनाद का िववाह भी दानव क क या सुलोचना से कया। इस
कार पु , प रजन, अमा य, बा धव और रा स से स प वह रावण परम ऐ य और
साम य का तीक हो गया।
इस कार वण-लंका म अपना महारा य थािपत करके तथा स पूण दि णवत
ीपसमूह को अिधकृ त करके अब उसका यान भारतवष क ओर गया। लंका भारत ही के
चरण म थी।
उन दन तक भारत के उ राख ड म ही आय के सूय-म डल और च म डल
नामक दो राजसमूह थे। दोन म डल को िमलाकर आयावत कहा जाता था। उन दन
आय म यह िनयम चिलत था क सामािजक शृंखला भंग करनेवाल को समाज-बिह कृ त
कर दया जाता था। द डनीय जन को जाित-बिह कार के अित र ायि , जेल और
जुमाने के द ड भी दए जाते थे। ाय: ये ही बिह कृ तजन दि णारा य म िन कािसत कर
दए जाते थे। धीरे -धीरे इन बिह कृ त जन क दि ण और वहां के ीपपुंज म द यु,
मिहष, किप, नाग, पौ , िवड़, का बोज, पारद, खस, प लव, चीन, करात, म ल, दरद,
शक आ द जाितयां संग ठत हो गई थ । ार भ म के वल ा य ही जाित- युत कए जाते
थे, पर पीछे यह िन कासन उ होता गया। सगर ने अपने िपता के श ु शक, यवन,
का बोज, चोल, के रल आ द कु टु ब को जीतकर उनका समूल नाश करना चाहा पर विश
के कहने से उ ह वेद-बिह कृ त करके दि ण के अर य म िनकाल दया। इसी कार न ष-
पु ययाित ने नाराज होकर अपने पु तुवशु को सप रवार जाित करके ले छ क
दि ण दशा म खदेड़ दया था। िव ािम ने भी अपनी आ ा का उ लंघन करने पर अपने
पचास कु टु ब को दि णार य म िन कासन दया था, िजनके वंशधर दि ण म आकर
आ , पौ , शबर, पुिल द आ द जाितय म प रव तत हो गए थे।
इस काल म लोभी, धोखेबाज, ठग, ापारी, विणक् को पिणक कहते थे। इसका
अथ ‘ पणलोभी‘है। ऐसे लोभी पिणक को भी आय लोग बिह कृ त करके दि ण म
िन कािसत करते थे। दि ण म आकर भी ये लोग प यकम करने लगे–माल खरीदने-बेचने
का ापार करने लगे। आगे चलकर इनक एक जाित ‘पा य’ ही बन गई और िजस देश
म यह बसे वह देश भी ‘पा य य’ के नाम से िव यात आ।
ऐसे ही िन कािसत चोर क एक शाखा दि ण म आकर ‘चोल’ जाित और ा त
म प रणत हो गई। पिणय ने सागवान के जहाज बनाकर समु के ीप-पुंज म दूर-दूर तक
जाकर ापार-िविनमय आर भ कर दया। उनम से ब त-से पिणक म यसागर के कनारे
बि तयां बसाकर बस बए। आगे समु के उस पार जाकर इ ह ‘पिणय ‘ और ‘चोल ’ ने
उन देश को आबाद कया िज ह आज हम ‘फनीिशया’ और ‘चाि डया’ कहकर पुकारते ह।
इस समय कोल और िवड़ से लेकर लंका, मेडागा कर, अ का और आ ेिलया तक
िजतनी ‘इिथयोिपक’ उप-जाितयां ह, वे सब इ ह बिह कृ त आय क परं परा म ह तथा
उन सबका एक ही वंश और सं कृ ित है। इनम ब त-सी तो भारत ही म दि ण म बस गई
थ और ब त-सी अ य ीपसमूह तक फै ल गई थ , िजनके उ रािधकारी आज सम त
एिशया, अ का, अमे रका और यूरोप के देश म िमलते ह।
रावण के शरीर म शु आय और दै यवंश का र था। उसका िपता पौल य
िव वा आय ॠिष था और माता दै यराज-पु ी थी। उसका पालन-पोषण आय िव वा के
आ म म उसी के त वावधान म आ। उसे िश ा-दी ा भी उसके िपता ने अपने अनु प
ही दी थी। उस समय वेद का जो व प था, उसे उसने अपने बा यकाल म अपने िपता से
पढ़ िलया था। उस काल तक वेद ही आय का एकमा सािह य और कम-वचन था। जो
के वल मौिखक था–लेखब न था। रावण के मातृप म दै य-सं कृ ित थी। दै य और असुर,
देव तथा आय के भाई-ब द ही थे, पर तु रहन-सहन, िवचार- वहार म दोन म ब त
अंतर था। िवशेषकर बिह कृ त जाितयां आय से ष े और घृणा करती थ । बिह कार का
सबसे कटु प ऋिषय -पुरोिहत ारा सं कार या से उ ह वंिचत रखना तथा य से
बिह कृ त समझना था। य िप अभी य का भी िवराट प न बना था जो आगे बना, फर
भी यह एक ऐसी अपमानजनक बात थी िजसने इन जाितय म आय के िव दै य और
असुर से भी अिधक–जो आय के दायाद बा धव थे–िव ष े और िवरोध क वाला सुलगा
दी थी।
रावण के मन म तीन त व काम कर रहे थे। उसका िपता शु आय और िव ान्
वै दक ॠिष था, उसक माता शु दै यवंश क थी, उसके ब धु-बा धव बिह कृ त आयवंशी
थे। उ ह या-कम तथा य से युत कर दया गया था। अब उसने भारत और भारतीय
आय को दिलत करने, उन पर आिधप य थािपत करने और सब आय-अनाय जाितय के
समूचे नृवंश को एक ही र -सं कृ ित के अधीन समान भाव से दीि त करने का िवचार
कया। त कालीन पर परा के अनुसार उसने नृवंश का सारा धा मक और राजनीितक
नेतृ व अपने हाथ म लेने का संक प दृढ़ कया।
देव और आय का संगठन उस काल म अ यु म था। उ ह ने लोकपाल , द पाल
क थापना क थी, जो देवभूिम और आयदेश के ा त भाग क र ा करते थे। देव क
वर जाितय म तब म त्, वसु और आ द य ही मुख थे। चोटी के पु षा म इ , यम,
, व ण, कु बेर आ द थे। यम, व ण, कु बेर और इ ये चार वंश-पर परा से लोकपाल थे।
रावण ने देव और आय के इस संगठन को जड़-मूल से उखाड़ फकने क योजना
बनाई। उसने सां कृ ितक और राजनीितक दोन ही कार के िव लव का सू पात कया।
उसका मेधावी मि त क और साहिसक शरीर ही यथे था, ितस पर उसके साथी-सहयोगी,
सुमाली, मय, वण, ह त, महोदर, मारीच, महापा व, महादं , य कोप, खर, दूषण,
ि िशरा, अितकाय, अक पन आ द महारथी सुभट और िवच ण म ी थे। कु भकण-सा
भाई और मेघनाद-सा पु था। रावण क साम रक शि अब चरम सीमा तक प च ं गई
थी। खूब सलाह-सूत करके और आगा-पीछा िवचारकर उसने रामे र के िनकट म दराचल
क समु म पवत-शृंखला के सहारे दि ण भारत से स ब ध थािपत कया। इस समय
दि ण भारत म दो धान दल थे–एक वे जो बिह कृ त आय थे; दूसरे वे जो िवदेश से
आकर भारत-समु के उपकू ल पर आ बसे थे। ये दल आय-अनाय के नाम से पुकारे जाते
थे। रावण ने दोन को अपने साथ िमला िलया।
सबसे थम उसने यम, कु बेर, व ण और इ के चार देवलोक के लोकपाल को
और फर आयावत को जय करने का संक प कया। अब वह खूब चाक-चौब द होकर
सुअवसर और घात लगाने क ताक म बैठ गया।
32. रावण का भारत– वेश

रावण अपनी सब तैयारी कर चुका था। उसने समु –माग से अपने स ब ध दि ण


भारत से जोड़ िलए थे। इसके अित र उसने सह समथ रा स को िविवध छ वेश
धारण करके भारत के िभ -िभ देश म भेज दया था, जो सब जाितय म रावण ारा
थािपत रा स-धम का चार करते तथा लोग को रा स बनाते थे। इस कार इस समय
समूचे दि णार य म ही नह , आयावत म भी ब त-से रा स घूम रहे थे। अब रावण कसी
सुयोग क तलाश म था। वह उसे अक मात् ही िमल गया। एक दन एक दूत रावणा के
भाई धनपित कु बेर का संदश े लेकर आया और उसने रावण को कु बेर का यह संदश े दया
क ‘‘तु हारा आचरण और वहार तु हारे कु ल के यो य नह है। तुम दै य के संग म ब त
िगर गए हो। दि णार य म और भरतख ड म तु हारे भेजे ए रा स ब त उ पात मचाते
ह। वे ॠिषय को मारकर खा जाते ह। य म िधर-मांस क आ ित देते ह और अनाय से
मेल रखते ह। तु हारे ये काय देव और आय को अि य ह। म तु हारा बड़ा भाई ,ं तो भी
तुमने मेरा बड़ा अपमान कया; फर भी मने अपनी लंका खुशी से तु ह दे दी और तु ह
अ ानी बालक समझकर तु हारे अपराध सहे ह। पर तु अब तु हारे कृ त-पाप अस होते
जा रहे ह। इससे म कहता ं क तुम अपने आचरण को सुधारो और अपने कु ल के अनुसार
काय करो।’’
दूत के ये वचन सुनकर रावण ने कहा–‘‘अरे दूत, तेरी बात मने सुनी। न तो तू, न
मेरा भाई धना य कु बेर ही–िजसने तुझे यहां भेजा है–मेरे िहत को समझता है। तू जो मुझे
भय दखाता है सो मुझे तेरा यह आचरण स नह है– फर भी तुझे दूत समझकर सहता ं
और कु बेर धनपित मेरा भाई है इसीिलए उसे नह मारता। क तु तू उससे जाकर कह क
रावण शी ही तीन लोक को जीतने के िलए आ रहा है। तभी वह तेरी बात का जवाब
देगा।’’
दूत को िवदा कर रावण ने अपनी योजना आगे बढ़ाई। सब बात पर सोच-िवचार
करके उसने द डकार य का रा य अपनी बिहन सूपनखा को दया और अपनी मौसी के बेटे
खर और सेनानायक दूषण को चौदह हजार सुभट रा स देकर उसके साथ भेज दया। इस
कार जन थान और द डकार य म रा स का एक कार से अ छी तरह वेश हो गया
तथा भारत का दि ण तट भी उसके िलए सुरि त हो गया।
ब त दन से लंका म ताड़का नाम क एक यि णी रहती थी। यह दि णी ज भ के
पु सु द य क ी थी। एक पु - सव होने के बाद एक यु म अग य ॠिष ने सु द
य को मार डाला था। अग य के साथ श ुता होने के कारण ताड़का ॠिषय से घृणा
करती थी। उसने य पित कु बेर से कहा था क वह उसके पित के वैर का बदला अग य से
ले, पर तु कु बेर अग य का िम था। इससे उसने उसक बात पर कान नह दया। जब
रावण ने नई र -सं कृ ित क थापना क और कु बेर को लंका से खदेड़ दया, तो यह
यि णी लंका से नह गई–उसने अपने पु मारीच सिहत उसका रा स–धम वीकार कर
िलया। मारीच को साहसी त ण देख रावण ने उसे थम अपने सेनानायक म और फर
मि य म थान दे दया। अब जब रावण का अिभ ाय ताड़का ने सुना तो उसने रावण के
िनकट जाकर कहा–‘‘हे र राज, आप अनुमित द तो म आपक योजना पू त म सहायता
क ं । आप मेरी बात यानपूवक सुिनए। मेरा िपता सुकेतु य महा तापी था। भरतख ड
म–नैिमषार य म उसका रा य था। उसने मुझे सब श -शा क पु षोिचत िश ा दी
थी और मेरा िववाह धमा मा ज भ के पु सु द से कर दया था, िजसे उस पाख डी ॠिष
अग य ने मार डाला। अब उस वैर को दय म रख म अपने पु को ले जा रही ।ं य द
स य ही आप आयावत पर अिभायान करना चाहते ह, तो मुझे और मेरे पु मारीच को
कु छ रा स सुभट देकर नैिमषार य म भेज दीिजए, िजससे समय आने पर हम आपक सेवा
कर सक। वहां हमारे इ -िम , स ब धी-सहायक ब त ह, जो सभी रा स-धम वीकार
कर लगे।” ताड़का क यह बात रावण ने मान ली; उसे रा स भट का एक अ छा दल
देकर तथा उसी के पु मारीच को उनका सेनानायक बनाकर तथा सुबा रा स को उसका
साथी बनाकर नैिमषार य म भेज दया। आजकल िबहार ा त म जो शाहाबाद िजला है–
वही उस काल म नैिमषार य कहाता था। इस कार भारत म रावण के दो सैिनक-सि वेश
थािपत हो गए। एक द डकार य म–जहां आज नािसक का सु दर नगर है; दूसरा
नैिमषार य म–जहां आज शाहाबाद शहर बसा आ है–सोन और गंगा-संगम के िनकट।
33. द डकार य

रणशा और नीितशा का महापि डत रावण जब द डकार य और नैिमषार य


म अपने सबल सैिनक-सि वेश थािपत कर चुका और समूचे भरतख ड और आयावत एवं
देवभूिम म अपने रा स के जाल फै ला चुका, तो वह अपने नाना सुमाली को लंका का
ब ध स प एकाक ही अपना परशु हाथ म ले चुपचाप छ -वेश धारण कर भरतख ड म
िव आ।
थम उसने द डकार य म घूमना आर भ कया। इस महावन का नाम
महाका तार भी था। यह अित दुगम वन था। इसका ाकृ त सौ दय भी अपूव था। वन म
बड़े-बड़े पवत-शृंग, झरने, झील और नदी-नाले थे। दि णार य म अभी तक द डकार य
ही ऐसा थान था, जहां ब त िवरल ब ती थी तथा जहां रा स का ाब य था। यह
रावण क बिहन सूपनखा खर-दूषण तथा चौदह सह रा स सुभट के साथ रहती थी।
इसके अित र यहां कु छ और भी िवकट रा स थे, िजनम एक बल परा मी तु बु
ग धव था, िजसे कु बेर ने कु होकर लंका से िनकाल दया था और अब वह यहां
द डकार य म िवराध नाम धारण कर िवकट रा स क भांित रहता था। वह बड़ा धूत,
नरभ ी, साहसी तथा दुराचारी रा स था। रावण और सूपनखा क आन म वह िनभय
िवचरण करता आ, ॠिषय को तंग करता तथा अवसर पाकर उ ह मार भी डालता था।
ऐसे ही और भी अनेक रा स थे। इसके अित र इस वन म बाघ, संह, शूकर, भसा, गडा
आ द हं ज तु क कमी न थी। फर भी यहां कु छ ॠिषगण अपने आय उपिनवेश
थािपत कए ए थे, िजनम मुख शरभंग और सुती ण ॠिष थे। सुती ण ॠिष का
उपिनवेश म दा कनी नदी के तट पर एक मनोरम थल पर था। यह उपिनवेश बिह कृ त
आय का सबसे बड़ा आ म थल था। यह उपिनवेश अ य त रमणीय था। यहां सुगि धत
पु प और फल के लता म ु ब त थे। शीतल व छ जल के जलाशय थे। द डकार य के
भीतर ही एक उपिनवेश मा डकण का भी था। मा डकण राजसी कृ ित के ॠिष थे। अत:
इनके उपिनवेश म सु दरी अ सराएं नृ यगान करत और ॠिष उनके साथ व छ द
िवहार करते थे, पर तु इस दुगम अंचल म सबसे अिधक मिहमावान् अग य का उपिनवेश
था। मह ष अग य बड़े तापी ॠिष थे। अग य के आ म के पास ही उनके भाई का भी
उपिनवेश था। वहां के सभी जन उनक अग य के समान ही ित ा करते थे। य तो ये
सभी ॠिष रा स से लड़ते-झगड़ते रहते थे, पर अग य ने वीरतापूवक अनेक रा स का
वध कर डाला था, िजनम वातािप और इ वल मुख थे। इससे अग य का आतंक रा स
पर भी था।
आजकल जहां नािसक है, उसी के इधर-उधर पंचवटी के िनकट ही अग य का
उपिनवेश था। पंचवटी म ही िवनता के पु येनवंशी ग ड़ के भाई अ ण के पु जटायु का
उपिनवेश भी था, जो गोदावरी के तट पर एक मनोरम थान पर था। यह थान ाकृ ितक
सौ दय से ओत- ोत था। वहां अनेक पवतीय गुफाएं थ । इन गुफा म अनेक ताल,
तमाल, खजूर, कटहल, आम, अशोक, ितलक, के वड़ा, च पा, च दन, कद ब, लकु च, धव,
अ कण, खैर, शमी, पलास और बकु ल के सघन वन थे। वहां हंस , सारस और जल-
कु कुट का कलरव प रपूण रहता था।
रावण ने भी अपनी बिहन सूपनखा के नेतृ व म द डकार य म एक उपिनवेश
थािपत कया था, य िप वा तव म वह था सैिनक-सि वेश। ये रा स के वल अपनी
सं कृ ित का चार बलात् करते और वहां के लोग को रा स बनाने क चे ा करते थे।
रावण क आ ा यु करने क न थी। इसी कारण य िप यहां खर-दूषण चौदह हजार
रा स के साथ रहते थे, पर तु वे लोग लड़ते-िभड़ते न थे। के वल ॠिषय के य म आकर
बिल-मांस बलात् डालते, उ ह पकड़ ले जाते, उनक बिल देते तथा नरमांस खाते थे।
रावण द डकार य क सुषमा पर मोिहत हो गया। इस समय शरद् ॠतु बीत गई
थी और हेम त आ गई थी। परम रमणीय गोदावरी के िनमल जल म रावण व छ द
िवहार करता और वहां क व थ वायु म फू तलाभ करता था। इस समय वहां वन-
उपवन क शोभा भी िनराली हो रही थी। सूय दि णायन थे। यह काल िहमालय क ओर
बढ़ने यो य न था। वहां क वायु समशीतो ण थी। हेम त म राि अिधक अ धकारयु हो
जाती है। राि का समय भी दन से बढ़ गया था। च मा का सौभा य भगवान् भा कर ने
हरण कर िलया था। कोहरे तथा पाले के कारण पू णमा क राि भी मिलन-धूिमल-सी
तीत होती थी। वन- देश क श य- यामला भूिम सूय के उदय होते ही सुहावनी तीत
होने लगती थी। इस समय सूय आकाश पर चढ़ जाने पर भी च मा के समान ि य लगता
था। म या न का सूय भी ािणय को ि य होता था। जल इतना शीतल हो गया था क
गजराज यास लगने पर जब अपनी सूंड़ जल म डु बाते थे, तब तुर त ही बाहर िनकाल लेते
थे। जल के प ी जल के समीप बैठे ए भी उसम च च डालने का साहस नह कर सकते थे।
शीत के कारण वन म फल-मूल क कमी हो गयी थी। न दयां कोहरे के कारण ढक -सी दीख
पड़ती थ । सरोवर म कमल-वन ीहत हो गए थे।
रावण इन सब ाकृ त दृ य का आनंद लेता तथा छ वेश म ॠिषय के
उपिनवेश म आता-जाता, मतलब क बात क खोज-खबर लेता रहता था। इसी कार
उसने द डकार य म रहते ए आयावत और भरतख ड के रा य का ब त-सा ान
स पादन कर िलया था।
34. असुर का देश

इस काल म भरत-ख ड म असुर के भी अनेक रा य थे। पर तु मूलत: असी रया


ही असुर भूिम थी। यह थान भूम य सागर के पूव भाग म ि थत है। आजकल यह देश
फारस और थोड़ा याम देश क सीमा के अ तगत है। इसका यह नाम शेम के पु असुर
के नाम पर आ। इितहासकार सैिलन का मत है क असी रयन सा ा य क थापना ईसा
से कोई ढाई हजार वष पूव ई थी। यह असुर सा ा य संसार क ऐितहािसक सीमा म
आए ए तीन ाचीनतम सा ा य म एक था। इसक आरि भक राजधानी ‘असुर’ नगर
था, जो असुर ने अपने नाम पर बसाया था। समय-समय पर इसक भौगोिलक सीमा घटती
गई। जब यह सा ा य उ ित के िशखर पर था, उस समय इसका िव तार भूम य सागर के
दि ण से लेकर पूव म मनाई पवत तक था। मूल असी रया क सीमा वतमान कु द तान से
िमलती-जुलती थी। उस समय यह उ र म जा ीस पवत तथा पि म म दजला नदी तक
को पश करता था। इस असुर-भूिम म पाव य देश, समतल मैदान और कृ षकोपयोगी भूिम
भी देखने को िमलती थी। यह पर िसमरा नामक पवत से रात म काश िनकलता दीख
पड़ता है, जो वषाकाल म बढ़ जाता है। होमर ने अपने का म इस देश को ऐसे रा स का
पक देकर वणन कया है, िजसका िसर संह का, धड़ बकरे का और पूंछ सांप क हो।
यहां के पवत अनेक खिनज पदाथ से भरे पड़े ह और मैदान चूना और बालू से।
सेब, अंजीर, बड़, बेर और ताल के वृ पाए जाते ह। कृ षकोपयोगी भूिम म फसल उपजती
ह। पहले घने जंगल भी थे। इस देश क जलवायु िभ कार क है। पहाड़ी हवा शीतकाल
म ठं डी रहती है। बफ भी िगरती है, पर ग मय म पहाड़ तप जाते ह। कह मौसम म यम
रहता है। फरात, दजला और जैब यहां क धान न दयां ह। इसक दोन ाचीन
राजधािनयां–िननवे और बेबीलोन मश: दजला और फरात नदी पर ि थत थ । फरात
नदी तो बेबीलोन के बीच म होकर गई थी।
कहा जाता है क पहले यहां अकाद नाम क कोई पहाड़ी जाित बसती थी। बाद म
उ र से सेमे टक लोग का आगमन आ। कु छ काल बाद ये दोन जाितयां पर पर आचार-
िवचार से िमल ग । इ ह दोन जाितय के िम ण से असुर जाित और आसुरी भाषा का
िनमाणा आ। असुर ही क एक शाखा सी रया म जा बसी, जो फोिनिशयन के नाम से
यात ई। फोिनिशयन बड़े नािवक, विणक् व िश पकार थे। कु द तान का ाचीन नाम
िनमरी है। यह थान आरमीिनया के नीचे कु देश–पौरािणक उ र कु है, िजसे
आजकल नम द कहते ह। उसे उस काल म कलेरबी कहते थे। नम द से हटकर असुर
िनमरी म बस गए। आगे यही देश असी रया–असुर का देश िस आ। यहां के
िनवािसय क जाित पा ा य इितहासवे ा ‘असी’ बताते ह। यह ‘असी’ असुर का ही लघु
प है। सूय के सुर िव कमा– व ा यह के मिहदेव थे। ईसा से कोई स ाईस सौ वष पूव
असुर वत राजा हो गए थे। असुर रानी शिश और आ द य म ईसा से प ह सौ वष पूव
एक सि ध ई और ईसा से तेरह सौ वष पूव असुर ने बेबीलोिनया को देव से छीन िलया,
पर तु फर हारकर वे देव क जा बन गए। ईसा से पूव यारहव शता दी म असी रया
फर वत हो गया। िमतािनिहतैित, ईलाम, बेबीलोिनया और िम देश को असुर नरे श
सरगन व उसके उ रािधका रय ने ईसा से पूव 722 म छीन िलया। फर असुर वेणीपाल
ने ई. पू. 648 म बेबीलोिनया तथा 645 म सुआ इं दावोगश इ देव से छीनकर देव के
रा य इ ासन का सदा के िलए अ त कर दया। इसके बाद स भवत: ये आ द य मुलतान
होकर भारत म आए। उ ह ने िस ध के तट पर मूल थान नगर बसाया जो आगे चलकर
मुलतान के नाम से िस आ। यहां जगि यात सूय का मि दर महमूद गजनवी के
अंितम आ मण तक थािपत था तथा तब भी उसक वैसी ही याित थी।
इस कार ई. पू. 2400 से ई. पू. 345 तक सुषा देश सुर का सुरपुर बना रहा–
पीछे वह असुर का देश बना। संभवतः सुर के िवरोधी होने से ही इ ह असुर कहा गया
है। ाचीन इितहासकार िडयोडोरस, लाहमी, टालोमी, टाड, क नंगहम और चीनी िव ान्
ाचीन ईरान के लोग क दो जाितयां बताते ह–एक सुर और दूसरी असुर। पर वे यह नह
बता सके क वे कौन थे। वा तव म ये दोन जाितयां सुर और असुर ही थ ।
ये असुर ही सेमे टक स यता के जनक ह, िजस कार सुमेर स यता के ज म-दाता
आ द य देव ह। असुर स ाट् नम द ने रा यशि ा कर दजला के कनारे िननवे को
अपनी राजधानी बनाया। पहले असी रया का रा य बेबीलोिनया सा ा य के अ तगत था।
बाद म वत हो गया। बेबीलोिनया का राजा धमा य के अधीन होता था, पर तु यहां
का राजा वयं धमा य बन गया और वही रा य म सवसवा हो गया। धीरे -धीरे असुर
का बल बढ़ता गया और बेबीलोिनया क शि का ास होता गया। थम ितगथल
िपलेसर ने सा ा य-िव तार का काय ार भ कया। उसने कई थान असी रया म िमला
िलए। बाद म िम को भी जय कया। ि तीय असुर नािसरपाल क िवजियनी सेना ने
चार ओर आतंक जमा दया। यह एक िनदयी राजा था, िजसने नगर-देश जलाकर छार
कर डाले। लोग को तलवार के घाट उतार दया। पर तु ि तीय शालमनसेट के काल म
असुर क सेना लूट-मार छोड़कर देश को िवजय करने म जुट गई। फलत: असुर-रा य
सा ा य म प रव तत हो गया। कला-कौशल को भी य दया गया। अनेक राजा ने
अधीनता वीकार कर ली। फल तीन का यु - थल अिधकृ त होने के बाद तो पि मी
एिशया म यह सव थम हो गया।
ईसा से पूव आठव शता दी म यह सा ा य ढीला आ। सेना और करद रा य ने
िव ोह कर दया। धीरे -धीरे पुराने रा यवंश लु हो गए और पुलु नामक एक सैिनक ने
संहासन ह तगत कर िलया। इसने इसके िव ोही रा य को दबाकर असी रया का
सा ा य फर दृढ़ कया। इसके वंश म अनेक राजा ए और उनके काल म ब त उलट-फे र
होते रहे। अ त म ई. पू. 637 म इस सा ा य ने िम को जय कया और सा ा य को बारह
देश म बांटकर येक पर एक-एक शासक, थािपत कर दया। सेमाचे रव ने ाचीन
नगर बेबीलोन का िव वंश कर दया। उसके उ रािधकारी इशारदन के रा यकाल म
सा ा य क दो राजधािनयां हो ग । पीछे इसके मरने पर सा ा य दो टु कड़ म बंट गया।
एक भाग का वामी असुर वेणीपाल आ। वह बड़ा िव ा सनी था। इसने बड़ा
पु तकालय संिचत कया। कु छ दन बाद इसका भाई िव ोही हो गया और राजभवन म
जल मरा। िम भी हाथ से चला गया। अ त म ईसा से कोई छह सौ वष पूव िननवे पर
सबने िमलकर चढ़ाई क । राजा हारा और उसका राजमहल म टयामेट कर दया गया। इस
कार सात सौ वष तक अख ड रहकर इस असुर-सा ा य का ऐसा पतन आ क इसका
नामोिनशान संसार से उठ गया।
35. वैजय तीपुरी

द डकार य के दि ण भाग के पास वैजय तीपुर था, जहां का वामी असुर का


एक एकािधपित, कु लीतरवंशी ितिम वज श बर था, जो सौ दुग का वामी था। श बर क
राजमिहषी दितपु मय दै य क पु ी तथा रावण क मिहषी म दोदरी क सगी बहन
थी। उसका नाम माया था। माया अपूव प-सु दरी थी। उसका रं ग तपाए ए सोने के
समान काि तमान् था और उसके अंग यंग इतने सुडौल थे क देखकर उसके रचियता को
ध य कहना पड़ता था। असुरराज श बर जैसा तापी और स प था, वैसा ही शालीन,
वीर और मिहमावान् भी था। रावण िवचरण करता आ अक मात् ही श बर क राजसभा
म जा प च ं ा। वल त अि -िशखा के समान तेज वी एक त ण को ब मू य मिणय के
भुजबंद और महाघ मरकतमिण का क टब ध पहने, िवशाल बा , श त व , उ त
ललाट, उ फु ल नयन और कृ णकाकप पर मिणमुकुट पहने, क ध पर दुधष परशु रखे,
लापरवाही से नगर के राजपथ पर अ सर होते देखा तो ब त जन कौतूहल से उसके पीछे
हो िलए। रावण चार ओर नगर क सुषमा िनहारता आ, गवा से झांकती ई
पुरवधु पर कटा करता आ, असुर बालक , याचक और क या को वण देता आ,
हंसता-मु कराता, हंस क चाल से चलता राजपथ पर राज-महालय क ओर चला जा रहा
था। असुर नागर आ यच कत हो इस तेज वी आग तुक एकाक परदेशी को देख रहे थे।
कसी का भी साहस उससे प रचय पूछने का न होता था।
राज ार तक प च ं ते-प च
ं ते ब त भारी भीड़ उसके साथ लग गई। राज ार पर
ार-पु ष ने पूछा–‘‘महाभाग, आप कौन ह और कस अिभ ाय से आप राज ार पर पधारे
ह? आपने अपने ज म से कस कु ल को ध य कया है? आ ा क िजए तो म वामी से
िनवेदन क ं ।’’
ार-पु ष का ऐसा िवनय देख रावण स हो गया। उसने अपने क ठ से बड़े-बड़े
मोितय क माला उतार उसके क ठ म डाल दी और हंसकर कहा–‘‘तेरे िवनय से संतु ।ं
तू अपने वामी से जाकर कह क ार पर एक अितिथ आया है, राजदशन का इ छु क है।
अपना शेष प रचय म तेरे वामी ही को दूग ं ा।’’
ऐसा ब मू य उपहार पाकर और रावण के ग रमामय वचन सुनकर ार-पु ष ने
झुककर रावण का अिभवादन कया और कहा–‘‘जैसी आपक आ ा! म अभी वामी से
जाकर िनवेदन करता ।ं तब तक महानुभाव इस आसन पर िवराजमान ह !’’ यह कहकर
ार-पु ष श बर क सभा म गया। जाकर उसने करब ाथना क –‘‘महीपाल, एक
मिहमावान् तेज वी अितिथ राज ार पर उपि थत है। वह राजदशन क ित ा ा
करना चाहता है। मुझ दास को उसने यह मु ामाल स होकर दान क है। अपना
प रचय वह वयं देना चाहता है। आगे देव माण ह।’’
ार-पु ष का यह वचन सुनकर और मोितय क वह ब मू य माल देख, उस
असुरराज ने आ य कट कया। फर अपने मि य क ओर देखकर उसने कहा–‘‘ऐसी
मु ामाल ार-पु ष को देनेवाला अव य ही कोई मिहमावान् है। तुम वयं उसक
अ यथना कर उसे मेरे पास ले आओ।’’
मि गण अ य–पा ले ार पर आए। रावण का अ य–पा से स मान कया
और कहा–‘‘महाभाग, अब आप चलकर हमारे असुरपित से भट क िजए।’’
हंसते–हंसते श बर के स मुख जाकर रावण ने कहा–‘‘असुरराज श बर क जय
हो! म पौल य िव वा मुिन का पु रावण, लंकापित, राजमिहषी मायादेवी का बहनोई,
आपका साढ़ू, आपके दशनाथ आया ।ं आप मेरे ये ह। म आपका अिभवादन करता ।ं ’’
रावण के ऐसे वचन सुनकर श बर दोन हाथ फै लाकर आसन से उठकर रावण क ओर
दौड़ा। उसने अंक म भरकर रावण को बार–बार आ लंगन करके कहा–‘‘आज म ध य आ,
िति त आ। पौल य रावण, तुम पूजाह हो। अ यथना करता ।ं इस असुरपुरी म
तु हारा वागत है। भाई, यह तु हारी ही पुरी है। तुम अपने ही घर आए हो।’’
आन दाितरे क से श बर के ने से जलधार बह चली। उसने अपने मि य को
आ ा दी क नगर म उ सव मनाया जाए, सब कोई आज दीपावली कर। यह हमारा ि य
स ब धी पौल य रावण जापित के वंश का है–सु िति त है। इसके आने से मेरा कु ल
ध य आ–मेरा यह नगर पिव आ। फर उसने रावण को अपने पास आसन पर बैठाकर
हंसते ए कहा–‘‘ क तु यह या? लंकाधीश, एकाक , िबना ही प र छद?’’
रावण ने भी हंसते–हंसते कहा–‘‘घर म आने के िलए प र छद क या बात!
आपके दशन का चाव ख च लाया। देवी म दोदरी भी अपनी ाणािधक बिहन को ब त
याद करती ह। मने सोचा–पू या ह वे, ा या ह वे, चलकर पद-व दना कर आऊं।’’
श बर ने कहा–‘‘तो चलो ब धु, अ तःपुर म देवी तु ह देखकर स ह गी।’’ उसने
चेटी क ओर देखकर कहा–‘‘अरी जा, देवी से िनवदेन कर, हमारा ब धु लंकािधपित
पौल य रावण आया है और अब हम अवरोध म आ रहे ह।’’
चेटी म तक अवनत कर, ‘जो आ ा’ कह चली गई और असुरराज श बर रावण के
क ध पर हाथ रखकर धीरे -धीरे बात करते ए अ तःपुर म िव ए।
36. मायावती

अपरा न क मनोरम वेला म मायावती अ तःपुर क मदनवा टका के माधवी


म डप म अके ली ही कु छ िवचारम –सी बैठी थी। आयु उसक अभी अ ाईस ही वष क
थी, पर तु अपनी आयु से वह ब त कम दीख पड़ती थी। उसका रं ग त कांचन के समान
देदी यमान था ही, उसक भाव–भंिगमा भी बड़ी मोहक थी। उसका शरीर उठानदार था,
कद कु छ ल बा था। ऐसा तीत होता था जैसे अंग से र फू टकर बाहर िनकलना चाहता
है। लाव य और वा य क कोमलता का उसके शरीर म कु छ ऐसा सामंज य था क
कसी भी तरह सुषमा का वणन नह कया जा सकता। उसके ने काले और बड़े थे। कोये
दूध जैसे सफे द थे। दृि म कु छ ऐसी मादक भाव–भंिगमा थी क िजससे उसक आ ही और
अनुरागपूण भावना का कटीकरण होता था। के श उसके भ रे के समान, दो भाग म बंटे
थे। उनम बड़ी कारीगरी से मोती गूंथे गए थे। यान से देखने पर उसक बाक भ ह कु छ
घनी तीत होती थ । कान छोटे, पतले और कोमल थे। शंख के समान क ठ, भरावदार
उ त उरोज और छरहरी देह थी। उसक देह क सुडौलता देखते ही बनती थी। वह
ी मकालीन ब त ही महीन कौशेय शरीर पर धारण कए ए थी, िजसम से छन-छनकर
उसके शरीर क लाव य-छटा दुगुनी-चौगुनी दीख पड़ रही थी।उसके छोटे-छोटे सु दर पैर
म पड़े सुनहरी उपानह के लाल मािण य ने म चकाच ध उ प कर रहे थे।
श बर एक तापी पु ष अव य था पर उसक अव था पचास वष से अिधक थी।
वह राजक य आव यकता और यु से िघरा रहता था। य िप वह ेमी, भावुक और
व छ दय का पु ष था; पर तु स े अथ म मायावती क मांग का वह पूरक न था। वह
एक अ छा पित था, पर मायावती क उ ाम वासना पित के थान पर ेमी चाहती थी।
इतने बड़े रा य का अिधपित पचास वष क ढलती आयु म ेमी नह हो सकता था।
मायावती को कोई संतान भी नह ई थी, इससे भी उसक वह िपपासा भड़क ई थी।
फर भी मायावती के च र म कोई दोष न था। उसक मानिसक भूख मन ही म थी।
अपनी मयादा, च र तथा दािय व का उसे पूरा ान था।
रावण क अव था अभी लगभग मायावती के बराबर ही थी। कहना चािहए,
एकाध वष कम ही थी। रावण िन , हंसमुख, िवनोदी, वीर और साहसी था। उ लास
और आकां ा से उसके र क येक बूंद भरपूर थी। माया को देखते ही रावण के ने
म मद छा गया। माया उसक साली–प ी क बड़ी बहन थी, अतः माया से वह न के वल
खुलकर हा य-िवनोद ही करता, ं य–िवनोद भी करने लगा। रावण के वभाव, िवनय,
वा य, सौ दय और पौ ष–इन सब पर मायावती िवमोिहत हो गई। एक अ ात आकषण
रावण के ित उसके मन म उ प हो गया। वह रावण को चाहने भी लगी और यार भी
करने लगी।
माधवी-म डप म अके ली वह असुर–स ा ी रावण ही के िवचार म कु छ अनमनी–
सी बैठी थी। उसका मन पर पर िवरोधी भाव से आ दोिलत हो रहा था। उसके आ ही
वभाव और दुदमनीय इि य-लालसा का नारी-धमनीित से चल रहा था। उसका
ेमी रमणी- दय पर पर िवरोधी आवेग से अधीर हो रहा था। एकाध बार रावण से
उसक कु छ एका त-वाता ई थी। असुरराज श बर ने उसका आ मीय क भांित अपने घर
म वागत कया था और स ा ी से अपने बहनोई का सब भांित स कार कर उसे संतु
रखने का बारं बार अनुरोध कया था। उस समय असुरराज पर देव और आय का एक
अिभयान होने वाला था। उसके िलए समूची असुरपुरी वैजय ती म भारी तैया रयां हो रही
थ । दूर–दूर के असुर भट स होकर रणरं ग मचाने वैजय ती म आ रहे थे। असुर-स ाट्
इस बार श ु से क ठन मोचा लेने क भीषण तैया रय म लगे थे। उसका बल श ु देव
िम पांचाल-नरे श दवोदास था। यह एक िनणायक यु का सू पात था, इसी से
असुरराज इस यु क ओर से बेखबर नह था। इसी से उसने अपने साढ़ू लंकापित रावण के
आित य का भार अपनी प ी मायावती पर डाल दया था। श बर मायावती को अ य त
ेम करता था। उन दन असुर, दै य और दानव क अपे ा सं कृ ित म आय से अिधक
सा य रखते थे। वे अपने को आय ही क शाखा म मानते थे। इसी से िववाह-मयादा उनम
आय ही के समान थी। मायावती भी आय-ललना क भांित ी-नीित तथा ी-धम को
समझती थी, य िप आय-ललना होने से वह अपने अवरोध म वत थी-ब धनमु थी।
उन दन असुर मिहलाएं आयपि य से अिधक वाधीनता तथा समानता का उपभोग
करती थ ।
मायावती जैसी आ ही वभाव क थी, वैसी ही मानवती भी थी। जब वह अपनी
गव ली चाल से हंिसनी अथवा हिथनी क भांित चलती थी, तब उसक शोभा देखते ही
बनती थी। इस समय अपने मन क चंचलता को िछपाने के िलए उसने सभी दासी-चे टय
को अलग कर दया था। के वल एक दानवी कं करी नंगी तलवार िलए लतागृह के ार पर
पहरा दे रही थी। अपरा न क सुनहरी धूप छन-छनकर लता-म डप म आ रही थी। इसी
समय रावण भी उपवन म घूमता आ वह आ प च ं ा। कं करी को नंगी तलवार िलए
म डप के ार पर खड़ी देख उसने अनुमान कया क अव य ही मायावती म डप मे है। वह
तेजी से कदम बढ़ाकर उसी ओर चला। कं करी को देखकर उसने हंसकर कहा–“लता-
म डप म य द वािमनी ह तो उनक सेवा म रावण का अिभवादन िनवेदन कर दे।’’
कं करी ने जब मायावती को रावण क िव ि क , तो उसक बड़ी-बड़ी
चमक ली आंख म एक मद आ गया। उ ेजना के मारे उसके उरोज उ त-अवनत होने
लगे। वह स म उठ खड़ी ई। कं करी पीछे हट चली गई। इसी समय रावण ने हंसते-हंसते
म डप म वेश करते ए कहा–‘‘देवी स ह , इस मंगलमयी सा य वेला म वन ी क
शोभा को आपने अपनी उपि थित से कै सा सजीव कर दया है! ऐसा तीत होता है क इस
माधवी लता से आवेि त म डप म छन-छनकर जो अ तंगत मरीिचमाली क व णम
रि मरािश एक हो गई है,ै उसे कसी जादूगर ने जैसे एक कर मू प दे दया है।’’
‘‘ओह, लंके र के वल वीर-िशरोमिण ही नह ह–चाटु कार भी वैसे ही ह। इसी गुण
ने शायद म दोदरी को मोह िलया है क कभी वह अपने आ मीय को याद भी नह
करती।’’
‘‘पर तु आपक आन द और ा क मू त तो उसी ने मेरे दय म अंकु रत क है।
तभी तो आपके चरण म ांजिल अपण करने इतनी दूर आया ।ं ’’
‘‘जाइए, बात न बनाइए। ांजिल उ ह चरण म अ पत क िजए जो नूपुर विन
से लंका के मिणमहालय को मुख रत करते ह। अपा म दान करने से पु य य होता है–
ऐसा नीितकार का वचन है।’’
‘‘आपका वचन माण है। क तु अभयदान िमले तो कु छ िनवेदन क ं !’’
मायावती हंस दी। उसने हाथ उठाकर अिभनय-सा करते ए कहा–‘‘अभय,
लंकािधपित, आपको अभय!’’
‘‘तो मुझे कहने दीिजए क रावण लंकािधपित नह , आपका दास है। उसे इन
चरण म ांजिल अ पत करने दीिजए।’’ हठात् रावण मायावती के स मुख घुटन के बल
बैठ गया।
मायावती ने भयभीत होकर इधर–उधर देखा। उसका मुंह ल ा से लाल हो गया।
उसने कहा–‘‘उ ठए, यह आप या कर रहे ह?’’
‘‘आराधना कर रहा –ं उस देवी क , िजसक अ ितम छिव मेरे र के येक
िब दु म ा हो गई है। मा करो सु दरी, यह रावण आपका दास है।’’ इतना कहकर
उसने उसके दोन हाथ अपने हाथ म लेेकर होठ से लगा िलए।
हठात् रावण के इस आचरण से मायावती िवचिलत-िवि मत हो गई। वह भीत-
च कत ह रणी क भांित कांपने लगी। उसके मुंह से बात न िनकली। एक अकथनीय आन द
से वह िव वल हो उठी, पर तुर त ही सावधान होकर उसने अपना हाथ ख च िलया और
कहा–‘‘यह या लंके र?’’
‘‘ वीकार करता ,ं मने अपराध कया है। क तु यह आपक इस अतुलनीय प-
माधुरी का स कार है। इस द योित क मानसी पूजा है। आप य हो ग ?’’
‘‘ नह ,ं पर तु आप मयादा से बाहर आचरण कर रहे ह।’’
‘‘देवी स ह , िन स देह अ कं चन आपक कृ पा के यो य नह , पर इस द
स दय क पूजा से तो आप मुझ दास को वंिचत मत क िजए।’’
‘‘यह या आप ं य कर रहे ह लंकेश?’’ मायावती ने अपनी शंसा सुनकर
असंयत होकर धड़कते ए दय से कहा।
‘‘नह देवी, म सच कह रहा ।ं म चाटु का रता नह करता। म आप पर मु ध ,ं
मेरा दय आप पर योछावर है।’’
‘‘यह तो आप म दोदरी के ित अ याय कर रहे ह।’’
‘‘म दोदरी को िन स देह म ाण से अिधक यार करता ,ं पर आपके द प
क तो म पूजा करता ,ं पर तु आपके ोध से भय खाता ।ं ’’
मायावती के आ हशील दय म वृि क लहर उमड़ने लग । उसने म द-म द
मु कराकर कहा–‘‘वीर वज लंकेश भी भय खाते ह ि य से, यह तो लंकेश के िलए शंसा
क बात नह है।’’ रावण के ने क तृ णा उभर आई, उसने कहा–‘‘आह, तब आप मुझ
पर एकदम िनदय नह ह।’’
‘‘यह आपने कै से समझ िलया?’’
‘‘आपके इस च छटा-सम उ वल हास से।’’
‘‘ क तु म ऐसी अकृ त नह ं क आपक तुित के िलए आपका आभार न
मानू।ं ’’
‘‘यह तो मेरे अ तःकरण क ा है।’’ फर एकाएक उ ेिजत होकर उसने
कहा–‘‘सच तो यह है क मेरा मन तुम पर अनुर है सु दरी! कहो, वह कौन बड़भागी है
िजसके िलए तुमने यह साज सजा है? वह कौन भा यवान् है जो तु हारे इन कमल-सी
सुग ध वाले अधर-प लव का चु बन करे गा? वणघट के समान तु हारे यह भरे ए कठोर
कु च आज कसके आ लंगन क ती ा म ह? ि ये, आज तुम मुझे रित दो। म लंका का
वामी, पौल य रावण काम-पीिड़त हो तुमसे न तापूवक रितदान मांग रहा ।ं म जब से
यहां आया –ं तेरी मनोहारी मू त दय म रख, रात- दन उसक आराधना करता ।ं ’’
इतना कहकर रावण अ य त उद भाव से दोन हाथ फै लाकर मायावती को अपने
आ लंगन म बांधने को आगे बढ़ा। उसका यह भाव देख और उसका अिभ ाय समझ
मायावती थर-थर कांपने लगी। उसने कहा–‘‘लंकेश, यह तुम या कह रहे हो? तुम मेरी
छोटी भिगनी के पित, मेरे स ब धी हो। म धम से तु हारी ये ा ।ं सोचो तो, मेरे पित यह
सुनगे तो या कहगे! तु हारे भाई कु बेर लोकपाल ि लोक मे िव यात ह। तुम भी धमाधम
को समझते हो–ऋिषकु मार हो। इसिलए ऐसा न करो। जो मेरा पित है,ै उसी के िलए म
शृंगार करती ।ं म असुर कु ल क ी –ं प ी !ं तु हारी र -सं कृ ित है, मेरे स व क तुम
र ा करो। कहो–वयं र ामः।’’
रावण ने हंसकर कहा–‘‘कह असुर-रमिणय के भी पित आ करते ह? फर यह
एका त रित का िनयम तो मानव म है। इसिलए मेरी अिभलाषा तु ह पूण करनी पड़ेगी।’’
इतना कहकर रावण ने झपटकर मायावती को अपने अंकपाश म दबोच िलया।
मायावती बाज के पंजे म दबी ई कबूतरी क भांित छटपटाने लगी।उसका ृंगार
अ त त हो गया, व फट गए। के श िबखर गए। वह के ले के प े के समान कांपने लगी।
मायावती क दुदमनीय वृि भी ती अिभलाषाि से उ ी हो उठी। कांपते ए मृद-ु
म द वर म कहा–‘‘नह , नह मत करो, ऐसा मत करो!’’
इस पर रावण ने उसे और भी कसकर अपनी बिल भुजा म भर िलया और
उसके होठ के िनकट अपने उ ह ठ ले जाकर कहा–‘‘ि ये, तू मेरी आरा या है!’’
उसने अपने अधर मायावती के अधर से िमला दए। मायावती भी आवेश म आ
रावण के अंक म समा गई। वह भूल गई अपना ी-धम, राजपद-मयादा, असुरराजमिहषी
का गौरवमय पद। अपने पित असुरराज को वह भूल गई। क ाक को भूल गई। िव
क सब बात को भूल गई। उसने उ म हो, सब कु छ भूल, उस नायक के आ लंगन म
अधखुले ने के साथ अपना शरीर अ पत कर दया।
37. असुर का िव म

व -गजना के समान श बर के श द दोन के कान म पड़े। असुरराज कह रहा


था–‘‘अरे िव वा मुिन के पु , तेरे श कहां ह, श ले। तू कु लीन है, जापित का वंशधर
है, लोकपाल का भाई है। म तेरा िनर वध नह क ं गा।’’
असुर-स ाट् के ये वा य सुनते ही मायावती मू छत हो गई। रावण ने उसे छोड़
दया। वह नीची आंख करके श बर के आगे खड़ा हो गया।
श बर ने कहा–‘‘श हण कर रावण!’’
‘‘नह , आप मेरा िनर ही वध क िजए।’’
‘‘यह मेरे कु ल क मयादा नह ।’’
‘‘ क तु म श हण नह क ं गा।’’
‘‘तो म लयु कर।’’ श बर ने अपने हाथ का शूल दूर फक दया। पर तु रावण
उसी भांित िसर नीचा कए खड़ा रहा। श बर ने कहा–‘‘म िवल ब और आ ा क अव ा
सहन नह कर सकता, रावण।’’
‘‘म आपसे यु नह क ं गा।’’
‘‘नह कै से करे गा रे , ल पट, पर ीगामी, चोर!’’ असुर ने एक लात मारी। लात
खाकर रावण भूिम पर जा िगरा। असुर ने कहा–‘‘यु कर!’’
‘‘नह , क तु तुम अब मेरा वध करो असुरराज।’’
‘‘वध नह , पाद- हार क ं गा।’’
‘‘पाद- हार नह । अनु ह मांगता ,ं तुम मेरा वध करो।’’
पर तु असुर ने फर रावण क छाती पर लात मारी। इस बार रावण लात खाकर
िगरा नह । दो कदम पीछे हट गया। उसने कहा–‘‘असुर श बर, अब बस करो। ब त आ।
दोष-िनवारण हो गया। म तु ह मा करता ,ं अब मुझे जाने दो।’’
‘‘तू ऐसा जघ य अपराध करके जीिवत जाएगा मेरी पुरी से!’’
‘‘ क तु मने तु हारा कोई अपराध ही नह कया।’’
‘‘अरे ल पट, अपराध नह कया? तूने या मेरी प ी से बला कार क चे ा नह
क ?’’
‘‘ ी और पृ वी वीरभो या ह– फर असुर क ि य पर कसी का एकािधकार
नह , वे सभी के िलए ह।’’
‘‘ क तु मेरी यह लात के वल तेरे िलए है।’’ असुर ने फर रावण के व पर लात
मारी। इस बार रावण ने असुर का पैर पकड़कर उसे अपने िसर के चार ओर घुमाकर दूर
फक दया। श बर घूमते ए च क भांित एक धनुष दूर जा िगरा। इस बीच रावण ने
अपना कु ठार उठा िलया।
श बर भी उठकर शूल लेकर रावण पर झपटा। उसने भरपूर वेग से शूल रावण के
ऊपर फका। शूल रावण के पा व म घुस गया। पर रावण ने परशु िसर पर घुमाकर असुर
पर आघात कया। असुर घूमकर वार बचा गया, क तु वह घुटन के बल िगर गया। रावण
ने फर परशु का हार कया। असुर ने लेटकर हार बचा, रावण के पैर म घुस, उसे िगरा
दया। परशु हाथ से छू ट गया। दोन यो ा पर पर गुंथ गए। दोन एक-दूसरे पर लात-मु
का हार करने लगे। दोन एक-दूसरे को दलमल करने लगे। दोन के शरीर और नाक-मुंह
से र झरने लगा। लड़ते-लड़ते ही दोन यो ा फर खड़े हो गए। असुर ने िवकराल ख ग
उठाया। रावण ने अपना परशु िलया। दोन घात- ितघात करने लगे। रावण बल परा म
से िभड़ गया। अ त म असुर ने ख ग का रावण के िसर पर हार कया। उस हार से
रावण का करीट िगर गया और वह बेसुध होकर कटे वृ क भांित धरती पर िगर गया।
श बर ने उसके हाथ-पैर बांधकर अ धकू प म डलवा दया।
38. श बर–सं ाम

मायावती क ओर यान देने का श बर को समय नह िमला। इसी समय चर ने


उसे सूचना दी क देव और आय क सेनाएं वैजय तीपुरी क सीमा लांघ चुक ह।
िग र ज म आ प च ं ी ह। श बर ने भी त ण ही असुर को स होने का संकेत कया।
भेरी, मुरज और शंख बजने लगे। दुदं िु भ धमक उठी। हाथी चंघाड़ने लगे। घोड़े िहनिहनाने
लगे। असुरवािहनी बरसाती नदी के वेग के समान दुमद श ुओ का दप चूण करने बढ़ चली।
संहल के िवराट हाथी पर छ -चंवर लगाकर असुर-स ाट् बैठा। वैजय तीपुरी और
िग र ज के बीच का माग सेना से आपूयमाण हो गया। उसक सेना म दस हजार रथ और
साठ हजार यो ा असुर थे। उसके िम , बा धव और सेनापितय म रोमा, महाकाम,
संहदं क पन, त तुक छ, दुरारोह, सुभाय, व पंजर, धू के तु, मथन और िवकटा
अ य त परा मी थे। छ ीस छ धारी राजा असुर-स ाट् के नीचे यु करने जा रहे थे।
िग र ज क उप यका म पांचालपित दवोदास और महाकोशल वामी के
राज संह आय दशरथ अजेय क संयु वीरवािहनी श ु क ती ा कर रही थी।
दवोदास क सेना म देव, नाग, ग धव और आ द य आ द सभी सुभट थे। सुबा , िनघात,
मुि क, गोहर, लंब, माथ, कटकिपगल आ द एक सह अधरथ थे। अंकुटी, सोिमल,
देवशमा, िपतृ
शमा,उ भट,महाभट,कु मारक,वीर वामी,सुराधर,भ डीर, संहद , ू रकमा,शबरक,
हरद , आ द अधसह पूणरथ थे। य सेन, इ वमा, िवरोचन, कु भीर, द पत, कं पन
आ द तीन सौ ि रथ और बा श ं ाल, िवशाख, च ड आ द दो सौ ि रथ थे। वीर,
वीरवमा, अमराम, चं द , संहभट, ा भट आ द एक सौ पंचरथ थे। उ वमा अके ला
षड् रथ था। राजा सह ायु का पु शतानीक महारथ के यूथ का वामी था। इनके
अित र महारथ के यूथपित, अितरथ के यूथपित, पूणरथ के यूथप अनेक थे। इन सब
यूथपितय के अिधपित अयो यानाथ दशरथ थे।
दोन ही प के भट आमने-सामने हो यु करने को िवकल हो उठे । आय के
धान सेनापित ने महाशुिच ूह का िनमाण कया। उस ूह के दि ण पा व पर साठ
अितरथ यूथप और वाम पा व मे साठ पंचरथ यूथप अपने यूथ सिहत आसीन ए। म य म
गज-सै य और के म पांचालपित दवोदास और उसक देवसेना। अ भाग म दशरथ
अपने दस सह अितरथ के साथ। श बर ने अपनी सेना का अधच ूह रचा। उसके
म य म गज-सै य के साथ वह वयं रहा।
ूहब होने के बाद ही दोन सेना म रणवा बज उठे । देखते-ही-देखते दोन
ओर से श चलने लगे। जय-जयकार का महाश द होने लगा। बाण से आकाश िछप गया।
श के पर पर टकराने से आग िनकलने लगी। हाथी, घोड़े और सुभट मर-मरकर िगरने
लगे। उनसे िधर क नदी बह चली, मृत वीर के शरीर ाह-से तैरने लगे। कोई सुभट
सुभट से करने लगा। कसी ने अधच बाण से कसी का िसर काट िलया। कसी के
मम थल म बाण घुस जाने से वह ची कार कर घू णत-सा भूिम पर िगर गया। देव क
िवकट मार से िवकल होकर असुर इधर-उधर भागने लगे। यह देख श बर ने बाण क
िवकट वषा का दवोदास के सारथी को मार दया। उसके घोड़े भी मर गए। यह देख असुर
ने बड़ा भारी जयनाद दया। इस पर दवोदास रथ से कू दकर श बर के रथ पर चढ़ गया।
उसने उसका धनुष काट दया तथा वजा िगरा दी। यह देख बड़े-बड़े िवकट असुर ने
पांचालपित को घेर िलया। िव ाधर के राजा िवकृ तदं पंचरथ ने यह देखा तो वह समु -
गजना क भांित महानाद करता आ असुर के दल पर िपल पड़ा। ग धव का िवकट
िव म देख असुर भयभीत होकर भागने लगे। श बर ने यह देखा तो क ं ार भरकर अपना
रथ उसी ओर बढ़ाया और बल परा म से उनके सारथी, वजा, रथ तथा घोड़ को मार
कु डल समेत उसका िसर काट िलया।
महाराज दशरथ के साथ कै के यी धनुष-बाण ले राजा के पृ क र ा कर रही थी।
महाराज दशरथ अपने यूथप को ललकारकर िवकृ तदं का बदला लेने आगे बढ़े। उनका
ोध देख और च ड बाण-वषा से ाकु ल हो असुर ची कार कर भागने लगे। कु छ बाण
से िव हो-होकर मरने लगे। इस पर कं कट-अंकुरी, च ड और कालक पन–इन चार असुर
यूथपितय ने बाण-वषा से दशरथ के रथ क धि यां उड़ा द । घोड़े मार डाले, च तोड़
डाले। इस पर महाराज दशरथ रथ से कू दकर ख ग और च चलाने लगे। असुर यूथपितय
ने उ ह चार ओर से दबोच िलया। उनका अंग बाण से बंधकर छलनी हो गया। इस पर
िवकट साहसकर रानी कै के यी ने एक हाथ म च को संभालकर घायल राजा को रथ पर
बैठाकर बाण-वषा करनी आर भ कर दी।
पांचालपित दवोदास ने दूर से महाराज दशरथ का यह संकट देखा। वह अपने दस
सह अितरथ को ललकारकर उधर बढ़ा। उसने िवकट परा म से दशरथ का मू छत
शरीर अपने रथ पर डाल, उ ह िनरापद थान म भेज दया। फर वह दूसरे रथ पर आ ढ़
आ, िजसम सोलह यामकण घोड़े जुते थे। अब उसने कालच धनुष पर िवकट महा
चढ़ाकर उसका हार कया। यह महा असुर यूथपितय को काट-काटकर ढेर करने लगा।
इस समय तक हाथी, घोड़े और यो ा इतने मर चुके थे क चार ओर रण थली मे कब ध
दीख पड़ते थे। इस कार असुर का मदन देख असुरराज श बर दवोदास के रथ क ओर
बढ़ा। उसका सूय के समान वल त रथ अपनी सह घं टय क रण कार से रण-िनम ण
देता आ-सा पांचालपित के स मुख आ खड़ा आ। अब दोन महावीर ने ऐसा िवकट यु
कया क असुर, देव, ग धव, मनु य सब कोई हाथ रोककर उनका देखने लगे। देखते-
ही-देखते दोन के रथ के सारथी मर गए। रथ क धि यां उड़ ग और दोन िवरथ हो
पर पर ख ग-यु करने लगे। दोन ने एक हर च ड यु कया। उससे शरीर से र क
सह धाराएं बह चल । इसी समय अवसर पाकर दवोदास ने श बर का िसर काट िलया।
िसर कटने पर भी दो मु त तक उसका कब ध लड़ा। असुर का कब ध िगरते ही देव ने
िवजय-शंख विन क । असुर भयभीत होकर र के क चड़ म लथपथ यु -भूिम से भाग
चले। इसी समय सूय अ ताचल को गए। पांचालपित दवोदास िवजय के नगाड़े बजाता
आ पीछे लौटा।
39. सहगमन

भूलुि ठता मायावती क उपे ा कर श बर रण े क ओर चल दया था। जाने से


पूव उसने मायावती से भट भी नह क । वह पुं ली थी। मानवती और भावकु मायावती
पित क इस अव ा, अपने पाप और रावण के अपराध से अिभभूत हो, चैत य आते ही मृ यु
क कामना करने लगी। श बर को वह यार करती थी। श बर ने भी माया को सदैव
ाणािधक समझा था। उसके जीवन म यह थम ही ण था जब उसक अव ा ई–
अ ित ा ई। पर तु वह िजतना ही िवचार करती, उसे अपना अपराध गु तर तीत होता
जाता था। उसने यह िनणय कया क वह पित से द ड क याचना करे गी, फर अि - वेश
करे गी। उसने मौन धारण कया, आहार भी हण नह कया, ृंगार और िवलास उसने
याग दया। वह समरांगण से पित के लौट आने क ती ा करने लगी। सूखे मृणाल क
भांित वह सुकुमारी मायावती मुरझाकर ीहीन हो गई। इसी समय उसे यु े से पित के
िनधन क दा ण सूचना िमली। मायावती सुनकर काठ हो गई। राजमहल दन से भर
गया। नगरी म िवषाद छा गया। उस दन नगरी म कसी ने दीप नह जलाया। कसी ने
भोजन नह कया। उस दन पौरवधु का ृंगार नह आ।
स ाट् के शव को यो ा रणांगण से ले आए। ितमागृह म राजशव क ित ा ई।
शव का सं कार कर, उसे अग -क तूरी-च दन-गोरोचन से च चत कर ेत कौशेय से
आ छा दत कर, उसके चार ओर सह घृत के दीप जलाए गए। शोकपूण वा गभगृह म
बजने लगे। असुर पुरोिहत ने म पाठ करना आर भ कया। बिल, अचना और अ येि के
अ य उपचार स प होने लगे। मायावती ने असुरराज-मिहषी क ग रमा धारण क ।
अ ुिवमोचन नह कया। सहमरण को स होकर िचता तैयार करने क आ ा दी।
म न कया, शृंगार कया, अंगराग लगाया और मंगलिच न अंग पर धारण कए। फर
वह पित के िसर को गोद म लेकर बैठ गई। अग और च दन क िचता रचकर तैयार क
गई थी। घृत और कपूर थान- थान पर उसम रख दए गए थे। असुर-पुरोिहत म पाठ
कर रहे थे, और असुर- मुख बिल-पशु ला-लाकर डाल रहे थे।
अभी रावण अ धकू प म ब दी था। मायावती ने उसे ब धनमु करके अपने
स मुख लाने क आ ा दी। स मुख आने पर मायावती ने कहा–‘‘रा से , अब तुम अपनी
पुरी को लौट जाओ, म तु ह मा करती ं और तुमसे मा-याचना करती ।ं मा करती
ं तु हारे अपराध-अिवनय-अनीित-आचरण के िलए और मा-याचना करती ं क
अितिथ और आ मीय से मेरे पित ने िव ह कया, इसिलए इस असुरपुरी म तथा
असुरराज-महालय म तु हारे िलए कु छ भी अदेय नह है। र , मिण, मािण य, दासी, दास
जो कु छ तु ह चे, ले जाओ। तुम मेरी छोटी बहन के पित हो, मुझे उसी के समान ि य हो,
जाओ मेरा आशीवाद म दोदरी से कहना। और कहना–उसक बहन ने उसके िलए स पथ
द शत कया है।’’
इतना कहकर मायावती मौन हो गई। उसने ने ब द कर िलए। रावण ने
कहा–‘‘देिव, इस असुर–िनके तन म य द स य ही मेरे िलए कु छ भी अदेय नह है, तो तुम
अपने ही को मुझे दे दो। इसके बदले म मेरा लंका का स पूण सा ा य, मेरा यह अधम
शरीर, मन-वचन- ाण तु हारा है, तु ह इसक यथाथ वािमनी हो। इस भयानक िवचार
को तुम याग दो। मुझ अनुगत दास पर स हो, अपने वणगात का य दाह न करो। म
मयादा के ितकू ल नह कह रहा ।ं ’’ क तु माया ने उ र नह दया।
रावण ने आतभाव से कहा–‘‘ सीदतु, सीदतु!’’ उसने कातर हो दोन हाथ पसार
दए।
मायावती ने ने खोले। उसने कहा–‘‘हे िव वा मुिन के पु , यह काम-िवकार का
काल नह है। म िजस पु ष क प ी ,ं उसी के साथ सहगमन क ं गी। जाओ तुम,
आयु मान्, तु हारा क याण हो–िशवा ते स तु प थानः!’’
माया ने दोन हाथ आकाश म उठा दए। रावण ने अ ुिवमोचन करते ए
कहा–‘‘ सीदतु, सीदतु!’’
माया ने उसी भांित आंख ब द करके कहा–‘‘माभूत,् माभूत्!’’
रावण ा से झुक गया। उसने माया क तीन प र माएं क । फर दीघ िनः ास
लेकर बोला–‘‘तब जाता ं देिव, देव और मानव के र से ब धुवर श बर का तपण
करने।’’
और वह चल दया। आंख म अ धकार और दय म तूफान भरे , अ ात दशा क
ओर–अपने भीषण कु ठार को क धे पर धरे ।
40. ग धव क नगरी म

िवकल और िथत रावण क धे पर परशु रखे, िख -मन, वन-वन भटकता-घूमता


रहा–कामो म -सा, मदग धम गजे -सा, िजसक हिथनी मर गई हो। कभी वह लाप
करता, कभी ल बी-ल बी सांस ख चता। कभी कसी िशला-ख ड पर िन े पड़ा रहता,
कभी कसी सागर-सरोवर के तट पर बैठ उसक लहर िगनता। भूख- यास का भी उसे ान
न रहा। शरीर-िव यास का उसे िवचार न रहा। के वल मायावती क मोिहनी मू त उसके
ने म बसी थी। उसी को अपने ाण म लय कए, वह म मातंग-सा रा से रावण,
अपनी वण-लंका, र -सा ा य और उद बा बल को भी भूल गया।
घूमता-भटकता वह ग धव के देश म जा प च ं ा। आजकल पेशावर से लेकर
डेरागाजीखां तक जो देश है, वह उस काल म ग धव का देश कहाता था। यह देश िस धु
नद के दोन ओर होने से अित रमणीय था। यहां पर मनोरम वनो ान देख वह ह षत
आ। उ ान म अनेक जाित के वृ लगे थे, िजनके सुवािसत मा त ने उसके जलते ए
दय को शीतल कर दया। वहां के सुपुि पत लतागु म और मनोरम िनझर को देख वह
ह षत आ। वह उसने ग धव के राजा िम ावसु को देखा। िम ावसु के साथ उसक
पु ी िच ांगदा थी। िच ांगदा का प पावती के समान द था। उस नवल प-यौवन-
स प ा अिन सु दरी ग धव-बाला को देख रावण ति भत रह गया। उसका प संसार
के ने को आन द देने वाला था। िम ावसु ने अध-िवि ाव था म रावण को उस अगम
ग धव- े म िवचरण करते देख, उसके िनकट आकर कहा–‘‘तू कौन है आयु मान्, वीर
ग धव के इस अगम े म कै सेे िनभय घूम रहा है? या तू आस िवपि से असावधान
है?’’
रावण ने ग धव के राजा को और उनक क या को देखकर िख मन से कहा-“
मुझ िवप -िवद ध, दुभा य-पीिड़त जन से आपका या योजन है? मनोरम थान समझ,
हैममा त से अपने िवद ध ाण को शीतल करने यहां चला आया ।ं यह य द अगम े
है तो म अभी चला जाता ।ं आप न ह । िवशेषकर इस सु दरी को तो म ु करना ही
नह चाहता। म जाता ,ं आपका क याण हो!’’
रावण के ऐसे वचन सुनकर िम ावसु ग धवराज ने हंसकर कहा–‘‘तेरी वाणी दृढ़
है, दृि म तेज है, अचल गात है, ल ब बा ह, श त ललाट है, िवशाल व है, ीण
क ट है, तू िन स देह े कु ल का पु ष है। पर तु िख है, यह तेरे भारी-भारी ास से
मने जान िलया। म ग धव का राजा िम ावसु ग धव ं और यह मेरी ि य पु ी िच ांगदा
है। म तुझ पर स ।ं कह, म तेरा या ि य क ं ?’’
रावण ने ग धव के राजा के ये वचन सुनकर कहा–‘‘सुनकर सं ह षत आ। म
िव वा का पु पौल य रावण ।ं लंका का अधी र ।ं क तु आप ये ह, पूजाह ह। म
आपका अिभवादन करता ,ं और आपक पु ी कमल-नयनी, पु पलितका-सी इस बाला
का अिभन दन करता ।ं ’’
‘‘ वि त, पौल य रावण, तेरा यश मने सुना है। तेरा शौय भी मुझे अिव दत नह
है, पर तु तू ि ल - ला त य है?’’
‘‘भा यदोष से म ि यजन-िवछोह से दुिखत ,ं म बड़ा भा यहीन ।ं ’’
‘‘पौल य, इस ग धव-लोक म तेरा वागत है। स हो! यह मेरी ाणािधका
पु ी िच ांगदा है। यह तेरा मनोरं जन करे गी। तेरे ि यजन-िवछोह से िवद ध दय को
आ याियत करे गी। इसे म तुझे देता ।ं तू, सिमधा ला, अ याधान कर।’’
रावण ने सिमधा ला अ याधान कया। ग धव ने अि क सा ी म अपनी
अिन सु दरी क या रावण को दान कर दी। क या रावण को देकर ग धवराज चला
गया। िच ांगदा पु पभार से लदी लता-सी ल ावगुि ठता रावण के पास खड़ी रही।
रावण ने कहा–‘‘कह क याणी, अब तेरा या ि य क ं ?’’
िच ांगदा ने कहा–‘‘हे नरशादूल, अब िख ता याग दीिजए। आपको कस ि य
का िवछोह आ, मुझसे किहए और कस सेवा से आप सं ह षत ह गे, यह बताइए।’’
रावण ने कहा–‘‘िविच संयोग है, ि य! येक दुःख क िच क सा है। अ धकार
के बाद काश है। िनराशा के बाद आशा है। म तो तेरे दशन ही से स प हो गया। तेरे
साि य का सुख अवणनीय है।’’
‘‘वह सामने एक सरोवर है। चिलए, वहां आप िव ाम कर। वह मेरी सिखयां भी
ह। आपको अ य-पा से स कृ त करगी।’’
रावण ने सरोवर-तट पर जाकर देखा — उसम नीलमिण-सा व छ जल भरा है।
बड़े-बड़े र कमल िखल रहे ह, उन पर भ रे गु ार रहे ह। लता-पु ष से थान सुशोिभत
है। वह बाला एक लता-म डप म पु प के एक िबछौने पर बैठ गई। उस समय उसक ऐसी
शोभा तीत ई मानो शरत् काल के मेघ पर िवराजमान च मा क कला हो। उसक इस
द सुषमा को देखकर रावण आ य और उ क ठा से भौचक रह गया। इसी समय उसे
तीत आ क मानो आकाश से उतरता आ तेजपुंज आ रहा है। उसने सु दरी िच ांगदा से
पूछा–‘‘ि ये, यह या चम कार है?’’
िच ांगदा ने कहा–‘‘आयपु , ये सब िव ाधरी, ग धव , अ सराएं, नाग-क याएं
मेरी सिखयां ह।’’ वे सब अपने हाथ म कोई ताजा कमल-फू ल, कोई ग ध-पराग, कोई
अंगराग, कोई वीणा-मृदग ं ष खंजरीक, कोई गोरोचन, कोई मयूरपु छ िलए वहां आ
प च ं । उस सजीव प-सागर को देख रावण िवमूढ़ हो गया। उन सु द रय के बीच िघरी
ई िच ांगदा न के बीच म च कला के समान सुशोिभत होने लगी। वह उ फु ल
शतदल कमल के समान स वदना, चलचंचल मकर द–लोलुप मरलोचना, हंसगािमनी,
कमल-ग धा िच ांगदा ग धवरा य-क या, काम-संजीवनी-सी तीत हो रही थी। उसके
लहर के समान मनोहर ि विलयु म दोदर को देख रावण इस कार चलायमान हो
गया जैसे समु च कला को देख चलायमान हो जाता है। रावण अपने चार ओर कपूर-
च दन तथा अगर के वृ से आती ई सुग ध से म हो गया। उसने आन दाितरे क से
िवभोर होकर िच ांगदा से पूछा–‘‘ि ये, इस मनोरम थान का नाम या है?’’ िच ांगदा
ने कहा–‘‘ वािमन्, यह मसर तीथ है। अब आप इस पुनीत सरोवर म ान कर अपना
म दूर क िजए।’’ इतना कहकर उसने सिखय को संकेत कया। अब वे सब घेरकर रावण
को सरोवर के तट पर ले ग । उन द ांगना के साथ रावण ने यथे जल-िवहार कया।
फर उन द ांगना ने रावण को नवीन व ाभरण धारण कराए। ि यतमा
ग धवनि दनी-सिहत उसे द ासन पर बैठाकर वणथाल म िविवध कार के वा द
भुने मांस, िम ा , पकवान परोसे। सुगि धत मसालेदार म मिणकांचन पा म भर-
भरकर पीने को दया। रावण उन द ांगना के साि य म, उस मनोरम उपवन म,
वा द उ म भोजन और सुगि धत म पाकर भूल गया असुरपुरी के अ धकू प क वेदना
और परम पवती मायावती को।
इसी कार सेवा-स कार, ान-अचना, आहार-िवहार से सब भांित तृ कर,
रावण क सब लाि त हरण कर िच ांगदा उसे द कनकरथ म बैठाकर अपने मिणमहल
म ले गई। वह मिणमहल भी बड़ा िविच था। उसम अनेक गु और मांगिलक भवन थे।
सूय के समान तेज वी उसका काश था। उसम इ नील और महानील मिणय क वे दयां
रची थ िजनम सोने क सी ढ़यां बनी थ । वे दय म सोने क जािलयां लगी थ । उसका
फश फ टक मिण का था, िजसके जोड़ म हाथीदांत लगा था। सीधे, िचकने और ब त ऊंचे
अनेक मिणमय ख भ से उसक शोभा अकथनीय हो गई थी। छत म और दीवार म मोती-
मूंगा-मािण य और चांदी-सोने का काम कया आ था। उसम ब मू य िबछौने िबछे थे।
उस मिणमहल म अनिगनत द ांगनाएं रं ग–िबरं गे सु दर व पहने अपनी प–छटा से
दशा को आलो कत करत , क ठ म पु पहार पहने इधर-उधर अ त- त भाव से आ-
जा रही थ । उनके तेज तथा उनके पहने ए र ाभरण के काश से वह मिणमहल
जगमगा रहा था। ठौर-ठौर पर अनेक मोहक और अ भुत प ी वण- पंजर म टंगे थे।
उनके कलरव से मिणमहल मुख रत हो रहा था।
धीरे -धीरे स या का अित मण आ। राि ई। महल अनिगनत सुगि धत तेल
के दीप तथा र दीप से आलो कत हो उठा।
सिखयां िच ांगदा और रावण को अब अपने शयनागार म ले ग । वहां एक ब त
ऊंचा अ भुत पलंग िबछा था, िजस पर ब मू य कोमल व िबछा था। उस पर च मा के
समान एक छ लगा था। िच ांगदा पित के अंक म उस श या पर जा बैठी। द ांगनाएं
च दन और मयूरपु छ क पंिखयां लेकर उनक हवा करने लग । कु छ चरण-सेवा म आ
लग ; कु छ मरकत के पा म सुवािसत म ढाल-ढालकर देने लग ; कु छ वण-थाल म
शूकर-ह रण और भसे का भूना मांस और िविवध भो य पदाथ ला-लाकर िनवे दत करने
लग । कु छ अंगराग, ग ध- अंग और व पर लगाने लग , कु छ के शर-क तूरी िमि त
ता बूल अपण करने लग । कु छ ने कोमल त तुवा संभाले, कु छ ने मधुर कं ठ से आलाप
लेना आर भ कया। कु छ मृदग ं ले बैठ । कु छ नृ य करने लग । इस कार रावण उस सुख-
सागर म जैसे खो गया। उसने िविवध रास-रं ग िवहार कया। सब द ांगना ने
िच ांगदा क अनुमित पाकर व छ द आहार-पान कया। सुवािसत म पी-पीकर तथा
भुने ए वा द मांस खा-खाकर वे सब भी असंयत होने लग । वे पर पर एक-दूसरे का
आ लंगन करने, हंसने, चूमने और ठठोिलयां करने लग ।
द ग धव-क या िच ांगदा के साथ रित-िवलास कर ा त- िमत रावण सो
गया। म दरा से म द ांगनाएं भी उस के िल-भवन म, जहां िजसे थान िमला, सो ग ।
अधराि अब तीत हो रही थी। हास-िवलास- ड़ा और िवहार से वे थक गई थ ।
म दरा के भाव से बेसुध हो वे सब इधर-उधर सो ग । वह के िल-भवन उस समय
शर कालीन आकाश क शोभा धारण कर रहा था। कसी ी के के श खुलकर िबखर गए,
कसी के फू ल के गजरे टू टकर िगर पड़े, कसी के आभूषण इधर-उधर िबखर गए। म पान
के भाव और नृ य क थकावट से चूर-चूर हो द ांगनाएं अचेत सोई पड़ी थ । ब त के
व ा द उनके शरीर से पृथक् हो गए थे। ब त के क ठहार टू ट-टू टकर भूिम पर िबखरे पड़े
थे। कु छ सु द रय के हार उनके तन के बीच म पड़े उनक सांस के साथ ऊपर-नीचे हो
रहे थे। उनके मुंह से म दरा क म दर ग ध आ रही थी। अनेक मदाएं म दरा से मदो म
हो पर पर आ लंगन कर एक-दूसरे से िलपटी पड़ी थ । इस समय वे एक गुंथी ई सु दर
फू ल क माला-सी सज रही थ । रात गल रही थी, सब कोई सो रहे थे। के वल क म सोने
के आधार पर रखे ए मिणदीप ही उन सु दर रमिणय के प-सागर को देख रहे थे। इन
द ांगना म कोई गोरी, कोई काली, कोई सांवली और कोई वणवणा थी। इन
सु द रय के कान के हीरे के कु डल क अम द आभा से वह कमरा ऐसा जगमग कर रहा
था, मानो तारागण के काश से आकाश देदी यमान हो रहा हो। नशे क झ क म वे ग धव-
बालाएं जहां थ , वह सो गई थ । उनक बगल म दोन ओर अनेक व तुएं पड़ी थ ।
मृदगं वाली मृदगं के साथ, वीणावाली वीणा को अंक म िलए और िडमिडम बजानेवाली
िडमिडम के साथ सोई पड़ी थी।
रा सराज रावण सो रहा था। वह उस समय सघन घन याम जलधर क शोभा
धारण कए ए था। उसके शरीर पर सुगि धत र च दन का लेप हो रहा था। उसके
मदरं िजत िनमीिलत लाल ने और िवशाल भुजाएं, उस समय अ य त शोभनीय तीत हो
रही थ । पयक पर फै ली ई उसक भुजाएं, िजनम वण के भुजबंध बंधे थे, खड़े ए ु
भुजंग के समान दीख रही थ । उसके क ध वृषभ के समान थे। उसक सांस के साथ पान,
पूग और म क ग ध आ रही थी उसका वण-मुकुट अपने थान से हट गया था। सोते ए
रावण के मुख पर उसके कण-कु डल बड़े सु दर लग रहे थे। सोया आ रावण ऐसा तीत
होता था, जैसे गंगा म गजराज पड़ा सो रहा हो। रावण क बगल म ही िच ांगदा सोई
पड़ी थी। उसक सुषमा िनराली थी। उसके गौर वण पर पु पाभरण अपूव शोभा िव तार
कर रहे थे। उसका लाव य अपूव था। उसके अंग पर मकड़ी के जाले के समान महीन व
थे, िजनम छन-छनकर उसका वणगात अपूव शोभा-िव तार कर रहा था। कमल क
पंखुड़ी के समान उसके लाल अधर म द-म द िहल रहे थे। वह कोई सुख- व देख रही थी।
ऐसा तीत होता था जैसे च मा क चांदनी वहां िसमटी पड़ी हो।
41. ग धवपुरी से थान

कु छ काल रावण ने ग धव-कु मारी के साथ यथे िवहार कया। वह उस


आन दलोक म मन रमण करता रहा। सुवािसत ग धव सुरापान कर और शील- प
और कोमल हाव-भाव म अि तीय ग धव-कु मा रय के साथ नानािवध हास-िवलास और
रित कर जब वह तृ आ, तो उसने वहां से चलने का िवचार ग धव िच ांगदा पर कट
कया। सुनकर िच ांगदा िवकल हो गई। ग धवराज को जब रा से का यह िवचार ात
आ तो उसने स मन वेदी रच, ढाई-ढाई मन क हजार िवदरी वण, र ाभरण से तथा
अनेक कार के ब मू य व से भरे सौ ऊंट, सात हजार घोड़े, पांच हजार हाथी और एक
हजार प-लाव यवती कशोरी कु मारी ग धव-क याएं तथा सात देश रावण को वेदी पर
संक प कर दए। सब ग धव ने उ सव मना रात-भर पान-गो ी क ।
अ त म रावण ने एका त पा अपने सुर िम ावसु ग धव से कहा–‘‘हे पू य, मेरा
एक गूढ़ उ े य है, िजसके कारण म स पूण भरतख ड और आयावत म छ भाव से
मण कर रहा ।ं शी ही राजप र छद-सिहत आकर आपक पु ी और भट को हण
क ं गा।’’ उसका गूढ़ अिभ ाय समझ ग धवपित ने कहा–‘‘जैसी तेरी इ छा, म तुझ पर
स ।ं कह, म तेरा अब और या ि य क ं ?’’
रावण ने ब ांजिल हो सुर को णाम कया, उसक प र मा क । रावण ने
पूछा–‘‘तात, आप या बता सकते ह क इस समय भरतख ड म अजेय कौन है, िजनसे म
यु -याचना क ं ?’’
इस पर िम ावसु ग धव ने कहा–‘‘पु , आयावत म महादुजय सूयवंशी दि ण
कोशल-नरे श अनर य ह। दूसरे महािव म दशरथ अयो यापित ह। आय का यह सूयवंश
हमारा पर परा का वैरी है। म उस पुरातन वैर क बात तुझसे कहता –ं जब दस राजा
के यु म बल तापी यदु, अनु, ु ◌ु आ द का िनधन आ, तब ु ◌ु के पु अंगार ने
पि मी आनव-नरे श अ को जीतकर वहां अपना रा य थािपत कया। पर तु सूयकु ल
के च वत मा धाता ने उ ह परािजत कर खदेड़ दया। पीछे मा धाता का वध जब मथुरा
के असुर ने कर डाला, तब अंगार के पु ग धार ने ग धार का यह रा य थािपत कया
तथा गा धार क यह नगरी बसाई। पर तु ये आयजन जब-तब हम पर आ मण करते ह।
अभी थोड़े ही काल पूव मने मा धाता के पु कु स को यु म ब दी बनाया था, िजसके
मोचन के िलए उसके भाई मुचुकु द और अ बरीष ने ग धव पर अिभयान कया था। अब
कु स तो ल ा के मारे रा य छोड़ नमदा तट पर चले गए ह और मुचुकु द ने मािह मती
बसाई है, िजसे हैहय मिह म त ने जय कर अपनी राजधानी बनाया है। तब वहां हैहय-
तालजंघ के बल से बली कातवीय अजुन सह बा रा य कर रहे ह। अ बरीष िवकट
यु कता थे। सो इस समय दशरथ-अनर य आयावत म और कातवीय हैहय अजुन
भरतख ड म अजेय पु ष ह। पर तु इनसे िबना चतुरंिगणी सेना के यु नह हो सकता।
इसिलए य द तेरी इ छा इनसे यु क हो तो म ग धव क सेना तुझे दूग ं ा और सब भांित
तेरा ि य क ं गा।’’
रावण ने सुर को फर अिभवादन कया और कहा–‘‘देव, मेरा उ े य के वल
यु -जय ही नह है। म आय क पर परा पर र -सं कृ ित क थापना करना चाहता ।ं
आय क ख डनीित मुझे स नह है। वे अपना अंग काट-काटकर तिनक-तिनक बात पर
आयजन को बिह कृ त करते ह। म सब आय, अनाय, देव, दै य, असुर, नाग, आनव, मानव
और आ द य तथा गत, आगत, समागत जन को एक धम, एक सं कृ ित के नीचे लाना
चाहता ।ं इसके िलए मुझे सव थम आय को और देव के द पाल को जय करना होगा।
म शी ही अपनी चतुरंिगणी सेना लेकर आऊंगा। तभी म आपक सहायता से भी लाभ
उठाऊंगा।’’
ग धवपित ने स होकर कहा–‘‘ वि त, ऐसा ही कर पु ! कामना करता ं तेरा
सदु े य सफल हो। क तु अब तू यहां से कि क धापुरी जा। वहां के वानर का राजा बािल
बड़ा दुमद और बली है। उसे अपना िम बना। वह कि क धा का रा य दुगम है और तेरे
माग म है। उसक िम ता से तुझे लाभ होगा।
‘‘तू यहां से पि म-दि ण दशा म जा। सारा माग पु प-लता से भरा आ
मनोरम है। वह तुझे सुखद और सुगम होगा। वृ के मधुर वा द फल खाता आ तू
अपनी या ा कर। आगे तुझे एक महावन िमलेगा। फर पवत- ेिणयां। उ ह पार करते ही तू
प पा सरोवर म प च ं जाएगा। वह ऋ यमूक पवत पर मनोरम कि क धापुरी है। वहां
इ के पु वानरराज बािल का रा य है।’’
रावण यह सूचना पा स आ। उसने कहा–‘‘हे देव, म ऐसा ही क ं गा।’’ उसने
ग धवराज क दि णा क और ि यतमा ग धव-नि दनी िच ांगदा को िविवध भांित का
आ ासन दे चल दया। ि यतम-िवछोह से िवद धा ग धवपु ी िच ांगदा कटे वृ क
भांित भूिम म मू छत हो िगर गई।
42. कि क धापुरी म

वन-पवत उप यका सबको पार करता आ वीरिशरोमिण रावण अ ततः प पा-


सरोवर पर आ प च ं ा। यहां क भूिम समतल थी। घाट सु दर और सुगम थे। सरोवर के
नीचे क भूिम बालुकामय थी। असं य नीलकमल और र ो पल उस सरोवर क शोभा
बढ़ा रहे थे। वहां प पा के जल म िवचरनेवाले हंस, कु रर, कार डव और च आ द प ी
मधुर वर म कू ज रहे थे। वे हंसा को जानते ही न थे। अनिगनत वानर अपनी-अपनी
पि य के साथ वहां िवहार कर रहे थे। प पा के तट पर फल -फू ल वाले इतने वृ थे क
सरोवर का तट उनसे ढंक गया था।
सरोवर के पि म तट पर ही महामुिन मातंग ऋिष का आ म था। उसम एक
हजार बटु क वेद पढ़ते थे और चय धारण करते थे। आ म म अनेक वानर-कु मार
चारी वेदपाठी थे। अनेक यती, तप वी तधारी पु ष- ी वहां तप वी का जीवन
िबताते थे। इसी आ म म एक अमोघ भावशाली मिहला शबरी रहती थी। वह जाित क
तो िनषाद थी, पर तु महा ानवती एवं तपि वनी थी। शबरी का ताप उस सरोवर के
अंचल म िव यात था। वह य थली वेदी म तप या कर रही थी।
सरोवर के स मुख ही ऋ यमूक पवत था। यह पवत जैसा मनोरम था वैसा ही
दुरारोह भी था। इस पवत पर सप ब त थे। वन म हािथय के भी ब त झु ड िवचरण
करते थे, जो यूथ बनाकर सरोवर के तट पर जल पीने आते थे। पवत के अंचल म बड़ी-बड़ी
ाकृ त गुफाएं थ । फल-फू ल और क द-मूल क तो वहां कमी थी ही नह । रावण ने सरोवर
म व छ द ान कया। तृ होकर क द-मूल-फल का आहार कया। फर वह मुिन के
आ म म गया।
महामुिन मातंग ऋिष तथा शबरी ने रावण का आित य कया। उसे अ यपा
दया। इसके बाद रावण ने कि क धा नगरी म वेश कया। उस वण-नगरी म व छ,
सुगि धत पवन वािहत था। उसम िव य पवत के ऊंचे गमन-चु बी ासाद थे। नगर म
अनेक रं ग थिलयां थ । वानर नाग रक और उनक पि यां सजी ई पाल कय म इधर-
उधर आ-जा रहे थे। वानरी मिहला क सवारी के आगे सैिनक शंख- विन करते जा रहे
थे। ये सैिनक दै य और दानव के समान परा मी और वीर थे। बािल के सेनापित का नाम
िवनत था। वह वीर पवत के समान भीमकाय था। वह मेघ क भांित गजन करता था।
वानरगण िविवध वणाभरण अंग पर धारण कए, वण- करीट िसर पर रखे, बड़ी आन-
बान से यहां घूम रहे थे। यहां इ पु महाबिल बािल और सु ीव दो भाई रा य करते थे।
बािल का शरीर लोहे के समान कठोर था। जब वह मु र लेकर यु म उतरता था, तब
बड़े-बड़े यो ा भी उससे पार नह पा सकते थे। वह अब तक कसी वीर से परा त नह
आ था।
ऋ यमूक पवत पर कभी सात ऋिषय के आ म थे। अब उनके थान पर सात
िवशाल ताड़ वृ थे। उ ह के िनकट कि क धापुरी थी। रावण राजपथ, वीथी,
अ ािलकाएं देखता आ राजमि दर क पौर पर जा खड़ा आ। राजमि य ने उसे
अितिथ-अ यागत जान अ य-पा से स कृ त कया। प रचय पूछा, आने का कारण जाना।
म ी तार ने कहा–‘‘आप तिनक िव ाम क िजए। वानरराज बािल स योपासना को
समु -तट पर गए ह। यह उनका िन य-िनयम है, आप उनसे यु -याचना कर सकते ह
अथवा कसी वानर से रच सकते ह, इससे हमारा भी मनोरं जन होगा।’’
पर तु रावण ने कहा–‘‘मि वर, मुझे वानरराज के दशन क बड़ी उ सुकता है, म
वह जाकर उनसे यु -याचना क ं गा। अ य वानर से करने का मेरा या योजन
है?’’ मि य ने कहा–‘‘य द आपको अपने जीवन का मोह नह है तो आप समु -तट पर
चले जाइए। वह महातेज वी सुभट बािल से आपका सा ात् हो जाएगा।’’
समु -तट पर जाकर रावण ने देखा–बािल एका मन सूय पर दृि दए ि तीय
सूय के समान अचल भाव से समु -जल म खड़ा है। रावण ने उ वर से कहा–‘‘यु ं देिह!
यु ं देिह!’’
बािल ने मुंह फे रकर महावीयवान रावण को देखा। सूय को जलांजिल दी। फर
जल से बाहर आकर कहा–‘‘आप कौन महाभाग मुझसे यु -याचना कर मेरी ित ा बढ़ा
रहे ह?’’ रावण ने कहा–‘‘म सात ीप -सिहत लंका अधी र पौल य रावण ं और गूढ़
उ े य से आपसे यु -याचना कर रहा ।ं आइए, आप भयभीत नह ह तो यु क िजए।’’
बािल ने हंसकर कहा–‘‘अितिथ का अ य-पा से स कार कया जाता है। फर
आप महा ित ह। पर तु आप यु -याचना करते ह, आपका अिभ ाय गूढ़ है तो ऐसा ही
हो। आप श -पात क िजए।’’
‘‘नह वीर, आप िनर ह, म म ल-यु क ं गा।’’
‘‘तो ऐसा ही हो।’’
रावण ने अपना परशु फक दया। दोन वीर समु क सोनरे त म म लयु करने
लगे। कु ती के दांव-पेच चलने लगे। दोन अ ितम यो ा थे, वे पर पर एक-दूसरे क
शंसा करते ए बड़ी देर तक म लयु करते रहे। दोन के शरीर पसीने से लथपथ हो गए।
यु करते-करते उ ह दो हर का काल हो गया। अ त म बािल ने रावण को परा त कर
उसके व और क ठ पर अपना चरण रखकर हंसते ए कहा–‘‘पौल य रावण, तु हारी
अिभलाषा पूण ई या अभी और कु छ इ छा है?’’
रावण ने भी हंसकर कहा–‘‘स तु आ इं तनय, तू महावीर है। तुझम अ भुत
बल है, िव म है। तेरी गित वायु के समान है। म िव वा मुिन का पु , पौल य रावण सात
ीप -सिहत लंका का अिधपित, तेरा अिभन दन करता ।ं तेरे बल क थाह के िलए मने
तुझसे यु कया था, य क म तुझसे िम ता थािपत करना चाहता था। अब अि क
सा ी म तुझे अपना िम बनाता ।ं अब से ी, पु , नगर, रा य, भोग, व –सब व तुएं
हमारी-तु हारी एक ही रहगी। हम-तुम दोन िमलकर ही इनका उपभोग कया करगे।’’
रावण के ये वचन सुन बािल स हो गया। उसने उसके क ठ से अपना चरण
हटाकर कहा–‘‘म तुझ पर स ।ं तू े कु ल का वीर है; पू य है, ा य है। आ,
अ याधान कर, हम अि को सा ी बनाकर ब धु व क थापना कर।’’
दोन ने अि विलत कर पर पर ब धु व क ित ा क , फर दोन ने एक-
दूसरे का आ लंगन कया।
इसके बाद दोन कि क धा म राज-मि दर म पर पर एक-दूसरे का हाथ पकड़े,
इस कार घुसे जैसे संह गुफा म वेश करते ह ।
43.

यम क प ी वसु से आठ वसु उ प ए, िजनम सबसे ये धर थे। धर के पु


थे।
के यारह कु ल चले। इन यारह कु ल के वतक थे–1. अज एकपाद्, 2.
अिहब य, 3. िव पा , 4. व ा, 5. वीरभ , 6. भैरव, 7. हरमहे र (िशव), 8. य बक,
9. सािव (कपाली), 10. श भू और 11. शव (िपनाक )।
के चार थान िस ह। थम मूल थान मूजवान पवत हेमकू ट (िह दू-कु श)
का य त पवत, जो पि म कोहसुलेमान से ब त उ र सफे द कोह ( ेत िग र-धवल) से
भी उ र म है। यहां ही सोम होता था। इसी के पूव क ओर चिग र है, िजसे अब
‘कराकु रम’ कहते ह। इसी का िवदारण कु मार का तके य ने कया था। उमावन–शरवन इसी
थान के आसपास है। यहां के आगे क वायु ब त च ड है। इसी से को तूफान का
देवता कहा है। इस देश म मूजवन, महावृष, वा लीक तथा मा त् जाितयां रहती थ , जो
आय न थ । पर तु मा त् लोग देवराट् इ के सहायक ए। दूसरा भ वट, कै लाश के पूव
क ओर, लौिह यिग र के ऊपर है। उसके नीचे पु नदी बहती है। तीसरा कै लास
िहमाचल देश का–मानसरोवर के िनकट का थान।
प शया के एक ा त म ‘शंकरा’ जाित अब भी िनवास करती है। पुराण म को
म त का पूवज माना गया है। को वृषभ के समान शि मान् तथा दुधष तेजवाला
बताया गया है। यह जरारिहत, ि थर-यौवन तथा सवािधपित माना गया है। ऋ वेद से यह
भी पता लगता है क उसके ह ठ सु दर थे, रं ग बादामी था, वह िसर पर बड़े-बड़े बाल
रखता था, शरीर उसका सूय के समान देदी यमान था, वह च ड धनुधारी यो ा था।
असी रया के िजया देश म ‘सेवा’ या ‘सेवािजयः’ नाम के देवता क उपासना
होती है। वहां तथा िम म भी ‘सेवा’ देवता के साथ सप का स ब ध जोड़ा गया है।
अमे रका के पे देश म िसवु देवता पूजा जाता है। यह सब िशव क ही पूजा है।
पैले टाइन देव का ‘पाल’ नामक धाम था, जो दै य ने छीन िलया था, उसी के उ ार के
िलए िशव ने ैपुर यु कया था। डेड-सी–मृ यु सागर ही वह थान है जहां ैपुर के मृत
वीर का जल- वाह कया गया था।
मसीह से पूव 2189 म िम के मिहदेव कपोत थे, जो िम ाइ म के नेता भी थे।
इ ह वहां के फरोहा ने देश-िनकाला दया था। तब िश तान के राजा िशिव ने उ ह आ य
दया था। इस िस ऐितहािसक घटना को पुराण क इस िव यात आ याियका से
िमलाइए क िशिव ने कबूतर के बदले अपना मांस दया। कपोत जाित को कबूतर बना
दया गया। यह िशिव राजा भी के वंश म थे। शेष का िव तार सारी सुर और
असुर-भूिम म आ और वे सभी सुर और असुर म समान भाव से पूिजत ए।
अ का का ाचीन नाम िशवदान है। पीछे जब राम ने रावण को िवजय कया
तथा अपने पु को रा य दया, तब अ का महा ीप कु श को िमला; तभी से वह कु श ीप
िस आ। अ का का म य देश िजसे सूडान कहते ह, िशवदान का ही िबगड़ा आ प
है। यहां भूम य सागर के अंचल म यवनसागर है, िजसके तट पर वह िस पुरी ि पुरी
थी, जो वणिन मत तथा तीन ख ड म िवभ थी। इसे ही िशव ने भ म करके जलम
कया था। आज भी उस थान पर ि पोली नगर और ा त है, िजसम ‘िशव’ नामक नगर
भी है।
िशव के इस महा ीप म आने से पूव यहां िस पृ वीिवजयी चा ुष उर और
उनका पु अंिगरा आ चुके थे तथा तमाम ीप पर अिधकार कर चुके थे। उरन, रयो–उर
उ ह क मृित को ताजा करता है। अ का का दि णांचल तो अंिगरा देश ही कहाता
है। अंकोला देश तथा अं ा-पैकृना उसी के िबगड़े ए नाम ह। चा ुष और िशव के बाद
भी सूयवंशी स ाट ने पीछे इस देश को अिधकृ त कया। मा धाता–(मांडाटे), अ बरीष–
(अ बे्), मिल द, ता कु ड- देश–(टे बकटू ), दमी देश आ द इसी बात के ोतक ह।
इ र या देश भी आ द य ने जय कया था। इ रट का अथ सूय है।
म यपुराण म िलखा है क रा स का थान निलवी नदी के तीर पर है। यह
स भवतः रावण के ऊपर ही ं य है। य द आप अ का के न शे को यान से देखगे तो
आपको ात होगा क अबीसीिनया के म य म एक तन नामक झील है, िजसके पूव तट पर
तीन पवत ह। ये तीन पवत िमले ए ह और तीन ओर से इस झील को घेरे ए ह। चौथी
ओर नील नद है। यह ि कू ट पवत है िजसका उ लेख पुराण म है।
अ बरीष मा धाता के पु थे। मा धाता सात ीप के सावभौम स ाट् थे। इनके
पु अ बरीष ा ण हो गए थे। िशवदान ीप म ा ण या ऋिष को दमी कहते थे।
अ का म दमी देश भी है और अ बरीष क खाड़ी भी है। ये दोन ही िपता-पु
िन स देह इस ीप म आए तथा उ ह ने इसे अिधकृ त कया था।
िम का भी ाचीन नाम िशवदेश–ओिसस आफ िशव था। यहां के राजा पीछे
मिहदेव– ी ट- कं स कहलाने लगे। ईिज ट नाम भी स भवतः जटा के नाम पर पड़ा हो।
एक का नाम कपद था। कपद का अथ है जटा-जूटधारी। तृ सु लोग को भी ऋ वेद म
‘कप दयः’ कहा है। स भवतः कपद उनका नेता हो और वे यहां के आ दवासी ह ।
बेबीलोिनया अ े िडयन लोग म भी जूड़ा बांधने क था थी, पर तु सुमे रयन म नह थी।
स भव है, इसी आधार पर इसका नाम ईिज ट आ हो। हां, ईरान म एक देश जाटा भी
है। स भव है वहां के लोग का यहां से स पक रहा हो। िम का नाम भी सं कृ त है और
मिहदेव ने यह नाम रखा था।
िम के ऊपरी भाग म एक थान डभीटा है। यहां कभी ‘दिम ’ नगर बसा था, जो
कसी िवजेता आ द य ने बसाया था। दिम , सूय या िव णु का नाम है। ि पोली (ि पुर),
िजसे िशव ने भ म कया था, वह िम के पि छम-उ र म मुख नगर है। सब जानते ह
क ि पोली देश का एक भाग िसर टयन सागर म जलम है। कु छ दन पूव इस जलम
भाग क जांच-पड़ताल क गई थी। इसी के िनकट कावस थान है, यह दै य याजक शु के
नाम पर है, य क शु का नाम ‘का ’ भी है। िम देश भूम यसागर के तट पर है। इस
सागर म आ सागर–ऐि या टक सी है। इसी के नीचे यवनसागर है। आ इ वाकु के पु थे
और इनके पु यवना थे। इन सूयवंिशय ने स भवतः अ बरीष और मा धाता से भी पूव
इस ीप पर अिधकार कया होगा, िजनके नाम पर ये समु ह। िवचारणीय बात यह है क
मा धाता और अ बरीष के मृित-िच न देश के नीचे के भाग म ह, जब क ये दोन समु
ीप के िसर पर ही ह। अि ीप भी यह है। मुिन नदी तथा अशाि त नदी अ का म ह।
44. देवािधदेव

के दादा यम य िप आ द य थे तथा देव ष भी थे, पर तु उ ह ने आय सं कृ ित


वीकार नह क , न ही वे आ द य म सि मिलत ए। देव, दै य, दानव सभी से उनका
व ण क भांित समभाव रहा। देव म खटपट तो सूय ही करते थे। सूय यम के िपता थे,
फर भी वे िपता-माता दोन से उपेि त थे। इसी से ये व ण के आि त ए तथा व ण क
सहयोग-नीित ही इ ह ने अपनाई थी। आ द य यम को अपना कु टु बी और आ मीय समझ
पू य पु ष मानते थे, पर उनक देव म यदा-कदा ही गणना करते थे। उनक संतान आठ
वसु भी अध-देव माने जाते थे। भी देव से पृथक् ही रहे, पर वे बडे़े तेज वी और तापी
थे। देव क भांित उनका दै य से भी सद्भाव था। बिल-पु बाणासुर से तो उनके गाढ़
मै ी स ब ध थे। वे ब त दन तक उसक नई राजधानी वन म रहे तथा बाण का ब त बल
उ ह ने बढ़ाया। उसका शरीरबल ब त था। उसक तुलना सांड़ से क गई है। देव लोग
िज ह द यु और अनाय कहते थे, वे भी के दरबार म अभय पाते थे। वे बड़े धनुधारी थे,
नाग के परम िम और संर क थे। उ ह चोर , डाकु और ा य का ाता कहा गया है।
पुंिज और िनषाद का भी उ ह वामी बताया गया है। इनके ोध और बाण से देव, दै य
सभी भयभीत रहते थे और संकटकाल म देव, दै य, दानव, नाग–सभी क शरण जाते
थे। उनका िस श ि शूल था।
वे नाद-िव ा के आगम थे। डम उनका वा था। कहते ह, अ र-समा ाय
उ ह ने ादुभूत कया और सबसे थम उ ह ने वाणी को उ ोिषत कया। वन पितय से
भी उ ह ेम था। वे वन पितय के वामी िस थे। वभाव उनका उदार था। वे जैसे
ज द ु हो जाते थे, वैसे ही झटपट स भी हो जाते थे। काम-िव ान के भी आिव क ा
थे। िस है क हजार अ याय का कामशा उ ह ने रचा था, इसी से उ ह कामजयी
कहते ह।
इ ह सब कारण से देव-दै य उनसे भय खाते तथा उनका आदर भी करते थे, पू य
पु ष समझते थे; पर तु य म भाग देते समय देव न यम को और न को ही अपनी पंि
म बैठाना पसंद करते थे। पाठक को ात है क को भी द ने एक क या दी थी, पर तु
से वे कतराते भी थे। भी द को कु छ न िगनते थे। वा तव म य -पाख ड के
समथक न थे। िन संदह े उ ह ने कु छ ऋचाएं तैयार क थ , पर तु वे वयं वै दक न थे।
उनक अपनी एक वत परं परा थी, जो यारह ने उन देश म, िजन-िजनम उनका
तार आ, चिलत क । उनके समथक उ ह देवािधदेव कहते थे और वे आ म-य को
सबसे अिधक मह व देते थे, िजसक ा या उनक अपनी थी तथा उनके इस आ म-य के
समथक ब त ऋिष उन दन स पूण एिशया महा ीप म फै ले ए थे।
अभी जब पर पर िवरोधी भावनाएं चल ही रही थ क इसी समय के सुर
द ने य कया। य म देव, िपतर, ऋिष, नाग, य , व ण आ द सभी युग-पु ष आए।
अि , पुलह, तु, इ , विश भी बुलाए गए। िविधवत् चातुह क वहां थापना क
गई। विश होता, अंिगरा, अ वयु, बृह पित उ ाता और नारद ा ए। आठ वसु,
बारह आ द य, दोन अि नीकु मार, उनचास म ण, वहां एक ए। ब त भारी
समारोह आ। दस योजन भूिम म य -समारोह आ।
यहां य -समारोह के स ब ध म भी म कु छ क ग ं ा। यह एक कार क अि -पूजा
थी, जो इलावत और आसपास के देव, दै य सभी म चिलत हो गई थी। मने बताया है क
देमाब द पवत पर का यप देश म एक थान बाकू है, जहां भूिम से अि िनकलती है।
इसी से ईरानी लोग अि क पूजा करते ह। उसी अि क पूजा का चलन देव , आय म
य - प से आ। पारसी लोग भी अि -पूजक ह। उनक अिगयारी म सैकड़ वष क
अख ड अि रहती है। धीरे -धीरे यह साधारण अि -पूजन, जहां-जहां आ द य गए, य के
प म साथ लेते गए। पीछे इसम और िविधय का भी समावेश आ और य के समारोह
धीरे -धीरे सब सामािजक और राजनीितक के िनपटारे के मूल समारोह हो गए। य
ही म देव क भूिम तथा दाय का बंटवारा होता था। य -भाग पाकर ही देव अपना िनवाह
करते थे।
इस य म द ाचेतस ने को नह बुलाया। य म न बुलाने का अिभ ाय
अपमान ही न था; मु य अिभ ाय यह भी था क उ ह य -भाग न िमले। वा तव म देव
का सब कु छ यौथ समाज था। पृथक् -संपि कसी क न थी। य समारोह म एक
साम ी य -भाग कहकर बांटी जाती थी। को न बुलाना सरासर को उनके भाग से
वंिचत करना था। पर तु क प ी सती, िबना बुलाए ही य म िपता के घर चली आई।
उसने िपता से कहा–‘‘आपके य म स पूण देव और ऋिष पधारे ह। हमारी सब बहन,
बहनोई, भांजे सप रवार आए ह। तब या कारण है क आपने हम लोग को नह बुलाया?
मेरे पित को आपने य -भाग से वंिचत कर दया?’’
द ने कहा–‘‘ वै दक मयादा नह मानते। देव को कु छ समझते नह ह। ि शूल
और द ड धारण करते ह। आ म-य का चार करते ह। नाग के साथ रहते ह। उनके गण
भी चोर, डाकू , द यु ह। यह सब उनका अभ आचरण है। इस अभ आचरण, अभ वेश म
वे कै से देव के साथ बैठ सकते ह?’’ इस पर सती ने ोिधत होकर कहा–‘‘िज ह आप अभ
कहकर िन दा करते ह, उ ह के तेज और भाव से देव िनभय ह। आप उनके ताप को नह
जानते। म अपने पित का अपमान नह सह सकती।’’ यह कहकर वह सबके देखते-देखते ही
धधकते ए य कु ड म कू द गई। देव, नाग, ग धव, म त्, गु क–‘‘यह या? यह या?’’
कहते ही रह गए। देव, ऋिष सब भयभीत हो गए। सती जल मरी–यह सूचना पाकर, ने
ु हो, न दीगण को द का य िव वंस करने को भेज दया। गण के दल-बादल य
पर छा गए। देखते-देखते उ ह ने द -य िव वंस कर डाला और द का िसर काटकर
य कु ड म झ क दया। के इस कोप से सब देव शोक त हो गए। यम और दोन
ही के सहायक सब दै य, असुर और दानव थे तथा हाल ही म देवासुर-सं ाम म वे उनसे
हार चुके थे। इसके अित र देव उनको आ मीय भी मानते तथा दबते थे। अतः को
उ ह ने समझा-बुझाकर बड़ी क ठनाई से शा त कया। पर ि य प ी क अपमृ यु से
अ य त स त ए। एक महा तापी यो ा थे ही। उनका बल अस था। उनका भाव
म त पर ब त था। ये म त् वतमान समरकं द या िबलोिच तान के आस-पास कह रहते
थे। इस घटना के बाद भी उनके साथ चले गए। इन म त से देवराट् इ ने िम ता कर
ली थी और समय–समय पर देवराट् इ तथा देव से सहायता िलया करते थे, पर तु
िव णु क भांित दै य और दानव के श ु थे ही नह । दै य और दानव भी उ ह उसी
कार पू य पु ष मानते थे तथा समय-असमय म दै य-दानव क भी वैसी ही
सहायता करते थे जैसी देव क । इस कार अपने काल म देव, दै य, दानव सभी म
पूिजत थे। फर भी उ ह अ य त ोधी समझकर संहारक ही समझा जाता था। उनका दै य-
दानव के गण का संगठन इतना भयानक था क उससे देव-दै य सभी भय खाते थे।
सती क मृ यु होने के कु छ काल बाद ने िहमालय क राजक या पावती से
िववाह कया। पावती ने क यशोगाथा पर मोिहत होकर वयं ही से िववाह क
याचना क । पावती क सेवा से स तु हो वे अब शा त भी हो गए। अब तक उनके के
नाम के अित र भव, पशुपित, नीलक ठ आ द नाम भी थे। अब सब लोग उ ह िशव–
शाि तमू त–कहने लगे। यहां देवी पावती से उ ह दो पु क ाि ई : एक गणपित,
दूसरे का तके य। उ ह ने िहमवान् के अंचल म अपना कै लास नाम का मनोरम आ म
बनाया और वहां रहने लगे। उधर रावण से खदेड़े ए कु बेर ने भी उनके िनकट ही अपनी
अलकापुरी बसाई। इस कार (िशव) का कु बेर और य से खूब मेल-जोल हो गया।
एक कार से य पित कु बेर क से िम ता ही हो गई।
45. देव–साि य

िहमाचल के अंचल म छ वेशी रावण कु बेर क अलका के चार ओर घूम- फरकर


सब घाट-घर देखने लगा। घूमते-घूमते वह शरवन म जा प च ं ा। यह शरवन सूय क धूप म
सुवण, सूय और अि के समान चमक रहा था। यहां शरवन म कास इतना ऊंचा था क
रावण को आगे क राह ही नह िमली। रावण अभी िवमूढ़-सा हो इधर-उधर देख ही रहा
था क एक िवकट पु ष उसके पास आया। उसने खे वर से पूछा–
‘‘तू कौन है रे पािप , कै से तूने इस अगम वन म आने का साहस कया?’’
रावण ने उससे तिनक भी भयभीत न होकर कहा–
‘‘तू ही कह, तू कौन है और कस अिभ ाय से तू इस वन को अगम कहता है?’’
‘‘अरे , तो तू या नह जानता, यहां भगवान् का िनवास है? यह कै लास क
उप यका है।’’
‘‘यह कौन है, िजसका नाम लेकर तू मुझे डराता है?’’
“देव-दै य-पूिजत भगवान् को तू नह जानता है? अब भाग यहां से। इस अगम े
म ािणय का आना िनिष है। यहां मेरी चौक है।’’
‘‘तू कौन है?’’
‘‘म भगवान् का कं कर न दी ।ं ’’
‘‘तेरे भगवान् रहते कहां ह? उ ह म भी देखना चाहता ।ं ’’ ‘‘तेरा दु साहस
है। जा, जा, भाग जा। भगवान् के दशन य ही नह होते, साधना से होते ह।’’
‘‘कै सी साधना से?’’
‘‘वह तुझ अपा से म या क !ं तू य द भगवान् के कोप का भाजन नह होना
चाहता है तो ज द भाग जा।’’
‘‘पृ वी पर िवचरण करने का हर एक ाणी को अिधकार है। और मुझे तो ऐसा
िवचरण ि य है। तेरे के कै लास को भी म देखना चाहता ,ं चल।’’
इतना कहकर रावण हंसकर पवत पर चढ़ने लगा।
न दी ने बाधा डालकर कहा–‘‘म कहता –ं भाग जा, आगे न बढ़, यह अगम े
है।’’ पर रावण नह माना, तो न दी ने उसे पकड़कर पीछे ठे ल दया। इस पर रावण ने
अनायास ही उसे उठाकर दूर फक दया। उस पु ष का ऐसा बल देख न दी आ यच कत
रह गया। न दी म अमोघ बल था। रावण क ओर देखकर बोला–‘‘तू स ववान् पु ष तीत
होता है। आ, मुझसे म ल-यु कर।’’
रावण तैयार हो गया। ब त देर यु करने के बाद रावण ने न दी को पछाड़ दया।
इस समय तक शोर-शराबा सुनकर ब त-से गण वहां आ गए थे। वे सब िमलकर शोर
मचाने और श चमकाने लगे। न दी ने कहा–‘‘नह , इसे मारो मत, यह स ववान् पु ष है,
इसे भगवान् क सेवा म ले चलो।’’
तब गण रावण को घेरकर ले चले। रावण भी अपना परशु क धे पर रख उनके
साथ चल खड़ा आ। य - य वह पवत-शृंग पर आरोहण करने लगा; य - य वह उसका
सौ दय देख मोिहत होने लगा। चार ओर मोहक, िहमा छा दत िग रशृंग पर सुनहरी सूय
क करण पड़कर रं ग-िबरं गी छटा दखा रही थ । पवतीय प ी जहां-तहां उड़ते बडे़ भले
तीत होते थे। य - य वह ऊपर चढ़ता जाता था, चार ओर िहमा छा दत पवत-शृंग
क पंि यां ही दृि गोचर होती थ ।
उसने कै लास-िशखर पर प च ं कर िवकट गण से सेिवत को देखा। पंगल जटा-
जूट, क ट म बाघ चम और दृि म अ त य ित। रावण ने ऐसे भावशाली पु ष को पहले
कभी नह देखा था। फर भी उसने को अिभवादन नह कया। अपना िवकराल परशु
कं धे पर रख िनभय स मुख आ खड़ा आ।
ने देखा, देखकर न दी से पूछा–‘‘यह कौन पु ष है और कस अिभ ाय से
हमारे पास आया है?’’
न दी ने कहा–‘‘देव, इसने प रचय नह दया। क तु यह कै लास के नीचे के अगम
े म घूम रहा था। मेरे रोकने पर इसने मुझसे िव ह कया और मुझे पराभूत कया।’’
‘‘तुझे पराभूत कया! ा य है तब तो यह पु ष।” फर ने रावण क ओर मुख
करके कहा–‘‘अपना प रचय दे पु ष! मेरे अगम े म िवचरने का कारण भी कह।’’
रावण ने कहा–‘‘महाभाग, म धनेश कु बेर का भाई र पित लंकेश रावण ;ं म इस
वन म व छ द िवचरण कर रहा था, तभी इस पु ष ने मुझे रोका। इसिलए िव ह का
दािय व मुझ पर नह है।’’
ने सुनकर हंसते ए कहा–‘‘अ छा, अ छा, रावण तू ही है। वि त! तू
कु शलपूवक तो है? मने कु बेर से तेरी बात सुनी है। पर तूने अपने ये कु बेर क अव ा क
है, सो या स य है?’’
‘‘इस पर कौन िवचार कर सकता है? म तो ऐसा नह समझता। मेरे भाई कु बेर ने
य -सं कृ ित थािपत क है, क तु मने र -सं कृ ित क थापना क है। हमारा मूल म
है–‘वयं र ामः’। जो हमसे सहमत है, उसे अभय। जो सहमत नह है, उसके िलए मेरा यह
कु ठार है।’’
खूब जोर से हंस पड़े। उ ह ने कहा–‘‘आयु मन्, यही कु ठार तेरा तक है?’’
‘‘मूल तक तो यही है।’’
‘‘ क तु म तुझसे सहमत नह ।ं ’’
‘‘तो आपके िलए भी मेरा यह कु ठार है।’’
‘‘मेरे पास भी यह ि शूल है।’’
‘‘तो अभी हमारा-आपका शि -संतुलन हो जाए।’’
‘‘पर तू मेरा अितिथ है, समागत अ यागत है।’’
‘‘आप इसी ि शूल से मेरा आित य क िजए। म यु क याचना करता ,ं आप
द पाल महाभाग यमदेव के वंशधर ह। म िव वा मुिन का पु ।ं आप मेरे ये ह। इसी
से म आपका िशर छेद नह करता, यु क याचना करता ।ं यु ं देिह!’’
‘‘म भी तेरे शौय से स ,ं तेरी यु ािभलाषा पूरी क ं गा, अभी तू िव ाम
कर।’’
‘‘नह महाभाग, काय-पू त ही मेरा िव ाम है। उठाइए ि शूल! ’’
‘‘तब जैसी तेरी इ छा!’’
ने क ं ृ ित क , डम नाद कर ि शूल उठाया। डम नाद सुनकर ब त-से
गण, ग धव, देव, य आ जुटे। वे और रावण का वह िवकट यु देखने लगे। रावण
को यह देखकर बड़ा आ य आ क उसके परशु- हार को कौशल से िवफल कर रहे ह
और वे उस पर शूल का करारा वार ही नह कर रहे। उसे ऐसा तीत आ क जैसे कोई गु
कसी बालक को यु -िश ण दे रहा हो। रावण ने अपने जीवन म ऐसा िवकट पु ष नह
देखा था। अ त म रावण थककर हांफने लगा। उसका सारा शरीर पसीने से भर गया। उसने
अपना परशु फक दया और सामने खड़ा हो गया।
ने हंसते ए कहा–‘‘ या थोड़ा िव ाम चाहता है तू रावण?’’
‘‘नह , िवराम चाहता ।ं आप यु कहां करते ह, िखलवाड़ करते ह।’’
‘‘ क तु, तू यु कर।’’
‘‘नह , शंकर! शंकर!!’’
‘‘यह या?’’
‘‘हां–क याणं कु ! आप देव ह, देवपित ह, यह रावण आपका कं कर है, आप
इसका क याण क िजए–शंकर! शंकर!!’’
ने हाथ उठाकर हंसते ए कहा–‘‘क याण हो तेरा। तेरा शौय तु य है, तू
अजेय है, क तु तेरी र -सं कृ ित या है?’’
‘‘वयं र ामः–हम र ा करते ह। यही हमारी र -सं कृ ित है। आप देवािधदेव ह।
आप देखते ही ह क आय ने आ द य से पृथक् होकर भरत-ख ड म आयावत बना िलया
है। वे िनर तर आयजन को बिह कृ त कर दि णार य भेजते रहते ह। दि णार य म इन
बिह कृ त वेद-िवहीन ा य के अनेक जनपद थािपत हो गए ह। फर भारतीय सागर के
दि ण तट पर अनिगनत ीपसमूह ह, जहां सब आय, अनाय, आगत, समागत, देव, य ,
िपतर, नाग, दै य, दानव, असुर पर पर वैवािहक स ब ध करके रहते ह। फर भी सबक
सं कृ ित िभ है, पर तु हमारा सभी का ही नृवंश है और हम सब पर पर दायाद बा धव
ह। म चाहता ं क मेरी र -सं कृ ित म सभी का समावेश हो, सभी क र ा हो। इसी से
मने वेद का नया सं करण कया है और उसम मने सभी दै य-दानव क रीित-पर परा
को भी समावेिशत कया है, िजससे हमारा सारा ही नृवंश एक वग और एक सं कृ ित के
अ तगत वृि गत हो। आप देखते ह क गत एक सौ वष म तेरह देवासुर सं ाम हो चुके ह
िजनम इन सब दायाद बा धव ने पर पर लड़कर अपना ही र बहाया। िव णु ने दै य से
कतने छल कए! देवगण अब भी अनीित करते ह। का यप सागर-तट क सारी दै य-भूिम
आ द य ने छल-बल से छीनी है। अब सुन रहा ं क देवराट् इ चौदहव देवासुर-सं ाम
क योजना बना रहा है। ये सब संघष तथा यु तभी रोके जा सकते ह, जब सारा नृवंश
एक सं कृ ित के अधीन हो। इसीिलए मने अपनी यह र -सं कृ ित िति त क है। आगे देव
माण ह!’’
रावण का ऐसा सारग भत भाषण सुनकर ब त स ए और रावण के िसर
पर हाथ रखकर कहा–‘‘तेरा य तु य है और म तुझसे स ।ं म भी देव, दै य, असुर
सबसे समान ीित रखता ।ं ’’
‘‘तो म आपका अनुगत िश य और सेवक ।ं आपने मेरा क याणदान कया है,
आप मुझे अनुमित दीिजए क म आपको ‘शंकर’–क याणदाता, कहकर आपक व दना
क ं ।’’
इतना कहकर रावण ने घुटन के बल बैठकर के चरण म िसर नवाया। ने
दोन हाथ उठाकर कहा–‘‘क याणं ते भवतु! िशवं ते अ तु!’’
रावण ने हष म हो नाचते ए कहा–‘‘आप देव ह, देवािधदेव ह, आप शंकर ह,
आप िशव ह!’’
और तब सब गण ने, म त ने, ग धव ने, देव ने ‘शंकर! शंकर!!’ कहकर
हषनाद कया। फर र पित रावण का अ यपा , अ त और मधुपक से स कार कया।
र राज के वागत-समारोह म द ांगना , अ सरा ने नृ य-गान कर कै लास को
मुख रत कर दया।
46. गु ाद् गु तमम्

उवाच–‘‘ किमदं जले िवमले ा मिन प यिस?’’


‘‘यथैवेह भगवः सा वलङ् कृ त सुवसनः प र कृ त एवमेव।’’
“ एष आ मे येतदमृतम्?’’
“ एष आ मे येतदमृतम्?’’
‘‘आ मैवेह महीय आ मा प रचय आ मानमेवेह म ा मानं प रचर ुभौ
लोकाव- वा ोित।’’
‘‘उभौ लोकाववा ोतीद ामु ित।’’
‘‘त माद य ेहाददानम धानमयजमानं शरीरं वसनेनालङ् कारे णेित सं कु वाणा
मुं लोकं जे याम इित।’’
‘‘अस यम ित मनी रिमदं जगत्।’’
‘‘ई रोऽहम्।’’
‘‘एतद् गु ाद् गु तमम्।’’
‘‘का च परापरा वेित भगवन्!’’
‘‘ े िव े, पराचैवापरा च। त ापरा वेदोऽयं, परा यया तद रमिधग यते।’’
‘‘ कम रं भगवन्।’’
‘‘जीवनम्। िवरामो मृ यु तावदुदगमो
् ज म।’’
‘‘ कमु य पं भगवन्।’’
‘‘योषा वा अि त या उप थ एव सिम लोमािन धूमो योिनर चयद तः-करोित
तेऽ गारा अिभन दा िव फु लंगा ति म ेति म ौ देवा रे तो जु वित त या आ या
पु षः संभवित।’’
‘‘उपम यते स हंकारो, पयते स तावः, ि या सह शेते स उ ीथः,
िति या सह शेते स हारः, कालं ग छित तत् िनधनं, पारं ग छित ति धनमेत ामदे ं
िमथुने ो म्।’’
‘‘स य एवमेत ामदे ं िमथुने ो ं वेद िमथुने भवित। िमथुनाि मथुनात्- जायते
सवमायुरेित योग् जीवित महान् जया पशुिभभवित महान् क या, न का न प रहरे त्
तद् तम्।’’
‘‘क य रे तः पुरा तम्?’’
‘‘ ण े मया ैलो यं सिवकारं िनगुणगणं रे तो तम्।’’
‘‘हेतुिभवा कम यै तैः कारणैरेतद् िल गम य चतम्?’’
‘‘अचयेथाः सदा िल गम्। सवा भगा काः ि य:, िल गेनािप य -िच नीकृ ता
सव पु षाः।
िल गा का भगा का जाः। पुि ल ग सवमीशानं ीिल गं िवि
चा युमाम्। ा यां तनु यां ा ं िह चराचरिमदं जगत्।
‘‘एतद् गु ं गु तमम्।’’
‘‘रावणः ब ा िलः–
‘‘ओम् म ं शि स प ं बाणा यं च महा भुम।् ’’
कामबाणाि वतं देवं संसार-दहन मम्।
शृंगारा दरसो लासं बाणा यं परमे रम् ॥
ओम् िपनाकधृक्, इहाग छ, इह ित , इह ित , इह सि धेिह, इह सि धेिह,
इहसि व, अ ािध ानं कु ।
वि त नो ः पा वंहसः।
गौरी ममाय सिललािन त ित।
47. लंग पूजा

िपछला प र छेद ‘गु ाद् गु तमम्’ हमने सं कृ त म िलखा है। गु ांग का


आवरण स यता का तीक है। इसिलए गु बात भी अनावृत न रहनी चािहए। इसी से
गु पर हमने सं कृ त भाषा का आवरण डाला है। कोई आव यक नह क पाठक इस
अ याय को पढ़ ही। के वल वे लोग, जो इस गु ोपदेश क पूरी गहराई तक प चं ना चाहते
ह, इस अ याय को मनन करने क चे ा कर। फर भी इस गु ोपदेश क थोड़ी-सी ा या
दाशिनक और पौरािणक आधार पर–उसम य कं िचत् वै ािनक स पुि देकर–हम यहां
करते ह।
इस गु ोपदेश का अिभ ाय यह है क जीवन और शरीर एवं मनु य िव क
सबसे बड़ी इकाई है। कोई देव उससे बड़ा नह । मनु य ही सबसे बड़ा देव है और उसे
अपनी ही पूजा-अचना करनी चािहए। उपिनषद म इस त व क ा या इस कार क
गई है–‘‘देवराज इ और देवराज िवरोचन दोन ही जापित के पास आ म-िज ासा के
िलए गए और जापित ने उ ह ही गु ोपदेश दया। इ ने शंकाएं क , पर तु िवरोचन
अशंक भाव से चला गया और उसने असुरजन म आ मपूजा का सार कया। यही कारण
है क िम के ाचीन असुर राजा ने अपने मृत शरीर को सजाकर बड़े-बड़े िपरािमड
म थािपत कया, िजनका आ यजनक और रह यपूण िववरण पुरात ववे ा ने भूगभ
से ा कया है। आ मपूजन का यह िवचार वा तव म मूल प म सबसे पहले रावण ने ही
सा रत कया था और उसके आ द उ ाता देवािधदेव थे।
दूसरा जो इसी आ मपूजन से स बि धत है और उषिनषद् म व णत है, ई र
या देवता के त व को वीकार न करके इस जनन-िवधान को य कहा है। जनन क
घटना को जो इतना मह व उस युग म दया गया, यह एक अ ानमूलक जंगली था थी या
िव ान का उ अंग था, इस स ब ध म हम अपनी कोई राय कट न कर के वल त य पर
ही काश डालते ह।
जनन-िव ान चराचर ािणय म नर-नारी के िमथुन-संयोग से उ प होता है।
इसिलए ाचीन काल से जा क वृि , मैथुनी सृि के मह व पर मुख पु ष का यान
गया और उ ह ने इस घटना को अ य त चम का रक और आ यजनक पाया क कस
कार नर-नारी के संयोग से गभ थािपत होकर एक नवीन ाणी का ज म होता है। और
वाभािवक प से उस काल से पु ष का यान नर-नारी के गु जनन-इि य के
मह व क ओर गया। उ ह ने जनन-इि य को िव के सबसे अिधक मह वपूण और
शि शाली त व के प म वीकार करके पूिजत कया। कहा जाता है क जनन-िव ान
को एक धा मक प देने का काय सबसे थम ने कया और उ ह ने एक हज़ार अ याय
के ‘काम िव ान-शा ‘ का िनमाण कया। उ ह ने जननांग को सब कारण का कारण
कहकर पूिजत कया। िजसका प रणाम यह आ क लंग-पूजन क वृि ाचीन जाितय
म थान पा गई।
हम यहां पर थोड़ा और गहराई से वै ािनक िव ेषण करगे। जीिवत ाणी का यह
अिनवाय ल ण है क वह अपनी प रि थित म िजतने रासायिनक उपादान पाये, सबको
अपने ज टल सादृ य म प रणत कर दे। यह प रणयन–पाचन करना और िवसजन करना–
इन दो या के प म, अनवरत चलता रहा है। िवसजन देर म और पाचन ज दी होता
है। पर तु िजस तरह आयतन बढ़ता है, उसी तरह ऊपरी तल, जो आहार प च ं ाने का
साधन है, अनुपात से नह बढ़ता। एक हद तक बढ़कर क जाता है। इसिलए वृि
अप रिमत नह होती। च टी से हाथी तक व क टाणु से कसी भी महाकाय ज तु तक
प च ं कर ि व क अिभवृि क जाती है। बाहरी तल और आयतन म शरीर के भीतर
एक ऐसा अिनवाय अनुपात है क िजसके भंग होने से वृि क जाती है और तब ि गत
ास और वृि का अनुपात समान हो जाता है। बड़े शरीर वाले सभी जीव को ऐसी
क ठनाइय का सामना करना पड़ता है। पर तु सू म देहधारी जीव, िज ह सेल कहते ह,
उनके सामने यह क ठनाई नह आती। जहां उनक बाढ़ कती है, वहां वे बीच से फटकर
दो हो जाते ह। इस तरह वहां आयतन नह बढ़ता। आयतन बढ़ने के बदले उनक सं या बढ़
जाती है। एक से दो, दो से चार, चार से आठ। इस कार उनक अन त सं या हो जाती है।
इस वृि म ास नह होता। येक ि पूण है और िनर तर बढ़ने वाला है। इस कार
ये सेल वाले सू म जीवाणु ‘एकोऽहं ब याम्’ के िस ा त को च रताथ करते ह और इसी
म ‘पूणमदः पूणिमदम्’ क घटना घ टत होती है। पर तु य - य शरीर म थूलता आती
है, यह भेदज उ पि क ठन होते-होते समा हो जाती है। ष पद या अ पद ाणी इस
तरह कट-कटकर नह बढ़ सकते। यहां कृ ित अंकुरण से काम लेती है, िजसम सारा शरीर
य का य रहता है। उसका के वल एक छोटा-सा अंश कटा-सा रहता है और धीरे -धीरे
दूसरे शरीर का जब अ छा-सा पूण प तैयार हो जाता है, तब वह अंश अपने पैदा
करनेवाले बड़े शरीर से िबलकु ल अलग हो जाता है और उसका ि व आगे बढ़ने लगता
है। ऐसा अंकुरण मूंग म और कु छ िवशेष कार के क ड़ म और थोड़े-से रीढ़वाले ु
ज तु म होता है। पर तु अि थ- पंजर क ज टलता बढ़ने पर अंकुरण ािणय क बाढ़
भी क जाती है और यह वृि छोटे-छोटे उ पाद तक पहंच-प च ं कर समा हो जाती है।
इसके बाद ही ज तु म मैथुन का आर भ होता है। मैथुन का अथ है जोड़ा। दो
अके ली सेल जुड़कर एक सेल बन जाती ह। इनम से एक सेल लंग अथवा शु होती है,
दूसरी योिन अथवा िड ब। इस या के िलए दो ि य के शरीर से एक-एक जनक और
जननी सेल िनकलकर पर पर िमलकर एक सेल बनती ह। वही नए ि का मूल प है।
नई सेल भेदन-रीित से सं या-वृि करती-करती असं य सजातीय सेल बनाकर नए थूल
शरीर का ढांचा तैयार करती ह। भेदन और अंकुरणवाली वृि म नर-नारी का कोई भेद
नह होता। पर तु बड़े शरीर म, चाहे चल हो या अचल, यह भेद अिनवाय हो जाता है क
नर का वीयाणु हो और नारी का िड बाणु। वीयाणु का प भी लंगाकार होता है और
िड ब क अनु पता योिन-पी ठका से िमलती-जुलती रहती है। चराचर ािणय म इस
कार वृि क िविध म लंग और योिन ापक ह।
उस अ य त ाचीन काल म इसी गु वै ािनक और दाशिनक जनन-आधार पर
नर-नारी क गु ोि य का पूजन ार भ आ, िजसका आर भ से आ। इसिलए
लंगोपासना क िविध म संसार क सभी ाचीन जाितय ने या िशव को सि मिलत
कया और के ि व को नृवंश क समि म आरोिपत कर लंग-पूजन को
िशव लंगाचना का प दया। लंग का धा मक अथ कया गया ‘लयनाि ल गमु यते’,
अथात् लय या लय होता है, इससे उसे लंग कहा गया है।
कु छ अ पायु वाले छोटे-छोटे शरीर म मैथुनी वृि म कु छ क ठनाई होती है। एक
न ही-सी जननी एक बार म थोड़े ही से िड ब उपजाती है। य द जनक क आव यकता न
पड़े तो दूनी शि वृि म लग जाती है। इसिलए, जहां िवभाजन या अंकुरण के िलए शरीर
अिधक ज टल है और मैथुनी िविध के सुभीते नह ह, वहां ‘ था-जनन’ क िविध काम
आती है। इसम शु या लंग-जीवाणु के िबना ही काम चल जाता है। ये िड ब य ही
ौढ़ता को प च ं ते ह य ही शरीर क रचना होने लगती है। मधुम खी का नर इसी था-
जनन िविध से उ प होता है। उसके माता-िपता नह ह–पर तु रानी म खी वीयरिहत
अ ड से ही पैदा होती है। इस कार जनन या के िहसाब से चार कार के ाणी संसार
म ह–भेदज, अंकुरज, मैथुनज और अना दतः अ डज। अब िव सृि के िनयमन म मैथुनी
या कृ ित म अपने आप उपजी या कसी ई र या क ता का इसम हाथ है, यह
िवचारणीय है। और रावण ने कसी दैवी क ता को वीकार नह कया। उ ह ने मनु य
को ही अपनी सृि का क ा-ध ा माना और अपने को ही ई र कहा। लाख -करोड़ वष
म िवकिसत होकर अयोिनज से योिनज सृि ई है। मनु य-वृि क यह क पना है क
उसने जगत् क वृि काम-वासना क ओर देखकर, सम त ािणय को काममोिहत
पाकर लंग-योिन क उपासना क न व डाली।
ईसाई धम के चार से पूव पा ा य देश क ायः सभी जाितय म कसी न
कसी प म लंग-पूजा क था चिलत थी। रोम और यूनान दोन देश म मशः
ि येपस और फ लुस के नाम से लंग-पूजा होती थी। फ लुस फलेश का िबगड़ा प है।
लंग-पूजा इन दोन रा के ाचीन धम का धान धम-िच न था। वृषभ क मू त लंग के
साथ पू य थी। पूजन-िविध िह दु क भांित धूप-दीप आ द ारा होती थी। िम देश म
तो ‘हर’ और ‘ईिशः’ क उपासना उनके धम का धान अंग था। इन तीन देश म फा गुन
मास म, वस तो सव के प म लंग-पूजा ितवष समारोह से आ करती थी। िम म
‘ओिस रः’ नाम के देवता इिथओिपया के च शैल से िनकलती ई नील नदी के अिध ाता
माने गए थे। लुटाक का कहना है क उस समय िम म चिलत लंग-पूजा सारे पि छम
म चिलत थी।
ाचीन चीन और जापान के सािह य म भी लंग-पूजा का उ लेख है। अमे रका म
िमली ाचीन मू तय से मािणत है क अमे रका के आ द िनवासी लंग-पूजक थे।
ईसाइय के पुराने अहदनामे म िलखा है क रै हीवोयम के पु आशा ने अपनी माता को
लंग के सामने बिल देने से रोका था। पीछे उस लंग-मू त को तोड़-फोड़ दया गया था।
य दय का देवता बैल फे गो लंग-मू त ही था। उसका एक गु म था, िजसक दी ा
य दी ही ले सकते थे। मौयावी और मा रना िनवासी य दय के उपा य देव लंग क
थापना फे गगी शैल पर ई थी। इनक उपासना-िविध िम वािसय से िमलती-जुलती
थी। पहाड़ पर, जंगल म, बड़े वृ के नीचे य दय ने लंग और बछड़े क मू त थािपत क
थी। उसे वे बाल नाम से पूजते थे। वेदी के सामने धूप देते और लंग के सामने वाले वृषभ
‘न दी’ को हर अमाव या को पूजा चढ़ाते थे। िम के ओिस रस के लंग के सामने भी बैल
रहता था।
अरब म मुह मद के ादुभाव से पूव ‘लात’ नाम से लंग-पूजन होता था। इसी से
पि छमी लोग ने सोमनाथ के लंग को भी ‘लात’ कहा है। ‘लात’ क मू तयां दोन जगह
ब त िवशाल और र -ज टत थ । कहते ह क वह लंग पचास पोरसा ऊंचा एक ही प थर
का था। संभव है, इस िवराटकाय लंग के ‘लात’ नाम पर ही िवजय त भ को ‘लाट’ का
नाम दया गया–जैसे कु तुब क लाट। यह भी स भव है क ये िवजय- त भ उसी देवता
‘लात’ के तीक ह । कोषकार रचडसन का कहना है क ‘लात’ अ लाह क सबसे बड़ी
पु ी का नाम था और उसका िच न व मू त लंग क आकृ ित क थी। पाठक को यह न
भूलना चािहए क अ लाह, इलाही, इलोई ाचीन व णदेव के ही नाम ह।
म ा के काबे म जो लंग है, उसका भिव यपुराणकार म े र के नाम से उ लेख
करता है। यह एक काले प थर का लंग है, िजसे मुसलमान संगे-असवद कहते ह। पहले
इसराइली और य दी इसक पूजा करते थे। मुह मद के जीवन-काल म इसक पूजा प ड
के चार कु ल करते थे। ांस म भी ाचीन काल म लंग-पूजा का चलन था। वहां के
िगरज और यूिजयम म लंग के प थर मारक क भांित रखे ह। पा ा य देश म
लंगची एक स दाय ही था, िजसे फािलिस म कहते थे। भारत म भी दि ण म लंगायत
स दाय है।
इिज ट-मेिसफ और अशी रस ा त-वासी न दी पर बैठे ए, ि शूलह त और
ा -चमधारी िशव-मू त क पूजा बेलप से तथा अिभषेक दूध से करते थे। बेबीलोन म
एक हज़ार दो सौ फ ट का एक महा लंग था। ाजील देश म अ य त ाचीन अनेक
िशव लंग है। इटली म अनेक ईसाई िशव लंग पूजते ह। कॉटलै ड के लासगो नगर म एक
सुवणा छा दत िशव लंग है, िजसक पूजा होती है। फ िज़य स म ‘ए ट स’ व िननवा म
‘एषीर’ नाम के िशव लंग ह। य दय के देश म भी ब त-से ाचीन िशव लंग ह।
अफरी द तान, काबुल, बलख, बुखारा आ द थान म अनेक िशव लंग ह, िज ह वहां के
लोग पंचशेर और पंचवीर नाम से पुकारते ह।
इ डोचाइना के ‘अनाम’ म अनेक िशवालय ह। ाचीन काल म इस देश को च पा
कहते थे। वहां के ाचीन राजा िशवपूजक थे। वहां सं कृ त म अनेक िशलालेख, अनेक
िशवमू तयां तथा लंग िमले ह। क बोिडया म, िजसका ाचीन नाम ‘का बोज’ है तथा
जावा, सुमा ा आ द ीप म भी अनिगनत िशव लंग िमले ह। वहां के लोग लंग-पूजन
करते थे। भारत-चीन (इ डोचीन) ी े (म य बमा), हंसावली (दि ण बमा), ारावती
( याम), मलय ीप आ द सव िशव लंग और िशवमू तयां पाई जाती ह।
बेबीलोिनया, िम , चीन और भारत म ा िशव लंग को य द यान से देखा
जाए तो यौन उपासना के एक अिव सनीय त य का रह यो ाटन होगा। मसीह से पूव से
लेकर ई वी सन् से ब त बाद तक भी ऐसा तीत होता है क ी-पु ष क वत और
िमथुन- प म पूजा होती रही है। इन सभी देश म ऐसे देवता क पूजा चिलत थी,
िजनके स ब ध म कहा जाता है क उनम ी और पु ष दोन का समान ितिनिध व था।
बाइिबल म आदम, जो पृ वी पर आनेवाला थम ि है, ी-पु ष का समान
ितिनिध व लेकर आया। उसम ी-पु ष दोन ही क रचना मक शि थी।
गाज़ी म एक ाचीन िस ा ा आ है। उस पर मु ा अं कत है, िजससे पता
चलता है क देवता ‘अ ात’ क दो आकृ ितयां थ । इस कार के देवता को, िजनम ी-
पु ष दोन त व िनिहत रहते थे, आ मतु कहा जाता है। यूनान के ‘अपोलो’ तथा
‘डायना’ के स ब ध म कहा जाता है क उनम ी-पु ष दोन का समान ितिनिध व था।
बेबीलोन वाले यह िव ास रखते थे क सबसे थम जो पु ष उ प आ, उसके दो िसर
थे–एक ी का, दूसरा पु ष का। शरीर म भी दोना लंग क इं यां अं कत थ ।
शैव िह दू िशव का एक प अधनारी र मानते ह। एलोरा क गुहा म
अधनारी र क एक भ मू त है। वैसे भी शरीर का बायां अंग ी का माना जाता है।
िह दू पि यां अधाि गनी कहाती ह। अनेक देश के पुरातन सािह य म कहा गया है क
पहले ी-पु ष जुड़े ए थे, पीछे पृथक् -पृथक् ए। ‘ लेटो’ भी इसी धारणा पर िव ास
करते थे। अनेक दाशिनक बारहव शता दी तक यही धारणा रखते थे।
नृ य म हाथ क उं गिलय क भाव-भंिगमा और मु ा से िविभ यौन संकेत
िनकलते थे। ाचीन काल म िम म हाथ को रचना मक शि का तीक माना जाता था।
तजनी से य द सामने क ओर संकेत कर शेष उं गिलय को मोड़ िलया जाए तो उससे पु ष-
लंग का संकेत होता था। भारतीय नृ य म हाथ के दोन अंगूठ को आपस म िमलाकर
दोन हाथ क तजनी को िमलाती ई उं गिलय को सीध म तान देने से योिन का संकेत
होता है। य द दोन हाथा क हथेिलय को पर पर िमलाकर, दोन तजिनय को संयु
प म खड़ा कर दया जाए, और शेष उं गिलयां पर पर आब होकर झुक रह, तो वे
संभोग क भाव- ंजना का बोध कराती ह।
िशव के साथ जहां लंग-पूजन का एक करण आ, वहां िशव के साथ सप-धारण
क भी बात है। िस है क िशव सप को धारण करते ह। ाचीन िशव के िभि -िच म
सांप को अपनी पूंछ िनगलते दखाया गया है, इसका यह अथ है क वह अपने-आप म पूण
इकाई है। यूनान के पुराने मठ म जीिवत सप रखे जाते थे, िजनक र ा क व था
मि दर क देवदािसय के िज़ मे होती थी। इन देवदािसय को नागक या कहते थे। खासकर
‘अपोलो’ के मि दर म सप पाले जाते थे, जहां ि यां नंगी होकर उ ह खाना िखलाती थ ।
गे अं न सप िम के पुराने िशलािच म अं कत पाया गया है। बेबीलोन म देवी इ तार के
पूजक सप क भी पूजा करते थे। भारत म ‘ नाग-पंचमी’ के दन सप क पूजा ब त दन से
चिलत है। अ य त ाचीन काल म िम , यूनान, भारत, चीन, और जापान के लोग कमल
और कु मु दनी के फू ल को इसिलए मह व देते थे क कमल फू ल म ी-पु ष दोन का ही
ितिनिध व माना जाता था। कली म ी-भाव और फू ल म पु ष-भाव माना जाता था।
इन फू ल से मि दर का भी शृंगार होता था। भूम यसागर के अनेक देश के ाचीन िनवासी
ाचीन काल से डायन-योजन के भय से गले म लंग के आकार का तावीज़ बांधते ह। भारत
म भी ऐसे तावीज़ बांधे जाते ह। बेबीलोिनया और ाचीन ांस म लंग और योिन के
आकार क रो टयां बनाकर खास उ सव के समय देवी-पूजा करके खाई जाती थ ।
मैि सको और म य-उ र अमे रका म भी लंग-पूजा चिलत थी। िस लेखक ुसेनवक
िलखता है क लोलमी फखाडे़ लफस के समय एक वृहत् लंग क थापना क गई थी,
िजसक ल बाई 390 फ ट थी। यह लंग ऊपर से वणमि डत था। िहरोपोिलस म वीनस
के मि दर के सामने दो सौ फ ट ऊंचा एक प थर का लंग थािपत था।
के साथ न दी का स ब ध बताया गया है। न दी को एक बैल के प म िशव
का वाहन कहा गया है। हम बता चुके ह क वै दक सािह य म को एक सांड़ के समान
शि शाली बताया गया है। आ लायन गृ सू म एक शुलगव य का उ लेख है, िजसम
एक िचतकबरे बैल को मारकर ‘‘ ाय महादेवाय जु ो वध वहराय, कृ पया, शवाय,
िशवाय, भवाय, महादेवायो ाय, पशुपतये ाय, श करायेशानायाशनये वाहा’’–इस
कार म से उसक पूंछ, चाम, िसरऔर पैर क आ ित देने का उ लेख है।
वैभाकि फसेस के िस पर महे र क मू त और न दी बैल क मू त िचि नत िमली है।
इसका रा य-काल संभवतः ईसा क पहली शता दी माना जाता है। िम म, जहां िशव का
थान माना गया है, बैल-पूजा अ य त ाचीन काल म लंग-पूजा ही के समान मानी गई
थी। रोमन जूिलयस सीज़र ने िलखा है क िम म एक देवता ‘असीरन’ माना जाता था,
िजसक आकृ ित सांड़ क -सी थी। इसे उ पादन का ोतक माना जाता था। ‘एिपस’ नामक
सांड़ के पूजन का उ लेख िम के ाचीनतम इितहास म है। इस बैल म पूजनीय होने के
िलए कु छ खास िच न होने आव यक थे, जैसे पद का काला रं ग, माथे पर उभरा आ सफे द
चौकोर िच न, पीठ पर ग ड़-जैसा िच न। इन िच न वाला बैल य ही कह िमल जाता
था, वह तुर त पंजरे म ब द कर दया जाता था। उसे अ छा भोजन और सोने को नम
िबछौना दया जाता था। पीने के िलए पानी भी पिव कु एं से प च ं ाया जाता था। लोग
उसे एका त म रखते थे। के वल उ सव के समय म ही बाहर िनकालते थे। म ारा
उसक तुित, आराधना होती थी। और लगातार सात दन तक उसका ज मो सव मनाया
जाता था। बाहर से आया कोई दशक उसका दशन कए िबना वापस न जा सकता था। जब
उसक मृ यु होती थी, तो उसे सुगि धत लेप से अ यंत धूमधाम से दफनाया जाता था।
वै दक पिण लोग, जो यूरोप म फिणश कहाते ह और इबरानी जाित के पूवज ह, वे
भी लंगपूजक थे। वे बाले र लंग क पूजा करते थे। बाइिबल म इसे ‘िशउन’ कहा गया
है।
मोहनजोदड़ो और हड़ पा म जो लंग िमले ह, वे तमाम थोथी दाशिनक बात को
ख म कर देते ह। वे वा तव म िश क आकृ ितयां ह।
48. माया का वष–न

पुरात व और इितहास इस बात के सा ी ह क अब से हजार वष पहले उ र


अमे रका के दि ण सीमा त म, िजसे आजकल म य अमे रका कहते ह, ‘मय’ नाम क
अ यंत शि शाली जाित रहती थी। हमारे ाचीन पुराण-सािह य म ‘मय’ एक दानवे है,
जो वा तुशा का आ द पु ष माना जाता है। अमे रका क यह ‘मय’ जाित भी
िवशालकाय िशलाभवन के िनमाण म िस थी। ‘मय’ ने असुर , दानव और दै य के
िलए बड़े-बड़े ासाद, नगर, ह य और पुर का िनमाण कया था। ि पुर-यु म इस जाित
के नेता दानव को िशव ने आ ा त कर उसके ि पुर का िव वंस कया था। वतमान िम के
पि छम म ि पोली देश है व उसका मु य नगर ि पोली है। यही वह ि पुर है, िजसे िशव
ने िव वंस कया था। ि पोली देश का कु छ भाग, जो िसर टयन सागर के नाम से िस
है, जलम है। अभी कु छ दन पूव इस जलम नगर का पता पुरात व के अ वेषक को
लगा था।
अमे रका के ाचीन ‘मय’ लोग के भवन, मि दर और त भ आ यच कत करने
वाले ह। मय जाित क स यता आ यजनक और रह यपूण है। पा ा य पुरात विवद् उसे
‘अमे ज़ंग और पज़ लंग’ कहते ह। इस मय जाित के सा ा य क ाचीन राजधानी िचचेन
आइज़ा थी, िजसके भ ावशेष, व त देव-मि दर के अवशेष तथा राज ासाद क खुदाई
से जो साम ी िमली है, उससे इस ाचीन महाजाित क अ भुत स यता और कला-कौशल
का कु छ अनुमान कया जा सकता है। अ भुत रीित से िन मत कई ाचीन मय-नग रय का
उ ार अभी हाल म जंगल को तथा स दय के पंक- लेप आ द को प र कृ त कर कया
गया है। िचचेन आइज़ा–जो इस मय-सा ा य क कभी राजधानी रही थी–अतीव सु दर
नगरी थी। उस नगरी क दीवार रं ग-िबरं गी और िविवध कलािच से िचि त थ । ी म
ऋतु के िवहार, खेल-कू द और आमोद-उ सव के अनेक िच न वहां िमले ह। कु छ लोग का
यह भी अनुमान है क ‘ वाटेमाला’ क उ सम भूिम पर अवि थत ‘वेटेन’ नामक झील के
िनकट इन मय लोग का थम उपिनवेश था। वहां से उ र क ओर वे ‘युकटन’ तक प च ं े
और िचचेन आइज़ा नगरी क थापना क ।
आरि भक छः शताि दय तक मैि सको क खाड़ी से लगाकर ह डु रास उप–
सागर–पय त िभ -िभ थान म मय लोग ने िनवास कया। नगर बसाए, भवन और
देव थान बनाए। यह वह युग था, जब वहां का यातायात अित क ठन था। यह एक
चम का रक बात है क इन क ठन समय म इस जाित ने कै से ऐसी उ ित कर ली? पीछे
उ ह दु दन का सामना करना पड़ा। उनम स भवतः बड़े-बड़े िनणायक यु ए। तभी
अनेक स प नगर के साथ उनक महानगरी िचचेन आइज़ा भी उजड़ गई।
मय जाित के बनाए ए नगर म गगनचु बी अ ािलकाएं थ । उनके राज-माग
िशला-फलक से आ छा दत थे। मील ल बी सड़क थ , जो एक नगर को दूसरे से िमलाती
थ । वे संभवतः योितष-िव ा के भी पारं गत थे। वे हण का िववरण ितिथ और वार-
सिहत जानते थे। इस मय जाित के वहां अनेक िशलालेख ा ए ह। कु छ ह तिलिखत ंथ
भी ह। उ ह से उनके अ त व ोह का पता लगता है, पर वह ब त आधुिनक ईसा क
ारि भक शताि दय ही का है।
यह भी ात आ क उन पर पेनवाल ने आ मण कर अंत म उनका िवनाश
कया और उनका इितहास भी न कर डाला, िजससे इस जाित का पूण इितहास अ धकार
म डू ब गया। ाचीन राजधानी क सफाई और खुदाई से वहां मि दर, महल, िपरािमड,
बाज़ार, ना गृह, क तथा अ ािलकाएं िनकली ह, जो आजकल के मि दर के समान ह।
मील तक ब ती के िच न देखने को िमलते ह। एक ऐसे बृहत् आकार का मि दर है, िजसम
हज़ार ख भे थे। यो ा के भी भवन होते थे। यो ा बड़ी-बड़ी ढाल बांधते थे। वहां क
िच -िव ा, मू त-िव ा तथा अलंकार क बनावट िम से िमलती है। ई वी सन् 1782 म
पेन के कसी सेनानायक ने कसी अल य ंथ के आधार पर, जो उसे वहां गुफा म
िमला था, एक ंथ िलखा था, िजसका नाम था–‘टाइगर– ाइ ट क काली कताब’। इसी
ंथ के आधार पर डॉ. गन ने, जो अमरीका के िव यात आ य लॉिज ट और ए स लोरर
थे, घोर अर य म एक अ ात राजपथ का पता लगाया था। पुरात विवद् कहते ह क
उनक िव मयो पादक स यता और सं कृ ित यूरोप क स यता के जोड़ क थी। उनक ी,
समृि और शि शािलता, उनक उ त तथा संग ठत जीवन- णाली, उनके उ सव-
आयोग, उनक थाप य-कला क अ भुत शि और िनपुणता आज के स य संसार क
प ा क व तु थी।
वस त क सुषमा, वन, पवत, उप यका म फै ली थी। दूर-दूर तक अ और कपास
के खेत लहरा रहे थे। बीच-बीच म सु दर िवशाल मैदान म ह रण, शाबर, नीलगाय िवचर
रहे थे। प थर क बनी सड़क पर दानव-ना रय क भीड़ लग रही थी। पु ष के चेहरे
दाढ़ीदार न थे। उनके म तक पर र च दन का लेप लगा था। वे कमरब द, कपास के सूती
चोगे पहने ए थे। उनके मुखम डल सुिच ण थे। युवितय के अंग पर रं गीन सािड़यां
िलपटी ई थ । च दन, अग , के सर, क तूरी और अ य सुग ध- से उनके अंग
सुवािसत थे। उनके ल बे-ल बे सुिच ण के श म, जो सुगि धत तेल म िस थे, िविवध
पु प गुंथे ए थे। सभी नगर के राजपथ पर जा रहे थे। नगर म आज वष-न था। ि य
और पु ष क टोिलयां पृथक् -पृथक् नृ य करत , गाती-बजात , आन दम नगर म चार
ओर से आ रही थ । नगर-िनवासी उनका ग ध-माला आ द से स कार कर रहे थे।
राजभवन का आज अ भुत शृंगार कया गया था। देव, देवे , दानवे
वणाभरण से सि त हो रहे थे। दानव-कु ल म दानवे ही ई र थे और वे संसार ापी
आदेश देने क मता रखते थे। राजदशन साधारणतया जावग को िन य नह होते थे।
िज ह होते थे वे, उन पर अनेक ितब ध रखते थे। पर तु आज वष-न के दन सब कोई
दानवे के दशन-लाभ कर सकते थे। पर तु दानवे को कोई भी जन सीधा स बोिधत
नह कर सकता था, न दानवे के स मुख सीधा खड़ा रह सकता था। येक पु ष को
दानवे के सम घुटने टेककर बैठना और नतम तक होकर तथा राज-सिचव के मा यम
से देव कहकर िनवेदन करना पड़ता था। आज राजवग जन, राजप रवार के जन, अमा य,
कोषा य , सेनानायक सभी सज-धजकर राज ासाद के बाहर मैदान म एक ए थे और
होते जा रहे थे। वा तव म आज के दन रा य क सारी कु मा रका क नीलामी होनी थी।
उसी का यह वष-समारोह था। असुर-दानवकु ल म यही िनयम उन दन चिलत था।
माता-िपता का स तान पर कोई अिधकार न था। राजा राज-सेवा म कु मार का वे छा
से योग करता था, कु मा रका को राजा क अ य ता म नीलाम कया जाता था।
येक ा त को िनि त सं या म सैिनक यु के िलए देने पड़ते थे, िजनके साथ उनका
श वाहक भी होता था।
युवती कु मा रका के स ब ध म िनयम इस आधार पर था क वे ही रा य के
िलए जनसं या क वृि करती ह; अतः उनका मान असुर-दानव रा मे सव प र होता
था। ितवष वष-न के दन रा य-भर क युवती कु मा रकाएं राज ासाद के ांगण म
राजा के साि य म ऊंची बोली पर बेच दी जाती थ ।
दानव और असुर रा य म एक और भी िनयम था। वह यह क कोई भी असु दर
पु ष राज-सेवा नह कर सकता था। पु ष का मू य उसक यो यता नह , शरीर-गठन और
प-स दय पर िनभर था। जो पु ष िजतना पवान तथा गठीले शरीर का होता, उसे
उतना ही ऊंचा पद िमलता था। इसिलए असुर-दानव-रा म शरीर-स दय का बड़ा यान
रखा जाता था। कु प और दुबल ि ितर कार क दृि से देखे जाते थे। वे चाहे िजतने
उ कु ल म उ प ए ह , उ ह अपने प रवार म दास-कम करने पड़ते थे तथा िनकृ
भोजन और व िमलते थे। पर तु कु मा रका के संबंध म यह बात न थी। कु मा रकाएं
जनन क के मानी जाती थ । जनन ही उन दन सबसे मह वपूण ान-िव ान था।
इसी से जननेि य क पूजा उन दन सव असुर-दानवकु ल म चिलत होती जाती थी।
राजा चाहता था क असु दर और िवकलांग कु मा रकाएं भी वण देकर सु दर पु ष को
दी जाएं, िजससे वे सु दर ब को ज म दे सक।
कु मा रका क िब के िलए एक िवभाग था। उसम पुरोिहत का ाधा य होता
था।
हर दन चढ़े कु मा रका का िव य आर भ आ। दानवे मय राजयाजक
तथा मि य के साथ सुसि त हो वणपीठ पर आ बैठे। दानवे के साथ अनेक
भिव यवादी, द शि धारी,जादूगर तथा योितषी भी थे।वे सब लाल व पर
वणाभरण पहने ए थे। दानवे के ि य पाषद लाल पोशाक पर सोने क सांकल गले म
पहने राजा क बाट म ब ांजिल खड़े थे। दानवे क चेटी भी मोरपंख और छ िलए
दानवे के पीछे खड़ी थी। रथदल, हयदल, गजदल और पैदल सेना पंि ब अपने-अपने
यूथपितय क अधीनता मे सजी खड़ी थी। आर भ म म ो ार आ। देवता को बिल दी
गई और अितवृि , अनावृि , अवषण, तूफान और दु भ से रा सुरि त रहे तथा
दानवे वष भर स प , सं रह, इन सबके िलए होम-पूजन और पृथक् -पृथक् बिल दी
गई।
इसके बाद दानवे क वण- ितमा का पूजन िविवध उपचार से आ। दानवे
क मू त पर िविवध जाजन ने अपनी ानुसार बिल-भट दी। ब त ने वण दया, र
दया, ब त ने पशु-बिल दी। ब त ने अपनी स तान क बिल दी। राजदशन के उपल य
म दूर से आए ए ब त जन ने अपना ही क ठ काटकर आ मबिल दी। ये सब बिलदान
बही-खात म िलखे गए और बाद म दानवे क ओर से िजसक भट, बिल िजतनी
मू यवान् मािणत ई उतना ही उसे राज साद दया गया। वण, पद, भू-स पि ,
पशुधन, कु मा रकाएं, आ द-आ द।
अब कु मा रका का नीलाम आर भ आ। सबसे पहले सव े , सवािधक सु दरी
क याएं दानवे और याजक के िलए छांटकर उनके िनधा रत मू य का वण नीलाम
करने वाले अ य के पास जमा कर दया गया। इसके बाद बची कु मा रका म से सव े
सु दरी क या का ऊंची-से-ऊंची बोली बोलने वाले को वण लेकर नीलाम कर दया गया।
उसके बाद एक सव े सु दरी, फर साधारण क याएं बारी-बारी से नीलाम कर दी ग ।
अ त म कु पा और िवकलांगनाओ क बारी आई। उनका कौन ाहक हो सकता था।
अतः उ ह धन देकर बेचा गया। अिभ ाय यह क गरीब सु दर पु ष को वण देकर उन
क या को रखने के िलए राजी कया। इस कार वे सब क याएं उसी दन िबक ग । वे
सभी एक कार से िववािहता हो ग । सु दरी क या क िब से िमले वण का एक अंश
असु दरी और िवकलांग क या के खरीदार को दे दया गया, िजससे वे उनका भली-
भांित पोषण कर सक। पर तु यह खरीद-िब साधारण नह होती थी। इसके िलए देव-
साि य म ित ा करनी पड़ती थी, िजसका यायाधीश बड़ी कड़ाई से पालन कराते थे।
इस स ब ध म अपील भी क जाती थी। पर पर क शत शपथ और गवािहय ारा तय
होती थ । कोई भी पु ष इस कार क या का पित बनकर उसके साथ अ यायाचरण नह
कर सकता था। उसे क या का समुिचत भरण-पोषण करना पड़ता था।
दानव और असुर के रा यशासन म उनके कानून तीन भाग म िवभ थे : एक
धनस प का, दूसरा धनहीन का, तीसरा दास का। दास अपनी िनज क स पि रख
सकते थे। वे अपने दास भी खरीद सकते थे। दास के वामी को दास का भी सभी खच
वहन करना पड़ता था। दास के िलए क या भी खरीद लानी पड़ती थी। दास-पु भी दास
होते थे, पर तु य द दास का संबंध कसी अदास- ी से होने पर गभ रह जाता था तो वह
बालक दास नह माना जाता था। दास पए देकर मु भी हो सकते थे। नीलाम म अदास
कु मा रका खरीद सकते थे। दास क बांह पर उनके वािमय के नाम खोद दए जाते थे।
राज-कर कड़ाई से िलया जाता था; जो नह दे सकता था, वह अपने प रवार के साथ बेच
दया जाता था।
49. ेय और ेय

िव िच दानव क क या मािलनी भी नीलाम होने को आई थी। दानव-क या का


रं ग तपाए ए वण के समान और मुख शतदल कमल के समान था। क या क देह ी उषा
के आलोक क भांित मनोरम थी। उसके सुिच ण पद-चु बी के श भ र के समान काले थे।
ने क उ वल योित शु न के समान थी और उसका मृद ु हास शारदीय पू णमा क
अमल चांदनी-सा िनमल था। उसका क ठ- वर वीणािविनि दत था, ास म पा रजात
कु सुम का सौरभ था। वह षोडशी बाला वस त म िखले ए फू ल से लदी-फदी एक लितका
के समान सुषमा रखती थी।
आसुरायण रै असुर-याजक थे, वेद ष थे। ेय और ेय के रह य के ाता िस
थे। उनक बड़ी भू-स पि थी। िवशाल ह य, भूिम, हाथी, घोड़े, वण, र और ब त-सी
सु दरी, प-यौवन-स प बालाएं उनके पास थ । िविवध भोग का ऋिषवर आन द से
उपभोग करते और दानव , असुर क सब सेवा-अचना हण करते थे।
रै ब त बूढ़े और कु प थे। दांत उनके सबके सब सड़-गल गए थे। शरीर का मांस
लटक गया था। ने क योित भी धुंधली पड़ गई थी, पर तु काम-भोग म उनक बड़ी
िच थी। वे ब त ब ढ़या कौशेय के व पहनते, वण-आसन पर बैठते, उ म सुवािसत
सोमपान करते तथा त णी बाला का साि य-सुख भोगते थे। नए-नए यौवन उ ह ब त
पस द थे।
कु मा रका क जो नीलामी असुर के माया नगर म वष-न पर होती थी,
उसम याजक तथा राजा के िलए सबसे थम अपनी पस द क कु मा रकाएं चुनकर
खरीद लेने क छू ट होती थी। उनके चुन िलए जाने के बाद बची ई कु मा रका का
सावजिनक नीलाम होता था। पर तु एक िनयम का पालन तो सव ही होता था क य द
कु मा रका खरीदार को वयं नापस द करे तो नीलाम र हो जाता था। याजक और
राजा का भी कु मा रका क वीकृ ित के िबना नीलाम मंजूर नह होता था। आसुरायण
रै ने मािलनी को अपने िलए चुन िलया और िनयत वण-रािश नीलाम के अफसर के
पास जमा कर दी, पर तु कु प और बूढ़े रै को मािलनी ने अ वीकार कर दया। फलतः
उनक बोली र हो गई। इस पर आसुरायण रै असंतु होकर चले गए। कोई अ य
कु मा रका उ ह ने नह खरीदी। इसी मािलनी को रै से ि गुण वण देकर एक दानव
राजा जान ुित ने खरीद िलया। जान ुित सु दर और त ण था। उसक ब त भारी भू-
स पि थी। मािलनी ने मु कराकर उसके हाथ िबकना वीकार कर उसे उपकृ त कर दया।
काला तर म जान ुित क इ छा ई क ेय और ेय के रह य को जाने। उन
दन असुर और देव को इस कार के रह य को जानने क बड़ी इ छा रहती थी, पर तु
ये ऋिषगण उसे सदा एक गोपनीय रह य बनाए रहते थे। उसे बड़ी टाल-टू ल और भारी
दि णा लेकर बड़ी अटपटी भाषा म बताया करते थे। वह राजा रै के पास छः सौ गाय
और ब त-सा वण, मिण, रथ, कौशेय और धन लेकर गया और उन आसुरायण रै से
याचना क क वह यह भट वीकार कर और ेय और ेय का भेद उसे बता द। पर रै उस
कु मा रका को भूले न थे। उसे राजा ने दुगुनी डाक देकर खरीद िलया था, इस कारण वे इस
राजा से जले-भुने बैठे थे। उ ह ने उसक मू यवान भट क ओर आंख उठाकर भी नह देखा
और ु होकर कहा–‘‘अरे शू , जा भाग। यह हमको नह चािहए।’’
राजा िनराश होकर लौट गया और ऋिष का अिभ ाय जान दुबारा एक हजार
गाय, ब त-सा धन और उस गांव का प ा, िजसम ऋिष रहते थे तथा वही कु मा रका
मािलनी लेकर ऋिष के पास फर प च ं ा और णाम कर कहा–‘‘हेे ऋिष, यह भट आपके
िलए है। मुझे ेय और ेय का भेद बताइए।’’ कु मा रका का मुंह देखते ही बूढ़े ऋिष खुशी
से िखल गए। उ ह ने कहा–‘‘अरे शू , आ बैठ, इस सु दर मुख-कमल क बदौलत सुन, ेय
और ेय दो माग ह। ेय को िव ा और ेय को अिव ा कहते ह। दोन पर पर-िव ह।
ेय से िनवृि और िनवृि से मो होता है तथा ेय से वृि और वृि से ज म-मरण
होता है। धन, ऐ य आ द लौ कक सुख का समावेश ेय म है और इन सबका याग ेय
है। जा भाग, यह रह य इतना ही यथे है।’’
50. आरोह त पम्

पर तु िव िच दानव क बेटी एकच असुर पर मोिहत थी। एकच फू तवान


त कर असुर था। गहन वन के उस पार दुगम िग रशृंग पर उसका दुगम दुग था। दुग जीण
और अित ाचीन था। वहां अपने एक सह त कर दानव के साथ वह िन रहता था।
त कर-वृि और आखेट उसका सन था। उ म घोड़े और सु दरी कु मा रकाएं, जहां से
जैसे हाथ लगे, उड़ा ले जाने का उसे शौक था। यह वयं एक दुदा त धनुधर यो ा और
अ ारोही था। वैसे ही उसके संगी-साथी भी थे। उस दुगम दुग म उसने ब त-से अमू य
अ और त णी कु मा रकाएं एक कर रखी थ ।
वष-न के दन यह मायानगरी म मािलनी क डाक बोलने गया था। मािलनी
से उसक साठ-गांठ पहले से ही थी, पर तु उसक डाक ब त ऊंची बोली गई। थम रै
ऋिष ने ही ब त वण दया और जान ुित ने उसके िलए ि गुण वण का ढेर लगा दया।
इससे एकच िन पाय हो गया। इतना वण उसके पास न था। वह हाथ मलता रह गया
और जान ुित मािलनी को अपने गध के रथ पर बैठाकर ले गया।
जान ुित बड़ा स प दै य था। उसका महल, सेना, सैिनक-सुर ा सभी कु छ था।
उसके अवरोध से मािलनी को उड़ा ले जाना एकच के िलए संभव न था। जान ुित का
डाक वीकार करने को छोड़ मािलनी के िलए दूसरा उपाय न था। इ कारी का कोई कारण
वह बता नह सकती थी। दुरा ह करने पर उसका कौमाय लांिछत होता था। मयादा भंग
होती थी। अतः उसने चिलत रवाज के अनुसार उस समय हंसकर जान ुित के हाथ
िबकना वीकार कर िलया। एकच तावपेच खाकर रह गया, फर भी उसने मािलनी क
आशा नह छोड़ी। वह उसक ताक म रहा। मािलनी को यहां ब त ऐ य ा आ, पर
साहचय उसे नह िमला। असुर राजा जान ुित त ण और सु दर था, पर साहिसक न था।
मािलनी के मन म जो लौहपु ष बसा था, उसका मन वह था। वह भी कसी तरह
जान ुित के फं दे से छू टना चाह रही थी। इसी से वह रै को दे दी जाए, इस ताव को
उसने जरा ननु-नच करके झट वीकार कर िलया। वह जानती थी क जान ुित के महल
क अपे ा ऋिष के अवरोध से भाग जाने के उसे ब त सुअवसर थे। य द उसे रै ने
नीलाम म खरीद िलया होता, तो उसका उनके यहां से भागना एक कानूनी अपराध होता,
पर तु अब वह भाग सकती थी।
रै ने ‘आरोह त पम्’ का समारोह कया। यह समारोह असुर म सुहागरात जैसा
होता था। फू ल क श या रची गई। ऋिष का शयन-मि दर धूप-सुवास-च चत कया गया।
इ जन को सोमपान कराया गया। देव-िपतृजन को बिल दी गई। ऋिष के अवरोध म
ब त ि यां थ । वे मािलनी को ान-म न से, व ालंकार से सि त-स प करके , बूढ़े,
कामुक, धनी और ल पट उस ऋिष के शयनागार म ले ग । ऋिष ने कहा–‘‘आरोह
त पम्!’’
क तु मािलनी ने अ वीकार करके उ र दया–‘‘भ ा वधूभवित य सुपेशा वयं
सा िम ं वृणुते जने िचत्।’’
ऋिष ने कहा–‘‘देवा अ े यप त प ीः सम पृश त तु व त तनूिभः।’’
मािलनी ने उ र दया–‘‘यथासौ मम के वलो ना यासां क तया न।’’
ऋिष ने कहा–‘‘सूयव नारी िव पा। तां पूषंि छवत मामैरय व य यां बीजं
मनु या वपि त। या न ऊ उशती िव याित य यामुश तः हराम शेपम्।’’
मािलनी ने अ वीकार करते ए कहा–‘‘या पूवप तं िव वा या यं िव दते परम्।
प ोदनं च तावदजं ददातो न िवयोषत।’’
इसी कार ब त कार से वै दक वाद-िववाद आ, पर तु मािलनी ने श या-
रोहण नह कया। ऋिष को पंचोदन-अनु ान वीकार करना पड़ा। अनु ान म ब त
खटपट करनी पड़ी। ब त देव, दै य, असुर, आ जन को आमि त करना पड़ा। देव को
बिल दी गई। आ के िलए य कए गए। दै य , असुर , ऋिषय को भोज दए गए, पर तु
समारोह क इस भीड़-भाड़ म अवसर पाकर असुर द यु एकच मािलनी को उठाकर घोड़े
पर बैठकर उड़नछू हो गया। सारा ही समारोह क गया। एकच द यु के दुजय दुग से
मािलनी को वापस लाने का साहस कसी को नह आ, पर तु ऋिष रै ऐसे न थे जो
आसानी से उस मुख को भूल जाते। उ ह ने एकाक ही असुर एकच के उस दु ह दुगम दुग
म जाने क ठान ली और वे खोज-पता लगाते गहन वन म घुस।े वन म असं य हं ज तु
थे–अनेक दुगम नद, नदी, पवत, उप यकाएं थ । पर तु ऋिषवर के दय म काम वाला धू-
धू जल रही थी। वे सब क और बाधा को पार करते ए अ ततः एकच के िग रिशखर
पर अवि थत दुग के ार पर जा खड़े ए।
य दुग के ार तक प च ं ना आसान काम न था। ऋिष एकाक थे, पदाितक थे।
इससे जा प च ं ।े सेना-साधन होने पर नह प चं सकते थे। माग संकरा था, दु ह था।
सीधी चढ़ाई थी। जगह-जगह बुज पर भारी-भारी िशलाएं इस ढंग से रखी ई थ जो
चाहे जब लुढ़का दी जात और सैकड़ मनु य क िपसकर चटनी हो जाती। पर तु बुज पर
िनयु असुर ने इस बूढ़े, िनर एकाक ऋिष को देखकर बाधा नह डाली। ऋिष ने दुग-
ार पर प च ं कर पुकार क और एकच द युराज से िमलने क इ छा कट क । सूचना
पाकर एकच ने ऋिष क सादर अ यथना क । अ य-पा दया और आने का कारण
पूछा।
ऋिष ने कहा–‘‘तू मेरी एक दासी को हर लाया है।’’
‘‘कौन दासी? मुझे तो मरण नह । या वह यहां है?’’
‘‘मा सय न कर। तूने ही उसे हरण कया है, वह अव य ही यहां होगी।’’
‘‘ या कसी ने देखा?’’
‘‘देखा नह , म जानता ।ं ’’
‘‘आप उसे पहचानते ह?’’
‘‘ य नह , वह नवकु सुम-कोमलांगी है, द पा है, मृग-शावक-से उसके अमल
ने ह, वण-सा उसका गा है। भ र के गुंजन-सी उसक वाणी है, पु प-गुि फता लता-सी
देहयि है।’’
‘‘वाह, ऐसी नवकु मुस-कोमलांगी, सु दरी, सुषमावती बाला म मेरी ब त िच
है। ऐसी ब त कोमलांिगयां मने देश-देश से हरण करके एक क ह। यहां ऐसी सु द रयां
ब त ह। आइए, अवरोध म चलकर देिखए, आपक दासी यहां है भी!’’
तब वह िवकट द यु बूढ़े ऋिष को भलीभांित िखझाने के िलए अवरोध म ले गया,
वहां सैकड़ िवलासवती सु द रयां िविवध ड़ा म म थ । वहां प क हाट लगी थी।
प के उस खेत को देखकर ऋिषवर भाव-मु ध ठगे-से रह गए। इसी समय उनक दृि
मािलनी पर पड़ी, जो एक लता-म डप म पु पगुि फत झूले पर आन द से झूल रही थी।
ऋिष ने उं गली उठाकर कहा–‘‘वह रही, वह है!’’
एकच ने हंसकर लापरवाही से कहा–‘‘वाह, वह तो िव िच दानव क क या
मािलनी है।’’
“ हां-हां, वही है मेरी दासी, िजसे तू उड़ा लाया है। फे र दे मेरी दासी।’’
‘‘ क तु यह आपक दासी कै से ई? आपने तो इसे खरीदा नह ।’’
‘‘उस म दभा या ने मेरे हाथ िबकना अ वीकार कर दया था।’’
‘‘तो फर?’’
‘‘उसे जान ुित ने ि गुण वण देकर खरीद िलया था, फर मुझे बेच दया।’’
‘‘आपने वण दया था?’’
‘‘ वण नह रे , मने उस शू को ेय और ेय का रह य बताया था।’’
‘‘तो यह खरीदा कहां? दान आ।’’
‘‘एक ही बात है; ला, लौटा दे मुझे।’’
‘‘पर तु वह तो मेरी ेयसी है।’’
‘‘अरे तेरे अवरोध म तो ब त ह, एक उसे मुझे लौटा दे।’’
‘‘ऐसी सु दर बाला म मेरी ब त िच है, ऋिषवर! फर वह तो मेरी ेयसी है।
लौटा नह सकता।’’
‘‘अरे , तू ऋिष का भाग हड़पना चाहता है। चल, म तुझे भी ेय और ेय का भेद
बता सकता ।ं ला, लौटा दे मेरी दासी।’’
द यु ने हंसकर कहा–‘‘ ेय और ेय का भेद म जानता ं ऋिषवर! पर आप पर म
एक अनु ह कर सकता ।ं
‘‘वह या?’’
‘‘मेरा एक िनयम है। म िन य नई सु द रयां देश-देश से हरण करके लाता ।ं
उनका यहां सब भांित मनोरं जन और स कार होता है। एक वष म उ ह अपने अवरोध म
रखता ।ं एक वष क अविध म जो सु दरी गभवती हो गई, उसे तो सदा के िलए अपने
पास रख लेता ं और जो एक वष म गभवती न ई, उसे अपने सेवक म बांट देता ।ं सो
तुम अगले वष आना। य द तु हारी यह दासी तब तक गभवती न ई, तो तु ह ही दे दूग ं ा।
कसी दूसरे सेवक को नह दूग ं ा।’’
िववश, ऋिष िन पाय घर लौट आए।
51. राजकु मार का दूषण

दि दग त म घूम- फरकर रावण ने पृ वी क राजनीितक और साम रक स ा


को अपने मन म तोल िलया। कहां कै से कससे लोहा िलया जाएगा, इसक योजना उसने
मन-ही-मन बना ली। फर उसने दोन भारतीय सैिनक-सि वेश –द डकार य और
नैिमषार य–का सू म िनरी ण कया। द डकार य के र पाल खर-दूषण और नैिमषार य
के र पाल मारीच और सुबा को आव यक गु आदेश दए। फर वह खूब सावधानी से
लंका म लौट आया।
लंका म उसका धूमधाम से वागत आ। नृ य, वा और दीपावली से उसक
अ यथना ई। रा स कु लवधु ने उस पर अ त-लाजा बरसा । रा स- मुख नागर ने
उसका जय-जयकार कया। हष और उ साह से अिभभूत हो रावण ने अपने वण-महालय
म वेश कया।
रावण ने अपने पीछे अपने छोटे भाई िवभीषण को यौवरा य दे, अपने नाना
सुमाली को धानमं ी और सेनानायक बना दया था। अब सबसे थम इ ह दोन ने
िख मन आकर उसका अिभन दन कया। उ ह िख देखकर रावण ने कहा–‘‘मातामह,
या कारण है क आप िख मन क ह? अरे िवभीषण ाता, य तेरा मुख वष मुख मेघ
के समान हो रहा है?’’
इस पर िवभीषण तो मुख नीचा कर मौन हो रहा, पर तु सुमाली दै य ने कहा–
‘‘पु , हमारा कु ल दूिषत हो गया। घर का िछ हम तुझसे कै से कह?’’
‘‘ या आ मातामह?’’
‘‘तेरी अनुपि थित म हम अमया दत हो गए।’’
‘‘ क तु कस कार?’’
‘‘ माद ही कहना चािहए। और कस कार?’’
‘‘ कसका माद मातामह?’’
‘‘मेरा ही पु , तूने मुझे ही तो लंका और राजप रवार क र ा का भार स पा था।
िवभीषण तो अभी िनपट बालक ही है।’’
‘‘सो लंका म कह कु छ दोष उ प हो गया?’’
‘‘लंका म नह पु , राजकु ल म!’’
‘‘राजकु ल म या आ?’’
‘‘अनातराज मधु लंका आया था।’’
‘‘आनतराज मधु दै य तो हमारा स ब धी है, आपका प रजन है, सु िति त
राजवग है, यो ा है। या उसका लंका म यथावत् वागत नह आ? राजकु ल ने कह
अिवनय कया उस स मा य अितिथ के ित?’’
‘‘नह पु , आित य ही तो राजकु ल का दूषण हो गया।’’
‘‘ क तु कै से?’’
‘‘हमने उसका लंका म भ वागत कया।’’
‘‘सु ु !’’
“ राज-महालय और अ तःपुर म उसे आ मीय क भांित िति त कया।’’
‘‘आप राजकु ल क मयादा जानते ह, आपने राजकु ल क मयादा के अनुकूल ही
कया।’’
‘‘ क तु राजकु ल क मयादा भंग हो गई।’’
‘‘ कसने भंग क ?’’
‘‘इसी अितिथ चोर ने?’’
‘‘ या कहते ह आप मातामह?’’
‘‘वह चोर मेरे भाई मा यवान् क पु ी, तेरी बहन कु भीनसी म अनुर हो
गया।’’
‘‘सुपा है मधु दै य। उसे कु भीनसी देकर हमारा कु ल सुपूिजत होगा।’’
‘‘यह बात ही न रही पु !’’
‘‘कै से, या हमारी बहन कु भीनसी मधु को नह चाहती?’’
‘‘वह तो उसे हरण कर ले गया।’’
‘‘ या मधु?’’ रावण के दोन ने जल उठे । उसके नथुने फू ल गए। उसने िवषधर
सप क भांित फु फकार मारकर कहा–‘‘ या आपके रहते मातामह?’’
‘‘पु , म तो म ही म रहा। फर उस समय म एक गु तर राज-काज से ीप-
समूह म चला गया था।’’
‘‘और भाई कु भकण?’’
‘‘वह सो रहा था।’’
‘‘िवभीषण?’’
‘‘वह आक ठ जल म तप कर रहा था।’’
‘‘पु मेघनाद?’’
‘‘य म दीि त बैठा था।’’
“ मि गण, रा स यो ा, हमारे सेनापित?’’
‘‘उ ह ने िवकट यु कया, पर मधु ने सभी को परा त कया। वह हमारे सुपूिजत
राजकु ल के म तक पर लात मारकर बलात् हमारी क या का हरण कर ले गया, पु !’’
‘‘वह हमारे सुरि त अ तःपुर से बलपूवक हमारी बहन कु भीनसी को हरण कर
ले गया, आप यह कहना चाहते ह?’’
‘‘हां, पु !’’
‘‘और भी कु छ है?’’
‘‘हां, िव ुि व!’’
‘‘िव ुि व? कौन है वह?’’
‘‘एक त ण दानव है।’’
‘‘उसके स ब ध म आप या कहना चाहते ह?’’
‘‘वह लंका म आया है।’’
‘‘तो अव य ही आपने उसका समुिचत स कार कया होगा।’’
‘‘नह कया, पु !’’
‘‘नह कया?’’
‘‘हमारे ऊपर तुम गु भार स प गए थे–लंका से भी बढ़कर राजकु ल क र ा
का।’’
‘‘सो फर?’’
‘‘राजकु ल हमारी ही असावधानी से दूिषत आ। मधु दै य...’’,
‘‘सो तो सुना, िव ुि व क ही बात किहए।’’
‘‘यह कहता ,ं वह इधर ब धा आता-जाता रहा। उसने कहा–मृगया म मेरी
अिभ िच है।’’
‘‘इसम दोष या है?’’
‘‘नह है। दोष क बात दूसरी है।’’
‘‘ या?’’
‘‘वह सूपनखा म सािभ ाय दृि रखता है।’’
‘‘तो?’’
‘‘हम मधु दै य का कटु अनुभव ले चुके थे। हमने िव ुि व को अ तःपुर से दूर
ही रखा।’’
‘‘वह अब कहां है?’’
‘‘लंका ही म कह है।’’
‘‘सूपनखा बहन य द उसे पस द करती है तो हम उसे िव ुि व को दे दगे।’’
‘‘आपक बात दूसरी है, हम ऐसा करने म वत न थे, हमने सावधानी रखी।’’
‘‘ या आपने सूपनखा से भी बात क ?’’
‘‘नह पु , हम के वल मयादार क ह।’’
‘‘ या वह कभी यहां आता है?’’
‘‘िछपकर। सूपनखा से िमलने।’’
‘‘ क तु आप?’’
‘‘उसे रोक नह सकते। बड़ा चतुर है, चपल भी।’’
‘‘म सूपनखा से बात क ं गा और िजसने मेरा कु ल दूिषत कया है, उसे दंड दूग
ं ा।
पु मेघनाद कहां है?’’
“िनकु भला-उ ान म य -दीि त है।’’
‘‘तो वह म उससे िमलने जाऊंगा। मेरा रथ मंगवाइए।’’
सुमाली ने कहा–‘अ छा’ और वह वहां से चला गया। रावण ने िवभीषण क पीठ
पर हाथ फे रकर कहा–‘‘भाई, कातर न हो। जाओ, तुम िव ाम करो।’’ और वह पु
मेघनाद से िमलने को उठा।
52. िनकु भला–य ागार

ि कू ट-उप यका म समु -तीर से तिनक हटकर रमणीय िनकु भला-उ ान था।
उ ान म एक बड़ा सरोवर था। ताल, तमाल, िह ताल, मौलिसरी और च दन के वृ थे।
उ ान अ य त िव तृत था। उसम िविवध लता-म डप, लता-गु म, वीथी और चौक थे।
हरी घास के बड़े-बड़े चौगान थे। सघन छाया म नाना जलचर, नभचर, िवहंग और जीव
वहां िवचरण करते थे। वहां का दृ य बड़ा ही मनोरम था।
सरोवर के तीर पर एक फ टक-वेदी पर मेघनाद कृ ण मृगचम पहने, हाथ म
कम डल िलए, िसर पर िशखा बढ़ाए, य सू पहने, दीि त हो, मौन त धारण कए बैठा
था। पास ही दै य-याजक समासीन हो िविधपूवक उससे य करा रहे थे।
रावण को यह सब अ छा न लगा। उसने कहा–‘‘पु , यह तुम या कर रहे हो?’’
पर तु मेघनाद उसी कार िन ल बैठा रहा।इस पर रावण ने फर
कया–‘‘अरे मेघनाद, यह तू कै सा अनु ान कर रहा है? य कर रहा है? मुझे ठीक-ठीक
बता।’’ पर तु मेघनाद फर भी मौन-जड़ रहा। तब याि क ने कहा–‘‘हे र े , तु हारे पु
मेघनाद ने छः य समा कर िलए ह।’’
‘‘कै से छः य ?’’
‘‘जैसे वेद-िविहत ह–अि ोम, अ मेध, ब सुवणक, वै णव और राजसूय।’’
‘‘ क तु इनम तो देव क पूजा होती है।ै या रावण के पु को इन मूख देव क
पूजा करना उिचत है?’’
‘‘र े अब तक क पर परा तो यही रही है।’’
‘‘र -कु ल म यह पर परा न चलेगी, र -कु ल के इस आयु मान् को तो इन
देवता को श ु क भांित यु म जय करके उ ह ब दी बनाना होगा।’’
‘‘ क तु र े , देवगण ब दी कै से ह गे?’’
‘‘हमारे बल परा म से, मने अपनी र -सं कृ ित म के वल एक ही देव को
वीकार कया है।’’
‘‘वह कौन है?’’
‘‘महे र, वृषभ वज , शंकर! उठ पु , इन हीन देव का आ य याग! और जा,
भूतपित क अचना कर! फर उनके साि य से दुजय देव को ब दी बनाकर अपनी
सेवा म रख!’’
‘‘रा से के ऐसे वचन सुनकर मेघनाद क ं ृ ित कर, य ासन छोड़ उठ खड़ा आ।
य -सू उसने तोड़ दया। िशखा काट फक । य -हिव पशु को िखला दी। फर वह
ब ांजिल हो, िपता के चरण म िगर गया। उसने रावण के चरण म म तक टेककर
कहा–‘‘हे तात, कौन ह वे दुलभ महे र ?’’
‘‘वे शरवन के उस पार उ ुंग िहम-िशखर पर रहते ह। जा और देवजय करने
िनिम उनसे वर ा कर। उनका साि य ा करके तू कामचारी हो सकता है। उनसे
खेचरमु ा, मृ युंजयिसि , देविसि , और द ा को ा कर।’’ इतना कह, रावण ने
भुजा उठाकर कहा–‘‘सब देव, दै य, य , क र, असुर, नर, नाग सुन–रा स का यह वंश
अब से कभी देवाचन न करे गा। देव इस वंश के दास ह, पूजाह नह । पूजाह के वल
देवािधदेव महादेव वृषाभ वज ह।’’
मेघनाद ने अल य को सा ांग िणपात कया और कहा–‘‘हे िपता, म यथावत्
यम-िनयम-अनु ान करके भगवान् वृषाभ वज क शरण म जाता ।ं ’’
‘‘जा पु , और महत् ेय को िस कर। फर हम इन दुबल देव का स मुख समर
म िनधन कर, िव म एक र -सं कृ ित का सार करगे।’’
मेघनाद ने रावण क व दना क और गध के वायुवेगी रथ म बैठ वहां से थान
कया। रावण भी अब िचर-िवयोग-िवद धा सु दरी सुकुमारी म दोदरी का यान कर अपने
अ तःपुर क ओर चला।
53. अ तःपुर म

अ तःपुर म र मिहषी म दोदरी ने रावण का भ वागत कया। सब


मंगलोपचार कए। यार, िवरह, उपाल भ और मान-मन वल आ, रित-िवलास आ।
िमलन-यािमनी मधुयािमनी क भांित तीत ई। सु भात आ। िन य नैिमि क काय से
िनवृ हो, रावण ने अब अपने र महासा ा य के िव तार पर यान दया। इसी महत्
काय के िलए उसने सारी पृ वी क या ा क थी। वह धम और राजनीित, दोन म
सावभौमता क थापना करने का व देख रहा था। िजस महदु े य क पू त के िलए
उसने अपने ाणािधक पु मेघनाद को मृ यु य के साि य म भेज दया था, उसक
पू त के िलए उसे अब अपने महावीर भाई कु भकण, महाकू टनीित सुमाली तथा अपने
मि य से स परामश लेने थे। उसे पृ वी के सब द पाल और लोकपाल को जय करना
था। सव अपनी र -सं कृ ित का डंका पीटना था।वह अभी तक ऋिषकु मार और स -
ीपािधपित ही था। क तु अब वह पृ वी भर के नृवंश का मिहदेव बनना चाह रहा था।
राि ही म उसने अपने सब मुख राजपु ष और रा स मह न को भोर म
सभा करने क आ ा दे दी थी। अब वह ातः कृ य से िनवृ हो य ही सभा-भवन क
ओर जाने को तुत आ, तभी म दोदरी ने आगे बढ़कर कहा–
‘‘मुझे र े से कु छ िनवेदन करना है।’’
‘‘ क तु म तो अभी ब त त ,ं या अग य क बात है?’’
‘‘है तो।’’
‘‘ कसके स ब ध म?’’
“र -राजकु मारी सूपनखा के स ब ध म।’’
‘‘हमारी ि य बहन के स ब ध म तु ह या कहना है? या कु छ िच तनीय बात
है?’’
‘‘िच तनीय नह , पर तु िवचारणीय तो है। म उसके भावी जीवन–उसके िववाह
के स ब ध म कहना चाह रही थी। अभी तक हमने इस स ब ध म िवचार ही नह कया है,
पर तु अब वह वय क भी तो हो गई है।’’
‘‘िन स देह वह हम तीन भाइय क बहन है। उसक क याण-कामना से म कै से
िवमुख हो सकता ?ं ’’
‘‘यही तो म भी चाहती ।ं अब हम इस को टाल भी तो नह सकते!’’
‘‘ या कह हम लोग से असावधानी ई है?’’
‘‘नह , पर तु अब हम असावधान रहना उिचत नह है। पर तु र े या आज
ब त त ह?’’
‘‘ऐसा ही है।’’
‘‘पर तु बात ब त आगे बढ़ने से पूव हम कु छ करना होगा।’’
‘‘अ छा, िव ुि व क ओर तो तु हारा संकेत नह है, ि ये?’’
‘‘िन संदह े , सूपनखा उससे ेम करती है।’’
‘‘बुरा या है, िव ुि व एक उ वंशीय त ण दानवकु मार है। सु दर और स य
है। य द वह उससे ेम करती है तो म उसे अनुमित दूग ं ा।’’
‘‘पर म समझती ं क वह लड़क अभी ेम के त व से िनता त अनिभ है। वह
तो उससे िववाह करने को आतुर हो रही है।’’
‘‘तो म उसका अिभन दन करता ।ं य न वे पर पर द पित बन जाएं?’’
‘‘आह, पर मुझे आपि है, वािमन्!’’
‘‘ य ि ये, य द हमारी बहन सूपनखा िव ुि व को यार करती है, तो हम
य इस संबंध म आपि होनी चािहए?’’
‘‘ या र े ने उसे देखा है?’’
‘‘नह , तुमने?’’
‘‘मने भी नह , वह सदैव िछपकर गु प से िमलता है।’’
‘‘तो न सही हम उससे प रिचत। सूपनखा तो उससे भलीभांित प रिचत है। और
यह उसी का िवषय भी है।’’
‘‘यही तो बात है।’’
‘‘ या सूपनखा से तु हारी इस संबंध म कु छ बात ई है’’
‘‘बस इतनी ही क वह उसे यार करती है।’’
‘‘बस, तो ठीक है।’’
‘‘पर तु हम अपना दािय व देखना है, रा से , हमारे र -कु ल क एक मयादा
है।’’
‘‘िन संदह े , पर तु हारा अिभ ाय या है?’’
‘‘वह अभी िनपट ब ी है, नह जानती, ेम का जीवन पर कतना भार पड़ता है।
यह बात तो हमारे ही सोचने क है।’’
‘‘पर तु उसका ठौर- ठकाना कहां है? वह चोर क भांित आता है तथा द यु क
भांित जंगल म भटकता रहता है।’’
‘‘उसे आखेट म अिभ िच है, साहिसक भी है वह।’’
‘‘ऐसे तो द यु होते ही ह।’’
‘‘इसम कदािचत् राज-प रवार क ओर से अिवनय आ है।’’
‘‘कै से?’’
‘‘मातामह सुमाली ने मुझे बताया था।’’
‘‘ क हमने उसका महालय म वागत नह कया!’’
‘‘तो ि ये, तुम भी मातामह से सहमत रह ?’’
‘‘ य नह , मधु का अिवनय या हमारी िश ा के िलए यथे नह ? हम कै से
कसी अप रिचत अ ात कु ल का अिभन दन कर सकते थे, जब क हमने देखा क वह
राजकु मारी पर दृि रखता है?’’
‘‘पर तु वह वीर सु िचस प है। सूपनखा उसे चाहती है, वह अिभजात दानव-
कु ल का है, फर उसक आयु भी तो ऐसी ही है।’’
‘‘हां, यौवन का ार भ ेम ही से होता है। ेमी समझते ह, ेम ही जीवन का सार
है, पर तु र -मिहदेव भी या यही समझते ह?’’
‘‘कदािप नह ।’’
‘‘म भी इसी से इस ेम-भावना को ाथिमकता नह दे सकती।’’
‘‘तो ि ये, तुम या चाहती हो?’’
‘‘के वल यही क रा े इस िवषय पर यान द। इस िवषय को अ पवय क त ण
के ऊपर छोड़ देना खेदजनक हो सकता है। मेरा मन कहता है, हम यह संबंध रोकना
चािहए। यह मुझे ेय कर नह दीख रहा है। असंभव नह , एक दन यो य पा हम उसके
िलए पा जाएं।’’
‘‘पर तु उसका ेम?’’
‘‘बचपन का अ ान है।’’
‘‘ ेम और जीवन के त य का उसे अनुभव होना चािहए। इसके िलए एक युि यह
हो सकती है क एक ऐसा भावशाली ि हम ढू ंढ़ना चािहए, िजसके साथ, िबना ही
िववाह कए, वह भाग जाए। ेम और जीवन का जब उसे अनुभव हो जाएगा, वह वयं
अपना पित चुन सकने म समथ होगी। ऐसे कसी एक पु ष पर दृि करो ि ये, म भी
देखूंगा।’’
‘‘इससे या लाभ होगा? जब तक उसका मनोनीत पु ष न होगा, वह उसके साथ
भागेगी ही य ? फर, म तो कसी ऐसे पु ष को जानती नह ।’’
‘‘िव ुि व ही या बुरा है? िववाह क बात छोड़ दी जाए। ेम ही को आगे
चलने दो, उसे तुम ढील दे दो। वह तो आज ही िव ुि व के साथ भाग जाएगी।’’
‘‘यह र े अपनी ही बहन का प रहास कर रहे ह!’’
‘‘नह ि ये, तु ह इसी बात का तो भय है। तु हारी बात से तो मने यही समझा।
देखो, सूपनखा मूख नह है, स ी, भावुक और ि थरमित लड़क है। म उसक ओर से
िनि त ।ं उसे तुम उसी के पस द के जीवन को चुनने दो। हम रा स ि य पर अपना
अंकुश रखना नह चाहते।’’
‘‘म भी चाहती ं क वह अपने जीवन को वयं चुन।े पर वह भूल नह कर
सकती, यह तुम नह कह सकते। वह दुिनया के संबंध म कतना जानती है? अपने ही संबंध
म उसका ान सीिमत है। उसके सारे ही आदश भावुकता पर आधा रत ह। वह समझती है
क वह सब कु छ जानती है, पर तु उसका दय सो रहा है। वह जब जागेगा, तब तक तो
स भवतः सब कु छ समा हो जाएगा। वह बड़ी तुनकिमजाज लड़क है। ऐसी लड़ कयां ेम
के मामले म सदा धोखा खाती ह।’’
‘‘ि ये, ेम के त व को म स भवतः तुमसे अिधक नह समझता।’’ रावण ने हंसते
ए म दोदरी का आ लंगन कया और कहा–‘‘तुम जैसा ठीक समझो करो। पर यह न भूलो
क म अपनी सूपनखा को ब त यार करता ं और उसे सुखी देखना चाहता ।ं ’’
और वह एक बार फर म दोदरी का आ लंगन कर तेजी से चला गया।
54. सूपनखा

खूब घने काले बाल, चमकती ई काली आंख, एक िनराला-सा ि व, गहन


अह म यता से भरपूर। रानी के समान ग रमा, िपघलते ए वण-सा रं ग, आदश सु दरी न
होने पर भी भ आकषण से ओत ोत। आंख म झांकती ई ि थर दृढ़ संक प- ितमा,
कटा म तैरती ई तीखी ितभा और उ फु ल होठ म िवलास करती ई दुद य लालसा-
यह सूपनखा का ि व था। ित या के िलए सदैव उ त और अपने ही पर िनभर।
ल बी, त वंगी, सतर और अचंचल।
उसका असली नाम था ‘व मिण’, पर तु नाखून उसके बड़े और चौड़े–सूप क
भांित थे, इससे बचपन ही म िवनोद और यार से भाई उसे िचढ़ाते ए सूपनखा कहते थे
और अब उसका यही नाम िस था। इस नाम से वह बचपन म िचढ़ती थी, पर तु अब
नह । वह पर तप रावण और दुधष कु भकण क अके ली बहन थी, यार और दुलार के
वातावरण म पली ई। थम र कु ल, दूसरे राजकु ल, तीसरे तापी भाइय क ि य
इकलौती बहन, चौथे िनराला अहं- वभाव, पांचव व छ द जीवन, सबने िमलकर उसे
एक असाधारण–कहना चािहए, लोको र–बािलका बना दया था।
रा से रावण के सामने आकर उसने शालीनता से कहा-“ जयतु देवः!
जय वाय:!”
‘‘अये वसा! अिप कु शलं ते?’’
‘‘ ीताि म। कम् र े !’’
‘‘भ ं ते प यािम भिगिन!’’
‘‘मेरे िलए र े का कु छ आदेश है?’’
‘‘तेरे ही क याण के िलए। तू र े क ाणािधका इकलौती बहन है।’’
‘‘कु छ िवशेष बात है?’’
‘‘हां बहन, तुझसे मिहषी म दोदरी ने कु छ कहा है?’’
‘‘यही क र े मुझे देखना चाहते ह।’’
‘‘तो बैठ बहन, तुझसे म कु छ बात क ं गा।’’
‘‘कै सी?’’
‘‘ यार क ?’’
‘‘कै सा यार?’’
‘‘जीवन से यार।’’
‘‘वह या होता है?’’
‘‘ या तू नह जानती?’’
‘‘कदािचत्।’’
‘‘तू या जीवन को यार करती है?’’
‘‘ य नह !’’
‘‘ या ब त अिधक?’’
‘‘हां!’’
‘‘अ छा, तो बता, िव ुि व कौन है?’’
‘‘वह एक ि यदश त ण दानव कु मार है।’’
‘‘तू उसे यार करती है?’’
‘‘करती ।ं ’’
‘‘तो लजाती य है? तेरा च र िनमल है। यार न अपराध है, न पाप। जो स य
है, वह कह। या वह तुझसे ब धा िमलता रहता है?’’
‘‘नह , कभी-कभी।’’
‘‘ या वह कभी-कभी आता है?’’
‘‘ब धा आता है, पर मुझसे कभी-कभी िमलना होता है।’’
‘‘ऐसा य ?’’
‘‘मिहषी और मातामह को यह िचकर नह है।’’
‘‘ य भला?’’
‘‘मिहषी यार को व कहती ह और सदैव मुझे डराती ह। उनका कहना है क
कसी पु ष को यार करने से जीवन का यार न हो सकता है।’’
‘‘ क तु तू या समझती है?’’
‘‘म तो कु छ नह समझती, पर तु मातामह क बात कु छ और है।’’
‘‘वह या है?’’
‘‘उनक िववाह करने क आयु बीत चुक है, वे कहते ह– ेम एक धोखा है।’’
‘‘मातामह क यह धारणा तुझे कै सी लगती है?’’
‘‘ओह, य द उसे स य मान िलया जाए, तो हम अपने ही जीवन पर अिधकार न
रहे।’’
‘‘ऐसा तू य सोचती है भला?’’
‘‘इसिलए क हम जीवन म एकाक नह ह।’’
‘‘िन स देह, पर तु हम दूसर के साथ जीिवत रहने के िलए उनके ित स े रहना
आव यक है। य द दूसर के साथ जीवन का लय करने म इतना-सा भी अस य रह जाएगा,
तो जीवन का आन द समा हो जाएगा।’’
‘‘ऐसा समझती ,ं र पित।’’
‘‘तो बहन, यह हमारे िलए आव यक है क जो लोग हमारे जीवन के िनकट आएं,
उ ह और अपने-आपको भी हम खूब सावधानी से देख। िन स देह, हम अपने जीवन पर
अिधकार है। उसी कार तुझे उस ि को यार करने का अिधकार है, िजसे तू ि यदश
कहती है। तू सचे रह और य द कह भूल हो तो गु न रख। जीवन क िन ा इसी म है।’’
‘‘म समझ गई।’’
‘‘अ छा तो सुन, या िव ुि व से िववाह करना चाहती है?’’
‘‘िन स देह।’’
‘‘तब तो मुझे भय है क तू जीवन को यार नह करती।’’
‘‘ऐसा य !’’
‘‘हम जैसे अपना स य देखना है दूसर के ित, उसी भांित दूसर का अपने ित
भी तो!’’
‘‘ क तु येक ि को अपने संबंध म िनणय करने का अिधकार है।’’
‘‘अव य ही है।’’
‘‘तो म चाहती ं क मने जो िनणय कया है, उसम र े बाधा न डाल।’’
‘‘बाधा नह डालना चाहता। म यह देखना चाहता ं क तू अपने जीवन को या
वा तव म यार करती भी है? तू िव ुि व को यार करती है तो तू उससे िववाह कर;
क तु वह उपयु पु ष है–यह अव य देख।’’
‘‘र े या कहना चाहते ह?’’
‘‘सुन, या तू कसी पु ष के साथ भाग जाना पस द करे गी?’’ ‘‘ कसी के साथ म
य भागूंगी? म िव ुि व के साथ िववाह क ं गी।’’
‘‘िववाह के िलए ज दी या है? अभी तू कसी पु ष के साथ भाग जा।’’
‘‘ य भला?’’
“ि यां ायः कसी ेमी के साथ भाग जाया करती ह। कोई िववाह के पहले
भागती है, कोई पीछे। मेरा िवचार है, पीछे भागने क अपे ा पहले ही भाग जाना अ छा
है।’’
‘‘वाह!’’
‘‘ जंघ को देखा है तून?े ’’
‘‘कौन है वह?’’
‘‘मेरी सेना का एक त ण गु मपित है। तेज वी और मेधावी–चीते क भांित
चंचल। वह उर नगर के अिभजात दै युकल का है।’’
‘‘तो उससे मुझे या?’’
‘‘तू उसके साथ कु छ दन के िलए भाग जा। इससे तुझे लाभ होगा। दुिनया क
ऊंच-नीच का ान हो जाएगा। तेरा मि त क और दय िव तृत हो जाएगा। यह भी
स भव है क तू उसे ही यार करने लगे और उसी से िववाह कर ले।’’
‘‘पर तु म तो िव ुि व को यार करती ।ं ’’
‘‘ठीक है, तो तू अभी जंघ के साथ भाग जा। ेम-संबंधी अपने अनुभव पु कर–
फर लौटकर िव ुि व से याह कर।’’
‘‘अ छी द लगी है!’’
‘‘कदािचत् तूने इसक उपयोिगता पर यान नह दया। िव ुि व से पहले तो
तेरा कसी पु ष से स पक ही नह आ। िव ुि व को भी तू सवतोभावेन नह जानती।
ब त कम तेरा उससे िमलना आ है। फर तू उसके ि व को कसी अ य पु ष से कै से
तौल सकती है? यार का पा कौन है–इसका चुनाव कै से कर सकती है? इसी से दूसरे पु ष
का भी तो अनुभव ा कर। फर उससे िव ुि व के सौ व को तौल।’’
‘‘इससे या होगा?’’
‘‘पता चल जाएगा क या वह दूसर क अपे ा े गुण का वामी है? या
वह दूसर क अपे ा तेरे जीवन को अिधक सुखी कर सके गा? तू य द अपने जीवन को
यार करती है, तो िव ुि व या और कसी को अपना अ धा यार मत दे। उसी को
अपना समपण कर, जो तुझे तेरा सबसे अिधक मू य चुकाए–सबसे अिधक यार करे । म
नह चाहता क तू िव ुि व को अ धा यार देकर अपने जीवन को क म डाल दे। मेरा
कहना यही है क ाथिमकता तू अपने ही जीवन के यार को दे–िव ुि व के यार को
नह । जो तेरे जीवन को यार दे, उसे ही तू यार कर, पर अपने जीवन से अिधक नह ।’’
‘‘यह सब सोचकर ही तो मने िव ुि व को यार कया है।’’
‘‘अ छा कह, वह कै सा पु ष है?’’
‘‘दशनीय, फू तमय और छरहरा शरीर–उद और साहिसक। देखोगे तो पस द
करोगे।’’
‘‘यह आ आकषक ि व। क तु गुण, िवशेषताएं, आचरण?’’
‘‘वह एक मेधावी और दूरदश त ण है। अपनी आयु से अिधक वह ग भीर है।
अपने कत का ान है। उसका सहवास मुझे सुखकर है, उसके साि य से म िनि त
।ं ’’
‘‘यह म सि द ध ।ं अ छा, या उसम कु छ दोष भी ह?’’
‘‘एक भी नह , वह एक आदश त ण दानव है।’’
‘‘उसके पा रवा रक जीवन के संबंध म तू कु छ नह जानती है?’’
‘‘इतना ही जानती ं क उसका िपता िचर वासी है। घर नह लौटा है–और
उसक माता ने एक दु र और जुआरी दै य को घर म डाल िलया है। अब वे दोन उसके
वैरी ह। उ ह भय है क अब वह समथ होकर उनसे अपने िपता क स पि न छीन ले। वे
उसे खपा डालने पर तुले ह। इसी से वह भागकर लंका म आ िछपा है। वह एक उपेि त
और अनादृत पु और िनरा य त ण है।’’
‘‘इसी से तेरी उसके ित इतनी आसि है?’’
‘‘ थम सहानुभूित ई, फर ेम और अब आसि ।’’
‘‘ या उसका कोई ि य ब धु-बा धव नह है?’’
‘‘म ं और म र े से अनुनय करती ं क उसे अपनी शरण म ले ल।’’
‘‘वह कस वंश का है?’’
‘‘कािलके य के वंश का।’’
‘‘अरे , वे तो हमारे श ु ह।’’
‘‘पर तु वह तु हारा बा धव है, िचर अनुगत।’’
‘‘कब से तू उसे जानती है।’’
‘‘अब यह वष समा होता है।’’
‘‘मातामह को तो वह भाया ही नह ।’’
‘‘कै से भा सकता था! त ण के दय को ये वृ थोड़े ही समझते ह!’’
‘‘ठीक है। पर तु बहन, म वृ नह –ं फर भी ये ।ं ’’
‘‘और म र े क जा और छोटी बहन ।ं ’’
‘‘ जा नह , बहन, ाणािधक बहन, पर तु मेरे दािय व को भी तो तू देख।
िव ुि व तेरे ही कथनानुसार सु दर और बुि मान त ण होने पर भी िवप , िनराि त
है। वह तेरे िलए अनुपयु पित भी मािणत हो सकता है। अभी कै से हम िनणय कर ल?
कै से म तुझे उससे िववाह करने क अनुमित दे दू?ं ठीक यही है क िववाह क बात अभी
रहने दे। तू यार करती है तो कर। पर ज दी न कर। मुझे भी उस पु ष से कु छ भािवत
होने दे।’’
‘‘ क तु र े कै से मुझे िववाह से वंिचत रखना चाहते ह? हम दोना पर पर स य
रखते ह। हम एक–दूसरे के पूरक ह, ऐसा मेरा िव ास है। इसम बाधा उपि थत करके
र े मेरे साथ याय नह कर रहे ह।’’
‘‘म वीकार करता ं क तू उस आयु को प च ं चुक है क दा प य सुख को हण
करे । म अव य तेरा िववाह करके स होऊंगा। िव ुि व के िव भी मुझे कु छ कहना
नह है, पर म यह अव य चाहता ं क तू एक िनरापद और आन दमय जीवन का आ य
ले।’’
‘‘यह सब थ है। मने िव ुि व से ही िववाह करने का िन य कर िलया है।’’
‘‘ क तु मने तुझसे जंघ के संबंध म जो बात कही?’’
‘‘म तो उस पु ष को जानती भी नह ।’’
‘‘ या तू उससे िमलना चाहती है?’’
‘‘िब कु ल नह ।’’
‘‘तू उसके साथ भाग य नह जाती?’’
‘‘म य भागूं? म तो िव ुि व के साथ िववाह क ं गी।’’
‘‘सो उसम या बाधा है? पु ष के गुण-दोष का कु छ ान तो तुझे हो जाएगा।’’
‘‘म समझती ,ं म उतनी मूढ़ नह ,ं भाई!’’
‘‘िव ुि व के साथ तो तेरा ब त ही अ प स पक रहा है।’’
‘‘ क तु आ मा क गहराई तक। हम लोग ने कभी भी ेम के संबंध म बातचीत
नह क । के वल ेम कया है। क तु म उससे कतनी भािवत ,ं यह र े सोच भी नह
सकते।’’
‘‘बहन, म तेरे ेम का अिभन दन करता ।ं ’’
‘‘तो भाभी से कह दया जाए, वे य िव ुि व को शंकालु होकर देखती ह?’’
‘‘बहन, वह के वल तेरी भाभी ही नह , राजमिहषी ह–तेरी अिभभावक भी ह।’’
‘‘आप भी तो रा से ह, सारी ही र -जाित के अिभभावक, सो आप या मेरे
जीवन पर अपना अनुशासन रखगे?’’
‘‘नह बहन, नह ।’’
‘‘तो मिहषी से भी कह दीिजए। वे आ रही ह, अभी कह दीिजए।’’
म दोदरी ने आकर पूछा–‘‘ या मुझसे तु ह कु छ कहना है?’’
‘‘म मिहषी और र े से यही िनवेदन करना चाहती ं क मेरे जीवन पर कसी
का अनुशासन नह है।’’
‘‘रा स क सं कृ ित ही वत भावनामूलक है। रा स का येक जन अपने
जीवन म वत है।’’
‘‘तो म िव ुि व को यार करती ।ं उससे म िववाह करना चाहती ।ं ’’
‘‘और मेरा यह कहना है क यार- ीित के अनुभव लेने के िलए य न सूपनखा
कसी त ण के साथ भाग जाए, पीछे िव ुि व या उस त ण से, जो उसे चे, याह कर
ले।’’ रावण ने म दोदरी को ल य करके कहा।
‘‘बुरा या है? पर तु ऐसा कोई पु ष र े ने सोचा है या?’’
‘‘हमारा गु मनायक जंघ ही है, उसी को म ाथिमकता दूग ं ा।’’
‘‘सूपनखा के िलए यह उ म होगा।’’
‘‘पर म कसी के साथ भागूं य ? म िजसे यार करती ,ं उससे याह क ं गी।’’
‘‘ याह करने पर उसने तेरे जीवन को संत कया तो?’’
‘‘ऐसा य होगा भला?’’
‘‘ब त होता है बहन, तुम भोली हो, समझती नह हो। तुम जैसी बािलकाएं इसी
कार थम ेम के वर म याह कर बैठती ह। फर एक पु ष को छोड़कर दूसरे के साथ
भाग खड़ी होती ह।’’ म दोदरी ने ेम-मु ा से कहा।
‘‘यही म कहता –ं याह के पीछे भागने से याह से पहले भागना अ छा है।’’
‘‘तो भागना ही है तो िव ुि व ही या बुरा है?’’
‘‘हम कै से कह! हमने तो उसे देखा नह ।’’–रावण ने कहा।
म दोदरी ने ग भीर होकर कहा–‘‘यौवन का आर भ ेम ही से तो होता है, पर तु
युवक और युवितयां के वल जीवन को यार ही करना जानते ह, उ ह संसार का अनुभव
कु छ नह होता, इससे उनका यार खोखला हो जाता है और जीवन िनराश। िववाह एक
दुःखद घटना हो जाती है। सूपनखा को म उससे बचाना चाहती ,ं उसने अभी कसी त ण
को यार क दृि से देखा ही नह है।’’
कु छ ककर उसने फर कहा–‘‘उसे त ण के यार का अनुभव होना चािहए,
यार के घात- ितघात से भी उसे अप रिचत न रहना चािहए। फर वह भी तो भूल कर
सकती है।यह कतना अपमानजनक होगा,सोचो तो!हमारा िव -िव ुत िति त र -कु ल
है और सूपनखा स ीपपित र राज क सगी बहन है। वह आ मिव ास से भरपूर है,
पर तु उसक दृि एकांगी है। अभी वह दुिनया के स ब ध म कु छ भी नह जानती। उसके
िवचार भावुकता से ओत- ोत ह। उसने अपने िनकटतम वातावरण से एक योजना ि थर
कर ली है और वह समझती है क वह सब कु छ ठीक-ठाक कर रही है। पर अभी वह ब ी
ही तो है। उसका दय तो अभी सो ही रहा है। एक दन वह जगेगा तो वेदना के हाहाकार
से भर जाएगा। इसी से म नह चाहती क वह मूख, भावुक लड़ कय क भांित उसी त ण
से याह कर ले िजसे उसने थम बार ही जरा-सा जाना हो और जरा-सा ही यार कया
हो।’’
इतना कहकर म दोदरी ने सूपनखा क ओर देखा। रावण ने उसका समथन करते
ए कहा—
‘‘तभी तो मने कहा क वह कसी त ण के साथ कु छ दन के िलए पहले भाग
जाए। ऐसा एक त ण मेरी नजर म है, जंघ।’’
‘‘पर तु जंघ से मेरा या लेना-देना है? म उसके साथ य भाग जाऊं?’’
सूपनखा ने गु से होकर कहा।
‘‘मेरी यारी र राज-नि दनी, तु ह व तु का यथाथ ान होना ही चािहए।
तु हारा शरीर और आ मा प रपूण होगा, तब वह आ लाद से एक दन ओत- ोत हो
जाएगा। तभी चैत य आ माएं पर पर िमलकर जीवन के स े आन द को ा करगी।
पर तु तुमने य द भावुकता और आवेश म आकर कु छ चूक क तो तु हारे इन ने म–जो
आज ेम से उ फु ल ह–क ण िवष भर जाएगा। ऐसा ही ब धा होता है बहन, म जानती
।ं मने देखा है।’’
‘‘ या यह मिहषी ने जीवन के यार क ा या क ?’’
‘‘नह , के वल यार क , िजसके फे र म तुम फं सी हो।’’
‘‘तो जो कसी को यार करते ह, वे जीवन के यार से वंिचत ही रह जाते ह?’’
‘‘ऐसा ही म समझती ।ं जो कसी के यार म फं स जाते ह, वे ायः जीवन को
यार नह करते। जीवन का ेम अ य ेम क भांित नह कया जाता। उसम एक कलापूण
कौशल क आव यकता है–भावावेश क नह । कला-पूण कौशल तो सीखना ही पड़ता है।’’
‘‘वह िचरसा य है। उसे सीखने को ब त समय चािहए। ब धा जब लोग उसे जान
पाते ह, उनका यौवन ढल चुका होता है। वह तुर त ही यार करने जैसी कोई छोटी चीज
नह है, र राज-नि दनी!”
‘‘तो या मिहषी िव ुि व म कोई दोष देख रही ह?’’
‘‘अनेक । वह अ यािशत प से ग भीर और अ यमन क है। उसे न कोई अनुभव
है, न उसके अिधकार म कोई स पदा है, न जीवन का सहारा। वह जीवन को नह , जीवन
के वाह को देख सकता है। वह भा यवादी है और जीवन के भय से िछपकर रहता है।
िन संदह े वह भावुक है। दूसर के ित अपने कत को समझता है। वह स ा और
प व ा है, पर तु वह पु ष नह है, जो हमारी बहन को जीवन क राह दखा सके । न
वह ऐसा ही है िजसे कु छ िसखाया जा सकता है। ऐसे पु ष को यार करके कौन ी अपने
जीवन को सुखी कर सकती है?’’
सूपनखा रोने लगी।उसका कु छ भी िवचार न कर म दोदरी कहती चली गई —
“िव ुि ह को अपने जीवन से भी यार नह है। कसी ी के ेम के भाव म आने का
अथ है, कसी पु ष को ेम करना। पर तु म नह चाहती क कोई कु मारी कसी ऐसे त ण
को यार करे जो सब ओर से असहाय हो, अ वि थत हो, अ त त हो।’’
‘‘तुमने तो िव ुि व को देखा ही नह है!’’ रावण ने कहा।
‘‘नह , जो सुना उसी पर मने सूपनखा को िहतकर बात कही है।’’
‘‘ य न उसे बुलाकर उसे अपनी यो यता मािणत करने का अवसर दया
जाए।’’ रावण ने कहा—
‘‘बहन, सूपनखा या तू उसे एक संदश े नह भेज सकती?’’
‘‘नह ।’’
‘‘ य नह ?’’
‘‘वह िछपकर रहता है। कहां रहता है, म नह जानती। वह अपनी सुिवधानुसार
आता है। वह जब तक आए–हम ती ा करनी होगी।’’
‘‘ या वह तुझ पर िव ास नह करता? अपने भेद िछपाता है?’’
‘‘उसने अपना गु थान मुझे बताना चाहा था। पर मने ही उसे रोक दया। उसे
अपने सौतेले बाप का भय है, जो उसे मारकर अपनी राह का कं टक दूर करना चाहता है।
फर लंका म कािलके य का कौन िम है? कािलके य तो रा स के श ु ह ही। उसने अपनी
कु छ गु बात मुझे बताई ह। एक कार से उ ह पर उसका जीवन-मरण िनभर है। मने ही
उसका गु वास नह जानना चाहा।’’
‘‘तब तो उसके आने तक हम कना ही होगा।’’
‘‘ क तु या र े उसका मिणमहालय म वागत करगे?’’
‘‘अव य बहन, य नह !’’
‘‘और मिहषी?’’
‘‘म भी बहन। हम दोन ही र राज-नि दनी के क याण-अिभलाषी ह।’’
‘‘उपकृ त ।ं आ याियत ।ं आप दोन मेरे माता-िपता ह। म आपक शरण !ं ’’
55. िव ुि न

रा सपुरी लंका अपने ढंग क िब कु ल िनराली नगरी थी। उसम कतनी सुषमा
थी और कतनी कु सा–यह कहना क ठन था। वहां के वन–उपवन बड़े िवशाल और रमणीय
थे। वे वन-उपवन च पा, चमेली, अशोक, मौलिसरी, साखू, ताल, तमाल, िह ताल, कटहल,
नागके शर, अजुन, कद ब, ितलक, क णकार आ द पुि पत वृ -लता से आ छा दत थे।
कु बेर का चै रथ नामक िवहार-वन ऐसा मनोहारी और अनुपम था, िजसका वणन हो ही
नह सकता। उसम सभी ऋतु के पु प पुि पत थे। पपीहा, को कल और नाचते ए मोर
अपने मधुर रव से उस उ ान को गुंजायमान कर रहे थे। भांित-भांित के िवहंग के कलरव
और मरावली से गुजायमान उस उपवन का पु पवािसत शीतल, म द सुग ध समीर
ाण म आन द का संचार करता था।
लंका के ि कू ट िशखर का िव तार सौ योजन था। उसी के एक िशखर पर
वणलंका बसी थी, िजसक ल बाई बीस योजन और चौड़ाई दस योजन थी। इस नगर के
ाचीर के गगन पश चार ार ेतवण मेघ के समान तीत होते थे। जैसे वषा ऋतु के
सघन घन िविवध आकृ ित के होते ह, वैसे ही लंका के भवन, ासाद और मि दर थे। कु बेर
का राज ासाद एक सह ख भ पर आधा रत था, िजसक धवल सुषमा कै लास के समान
थी। इसी को रावण ने अपनी िच और िवलास-भावना से, मिण-मु ा से सुसि त कया
था। दस सह धनुधर रा स दन-रात उसक रखवाली करते थे। धन, धा य, र , मिण,
वण और यो ा से भरपूर, य यु कपाट से सुरि त वह लंकापुरी सब पु रय से
िविच और शोभास प थी।
पाठक को मरण होगा क यह लंका दै य क थी। यहां हम सं ेप म फर उस
इितहास को दोहराते ह। िजस समय का उपा यान इस उप यास म व णत है, उसके कोई
डेढ़ सौ वष पहले दै य का सा ा य पृ वी म सव प र था। इस सा ा य के ित ाता
िहर यकिशपु, िहर या , व ांग, अ धक और व नािभ आ द थे। इनम िहर यकिशपु और
िहर या का ताप सव प र था। िहर या क सहायता से िहर यकिशपु ने अपना रा य
ब त बढ़ा िलया था, िजसका बड़ा आतंक पृ वी-भर के रा य पर था। िहर या ने जो
अपना दूसरा सा ा य थािपत कया था, वही आगे चलकर िव ुत बेबीलोन सा ा य के
प म िवकिसत आ था। इन दोन भाइय ने अनेक देवराज को पद युत कर दया था
तथा वे ि लोकपित िव यात थे। इन दोन भाइय का सा ा य वतमान एिशयाई स,
सफे द कोह, काके िशया, पामीर से तु क तान और अफगािन तान तक फै ला आ था। उन
दन देवगण, जो आ द य भी कहाते थे, सुमे –पामीर तक ही सीिमत थे। उनका वहां एक
छोटा-सा गणत था। पीछे ग धव अ सरा क एक नई िमि त जाित हेमकू ट कराकु रम
पर और नाग क िन सा पहाड़ पर आ बसी थी। ऋिष नीलाचल म और िपतृ शृंगवान्
पवत के आंचल म रहते थे, जो सुमे से पि म का यप सागर के तट पर था। वाराह का
एक छोटा-सा रा य के तुमाल ीप म था, जो देव के िम थे। व ण ने लय के बाद उनसे
पृ वी के सं कार-उ ार म भारी मदद ली थी। तब से वाराहपित भी देव क पंि म िगने
जाने लगे थे। वाराह ने घात लगाकर एक दन वन म मृगया को गए ए िहर या को
मार डाला। तब से िहर यकिशपु का रा य डगमगा गया। फर भी कसी तापी देव ने उस
पर चढ़ाई करने का साहस नह कया। अ त म िव णु के यास से उनके भाई नृ संह ने, जो
िहर या के मरने पर बेबीलोिनया सा ा य के वामी बन गए थे, िहर यकिशपु को भी
म लयु म मार डाला। लाचार िहर यकिशपु के पु लाद को िव णु से सि ध करनी
पड़ी। देव क ओर से िव णु ने वचन दया क अब दै य का र पृ वी पर नह िगरे गा।
इसके बाद लाद और उसके पु िवरोचन ने कोई राजनीितक मह ा नह ा क ।
आ द य से इनके यु ए अव य और उनके दबाव से दै य ने पूव क ओर अपना सार
ार भ कया। उ र-पि म के रा य-समूह उनसे िछन गए और वहां देव तथा आ द य के
अनेक ख ड-रा य थािपत हो गए।
इसके बाद िवरोचन-पु बिल बड़ा तापी आ। उसने अपने िपता िवरोचन और
िपतामह लाद के जीवन-काल म ही अपनी राजनीितक मह ा बढ़ा ली थी और अपना
नया सा ा य संग ठत कर िलया था। उसने दै य और दानव को सि ध ारा एक सू म
बांधा। उसने राजनीितक ही नह , सां कृ ितक संबंध भी थािपत कर िलए। धीरे -धीरे उसके
शौय, राजनीित ता, पु षाथ, यायपटु ता, धम, दान आ द गुण के कारण उसका यश दूर-
दूर तक फै ल गया। एक बार दै य का फर बोलबाला हो गया। पर तु देव को यह कै से
सहन हो सकता था? उ ह ने नाग से िम ता के स ब ध थािपत कए और अंततः बिल से
उनका िवकट समर आ।
इस मह सं ाम म बिल का दोष न था। उसने अपने िपतामह के िनधन का वैर
छोड़कर देव से सि ध क , उनके साथ िमलकर समु -मंथन कया और पूरा प र म करने
पर भी दै य खाली हाथ रह गए। सो देव क ध गाध गी और अपमान से खीझकर बिल ने
यु -दान दया, िजसम लाद तक ने वृ ाव था म योग दया। इस यु म दै य क
कटक म महापि नी, प , कु भ, कु भकण, कांचना , किपक ध, ि ित, क पन, मैनाक,
ऊ वव , िशतके श, िवकच, सुबा , सह बा , ा ा , व नािभ, एका , गज क ध,
गजशीष, कालिज व, किप, हय ीव, लाद, श बर, अनु लाद, नमुिच, यम, पुलोमा,
िवरोचन, धेनुक, युवराज बाण, अनायुषा-पु बिल, वृषपवा, वृ , कनक बंद,ु कु जंभ,
एकच , रा , िव िचि , के शी, हेममाली, मय आ द अनेक दै य-दानव छ पित और
मा डिलक सरदार लड़े। देव क ओर िव ाधर, ग धव, नाग, य , ड बर, तु बर, क र
आ द थे। यु म पहले देव को परािजत होकर अफगािन तान क ओर भागना पड़ा। उ ह
अपना देव-लोक भी खो देना पड़ा। बाद म उ ह ने बृह पित और वामन ारा सि ध कर
तथा बिल को य म फं साकर, उसका बल हरण कर अ त म बिल को परािजत कया।
इस यु म दै य-दानव का बल भंग हो गया और उनका सा ा य भी िछ -िभ
हो गया। लंकािधपित दै य-ब धु माली, सुमाली और मा यवान् के इस यु म सब प रजन
खेत रहे। पर तु बिल-पु बाण ने फर उ कष दखाया। उसने से िम ता क , िजससे
उसक शि अमोघ हो गई। बाण अपने काल का महान् दै य-स ाट् था। उसक शि
असीम थी। उसी के समय म कािलके य क एक नई जाित दानव म से िवकिसत ई।
क यप क तृतीय प ी दनु क दो क याएं भी थ िजनम एक पुलोमा थी, दूसरी कािलका।
इन दोन क संतान से दो नई शाखाएं चल –पौलोम और कािलके य। इस समय बीस
सह कािलके य ने बाण क अधीनता वीकार कर उसका बल बढ़ाया, पर तु काल पाकर
बाण का भी बल- य आ और कािलके य को क यप-तट छोड़कर लंका क ओर भागना
पड़ा। इनम से ब त ने लंका के आसपास के ीप-समूह पर अिधकार कर िलया। ये सारे
ही ीप उस समय रावण के र -सा ा य म आ चुके थे। अतः रावण को कािलके य पर
ब त बार सेना भेजनी पड़ी। पर तु हर बार कािलके य ने रा स-सै य को तािड़त कया।
कािलके य के आतंक का िस ा रा स पर बैठ गया, पर मह वाकां ी रावण न अभी
कािलके य क गितिविध पर िवशेष यान नह दया था। वह अपने भारत वास म चला
गया था। इसी बीच िव ुि व लंका म छ वेश म आने-जाने लगा। वही वा तव म
कािलके य का सरदार था। रा स के भय से वह िछपकर लंका म आता था, पर दैवयोग से
उसका प रचय हो गया सूपनखा-राज-क या से इसिलए अब लंका म उसका आना-जाना
और ही कार का हो गया। वह सूपनखा से भी िछपकर िमलता था, इसिलए ब धा कई-
कई दन तक उसे घात म लंका म िछपे रहना पड़ता था।
िव ुि व एक ितभास प और वीर त ण था। उसम साहस क भी कमी न
थी। अपने अद य साहस और उ साह के कारण ही वह कािलके य का सरदार बन गया था।
अपने असाधारण िव म से उसने वह ीप जय कया था और हर बार रा स को उससे
हार खाकर भागना पड़ता था। पर तु उसने अभी लंका म यह कट नह कया था क वही
कािलके य का सरदार है। सूपनखा उसे एक कु लीन दानव-त ण ही समझती थी। उसक
उठान बड़ी सु दर थी, घुंघराले काले बाल तथा भरी ई गदन। रं ग काला था, पर तु दांत
हीरे के समान उ वल और चमकदार थे। उसका हा य बड़ा िनमल था। उसका िवशाल
व , चंड बा , पु जघन और तीखी दृि उसके ि व को आकषक बना देते थे। वह
श दबेधी था। धनुष भी उसका खूब बड़ा था। बाण का तूणीर सदैव ही उसके क धे पर
पड़ा रहता था। इसके अित र एक िवशाल शूल भी वह हाथ म रखता था। सूपनखा से
तथा अ य भी िम से उसने यही कहा था क वह आखेट के िलए लंका के वन म शौक से
घूम रहा है। सूपनखा के अित र यह कोई नह जानता था क वह कािलके य दानव है।
सं या का अंधकार गहरा होता जा रहा था। इसी समय िव ुि व ल बे-ल बे
डग भरता आ लंका क वीिथय म तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था। वीिथका म अंधकार
था। वह नगर का बूचड़ मुह ला था, जहां नर-मांस से लेकर सब पशु का मांस िमलता
था। यहां ा का मांस भी िबक रहा था, िजसे लोग शौय-वृि के िलए खाना िचकर
समझते थे।
िव ुि व के क धे पर एक भारी ह रण का भार था। जो बाण उसके दय म
पार हो गया था, वह अभी उसके शरीर म अटका आ था। उसम से अभी तक र टपक
रहा था। उसके झोले म और भी कु छ प ी थे, िजनका उसने िशकार कया था। पर तु ऐसा
तीत हो रहा था जैसे उसका ायुजाल लोहे का बना हो। वह दूर से आ रहा था और उसके
पास काफ बोझा था, पर तु वह िब कु ल तरोताजा था।
एक जीण क तु िवशाल घर के फाटक पर आकर वह तिनक ठठका। फर वह
भीतर घुस गया। उस समय घर के िवशाल ांगण म अंधेरा छाया था। कोई पु ष भी वहां
न था। वह दालान पारकर भीतर चला गया, जहां ब त-से रा स, दै य, दानव, नर, नारी,
बालक बैठे खा-पी रहे थे। सबके हाथो म बड़े-बड़े भुने ए मांस-ख ड थे और म के भरे
भा ड उनके आगे धरे थे। वह उन पर भेिड़य क भांित ज दी-ज दी तीखे दांत का हार
कर रहे थे तथा म पी रहे थे। िव ुि व ने क धे का भार एक ओर सहन म पटक दया,
फर उसने इधर-उधर देख एक रा स–लड़क को संकेत से िनकट बुलाकर कहा–‘‘अरी
सरमा, इन पि य को मेरे िलए झटपट अभी भून ला। ज दी कर और नमक भी संग ही ले
आ।’’ रा सबाला मृत पि य से भरा चमड़े का झोला लेकर भीतर चली गई। उसने
उलटकर देखा तो उसम एक सांप भी था। सांप ब त मोटा था और अभी तक उसके फन से
िवष और झाग िनकल रहे थे।
वह उसे हाथ म िलए आई। िव ुि व एक िशलाख ड पर बैठकर समूचे सूअर म
दांत गड़ा रहा था। सरमा ने कहा–‘‘यह सांप य लाया है?’’
‘‘फिनयर है, खूब चब है इसम। मेरे िलए भून ला। मजेदार रहेगा। मुझे इसका
शौक है।’’
‘‘और य द दूषीिवष हो गया तो या होगा?’’
‘‘िव ुि व मर जाएगा, और या होगा! तेरा ब त झंझट छू ट जाएगा। जा
भाग।’’–इतना कहकर उसने सूअर क उरोगुहा म हाथ घुसेड़कर उसका कलेजा ख चकर
बाहर िनकाल िलया और चाव से खाने और हंसने लगा।
सरमा चली गई। थोड़ी ही देर म वह उस सांप को और पि य को समूचा भून-
भानकर ले आई। िव ुि व ने स मु ा से उसक ओर देखा और सांप के ख ड करके
च- चकर खाना आर भ कया। सरमा खड़ी देखती रही। कहा—
‘‘ या म लाऊं?’’
‘‘ले आ, दो भा ड।’’
पर तु सरमा ने एक भा ड लाकर उसके आगे धर दया। िव ुि व ने ु होकर
कहा—
‘‘अरी कृ या, मने दो कहा था।’’
‘‘दो यादा ह। तू संयत नह रह सकता।’’
‘‘तो तुझे या! तू भा ड ला।’’
‘‘यह है तो।’’
‘‘एक और ला।’’
‘‘एक ही यथे है।’’
‘‘तू मुझ पर अंकुश रखती है?’’ उसने लाल-लाल आंख से रा स-बािलका को
देखा। पर तु रा स-बाला फर भी नह गई। खड़ी रही।
यह देखकर िव ुि व हंस दया। उसने खाते-खाते सप का एक टु कड़ा उठाकर
कहा–‘‘ले, तू भी खा।’’
‘‘ऊ क ं ् , म सप नह खाती।’’
‘‘खा ले कृ या, ने -दोष दूर हो जाएगा। यह ने क अ छी ओषिध है।’’
‘‘मेरे ने म दोष नह है।’’
‘‘तो यह ले।’’ उसने एक समूचा भूना आ तीतर उसे दे दया। प ी को लेकर भी
वह खड़ी ही रही। िव ुि व ने कहा—‘‘जा भाग, अब य खड़ी है?’’
‘‘मुझे कु छ कहना है।’’ उसके ने म भय और वाणी म क णा थी।
‘‘कह।’’
‘‘वे मुर, उसक ी और बालक पु को पकड़ लाए ह।’’
‘‘कौन?’’
‘‘ ा ा और िवकटोदरी।’’
‘‘ य ?’’
‘‘ऋण के िलए।’’
‘‘ फर?’’
‘‘मुर ऋण नह चुका सका, अब ये उसे सप रवार मारकर खा जाना चाहते ह।’’
‘‘ क तु मुर तो हमारा िम है। उसका बालक मुझे ब त ि य है। उसक ी भी
मृदभ
ु ािषणी है।’’
‘‘उसक मुझ पर भी मातृदिृ है। कृ पा कर उसे बचा ल।’’
‘‘ऋण कतना है?’’
‘‘के वल तीन वण।’’
‘‘इतना तो म अभी दे सकता ।ं ’’
‘‘तब तो वे तीन तेरे दास बन जाएंगे।’’
‘‘तो जाकर देख, वहां या हो रहा है और मेरे आने तक उ ह ठहरने को कह।’’
‘‘बािलका क उ तेरह-चौदह साल क थी। उसके अंग पर के वल अधो-व था।
वह सूअर के दांत का क ठ-भूषण पहने थी जो वण म मढ़ा था। कछु ए क खोपड़ी के चूड़
उसक भुजा म भरे थे। मनु य के दांत क एक वण-सू िथत करधनी वह क ट म
पहने थी। वह बड़ी चपल और ती बुि लड़क थी। गत वष उसे कसी ु ीप म बांधकर
बिल के िलए ले जाया जा रहा था। िव ुि व उधर आखेट को गया था। उसका आतनाद
सुन उसने उसे पांच वण म खरीद िलया। अब वह उसक सेवा बड़ी लगन से कर रही थी।
िव ुि व उस पर ब त सदय था। बािलका िव ुि व का आदेश पा भाग गई।
िव ुि व ज दी-ज दी उस शूकर और पि य को तथा उस म भा ड को उदर थ करने
लगा, पर तु बािलका तुर त ही बदहवास-सी दौड़ी आई। उसने िव ुि व के क धे
झकझोरकर कहा–‘‘चल-चल, ज द!’’
‘‘ या आ? अभी मेरा भोजन पूरा कहां आ?’’
‘‘पर उ ह ने मुर को मार डाला। वे उसे खा रहे ह। वे उसक ी और पु को भी
मार डालगे।’’
‘‘अरे ,’’ कहकर िव ुि व उठा। अपना भारी शूल उसने हाथ म ले िलया।
बािलका उसे एक कार से घसीटती ई-सी अंधेरी और तंग वीथी म ले चली। ा ा के
घर जाकर उसने देखा क मुर का मु ड कटा पड़ा है और िवकटोदरी उसका व चीरकर
उसका दय िनकाल रही है। हाथ म र सना ख ग लेकर ा ा मुर क ी और बालक
को वध-यूप से बांध रहा है, दोन चीख-िच ला रहे ह।’’ िव ुि व ने ललकारकर कहा–
‘‘यह या कया रे , ा ा ?’’
‘‘तो म अपना ऋण छोड़ दू?ं ’’
‘‘छोड़ उ ह! अभी ब धनमु कर!’’
‘‘तो ला तीन वण मु ाएं तू ही दे दे।’’
‘‘पर तूने मुर को मार ही डाला।’’
‘‘उस सूखे बूढ़े म मांस ही कतना है, एक वण भी तो नह उठे गा उसका। आज
यु म उस ीप के ब त त ण का वध आ है। वे सब िबकने हाट म आए ह। आज नर-
मांस का भाव ब त स ता हो गया है। फर यह बूढ़ा, वह बालक। ऊ क ं ् –म ब त घाटे म
र गं ा। सोच भला तीन वण और याज!’’
‘‘यह ले तीन वण मु ाएं, खोल उनका ब धन।’’ उसने वण मु ाएं उसक ओर
फक द ।
ा ा ने हंसकर वण उठा िलया। फर कहा–‘‘तिनक पहले आता तो यह बूढ़ा
भी तेरे काम आता।’’ वह बालक और ी को ब धनमु करने लगा। पर तु िवकटोदरी ने
ु मु ा से कहा–‘‘यह दय-ख ड और इसका मांस म नह दूग ं ी, कहे देती –ं सूद कतना
आ, यह य नह कहते?’’ उसने रोषभरी आंख से पित क ओर देखा।
पर तु िव ुि व उससे िववाद करने को वहां का नह । िससकते और बदहवास
ी और बालक को िलए, हाथ का शूल हवा म िहलाता आ, तेजी से वहां से चल दया–
उसके पीछे खुशी से ताली बजाती वह रा स-बािलका भी।
56. मातृवध

सरमा ने कहा–‘‘एक भा ड म और दू?ं ’’


‘‘नह ,’’ िव ुि व ने लापरवाही से कहा और पीठ पर तरकस बांधा।
‘‘तो िव ाम कर, मने ा -चम िशलाफलक पर िबछा दया है।’’
‘‘नह , अभी मुझे जाना होगा, तू सो रह। अब रात को मेरा आना स भव नह है।’’
बािलका ने आकु ल ने ा से त ण को देखा। वह उदास हो गई। पर िव ुि व ने इस पर
यान नह दया। वह अपना शूल हाथ म तौल रहा था। बािलका ने कु छ भयभीत होकर
कहा–
‘‘ या कोई िव ह है? शूल तू य तौल रहा है?’’
‘‘तो तुझे या भय है? तू सो।’’
‘‘नह सोऊंगी। रातभर जागती र ग ं ी, जब तक तू न आएगा।’’
‘‘म तो रात-भर न आ सकूं –यह भी संभव है, कल तक भी न आ सकूं –यह भी संभव
है।’’
‘‘तो तू होकर जा रहा है?’’
‘‘ कससे?’’
‘‘मुझसे और कससे?’’
‘‘तुझसे य ?’’
‘‘मने तुझे दूसरा म -भा ड नह दया, इससे!’’
‘‘नह नह ।ं ’’
‘‘तो मत जा, िव ाम कर।’’
‘‘जाना होगा!’’
‘‘कहां?’’
‘‘ ीप के दि णांचल म। िपतृचरण ब त दन बाद घर आए ह। अिभन दन
क ं गा।’’
‘‘तो अिभन दन करके रात को आ, न हो भात म जा।’’
‘‘ब त दूर है, रात म लौट न सकूं गा। भात तक ठहर नह सकता–िपतृचरण पर
संकट आ सकता है।’’
‘‘कै सा संकट?’’
‘‘वह रा स का पुर है, जहां मातृचरण का िनवास है। वह पु ष भी रा स है,
िजसे मातृचरण ने घर म डाल िलया है। संवादवाहक ने कहा है क िपतृचरण पर संकट आ
सकता है।’’
‘‘तो म तेरे साथ चलती ।ं ’’
िव ुि व हंस दया। उसने कहा–‘‘तू या मुझसे अिधक ल यबेध करती है? जा,
सो रह। पर तु ठहर, मुर क ी और बालक को तूने िखलाया-िपलाया कु छ?’’
‘‘एक शूकर उसे दे दया है और एक म -भा ड।”
‘‘तो ये वण मु ाएं भी उसे दे दे, कदािचत् उसे इनक आव यकता है।’’
उसने मु ी-भर वण मु ाएं अपने चमब ध से िनकाल बािलका क हथेली पर रख
द । इसी समय एक वृ -दानव हांफता आ आया। उसका सारा शरीर कांप रहा था। वह
कोयले के समान काला और ब त ल बा था। वह अ य त दुबल था। उसके बड़े-बड़े दांत
भयंकर थे, उसके सारे अंग चब से तर थे और िसर पर वण से मढे़ दो स ग बंधे थे। उसक
कमर म भसे का चमब ध बंधा था और हाथ म एक िवकराल खा डा था। वह दूर से दौड़ा
चला आ रहा था, इसिलए हांफ रहा था और उसका अंग चब और पसीने से गीला हो रहा
था। वह दौड़कर िव ुि व के पैर म िगर गया। उसने कहा–‘‘िव ुि व, उसने तेरे
िपता का वध कर दया।’’
‘‘ कसने?’’
‘‘तेरी माता ने।’’
‘‘तूने देखा?’’
‘‘मने उसे घर के ार पर आते देखा। ार पर तेरी माता ने उसक अ यथना क
और वह उसे भीतर ले गई। य ही उसने श खोलकर रखे, उसने उसका वध कर डाला
और शव ख चकर चतु पथ पर डाल दया।’’
‘‘ या वह उसका रा स पित भी वह था।’’
‘‘नह ।’’
‘‘तो अके ले उसी ने िपतृचरण का वध कया?’’
‘‘ऐसा ही म समझता ।ं ’’
‘‘तू या ब त िमत है?’’
‘‘ िमत ,ं पर तू करणीय कह।’’
‘‘तो ीप म जाकर सब कािलके य को श -ब कर ले आ।’’
‘‘कहां?’’
‘‘जहां मृत िपतृचरण ह।’’
यह कहकर िव ुि व ने शूल उठाकर चरण बढ़ाया। बूढ़े दानव ने बाधा देकर
कहा–‘‘हमारे आने तक तू ठहर। एकाक वहां जाना िवप नक हो सकता है। उस रा स के
वहां ब त प रजन ह। वह र पित का गु म-नायक है। वह तुझे मार डालेगा।’’
‘‘मेरी िच ता न कर। तू अपनी राह जा।’’
यह कहकर िव ुि व तीर क भांित वहां से चल दया। इस समय चार
दशा म अंधकार फै ल गया था। िव ुि व अंधेरी और सूनी गिलय को पार करता
आ सीधा समु -तीर क ओर जा रहा था। उसक चाल तेज थी और उसका मि त क
िविभ िवचार से गरम हो रहा था। नगर का ा त-भाग आ गया और अब वह िवजन वन
म िव आ। यहां भी कह -कह समु पर मछली मारनेवाल क झ पिड़यां थ ।
झ पिड़यां धरती म ग े खोदकर और वृ क मजबूत टहिनयां उनके चार ओर गाड़कर
बनाई गई थ । इन टहिनय के चार ओर द रयाई जंगल क घास का जाल पुरा आ था,
िजन पर गारे का लेप था। छत भी उनक वैसी ही बनी थी। इन झ पड़ म के वल एक
छोटा-सा ार तथा धुआं िनकलने को छत म एक छोटा-सा सूराख था। कु छ झ पड़े बडे़ थे
तथा चटाइय से बनाए गए थे। कु छ झ पड़े झील म पानी पर बने थे, जो उन जंगली
जानवर से सुरि त रहने को बनाए गए थे, जो उनके चार ओर रात- दन घूमते रहते थे।
उनके डर से उ ह नेझील म ल बे-ल बे लकड़ी के लट् ठे गाड़कर पानी क सतह से ऊंचा
एक चबूतरा बनाया और ऐसे ही चबूतर पर झ पिड़यां बना ली थ । कह -कह तो पूरे
गांव के गांव ही इस कार झील म बने ए थे। जगह-जगह ब त-से लोग बकरी क खाल
के डेर म रह रहे थे, जहां सारा कु नबा एक ही जगह िसमटकर रहता था। यहां तक क
खराब मौसम म पालतू पशु भी उ ह म आ य लेते थे। सोने को घास के ढेर, बैठने को कु छ
चपटे प थर के ढोके , खाना पकाने को िम ी के बतन और िशकार के िलए शूल, धनुष, परशु
और गोफन। कह -कह नगर के ा त म चपटी ट के घर थे। ये घर ब त छोटे-छोटे और
एकमंिजले थे, पर इनम सहन था और छत लकड़ी क थ , िजन पर गारे का पल तर कया
आ था।
िव ुि व को जैसे इन झ पड़ , झील और वहां रहने वाल से कु छ सरोकार ही
न था; वह तेजी से अपने ग त पर बढ़ा जा रहा था। सामने ही एक पवत क उप यका
थी, वह उसी ओर बढ़ रहा था। अ ततः वह अपने ग त पर प च ं गया। यहां आकर उसने
अपनी गित धीमी कर ली। यहां से पवत- ृंखला शु होती थी। शी ही वह पवत के नीचे
जा खड़ा आ। सामने समु गरज रहा था। हवा तेज चल रही थी और जब वह पहाड़ से
टकराती थी तो मेघ-गजन के समान श द होता था। अब उसने सावधानी से चार ओर
देखा और िब ली क भांित िन श द पवत क तंग राह पर चढ़ने लगा। थोड़ी ही दूर पर
उसे कु छ गुफाएं नजर आने लग । छोटी-बड़ी अनेक गुफाएं थ । उन सबम रा स और
दै य के प रवार रहते थे। कसी- कसी गुफा म से शोर आ रहा था। कसी म से मांस भूनने
क ग ध आ रही थी। वह पा व म घूमकर उस बड़ी गुफा के ार के सामने प च ं ा, िजसके
डेढ़ सौ फ ट नीचे नदी बह रही थी। इसके दोन ओर आठ सौ गज के िव तार म और अनेक
छोटी-बड़ी गुफाएं थ । ार के सामने आकर वह कु छ ठठका। उसने देखा, सामने ही काली-
काली कोई व तु बीच राह म पड़ी है। वही उसके िपता का मृत शरीर था। ब त दन से
उसने अपने िपता को देखा नह था, पर तु उसने क पना और अनुमान से समझ िलया
क यही उसके िपता का शरीर है। उसने झुककर उसे देखा और घुटन के बल उसके पास
बैठ गया। फर उसने एक ल बी सांस ली और िसर उठाकर गुफा क ओर देखा।
वह गुफा के भीतर िव आ। ार के भीतरी दालान म एक बूढ़ा रा स ऊंघ रहा
था। वह िबना उसे जगाए आगे बढ़ गया। यहां काश था। चब का दीप जल रहा था।
सामने छोटी-बड़ी अनेक कोठ रयां थ । बीच म बड़ा हॉल था, जो अ भुज त भ पर
आधा रत था। उसके सामने त भ वाला एक ल बा दालान था, वह उसी दालान म
अ सर आ। त भ पर हाथी और संह के िच बने थे तथा उन पर उभरी ई न ाशी हो
रही थी। अ त म वह उस मुख गुफा के ार पर प च ं गया िजसके सामने ख भ वाला
ब त बड़ा ओसारा था। यहां उसे एक रा स ने टोका। रा स एक अधेड़ वय का था। उसके
हाथ म धनुष-बाण था। पर तु अभी उसके मुंह से वर फू टा भी न था क िव ुि व का
शूल उसक पसिलय को पारकर कलेजे को चीर गया। वह घू णत हो वह िगर गया। इसके
बाद वह रं गमहल म िव आ। ार पर महीन पद पड़े थे। भीतर सुगि धत जल रहे
थे और वह उसक माता ब त-सी रा सी दािसय के बीच पलंग पर सो रही थी।
िव ुि व क माता का नाम िव ला था। उसक आयु चालीस को पार कर गई थी,
पर तु अभी उसका अंग-सौ व और यौवन वैसा ही भ और आकषक था क कोई भी
त ण उस पर मोिहत हो सकता था। वह सोने के पलंग पर सो रही थी। गुहा म सुगि धत
चब के ीप का म द काश था। पास म ख ग और धनुष-बाण रखे अनेक त णी दै य और
रा सबालाएं उसके चार ओर भूिम पर सो रही थ । िव ला क उठान बड़ी आकषक थी।
वह ल बे कद क और छरहरे बदन क कमनीय ी मू त थी। उसके ने म मादकता थी
और होठ म रस का भ डार। वह कसी भी त णी सु दरी से अिधक आकषक थी। शान भी
उसक रािनय जैसी थी। वह क ठ म संहल के बड़े-बड़े मोती पहने थी तथा उसका
क टब ध और वलय वण का था।
कु छ देर िव ुि व चुपचाप खड़ा अपनी माता के इस भ प को देखता रहा।
फर उसने उसका पैर पकड़कर ख चा। एकाएक न द से च ककर उसने यमदूत के समान
िव ुि व को सामने हाथ म िवकराल शूल िलए देखा।
य िप उसने ब त दन बाद पु को देखा था, पर उसने उसे तुर त ही पहचान
िलया। वह हड़बड़ाकर पलंग से उठ खड़ी ई। उसने धड़कते ए दय पर हाथ रखकर
कहा–‘‘जात, तू इस असमय म कस अिभ ाय से आया है?’’
‘‘मातः, म िपतृचरण के दशन करने आया ।ं ’’
‘‘तेरे िपता दो ह।’’
‘‘मुझे एक ही चािहए।’’
‘‘य द तेरा अिभ ाय हतभा य मुचुकु द दानव से है तो उसका शव उस चतु पथ
पर पड़ा है।’’
‘‘उसी से अिभ ाय है मातः?’’
‘‘तो वह जा, यहां य आया?’’
‘‘तुझे वह ले जाने के िलए।’’
‘‘मेरा उससे या स ब ध रहा?’’
‘‘इस पर म िववाद नह करता।’’
‘‘तो कह, तेरा म या ि य क ं ?’’
‘‘के वल वह श हाथ म ले, िजससे तूने उसका वध कया है।’’
‘‘ कस िलए?’’
‘‘उसी से मेरा भी वध कर।’’
‘‘तुझसे मेरा या िव ह है, जात?’’
‘‘पर मेरा तुझ पर िव ह है।’’
‘‘ कस िलए?’’
‘‘तूने पित-वध कया।’’
‘‘मेरा पित सुकेतु रा स है।’’
‘‘और मेरा िपता?’’
‘‘कभी था, अब नह ।’’
‘‘पर तु यह सब भूिम, स पि , पशु, वण र , घर, भ डार तो उसी के ह।’’
‘‘वह मृत ह, अब म उसक वािमनी ।ं ’’
‘‘और म?’’
‘‘तू य द मेरा अनुगत है तो मेरा तुझ पर अनु ह है।’’
‘‘अनु ह है तो श ले।’’
‘‘कै सा श ?’’
‘‘िजससे तूने िपतृचरण का वध कया।’’
‘‘ क तु य ?’’
‘‘मेरा वध करने के िलए।’’
‘‘म तेरा वध नह करना चाहती, जात!’’
‘‘पर म तेरा वध करने आया ,ं मातः!’’
‘‘तेरा ऐसा धृ आचरण?’’
‘‘ ोध करने से लाभ न होगा मातः, श ले और तिनक उधर खुले थान म
चल।’’
‘‘ य ?’’
‘‘यहां श – योग के यो य थान नह है।’’
‘‘तू या मुझसे यु करना चाहता है?’’
‘‘तुझे वध करने से पूव म तुझे आ मर ा का अवसर देता ।ं ’’
‘‘अरे कािलके य, तुझे या रा स का भय नह है, जो तू यहां िनभय चला आया?
जा, अभी भाग जा।’’
‘‘िव ला भय और ोध से चीख उठी। चीख सुनकर सब हरी रा िसयां जाग
उठ । वे सब श लेकर वािमनी क आ ा क बाट जोहने लग ।
िव ुि व ने कहा–‘‘अरी चे टयो, यह माता और पु का िव ह है। चली जाओ
यहां से। यहां तु हारा कु छ काम नह है।’’
इस समय िव ुि व का िवकराल मुख और भावभंगी देख वे सब रा िसयां डर
ग । उनके मुख से बात न िनकली। पर तु िव ला ने चीखकर कहा–‘‘इस िनल पु को
मेरे क से िनकाल बाहर करो।’’
पर तु कसी का ऐसा करने का साहस न आ। इसका कारण िव ुि व का
आतंक तो था ही, वे सब िव ला के दुरा ह, िनदय वभाव और पित-ह या के कारण
उससे घृणा भी करती थ ।
िव ला ने उ ह िनि य देख गरजकर कहा-‘तुम लोग ने मेरा आदेश सुना
नह ?”
िव ुि व ने कहा–‘‘नाहक उनका ाण संकट म डालती ह, मातः! तू ही श
उठा।’’
‘‘म श नह उठाऊंगी।’’
‘‘ह त, तो मुझे श के िबना ही तेरा वध करना पड़ेगा।’’ उसने हाथ का शूल दूर
फक दया और संह क भांित उछलकर िव ला को क ठ से पकड़कर भूिम पर िगरा
िलया। िव ला ने छू टने क ब त चे ा क , ब त छटपटाई, पर िव ुि व उसे उसी
कार घसीटकर अिल द के एक एका त थल म ले गया, जैसे बाघ अपने िशकार को ले
जाता है। फर उसने उसके िसर के सब बाल नोच डाले। उसके मुंह म हाथ डालकर मुंह
चीर दया। र क धार बह चली। िव ला छू टने को ब त छटपटाई, पर िव ुि व के
लौहद ड से वह पार न पा सक । अिल द म वह उसे कभी इधर से उधर घसीटता, कभी
उठाकर प थर पर इस कार पटकता जैसे धोबी कपड़ा पटकता है और कभी िसर से ऊपर
उठाकर दूर फक देता। फर भी िव ला के क ठन ाण नह िनकले। वह आ नाद करती
रही। अ त म िव ुि व ने अपना चरण उसके व पर रखकर जोर से दबा दया।
पसिलयां चराकर टू ट ग और एक बार र -वमन करके वह पित-ह यारी सु दरी दानवी
ठ डी हो गई। पर तु िव ुि व का ोध तो अभी भी शा त न आ। उसने मृत माता का
एक चरण पैर से दाब, दूसरे को हाथ म उठा बलपूवक उसे दो ख ड म चीरकर दोन
ख ड ार के बाहर दोन दशा म बिल-मांस क भांित फक दए।
चे टयां यह घोर कृ य देख, भय से चीखती ई भाग खड़ी , पर तु इसी समय
ब त-से सश रा स के साथ सुकेतु रा स ने उसे घेर िलया। िव ुि व ने उछलकर
अपना शूल घुमाया। अब उस अके ले का अनेक से तुमुल सं ाम होने लगा। रा स क सेना
कोलाहल करती बढ़ती ही चली गई, पर तु िव ुि व के िवकराल शूल के सामने रा स
ठहर न सके । इसी समय सह कािलके य ने रा स को चार ओर से घेरकर काटना
आर भ कर दया। देखते-ही-देखते सब रा स काट डाले गए। सुकेतु का िव ुि व से
तुमुल यु आ। अ त म िव ुि व का शूल उसके व को पार कर गया। अब उसका
िसर काट और अपने िपता का शव क धे पर रख िव ुि व अपने कािलके य यो ा के
साथ समु तीर क ओर लौटा, जहां उनक नौकाएं उनक ती ा कर रही थ ।
57. ितगमन

‘‘िव ुि व ने अपनी मां को मार डाला है।’’–रावण ने उ ेिजत वर म कहा।


‘‘नह , यह स भव नह है।’’–सूपनखा ने और भी उ ेिजत होकर उ र दया।
‘‘उसने उसे मार डाला है।’’
‘‘अपनी सगी मां को? नह -नह , ऐसा नह आ।’’
‘‘उसने उसे मार डाला।’’
‘‘िव ुि व ने?’’
‘‘बहन, यह अ छा नह आ। बड़ी भयानक बात है।’’
‘‘ क तु...?’’
‘‘उसने सुकेतु को भी मार डाला है और उसके सब रा स को भी।’’
‘‘ क तु र े ...’’
‘‘उसे न देवता मा कर सकते ह, न म।’’
‘‘तो म र े को दोष न दूग ं ी, पर तु म िव ुि व के साथ ,ं यह न भूलना।’’
‘‘ क तु मातृवध? कतना जघ य है!’’
‘‘पु ष पर कत का भी कु छ भार है।’’
‘‘पर तु म उसे अब स ब धी वीकार नह कर सकता। सुकेतु हमारा वीर
सेनापित ही न था, प रजन भी था।’’ रावण ने मिहषी म दोदरी क ओर देखा। म दोदरी ने
भ मन से कहा–
‘‘म भी। िव ला मेरी मौसेरी बहन थी।’’
‘‘अपने स ब धी और प रजन के ह यारे का हम कै से वागत कर सकते ह?’’
‘‘यह तो बड़ी ही खराब बात हो गई, सूपनखा! उसने अपनी सगी मां को मार
डाला। हम उसका मिणमहालय म वागत नह कर सकते।’’
‘‘मां, म नह चाहती क वह यहां आए, मुझे ही उसके पास जाना होगा।’’
‘‘पर तु तू िन य ही अब उसे पित- प म वरण करना न चाहेगी!’’
‘‘िन स देह वह मेरा पित है।’’
‘‘सूपनखा, र ािधपित क कु लक या, रा सबाला होकर तू मातृह ता से िववाह
करना चाहती है?’’
‘‘म उसी से िववाह क ं गी।’’
‘‘ओह, यह तो अ य त अपमानजनक और ासदायक है। मातृह ता से िववाह
करके फर या तू रा स क िति त जाित म रह सकती है?’’
‘‘र े ने मुझे मेरा भिव य बता दया। पर म उसी क –ं उसके सब अ छे-बुरे,
पाप-पु य क संिगनी। उसके काय को र े ने देखा है, म उसक मनो था देख रही ।ं
इस मनो था के क को अके ला ही भोगने देने को म उसे अके ला नह छोड़ सकती। य द म
ऐसा क ं तो म अपनी दृि म छोटी हो जाऊं।’’
‘‘उस आदमी के ेम के िलए तू यह दु साहस कर रही है!’’
‘‘भाई, तू र े है, साहिसक यो ा–और म तेरी बहन ,ं साहिसक ेिमका।’’
“साहिसक ेिमका?’’ म दोदरी ने यो रय म बल डालकर कहा।
‘‘मिहषी, गु सा करने से या होगा? कु छ लोग साहिसक कत िन होते ह। वे
प रणाम क िच ता नह करते, न वे लाभ-हािन का िवचार करते ह। वे के वल वही करते ह,
जो ठीक है।’’
‘‘तो तू या समझती है, यह मातृवध ठीक है?’’
‘‘स भव है। पर तु म तो िव ुि व के ित अपने कत ही क बात सोचती
।ं ’’
म दोदरी ने कहा–‘‘तो उसे बुलाकर कारण पूछ।’’
‘‘वह नह आएगा।’’
‘‘मेरी आ ा से भी नह ?’’–रावण ने ोध से कहा।
‘‘और म भी तेरी आ ा से यहां कूं गी नह । उसके पास जाऊंगी।’’ सूपनखा ने
शा त मु ा से कहा।
‘‘तुझे जंघ से याह करना होगा।’’
‘‘कदािप नह , मुझे दुःख है, मेरे कारण र े को दुःख आ–मिहषी को भी अब
िचि तत होने क आव यकता नह है, अब म चली।’’
‘‘कहां?’’
‘‘अपने ि यतम के पास।’’
‘‘तो मुझे उससे यु करना होगा।’’
‘‘र े , उसके पास भी श है।’’
‘‘तो तू र े को चुनौती देती है?’’
‘‘चुनौती र े अपनी बहन को देता है, जो उसका ापार नह है।’’
‘‘ क तु!’’ म दोदरी ने कहा–‘‘म एक बार िव ुि व से बात क ं गी।’’
‘‘म उसे मिणमहालय क ोढ़ी न लांघने दूग
ं ा।’’
‘‘जब तक र े को आपि है, म भी उसका यहां आना ठीक नह समझती।’’
‘‘हम यह कै से कह क वह कृ त मातृह ता है या क कत िन पु ?’’
‘‘वह कत िन पु है।’’
‘‘ या माता का?’’
‘‘नह , िपता का।’’
‘‘पर तु हम रा स म, दै य म और दानव म मातृस ा ही व र है, िपतृस ा
नह ।’’
‘‘तो इसी से एक प ी अपने पित का वध कर सकती है? उसक सब स पि को
उसके जीते-जी लेकर दूसरे पु ष के साथ रह सकती है?’’
‘‘यह दोषपूण है।’’
‘‘तो उसे कत िन पु ही कहा जाएगा। स भव है, उसने कत वश जो कु छ
कया, उससे वह दुःखी भी हो।’’
‘‘बहन, ेम के आवेश म मनु य ब त-सी बात नह देख सकता।’’
‘‘पर तु ी को पित क अिव ािसनी होने पर या द ड दया ही न जाए?’’
‘‘यह तो उसके ि व और च र पर िनभर है।’’
‘‘तो र े समझते ह क उसने अपराध कया है?’’
‘‘हो सकता है; पर तू या समझती है क तुम दोन एक-दूसरे के पूरक हो?’’
‘‘हम दोन जीवन-साथी ह, म उसे वरण करके स ।ं ’’
‘‘दुभा य है, दुःखद है!’’
‘‘तो अब म चली, अिभवादन करती ं भाई!’’
‘‘आह, यह दु सह है, बहन!’’
‘‘अिभवादन करती ,ं भाभी!’’
‘‘ क तु तू हम छोड़कर जा रही है?’’
‘‘तु हारा आशीवाद लेकर।’’
‘‘ फर कब आएगी, सूपनखा?’’
‘‘कभी नह ।’’
‘‘अ तु! जो मिण, र , वण तुझे चािहए, मिणमहालय से ले जा और कु छ सैिनक
भी।’’
‘‘नह ले जा सकती।’’
‘‘ य ?’’
‘‘िव ुि व मेरे िलए यथे है।’’
‘‘वह तो वयं िवप है।’’
‘‘ फर भी म र े का दहेज नह वीकार कर सकती।’’
‘‘ या मेरे अनुरोध से भी नह , सूपनखा?’’
‘‘नह , जब तक र े मेरे पित को अपना बहनोई वीकार कर मिणमहालय म
उसका वागत न करे ।’’
‘‘यह तो कभी नह होने का।’’
‘‘तो भाई, िवदा!’’
‘‘बहन, या यह यथे नह क तू उससे याह कर रही है? मुझे भी उसे ेह करना
होगा?’’
‘‘और आदर भी। तुम जब तक उसे बहनोई और िनरपराध कत िन पु नह
समझते, हमारी राह जुदी है–तु हारी जुदी।’’
‘‘ओह सूपनखा, मुझे उससे यु करना ही पड़ेगा, यह मेरी कु ल ित ा का है।’’
‘‘तो भाई हम सब कािलके य लोग अ मपुरी म तेरा वागत करगे।’’
58. यमिज ना

लंका म यमिज वा नाम क एक कु नी रहती थी। वह वृ ा रा सी सवहारी


िव ा म बड़ी कु शल थी। वह कु नी लंका म िस थी। लंका क सब वे या क वह
नानी थी। उस रा सी कु नी का प भी बड़ा अ भुत था। उसक ठोढ़ी मोटी थी, नाक
चपटी और टेढ़ी थी। दांत बड़े-बड़े बाहर को िनकले ए और छीदे थे। चमड़े के खाली थैले
के समान लटके ए तन, क ठ क उभरी ई नस, उसके कद- प को कर रही थ ।
धुला आ धवल व पहने, िविवध वशीकरण औषिधय के ताबीज और र क माला
पहने, उं गली म वण क मु का और क ट म वणमेखला धारण कए आस दी पर बैठी
वह कु नी यमिज वा अपनी पु ी मदालसा को वे याधम िसखा रही थी–‘‘देख, तेरे ये
िचकु र-भर ऐसे ह जैसे भ म होते ए कामदेव का धू ही व तकाकार हो गया हो।
कामीजन को कं कर बनाने को यही यथे ह। फर ये म दो लिसत ूयुगल और म द-
ि मत अधर धीर को भी अधीर करनेवाले ह। कामीजन तेरे इस वणका त शरीर क
काि त सुनकर ही िव वल हो सकते ह, देखने क तो बात ही या है, फर तेरी यह िचर
द तपंि , अिजर िव ु ाम-काि त को मात करती है और पु ष के मन म म मथदाह-
वेदना उ प करती है। तेरा आलाप को कल क कु क को मात करता है और तेरे इन
मकर-के तन-िनके तन युगल तन-का तार म मर त कर का वास है। तेरे ये मृणाल-
प रकोमल युगल बा भला कसे मदन-संकट म नह डाल सकते! तेरा यह मनोहर म य
देश ीण तो है, पर तु शरीरधा रय क अिभलाषा, िच ता, मृित, गुण-कथन, उ ग े ,
संलाप, उ माद और जड़ता क म मथ-दशा को ा कराता है। संक पज चापयि -गुण-
शोभा-धा रणी ये तेरी रोम-रािज त ण को कामशर-पीिड़त करती है। ये तेरे सुवण-
िशलातल, रमणीय पृथुल जघन यितय क समािध का नाश करने वाले ह। ऐसे ही
मनोहारी तेरे र भा त भ-से शीतल ऊ -युग मदन- वर-शाि त क महौषध ह। कनकलता
के समान यौवन-क प-त तेरे ये सुडौल जंघायुगल भला कसे कामफल न दगे? अनार और
थल-कमिलनी के रं ग को फ का करनेवाले तेरे चरण-युगल भला कसके मन को अलंकृत
नह करते? अरी पु ी, तेरे शरीर क इस शोभा का मू य पृ वी पर कहां है? पर तु यान से
सुन! धन से सबक ित ा होती है–वे या क िवशेष करके । पर तु ेम करने से धन नह
िमल सकता। इससे वे या क बेटी को ेम के िवष से दूर ही रहना चािहए। स या के
अ धकार के समान वे या का अनुराग दोष- पी अ धकार को बढ़ाने वाला होता है।
इससे, वे या-पु ी को ेम का चतुराई से अिभनय करना चािहए– ेम नह करना चािहए।
वे या को चािहए क पु ष के साथ अनुराग कट कर उससे सब धन ले ले, फर धन लेकर
उसे िनकाल दे और जो उसे फर धन िमले; तो उसे भी वीकार कर ले। मुिन के समान जो
वे या बालक म, युवा म, वृ म, पवान् म तथा कु प म समभाव रखती है, उसी को
परमाथ ा होता है।
रावण का छोटा पु अ यकु मार था। वह अभी कशोर वय का सु दर, भावुक
त ण था; और लीला-िवलास म िच रखता था। मदालसा पर वह आस था। वह अभी
वे या क वृि य को नह जानता था। लंका म यौवन के अ धे धनी त ण कशोर के
धन और ाण को हरने वाली दो व तु का ाब य था–एक वे यालय, दूसरे ूतालय।
इसिलए लंका के े , चतुर नाग रक रा स वेद-िव ा, अ -िव ा, श -िव ा और र -
िव ा के साथ–अ -िव ा और मोिहनी िव ाएं भी सीखते थे। पर तु अ यकु मार अभी
िनपट बालक ही था। एक बार वा टका म उसक मदालसा से देखादेखी हो गई थी।
सौिवद के ारा तीन वष तक उसने उसक आराधना क , तब कह उसने उसे आने क
वीकृ ित दी। एक दन िवहार करते ए वह मदालसा का अपने िम और म ी ह -पु
ज बुमाली से वणन करने लगा–
‘‘अरे िम , उसका ू भंग, ि मत और कटा पात, मृदव ु मनोहारी अंगहार,
आलाप और अिभगमन– येक म कु सुमायुध का वास है। अरे , जैसे ितल-ितल सब र के
सं ह का समावेश करके िपतामह ा ने सु दोपसु द के नाश के िलए ितलो मा अ सरा
क सृि क थी–उसी भांित उस दु बूढ़े ा ने इस लंका म सब र -त ण का नाश करने
के िलए यह मदालसा रची है। उसक मृग-शावक जैसी तरला-िवलोला चा ुषी, फू ल से
गुंथी ई सुदीधा वेणी, ािणय को कामोिचत फल देनेवाली ह । उसके च -ितलक-
शोिभत ललाट और दुलभ र ो पलकोकनद-मुख ी अव य है, उसका आता मधुम
अधरो का अमृत-पान पु य-शेष जन ही कर सकते ह। अहा, घू णत लोचन, अनुरागा ा त
कमल- ुित, वह मु धवदन सुधा-सदन ही है। उसका कृ श तन तो निलनी के समान शीतल-
कोमल है और उस पर फु ल मुख-कमल िखला है। म मर उसका मकर द-पान करना
चाहता ।ं उसके िनत ब-सौ दय को देखकर तो तप वी भी तुर त उ कं ठत हो उठगे। वह
सुवदना, ह षणी, तनुम या, मृदभ ु ािषणी, धरा देखने वाल को आ य-िवमूढ़ कर देती
है। वह जब पलक झुकाकर, ेमदाकु ल-पराङ् मुखी हो दृि -मा से ही त भाव को
करती है तब तो दशाण शर ेप से गिलत, काम-वृ भी उ ीिवतकाम हो जाते ह।
फर मेरे जैसे ृंगार-ि ध त ण क या कथा! उसके द प पर यौवन छाया ही है,
फर जब वह अंग और लीला के ृंगारानुभाव से उ ी होता है–तब मुिनय का मन भी
मु ध हो जाता है। अरे , ता य के िनझर झरने के अमृत से उसक देह- ी संिचत ई, तो
नवीन यौवन क लीला-कला क पौध फू ट उठी। फर उ ह त क शीतल छाया म
सोता आ कं दप अक मात् जाग उठा। हाय-हाय, वह अब जग य करना चाहता है।
िवधाता ने उसे लाव य ही के कण से बनाया है, उसके कु च-युगल िनबाध उ त होकर
जन-जन को पीिड़त करते ह। य , भाई यह कै सा चम कार है, यह कामदेव– मरण-मा से
तो उसक उ पि है, फू ल के उसके बाण ह, अबला ी का उसे बल है, फर भी वह ं य-
अनंग आबाल-वृ सभी का घात करता है! उसके आकणा तगामी नील ने तो ऐसे
शोभायमान ह, जैसे उसने कान म कमल का ृंगार कया हो। लंका क सब ि यां तो
उसक अतु यता म और पु ष भोग-िवरह म सूखते जा रहे ह। बस ष ढ ही मजे म ह। उस
कािमनी क ीण क ट आभरण-भार नह सक सकती थी, इसिलए िवधाता ने उसे रोम-
रािज के नैस गक आकषण से सि त कया है। उसके सक प अधर, अधीर ई ण-युगल,
बं कम ू भंग तो उस त वंगी को भी ही करते ह। पर फर भी उसने रा स-भट से
भरी-पूरी इस समूची लंका को जीत िलया है। उसके पु िनत ब पर भारी वण-रशना
िनदय आघात कर रही है और पीन कु च-यु म मिणहार के आघात को िन सह रहे ह।
अपनी-अपनी साम य ही तो है। पर तु यह जो मृणालमृद ु भुजव ल रय म वजनी वण-
वलय पहना दए ह–यह तो अनथ ही है।’’
इस कार जब दोन िम मदालसा का प-लाव य वणन कर रहे थे, तभी
यमिज वा क भेजी ई दूती ने आकर राजपु को णाम कर पु पता बूल-पटल का
उपायन राजपु के स मुख धरा और िवन मनभावन वचन बोली–“ि यदश कु मार, अब
म तुमसे या क ?ं वह तो च मा को अंक म भरना चाहती है, आक ठ अमृत-पान करना
चाहती है और मलय-प लव पर शयन करके अपना दाह शा त करना चाहती है अथवा
िव णु क कौ तुभ मिण को दय म धारण करना चाहती है। भला उसक प ा तो देखो।
कहां हम पािपनी अ पृ या वे या जाित, और कहां आप जैसे गुण-समु उदार अ तःकरण
वाले राजपु ! भला हम हीन-कु ल कै से कु लवधू क ित ा को ा हो सकती ह? पर क ं
या–यह सब उस िध कृत अनंग का दु भाव है, वह िववेक ऋिषजन को भी िववेकहीन
कर देता है, फर यु ायु का िवचार भला वे कै से कर सकते? सो यही तो म मथ क
‘रागर ु’ है। उसक उ ग े ाव था का वणन म कै से क ं ? वह दूसरे का मन हरती है, पर
वयं िवमन रहती है। नागर का वह मनोरं जन करती है, पर वयं उदासीन रहती है। हे
कु मार, तेरे िबना वह ऐसी उि हो रही है क या क ।ं अपने िविच आचरण से वह
कामीजन के मन को मोह लेती है, पर तु उनके सेवा–स कार-दान से वह स नह होती।
कु मार, वह तो तेरे ही ेम म दीवानी हो रही है। पर तु वह ेम क भोरी ेम का नाम ही
जानती है– ेम के त व को नह पहचानती; अभी उसका अनुभव ही या है! अ हड़ है।
रितवाता से वह कं ट कत हो जाती है, रितसुख क बात तो उसने अभी सुनी ही सुनी है। वह
उसका अपना अनुभूत नह है। इस कार यह ेम-मू त अभी परो -म मथा है। अभी वह
मदन- जा से अनिभ है और उस अनिभ पर पापा मा, द ध मनोज ने कु सुमा से,
तुझसे रिहत देख, आ मण कया है। अब वह बाला मन म तेरी ही मू त रखकर आते जाते,
आगे-पीछे, स और ु तेरा ही यान करती रहती है। तुझे ही नाना अव था म,
नाना भाव म देखती है। ऐसी वह उ कं ठत नाियका है। हे राजकु मार, तू का त है, है,
र य है, सुगम है, सुखद है, मनोहर है, रमण है, इ है, वामी है, दियता का ाणदाता,
के िलकरण-िनपुण है। सो हे राजपु , तू उस ि या के िनकट चल, अब झूठ-मूठ का िवल ब
य ? अरे , वह दपण म अपना मुख भी नह देखती, न च -दशन करती है, इससे उसे
अनुताप होता है। जब सोती है तो अपनी मृणाल-भुजा को इधर-उधर पटकती रहती है।
वह कट उदासीन है,पर भीतर से अनुर है। म कहती ,ं अरी मूखा, वही तो तू है। वही
यह िवद ध जन-मि डत पुरी लंका है, वही कु समायुध है, फर यह नया िवरह-संताप तुझे
कै से उ प आ? उस िवरह-पीिड़ता के कपोल पा डु र होकर और भी मनोहारी हो गए ह,
सो इसम आ य या? म मथ-िवकार तो सहज सौ दय को िनखारता ही है। नये कमल-
प क श या पर उसका कृ श और दु नरी य पा डु शरीर ऐसा शोभायमान हो रहा है
जैसा स या के धूिमल काश म िवकिसत ि तीया क ीण च -कला; और ऐसा भी
होता है क ‘िवष य िवषमौषधम्’। इसिलए िजस कारण से यह मरमा रोग आ है
उसी से उसका शमन भी होगा। सो राजकु मार, वह मदालसा तेरे चरण-कमल के रज क
संगित क इ छु क है, वह दासी के समान तेरी इ छा करती है, सो तू उसक मनोकामना
पूरी कर। म न तो चापलूसी करती ,ं न झूठी बड़ाई, न लोभ से कु छ योजन है। मने
उसका स ा गुण-गान कया है। स ाव ही िजसका मूल है और हंसती ई दृि का िवलास
ही िजसक सघन छाया है, उस मदालसा- पी राग-त का रसपान कर, और सब
लंका के वासी ीम त रा स िजसक एक झलक देखने को मरे जाते ह, तू उसका अंग-संग
कर।’’
दूती के ऐसे वचन से उ म -सा हो अ यकु मार काम- वर से द ध हो भारी-भारी
सांस भरने लगा। फर उसने दूती से कहा–‘‘हे चा भािषणी, जा, समय-स मत कर।’’
59. अ मपुरी का यु

लंका- ीप के पूव अंचल म कु छ अ म- ीप-पुंज थे। ये ीप ब त छोटे-छोटे थे


और इनम से अनेक म मनु य क आबादी नह थी। कु छ ीप तो ऐसे थे, िजनका पता ही
नािवक को न था। पर कु छ, ऐसे भी थे, जहां जाते ए अ छे साहसी नािवक भी डरते थे।
य क ये सभी ीप-पुंज चु बक प थर के ीप थे, इसी से ये सब अ म- ीप-पुंज के नाम से
िस थे। ब त कम नािवक वहां जाने का साहस कर पाते थे। ीप के पास जाते ही
नौका के अंशफलक िबखर जाते थे। इ ह ीप-पुंज म से एक म अ मपुरी बसी थी।
पहले यह पुरी रा स ही क थी, पर तु ाचीन काल से उसम दै य-दानव ही रहते थे।
िव ुि व जब कािलके य का नेता बना, तो उसने पुरी को कु छ समृ बनाया। इस समय
अ मपुरी म बीस सह कािलके य बस रहे थे और इन सबका नेता िव ुि व था।
अ मपुरी समु के िजस अंचल म बसी थी, उसके आसपास का समु ब त गहरा था और
वहां समु म जल-दानव ब त थे। उनके भय से भी ब त कम नािवक वहां आने का साहस
करते थे। यह जल-दानव बड़ा शि शाली ाणी था। इसक आकृ ित िवल ण और भयानक
होती थी। इस जीव के आठ पैर उसके िसर पर होते थे। इन आठ िवशाल पैर के साथ दो
र सीनुमा मूंछ भी होती थ । इसक आंख बड़ी ही भयानक होती थ । इन जल-दै य के
आठ पैर बड़े ही मजबूत और भयानक होते थे । वे इ ह से अपना िशकार पकड़ते थे।
इनका आकार छ:-सात गज का होता था। इस जल-दै य क सभी बात िनराली थ । यह
आगे को न चलकर पीछे क ओर चलता था। यह ज तु उस काल म, जब जहाज, िबना य
के चलते थे, उनके िलए काल ही माना जाता था। यह जल-दानव अपने मजबूत पांव से
तरणी को जकड़ लेता था और बात-क -बात म उसका म तूल तोड़ डालता था। एक
िविच बात यह थी क उसके शरीर म से क तूरी के समान सुग ध िनकलती थी। यह दै य
अपनी ल बी भुजा म कई-कई मनु य को एकबारगी ही लपेट तथा तोते के समान
िवराट च च खोलकर उन सबको एकबारगी िनगल जाता था।
दूसरी िवशेषता इस ीप क , वन-मनु य क थी। ये एक जाित के गु र ले ही थे।
इन वनमानुष का आकार दो गज से भी अिधक होता था और इनका शरीर इतना सुग ठत
और मोटा-ताजा होता था क देखने पर ये िब कु ल भयानक दै य लगते थे। इनके अंग और
जबड़े अ यंत मजबूत होते थे और छोटे-से-छोटे वनमानुष म दस आदिमय का बल होता
था। इनका देह-भार साठ मन तक होता था। इनके सवाग पर बड़े-बड़े काले बाल उगे होते
थे। िसर पर कु छ लािलमा िलए लाल बाल होते थे। उनका भरा आ मुंह, चपटी नाक और
बेढंगी आंख होती थ । जब ये अपना मुंह खोलते थे, तो उनक िवकराल दाढ़ प दीख
पड़ती थ । ये जीव दो-चार एक होकर जब ब ती क ओर आते तो कृ िष चौपट कर डालते
थे। यह पशु दस-दस क सं या म पा रवा रक ढंग पर रहता था। वह बड़ा ही िवकट,
साहसी और अपनी र ा म समथ होता था। जब यह ोध करता था तो इस कार गरजता
था क वन-पवत ित विनत हो जाते थे।
िव ुि व ने कौशलपूवक तरणी को अ म- ीप के तट पर लगाया। वह थम
वयं उछलकर उतरा और फर उसने दोन हाथ म सूपनखा को उठाकर तट पर रख
दया। धीरे -धीरे दोन ही ीप क ऊबड़-खाबड़ पथरीली राह पर बढ़ने लगे।
सूपनखा ने पूछा–‘‘अब या हम सुरि त ह?’’
‘‘म समझता ,ं अ मपुरी म हम सुरि त ह।’’
‘‘ क तु र े से कह आई ं क अ मपुरी म हम उसका वागत करगे।’’
‘‘सो तो ठीक ही कहा।’’
‘‘ या हमारा बल इतना है?’’
‘‘बीस सह कािलके य मेरे अधीन ह।’’
‘‘वह तो तूने पहले कभी नह कहा!’’
‘‘तो तूने र े को कै से िनम ण दे दया?’’
‘‘के वल तुझी पर िनभर होकर।’’
‘‘ या म एकाक दुजय र े से पार पा सकता ?ं ’’
‘‘ य नह , तुझम र े से अिधक शौय भी है, दप भी है।’’
‘‘यह तू मानती है?’’
‘‘मानती ।ं ’’
‘‘अ छा ही है, उसम बीस सह कािलके य को भी जोड़ दे िजनक तू आज से
वािमनी है।’’
‘‘पर म तो तेरी कं करी ।ं ’’
‘‘और म तेरा।’’
‘‘हम कतना चलना होगा?’’
‘‘डेढ़ योजन।’’
‘‘चल फर, सूरज का खर तेज बढ़ रहा है।’’
दोन आगे बढ़ चले। अ मपुरी क पौर पर कािलके य ने द पित का भ
अिभन दन कया। नगर-भर म नृ यो सव आ। दीपावली ई। राि को म भोज आ,
जहां िव ुि व ने सूपनखा-सिहत वण- संहासन पर बैठ सबक अ यथना वीकार क ।
अ मनगर साफ-सुथरा और कलापूण गवा से स प था। कािलके य स प और
ीम त न थे। कृ षक और आखेटक-मा ही थे, फर भी वे चतुर और सु िचपूण थे।
िव ुि व से उ ह ेम था। िपतृह या रणी माता का वध करने के कारण कािलके य ने
उसका अिभन दन ही कया था।
लंका म िव ुि व छ वेश म एक िशकारी के प म रहता था। उसने एक
कार से अपने वैभव और साम य का ठीक-ठीक अनुमान सूपनखा को भी न दया था। वह
उसे एक िवपद् त त ण दानव-कु मार समझती थी । उसक शालीनता और उसका
साहिसक जीवन उसे ब त पस द था। इसी से वह उस पर इतनी मोिहत थी। उसक
िवप ाव था, पा रवा रक कलंक और वयं िव ुि व के हाथ माता का वध होने पर भी
वह उसे याग न सक । इतने बड़े इस सा ा य के अिधपित क इकलौती यारी बहन,
भाइय और भाभी के परम अनुरोध को भी न मानकर एकाक उसके साथ चल दी। पर तु
जब उसने यहां आकर अ मपुर म उसक साम य और वैभव देखा, तो उसने जाना क
उसका पित एक छोटा-सा राजा ही नह है, वह अपने कु ल का अिधपित और ीप का
वामी है।
चलते समय रावण ने ि य बहन को कहा था क संकट त होने पर वह उसक
शरण आ सकती है, पर तु उसने अपने घम ड और आ मस मान के आवेश म रावण का
दया उपानय भी वीकार नह कया था। अतः अब भला वह कै से उसक शरणाप हो
सकती थी! उसने उसका एक भी अनुरोध नह माना था, तो अब वह कै सेे अनुरोध कर
सकती थी!
पर तु मधुयािमनी स प ई ही नह और संकट का काल आ प च ं ा। रावण के
सोलह सौ यु पोत ने अ म ीप को घेर िलया। ु ा, म यमा, भीमा, चपला, पटला, मया,
दीघा, प पुटा, गभरा, म थरा, तरणी, लािवनी, धा रणी, वेिगनी, ऊ वा, अनू वा,
वणमुखी आ द अनेकिवध जल-नौका ने अ म ीप का तट घेर िलया। उन पर से शूल-
ख ग-मुदगर-् धनुष-बाणधारी यो ा रा स तीर पर उतरने लगे।
िव ुि व सूचना पा तुर त ही यु को स हो गया। पाठक उस ता दासी
रा स-बािलका को न भूले ह गे, जो लंका म िव ुि व के िलए जागरण कया करती थी।
यहां वह सूपनखा क ि य सखी बन गई थी। अभी य िप कु छ ही मु त का सि मलन था,
पर दोन ही ि य सिखयां बन गई थ । जब िव ुि व यु -स ा से सि त हो सूपनखा
से िमलने आया तो उसने देखा क सूपनखा और सरमा पर पर एक-दूसरे को यु -स ा से
अलंकृत कर रही ह। िव ुि व ने हंसकर कहा-“ि ये, यह या?’’
उसी कार हंसकर सूपनखा ने कहा–‘‘र े के वागत क तैयारी तो मुझे ही
करनी है। मने ही तो उसे अ मपुरी म िनम ण दया है। म अपने भाई के ताप- वभाव से
प रिचत ,ं अतः उसका समुिचत स कार तो म ही क ं गी।’’
‘‘तो िति ते, तू सरमा के साथ पुर क र ा कर! कह, कतने यो ा तुझे
चािहए?’’
‘‘एक भी नह , हम पु ष यो ा न चािहए। हम दानव-बालाएं ही अपने नगर क
र ा कर लगी। हां, हम श चािहए।’’
‘‘वे श ागार म यथे ह। या म तेरी सहायता के िलए कु छ सेनापित और म ी
िनयु कर दू?ं ’’
‘‘नह , उन सबको तू ले जाकर रण थली म अपना शौय कट कर, यहां हम सब
यथे ह। हमारे रहते नगर म रा स िव न हो सकगे।’’
‘‘तो ि ये, कु ल-पु ष तेरी र ा कर। म चला।’’
‘‘समु के दै य तेरी सहायता कर। जा, श -ु र से ललाट-ितलक दे।’’
समु -तट के दि ण दशा म िवराट समतल मैदान था। वह रावण ने महासूिच-
ूह बनाकर अपनी सेना को अवि थत कया था। ूह के ा त-भाग से उसने सभी
मामा को िनयु कर म य म कु भकण को रखा तथा सेना के पृ भाग क र ा वयं
अपने अधीन क । िव ुि व ने अधच - ूह रचा। म य म वह वयं रहा तथा ा त म
कुं जर और सनीथ कािलके य सेना-नायक को िनयु कया।
दोन ओर से रण-वा बजे तथा सेनाएं जय-जयकार का तुमुलनाद करत , श
चमकात पर पर गुंथ ग । देखते-ही-देखते बाण से दशाएं ा हो ग । शी यो ा
कट-कटकर भूिम पर िगरने लगे। लोथ के ढेर लग गए। यो ा परचार-परचार कर भट से
जूझने लगे। श क मारकाट, यो ा क ललकार और घायल के ची कार से दशाएं
ा हो ग । म या न तक तुमुल यु आ। धीरे -धीरे भट के कट जाने पर अपनी-पराई
सेना का भेद मालूम आ और लड़ते ए ितपि य के नाम रावण अपने मि य से पूछने
लगा। इस समय कु भकण ने िवकट परा म ठान रखा था। उसके स मुख कोई भट ठहर भी
न सकता था। यह देखकर िव ुि व आगे बढ़कर कु भकण के स मुख आया। उसने ख ग
म तक पर लगाकर कु भकण का अिभवादन कया और कहा–‘‘हे रा स के ये , मेरा
तुझसे एक अनुरोध है।’’
‘‘तो पहले अपना नाम कह, गो बता और फर योजन कह।’’
िव ुि व ने कहा–‘‘र पित, तेरी बहन का वामी िव ुि व कािलके य ।ं ’’
‘‘तो या तू शरणागत है?’’
‘‘नह र े , म र -कु लपित के साथ यु करने क ित ा चाहता ।ं ’’
‘‘तो वीर, म भी िति त स ब धी ,ं तू मेरा भिगनीपित है, तू मुझी से -यु
कर।’’
‘‘यह म-भंग होगा। ऐसी कािलके य क रीित नह । यह स मान ये को ही
िमलता है। भा य से र -कु ल का अपराधी भी म ,ं अपने कु ल का ये भी म ।ं इसी से म
थम रा से रावण से -यु क ं गा। फर उसके बाद तेरी अ यथना क ं गा।’’
‘‘म तुझ पर स आ। तेरी बात युि यु , संगत और दोन कु ल क मयादा के
अनुकूल है। म रावण को तेरा अनुरोध िनवेदन करता ।ं ’’
अनुरोध सुनकर रावण वहां आया। िव ुि व ने श भूिम पर रखकर िनर त
हो रावण का अिभवादन कया। फर कहा–‘‘सात ीप के वामी रा से का म
अ म ीप म वागत करता ।ं ’’
“ वि त,तेरी िवनय भी तेरे शौय के समान ही ा य है, क तु तू या
मेराशरणाप है?’’
‘‘र े , मेरी प ी और तेरी भिगनी सूपनखा ने मुझसे अ मपुरी म तेरा वागत
करने को कहा था।’’
‘‘वह मुझे याद है।’’
‘‘तो म अ म ीप म तेरा वागत करता ।ं ’’
‘‘शरणाप होकर?’’
‘‘नह , अ मपुरी का अिधपित और तेरा भिगनीपित होने के नाते।’’
‘‘तू कस भांित वागत करना चाहता है, भिगनीपित?’’
‘‘य द तू श भूिम पर रख दे, जैसे मने रख दया है, तो तेरा िचर कं कर होकर,
नह तो तू मुझे अपने साथ -यु क ित ा दे।’’
‘‘दूसरी ही बात ठीक है भिगनीपित, तेरा मुझे वीकार है। श उठा ले।
पर तु यु -पूव कह, तेरा म और या ि य क ं ?’’
‘‘यही यथे है र पित, तुझे कौन-सा श िस है?’’
‘‘तू व छ द हार कर। सुना है तू शि का अमोघ हार करता है।’’
‘‘य ही कु छ अ य त ।ं तो र े , तू हार कर।’’
िव ुि व ने उछलकर शि उठा ली। रावण ने च ड वेग से शि फक ।
िव ुि व एक ओर झुक गया, शि भूिम म जा धंसी। अब िव ुि व ने शि फक ।
वह रावण के कु डल को छू ती ई चली गई। बड़ी देर तक दोन यो ा शि , शूल, ख ग
और मु र से यु करते रहे। र े रावण थककर हांफने लगा। उसके घाव से र झर-झर
बह रहा था, पर तु िव ुि व अभी भी ताजा-दम था।
रावण ने हंसकर कहा–‘‘तेरा परा म ा य है, वीर!’’
‘‘र े स ह । मु त-भर िव ाम कर ल। इसके बाद यु हो।’’
‘‘जैसे तुझे ि य हो।’’ रावण ने अपने हाथ का श रख दया। दोन प ति भत
हो वह यु देख रहे थे। दोन अ ितहत यो ा आस-पास खड़े म दूर कर रहे थे। रावण ने
कहा–‘‘िव ुि व तू या सूपनखा के िलए कु छ स देश देना चाहता है?’’
‘‘के वल यही क म उसे यार करता ।ं ’’
‘‘ या उसक कोई अिभलाषा भी है?’’
‘‘य द र े का अके ले ही उसे अ मपुरी म वागत करना पड़ा, तो उसक
अिभलाषा र े से अ न रहेगी। फर रा सराज रावण िजसका भाई और ये है,
उसके िलए मुझे या िच ता? पर तु, अब तो हम सु ता चुके।’’
‘‘िन संदहे ? तो वीर, धनुष ले।’’
‘‘र े , य द दो शरीर-र क साथ ले ल तो मुझे आपि न होगी।’’
‘‘वाह वीर, ऐसा भी कह होता है?’’
इसके बाद दोन वीर म धनुष-बाण से यु आ। अनेक कार से म पूत बाण
से आकाश छा गया। दोन वीर के शरीर म बंध- बंधकर बाण शरीर का अंगभूषण बनने
लगे। उनम से र क धार बह चली। अ त म रावण ने सात अधच एकबारगी ही धनुष
पर चढ़ाकर िव ुि व के धनुष क डोरी को काट डाला। यह देख रा स क सेना गरज
उठी। पर तु इस समय िव ुि व ने िवकट परशु उठा रावण के िसर पर आघात कया।
रावण आघात खाकर नीचे िगर गया। फर उसने उछलकर अपना परशु संभाला, अपने
िसर के चार ओर घुमाकर रावण ने िव ुि ह पर हार कया। हार खाकर िव ुि ह
मू छत हो गया। इस पर सब कािलके य सेनापितय ने िव ुि व को श क छांह म
िछपा िलया। रा स क सेना एक बार फर कािलके य पर टू ट पड़ी। िव ुि व का त ण
सेनापित िम हष कािलके य िव ुि व के चरणतल म खड़ा होकर परशु चलाने लगा।
पर तु कु भकण ने उसका पैर पकड़कर उसे एक िशला-ख ड पर धर पटका, िजससे उसका
भेजा फट गया। अब िवकृ तदं और कु भकण म घनघोर यु आ। अ त म कु भकण ने
शि उसके दय के आरपार कर दी। तब च वाल, अंकुरी, चंड और िनघात कािलके य
सेनानायक एक साथ ही कु भकण पर टू ट पड़े। श क चंड मार ने कु भकण को िवकल
कर दया और वह च र खाता आ भूिम पर िगर गया, यह देख कािलके य ने िवकट
हषनाद कया।
इसी समय िव ुि व ने मू छा भंग होने पर ख ग हाथ म ले रावण के स मुख
आकर कहा–‘‘र े , आ, हम अपना अविश धम पूरा कर।’’
और एक बार फर ये दोन अ ितम यो ा सं ाम म िभड़ गए। उधर सोिमल और
कालक पन दै य से ह त और िवल बक रा स घनघोर यु कर रहे थे।
िव ुि व पहले भी रावण के परशु का करारा घाव खा चुका था। अब वह
बार बार िधर बहने से अश हो सु त हो गया । कई नए घाव खा गया।रावण ने कहा-“
िव ुि ह, श रख दे और शरणाप हो।’’
‘‘र े , जब श -धारण म म समथ न र ,ं तब तू ही मेरे श को हण करके
मुझे स मािनत करना।’’ इतना कहकर उसने एक िवकट वार रावण पर कया, पर रावण ने
उछलकर ख ग का एक जनेऊ हाथ दया, िजससे िव ुि व का िसर कटकर भूिम पर जा
िगरा। िव ुि व का कबंध ढाई घड़ी लड़ता रहा।
इस पर सब कािलके य ु हो एकबारगी ही रा स पर टू ट पड़े। पर रावण ने
यु रोक दया। उसने कहा–‘‘अब यु का कु छ योजन नह रहा।’’ िव ुि व के
सेनापित भयंकर ने कहा–‘‘हम भ िव ुि व का शरीर लेकर अ मपुरी जाते ह। र े
अ मपुरी के ार पर आएं। वहां कािलके य क रानी सूपनखा उनका वागत करगी।’’
‘‘कािलके य अितरथी िव ुि व के शरीर को लेकर लौट गए। उनके पीछे रावण
िनर हो मि य -सिहत अ मपुरी को चला, उसके पीछे सब रा स सै य श नीचे कए
ए। अ मपुरी म िव ुि व क िचता नगर के बाहर रची गई और सूपनखा ने
िचतारोहण क तैयारी क । सब कािलके य िनराहार रह, समु - ान कर िचता क
प र मा कर नीरव खड़े हो गए। तभी कािलके य क रानी स ः िवधावा सूपनखा
शृंगा रत हो, िचतारोहण के िलए आई। पहले उसने पित-सिहत िचता क प र मा क ।
फर उसने रावण के िनकट आकर कहा–‘‘ वागत भाई, अ मपुरी म तेरा वागत है। पर तु
तू मुझे माकर र े , म अिधक िवल ब नह कर सकती, तेरा क याण हो!’’
रावण क आंख म आंसू भर आए। उसने कहा–‘‘बहन, यह तू या कहती है! म
तुझे लंका ले जाने के िलए यहां आया !ं ’’
‘‘पर तु वीर, मेरा पथ तुझे मालूम है। तूने अपनी मयादा रखी–कु ल-मयादा, राज-
मयादा। मने अपनी मयादा रखी— ी मयादा के िलए वहां जा रही ,ं अ ात लोक म।
भाई, र े तू महा तापी स व है, तेरे अनु ह से मने के वल एक रात का सुहाग भोग
िलया। मने दोन कु ल को ध य कर दया। तेरे र -कु ल को भी और अपने कािलके य-कु ल
को भी। अब तेरी मेरी राह दो ह। तू अपनी राह जा और म अपनी।’’
‘‘यह न होगा बहन, तुझे हम सभी भाइय ने अपनी ने - योित समझा। कु ल-
मयादा का पालन न करने से कु ल- य होता है। इसी से मुझे यहां आना पड़ा। पर
िव ुि व सु िति त है। उसके साथ िववाह करके तूने र -कु ल कलं कत नह कया। म
स तु ,ं पर खेद है िव ुि व ने मुझसे तुझे नह मांगा। अब तो बहन, जो होना था सो
हो गया। अब तू यह भयंकर इरादा याग, शोक को भी मन से िनकाल बाहर कर-
भ मा तम् शरीरम्।’’
‘‘पर तु िचतारोहण रा स क भी कु ल-मयादा है और दानव क भी। फर म तो
ि य के िबना नह रह सकती। जब मने उसके िलए तुम र े को और लंका के वैभव को
भी याग दया, तब तूने या यह नह जाना क मने उसक अपे ा िव को भी तु छ मान
िलया है?’’
‘‘मने जान िलया बहन, इसी से तुझे रोका नह । पर तूने भी तो जान िलया था क
मुझे आना होगा। तूने मुझे अ मपुरी म आमि त कया था। अब िजसका मुझे भय था, वही
हो गया। अब तू भी धम का अनुसरण कर–
‘‘उदी व नायिभजीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एिह?’’
‘‘पर तु–अजं ददातो न िवयोषतः।’’
‘‘निह, निह, जीव त ाणसमूहमिभल य आग छ!’’
रावण ने आगे बढ़कर ि य बहन का हाथ पकड़ िलया, कु भकण ने उसे अपनी
ल ब बा म उठा िलया। सूपनखा ने रोते ए कहा–‘‘तो भाई, म कािलके य को नह
छोड़ सकती।’’
‘‘ठीक है। जा तू अपने सब कािलके य के साथ द डकार य म रह। द डकार य मने
तुझे दया बहन, तू वहां रह चुक है, वह देश तुझे ि य है। अब से तू ही वहां क वािमनी
है, पर कािलके य भी सब रा स-धम हण कर।’’
‘‘कािलके य रा स-धम वीकार करगे।’’
‘‘म खर को आदेश दे दूग ं ा क द डकार य क वािमनी सूपनखा है, वह सूपनखा
का अनुगत होकर रहे।’’
सूपनखा ने वीकार कया। िव ुि व क िचता म अि दी गई। रावण ने म
पढ़ा–सूय च ुग छतु वातमा मा ां च ग छ पृिथव च धमणा। आपो वा ग छ य द त ते
िहतमोषधीषु ितित ा शरीरै ः। ये एत य पथो गो ार ते यः वाहा। ये एत य पथो
अिभरि तार तेभयः वाहा।
रावण ने थम घृत क , फर दूध क धार से िचता को स चा। पीछे सब रा स ने,
कािलके य ने भांित-भांित से पशु का आखेट करके िचता को बिल दी।
60. विश –िव ािम

इस समय आय के रा य गंगा और यमुना क घा टय को पारकर सोन महानद के


तट को छू रहे थे। दि ण म नमदा के कनारे तक अनेक समृ रा य थािपत हो चुके थे।
सर वती और दृष ती क म यभूिम–िजसे आज-कल सरिह द का इलाका कहते ह–
आयावत क के भूिम थी। अनेक च वत रा य क भांित भावशाली ऋिषय के अनेक
आ म भी यहां थािपत थे, िजनम विश , िव ािम , जमदि , गौतम और क व के
आ म ब त िस थे। वे िनर तर असुर , नाग , म त , और द यु को पीछे धके लते ए
अपनी राज ी क वृि करते जा रहे थे।
पर तु इस समय आयावत म दो ि ऐसे थे, िजनका माहा य बड़े-बड़े च वत
राजा से भी अिधक भावशाली था। इनम एक थे विश और दूसरे थे िव ािम ।
विश का मै ाव ण नाम भी िस था। इनका ज म देवभूिम इलावत म आ था
तथा इनक माता उवशी उन दन व ण और सूय, दोन ही क सेवा करती थ , इसिलए
यह िनणय नह हो सकता था क वह सूय के औरस ह या व ण के । इसिलए उ ह
मै ाव ण–सूय और व ण का पु कहते थे। व ण के सभी पु ऋिष ए। उ ह ने राज-
स ा थािपत नह क । विश भी ऋिष ए, पर तु इलावत म उनका एक ित ी पैदा
हो गया। उसका नाम नारद था। विश ने अि हो क थापना क और य क ित ा
क । शी ही वे याजक िस हो गए, पर तु नारद ने उसक खूब िख ली उड़ाई। विश
क य -िविध वीकार नह क । उ ह ने वामदे गान कया। इसके बाद दोन का पर पर
संघष बढ़ चला। विश जो भी पूजन-िविध थािपत करते, नारद उसके िवपरीत दूसरी
िविध कहते। ऐसा करते-करते नारद का नाम ही वामदेव िस हो गया। उ ह ने देवराट्
इ को स कर िलया और देवराट् क शंसा म अनेक सू रचे। विश क पैठ देवराट्
के दरबार म नह ई। उ ह ने इलावत याग दया और वे कु छ काल के िलए शाक- ीप
चले आए। उन दन अरब का नाम शाक ीप ही था। विश के वंशज मग, मुिन, मौनी
िस ए। कु श ीप–अ का-म भी मुिनवंशी कु छ लोग जा बसे। शाक ीप–अरब–म
विश ने बड़े-बड़े य कए। उनके य के धुएं और सुग ध से दशाएं ा रहती थ ।
पर तु भा य क बात देिखए–यहां भी इनका एक बल ित पध उ प हो गया।
ये का -उशना–शु थे, जो दै यगु भृगु के पु थे। भृगु का वंश जापित का वंश होने के
कारण अिधक िति त था और शु तो दै यपित बिल और दानवे वृषपवा के याजक
तथा च वत पौरव ययाित के सुर थे ही। उनका बड़ा मान था–बड़ा नाम था। अतः
अरब–शाक ीप–म भी विश का ताप फ का ही रहा। भृगुवंिशय का तेज– ताप वहां
बढ़ता गया। लोग ने का -उशना–शु को अपना पू य याजक बना िलया। आगे चलकर
उ ह ने का का मि दर बनाकर उसम शु क मू त थािपत क । इसी मि दर को आज
काबा कहते ह।
विश फर भारत चले आए और सुदास के कु लगु और म ी बने। दाशरा -यु
म उ ह ने बड़ा परा म कट कया। पीछे सुदास से भी नाराज होकर वे सूयवंिशय के
कु लगु ए। पहले दि ण कोसल के क माषपाद के पुरोिहत बने। पीछे अयो या क मूल
ग ी पर आसीन दशरथ के कु लगु ए। दैव-दु वपाक से यहां भी उनका ित ी िमल
गया–वे थे िव ािम , िज ह उ ह ने एक बार यु म परा त कया था, जब क क माषपाद
रा य के व थापक थे। वा तव म फर िव ािम ने उ ह कह भी जमने नह दया।
सव उनसे उनक खटपट होती ही रही। यह श ुता यहां तक बढ़ी क िव ािम ने विश
के सब पु को मरवा डाला।
िव ािम वा तव म का यकु ज के राजा थे। यहां संगवश हम उनके वंश का भी
प रचय दगे। शोण नद के तटवत देश पर कु श नामक एक राजा रा य करता था। उसक
प ी वैदभ से उसे चार पु उ प ए। उनके नाम कु शनाभ, कृ शा , अमूतरजस् और वसु
थे। इन चार राजपु ने अपने िपता के ही राजकाल म िपता क आ ा से चार नगर
बसाए–कु शनाभ ने महोदय, कृ शा ने कौशा बी, अमूतरजस् ने धमार य और वसु ने
िग र ज। िग र ज, का नाम वासुमती भी िस आ। यह िस नगर पांच पवत पर
बसा था। आगे यह पर िस जरास ध तथा िशशुनागवंशी स ाट् ए। कु श राज ष थे।
उनके ये पु कु शनाभ को घृताची अ सरा से अनेक क याएं ।
इसी काल म उस े म एक ऋिष चूली नाम के रहते थे। वे बड़े तेज वी और
िव ान् थे। उ मला ग धव भी ऋिष के िनकट ही कह रहती थी। उसक क या सोमदा
ऋिष क यदा-कदा सेवा करती रहती थी। ब त काल बाद वह ग धव-क या जब यौवन क
देहरी पर प च ं ी, एक दन ऋिष ने कहा–‘‘म तुझ पर स ,ं तू वर मांग!’’ इस पर
सोमदा ने कहा–‘‘हे िष्, मेरा अभी िववाह नह आ है तथा म कसी क भाया नह ।ं
अतः य द आप मुझ पर स ह, तो मुझे एक तेज वी पु दीिजए।’’ ऋिषवर ने ग धव
क या क यह याचना सहष वीकार कर ली और यथासमय सोमदा के गभ से एक पु
आ, िजसका नाम द रखा गया। युवा होने पर द काि प य नगरी म रहने
लगा। उन दन काि प य नगरी म ब त ग धव रहते थे। शी ही वह नगरी का राजा हो
गया। राजा कु शनाभ ने द को प-गुण-स प एवं कु लीन देख अपनी क याएं उसे दे
द । पर तु ब त काल बीत जाने पर भी राजा द को कोई स तान नह ई। बड़ी आयु
म उसे गािध नाम का एक पु आ, कृ शा के पु कृ िशक ने उसे गोद िलया। यही गािध
िव ािम के िपता थे। धीरे -धीरे कृ िशक ने का यकु ज म अपना रा य थािपत कर िलया,
िजसके उ रािधकारी गािध क दो स तान थ –एक पु ी, दूसरा पु । पु ी स यवती
ऋचीक ऋिष को एक सह यामकण अ लेकर दे दी गई। िव ािम का बा यकाल का
नाम िव ब धु था। वे ऋचीक से सब श -शा म िन णात हो का यकु ज के राजा बने।
राजा से अरि त समझकर ही उ ह ने विश के रि त रा य पर एक अ ौिहणी सेना
लेकर आ मण कया था, पर तु विश के आगे उ ह हार माननी पड़ी। उ ह ने विश को
यह भी उ कोच देना चाहा क य द आप यह रा य मेरे हवाले कर द तो म आपको सोने से
सुसि त चौदह सौ हाथी, वण से मढ़े ए आठ सौ रथ, यारह हजार अ और एक लाख
गौएं दूग
ं ा, इसके अित र भूत वण भी; पर तु विश ने वीकार नह कया। इस यु
म प लव , िहरात , करातो, का बोज , बबर और यवन ने विश क सहायता के िलए
यु कया था। इस यु म िव ािम के सब पु -प रजन खेत रहे थे, के वल एक ही पु
जीिवत बचा था। अ त म िव ािम पराजय क ल ा के कारण ी-सिहत जंगल म जा
िछपे, जहां उनके चार पु ए–दृढ़ने , हिव य द, महारथ और मधु य द। वन म
िव ािम ब त काल तक रहे। यह मेनका अ सरा उनके साथ दस वष रही। यह ि शंकु
से सांठ-गांठ कर उ ह ने विश से वैर साधा। ि शंकु भी विश से खार खाए बैठा था। यह
सारी कथा पाठक जानते ही ह।
पर तु इस वैर-भावना के मूल म एक और भावना भी थी क िव ािम के वंश का
महा ित भृगुवंिशय से स ब ध हो चुका था। ऋचीक ने एक सह यामकण घोड़े देकर
िव ािम क बहन से याह कया था तथा बहन के पु जमदि और िव ािम दोन ही
ने ऋचीक के आ म म वेद और श -िव ा हण क थी। साथ-ही-साथ हैहय से वैर क
भावना भी। इससे िव ािम म जो वैर-भावना का बीज तथा श -साधना का बल तथा
राज-भोग और रा य- होकर वन म िछपने के संयोग आए, तो उनक ोध-भावना और
वैर-भावना मूत हो उठी, िजसने विश का एक कार से वंश-नाश करके ही दम िलया।
िव ािम के बहनोई ऋचीक जैसे वेद ष थे, वैसे ही म ,य ,त और श -
िव ा म भी एक थे । उ ह ने िव ािम को अनेक द ा दए।द ड-च ,काल-द ड,
कम-च , िव णु-च तथा इ -च ; व , िशवशूल, ा और इषीका जो म -बल
से चलते थे,उ ह ने दए।मोदक और िशखरी-भेद दो गदायु के रह य िसखाए।
धमपाश,कालपाश और व णपाश दए। सूखे और गीले व दए तथा िपनका ,
नारायणा , आ ेया , वाय ा , हयिशर और च-महा य से िसखाए। मुशल और
कं कणी अ भी दए। फर िव ाधरा , न दना , दो कार के ख ग, पैशाचा ,
मोहा , वापना , वहा , शोहणा , समापना , िवलयना , भावना , जो अित
मह वपूण थे, िसखाए। इन महा के कारण िव ािम क शि अपार हो गई। यह सब
महा , उ ह ने ीराम को और ल मण को उस समय योग-संहार सिहत िसखाए थे, जब
उ ह ताड़का-वध के िलए नैिमषार य म ले गए थे। इसके अित र धृ , रभस,
ितहारतर, पराङ् मुख, अवागुण, ल य, अल य, दृढ़नाभ, सुनाभ, दशा , शतव ,
दशाशीष शतोदर, ाभ, महानाभ, दु दुनाभ, वनाभ, िन भल, िव च, खा चमाली,
धृितताली, िष य, िवधूत, मकर, महो, आवरण, जृ भक, सवनाथ और वा णा आ द क
योग-िविधयां भी सीखी थ ।
इलावत म जो नारद–वामदेव ने वाम-पूजन िविध का चलन कया था, ये उसी
के समथक थे। उ ह ने जो ऋचाएं तैयार क , वे भी वामिविध मूलक थ । कहना चािहए,
उनका वेद आय से िब कु ल पृथक् और िनराला था। आयजन िजन ऋचा को वेद कहते
थे, ऋचीक उ ह नह मानते थे; वे अपनी ऋचाएं पेश करते थे। ऋचीक का यह वामाचार-
मूलक वेद ही आगे चलकर अथवण या अथववेद िस आ। विश और िव ािम िजस
य म एक होते–वह झगड़ा खड़ा हो जाता; य क दोन क वेद-िविध पर पर वाम
थी। सं ेप म िव ािम अथवण थे और विश ऋ वै दक।
भृगु का वंश दै य-याजक होने तथा आयावत से पृथक् होने के कारण आय से
उनके सं कार-आचार ब त िभ थे। एक बात और थी। िव णु–सूय ने शु क माता तथा
भृगु क प ी का वध कर दया था। भृगु क यह प ी दै यराज िहर यकिशपु क पु ी थी।
इस पर ु हो भृगु ने िव णु क छाती म लात मारी थी। सो सूयवंिशय से भृगुआ का यह
वैर भी ब त पुराना था। आयावत म बसकर और आय के कु लगु होने पर भी उनके
आचार बदले नह । भृगु क सबसे बड़ी िवशेषता यह थी क वे बल यो ा भी थे।
उ ह ने बड़े-बड़े यु भी कए। यदु, तुवसु और ु यु, जाित के वे सहायक रहे, प थ और
शायात के स ब धी और कु लगु रहे। इस कारण उन दन आय के सां कृ ितक और
राजनीितक जीवन से इस वंश का अिवि छ और मह वपूण स ब ध रहा। िवशेषकर
ऋचीक के का यकु जपित गािध क पु ी से िववाह कर लेने के बाद जब जमदि और
िव ािम का ज म आ तथा दोन का साथ-ही-साथ पालन-पोषण आ तो काल पाकर
ये दोन मामा-भानजे, ऋचीक के मेधावी िश य, आयावत म एक ब त ऊंची ित ा-भूिम
पर ि थर ए। आयावत ही म य ऋचीक क स ा तथा भाव िस धु से गंगा तक व
काशी से नमदा तक फै ला था। उ ह के कारण िव ािम भी इतने िस ए। राजा क
भांित उतने िति त कभी नह ए। स भवतः आगे उसके वंश म रा य रहा भी नह ,
पर तु वे राजा के शीष- थल पर बने रहे। सं ेप म, विश और िव ािम , ये दो उस
काल के अ ितम न थे, िजनम सारे आयावत क राजनीित और सां कृ ितक ित ा-
भूिम आधा रत थी।
61. हैहय कातवीय सह ाजुन

न ष-पौ और ययाित-पु यदु के दूसरे पु सह िजत् क शाखा म प ीसव


पीढ़ी म हैहय नाम का राजा आ। इसके वंश म ततीसवां राजा कृ तवीय और च तीसवां
राजा अजुन था, िजसे उसके बल- ताप के कारण सह ाजुन के नाम से पुकारा गया। हैहय
का यह वंश बड़ा िव मशाली आ। वैव वत मनु के पु शयाित ने ख भात क खाड़ी म
एक आनत रा य थािपत कया था। शयाित बड़े स ाट् थे। इनका ऐ ािभषेक आ था।
पाठक यह भी जानते ह क इनक पु ी सुक या का िववाह भृगु-पु एवं शु के सौतेले
भाई यवन से आ था। य िप यवन दै य-याजक के वंश म थे, पर तु मानव क क या
से िववाह करके आय ऋिष हो गए थे, क तु रहते थे ससुराल म, राजसी ठाट-बाट से। वे
यो ा भी बड़े बांके थे। एक बार तो उ ह ने देवराट् इ से िवकट यु कया था। वह काल
ही ऐसा था जब येक को श हण करना पड़ता था। ऋिष लोग भी तब सीधे-सादे तो
नह होते थे। वे यु म राजा के साथ-साथ भाग लेते थे।
काला तर म पु यजन असुर ने शायात से अनात का रा य छीन िलया और उनसे
हैहय ने वह रा य छीन िलया। आनत-रा य के वामी होकर हैहय ने यवन के वंशज
भागव को अपना कु लगु मान िलया। यवन के वंशधर म दधीिच, ऊव, ऋचीक,
जमदि और परशुराम उ प ए। अतः हैहयवंश का भागव के इस वंश से न के वल घिन
स ब ध ही रहा, अिपतु वे हैहय के ही रा य म बसे रहे। पर तु राजपुरोिहत और
राजस ब धी होने के कारण भागव खूब स प जागीरदार क भांित रहते थे। हैहय ने भी
उ ह खूब धन दया था। पीछे हैहय ने उनसे जा क भांित कर हण करना चाहा। इस
पर भागव ने आपि क । रा य के दायाद और गु होने के नाते वे इस कर से अपने को
बरी करना चाहते थे। पर तु इस पर झगड़ा बढ़कर भारी िव ोह का प धारण कर गया।
अ त म भागव को मािह मती का रा य छोड़कर सर वती-तीर पर बस जाना पड़ा जहां
उनका स ब ध का यकु जपित गािध से हो गया और वे इससे फर िति त और स प हो
गए। औव-पु ऋचीक का पु जमदि और गािध-पु िव ािम –मामा-भा जे–
सर वती-तट पर ऋचीक ऋिष के आ म म वेद पढ़ने लगे और शी ही दोन िव यात
वेद ष हो गए। यह बात पाठक जानते ही ह।
इस समय हैहय का ताप मथुरा से नमदा-तट तक के देश म फै ल गया था और
उधर काशी से ख भात क खाड़ी तक उनका िव तार था। अब कोई भी आय राजा अके ला
हैहय को पदा ा त न कर सकता था। कातवीय अजुन समूचे म यभारत का वामी था।
उसक िवपुल पोतवािहनी और अजेय हय-दल थे।
जमदि का िववाह इ वाकु वंश क राजकु मारी रे णु के साथ आ था और रे णु क
सगी बहन सह ाजुन को याही थी। इस कार जमदि और सह ाजुन र ते म साढ़ू थे।
पर तु जमदि हैहय का िपछला वैर नह भूल।े ऋचीक ने बा यकाल ही से उनम हैहय-
िवरोधी भावना भर दी थी। वे हैहय को अपना िचर श ु समझते थे। ऋचीक अ ितहत
धनुधर थे। िव ािम ने उ ह से धनु व ा सीखी थी।
ागैितहािसक काल म नमदा िनःसीम नदी थी। उसी के उ री तट पर अजुन क
नई राजधानी मािह मती थी। इस नगरी को, मािह मत ने कक टक नाग से छीनकर स प
बनाया था। बाद म उसने शक , यवन , क बोज , पारद और प लव क सहायता से
नमदा से मथुरा तक का समूचा देश जीत िलया था। नगरी के पास नमदा का िव तार
समु के समान था। उसम सदैव ही सुमे पाताल, ीर-सागर, ि पुरी और स महासागर
के ीप-समूह के यान लंगर डाले पडे़ रहते थे। सह ाजुन का नौ-बल अजेय था। वह लहर
का वामी िस था। उन दन मािह मती समूचे आयावत, भरतख ड, इलावत और
दै य-रा य के ापा रय से प रपूण रहती थी। प य म आय, अनाय, असुर, ा य, नाग
आ द सभी जाितय के विणक् य-िव य करते रहते थे। मथुरा से नमदा-तट तक समूची
पृ वी का वामी उस समय सह ाजुन हैहय था।
हैहय का जैसा रा य- ताप था, वैसा ही भृगु का धम- ताप था। अनूप देश इन
दोन तापी ित ि य का े था। यहां भृगुवंशी अिधक रहते थे। अनूप देश क सीमा
पूव म चम वती, पि म म समु , दि ण म नमदा और उ र म आनत तक थी। भृगुवंशी
यहां के हैहय से भी पुराने िनवासी थे। उनक ब त जमीन, जायदाद, जागीर और धन-
स पि यहां थी। इसी से जब भृगु से सह ाजुन का िव ह आ तो वह ब त उ प
धारण कर गया। सह ाजुन गव ली कृ ित का था। वह भृगु का दो पीढ़ी पुराना वैर
भूला नह –जमदि के साथ र ते के सू म बंधकर भी नह । पर तु भृगुवंशी अब उससे दूर
सर वती-तट पर रहते थे। यह िव ह नाम ही को रह गया था क एक घटना आ घटी।
जमदि ने अपनी ी रे णु को िच रथ ग धव के साथ िभचार-रत पा उसका िसर अपने
छोटे पु परशुराम के हाथ कटवा िलया। इस पर ु होकर उसके साढ़ू सह ाजुन ने
अपनी ी के अनुरोध से जमदि के आ म को लूटकर उसे जला डाला।
मथुरा तक हैहय क रा य-सीमा थी। मथुरा से आयावत िनकट ही था। मथुरा
आयावत और भारतवष क सीमा पर था। सह ाजुन क इस कारवाई से आयावत म ब त
उ ेजना फै ल गई और जमदि पु परशुराम सह ाजुन से िपता के आ म जलाने का
बदला लेने क सोचने लगे। पाठक जानते ही ह क कस कार हैहय से जामद ेय राम ने
बदला ले उनके र से सम तक तीथ म पांच र -कु ड भरे थे।
62. मािह मती का यु

सब बात पर भलीभांित िवचार-परामश करके , लंका का सारा रा य-भार


िवभीषण को स प, रा स क चतुरंग चमू ले; महाबली और िवच ण महोदर, ह त,
मारीच, शु , सारण और धू ा इन छः महामा य को साथ ले रावण ने लंका से
द थान कया। वह समु -पार उतर धनु को ट क राह भारत म घुसा। भारत के स पूण
समु -तट को उसने सुरि त-सु वि थत कया। फर भाई खर को उसका सिचव और
दूषण को सेनापित बनाया। सब कािलके य सिहत, जो रा स होने क शपथ ले चुके थे,
चौदह सह रा स भट द डकार य क र ा को िनयत कए,द डकार य म ठौर-ठौर
सूपनखा ने सैिनक-सि वेश थािपत कए। वहां आय का ाब य न होने पाए, इस
स ब ध म उसे ब त-से मह वपूण आदेश दे वह नदी, नगर, पवत, वन, उपवन पार करता
आ मािह मती नगरी के िनकट आ प च ं ा।
नमदा-तट पर उसने अपना सैिनक-सि वेश थािपत कर, िन जल-िवहार
और मृगया का आन द लाभ कया। दैवयोग से जहां रावण ने अपना सि वेश थािपत
कया था, वह दुमद हैहय अजुन च वत अपने अवरोध के साथ जल-िवहार कर रहा था।
उसके अवरोध म सह ि यां थ , जो देश-देशा तर से एक क गई थ । रावण को पता
चल गया क िनकट ही च वत जल-िवहार कर रहा है। उसने अपने मि य से स मित
ली क इस अवसर पर या करना उिचत है।मि य ने कहा-“ यह च वत मािह मती-
नरे श अजुन महातेज वी है। इससे यह यह घेरकर ब दी बना िलया जाए तो उ म है।
इससे यु कया जाए या इसे मार ही डाला जाए। इस समय यह अरि त है।’’ पर तु
रावण को यह मत न चा। उसने कहा–‘‘यह तो मेरी ित ा के सवथा िव बात होगी।
फर, हम तो धम-िवजय भी करनी है। य द च वत हमारी र -सं कृ ित वीकार कर लेता
है, तो िव ह का योजन या है? हम उसके िम ह।’’ मि य से ब त आलाप- लाप
आ। अ त म रावण ने कहा–‘‘म ऋिष-कु मार ,ं वेद ष ।ं र -सं कृ ित का सं थापक
मिहदेव और द पित पौल य कु बेर का भाई ।ं यह अवसर अ छा है, िव ह के थान पर
म च वत से सि ध-वाता करना अिधक पस द क ं गा। च वत स पूण म यदेश का
वामी है, उसके र -धम वीकार करने पर सारा म यदेश, फर आयावत भी रा स हो
जाएंगे।’’
उसने ऋिष-कु मार का वेश धारण कया। कमर म र कौशेय पर ा -चम
बांधा, व पर वण-वम धारण कया और क धे पर अपना परशु धर वह एकाक ही वहां
जा प च ं ा जहां च वत अपने अवरोध के साथ जल-िवहार कर रहा था। नमदा-तीर
प च ं कर उसने च वत को सूिचत कया क म पौल य रावण, धनपित द पित कु बेर का
अनुज, र -सं कृ ित का सं थापक ।ं च वत से मै ी-लाभ चाहता ।ं च वत उस समय
ानो र यजन कर रहा था, उसने उसी समय रावण को स मुख बुलाकर उसका
अिभन दन करते ए कहा–
‘‘ वि त पौल य, मािह मती म तेरा वागत है िम , म तेरा या ि य क ं ?’’
‘‘मेरी र -सं कृ ित को वीकार कर।’’
‘‘ कसिलए?’’
‘‘िजससे आय-अनाय का भेद न हो, नृवंश एक सां कृ ितक सू म बंध जाए, वेद
ही हमारा सां कृ ितक के िब दु हो।’’
‘‘सो तो अ छा है। पर आयावत से तो मेरा ही िव ह है, आय तो हम ही बिह कृ त
समझते ह।’’
‘‘पर म तो पृ वी पर धम-जय करने को िनकला ।ं ’’
‘‘यह तो कु छ यु -घोषणा-सी है।’’
‘‘जो मेरी र -सं कृ ित वीकार नह करता, उस पर मेरा यह परशु है।’’
च वत ने हंसकर कहा–‘‘तेरी बात से तो तेरे परशु ही पर मेरा अिधक लोभ है।
म तेरी तरह ऋिष-कु मार नह ,ं ।ं ’’
‘‘तब तो म च वत का याजक भी ।ं ’’
‘‘तो परशु को दूर फक, म अ य, पा , मधुपक िनवेदन क ं ।’’
‘‘यह मेरा वेद है, इसे अंगीकार कर!’’
‘‘म तो अथवण का अनुगत ।ं ’’
‘‘तब तो फर परशु ही है। यु ं देिह!’’
‘‘म तेरे आ वान पर स ।ं पर तु अभी तू मेरा अितिथ होकर मािह मती म
िव ाम कर। फर म तेरी अिभलाषा-पू त क ं गा।’’
रावण अपने िशिवर म लौट आया।
दोन ओर सै य क तैया रयां होने लग । रा स क सेना दुजय थी तथा रावण
का तेज अस था, पर तु च वत कातवीय भी अ ितहत था। उसक सेना म तुि डके रा,
शयात, हैहय और अवि तपित वीितह क चतुरंिगणी चमू थी। च वत का सेनापित
एक िवल ण और साहसी सेनानी था। नमदा-तट पर यह ागैितहािसक यु आ। इस
यु म ि -िवशेष का मह व था। च वत बाज क भांित रा स पर टू ट पड़ा। रा स
बड़े िवकट यो ा थे, पर तु च वत का भीम िव म अस था। च वत वयं अपनी
भीमकाय गदा लेकर, सचमुच जैसे सह बा से ही उसे घुमाता आ काल- प हो,
रा स-सै य म घुस गया। उसके उस भीम हार से त हो रा स इधर-उधर भागने लगे।
यह देख ह त अपना लौहमु र ले उसके सामने आया। मु त-भर दोन वीर उलझे रहे।
अवसर पाकर ह त ने अपने मु र का च वत के िसर पर हार कया, पर च वती ने
उछलकर उसके हार को िन फल करके अपनी गदा का करारा वार कया। गदा क चोट
से घूमकर ह त मू छत हो भूिम पर िगरा। यह देख शुक, सारण, महोदर और धू ा
महासेनािनय ने च वत को चार ओर से घेरकर उस पर सैकड़ बाण क वषा क ।
पर तु च वत ने उनक तिनक भी आन न मान अके ले ही बाण क वषा कर इन सब
रा स महासेनािनय को ब ध डाला। च वत के दुधष तेज से घबराकर सब रा स
सेनानायक भाग चले। यह देख रावण वयं ललकारकर अपना परशु घुमाता आ आगे
बढ़ा। इन दोन वीर का डेढ़ हर िवकट यु आ, िजसे देखने को दोन ओर क सेनाएं
हाथ रोक खड़ी हो ग । दोन एक-दूसरे को परािजत करने क इ छा से एक-दूसरे पर चोट
कर रहे थे। रावण के हाथ म िवकराल परशु था और च वत के हाथ म िवकट गदा थी।
च वत ने उछल-उछलकर रावण के व म गदा क चोट क । उधर रावण अपने परशु के
करारे वार करता रहा। ब धा दोन वीर के श पर पर टकरा जाते, उनम व -गजन
होता, अि - फु लंग िनकलते। इसी कार यु करते-करते डेढ़ हर काल बीत गया। दोन
वीर ल और पसीने से तर हो गए। अब अक मात् च वत ने अपनी गदा घुमाकर दूर से
रावण के व पर फक मारी। रावण ने भी परशु पर उसे झेल िलया। दोन वीर के अ
टू टकर टु कड़े-टु कड़े हो गए। फर भी रावण उस हार से ितलिमलाकर एक धनुष पीछे हट
गया। वह दद से कराह उठा। पर तुर त ही उछलकर उसने च वत के व म मुि - हार
कया। उस व -मुि का हार खाकर च वत मुंह से खून वमन करने लगा। फर ोध से
अधीर होकर उसने रावण क कमर पकड़ उसे अधर हवा म उठाकर भूिम पर पछाड़ दया।
रावण मू छत हो गया। च वत ने उसे कांख म दाब अपना मुंह मोड़ा।
यह देख रा स-दल म हाहाकार मच गया। सब रा स गु मपित, नायक,
सेनापित, सुभट अपने-अपने अ ले ‘मारो-मारो‘ कहते च वत के पीछे दौड़े। पर तु इसी
समय , शयात और अवि तराज क िवकट चतुरंग चमू ने शि , शूल, ख ग, धनुष ले
चार ओर से रा स को घेरकर मार करनी शु कर दी। रा स भाग खडे़ ए और
च वत ने रावण को र सी से बांध अपने रथ पर डाल िलया तथा िवजय-दु दुिभ बजाता
आ मािह मती म घुसा, जहां पौर वधु ने उस पर लाजा-वषा क तथा ऋिषजन ने
पु प बरसाए। च वत ने रावण को बांधकर कारागार म डाल दया।
63. रावण क मुि

दुजय परं तप रावण को बांधकर ब दी बनाने से च वत हैहय कातवीय अजुन का


यश दि दग त म फै ल गया। आयावत और भरतख ड-भर म उसका आतंक छा गया।
रा स के सेनापित और म ी ह त, शुक, सारण, महोदर, धू ा आ द भारी ब मू य
उपानय साथ ले च वत क सेवा म उपि थत ए। उपानय स मुख धर उ ह ने कहा–‘‘हे
तेज वी हैहय, आपक जय हो। आपने महापरा मी र -राज रावण को जय करके अपना
सुयश पृ वी पर िव तीण कर दया। आपका परा म अतुिलत है और आप पृ वी के सब
वीर म े ह। िजस रावण के भय से समु और वायु भी ति भत हो जाते ह, सूय भी
तेजहीन हो जाता है, उसी दुजय र पित रावण को आपने यु म जय कर ब दी बना
िलया। क तु हे यश वी महाराज, अब आप उसे छोड़ दीिजए। आपका यह काय ब दी
बनाने से भी अिधक यश वी होगा। यह धन-र -रािश उपानय क भांित तथा द ड व प
हम आपक भट म उपि थत कर रहे ह।’’
रा स-मि य के ये वचन सुन, स हो च वत ने हंसकर रावण को तुर त
सभा-भवन म ले आने क आ ा दी। सभा म आने पर उसने उठकर वयं उसे ब धनमु
कया, उसे द ालंकार धारण कराए, और अ य, पा , मधुपक देकर कहा–‘‘हे
रा सराज, मने तो तेरा पहले भी मािह मती म िम क भांित वागत करना चाहा था,
पर तु तूने सि ध नह , िव ह मांगा, मै ी नह , यु -याचना क । सो मुझे समरांगण म तेरा
श से स कार करना पड़ा। पर इससे मने तेरा समर-कौशल और तेरी अजेय शि देख
ली। म तेरे शौय से स तु ।ं सो, हे तापी पौल य, य द तेरी इ छा हो तो हम-तुम दोन
आज से अि क सा ी म समान िम होने क शपथ ले ल।’’
रावण ने दोन हाथ फै लाकर कहा–‘‘च वत ने तो मुझे यु -िभ ा देकर पहले ही
यथे गौरव दान कर दया था। अब मै ी से स प करके मुझे कृ तकृ य कर दया।
अ याधान कर च वत ! आज से हम जीवन म, मरण म, सुख म, दुःख म एक ह।’’
च वत हैहय ने तुर त अि क सा ी म मै ी- थापना क और रावण को दय
से लगाकर कहा–‘‘हे पौल य, तू ऋिषकु मार तथा वेद का उद्गाता है। सं कृ ित का
सं थापक है। रा स का वामी और स ीप का अिधपित है। तूने मुझसे अपनी र -
सं कृ ित क बात कही थी। उस समय तू परशु-ह त था। इससे श ने शा नह सुनने
दया। अब तू ेहिस है, हमारा अिभ िम है, अपनी सं कृ ित का बखान कर। उसे
सुनकर म स होऊंगा।’’
रावण ने कहा–‘‘च वत राजन्, यह मेरी लोकै षणा है। इसम लोक िहत िनिहत
है। सुन, इस समय पृ वी पर देव, दै य, दानव, असुर, आय, ा य, नाग, ग धव, क र,
य , र आ द अनेक नृवंश िव तार पा रहे ह जो सब पर पर दायाद-बा धव ह, क तु
पर पर िव ह करते ह। बारह दा ण देवासुर-सं ाम हो चुके। ये सं ाम आ थक कम और
सां कृ ितक अिधक थे। आचार क िभ ता ही नृवंश क इस िव ह-भावना का मूल कारण
है। पृ वी तो ब त िव तृत है और नृवंश अभी अिधक िव तार नह पा सका है। फर भी
यु होते ह। जो भूिम व छ द है वहां लोग नह बसते, दूसर क अिधकृ त भूिम छीनना
चाहते ह। इसका मूल कारण आचार क िभ ता ही है। नृवंश के आचार का मूल उ म
वेद ह। पर तु आय ने विश के नेतृ व म वै दक िविध-पर परा कु छ दूसरी ही थािपत क
है। उधर नारद क बाम-पर परा देव और दै य म भी चिलत है। भृगु पृथक् ही आथवणी
पर परा चिलत कर रहे ह। फर आय को बड़ा गव है, वे तिनक िविध-भंग होने पर ही
आयजन का बिह कार कर देते ह। देखो, ऐसे कतने बिह कृ त आय, ा य दि णार य
तथा आसपास के ीप-समूह म बस गए ह। अब य द इन सबको सां कृ ितक रीित से एक
वेद के अधीन नह कया जाता है तो नृवंश अपने ही िव ह म िवन हो जाएगा।इसिलए
महाराज कातवीय सह बा ,मने यह र -सं कृ ित थािपत क है। ‘वयं र ामः’–हमारा
मूल-म है और समूचे नृवंश को समान वै दक सं कृ ित म दीि त करना ही हमारा धम है।
इसी से मने वेद म समूचे नृवंश के आधार का समावेश कया है और अब मने घम डी
आय और देव को जय करने क भावना से लंका यागी है। म के वल यही चाहता ं क
वै दक धम म समूचे नृवंश का सम वय रहे।’’
‘‘साधु! साधु! अ छा है पौल य रावण, तेरा उ े य तु य है। जहां तक आय के
गव भंजन का है, म तेरे साथ ।ं अनुमित देता ,ं तू मेरी जा म अपने सम वयमूलक
धम का चार कर। पर तु म तेरे धम म दीि त नह हो सकता! हां, मेरी सहानुभूित तुझी
से है। वि त र ःपते! वि त पौल य! जब कभी तू परशु रिहत िनर मािह मती म
आएगा, तभी तेरा वागत होगा। अब तू जा, अपना अभी िस कर और कह–म तेरा और
या ि य क ं ? तुझे छु ी है, िम मािह मती म जो व तु तुझे ि य है– वे छा से ले जा।’’
‘‘बस िम तेरी िम ता से म स प आ। तेरी जय हो च वत , पौल य रावण
तेरे िलए जब मािह मती म आएगा तो इस परशु के साथ और जब अपने िलए आएगा तो
िनर ।’’
इतना कहकर रावण उठा। च वत ने उठाकर उसे दय से लगाया और तब
पौल य रावण मािह मती के राजपथ पर र िबखेरता आ तथा वहां क कु ल-वधू टय
म कौतूहल बढ़ाता आ अपनी सेना म लौट आया।
64. मधुपुरी

रावण ने नमदा म ान कर, ज बूनद लंग क बालुका म थापना कर सुगि धत


पु प से पूजन कया। फर वहां से थान कर वन, पवत, नद-नदी पार करता आ
मधुपुरी क सीमा म मुकाम कया। आजकल जो ाचीन पुरी मथुरा के नाम से िस है,
इसी का नाम ार भ म मधुपुरी था। पाठक मधु असुर को न भूले ह गे। यह उ ह पु यजन
के वंश का असुर था िज ह ने शयात से अनाय-रा य जय कया था और लंका म प च ं कर
सुमाली के भाई मा यवान् क पु ी, रावण क ममेरी बहन, कु भीनसी को चुरा लाया था।
मधु ने यह पुरी अभी नई बसाई थी। पाठक को यह भी मरण होगा क महा तापी
स ाट् , ययाित ने च बल, बेतवा और के न वाला इलाका अपने पु यदु को दया था। यदु के
दो पु थे– ो ु और सह िजत्। पहले से यादव वंश चला और दूसरे से हैहय वंश। हय
यदुवंश का उनतालीसवां नृपित था, िजसने मधु असुर क पु ी से िववाह कया। मधु के
संपक से युदवंश भी असुर म िगना जाने लगा तथा आय से इसक मह ा कम हो गई।
पहले शयात से आनत-रा य मधु ने छीन िलया, फर अपने दामाद हय को दे वयं ज
म आ मधुपुरी बसाई। पर तु नई राजधानी बसाने तथा आनत-रा य हैहय ारा आ ा त
होने से इस समय मधु िनबल हो रहा था। रावण के आने का समाचार सुन वह भयभीत
होकर अपने दुग म िछप गया और दुग म सब ार ब द कर िलए। रावण ने मधुपुरी को घेर
िलया और रा स ने चार ओर से बाण-वषा करनी आर भ कर दी। दुग पर से मधु ने भी
ितकार कया। पर उसका बल यथे न था। शी ही दुग भंग हो गया। रावण अके ला ही
क धे पर परशु रख, मधु-मधु गरजता आ मधु असुरपित के अ तःपुर म घुस गया।
अ तःपुरी क सब चेटी, दासी, क री भयभीत हो जड़ हो ग । रा स क सेना महल को
घेरकर शोर मचाने लगी। तब कु भीनसी ने बाहर आ अ य, पा , मधुपक से रावण का
स कार कया, पूजन कया और वह रोती-रोती रावण के चरण पर िगरकर िगड़िगड़ाकर
कहने लगी–‘‘हे वीरबा भाई, मेरी र ा कर, सूपनखा क भांित मुझे िवधवा न कर।
वैध बड़ा भारी दुःख है। य द तू मेरा कहना न सुनेगा तो तेरा भला न होगा।’’
रावण ने उसे सा वना देकर कु शल पूछा और कहा–‘‘तू िनभय होकर अपना
अिभ ाय कह, तेरी सब इ छाएं म पूण क ं गा।’’
कु भीनसी ने कहा–‘‘र े , मेरा पित मधु मुझसे ेम करता है, म भी उससे ेम
करती ।ं म इस रा य क मिहषी ं तथा मेरा पु उसका उ रािधकारी है। यह स य है क
उसने बलात् मेरा हरण कया था, पर यह तो रा स क मयादा तूने थािपत क है। फर
यहां लाकर उसने वेद-िविध से अि क सा ी म िववाह कया है और मेरा स कार भी
करता है। इसिलए तू मधु को मेरे िलए मा कर दे। तेरा ऐ य बढ़े, तू स रह! तू मधु को
अभयदान दे!’’
अपनी बहन कु भीनसी के ये दीन वचन सुन रावण िवत हो गया। उसने क धे का
परशु धरती पर टेककर कहा–‘‘तू डर मत, मधु को म तेरे कहने से अभय देता ।ं अब उसे
मेरे स मुख उपि थत कर; म उसे साथ लेकर आय और देव से यु करने जाऊंगा।’’
रावण के इस वचन से आ त हो कु भीनसी मधु को ले रावण के स मुख आई।
मधु ने रावण का अिभवादन कया। रावण ने उसका आ लंगन कर कु शल पूछा। फर मुध ने
रावण क मधुपुरी म बड़ी ठाट क प नाई क । पान, भोज, नृ य, दीपो सव आ। गो ी
ई, फर रावण एक रात मधुपुरी म रह, मधु और उसक चमू को ले आयावत म िव
आ।
65. आयावत म वेश

ि गित से रावण क रा स सै य ने आयावत म वेश कया और वह


नैिमषार य म जा प च ं ी। पाठक जानते ह क नैिमषार य म रावण का एक सैिनक-
सि वेश थािपत था िजसक र ाथ ताड़का रा सी तथा उसके दो पु सुबा और मारीच
ब त-सी रा स-सै य सिहत वहां रहते थे। उसे आशा थी क नैिमषार य म उसका ताड़का
और उसके पु ारा अ छा स कार होगा। पर तु यहां आने पर जब उसने अपने सि वेश
को उजड़ा आ और न - देखा तो वह आ यच कत रह गया। उसने मि य से
कहा–‘‘यह तो बड़ी अ भुत बात है, भला मेरे सेनापित मारीच, सुबा और सब रा स-
सेना कहां गई? ताड़का तो बड़ी िवकट ी थी, कसने उसका पराभव कया?’’
मि य ने दूत के ारा बड़ी खोज के बाद मारीच को कसी िग र-क दरा से खोज
िनकाला, जहां वह ाण-भय से िछपा बैठा था। वह ब त दुबल, बूढ़ा-सा हो रहा था तथा
घाव से उसका शरीर भरा था। वह ब त दुःखी और िनराश था। रावण ने उसे ब त-ब त
तस ली दी और उससे इस दुदशा का कारण पूछा। मारीच ने कहा–‘‘हे वामी, अपनी
िवपि कै से क ।ं बस, सं ेप म यही सुन लीिजए क रा स म के वल म ही अके ला जीिवत
बचा ।ं अ य सब तो काल-कविलत ए।’’
‘‘ क तु यह िवपि रा स पर आई कै से?’’
‘‘कोई राम-ल मण नामक दो मानव-कु मार ह। उ ह ने हम सब रा स को मार
िगराया।’’
‘‘कौन ह वे मानव-कु मार?”
‘‘सुना है, कोसलरा य के राजकु मार ह।’’
‘‘यहां नैिमषार य म या उनक भूिम है?’’
‘‘नह , िव ािम उ ह अपनी सहायता के िलए ले आए थे।’’
‘‘वही ऋचीक के पु ?’’
‘‘पु नह , साले–पर वेद उ ह ने ऋचीक ही से पढ़ा है।’’
‘‘मने सुना है। पर वे तो मानव के िम नह । मानव के िम तो मुिन विश ह।’’
‘‘विश और िव ािम ब त लड़े ह। जीवन म ित प रहे ह। पर इस बार वे
विश क सहमित ही से इन मानव-कु मार को ले आए थे।’’
‘‘ कसके पु ह वे?’’
‘‘अयो यापित दशरथ के ।’’
‘‘ओह, श बर के यु म दशरथ के परा म क बात मने सुनी थी। पर तु वे बालक
मानव या ब त सेना अयो या से लाए थे?’’
‘‘नह एकाक ही थे। िव ािम उनके साथ थे।’’
‘‘िव ािम बड़े धनुधर ह। वे ऋचीक के िश य ह। ऋचीक क ग रमा म जानता
,ं पर तु िव ािम और इन बालक ने या समूची रा स-सेना का िव वंस कर दया।’’
‘‘ऐसा ही ल ाजनक कांड हो गया, र पित?’’
‘‘िव ािम या यह कह रहते ह?’’
‘‘िनकट ही का यवन म उनका आ म है। हमने उ ह टकने नह दया। िनर तर
हमने उन पर आ मण कए। उनक य -िविध भंग क । बलात् म और बिल-पशु क
आ ित उनके य -कु ड म दी।’’
‘‘िव ािम ने िवरोध नह कया, श हण नह कया।’’
‘‘नह , वे श हण नह करते। दि ण कोसल के पराभव के बाद जब से उ ह ने
ऋिषपद हण कया, तभी से वे श हण नह करते ह।’’
‘‘इसी से वे इन मानव-कु मार को ले आए।’’
‘‘इसी से।’’
‘‘ या नाम बताया, उनका?’’
‘‘राम, ल मण।’’
‘‘इतना शौय है उन बालक म?’’
‘‘उ ह ने बात क बात म एक ही बाण से माता ताड़का को सौ धनुष दूर फक
दया और वह र -वमन करके मर गई। इस पर जब मने और सुबा ने रा स क सेना
लेकर उन पर आ मण कया तो उ ह ने बड़े ही ह त-लाघव से सारे रा स को काट
डाला। सुबा भी उसी यु म खेत रहा। मेरे ये अधम ाण कसी भांित बच रहे। सो म
असहाय पवत-क दरा म व य पशु क भांित िछपकर दन काटता रहा और आपके
आगमन क राह ताकता रहा।’’
‘‘अद्भुत है, अकि पत है, ाघनीय है! अिभन दन करता ं उन मानव-बालक
का? अब कहां ह वे कशोर?’’
‘‘िमिथला के सीर वज ने जनकपुर म अपनी पु ी का वयंवर रचा है। िव ािम
के साथ दोन कु मार वह गए ह।’’
‘‘यह सीर वज या कोई बड़ा आय है?’’
‘‘मानव ही के वंश म ह।’’
‘‘और उसक वह पु ी?’’
‘‘ ैलो यसु दरी है, सीता उसका नाम है। सीर वज ने कृ िष-य ारा उसे ा
कया था।’’
‘‘तेरे वचन से मेरी अिभलाषा उन दोन मानव-बालक तथा उस ैलो य-सु दरी
सीता को भी देखने को उ हो उठी है।’’
‘‘आकषण का एक िवषय भी है।’’
‘‘वह या?’’
“ वहां एक िपनाक धनुष है।सीर वज का ण है क जो कोई उसे चढ़ाकर
बाणसंयु कर सके गा, उसी को वह ैलो यसु दरी पु ी देगा।’’
‘‘वहां या ब त राजा आए ह?’’
“ आयावत और भरतख ड के ायः सभी राजा गए ह।िपनाकपािण के िवशेष
अनुरोध से दै ये बाण महाकाल भी आया है, ऐसा सुना है।’’
‘‘बाण आया है?’’
‘‘ऐसा ही सुना है।’’
‘‘ठीक है, अ छा संयोग है। म भी जाता ।ं ’’
‘‘ या सै य-सिहत?’’
‘‘नह , एकाक । एक बार उस िपनाक धनुष को देखूंगा। उन मानव-बालक को भी
और उस ैलो यसु दरी को भी। पर तु म छ वेश म जाऊंगा।’’
‘‘ या यह िच य नह है?’’
‘‘मेरे इस परशु के रहते?’’
‘‘मेरा कहना है, सुर ा के िलए कु छ भट अव य साथ लेने चािहए।’’
‘‘नह , क तु राह कतने योजन है?’’
‘‘ यारह योजन सुना है, पर तु देखा नह है। यहां से तीन योजन पर शोण नदी
पार करके जाना पड़ता है।’’
‘‘राह म कु छ रा य-सीमाएं भी ह?’’
‘‘नह , कोसल रा य से िवदेह रा य िमला आ है।’’
‘‘ठीक है, तो तू मारीच मातुल, शी आरो य–लाभ कर और अपने िबखरे ए बल
को एक कर, फर रा स-सै य को साथ ले ग धमादन पर प च ं , जहां मेरा वीर पु
मेघनाद और मातामह सुमाली तथा भाई कु भकण कु बेर क अलका को आ ा त करने
छ वेश म प च ं चुके ह। सब ात बात को जान और देवािधदेव से परामश कर
अलका को आ ा त करने को तैयार रह। तब तक म आता ।ं ’’
उसने अपने मि य और सेनापितय को भी आव यक आदेश दए और कु छ सेना
वहां नैिमषार य म रख, शेष को आगे बढ़ने का आदेश दे, उसने जनकपुरी क ओर एकाक
ही क धे पर परशु रखकर थान कया।
66. धनुष–य

िमिथला के राजा सीर वज जनक ने यह ण कया था क जो पु ष जनकपुर के


िपनाक धनुष को चढ़ाकर बाणसंयु कर देगा, उसे ही वह अपनी क या सीता दे दगे। इस
धनुष-य का िनम ण पृ वी के राजा को भेजा गया और पृ वी-म डल थ राज-कु ल के
मुकुटधारी-छ धारी राजा महाराज जनक क िव -मोिहनी सीता को जय करने जनकपुर
मआप च ं े। इस समय इन सब छ धा रय क चतुरंिगणी सेना क चहल-पहल और
हािथय , घोड़ , रथ और अ य वाहन क भीड़-भाड़ से जनकपुरी भर गई थी। देश-
देशा तर से वेदवे ा ऋिष भी आए थे। उनके िनवास- थान पर सैकड़ बैलगािड़यां और
छकड़े खड़े थे। सभी अपने-अपने सुभीते के अनुसार अनुकूल थान पर डेरे डाल रहे थे।
महामुिन िव ािम भी राम-ल मण सिहत धूमधाम से आए थे। उनके साथ सैकड़ वेद-
पाठी, बटु क, मुिन और अनेक ऋिष थे। मुिन िव ािम के साथ सौ छकड़े आए थे।
सीर वज महाराज ने सब ऋिषय , मुिनय और छ धा रय का समुिचत स कार कया।
सबको यथोिचत िनवास और आव यक साम ी दी गई। नगर म िनत नई धूमधाम होने
लगी और अ ततः वह दन भी आया जब धनुष-य रचा गया।
ब त से राजा भारी-भारी सेना िलए बड़ी तड़क-भड़क और धूमधाम से आए थे।
सबके ठाठ एक से एक िनराले थे, पर तु सबसे िनराला ठाठ र पित रावण का था। यह
महा ाण पु ष अके ला ही पांव- यादे क धे पर परशु रखे संह क भांित धीर-म थर गित से
वहां जा प च ं ा था। उसे न कसी को प रचय देने क आव यकता थी, न कसी को उससे
पूछने क िच ता थी। ब त ने उसे देखा और कसी छ धारी राजा का साम त समझा।
कसी ने एकाध बात क भी, तो उसने उसे उ र ही नह दया, एक क ं ृ ित कर आगे बढ़
गया।
य थली म पृ वी-मंडल के राजा उपि थत थे। उनके मुकुटमिण सूय के काश म
जगमगा रहे थे। रावण ने कमर म र कौशेय, व म ा -चम, कं ठ म उपवीत, भुजा
म वलय, कमर म र -क टब ध और पैर म लाल उपानह धारण कए। मुख पर िलपटी ई
चमक ली काली छोटी-सी दाढ़ी, खड़ी ई मूंछ, उन पर उभरी नाक और पानीदार गहरी
काली आंख। संह जैसे उठान और वृषभ जैसी चाल, अभय दृि । उसे जो देखता देखता ही
रह जाता। सब राजा से उसका ठाठ िनराला था, देखकर मुिन-कु मार का भान होता था।
पर िवकराल परशु और वल त दृि या मुिन-कु मार क होती है? वह सब राजा क
र -मिणय को घूरता आ, उनक उपि थित से कु छ भी भािवत ए िबना, धीर गित से
य -भूिम म आगे बढ़कर वहां प च ं ा, जहां वण के मिण-ज टत संहासन पर महाराज
दै ये बैठा था। दै ये का तेज सूय के समान था। उसका बड़ा डील-डौल था। रावण ने
उसके स मुख प च ं कर तथा परशु क धे से उतारकर कहा–
‘‘जयतु महाराज:! कि त् दै ये ो देवासुरसं ामे व ितहतमहारथो बाणो नाम
महातेजा:!”
‘‘अथ कम्? बाणोऽि म।’’
‘‘अहमिभवादये।’’
‘‘क वं भ ?’’
‘‘अहं रावणो नाम।’’
‘‘आः, अयं लंकाभता? एिह, एिह, व यायु मन्!’’
‘‘अनुगृहीतोऽि म।’’
‘‘र ः पते, इह ित । वदागमनं जनकाय िनवेदयािम तावत्।’’
बाण क सूचना पाते ही जनक सीर वज अपने पुरोिहत गौतम-पु शतान द के
साथ आ उपि थत आ। बाण ने रावण का स ीप-पित कहकर प रचय दया। सीर वज
ने न ता और आदर से कहा–
‘‘ वागतमितथये, एतदासनमा यताम्।’’
‘‘बाढम्!’’ कहकर रावण ने आसन हण कया। जनक ने पुकारकर सेवक से
कहा–‘‘पा मानय। शु ूषामो भव तम्।’’
रावण ने संतु होकर कहा–‘‘वाचानुवृितः ख वितिथस कार। पूिजतोऽि म।
िव तोऽि म। अनेन ब मानवचनेनानुगृहीतोऽि म। आ यताम्!’’
इसी समय सब बाजे एकाएक जोर से बज उठे । जनक त भाव से य -भूिम म
चले गए। कसी ने ऊंचे वर म पुकारकर कहा–
‘‘एवमायिम ान् िव ापयािम। उ सर तु, उ सर तु, आया उ सर तु!’’
और दूसरे ही ण कु मा रका से िघरी ई, मांगिलक उपचार -सिहत
जनकनि दनी सीता ने िवजयमाला िलए य -भूिम म पदापण कया। शु प रधान
धा रणी, ल ावनता, जनकराजनि दनी सीता पु पभारनिमत वृ त क -सी शोभा का
िव तार कर रही थी। सारी सभा उस सुषमा को देख िच िलिखत-सी रह गई। आगे
चलनेवाली चे टय ने हाथ क छड़ी ऊंची करके कहा–
‘‘ए वेतु भतृदा रके , इयं य भूिमः, िवशतु!’’
रावण ने उ सुकतापूवक दै ये बाण के कान के पास मुंह लाकर म दि मत वर म
कहा–‘‘इयं सा राजदा रका? अिभजनानु पं पम्।’’
‘‘नािह पमेव, गितरिप ख व या मधुरा।’’
“ द ् या सफलं म अिभगमनम्।’’
‘‘ममानु पमेवािभिहतम्।’’
इसी समय मि गण सैकड़ मनु य ारा उस आठ पिहय वाले शकट को
खंचवाकर य -भूिम म ले आए, िजस पर वह द िपनाक धनुष रखा था। कं चुक ने
पुकारकर कहा–
“एवमायिम ान् िव ापयािम! यह द धनुष िनिम के ये पु देवराट् को
देवता ने धरोहर के प म स पा था। इसी धनुष को ने द -य म य वंस-काल म
यु कया था।
‘‘इस समय यह िस धनुष िमिथला राजवंश के पास देवता क पिव
धरोहर के प म है। राज ष जनक ने एक वार कृ िष-य करते ए भौमी क या ा क थी
और उसका लालन-पालन पु ी के समान कया था। उसका नाम सीता है। अब वह
राजनि दनी िववाह-यो य वयःसि ध ा है। राज ष जनक का यह ण है क जो कोई इस
धनुष पर यंचा चढ़ाकर इस पर बाण-संधान करे गा, उसको राज ष सीर वज अपनी पु ी
दगे। अब हे नृपितगण, आप अपने बल और सौभा य क परी ा कर।’’
यह सुनकर छ धारी नृपित उठ-उठकर धनुष को उठाने लगे। थम उ ह ने एक-
एक करके जोर लगाया। फर सबने िमलकर चे ा क , पर तु वे धनुष को िहला भी न सके ।
वे सब िवफल मनोरथ हो खीझकर रह गए और जब उ ह ने देखा क िबना ण पूरा कए
राज ष जनक कसी को पु ी नह याहगे, तो वे सब ु हो, श ले-लेकर यु करने को
स हो गए। सीर वज ने भी ऐसे समय के िलए चतुरंिगणी सेना तैयार रखी थी। उसने
देखते-ही-देखते सब राजा को घेर िलया। दै ये बाण और रावण अभी यह तमाशा देख
ही रहे थे क रावण ने उ ेिजत-सा होकर दै ये से कहा–
‘‘ ु कामो धनुः े म्।’’
‘‘परमभा वरं धनुरेतद्।’’
‘‘तद य धनुष आरपोणं क र ये।’’
‘‘न खलु। सुरोपमं पू यं धनुवरम मािभः ानुयाियिभः।’’
‘‘त कं करणीयम ?’’
‘‘ित , प य कौतुकम्!’’
रावण अपने आसन पर बैठ गया। इसी समय य -भूिम म राम-ल मण सिहत
िव ािम मुिन ने वेश कया। जनक ने अपने पुरोिहत और अमा य सिहत िविधवत्
अ य-पा से ऋिष का पूजन करते ए कहा–
‘‘भगव वागतं तेऽ तु। कं ते करोिम, भवाना ापयतु!’’
िव ािम ने कहा–
‘‘इमौ लोकिव ुतौ दशरथ य पु ौ, धानुः े ं ु कामौ।’’
जनक ने कहा–‘‘ ूयताम य धनुष:, यदथिमह ित ित, भूतलादुि थता ममा मजा
सीतेित िव ुता वीयशु के ित। एते सव नृपतयो ममा मजां वरियतुमागताः। तेषां वीय
िज ासमानानां शैवं धनु पा तम्। ये न शेकु हणे त य धनुष- तोलनेऽिप वा, ते अवीया
नृपतयः या याताः।तदेतद् परमभा वरं घनुदशय रामाय।य म धनुषी रामः
कु यादारोपणम्, ◌ु ◌ाोरामःकु यादारोपणम्, सुतामयोिनजां वीयशु कां सीतां द ां
दाशरथयेऽहम्।’’
जनक के संकेत से ने वती और कं चु कय ने माग- दशन कया। िव ािम और
राम को वे धनुष के िनकट ले गए। भट ने पुकारकर कहा–‘‘यही वह धनुष है, िजसे
िनिमवंश क धरोहर देव ने धरा है। िमिथला का िनिम-राजवंश इसक पूजा करता रहा
है। इस धनुष को असुर, ग धव, देव, रा स, य , क र और बड़े-बड़े उरग भी आ ा त
नह कर सके ।’’
िव ािम ने कहा–‘‘व स राम, धनु: प य।’’
राम ने धनुष को भली-भांित िनरी ण करके कहा–
‘‘इदं धनुवरं द ं सं पृशामीह पािणना।
य वां भिव यािम तोलने पूरणेऽिप वा ॥’’
ऋिष और राज ष ने कहा–‘‘बाढम्!’’
इतना सुनते ही राम ने हजार राजा के देखते-देखते धनुष को दृढ़ हाथ म
पकड़कर अधर म उठा िलया। फर य ही उसक यंचा को चढ़ाने लगे, व पात क
भांित घोर श द करके धनुष बीच से टू ट गया।
सारी ही य -भूिम थ सभा यह चम कार देख जड़-च कत रह गई। जनक ने हाथ
उठाकर कहा–
“दृ वीय िह रामो दशरथा मजः। सीता सुता मे भतारं राममासा जनकानां कु ले
क तमाह र यित। सा वीयशु के ित मे स या ित ा। सीता रामाय मे देया। शी ग छ तु
अयो यां व रता रथैः मि णो मम, आनय तु राजानं पुरम्। कथय तु सवशो
वीयशु कायाः दानम्।’’
सीता ने जयमाला राम के कं ठ म डाल दी। ब दीजन िव द बखानने लगे। रावण
ति भत हो यह चम कार देख रहा था। उसे सब कु छ चम कारपूण लग रहा था। राम का
कशोर वय, लाव य, प और अितिव म देख वह ति भत हो गया था। जब धनुष टू ट
गया तो वह आ यच कत आ और जब जनक ने घोषणा क क उसने वीयशु का क या
को दान कर दया, तो वह कु छ िवकल आ। कह एक अ ात टीस उसने अनुभव क ।
उसक दृि शारदीय शोभाधा रणी सीता पर अटक गई। उसने मु ध भाव से अपने ही मन
म कहा–‘‘अहा, इस शीलवती के अंग को तो इसके व ने भी नह देखा होगा, जैसे आ मा
को शरीर नह देख पाता।’’
रावण को यानम देख बाण ने कहा–
‘‘ि थतो म या नः दृढ़मि म प र ा तः, िव िम ये।’’
पर तु रावण ने अपने ही म डू बे ए कहा–
‘‘अथ प रसमा चम कारः।’’
‘‘भवतु नाम।’’
‘‘अलीकमलीकं ख वेतत्।’’
बाण िखलिखलाकर हंस पड़ा। हंसते-हंसते उसने कहा–‘‘भवतु! ग छाम तावत्।’’
वह वण संहासन से उठ खड़ा आ। रावण ने भी खड़े होकर कहा–
‘‘अहमिप त भवता यनु ातो ग तुिम छािम।’’
‘‘ग छतु भवान् पुनदशनाय।’’
‘‘व दािम दै ये !’’
रावण ने अपना परशु क धे पर रखा। वह धीर-म द गित से वहां प च ं ा जहां
खि डत धनुष पड़ा था और राम को जयमाला सीता ने पहनाई थी, उसके एकाध पु प,
वह पृ वी पर सीता के चरण-िच न के समीप पडे़ थे। उसने झुककर उस चरण-िच न क
मृि का जरा-सी उं गिलय के पोर म छू कर दय से लगाई। पु प क उन पंखुिड़य को य
से उठाया और िबना इधर-उधर देखे राजा , म डलीक , धनुधर , ा य , चा रय
और ऋिषय के बीच होता आ अपने माग चला– दय म राम क कसलय-कोमल मू त
और सीता क अमल छिव को र क येक बूंद म भरकर।
67. सावभौम रावण

िमिथला के धनुष-य से लौटकर रावण ने शी तापूवक अपना सावभौम थान


कया। उसके शत-सह रा स छ वेश म िहम-शैल क उप यका म कु भकण और
सुमाली के नेतृ व म उसक ती ा कर रहे थे, जहां उसके धमगु और श -गु
महादेव क उन पर छ –छाया थी। उसने मारीच को खूब आगा-पीछा समझाकर तैयारी
करने का आदेश दया था। नैिमषार य से मारीच रा स क सै य िलए गंधमादन क ओर
थान कर चुका था, अतः रावण ने अिवल ब वहां से कू च बोल दया और उ र कोसल
रा य क सीमा म जा घुसा, जहां महा तापी अनर य रा य कर रहा था। अनर य ने
रावण को भारी रा स सै य िलए, अपनी रा य सीमा म िव होते देखा तो वह दस
सह अ और ब त-से रथ, हािथय से सि त सै य ले रणांगण म उतरा। घनघोर यु
आ। रा स ने बल परा म से अनर य क सेना को काट डाला। पर तु महावीर अनर य
गजराज पर खड़ा हो, हाथ म धनुष ले, अपनी सेना को ललकारता आ रावण पर बाण-
वषा करता रहा। अनर य के ह तलाघव और परा म को देख एक बार रावण के सब
म ी– ह त आ द घबराकर भागने लगे।
तब रावण ललकारता आ रथ पर चढ़कर उसके स मुख आया। यह देख अनर य
ने भी रथ हण कया। अब इन दोन महािव मशाली यो ा ने िविवध द श ा
से ऐसा िवकट यु कया क दोन ओर क सेनाएं ति भत हो ग । रावण ने वेग से च ड
आ मण करके अनर य के रथ के घोड़ को मार डाला। इस पर अनर य ने रथ से कू दकर,
बाण क बौछार से रावण के सारथी को ब ध दया। रावण भी उछलकर रथ से उतर पड़ा
और उसने अनर य के म तक पर गदा का चंड वार कया। उस हार को न सहकर
अनर य मुंह के बल भूिम पर िगर गया। यह देख रावण अ हास करके हंसने लगा। हंसते-
हंसते उसने कहा–‘‘राजन्, इतने ही बल पर तुम वै वण रावण से यु करने िनकल आए?
अब भी यह अ छा है क पराजय वीकार कर लो और मेरी र -सं कृ ित को भी वीकार
करो। जो कोई मेरी र -सं कृ ित को वीकार करता है उसके िलए अभय, जो वीकार नह
करता उसके म तक पर मेरा परशु है।’’ उसने अपना िवकराल परशु हवा म घुमाया।
इस पर अनर य ने कहा–‘‘अरे िव वा मुिन के पु , तू या अपने ही मुंह से अपनी
शंसा करके बड़ा बनना चाहता है? अरे मूढ़ तू इ वाकु वंश का अपमान करना चाहता है?
म वृ ं और मेरे ाण याग का यह समय समुिचत है–तो भी या! अभी इ वाकु वंश
िनवश नह आ है। आ, सावधान हो और यु कर, गाल न बजा!’’ इतना कहकर महाराज
अनर य ने बाण-वषा कर रा स को िवकल कर दया। ह त, क प और अ य रा स ने
चार ओर से िवरथ महाराज अनर य को घेर िलया। महातेज वी अनर य शरीर पर
सह आघात खा वह खेत रहे।
महाराज अनर य का िनधन होने पर रावण ने िहमव त क ओर बाग मोड़ी, जहां
उसके भाई कु भकण, नाना सुमाली तथा महावीर पु मेघनाद तथा सह रा स उसक
बाट जोह रहे थे। रावण क वह वीर-वािहनी उनसे इस कार जा िमली, जैसे न दयां समु
म िमलती ह। रा स क एक सै य का आगमन सुनकर य भयभीत होकर भागने लगे।
कु बेर ने जब सुना तो उसने ु होकर रावण के स मुख यु करने अपनी चतुरंग चमू को
भेजा। य ने रा स के धुर उड़ा दए। रा स और रा स-सेनापित इधर-उधर भागने
लगे। यह देखो रावण ने ललकारकर कहा–‘‘अरे रा स भटो, िनभय यु करो और देखो क
म अके ला ही यु थली म कै सा चम कार दखाता ।ं ’’ इतना कहकर वह अपना परशु
घुमाता आ य के समूह म घुस गया। य ने भी गदा, मुशल, ख ग, शि , तोमर आ द
आयुध ले उसे चार से घेर िलया। पर तु रावण ने उनका तिनक भी भय न कर अपने फरसे
से उ ह मारना शु कर दया। उसके मि य और सेनापितय ने भी उसे चार ओर से
घेरकर चौमुखी मार शु कर दी। देखते-ही-देखते य के शरीर कट-कटकर ढेर होने लगे।
घायल क ची कार और यो ा क ललकार से लोग के कान के परदे फटने लगे।
य क यह दुदशा देख कु बेर वै वण ने अपने सेनापित सुयोध कं टक य को
ब त-सी नई सेना देकर भेजा। इस नई सेना को देख िवकराल कु भकण दोन बा
फै लाकर दौड़ा। दूसरी ओर से मारीच ने य को दबाया। दोन दल म जब इस कार
िवकट सं ाम हो रहा था, तब अवसर पा रावण अपना परशु घुमाता आ अलका के
संह ार पर जा प च ं ा। उसके साथ ही दै य सुमाली शि हाथ म िलए चला। ार-र क
के अ य सूयभानु य ने रावण को रोकना चाहा। जब रावण उसे धके ल आगे बढ़ा, तो
सूयभानु ने ख चकर प रघ रावण के म तक पर दे मारा, िजससे रावण के म तक से र
क धार बह चली। इससे ु होकर रावण ने वही प रघ छीन इतने वेग से उसक छाती म
मारा क वह वह िगरकर मर गया। ार-र क सारी सेना अ -श फक भाग खड़ी ई।
रावण परशु घुमाता आ सुमाली-सिहत अलकापुरी म घुस गया।
कु बेर ने जब यह समाचार सुना तो उसने मिणभ य को रावण का वध करने
भेजा। चार हजार य लेकर मिणभ ने रावण को चार ओर से घेर िलया। उस पर गदा,
मुशल, ास, शि , तोमर तथा मु र क वषा होने लगी। इसी समय ह त, अक पन और
मारीच ब त-सी रा स सेना ले वहां प च ं गए। अब वीर वीर से गुंथ गए। ह त और
महोदर ने ब त-से य को मार िगराया। इसी समय धू ा ने मिणभ क छाती म
कु शल का हार कया, पर मिणभ ने उसक तिनक भी िच ता न कर इतने वेग से गदा
धू ा को मारी क वह च र खाकर भूिम पर िगर गया। यह देख रावण मिणभ क ओर
दौड़ा। मिणभ ने तीन शि यां रावण पर फक , पर रावण ने इसी समय परशु से मिणभ
के िसर पर हार कया। इससे मिणभ मू छत हो गया। उसे रथ पर डालकर य कै लास
क ओर ले भागे।
मिणभ के पराभव का समाचार सुनते ही य क सेना म हाहाकार मच गया।
अलकापुरी के सब आबालवृ आतनाद करने लगे। यह देख शु , ो -पद और प शंख
नामक तीन महािव मी महारिथय के साथ वयं कु बेर धनेश ने पु पक िवमान म बैठकर
य क सेना-सिहत यु -भूिम म वेश कया। कु बेर धनेश को स मुख आता देख रावण
परशु उठा आगे बढ़ा। उसे देख कु बेर ने कहा, ‘‘अरे दुबुि रावण, तू मेरा िनवारण भी नह
मानता। अरे , जो माता-िपता और गु जन का अपमान करता है, वह तो महा अधम है।
पर तु अब इन बात से या? अब तू अपने कम का फल भोग!’’ इतना कह उसने रावण
पर गदा से वार कया। कु बेर के ताप और तेज से ाकु ल होकर रावण के सभी म ी
भयभीत होकर भाग गए, पर रावण अचल खड़ा रहा। जब कु बेर ने दुबारा गदा का हार
करना चाहा तो रावण ने भी हार कया। अब दोन भाइय म भयंकर यु होने लगा।
लड़ते-लड़ते कु बेर ने रावण पर आ ेया छोड़ा। इसका िनवारण रावण ने व णा से
कया। फर रावण ने अनेक कौशल कए, अ त म रावण का गहरा अाघात म तक पर
खाकर कु बेर मू छत होकर भूिम पर िगर गया। यह देख उसके सेवक उसे उठाकर रथ म
बैठाकर ले भागे। रावण यह देख स आ। उसने कु बेर के पु पक िवमान पर अिधकार
कर िलया, िजसम सोने के ख भे, वैदय ू मिण के ार और मोितय क झालर टंगी थ । इस
पु पक का वेग मन के समान था। इसक सी ढ़यां सोने क थ और इसम ठौर-ठौर र जड़े
थे। यह िवमान व ा िव कमा ने कु बेर के िलए बनाया था। रावण ने िवमान को ा कर
तीन लोक को जय कया समझा और वह तेजी से िहमालय को लांघकर देवािधदेव के
िनके तन कै लास-िशखर पर जा चढ़ा।
कै लासी ने स वदन हो रावण क अ यथना क । रावण ने कै लासी के चरण
पर म तक रख उ ह िणपात कया और ब ांजिल हो अनु ह-याचना क । ने
कहा–‘‘भ वै वण, तेरे पु मेघनाद को हमने अपने सब द ा दे दए ह। अब वह देव-
दै य सभी से अजेय है। अब कह, तेरा और या ि य क ं ?’’
रावण कृ तकृ य हो गया। इसी समय मेघनाद ने िपता के चरण छु ए। रावण ने पु
को छाती से लगा, ेह से िसर सूंघा; फर वह पु को साथ ले, क अनुमित ले ती
गित से कै लास के नीचे उतरा।
पर तु कै लास ही के माग म उसक भट नारद वामदेव से हो गई। नारद को देख
रावण ने उ ह िणपात कया और अपना म त सुनाकर कहा– “देव ष, कहो, कै से मेरा
मनोरथ पूरा होगा?’’
नारद ने कहा–‘‘सुन िव वा मुिन के पु , तेरे परा म, साहस और भावना से म
ब त स ।ं पर तू यहां आयावत म या कर रहा है? तू देव, दानव, दै य, य , ग धव
सभी को परािजत करने क साम य रखता है, तू अपवत जा। वहां यम, वा णेय, इ
देवराट् ह, उ ह जय कर। फर नाग को पाताल म िवजय कर। तब तेरा मनोरथ फलेगा।’’
रावण ने हंसकर कहा– “देव ष, म ऐसा ही क ं गा।’’
इतना कह नारद अपनी राह लगे और रावण ने भी अपवत क राह पकड़ी। अब
वह िम ावसु ग धव क पुरी म प च ं ा, जहां उसका भ वागत आ। िचर-िवरिहणी
िच ांगदा से िमलकर दय- ि थ खोली, मान-मनौवल आ। िच ांगदा के मनोरथ पूण
कर तथा शी लौटने का वचन दे, अपने सुर िम ावसु से ग धव क सेना सहायताथ ले,
रावण अपवत क ओर अ सर आ। अनर य का यु म िनधन तथा बािल वानरे और
मािह मती के सह ाजुन क कथा रावण ने सुर को कह सुनाई थी।इस पर िम ावसु ने
उसे अनेक स परामश दए। चतुरंग चमू के साथ ब त वण, मिण और द ा भी दए।
अब रावण का यह रा स-सै य अप रसीम था। रौ शि से स प और ग धव
से संयु तथा अजेय मेघनाद, कु भकण और सुमाली से सुरि त उसक सेना एक ओर थी
और दूसरी ओर उसका अपना िवकराल परशु था।
चलते-चलते रा स क यह चतुरंग चमू ‘आयवीयवान्’ े म आ प च ं ी, जहां
इ सखा म त् संवत ष के नेतृ व म य कर रहे थे। म त के इस य म देवे सिहत
सभी देवता उपि थत थे। दुजय रावण परशु क धे पर रख िनभय एकाक ही य -भूिम म
जा धमका और बोला, “म स ीप का अधी र पौल य रावण ।ं नृवंश म एक वै दक
र -सं कृ ित क थापना करने के िलए मने सावभौम अिभयान कया है। अब जो मेरी र -
सं कृ ित को वीकार करता है, उसे अभय; जो नह वीकार करता है उसके म तक पर मेरा
यह परशु है।’’ रावण के ऐसे गव-भरे , अकि पत, अत कत वचन सुनकर सभी म ण और
देवगण ति भत रह गए। रावण क दुधष चतुरंग चमू क सूचना उ ह िमल गई थी। इससे
उ ह भीित भी ई। इसके अित र यह य का काल था।
रावण के ये वचन सुनकर म त के मुख ने कहा–
‘‘अरे पौल य, तू िव दीखता है, पर अिभमानी पु ष क भांित बात करता है।
या िव म तू ही एक वीर पु ष है?’’
‘‘इसका िनणय तो यह परशु करता है, अभी मने अपने बड़े भाई कु बेर धनपित का
इसी से पराभव कया है तथा इ वाकु अनर य का इसी परशु से िशर छेद कया है,
िजसका र भी अभी सूखा नह है।’’
म त के मुख ने कहा, ‘‘शा तं पापम्! बड़े भाई का पराभव और वृ मानव
अनर य का वध! अरे वै वण, तू तो अधम करता आ रहा है, या संसार म अधम करके भी
कोई यशभागी बना है? पर तु इस लाप से या? तू य द हम म ण से यु ही चाहता
है तो खड़ा रह, म तुझे यहां से जीिवत नह जाने दूगं ा।’’
यह कहकर म त का वामी ख गह त हो य ोपवीत पहने ए ही य ासन से
उठ खड़ा आ। अ य म ण ने भी ख ग ख च िलए। देव ने भी धनुष पर बाण-संधान
कए। रावण क ं ारकर परशु घुमाने लगा, पर तु इसी समय मह ष संवत ने उसके िनकट
आकर ेह से रावण के िसर पर हाथ रखा और कहा–‘‘आयु मान् रावण, म तेरे िपता
िव वा मुिन का गु भाई और सखा ।ं तुझे देखकर स ह षत ,ं म ण इस समय
माहे र य म दीि त ह, तू भी तो माहे र है। सो पु , इस समय धम- ण म यह िव ह
ठीक नह । इसम देव-अव ा होगी।’’ फर उसने म त के मुख से कहा–‘‘य दी ा म
िव पु ष को यु और ोध से दूर ही रहना उिचत है, इसिलए रावण के परा म और
य के भार को समझकर आप भी श याग द तथा सब म त् और देव शा त हो जाएं।’’
इसी समय रावण के म ी शुक ने उ वर से पुकारकर कहा–‘‘म रा स का
म ी शुक पुकारकर घोिषत करता –ं यहां बैठे सब म ण और देवगण सुन क वै वण
पौल य रावण-स ीप का अिधपित लंकेश–यहां उपि थत है। म उसक िवजय-घोषणा
करता ,ं िजसे िवरोध हो, वह श ले!’’
पर तु ऋिषवर संवत के संकेत से सब म ण और देवे -सिहत देवगण चुपचाप
बैठे रहे। रावण उसी कार य थल से चला गया।
शी ही वयं वह अपवत म जा प च ं ा। यमराज मिहष क सै य ले तोमर, शूल,
ास, प रघ, मु र और शि के साथ यु थल म आ प च ं ।े वह य िप ब त वृ हो गए
थे पर अभी उनम बड़ा बल था। यमराज ने रा स मि य तथा रा स को छोड़ सीधा
रावण ही पर आ मण कया। यम के द ा से रावण ाकु ल हो गया, तब उसने महा
अमोघ पाशुपता धनुष पर चढ़ाया। पाशुपता सह उ कापात क भांित– वलंत स व
क भांित सब यमदूत को भ म कर यम को पराभूत कर गया।
पर तु शी ही चैत य हो ोध से लाल-लाल आंख िलए यम ने अपने सारिथ से
कहा–‘‘सूत, मेरा रथ इस वै वण के पास ले चल।’’ सूत ने काल-द ड हाथ म ले, रथ आगे
बढ़ा दया। यम ने भयानक वेग से महा का योग कया, िजसम दश दशाएं जलने
लग । रा स क सेना हाहाकार करती भाग खड़ी ई। पर रावण ने घोर गजना करके
यमराज को बाण से छा दया। यमराज ने भी गदा के हार से रावण के व को आहत कर
दया। फर उस पर अमोघ शि का हार कया। इससे रावण मू छत होकर भूिम पर आ
िगरा। थोड़ी ही देर म फर चैत य होकर उसने बाण क वषा कर यम के सारिथ मृ यु को
ाकु ल कर दया। यमराज ने कहा–‘‘अरे , यह िव वा मुिन का पु तो िहर यकिशपु,
नमुिच, श बर, धूमके तु, बिल, वैरोचन, वृ , राज ष, ग धव, उरग सभी से बल वल त
स व तीत होता है।’’ यह कहकर यमराज ने यु - े याग दया। यमराज को पराङ् मुख
देख रावण िवजय का डंका बजाता आ अपवत से व णलोक क ओर चल पड़ा।
शी ही उसक चतुरंग चमू व णलोक म जा प च ं ी तथा वा णेय से उसका
घमासान यु ठन गया। नानािवध द ा से वा णेय ने रा स से यु कया।
वा णेय ने बाण से रावण के शरीर को छेद डाला। इस पर ु हो महोदर ने रथ पर बैठ
मुशल, भाल, प श, शि और शत ी लेकर वा णेय को खदेड़ दया। उसके हार से
वा णेय चार ओर से िघर गए। यह देख रावण ने परशु हवा म घुमाकर लयमेघ के समान
गजना क और सब वा णेय से कहा–‘‘हे वा णेय, तुमने मय दानव क प ी हेमा नामक
अ सरा का हरण कया है, उसे वापस करो तथा उरनगर मय दानव को दो, तो म तु ह
मा क ं गा। नह तो समूचे व णालय को भ म कर ढेर कर दूग ं ा।’’ इस पर इ ु
वा णेय ने आगे बढ़कर ख ग हवा म िहलाते ए कहा, ‘‘हेमा मेरी ेयसी है, उस पर
िजसक दृि है, उसका म इसी ण वध क ं गा।’’ मय दानव अब अपनी िवकराल शि ले
आगे आया। उसने कहा–‘‘अरे पराई ी को चुराने वाले चोर, ठहर! आज तू मेरे हाथ से
बच नह सकता।’’ इसके बाद दोन वीर गुंथ गए। िविवध श ा का योग आ और
इ ु छाती म शि खा र वमन करता आ मर गया।
वा णेय ने अछता-पछताकर हेमा रावण को स प दी। उरनगर भी उसके हवाले
कया। इस कार वा णेय से यु म कृ तकृ य हो, अपनी ि य म दोदरी क अिभलाषा
पूण कर, अपनी सास हेमा अ सरा को साथ ले रावण ने दलबल सिहत उरनगर म डेरा
डाला और सब रा स-सै य को िव ाम करने क आ ा दी।
68. उरपुर

उन दन उरपुर देवलोक म अ य त स प नगर था। वहां अनेक देव, अ सराएं


और उरग जन रहते थे। इसक सुषमा अमरावती से कम न थी। यह नगर काके शस
उप यका म आज भी बसा आ है। वहां क अ सराएं देवलोक म सबसे अिधक सु दर
आ करती थ और वे उवशी कहाती थ । काके शस या कोहकाफ का यह अंचल अ य त
आरो य द है। प शयन कथाकार ने इन अ सरा को कोहकाफ क परी कहकर इनका
प रचय दया है। यहां पा रजात नाम का एक अ लान, ेत थल-कमल होता था जो
देवलोक-भर म िस था। इसक ग ध-माधुरी एक योजन तक वातावरण को सुरि त
करती थी और देवराट् इ ित दन इसी पा रजात का अ लान मा य धारण करते थे।
आज भी संसार-भर म इस ा त का यह थल-कमल िस है।
रावण ने वा णेय से हेमा अ सरा के साथ ब त-से र , मिण, सुवण भी ितपू त
के प म िलए थे तथा हेमा को अपनी बि दनी के प म पृथक् एक थान म रखा था। हेमा
इसी उरपुर क िनवािसनी थी। वह असाधारण सु दरी और मोहक थी। उसके कटीले नयन
के कटा और उ त उरोज का आकषण िवल ण था। इस बृहद् अिभयान म रावण के
साथ उसका सुर मय दानव और उनके दोन पु मायावी और दु दुिभ भी थे। भली-भांित
सैिनक-सि वेश थािपत कर चुकने के बाद रावण ने अपने सुर मय दानव को बुलाया
तथा अपने सब मि य के सम उसने कहा– “हे महाभाग, सु बा ीप म मने आपक
क या हण करने के समय शु क- प जो वचन दए थे, उ ह मने अब पूरा कर दया।
वा णेय से दा ण यु करके आपने अपने श ु का हनन कया तथा आपक ी हेमा
अ सरा का मने उ ार कर दया, अब वह बि दनी यहां उपि थत है। वे छा से अकारण
अपने पु ष को यागकर जो ी चली जाए और दूसरे से रमण करे , वह द डनीय है। ऐसी
ी को शौय से फर ह तगत करना धम है तथा उस कु ल- यािगनी पुं ली का वध करना
भी कु लीन मयादा है। पर तु शौय से मने उसका उ ार कर दया, अब कु ल-मयादा के
अनुसार काय करना आपका धम है। यह ख ग है, लीिजए और उस कु ल- यािगनी, कु लटा
ी का िशर छेद कर अपने िति त कु ल क ित ा सुरि त क िजए िजससे लोक म
उदाहरण रहे।’’ इतना कहकर रावण ने ख ग अपने सुर मय दानव के हाथ म दे दया।
मय ने कहा–‘‘हे सौ य, तूने अ छी धम-मयादा कही। म भी यही ठीक समझता ं
और अभी उस कु लटा कु ल- यािगनी का दय इस ख ग से िनकालकर भ ण क ं गा। अब
उसके कलं कत जीवन से मुझे या!’’ इतना कहकर मय दानव ख गह त उस कारागार म
गया, जहां उसक प ी हेमा अ सरा बि दनी थी, िजसके िवयोग म वह अपना रा य, नगर
याग चौदह वष वन-वन और देश-देश क खाक छानता रहा था।
पर तु जब वह न ख ग हाथ म िलए उसके स मुख प च ं ा, तो उसने देखा क वह
अिवचल भाव से ि थर खड़ी है। मय ने देखा, उसका स दय और आकषण इन चौदह वष म
तिनक भी लान नह आ है। वैसा ही उसका उठा आ यौवन है, वैसा ही तपाए सोने का-
सा वणगात है, वैसी ही नीलमिण-सी उसक देह-यि है।
अपने पित को चौदह वष बाद इस कार ख गह त स मुख खड़ा देखकर वह
तिनक भी िवचिलत नह ई, न उसने अपने बचाव क ही कु छ चे ा क ।
जरठ मय क मु ी से ख ग त होने लगा। वह उस मनोहर रमणीय व म
ख ग नह घुसेड़ सका। उस कोमल शोभावती रमणी पर िनदय वार न कर सका। कस
कार उसने उसके नविवकिसत यौवन के साथ कभी रमण कया था–संसार को भूलकर!
आरोिपत कर दया था उसी म अपने को! उसके िलए नगर बनाया था, हेम-ह य बनाया
था, उसे यार कया, उससे उसने एक पु ी और दो पु उ प कए थे। आज चौदह वष से
वह उसके िवयोग म मारा-मारा फर रहा था। उसके िबना उस िवरागी को संसार सूना
दीख रहा था और आज जैसे उसक खोई िनिध िमल गई थी। अतीत जीवन म मधुर दृ य
उसके ने म घूम गए। उसने देखा–आज वह पहले से भी अिधक आकषक, मनोहर और
सु दरी है। अब भला वह कै से उसका वध कर सकता था!
हाथ म ख ग िलए वह देर तक एकटक हेमा को देखता रहा। फर उसने
पूछा–‘‘अब तू या चाहती है?’’
‘‘जो तुम चाहो।’’
‘‘तू या करे गी?’’
‘‘जो तुम कहो।’’
‘‘कहां रहेगी?’’
‘‘जहां तुम रखोगे।’’
‘‘य द म तुझे मु कर दू?ं ’’
‘‘अब, इस अिभयान के बाद?’’
‘‘तू जहां चाहे चली जा, मुझसे तुझे या!’’
‘‘ फर इतना र य बहाया?’’
‘‘यह तो ठीक ही कया।’’
‘‘तो अब फर म कहां जाऊं?’’
‘‘ या इ ु तुझे मेरे ह य से भगा ले गया था?’’
‘‘नह , म वे छा से उसके साथ गई थी।’’
‘‘इसम दोष कसका है, तेरा या इ ु का?’’
‘‘ कसी का भी नह !’’
‘‘तो तू अपने उस ग हत काय के िलए लि त नह ?’’
‘‘लि त नह ।ं ’’
‘‘ या म तुझे यार नह करता था?’’
‘‘करते थे।’’
‘‘और तू?’’
‘‘म भी।’’
‘‘ फर भागी य ?’’
‘‘इसिलए क म अपने को भी यार करती थी।’’
‘‘तूने मेरा िवचार नह कया?’’
‘‘ब त कया।’’
‘‘ फर भी तू मुझे छोड़कर भाग गई?’’
‘‘हां।’’
‘‘ कसिलए?’’
‘‘तु हारे साथ रह नह सकती थी।’’
‘‘ य ?’’
‘‘ य क उसने भी मुझे यार कया।’’
‘‘और तून?े ’’
‘‘मने भी उसे।’’
‘‘ या तू उसके साथ स तु रही?’’
‘‘ब त।’’
‘‘मने तुझे कतने ह य-मिण दए, कतने सुख-साधन जुटाए! उसने भी ऐसा ही
कया?’’
‘‘न।’’
‘‘ फर भी तू उसके साथ सुखी रही।’’
‘‘हां।’’
‘‘मुझे याद नह कया?’’
‘‘ब त कया।’’
‘‘मेरे दुःख को नह देखा?’’
‘‘ब त देखा।’’
‘‘ फर भी लौटी नह ?’’
‘‘नह लौट सकती थी।’’
‘‘ या तुझे बलात् रखा गया था।’’
‘‘नह ।’’
‘‘चाहती तो लौट सकती थी?’’
‘‘लौट सकती थी।’’
‘‘ फर भी लौटी नह ?’’
‘‘न।’’
‘‘ य ?’’
‘‘उसके यार के वशीभूत होकर।’’
‘‘तो उसका यार, मेरे यार, तेरे िववेक और तेरी-मेरी मयादा–सबको आ ा त
कर गया?’’
‘‘ऐसा ही आ।’’
‘‘और अब?’’
‘‘अब तो तुमने उसे मार डाला।’’
‘‘पर तु तू?’’
‘‘तु हारे अधीन ।ं ’’
‘‘य द म तेरा वध क ं ?’’
‘‘करो।’’
‘‘और यार?’’
‘‘करो।’’
‘‘तू भयभीत नह है?’’
‘‘ या तुमसे?’’
‘‘नह , इस ख ग से?’’
‘‘नह ।’’
‘‘ य भला?’’
‘‘तुम जो मेरे िनकट हो। तु हारे िनकट रहते मुझे भय या!’’
मय क आंख से अ ुधारा बह चली। ख ग क नोक भूिम म गड़ाकर वह पृ वी
पर झुक गया।
हेमा ने आकर उसका िसर अपने व म ले िलया।
ब त देर बाद मय ने कहा–
‘‘घर चल, हेमा!’’
‘‘चलो!’’
और दोन उस ब दीगृह से बाहर आए। रावण ने सब बात जान , पर उसने सास
क अ यथना नह क । फर भी वह उसके अदै य पर च कत था।
उसने कहा—‘‘मातः, म तेरी अ यथना नह कर सकता।’’
‘‘कै से कर सकता है पु , मुझसे घृणा करने का तुझे अिधकार है।’’
‘‘म तुझसे घृणा नह करता मातः, पर तु तूने अपराध तो कया है।’’
‘‘इसका िवचार तू नह कर सकता पु , तेरी प ी का िपता—मेरा पित—कर
सकता है, सो उसने कर िलया है।’’
‘‘तो मातः, तेरा अब म या ि य क ं ?’’
‘‘इस उरपुर म हमारा अिभन दन हण करके मुझे सं ह षत कर।’’
‘‘यह उरनगर तो मने अपने सुर महाभाग मय को दया है।’’
‘‘तो उसक प ी म यहां क वािमनी ;ं तेरा अिभन दन करती ,ं तू हमारा
जामाता है, पूजाह है, अितिथ है, अिभन दनीय है, मेरे पित पर तेरा उपकार है।’’
‘‘तो मातः, मेरे इस काय से या तुझे दुःख नह आ?’’
‘‘पु , सभी के सुख-दु:ख से तेरा या योजन है तथा गु जन के गुण-दोष के
िववेचन का यह या अवसर है? य द स य ही तूने हम उरनगर का वामी बनाया है, तो
जामाता क भांित हमारा अिभन दन हण कर।’’
रावण ने वीकार कया और तब मय दानव और उसक पुनरागता प ी हेमा
अ सरा ने उरपुर म रावण और रा स सै य के स कार का आयोजन धूमधाम से कया।
69. सारं सुरमि दरम्

अपने यश वी जामाता रावण क अ यथना के िलए मय ने सब दै य-दानव और


असुर स बि धय को बुलाकर िवराट भोज का आयोजन कया। स पूण दै यलोक तथा
पाताल से दै य–दानव आने लगे। उसके साथ अनेक दै य-पाषद और सैिनक थे। सुभाय,
त तुक , िवकटा , क पन, नमुिच, धू के तु, मायाकाम तथा अ य सगे–स ब धाी दै य–
दानव, राजा और भूिमपित एकि त ए। सभा भरी। पर पर यथायो य व दना कर सब
बैठे। मय ने सबका यथायो य स मान कया। अब भोजन क पंि बैठी तो दस योजन
िव तृत भूिम म भोज आ। िविवधा कार के भुने-तले मांस, समूचे मृग, शूकर, लाव,
तीतर, ब ख, हंस, च वाक, कपोत, कु कुट आ द के वा द मांस के साथ सुवािसत
म दरा का खूब पान आ। दानवे मय ने नाना कार के भ य, भो य, ले आ द षड् रस-
यु द अ -भोजन तुत कए। भोजन से िनवृ हो दानव-दै य-र सभा म जा बैठे,
जहां अनेक दै य-बालाएं नृ य कर रही थ । सभी दै य-दानव वहां बैठे र -मिण क
यािलय म भर-भर म पीने तथा दै य-बाला का नृ य देखने लगे। नमुिच दानव क
क या िवलािसका का नृ य देख सभी जन िवभोर हो गए। िवलािसका क काि त से दशाएं
कािशत हो उठ । अपनी दृि से अमृत क वषा करती ई वह दानव-बाला ऐसी तीत
हो रही थी, जैसे च मा क मू त ही पृ वी पर अवत रत ई हो। ललाट म ितलक, पैर म
नूपुर, मनोहर दृि , नृ य करने म वह मूत कला-सी हो उठी। उसके घुंघराले बाल, उ वल
और सम द त-पंि , उ म पीन तन उस नृ य म िवलास-वाहक ए। उस दानवी के नृ य
को देख रावण कामिवमोिहत हो गया। थक जाने पर नृ य ब द कर वह दानव-बाला जब
ितरछी नजर से उस जग यी रावण को देखती ई, िपता क आ ा से उसे ऋजु णाम
िनवेदन कर चली गई, तब रावण भी मि य सिहत उठकर अपने शयन-मि दर म आया।
िवलािसका क याद कर वह ल बी-ल बी सांस ख चने लगा। अधराि तीत होने पर
िवलािसका अपनी दो सिखय -सिहत वहां आई और रावण के शयन-क म जाने लगी। तब
पहरे पर जागते ए म ी ह त ने कहा–‘‘हे राजपु ी, तिनक ठहर। म तेरे आगमन क
सूचना र े को दे दू।ं ’’
दानव राजक या ने कहा–‘‘भ , तू मुझे भीतर जाने से कसिलए रोकता है?’’
‘‘महाभागे, सोते ए पु ष के पास सहसा नह जाना चािहए। फर हमारा वामी
ती है।’’
‘‘अ छा तो भ , तू उसे सूिचत कर।’’
रावण ने िवलािसका का आना सुना तो वह बाहर आकर उसक अ यथना करता
आ बोला—‘‘सु दरी, तूने अपने आगमन से इस अ यागत को कृ ताथ कया है। अब आसन
हण कर इस थान को भी कृ ताथ कर!’’
राजपु ी सिखय -सिहत बैठ गई। तब रावण ने कहा–‘‘हे चपलने , य िप तेरे
दशन-मा से ही मेरे ने सफल हो गए, पर सभा म नृ य करते समय तूने सभी के समान
मुझे भी समझ मेरा अपमान ही कया।’’ बाला ने म द मु काकर और अपनी भारी-भारी
पलक उठाकर कहा–‘‘यह अपराध तो उसका है िजसने सभा म मेरा नृ य िबगाड़कर मुझे
लि त कया।’’
इस पर हंसकर रावण ने िवलािसका का हाथ पकड़ िलया। इसी समय कुं जरकु मार
दै य क पु ी रोमा भी वहां आ प च ं ी। वहां िवलािसका को देख वह ई या से जलकर
बोली–‘‘हे सखी, कु शल तो है, आज इस समय राि म तू यहां कै से आई?’’
िवलािसका ने कहा–‘‘यह तो मेरे ही िपतृ का घर है। र े मेरा अितिथ है।
इसी तरह तुम भी मेरी अितिथ हो। म तु हारा भी स कार करती ।ं ’’
‘‘यह तो ब त अ छी बात है। मने सुना था, यहां जो भी आता है उसका तुम इसी
भांित स कार करती हो।’’
िवलािसका ने होकर कहा–‘‘पर तु म तु हारे समान, िबना ब धु क आ ा
के अके ली पराये थान म नह जाती।’’
यह उ र सुन ु हो, कु छ भी जवाब दए िबना, रोमा चली गई और
िख मन िवलािसका भी सिखय समेत उठकर चल दी। िववश रावण भी िवमन हो रात-
भर करवट बदलता रहा।
दूसरे दन नमुिच दानव ने आकर मय से कहा–‘‘म आज र े का अपने घर
आित य करके अपनी क या िवलािसका उसे दूग ं ा।’’ सबके सहमत होने पर उसने वेदी रच
अि - थापना क और अपनी क या अनेक र -सिहत रावण को दे दी। दूसरे दन
कुं जरकु मार दै य ने आकर कहा–‘‘आज आप सब लोग मेरे थान पर आइए, वहां म र े
रावण का स कार क ं गा तथा अपनी पु ी ारोमा उसे दूग
ं ा।’’ फलतः सभी दै य-
दानव ने वहां जा र े के साथ उसका आित य हण कया और उसने सबका िविधवत्
स कार कर अपनी क या रावण को दे दी। तीसरे दन दुरारोह ने अपनी ैलो यसु दरी
क या कु मुदवती उसे दे दी। चौथे दन त तुक छ ने िनम ण दे त कांचन क भावाली
क या भावती उसे दी। पांचव दन मदनके तु दै य ने पान-गो ी रच दूवा के समान
काि तवाली यामलांगी, मदनशर के समान अपनी सुभ ा क या उसे दी। छठे दन सुबा
ने अपनी नवीन प लव के समान कोमल अंगवाली माधुरी क या और सातव दन सुभाय
ने कु सुम-कोमल सुमाया क या दी। आठव दन भ जंघ दानव ने आकर िनवेदन कया–‘‘हे
र े , आज तु हारे आित य क मेरी बारी है। मने सुरपुर से बारह द देवांगना का
हरण कया था। वे सब प- कशोरी एक से एक बढ़कर ह। उनम अमृत भा तथा के िशनी
नाम क दो ऋिष-क याएं ह। कािल दी, भ का और दपकमाला, देवलमुिन क क याएं ह।
सौदािमनी और उ वला हाहा ग धव क पुि यां ह। पीवरा ग धव क बेटी है।
अंजिनका काल दै य क पु ी है, के शरावती पंगल म त् क पु ी है। ये बारह द ांगनाएं
मेरी दुलारी पु ी अनंगभ ा क सिखयां ह। अब सब दै य-दानव क पान-गो ी म म ये
तेरह क यार तु ह दूग ं ा।’’ सब दै य-दानव ने यह ताव स ता से वीकार कया।
दानव भ जंघ ने ब त-से दहेज के साथ तेरह क याएं र े को दे द ।
िजस समय उरपुर म इस कार रावण के िनत-नये याह रचाए जा रहे थे और
एक से बढ़कर एक नवोढ़ा बालाएं उसे भट दी जा रही थ , तभी स पूण दै यलोक, देवलोक
तथा मृ युलोक के उन राजा और सरदार ने, िजनक क या का रावण ने हरण कया
था, उरपुर के समाचार जान तथा रावण का प रचय पा स देश पर स देश भेजने आर भ
कर दए। ग धव नागभट ने अपनी क या मदनसेना, अपरा त के वामी सुभट ने अपनी
क या च ावती, कांची के म त् राजा कु भीरक ने अपनी क या व णसेना, लावाणक के
राजा ने अपनी लाव यवती क या िव ु माला और ीक ठ के राजा ने अपनी काि तमती
क या के िलए भारी-भारी दहेज भेज रावण को अपना दामाद वीकार कर िलया।
पृ वीजयी र े रावण को अपनी-अपनी क या देने क मानो समूचे दै यलोक और
देवलोक म होड़-सी मच गई।
उस काल म क या का राजनीितक मू य भी खूब था। आजकल क भांित
कदािचत् उन दन िवदेश के राज-दरबार म राजदूत नह रखे जाते थे। तब िवजयी
नरपित को क या देना ही लाभदायक होता था। वह क या िपता के श ु-ह य म जाकर
उसके दय तक का भेद जान लेती थी तथा सदैव अपने िपता पर पित को सदय रखती थी।
वह युग ऐसा ही था।
उरपुर के ड़ा-उ ान म िनत-नई नववधु का साद पा रावण िन कु छ
दन अपनी मधु-यािमिनयां मनाता रहा। जब वह वहां से चला तो मय दानव ने अपने
दामाद को एक सह कु मा रकाएं, एक सह हाथी, दस सह अ , एक सह वणज टत
रथ तथा वण, र , व , कपूर, अगर, कुं कु म आ द से भरे पांच हजार ऊंट दहेज म दए
तथा सब रा स का िविधवत् स कार कर बहतु-सा वण-र दे उ ह िवदा कया।
70. अमरावती म

उरपुर म सुर तथा सास से सुपूिजत होकर रावण अपनी चतुरंिगणी सेना ले
अमरावती क ओर बढ़ा। अब तक रावण ने मेघनाद को यु से िवरत कर रखा था। उसने
कहा था–‘‘पु , तू के वल देखता रह, यु न कर। म देवराट् इ के साथ तेरा थम यु
देखना चाहता ।ं ’’ सो अब जब अमरावती के वण-कलश रावण ने देख,े तो पु मेघनाद
को छाती से लगाकर उसने कहा–‘‘पु , यह अमरावती है, यहां हमारे रा स धम के परम
िवरोधी देव आ द य रहते ह। अब तेरा यह काय है क इस देवराट् को रि सय स बांध ला।
आज तू ही इस देवािभयान का नेतृ व कर, पु ! हम सब तेरे अनुगत रहकर तेरी पृ -र ा
करगे।’’
िपता के वचन सुन मेघनाद ने रावण क प र मा कर णाम कया और
कहा–‘‘तात आप मेरा कौतुक देख क कस कार देवराट् को बांधकर आपके चरण म ला
डालता ।ं ’’
इतना कहकर मेघनाद ने वम पहना, श धारण कए और यामकण सोलह
घोड़ के रथ म बैठे समूचे र बल का व - ूह रच, ध सा बजाता आ अमरावती क ओर
अ सर आ। रा स क इस महती वीरवािहनी को देखकर देवतागण घबरा गए। देवराट्
ने अपने पु जय त को मेघनाद से लोहा लेने को भेजा और पुर के सब राह-घाट पर अपने
धनुधर देव को स कया।
दोन ओर से रणवा बजते ही दोन सेनाएं िभड़ ग । जय त के संर ण म देव-
सै य ने मेघनाद पर भीषण हार करने आर भ कए। मेघनाद ने अनायास ही जय त के
सभी बाण को काट डाला तथा एकबारगी ही बाण के जाल से उसे ढांप दया। यह एक
अभूतपूव धानुयु था, िजसम एक ओर एकाक मेघनाद– - कं कर, िव ुत्- वाह क
भांित बाण-वषा कर रहा था, दूसरी ओर जय त देवराट् -सुत द रथ पर सवार, िजसम
वणाभरण पहने सोलह ेत अ जुते थे, अपना अमोघ लाघव दखा रहा था। देखते-ही-
देखते मेघनाद ने देव-सा रथ मातिल को बाण से छेद दया। उ र म जय त ने मेघनाद के
सारिथ वीर चूड़ामिण सारण को अि बाण से द ध कर दया। इस पर अित आवेिशत हो
मेघनाद ने मायाच रच यु भूिम म घोर अ धकार फै ला दया और फर चार ओर से
ास, मुशल, शति य के हार से देवकु ल को आतं कत कर दया। ऐसा अ भुत और
भयानक यु देख देव हाहाकर कर भागने लगे। कसी को भी अपने-पराये का ान न रहा।
यु का सारा म भंग हो गया।
अब मायावी मेघनाद जय त पर अ तक के समान हार करने लगा। जय त पर
घोर िवपि आई देख, उसके नाना भीम-िव म दानवे पुलोमा ने ूह म बलात् घुसकर
रथ पर से जय त को उठा िलया और उसे कांख म दबा, जल- त भनी िव ा ारा समु -
जल म घुसा। जब देव ने जय त के रथ को खाली तथा मातिल को मू छत देखा तो जय त
को मरा समझ रण थली से भाग िनकले।
इसी समय मातिल क मू छा भंग ई और वह रथ दौड़ाकर ाकु ल भाव से
देवराट् इ के पास प च ं ा। अपने पु को रण े से इस कार गायब सुन देवराट् इ
व ह त हो वयं रथ म बैठ यु थली म प च ं ा। शत-सह मेघ क गजना के समान
विनत उस रथ को हेम-पवत क भांित अबाध गित से आता देख रा स भय से चीखने-
िच लाने लगे। अब , वसु, आ द य और म ण इ क र ा करते ए उसे चार ओर
से घेरकर चले। यह देख रावण ने मेघनाद को यु से िवरत करके कहा–‘‘तू तिनक िव ाम
कर पु , तब तक म इस ा देवराट् को देख।ूं ’’ कु भकण रथ के आगे तथा शुक, सारण
दाय-बाय और भीम-परा म सुमाली दै य रावण क पृ -र ा पर स हो चले। चार
ओर रा स का कटक। ण-भर ही म घमासान मच गया। कु भकण को अपना-पराया
कु छ न सूझ पड़ता था। वह िजसको भी सामने पाता, अपने दांत , भुजा और लात से
मसल डालता। श हण करने का उसे िवचार ही न आता था। वह देव को बीच से चीर-
चीरकर इधर-उधर फकने लगा। उसका यह बीभ स काय देख देव ‘ ािह माम्– ािह माम्’
करने और इधर-उधर भागने लगे। अब परा मी मेघनाद से िभड़ गया। ने उसके
चार ओर से िलपटकर उसके अंग िवदीण कर डाले। उनम से र झरने लगा। उधर
म ण ने रा स को मार-मारकर िबछा दया। य -भूिम मर और अधमर से पट गई।
अनेक रा स अपने वाहन पर िगरकर मर गए। वहां र क नदी बह चली। उसम तैरती
ई लोथ जलचर-सी दखाई देने लग । आकाश म चील, िग और कौए उड़ने लगे। बड़ा
ही बीभ य दृ य उपि थत हो गया। रावण ने जब यह दशा देखी तो वह अपना रथ बढ़ाकर
इ को ललकारता तथा बाण क वषा करता आगे बढ़ा। इ ने भी धनुष को टंकारकर
शरसंधान कया। अब रावण और इ का ऐसा घनघोर यु आ क जैसा कसी ने न
देखा, न सुना होगा।
इसी समय मेघनाद ने माया रची। रण े म अ धकार छा गया। इ , रावण और
मेघनाद को छोड़ सम त वीर अ ध के समान आचरण करने लगे।
अब रावण ने ललकारकर सारिथ से कहा–‘‘अरे , मेरा रथ म य यु -भूिम म ले
चल, आज म इस आयवीयान् क देव-भूिम से देव का बीज नाश क ं गा। देव का वध
करने से मेरे कु ल क क त बढ़ेगी। चल-चल–उदय पवत क ओर चल!’’
रावण क इस आ ा को सुन सारिथ रथ को युि से व गित से चलाकर देव क
सेना को चीरता आ उसके म य भाग म जा प च ं ा। इस कार रावण को आते देख इ ने
िच लाकर कहा–‘‘इसे जीता पकड़ना चािहए। िजस कार हमने बिल को बांधकर
ि लोक का रा य पाया है, उसी कार इस दु वै वण को भी बांध लो।’’ यह कहकर इ
वहां से हट गया। आ द य, , वसु और म ण ने अब रावण को चार ओर से घेर िलया
और बाण से उसे ढांप दया। इस पर सब रा स जोर-जोर से िच लाने लगे और कहने
लगे–‘‘हाय-हाय, र े को इ ने ब दी बना िलया। अब कौन हमारी र ा करे गा?’’
अब ह त, महोदर, मारीच, महापा व, महादं , य कोप, दूषण, खर, ि िशरा,
दुमुख, अितकाय, देवा तक, नरा तक आ द रण-पि डत महारथी रा स भट सुमाली को
आगे कर दैव-सै य म धंस गए।
सुमाली ने यहां ऐसा समर कया क देव-सेना क सारी व था भंग हो गई। यह
देख व ा और पूषा दो आ द य सेना-सिहत सुमाली पर टू ट पड़े। इसी समय आठव वसु
सािव ने भी वसु को ले सुमाली को घेर िलया। अब च म ं ुखी यु होने लगा और
रा स क सेना कट-कटकर िगरने लगी। सुमाली और सािव म अब घनघोर यु होने
लगा। दोन ही वीर परम परा मी थे। व ा और पूषा धके लकर रा स के ह त, महोदर
आ द महारिथय को यु म फं साकर सुमाली से दूर ले गए। दो मु त के तुमुल सं ाम म
वसु सािव ने सुमाली का रथ तोड़ दया, घोड़ को मार डाला। यह देख य ही सुमाली
रथ से कू दा, य ही सािव वसु ने उछलकर कालद ड के समान भयंकर गदा कई बार
घुमाकर उसके म तक पर दे मारी। उसक चोट से सुमाली का म तक चूर-चूर हो गया और
सुमाली चुरमुर हो भूिम पर िगर गया। यह देख रा स म हाहाकार मच गया। रा स रोते
और बाल नोचते इधर-उधर भागने लगे।
सुमाली के वध से ु अि के समान जलता आ मेघनाद रथ पर बैठ िबजली क
भांित इ पर टू ट पड़ा। छू टते ही उसने शि का इ के व म हार कया। साथ ही दस
बाण से सारिथ मातिल और दस बाण से उसके घोड़ को ब ध डाला। फर उसने माया-
िव तार करके अ धकार कर दया। सब देव ाकु ल हो गए। तब मेघनाद िन शंक इ के
रथ पर चढ़ गया और उसे जकड़कर रि सय से बांध, पीठ पर उठा, गजना करता आ
रा स क सेना म लौट आया।
जब काश आ और देव ने इ को रथ पर नह देखा, तो वे बड़े घबराए। न उ ह
मेघनाद ही दखाई दया, न इ । उ ह ने खीझकर रावण पर च ड आ मण कया।
आ द य और वसुआ ने उस पर अिवरत हार कर उसे जजर कर दया। इसी समय अदृ
रह मेघनाद ने आकाशवाणी से पुकारा–“ हे िपता, अब यु का या योजन है, हम
िवजयी हो गए ह। ि लोक के वामी इ को हमने बंदी बना िलया है। अब इन ु
देवता को मारने से या लाभ है? चिलए, लंका को लौट चिलए और ि लोक का रा य
भोिगए।’’
मेघनाद क यह सारग भत आकाशवाणी सुन रावण सं ह षत हो गया।
आकाशवाणी सुन देवता भी घबरा गए। इसी समय ह त ने शंख फूं ककर संकेत कया और
सारण व गित से रथ को चलाकर रावण को यु -भूिम से बाहर ले चला। रावण के रथ
क वजा देखते ही रा स ने हष-नाद कया। रा स क सै य म िवजय-दु दुिभ बज उठी।
अपनी िवजय से ग वत रावण ने ह षत हो इ जयी पु को छाती से लगाकर
कहा–‘‘अरे पु , तू आज से ैलो य म इ िजत् के नाम से िव यात हो! तूने आज इ को
ब दी बनाकर हमारे कु ल ऐ य को बढ़ाया है। अब इ को लेकर अभी लंका को थान
कर। पीछे म भी आता ।ं ’’ इतना कह रावण ने उसी ण सुर ा के िलए ब त-सी सै य दे,
ब दी इ के साथ इ जयी मेघनाद को लंका भेज दया।
71. लंका क ओर

अब ह षत, तृ मनोरथ, अ ितरथ, च वत , ैलो य-िवजयी रावण लौटा। उसने


देवलोक से एक सह कु मा रकाएं हरण क । ग धवलोक प च ं िम ावसु ग धव क व दना
क , ि यतमा िच ांगदा को दय से लगाया। वहां से ि यतमा िच ांगदा को संग ले तथा
िम ावसु से ब त धन-उपानय ले, वह लंका क ओर चला। माग म नाग , य , मनु य ,
देव , दानव और राज षय के जो-जो जनपद पड़े, सभी म अपनी िवजय-वैजय ती
फहराता, अपनी र -सं कृ ित का डंका पीटता और जनपद क सु दरी क या का हरण
करता, िवरोिधय का वध कर उनके अवरोध क ब -बे टय को बलपूवक समेटता, अपने
पु पक िवमान पर बैठ, आगे बढ़ता चला गया। वे सब अप त बालाएं ची कार करत , दन
करती जा रही थ । उनके आंसू सूखते न थे। वे सब कशोराव था वाली बालाएं अपने
सौ दय से रित का दप दलन करने वाली थ । उनके ल बे-ल बे, काले-काले बाल और
सम त अंग अ य त ही कोमल और सुडौल थे। उनके मुख पू णमा के च के समान सु दर
थे। उनके उभरे उरोज, पतली कमर और लाव य को देख मन वश म नह रहता था। रावण
उ ह बला कार से हरकर लंका म ले जा रहा था। उ ह वह अपनी सब लूटी ई संपदा से
बढ़कर समझता था। िजस कार संह के चंगुल म फं सी ह रणी तड़पती है, उसी कार वे
सब बालाएं ाकु ल हो रही थ । वे अपने पितय , माता-िपता और प रजन से बलात्
पृथक् करके हरण क गई थ । िज ह देख-देखकर रावण कामिव वल हो रहा था और वे
सब कु करी क भांित ाकु ल हो दन करती जा रही थ ।
अ त म वह लंका प च ं ा। िवजय-डंका बजाते ए उसने लंका म वेश कया।
नगरिनवािसय ने उसका जय-जयकार कया।
अ त म, जब म दोदरी ने आगे बढ़कर उसका अ य-पा से स कार कया, तब
िच ांगदा को आगे कर उसने कहा–“ि ये म दोदरी, यह तेरी अनुगता ग धवकु मारी
मिहषी िच ांगदा उपि थत है। तुम दोन क सेवा के िलए ये दस सह कु लीन कु मा रकाएं
ह, जो देव, दै य, नाग, मानव, आनव, सभी स ा त कु ल क ह।
लंका म घर-घर आन द-मंगल होने लगा, दीपावली ई। नृ य-पान-गो ी ई।
रावण के मिणह य म वण, र लुटाए गए। राजमिहषी म दोदरी और िच ांगदा ने
िविवध मंगल-अनु ान कए। पशु क बिल दी गई। य ए और बड़े-बड़े पान महो सव
ए। इस समय लंका आन द और उ लास के झूले म झूलने लगी।
72. रं ग म भंग

अभी लंका म िवजयो सव, पान-गोि यां, नृ य-िवलास, दीपाविलयां हो ही रही


थ क अक मात् रं ग म भंग हो गया, िजससे सारी लंका म िवषाद और ोध क भावना
फै ल गई। नाच-रं ग, पान गोि यां तुर त रोक दी ग । नगर और मिणमहल, सव ही शोक
छा गया।
कोई एक तप वी-बिह कृ त-रा य युत आय राजकु मार द डकार य म आए ह, जो
धनुष-बाण धारण करते ह। उससे द डकार य क रानी सूपनखा का िव ह हो गया है।
उ ह ने धृ तापूवक रा स-राजनि दनी सूपनखा का अंग-भंग कर दया है, उसक नाक
काट ली है और जन थान के र क चौदह हजार रा स को खर-दूषण सिहत मार डाला
है। अब सूपनखा रोती-कलपती, िवलाप करती लंका म र े रावण क शरणाप ई है।
ि लोक पित िव िवजयी रावण ि य बहन का यह भयानक अिभयोग सुन ोध और शोक
से जड़ हो गया है। इस भयानक अपमान का वह उन तप वी राजकु मार को या द ड दे,
यही वह िनणय नह कर पा रहा है। वह अपने मिणमहालय म पड़ा ल बी उसास ले रहा
है।
जग यी महातेज रावण अपने मिणमहालय के सतख डे क छत पर वण-
संहासन पर अित उि बैठा था। देव के यु म उसके अंग पर जो व - हार ए थे,
उसक चोट अभी उसके शरीर पर ताजा थ ।
इ के ऐरावत ने अपने जो दांत उसक छाती म गड़ा दए थे, उनके िच न अभी
भी उसके व पर थे। वह राजोिचत व ाभरण से सि त, सु दरी ता बूल-वािहिनय ,
चंवरधा रिणय , सािधका से प रवृत मूत िहमशैल-जैसा दीख रहा था। ब दीजन
उसका तुितगान कर रहे थे और सब म ी और राजवग पु ष हाथ बांध अधोमुख दीन
भाव से उसके स मुख बैठे थे।
अब उसक बहन सूपनखा उसके स मुख खड़ी हो कहने लगी–
‘‘भाई, मेरी इस दुदशा को देख। तू अिभताभ य द इसे सहन करे गा तो तू भी उस
िन कािसत के हाथ अछू ता न बचा रहेगा।”
रावण ने िवप बहन को िख ने से देखा, फर कहा–
‘‘बहन, धैय रख, रावण को ु करके यमराज भी सुख से नह जी सकता। तू
िव तार से उस आय राजपु का बखान कर। या वह स पूण देवता और यम, कु बेर,
द पाल -सिहत जन थान म आया है?’’
‘‘वह दाशरिथ राम कहाता है। उसके साथ उसक प ी सीता और एक भाई है।
उसने मुिन का वेश धारण कया है, पर तु है वह धनुधारी और च ड यो ा। उसने अके ले
ही बात क बात म खर-दूषण-सिहत हमारे चौदह हजार रा स को मार डाला है।’’
‘‘दाशरिथ राम! याम गात, सघन कृ ण काकप , िवशाल व , ल ब-बा ?”
‘‘वही है, वही है, उसके कं धे बैल के समान पु ह। भुजाएं गोल और घुटन तक
ल बी ह, सुदशना कमनीय काि त है। उसे द ा का महा ान है।’’
‘‘तो उसके साथ सीता भी वह है–सीर वज क अयोिनजा वीयशु का?’’ रावण के
ने म जनकपुरी के य के धानुभग का िच घूम गया। उसने कहा–‘‘वह ी च पकवण ,
भी और अित कोमलका त- भा है न!’’
‘‘ऐसा ही है। या तूने उसे देखा है?’’
‘‘ऐसा ही म समझता ,ं दाशरिथ राम ही है वह, पर तु वह रा य –
राजबिह कृ त हो, द डकार य म कै से घूम रहा है?’’
‘‘िपता क आ ा से।’’
‘‘ या एकाक ही?’’
‘‘बस, वह, ी और भाई, तीन ही ह।’’
‘‘तीन ही ने मेरी बल रा स-सेना को मार डाला–खर को भी, दूषण को भी!
बड़े आ य क बात है!’’
‘‘चम कार ही कहना चािहए।’’
‘‘कदािचत्। उसका एक चम कार मने देखा है–ऐसा मुझे मरण होता है। पर तु
यह िव ह आ य ?’’
‘‘अकारण ही भाई, मुझे सूचना िमली–वहां जन थान म एक नया त ण तप वी
आया है और एक नया आ म बनाकर रहने लगा है। तेरा आदेश था क ऐसा न होने दया
जाए। सो म वयं ही उसे देखने गई। वहां मने उसे देवता के समान पवान पाया।
उसका मुख तेज वी, भुजाएं िवशाल और ने कमल के समान थे।’’
‘‘ठीक है, वही है!’’
‘‘उसे देख म सकामा हो गई। मने उससे पूछा–हे सु दर पु ष तप वी के वेश म
िसर पर जटा धारण कए और संग म ी िलए, धनुष-बाण से सुशोिभत, तू कौन है और
यहां मेरे इस जन थान म कस योजन से आ बसा है?’’
‘‘इस कथन म तो कोई दोष नह था।’’
‘‘तब उस पु ष ने कहा–सु दरी, म परा मी महा मा दशरथ का पु राम ,ं मेरे
साथ मेरी पित ता प ी सीता और आ ाकारी भाई ल मण है। हम लोग माता-िपता क
आ ा से े रत हो धम-पालनाथ यहां द डक वन म िनवास करने आए ह। अब तुम भी
अपना प रचय दो।’’
उस पु ष के वचन सुनकर मने कहा–‘‘म िव वा मुिन के पु रावण ि लोकपित
क बहन सूपनखा ।ं बल कु भकण और धमा मा िवभीषण मेरे भाई ह। इस द डकार य
क वािमनी म ही ।ं ’’
‘‘ठीक कहा।’’
‘‘तब उस पु ष ने कहा–जानकर स आ। अब यहां आने का कारण कहो!’’
‘‘तब मने अपना अिभ ाय उससे कहा क म िति त र वंश क राजपु ी ;ं तुझ
पर मेरा काम-भाव है, तू मुझे प ी-भाव से हण कर। मेरा बल अ मेय है, मेरा भाई
ि लोकपित है, मुझसे संबंध करके तू सु ित होगा।’’
‘‘ठीक कहा, ठीक कहा!’’
‘‘पर तु उस पु ष ने कहा–मेरी प ी मेरे साथ मौजूद है और तुझ जैसी सुल ण
और वाधीनभतृका के िलए सौत का होना दुःख का कारण हो सकता है।’’
‘‘उस पु ष ने ठीक ही कहा।’’
‘‘पर तु मने कहा–इस मानुषी ी का या? इसे तो म अभी मारकर खा जाऊंगी,
फर तू और म साथ-साथ वन, पवत-िशखर म व छ द िवचरण करगे।’’
‘‘इसम अनुिचत या था?’’
‘‘पर उस पु ष ने कहा–इससे अ छा तो यह होगा क यह मेरा छोटा भाई ल मण
है। इसके साथ ी नह है, तू इसी से िववाह कर ले। इसके साथ तुझे सौत का डर भी नह
है।...मने देखा क वह पु ष भी कमनीय है। मने उसके िनकट जाकर उससे कहा–अरे पु ष,
तू भी मेरे ही समान पवान है, गुणवान् है, मुझे तेरी भाया बनना वीकार है।’’
‘‘तूने उस पर अनु ह ही कया।’’
‘‘पर तु उसने कहा–म तो दास ।ं मेरी भाया बनकर तो तुझे दासी ही बनना
पड़ेगा।’’
‘‘तेरा अनु ह उसने अ वीकार कया?’’
‘‘इस पर मुझे ोध आ गया और मने कहा–इस मानुषी ी के ऊपर तुम लोग मेरा
ितर कार करते हो! मुझसे ठ ा करते हो! ठहरो, म अभी इसे खा डालती ।ं जब म उस ी
पर झपटी तो उस दाशरिथ के संकेत से उसके दु भाई ने पकड़कर िनल तापूवक मेरा
अंग-भंग कर दया–मेरी नाक काट डाली।’’
‘‘अ य है, क तु तू शेष कथा कह।’’
“अंग-भंग हो मुख से र बहाती म खर के पास प च ं ी और तुर त ही मू छत हो
गई।’’
‘‘अस है, म इसका ितकार क ं गा।’’
‘‘मेरी यह दशा देख, खर ने कहा–अरे , यह या आ? कस दु ने तेरी यह दुदशा
कर डाली? कह, कस मूख को अपने ाण भारी ह? देवता का वामी देवराट् इ िजस
र े रावण का ब दी है, उसक बहन के साथ यह धृ अनाचार कसने कर डाला? देव ,
ग धव और तपि वय म ऐसा कौन परा मी आ गया, िजसने तेरी यह दुदशा कर दी?
आज मेरे ाणा तक बाण उस अपराधी का ाण हरण करगे। कह-कह, बहन, आज पृ वी
कसका िधर पान करे गी? आज मेरे हाथ से उस अपराधी को देवता, ग धव और रा स
कोई नह बचा सकता। हमारी ही इस भूिम म कसने तुझे पराभूत कया? होश म आ और
उस पािप का नाम मुझे बता।’’
‘‘समीचीन कहा खर ने।’’
‘‘तब मने रोते-कलपते उसे सब घटना आ ोपा त बता दी। यह भी कह दया क
म नह जानती क वे मनु य ह क देव या ग धव, पर तु मेरी आकां ा है क िजस पु ष ने
मेरी यह दशा क है म उसका दय-भ ण क ं गी। सो वीर, तुम अभी मेरी यह इ छा पूण
करो।
‘‘मेरी यह बात सुनकर खर ने अपने महाबली चौदह भट को आदेश दया क
जाओ, देखो, इस द डक वन म कृ ण मृग-चम धारण कए श -सि त दो पु ष आए ह,
उनके साथ एक ी भी है। तुम जाकर उन दोन पु ष को मार डालो और उनका दय
िनकाल लाओ। हमारी बहन सूपनखा उसका भ ण करे गी। उस ी को जीता पकड़ लो,
हम उसे र राज को भट करगे।
‘‘सो भाई, चौदह रा स-भट श सि त हो जब पंचवटी प च ं ,े तो शूल, कृ पाण,
शि लेकर राम पर टू ट पड़े, पर तु उस मायावी पु ष ने बात क बात म उन भट को मार
िगराया। यह सुनकर खर ु हो चौदह सह रा स क स पूण सेना लेकर चला और
ी-सिहत उन तीन को घेर िलया। पर भाई, वे तो इस भयानक सै य से भी िवचिलत नह
ए। हे भाई, जब महावीर, खर अपने धनुष और बाण का भार अपने देदी यमान रथ पर
रख, उ म गध को उसम जोत, रा सवािहनी को लेकर चला, तो दशा म अंधकार छा
गया। रा स क गजना से वन-पवत क पायमान हो गए, धूल के बादल ने सूय को िछपा
िलया। पर तु उस समय बड़े-बड़े अपशकु न ए। रा स पर अमंगलसूचक र -िमि त जल
क वषा ई। खर के रथ म जुते गधे दौड़ते-दौड़ते अक मात् िगर पड़े। रथ क वण- वजा
पर एक िग आ बैठा। सेना के सामने मांसाहारी पशु, प ी अनेकिवध डरावने श द करने
लगे। ाची दशा म शृगाल रोने लगे, सूय-म डल के चार ओर गोलाकार घेरा दखाई
पड़ने लगा। ऐसा तीत होता था, मानो िबना अमाव या के आज सूय को के तु ने स िलया
है। पर तु इन उ पात को देखकर भी खर डरा नह । उसने कहा–चाहे जो हो, म अपनी
ि य बहन सूपनखा को इन श ु का ि प ड अव य खाने को दूग ं ा। इस कार खर-दूषण
सिहत चौदह सह रा स ने राम का आ म घेर िलया। जब उन तपि वय ने रा स के
इस दल-बादल को आते देखा, तो उ ह ने र ा और यु क त काल व था कर ली।
छोटा तप वी तो उस ी को िग र-गुहा म बैठाकर, गुहा- ार पर धनुष-संधान करके बैठ
गया और बड़ा रा स के स मुख आ धनुष टंकारने लगा। खर ने जब यह देखा तो उसने
सारिथ से कहा–हमारा रथ इस हतायु पु ष के स मुख ले चल। जब उस पु ष ने खर के रथ
को अपनी ओर आते देखा, तो पैने बाण छोड़कर रथ के गध को तुर त मार िगराया। अब
तो खर दूसरे रथ पर चढ़कर बाणवषा करने लगा। रा स क सै य ने भी उसे चार ओर से
घेरकर बाण से पाट दया, पर तु वह तो अ भुत कौशल और फु त से चार ओर घूम-
घूमकर द ा से रा स का हनन करने लगा। सेना के साथ मने वयं रहकर उसका यह
चम कार देखा। अब म तुमसे या क –ं भाई, रा स के छोड़े ए श उस पु ष म इस
कार लय हो जाते थे, िजस कार न दयां समु म लय हो जाती ह। उसके शरीर से र
क धारा बह रही थी, पर तु उसने कालपाश क भांित िजन बाण क वषा क , वे सब
अि के समान वल त थे। उनसे बंध- बंधकर रा स र म लथ-पथ हो भूिम पर लोटते
चले गए। इस कार दो हर के यु म उस एकाक पु ष ने सब रा स को काट डाला।
ब त-से रा स िच लाते ए भाग खड़े ए। ब त-से पाश, प थर, गोफ, मु र ले उस पर
िपल पड़े। पर जब उस पु ष ने तेज वी ग धव-अ का योग कया, तो चार ओर आग
ही आग फै ल गई। उस समय यु - े म चार ओर लोथ ही लोथ दीख रही थ । खर का
रथ भंग हो गया, वजा टू ट गई, गधे मर गए। तब खर-दूषण बचे ए रा स-भट को
समेट, दल बांध, फर यु करने लगे। इस समय प रघ उठा, दूषण ने िवकट परा म
दखाया।
‘‘वह प रघ बड़ा िवकराल था। उससे उसने अनेक श ु के नगर के फाटक तोड़े
थे। वह उस भयंकर लोहे क क ल वाले प रघ को लेकर य ही झपटा, उस पु ष ने दस
बाण उसके मुख म मारे , जो उसके हलक को चीरकर ा ड के पार हो गए। फर फु त से
उसने उसके दोन हाथ काट िलए तथा ने भी फोड़ दए। दूषण वह भूिम पर िगरकर
छटपटाने लगा। इसके बाद महाकाल, थूला , माथी आ द महारथी भट को लेकर खर
आगे बढ़ा। कसी ने प श उठाया, कसी ने परशु, कसी ने गदा। खर ने धनुष िलया। पर
उस तेज वी ने क णक बाण से सभी को ब ध डाला। वे सभी भट झूम-झूमकर ाण यागने
लगे। इस कार देखते-ही-देखते रा स क सारी सेना कट गई। जो शेष बचे, वे भाग खड़े
ए। के वल दो ही वीर मुद से पटे रण- े म रह गए–ि िशरा और खर। पर तु इन दोन
वीर को भी राम ने देखते-देखते धराशायी कर दया। उस परा मी राजकु मार ने उनके
हाथ-पैर काट डाले।
‘‘इस कार जन थान रा स से रिहत हो गया। हमारा सा ा य भंग हो गया।
भाई, यु - े ही म घाव और र से भरे ए उस तप वी राजकु मार का शरभंग, अग य
आ द तपि वय ने अिभन दन कया। म तो खीझ के मारे मर गई। मेरा जीवन िध ार के
यो य हो गया। तूने जब मेरे पित का वध कया था, उस अस दुःख को न सहकर मने
िचतारोहण करना चाहा था। उस समय तूने मुझे उस काम से रोक दया था। पर तु भाई,
अब य द तू मेरा ि य न करे गा, अंग-भंग करने वाले उस रा य- राजकु मार को मारकर
उसका ख ड मुझे लाकर खाने को न देगा तो म अब अपने ाण नह रखूंगी। अि म
जलकर मर जाऊंगी।
‘‘अरे भाई, तू तो लोक म ि िव म िस है। तूने तीन लोक को जय कया है।
अरे , यम और कु बेर को तूने आ ा त कया, इ को ब दी बनाया, पृ वी पर तेरा सा मु य
करने वाला वीर कौन है? फर इस दु तप वी वनवासी पु ष ने मेरा अंग-भंग कया है। म
तो उससे िववाह कर उसे िति त करना चाह रही थी। म ि लोक पित रावण, अजेय
कु भकण क बहन, इ िजत् मेघनाद क बुआ, आज ऐसी िवप ाव था को प च ं गई! अरे
भाई, जब तक तू उस तप वी कु कम को मार उसका ख ड मुझे खाने को नह देता और
उसक उस मानुषी ी का हरण कर उसे अपनी दासी नह बनाता, तब तक तेरा
ि लोक पित होने का द भ के वल िवड बना है–और यह तो ुव समझ क रा स का अब
अ त ही आ गया है। आज नह तो कल, रा स का अब पराभव ही होगा।’’
मि य के सम बहन सूपनखा के ऐसे ममा तक वचन सुनकर र े रावण
व -गजना कर उठा। उसने कहा—‘‘म अि को भी भ म कर सकता ।ं सूय के काश को
भी बुझा सकता ।ं मृ यु मेरे भय से कांपती है। सो मेरे रहते उस ु मनु य ने तेरी ऐसी
दुदशा कर डाली! महाबली खर, दूषण और ि िशरा सिहत मेरे चौदह सह रा स को
उसने अके ले ही मार डाला! यह तो उस चम कार से भी बढ़कर है, जो मने जनकपुर म देखा
था। पर तु मने तो उसे िनपट बालक ही समझकर छोड़ दया था। म ऐसा जानता तो वह
सब नृपितय के स मुख उसे मारकर वह ी छीन लाता।’’ कु छ ठहरकर फर रावण ने
कहा–‘‘सूपनखा, तू िवषाद न कर, म अभी जन थान जाता ।ं उस पु ष का ख ड तुझे
खाने को और गम र पीने को दूग ं ा, िच ता न कर!’’
इस पर अक पन ने ब ांजिल होकर कहा–
‘‘र े स ह । आ ा पाऊं तो िनवेदन क ं । उस बिह कृ त राजकु मार के साथ
जो ी है, वह िव क अिन सु दरी है। अभी उसने यौवन क देहरी म पैर ही रखा है।
उसके सब अंग- यंग सुघड़ और सलोने ह। वह संसार क सब ि य म अमू य र है। हे
महाराज, उस शीलवती क सुषमा का म कहां तक बखान क ं ? सो मुझ दास का तो
िनवेदन है क आप छल-बल से उस रमणीय रमणी को हरण कर लाइए। इससे बहन
सूपनखा का बदला भी चुक जाएगा और वह हतभा य तप वी मानव-कु मार उसके िवयोग
म रो-रोकर आप ही मर-खप जाएगा।’’
म ी अक पन क यह युि रावण को जंच गई। धनुय म रावण ने सीता क जो
ल ािवन कमनीय काि त देखी थी, वह उसके मन म बसी ही थी। उसने संतु होकर
कहा–‘‘ऐसा ही होगा। मेरा रथ तैयार करो। भात होते ही म जन थान को जाऊंगा।’’
73. सुभ वट

धनु को ट के िनकट, समु -तीर से कु छ हटकर एक रमणीय वन था। वन म एक


िनमल सरोवर था। सरोवर के तट पर एक िवराट् सुभ वट था। इस सुभ वट क चार सौ
शाखाएं थ तथा इसका िव तार सात योजन भूिम पर था। यह वट ब त ाचीन था।
िस था क इसी के नीचे बालिख य ऋिषय ने तप कया था। ब त दन यहां ग डे़ ने
िवलास कया था। वट के चार ओर र य पवत ेिणयां थ । स मुख ही नील नीरिध का
अन त िव तार था। िजस भूिम-भाग पर यह मनोरम सरोवर और महावट था, वह ब त
दूर तक समु म धंसा आ था। समु के तट को छू ती ई अनेक पवत- ृंखलाएं थ । चार
ओर तमाल के पु प िखले थे। गोल िमच क लताएं जहां-तहां सुशोिभत थ । पवत- ेिणय
के आस-पास ढेर मोती, सीप सूख रहे थे। मूंग के भी वहां ढेर लगे थे। थान- थान पर
व छ जल के झरने ने को आन द दे रहे थे। िनकट ही पुर एवं नगर था। नगर बड़ा
स प था, उसके नाग रक हािथय , घोड़ , रथ आ द पर सवार हो अपने काम से
राजपथ पर आ-जा रहे थे। सब िमलाकर इस थान क शोभा अतुलनीय थी।
सुभ वट क ित ा तो ब त पुरानी थी ही, पर तु इस समय यहां पर परम ानी
और वीतराग तप वी तप कर रहा था। वह सब एषणा से रिहत, एका तवासी हो, मूक-
मौन सवभूत-दयारत िनरीह भाव से रहता था। वा तव म वह वृ तप वी था। दूर-दूर तक
उसक याित थी और लोग उसे राज ष क भांित सुपूिजत मानते थे। िस था क वह
कोई महान राजा था। वा तव म वह वृ तप वी और कोई नह , रा स मारीच था।
नैिमषार य के अिभयान के बाद रावण के जग यी हो जाने पर उसने सब भांित कम-
सं यास ले िलया था और वह बड़े िनरीह भाव से वहां रहता था।
अक मात् रावण ने इस शा त आ म म वेश कया। उसके वण-रथ क
घि टकाएं कं किणत होती ई दशा को ित विनत करने लग । रथ का घोष सुन,
जटाजूट और व कल-वसन पहने वृ मारीच गुहा से बाहर आया और उसने सुभ वट के
नीचे रा सराज रावण क अ यथना क । मारीच के साथ आ म म और ब त नाग, दै य,
रा स तप वी रहते थे। वे ब त अ प भोजन करते, धमाचरण म रत रहते तथा वेदा ययन
करते थे। वे सब भी आ म क ि य , तपि विनय सिहत र े रावण क अ यथना को
एक हो गए।
मारीच ने अपने साथी तप वी रा स और वेदपाठी दै य , नाग-कु मार के साथ
रावण क भारी अ यथना क । अलौ कक भोग-सामि य ारा राजा का िविधवत् पूजन
कया। अ -जल से स कार कया। फर मारीच ने व थ होने पर पूछा–‘‘हे रा सराज,
लंका म कु शल तो है! यहां कस अिभ ाय से आना आ? या मुझ अ कं चन दास से कु छ
योजन आ उपि थत आ? वह सब िव तार से किहए।’’
रावण ने चतुराई से मारीच क शंसा करते ए कहा–‘‘तात मारीच, म तुमसे
या क ?ं म इस समय अ य त दुःखी ।ं तु ह ात है, जन थान म खर, दूषण और
ि िशरा के साथ सूपनखा हमारी बहन रहती थी। वहां कोई बिह कृ त मानव दाशरिथ राम
अपनी भाया और भाई सिहत आया है। उसने मेरे सब रा स का खर, दूषण सिहत वध
कर डाला तथा सूपनखा का अंग-भंग कर उसे िव प कर दया है। यह वही दाशरिथ राम
तीत होता है, िजसे मने जनकपुर म देखा था। उसी ने तु ह नैिमषार य से वंिचत कया।
तु हारा भी वह िचरश ु है। अब सुना है क उसके िपता ने उसे प ी-सिहत अपने रा य से
िनकाल बाहर कया है, इससे अब वह िवप और असहाय है। पर उसने मेरी सेना का
संहार कया है। उसने पु ष-मयादा के िवपरीत कामािभलािषणी सूपनखा का अंग-भंग
करके उसे अप प कर दया है। इसिलए म भी बदला लेने के िवचार से उसक देवबाला-
सी सु पा-सुल णा ी को चुपचाप चुरा ले जाने का मनोरथ करके िनकला ।ं अब तुम
इस काम म मेरी सहायता करो। परा म म, िवरोध म और बदला लेने म तु हारे समान
पृ वी पर कोई नह है। तु हारे अके ले के पास रहने पर म देव, ग धव कसी को कु छ नह
िगनता। तुम बुि मान् भी ब त हो। नाना कार के उपाय सोचने म तु ह भला कौन पा
सकता है! इसिलए तात मारीच, म तु हारे पास आया ।ं मने एक उ म योजना बनाई है
क तुम वण-मृग का प धारण कर उस हतभा य तप वी क ी क दृि म आओ। वह
ज र ही अपने पित से मृग को पकड़ लाने को कहेगी। बस, दोन भाई मृग का पीछा करगे।
उ ह तुम भटकाकर जरा दूर ले जाना। इसी बीच म अवसर पाकर उस ी को चुराकर चल
दूग
ं ा। फर तो दाशरिथ राम उसके िवयोग म दुःखी होकर दुबल हो जाएगा। तब म सहज
ही उसे मार डालूंगा।’’
रावण क इन बात को सुनकर वृ मारीच भयभीत हो रावण के मुख क ओर
ताकने लगा। उसका क ठ सूख गया, उसके मुंह से बात न िनकली। फर उसने न तापूवक
रावण से कहा–‘‘हे र े , अभी आपने उस राम को पहचाना नह है, तभी आप ऐसा कहते
ह। संसार म ि य वचन बोलने वाले ब त ह, पर तु अि य स य बोलने वाले िवरले ही होते
ह। खेद है क आप ऐसे तेज वी राजा होकर भी गु चर नह रखते। आप वयं चंचल और
अि थर िच भी ह। इसी से राम के िव म से बेखबर ह। इसी से यह दुबुि आपको सूझी
है। कह जनकनि दनी सीता आपके िलए काल होकर तो नह ज मी है, जो आपने ऐसा
िवचार कया? िन य जािनए क य द आपने ऐसा कया, तो आपक लंकापुरी, जो वण,
धन और वैभव म अमरावती से बढ़-चढ़कर है, िम ी म िमल जाएगी। सो राजन्, म आपके
िहत क बात कहता ं क आप आग को प ले म मत बांिधए। चुपचाप लंका लौटकर
धमपूवक जा का पालन क िजए।
‘‘आप मेरा ही उदाहरण लीिजए। अपने बल-िव म का मुझे भी कभी गव था। तब
म पवताकार शरीर धारण कए पृ वी पर िवचरण करता था। मुझम दस हािथय का बल
था। मेरे ही भय से िव ािम दाशरिथ राम को नैिमषार य लाए थे। उस समय तो उसक
कशोराव था थी–अभी तक म उस एक व धारी सांवले-से त ण को, िजसक बड़ी-बड़ी
आंख थ , नह भूला ।ं उसक शोभा नवो दत बालच के समान थी। मुझे तो यह अहंकार
था क मुझे देवता भी नह मार सकते। फर इस दाशरिथ को भला या समझता? मने इसे
बड़ी ही उपे ा से देखा, पर इसने जो बाण मुझे मारा, उसके वेग से अचेत होकर म एक
योजन दूर फका जाकर अथाह जल म जा िगरा। उसने मुझे मारना ही नह चाहा, इसी से
म मरा नह । इससे मेरी आपको यह सीख है क उस पु ष से वैर मत बढ़ाइए। उसका
पु षाथ तो आप जनकपुर म देख ही चुके ह। िजसने खर-दूषण जैसे रा स , महारिथय के
साथ चौदह सह रा स-भट को मार डाला, उसके िव म म अब या स देह रहा? सो
आप य द इस पु ष से वैर बढ़ाएंग,े तो बैठे-ठाले आपि म ही फं सगे और अ त म घोर
प र म से पाई ित ा तथा स भवतः ाण से भी हाथ धो बैठगे। र े , अब और पराई
ी का लोभ न क िजए। आपके अवरोध म अनिगनत ि यां ह, उ ह पर संतोष क िजए
और रा स क िजसम ीवृि हो तथा रा स क मान- ित ा बढ़े, वही क िजए। म
आपका शुभिच तक ,ं इससे यह भली सीख दे रहा ।ं ’’
मारीच के ये वचन सुनकर रावण ने ु होकर कहा–‘‘अरे रा सकु ल-कलंक,
कायर, तू मुझे उस पितत एकाक बिह कृ त राम दाशरिथ से भयभीत करता है। म अव य
उसक ी का हरण क ं गा। मने तुझसे स मित नह मांगी–अब तू मेरा सिचव नह है।
या तू इतना भी नह समझता क राजा के पूछने पर ही अपना अिभ ाय कट करना
चािहए? चतुर राजपु ष तो वह है जो राजा के स मुख सदा अनुकूल, मधुर, उ म,
िहतकारी भाषण करे । राजा क बात को काटकर िहतकारी बात भी आ ेपयु भाषा म
कही जाए तो वह राजा को मा य नह होती। या तू नह जानता क राजा म अि और
भय का-सा तेज रहता है! इसिलए उसम परा म, साम, भेद, द ड और साद सदा
िव मान रहते ह। इसी से सदैव राजा का स मान और पूजन करना चािहए। क तु तू यह
म ी-धम भी भूल गया! म राजा ,ं तेरा अितिथ ,ं यह भी िवचार तूने नह कया तथा
कठोर बात कह गया! अरे , म तुझसे अपने कत के गुण-दोष नह पूछ रहा, के वल
सहायता चाहता ।ं तुझे कस कार मेरी सहायता करनी होगी, वह भी सुन। तू वण का
मृग बनकर राम के आ म म इस कार िवचरण कर क वह ी तुझे देख ले, वह वण का
िविच मृग देख अव य कौतूहलवश हो, उस मृग को लाने को अपने पित से कहेगी और
जब वह आ म से तेरा पीछा करे गा, तब तू उसे दूर ले जाना। बस, म अपना काम इसी
बीच बना लूंगा। मेरा इतना काम करके तू जहां चाहे चला जाना। म तुझे यथे पुर कार
दूग
ं ा। य द तू मेरी आ ा का पालन न करे गा तो म अव य तेरा वध क ं गा।’’
रावण के ये ोधपूण वचन सुनकर मारीच ने कहा–‘‘म बूढ़ा आ और अब तप वी
का जीवन तीत करता ।ं इन पंच से भला मेरा या स ब ध है! खेद है क आपके
म ी आपको अ छी सीख नह देते और आपक बुि भी मोह ने कुं ठत कर दी है। इस
काम म मेरी तो िन य ही मृ यु है, पर तु आप य द सीता का हरण करने म सफल भी हो
गए तो न आप बचगे, न आपक लंका। आपक सारी ही ी-स पदा चली जाएगी। आपक
थािपत र -सं कृ ित क भी समाि हो जाएगी। पर तु अब इन बात से या? आप यह
घोर कम करने पर तुले ही बैठै ह तो चिलए, मेरे ारा आपका कोई ि य काय हो तो म
ाण देकर भी क ं गा।’’
मारीच के ये वचन सुन रावण स हो गया। उसने कहा–‘‘यही उिचत है। अब
तुम मेरे साथ इस र ज टत रथ पर बैठ जाओ। मेरा यह काय करने पर तुम व छ द हो
तप वी-जीवन तीत करना। म सदैव तु हारी र ा क ं गा।’’ इतना कह रावण मारीच
को रथ पर बैठा द डकार य क ओर चल दया।
74. र –कू ट ीप

सुभ वट कानन म मारीच रा स का िम शबर का राजा पुिल दक रहता था।


पु लंदक जल-द युता का धंधा करता था। उसके ब त-से सेवक धनुष-बाण िलए समु म
आते-जाते जलयान को लूट लेते तथा लूटे ए वण-र अपने वामी पुिल दक के चरण
म ला धरते थे। इस कार लूटे धन से वह अ य त स प और धनी हो गया था। उसका रं ग
एकदम काला, ने लाल तथा अंग पर बड़े-बड़े बाल थे। उसक भ ह ब त मोटी, मूंछ कड़ी
तथा दांत तेज थे। वह शरीर से एक सांड़ के समान बलवान् था। उसके सेवक शबर लोग भी
बड़े ू र और साहसी थे। द यु-वृि म वे परम चतुर थे। उनके भय से बड़े-बड़े वाहक भी
समु म िन व या ा करने का साहस नह कर सकते थे।
िव ाधर का राजा उदयवधन पुिल दक का िम था। उदयवधन भी बड़ा स प
और धनी था। धनु को ट के िनकट ही उसका नगर था। जहां वह बड़े ठाठ से अपनी सु दर
रमिणय के साथ आन द-िवहार करता था, इन दोन पु ष क िम ता क कहानी भी
बड़ी अ भुत है। एक बार उदयवधन मृगया के िलए वन म गया था। वहां शबर ने उसे
घेरकर लूट िलया और उसे बांधकर िश देव के स मुख बिल देने को ले आए। पर जब उसे
यूप म बांध वे उसका वध करने लगे, तभी पुिल दक आ गया तथा राजा का कमनीय गौर
वण, अ प वय देख तथा उसका प रचय पाकर उसने उसे मु कर दया तथा अि क
सा ी म िम ता भी कर ली। पुिल दक से िम ता थािपत कर राजा उदयवधन अपनी
नगरी म चला आया। पुिल दक ने उसे ब त-से ब मू य गजमु ा और क तूरी
उपहार व प दए। पर तु संयोग क बात ऐसी ई क कु छ काल बाद पुिल दक को द यु-
वृि करने के अपराध म राजा उदयवधन के सेवक ने पकड़ा। नगर-पाल ने उसे शूली पर
चढ़ाने क आ ा दे दी। पर तु जब राजा ने यह सुना तो उसने कट म तो उस चोर को िम
नह कया, पर तु चुपचाप छ नाम से एक लाख वण-उ कोच देकर उसे भगा
दया। पुिल दक ने इसका बड़ा आभार माना और वह िव ाधर के उस राजा को
कृ त ता व प कोई मू यवान् उपहार देने क सोचने लगा।
उ ह दन सुभ वट के िनकट ही एक िग र-क दरा म िवकट कृ या रहती थी।
उस कृ या का भाव और साम य दूर-दूर तक फै ला आ था। वह नर-मांस ही भ ण
करती तथा िन य नर-बिल देती थी। सब लोग उसे सव-िसि दा ी समझते थे और जब वह
नर-मांस क आ ित अि म डालकर ‘कं दपयािम’, ‘कं दपयािम’ का उ ोष करती थी, तब
अथ गण ब ांजिल अपने-अपने अिभ ाय िनवेदन करते तथा मनोरथ पूण करते थे।
पुिल दक इस कृ या का अन योपासक था। ितमास अमाव या के दन वह एक
सु दर बिल अव य ही कृ या को भेजता था। इसम उसे कु छ क और असुिवधा नह होती
थी। उसके सेवक द यु शबर इधर-उधर लूटमार कर ब त पु ष को पकड़ लाते थे। वह
उ ह म एक सु दर त ण पु ष को व ाभूषण से अलंकृत कर च दनच चत कर र मधूक-
पु पमाल पहना कृ या क सेवा म भेज देता था। इस कार अल य बिल-पु ष को पा कृ या
अित संतु हो थम उस बिल-पु ष के साथ म पान कर रितिवलास करती, फर उसक
बिल िश देव को दे उसका उ ण र पान कर स होती तथा बिल-मांस का ही भोजन
करती थी।
इस कार कृ या को पु लंदक ने अपने वशीभूत कर रखा था। अब उदयवधन के
अनु ह से ाण- ाण पाकर शबर पुिल दक वयं कु छ उ म बिल-पु ष साथ ले कृ या क
सेवा म आ उपि थत आ। इस समय वह कृ या य -भूिम म बैठी थी। ा चम पर,
एकदम न , बाल खोले, माथे पर बड़ा-सा िस दूर-ितलक, िमली ई ब त मोटी भृकु ट,
टेढ़ी और चपटी नाक, थूल कपोल, भयानक ओ , बड़े-बड़े दांत, ल बी गदन, नािभ तक
लटकते तन, महा उदर, फू ले ए बड़े-बड़े पैर। वह ने को ब द कए म -पाठ कर रही
थी। स मुख वेदी पर ताजा कटा नर-मु ड रखा था। िनकट ही भा ड म बिल-मांस पक
रहा था। शबरपित पुिल दक को देख और नये बिल-पु ष का साद पा कृ या स हो
गई। उसने पुिल दक को ान करा, िववसन च के भीतर बैठा, उसी से िश देव का
अिभषेक करा, म पूत जल का माजन कर उसे नर-मांस का साद िखलाया। फर कहा–
‘‘कं दपये! कं दपये! कं ते ि यं करवािण?’’
यह कृ या वा तव म एक ऋिषप ी थी। इसका पित देव ष था। ब त नाग, र ,
य , दै य, दानव बटु क उसके पास वेदा ययन करने आते थे। पीछे वह रा स हो गया और
घर ही म िश देव क थापना कर वाम-िविध से सप ीक म डल बना िश देव का पूजन-
भजन करने तथा नर-बिल दे नर-मांस भ ण करने लगा था। उसक मृ यु होने पर अब यह
उसक प ी कृ या अपनी दैवी शि य से ब त पूजाहा हो गई थी।
पुिल दक ने ब ांजिल होकर कहा–‘‘ सीदतु अ ब! मेरा िम िव ाधर का
वामी उदयवधन है। उसने मुझे ाण-दान दया है, अब म कृ त ता व प उसे कोई एक
ैलोकसु दरी क या भट करना चाहता ।ं उसी के िलए म आपक शरण आया ।ं ’’
पुिल दक के ये वचन सुन कृ या ने हंसकर कहा–
‘‘िव म व! िव म व! िव म कर! िव म कर! तुझे िसि ा होगी। सुन, यहां
से दि ण दशा म समु के बीच मनु य रिहत एक ीप-खंड है। उस ीप का नाम र -कू ट
ीप है। वह दुगम थान है। उस अगम-िवजन वन म मलयके तु दानव ने चार खंड का एक
भ ासाद बनाया है। मिण-कांचन-संयोग से बना वह ासाद सब लोको र भोग से
प रपूण है। उसम उसने तु बु य क पु ी महि लका को चुराकर िछपा रखा है।
य नि दनी महि लका संसार क सब ि य म े है। ितलकु सुम-सी कोमल काि तवती
वह बाला ऐसी भी है क उसके स मुख सब देवांगनाएं तु छ ह। ासाद म एक सह
वय का प रचा रका के साथ वह कु सुमकोमलकलेवरा महि लका रहती है। येक
चतुदशी को दानव मलयके तु अपने ेतरि म गजराज पर चढ़ महि लका के िनकट आता
तथा णय-याचना करता है; पर तु वह भािगनी उसके णय को वीकार नह करती है।
दानव के भय से कोई पु ष उस ीप म नह जा पाता है। वह अगम-िवजन ह य ार-रिहत
है। इससे वह सवजनव जत है, पर यह रह य म तुझे बताती ।ं उसी ीप म एक सरोवर
है। यह सरोवर उस ह य क उ र दशा म पवत क उप यका म ही है। उसी सरोवर के
बीच जल म भूगभ-माग का मुख है। तू अपने िम को ले वहां जा तथा जलम माग से ह य
म जाकर उस य -क या को िम पर अनुर कर, फर परा म से दानव का वध कर य -
कु मारी का वहां से उ ार कर उसे अपने िम को देकर कृ तकृ य हो।’’
यह गूढ़ संदश े देकर कृ या खड़-खड़ करके हंस पड़ी। उसके बड़े-बड़े भयानक दांत
बाहर िनकल आए। कृ या से ऐसा गूढ़ संदश े पाकर पुिल दक शबर स हो गया। उसने
कहा–‘‘मातः, कै से म एकाक उस महापरा मी दानव का वध कर सकता ?ं अपने िम
को म उस दानव से यु करने के संकट म नह डालूंगा। या म शबर और िव ाधर क
सेना लेकर र -कू ट ीप पर जाऊं?’’
‘‘इससे सफलता नह िमलेगी। युि , िव म और पंच से कायिसि होगी। वह
दानव बड़ा मायावी है, तेरे सब शबर और िव ाधर को मारकर खा जाएगा। यह चूण ले।
यह िस चूण है। इसम सोम-क प है। इसके खाने से वह िवमोिहत हो जाएगा। तब तू
अपना काय सरलता से कर सके गा।’’
इस कार कृ या से म ले पुिल दक अपने घर गया। उसने सब बात को सोच-
िवचारकर थम एकाक ही र -कू ट ीप पर जाने का िन य कया और वह साहस करके
वहां चला गया। उसने सारे वन को भलीभांित देखा। राह-बाट को जांचा और उस ार-
रिहत अ भुत ह य को भी चार ओर घूमकर देखा। फर वह उस सरोवर के तट पर जा
जल- ड़ा करने लगा। वह बार बार जल म गोता लगाकर जल म िछपे गु गभ माग-मुख
को ढू ंढ़ने लगा। अ त म उसे वह मुख िमल गया। मुख म िव हो, वह शी ही एक सुरंग म
प च ं गया, िजसको पार करने पर उसने अपने को ह य के भीतर पाया।
ह य क शोभा और सुषमा देख वह आ य-च कत हो गया। ह य क ऊंची-ऊंची
दीवार थ । भीतर अनेक सौध थे, बाग थे, वा टकाएं थ , िजन पर िविवध रं ग के फू ल
िखल रहे थे। वृ पर अनेक िवहग कलरव कर रहे थे। वह व छ जल क एक पु क रणी
थी, िजसके तट पर सघन छाया म बैठी प और सुषमा क खान उस कशोरी य क या
को उसने फू ल से ड़ा करते ए देखा। उस समय वह बाला अके ली ही वहां बैठी थी।
पुिल दक साहस करके उसके सामने जा खड़ा आ। एकाएक उस जनव जत थान म उस
पु ष को देख बाला कु छ भय और आ य से जड़ हो गई। उसने कहा–‘‘कः? कः?’’
पुिल दक ने उसके िनकट आ णाम कया। फर कहा–‘‘मा भैषी: बाले! मुझसे भय
न कर। म शबर का राजा पुिल दक ।ं ’’
‘‘तो तू कै से इस अगम े म आया, तुझे या दानव का भय नह है?’’
‘‘म कृ या माता का सेवक ।ं उ ह क आ ा से तुझे यहां से मु करने आया ।ं
मेरा िम िव ाधर का राजा उदयव न अित कमनीय, प-गुण म तेरे ही समान
अि तीय है। तेरी ही भांित वह संसार म ने को आन द देने वाला है। उस कमनीय पु ष
के साथ तेरा संभोग न हो तो कु सुमायुध का धनुष-धारण ही थ है।’’
पुिल दक के ये वचन सुनकर वह बाला उ सुक और कु छ लि त होकर बोली–‘‘हे
अितिथ, तेरा वागत है। पर तेरा वह िम कहां है? मुझे लाकर दखा तथा तू कै से मेरा
यहां से उ ार कर सकता है? या तेरा और तेरे िम का ऐसा साम य है?’’
पुिल दक ने कहा–‘‘तू िच ता न कर। चतुदशी के दन दानव यहां आएगा। तभी म
उससे िनबट लूंगा और तभी म अपने उस िम को लाकर तुझे दखाऊंगा।’’ उसने बाला को
कु छ गु परामश भी दए और ‘शी फर आऊंगा’ इतना कह वह शबर का राजा वहां से
उसी गु राह से चलकर बाहर आ गया तथा एक तप वी का वांग धारण कर उसी
सरोवर के तट पर आसन जमाकर बैठ गया।
िनयत काल म ेतरि म गजराज पर चढ़ वह दानव वहां आया। अपने अगम
व जत ीप पर एक पु ष को बैठे देख बड़े ोध और आ य से उसके िनकट आकर बोला–
‘‘तू कौन है और मेरे इस व जत ीप म कै से आया?’’
‘‘म भगवती कृ या का गण ।ं भगवती क आशा से तेरे ही िलए यहां आया ।ं ’’
‘‘मेरे िलए य ?’’
‘‘भगवती कृ या के आदेश से म तुझे वशीकरण दूगं ा िजससे तू कृ तसंक प हो।’’
‘‘ या तू ऐसा समथ है?’’
‘‘म िस पु ष ।ं जा, सरोवर म ान कर आ, म तुझे िस चूण दूग ं ा।”
‘‘उससे या होगा?’’
‘‘तेरा मनोरथ पूरा होगा दानवे , कृ या माता का तुझ पर अनु ह है।’’
दानव- ान कर आया और पुिल दक ने थोड़ा चूण उसे दया और कहा, ‘‘इसे
भ ण कर और मौन रहकर बाला के िनकट जा।’’
‘‘ या तू मेरा रह य जानता है?’’
‘‘म भूत, भिव य सब जानता ।ं ’’
‘‘ वि त, तो म तेरी परी ा क ं गा, झूठा होने पर तेरा वध कर तेरा भी भ ण
क ं गा!’’
पुिल दक ने हंसकर ऋिष क भांित हाथ उठाकर कहा–‘‘जा दानवे , कृ त-
मनोरथ हो!’’
जब मलयके तु ह य से बाहर आया, वह स था। य -बाला ने हंसकर उसक
ओर सािभ ाय दृि से देखा था–एकाध अनुरोध-वा य भी कहा था।
शी ही उस कपट मुिन से दानव क िम ता हो गई। दानव ने उसे अपने ीप म
रहने क सुिवधाएं दे द । वह जब आता, उसके िलए उपानय लाता। अवसर पाकर
पुिल दक अपने िम को भी ीप म ले गया। गु राह से ह य म उसे प च ं ा दया।
पु क रणी के तीर पर वह फू ल से ड़ा कर रही थी। कभी वह गुनगुनाती ई-सी कसी
फू ल को तोड़कर मसल फकती, कभी उ ह नासार पर रख सूंघती। इसी समय उसक
दृि त ण िव ाधर पर पड़ी। वह त ण न रा स और दानव क भांित कृ णवण था, न
क प ू । उसका गौर वण और का त कलेवर देख, उसके उ वल नीलमिण के समान ने देख,
उसका श त ललाट और व देख, वह उस पर मोिहत हो गई। उसके क ट- देश म
कौश य, क ठ म मिणहार और भुजा म मिणवलय, िसर पर सुिच ण काकु ल लटक रहे
थे।उसने धड़कते ए व पर हाथ रख आगे बढ़कर कहा–“हे नर-शादूल, तुम कौन हो और
इस दुगम ीप म आ, कै से इस अग य ह य म आ गए? या तु ह दानवे का भय नह ?
यहां आकर तो कोई पु ष जीिवत नह लौटता है। यह दानवे -रिचत ीप र -कू ट है। यह
पु ष मा के िलए अग य है।’’
पर तु इसी ण ओट से िनकलकर पुिल दक ने कहा–‘‘बाले, यही मेरा िम
िव ाधर का राजा उदयवधन है। यही तेरे यो य वर है िजसे म ले आया ।ं ’’ तब ितरछी
दृि से उसे देखती ई कु छ लजाती-सी वह बाला बोली–‘‘तेरे िम क म अ यथना करती
।ं पर तु म परवश ।ं ’’
इस पर आगे बढ़कर उदयवधन ने बाला का हाथ पकड़ िलया। बाला ने कहा–‘‘हे
धमा मा, म क या ं और िपता के अधीन ।ं ’’ उदयवधन ने कहा–‘‘हम ग धव-िविध से
िववाह स प कर लगे, तू उसक िच ता न कर।’’ इतना कह अ याधान कर पुिल दक क
सा ी म दोन ने िववाह-िविध स प क । फर वह त कर उदयवधन को वह छोड़ गभ-
माग से बाहर आ दानव के आगमन क ताक म बैठ गया। जब चतुदशी को दानव आया तो
उसने ब त-सा िस चूण िखलाकर उसे ह य म भेज दया। उस िस चूण के भाव से वह
मू छत हो गया और उदयवधन ने उसका िसर काट िलया। इस कार दानव को मार,
कु मा रका को ले वे दोन िम ेतरि म गजराज पर सवार हो तु बु य क नगरी म
आए। तु बु ने अपनी क या के उ ारकता क अ छी अ यथना क और अि के समान
देदी यमान र के ख भ क वेदी बनाकर अपनी पु ी महि लका उसे दे दी। उदयवधन
उस रमणी-र को पा कृ ताथ हो, उसे ले, साथ म ब त-सा र -मिण ले, ेतरि म गजराज
पर सवार हो, उसी र -कू ट ीप के अगम ह य म आ नानािविध िवलास करने लगा।
शबरपित पुिल दक िम का उपकार कर कृ तकृ य हो सुभ वट कानन म अपने ाम म
लौट आया।
75. राम

जब सूयपु मनु और उसके दामाद बुध ने अपने पैतृक रा यवंश क थापना कर


ली और सूयम डल और च म डल दोन का भलीभांित िव तार हो गया, तब उ र भारत
आयावत के नाम से िव यात हो गया तथा इस आयावत क समृि स पूण भारत से बढ़-
चढ़कर हो गई। इन आय म अनेक सां कृ ितक नवीन- थापनाएं । थम तो यह क इन
दोन ही कु ल ने अब तक चली आती ई मातृसं क वंश-पर परा को याग िपतृमूलक
वंश-पर परा थािपत क । कु ल-पर परा को िपतृमूलक िनि त करने म एक मह वपूण
सां कृ ितक प रवतन यह आ क आय म िववाह-मयादा दृढ़ब मूल हो गई और ि य के
िलए पु ष ‘पित’ या ‘ वामी’ हो गए। उनके शरीर और जीवन क स पूण स ा पर उसका
अख ड एवं सवत अिधकार हो गया। यहां तक इस मयादा का प बना क य द वीय
कसी अ य पु ष का भी अनुदान िलया हो तो भी संतित का िपता उस ी का वह ‘पित’
ही माना जाएगा, िजससे उसका िववाह हो चुका है। अिववािहत ि य का िपता भी वही
पित होगा। ब त-से ऋिषय ने तो वीयदान अपना एक पेशा ही बना िलया, िजसम
उ लेखनीय वेद ष दीघतपा थे। विश और दूसरे व र ऋिषय ने भी अ य राजा क
पि य को वीयदान दया। ऐसी सभी स तान न माता क मानी ग , न वीयदाता पु ष
क । युत वे उस पु ष क स तान और उसी कु ल–गो को चलाने वाली िस , जो
उसक माता का िववािहत पित एवं वामी था। इससे आय जाित को यह लाभ तो अव य
आ क वह एक संग ठत जाित हो गई, पर तु इससे एक नई और मह वपूण बात यह
उ प हो गई क उनक रा य-स पि आ द सब वैयि क होती गई और देखते-ही-देखते
मानव और एल के महारा य का िव तार हो गया।
पर तु इससे ि य के अिधकार का खा मा हो गया। प ी का अपना कु ल-गो
कु छ भी न रहा। िपतृमूलक वंश-पर परा म िपता का कु ल-गो के वल पु को ही िमलता
था–पु ी को नह । इसका अिभ ाय यह क पु ी को िपता क स तान ही नह िगना गया।
वह िपता के कु ल-गो से बिहगत एक िवि छ व तु मान ली गई, जो वय क होने पर
कसी पु ष को उसक प ी बनने के िलए दे दी जाती थी। उसे न िपता का कु ल-गो
िमलता था, न पित का। इस कार से आय क वंश-पर परा म ी मा पित के िलए
स तान उ प करने क एक जीिवत े थी। इस िववाह-मयादा म दा प य ेम, समानता
आ द के कु छ भी भाव न थे। न िववाह का उ े य नर-नारी क नैस गक कामेषणा क पू त
था, न वह अ य शारी रक और भौितक एषणा पर आधा रत था, उसका उ े य अपने
‘पित’ के िलए–जो वा तव म उसका वामी था–साथी, िम या जीवन-संगी बनना नह –
स तान उ प करना था।
दूसरी मह वपूण सां कृ ितक बात, जो आय कु ल म उ प ई, वह उ रािधकार
थी। िपता क सारी रा य-स पि का िनि त प से पु को ही उ रािधकार िमलता
था–पुि य को नह । इस कार जहां पुि यां िपता के कु ल-गो से वंिचत कर दी ग वहां
स पि से भी वंिचत कर दी ग । स पि का सवाथ म उ रािधकारी पु था। इस कार
आय का संगठन एक कार से अ ीक संगठन था। अथात् आय क जाित म ी क कह
भी गणना न थी। वह के वल पु ष क पूरक थी। पित के िलए उसक स पि के
उ रािधकारी को उ प करने के िलए वह याही जाती थी। इसिलए िववाह म अब ि यां
पित को वे छा से वरण नह करती थ , वे िपता के ारा दी जाती थ । इस स ब ध म
उनक स मित नह ली जाती थ , न उनक िच और पस द का िवचार कया जाता था।
िजस कार पित को िववाहोपरा त प ी पर पूणािधकार ा था, उसी कार िववाह से
पूव क या पर िपता को। पर तु मजेदार बात यह थी क िपता क स पि म और पित क
स पि म उनका कु छ भी भाग न होता था। वह कु ल-गो -स पि के सब अिधकार से
वंिचत थ । य - य आय क रा य- ी बढ़ती गई, य - य िववाह के िनयम ढ़ब
होते गए, िजनसे ि य क दशा एक कार से दासता क सीमा को प च ं गई। िववाह के
समय उसे पित क आ ाका रणी और अधीन रहने का वचन भरना पड़ता था। वह ‘द ा’
थी। वयंवर क था बड़े-बड़े आयकु ल म चिलत थी, पर तु उसम भी क या को अपनी
पस द का पु ष चुनने का अिधकार न था। िपता ही उस चुनाव क कोई शत रख देता था
और उस शत को पूरा करने पर वह क या उसी को दे दी जाती थी। ऐसे वयंवर म क या
को ‘वीयशु का’ कहा जाता था। इसका अथ था–परा म के मू य पर क या क खरीद।
अथात् परा म ही क या का मू य है। कु छ कु ल क या के मू य म भी धन लेते थे। सीता
‘वीयशु का’ थी। पर तु गािध राजा ने एक हजार घोड़े लेकर ऋचीक को अपनी पु ी याह
दी थी। और इतना ही य , राजा लोग अपनी क याएं पुरोिहत को य -दि णा क भांित
भी दे देते थे। जैसे दशरथ ने ऋ यशृंग को अपनी क या शा ता दे दी थी।
ब प ी व क था भी इसी कारण चली। पित को अनेक ि य से याह करने के
अिधकार ा हो गए, पर प ी को नह । िववाह के अित र आय लोग दािसयां भी रखते
थे। इस समय आय राजा के अ तःपुर म चार कार क पि यां रहती थ , एक मिहषी–
मु य महारानी–िजसे राजा के साथ य म सि मिलत होने का अिधकार था। दूसरी
पित ता–िजस पर पित का ेम कम हो जाता था या जो बूढ़ी हो जाती थी। तीसरी
वा वृता–जो मु य ेिमका होती थी। चौथी–पालावली–जो ायः म ी क क या होती
थी। अपना अिधकार बनाए रखने तथा राजा के भीतरी भेद लेने के िलए ाय: मि गण
अपनी क या राजा ही को देते थे। इसी कार रा य क भी पांच ेिणयां थ । एक
सा ा य–िजसम अनेक अधीन, िविजत तथा करद रा य सि मिलत होते थे। दूसरा भो य–
जो स ाट् ारा कसी भी िनयुि के प म दान कया जाता था तथा शासक को के वल
उसक आय पर ही अिधकार रहता था। तीसरा वरा य–जो वत था। चौथा वैरा य–
जो श ु का जय कया आ होता था। पांचवां रा य–जो सा ा य के अ तगत होता था।
दायभाग और उ रािधकार के स ब ध म भी आय म पहले यही िविध चिलत
रही क रा य सब पु म बांट दया जाता था। जैसे मनु ने अपने पु म समान रा य बांट
दया था। पर तु शिशिब दु के कु ल म दायभाग का चलन आ। शिशिब दु ययाित-पु
यदु के वंश म एक च वत राजा था। यह िच रथ का पु था। शिशिब दु िवदभ का राजा
था। इसने अनेक अ मेध य कए और ब त वण बांटा। इसके पास वण का अटू ट
भ डार था। िस च वत मानव मा धाता शिशिब दु का दामाद था। किपय ने
शिशिब दु के िपता िच रथ का य कराया। उसम उस अके ले को ही अ ा द का अ य
बनाया। इसके बाद उसी य म िच रथ ने यह घोषणा कर दी क मेरे वंश म एक ही
छ पित होगा। शेष उनके अनुजीवी ह गे। अथात् जैसे मनु ने अपने सब पु म रा य
बांटा; उस कार िच रथ क भावी स तान म रा य का बंटबारा नह होगा। रा य के वल
ये भाई का रहेगा। वही राजा कहाएगा। शेष भाई उसके अनुजीवी रहगे। उ ह गुजारा
िमलेगा। आगे चलकर मानव ने भी इस िनयम को मान िलया और तब रा य के बंटवारे
समा हो गए। जो ग यां थािपत हो चुक थ , वही संपु होती रह ।
पीछे हम बता चुके ह क आयावत म इस समय सूयवंश क पांच शाखाएं थािपत
थ । एक–उ रकोसल रा यवंश, दूसरा–दि ण कोसल राजवंश, तीसरा–शयात आनत
रा यवंश, चौथा–मैिथल रा यवंश और पांचवां–वैशाली रा यवंश। उ र कोसल रा यवंश
क 39व पीढ़ी म राम का ज म आ।
इस वंश म अब तक मनु, इ वाकु , युवना , बृहद , मा धाता, सद यु,
अ बरीष, दलीप, रघु और दशरथ िव ुत पु ष हो चुके थे।इस समय उ रकोशल रा य के
उ रािधकारी राम वनवास कर रहे थे। दशरथ क मृ यु हो चुक थी।
दशरथ महारथी यो ा और िति त राजा थे। देवराज इ से उनके मै ी स ब ध
थे। वे नीितमान् और स य ित थे। उनक तीन मिहिषयां थ – थम कौश या–दि ण
कोशलािधपित भानुमान् क पु ी, ि तीय सुिम ा–मगधराजपु ी, तृतीय कै के यी–उ र
पि मी आनवनरे श के कय क पु ी। दशरथ ने िस धु, सौवीर, सौरा , म य, काशी,
दि ण कोसल, मगध, अंग, बंग, क लंग और िवड़-नरे श को जय कया था तथा अनेक
अ मेध य कए थे। िग र ज के िस यु म उ र पांचाल दवोदास क सहायता क
थी तथा वैजय ती के कु लीतर के वंशधर ितिम वज श बर असुर को मारा था। अंग-नरे श
लोमपाद इनके िम थे।
राम के ज म से पूव इस उ र कोसल रा य के भी कु छ शाखा-रा य थािपत हो
चुके थे, िजनम एक शाखा ह र -वंश क थी। इसक राजधानी का यकु ज के पास थी।
इस समय इस ग ी पर स भवतः रोिहता जीिवत थे। मु य सूयवंश शाखा क तीसव
पीढ़ी से–राम से कोई नौ पीढ़ी पूव िस धु ीप राजा के काल म अनर य ने यह ग ी
थािपत क थी। इनक पांचव पीढ़ी म ैया ण ए। उनके पु स य त (ि शंकु) और
उनके पु ह र , जो पीछे महास यवादी िस ए। राजा ैया ण वेद और तापी
था। उसका पु स य त दुराचारी तथा दुरा ही था। उसने तीन बड़े अपराध कए–एक
नव-िववािहता ऋिष-प ी का हरणकर उससे बला कार कया, चा डाल के साथ खान-
पान रखा, कु लगु विश क गाय को मारकर खा गया। इससे ु होकर िपता ने विश
के कहने से उसे रा य युत कर दया और उसे ि शंकु का कु नाम दया। यौवरा य से युत
होकर वह वन म रहने लगा। िपता के मरने पर भी विश ने उसे ग ी नह स पी– वयं ही
रा यभार संभाला। इसी समय का यकु जपित िव ािम ने रा य पर चढ़ाई क और
विश ने उ ह शबर और ले छ क मदद से परािजत कया। रा य िव ािम वन म
जा िछपे, जहां ि शंकु ने उनक ब त सहायता क और उनके कु टु ब का पालन कया।
अवसर पाकर िव ािम ने ि शंकु को संहासन पर बैठाया और उसके य म पुरोिहत
बने। ि शंकु के पु महादानी और महाबली ह र ए। इ ह ने दि वजय करके अ मेध
कया और सोमपुर बसाया। उनके िचरकाल तक पु नह आ तो उ ह ने व ण क
उपासना क और कहा क म पु क बिल दूग ं ा। पर जब रोिहता का ज म हो गया तो
मोहवश राजा ने पु क बिल नह दी। विश क सलाह से वह सात बार वन को भाग
गया और लौट आया। बाईस वष बाद ह र को जलोदर का रोग आ और समझा गया
क वह वचनभंग का दंड है। अ त म राजपु के थान पर भागववंशी वेद ष अजीगत के
पु शुनःशेप को हजार गाय देकर मोल िलया गया और उसक बिल देकर य करने का
आयोजन आ। बदनामी से बचने के िलए विश इस य के पुरोिहत नह बने–अया य
आंिगरस को पुरोिहत बनाया गया। बालक शुनःशेप को लाल व पहनाकर बिलयूप से
बांध दया गया। पर तु कोई य कता उसके वध को राजी न आ। तब अजीगत ही सौ गाय
लेकर वध करने को राजी हो गया। पीछे जब िव ािम को यह सूचना िमली तो वे आए।
वा तव म यह बालक उनका भांजा था और उ ह ने बड़े झंझट के बाद उसे बिलदान से
बचाया। अब इस समय इस ग ी पर रोिहता रा य कर रहे थे।
सूयवंश क दूसरी शाखा–सगर-वंश ने दशरथ-काल से कु छ ही पूव म य-भारत म
अपनी ग ी थािपत क थी। इसी वंश का थम राजा बा था, िजसे हैहय तालजांघ ने
परा त कया था। बा रा य युत हो अि औव के आ म चला गया था। वह सगर का
ज म आ। बा तो वह वगगत ए और सगर ने अपने य से रा य ा कया तथा न
के वल हैहय को जीता अिपतु अपना रा य भी ब त बढ़ा िलया। हैहय के पर परागत श ु
अि औव ने इ ह भारी सहायता दी। सगर ने हैहय क सारी ही शंका का मूलो छेद कर
दया तथा अपना महासा ा य-िव तार कया। इनक कमान म साठ सह यो ा थे।
इ ह के तीन पीढ़ी के नरे श–अंशुमान्, दलीप और भगीरथ चार न दय को खोदकर और
िमलाकर गंगा को मैदान म लाए थे। अंशुमान राज ष थे, उ ह ने अ मेध और राजसूय य
कया। इस समय ग ी पर भगीरथ या उसका पु आसीन था।
दि ण कोसल राजवंश क ग ी पर ऋतुपण के पौ क माषपाद थे, िज ह ने
रा स धम वीकार कर नर-मांस खाना आर भ कर दया था। इ ह ने अपने राजगु
विश के पु शि तथा िन यानवे प रजन को िव ािम के भड़काने से खा डाला था।
इ ह क माषपाद क प ी म वीयदान कर विश ने पु उ प कया था। क माषपाद के
बाद इस राजवंश क दो शाखाएं हो गई थ । िनषध-िवदभ, दि ण कोसल और दशाण,
दोन रा य क सीमाएं पर पर िमलती थ । सूयवंश क अ य शाखा का उ लेख अ य
आ चुका है। अयो या, ाव ती और साके त सूयवंश क धान राजधािनयां थ । सं ेप म
इस समय उ र कोसल रा य पर राम के थानाप भरत, ह र -शाखा पर रोिहता ,
सगर-शाखा पर भगीरथ, दि ण कोसल ग ी पर क माषपाद, िवदेह मैिथल म सीर वज,
मैिथल संका य-शाखा पर धम वज, वैशाली म मित और शयाित रा य पर मधु रा स
रा य करता था। सूयवंश क इन ग य के अित र जो राजवंश थे उनम च वंश मुख
था।इसक मु य ग ी ित ान म सारभौम, िवदभ म धृितम त, उ र पांचाल–सुदासवंश
◌ै म सोमक, दि ण पांचाल म िचरा , मगध म सुध वा, का यकु ज म ऋतुराज, मालव
म दुजय, िवदभ म सुबा और उ री िबहार म म त् के वंशधर रा य करते थे। अंग म
लोमपाद और उ र-पि म म कै कय थे।
दै य , रा स और असुर म–रावण और मधु; ऋिषय म विश , िव ािम ,
वामदेव–नारद, ऋ यशृंग, िम यु का यप, सायका , देवराट् मधु छ दस, ितदश,
गृ समद, अगसा, अलक, भर ाज आ द मुख थे।
दशरथ को वृ ाव था तक कोई स तान नह ई, वाध य म चार पु ए। दशरथ
क तीन पि य म बड़ी कौश या तो कोसल-वंश क ही क या थी। वह दि ण
कोसलािधपित भानुमान् क पु ी थी। इसिलए यह वंश आय भी था, मानव भी था,
सूयवंश भी था। इनके सब आचार-िवचार अनुकूल थे। दूसरी मगध के राजा क पु ी थी,
जो कदािचत् दशरथ का करद राजा था। पर तु कै के यी क बात इन सबसे पृथक् थी। वह
उ र-पि मी आनवनरे श क लड़क थी। पाठक को मरण होगा क स ाट् ययाित के
बंटवारे म अनु को गंगा-यमुना- ाबे का उ री भाग िमला था। इस वंश क इ सव पीढ़ी
म महामानस च वत ए और उ ह ने सारे पंजाब को जीत िलया। उ ह स ीपपित तथा
स सागर का वामी कहते थे। इनके िपता जनमेजय को मा धाता ने हराया था। उस
समय यह वंश दो ख ड म होकर कु छ पि म को और कु छ पूव को चला गया था।
महामानस पि म क ओर जानेवाल म से थे। इनके वंश ने िस धु सौवीर, के कय,
भ वा लीक, िशिव और अ ब रा य थािपत कए। इनम के कय मुख थे। महासागर के
पु उशीनर और ितित ु थे। उशीनर ने पहले अवनीरस अपनी राजधानी बनाई थी। इनके
रा य-म डल म यौधेय, अ ब , नवरा और कु िमला क रयासत भी सि मिलत थ ।
उशीनर के पु िशव थे िज ह ने कपोत को शरण दी थी। इनके चार पु ने फर पि म
क ओर बढ़कर वृषदभ, के कय, म और सौवीर रा य क थापना क थी। इस समय
स पूण पंजाब इ ह के अिधकार म था। के कय-नरे श आनव दशरथ क ट र के बल
वत नरे श थे। इनक पु ी कै के यी तथा पु युधािजत् थे। कै के यी मानवती, सु दरी,
ग रमावती और ठसकदार रानी थी। बड़े राजा क बेटी होने के कारण उसका मान भी
ब त था। सबसे छोटी, सु दरी और गुणवती होने के कारण वाध य म राजा उसे यार भी
ब त करते थे। उसका अपना अलग महल, नौकर-चाकर, दास-दासी थे। वह वत कृ ित
क ी थी। यु और आखेट म राजा के साथ जाती थी। यह वा तव म कु छ तो िपतृकुल का
भाव था और कु छ ‘वृ य त णी भाया’ का मामला था।
पर तु सबसे मह वपूण और क ठनाई क एक बात थी। जब वृ ाव था होने पर
भी दोन रािनय से कोई स तान नह ई, तब उ ह ने के कय राजा क पु ी मांगी। के कय
राजा ने इस शत पर पु ी देना वीकार कया क दशरथ के उ प कै के यी का पु कोसल
रा य का उ रािधकारी होगा। हम बता चुके ह क आय क प रपाटी िपतृकुल क थी
तथा वहां ी का कोई मह व न था। पित ही पु का वामी होता था, पर तु संभवतः
आनव-कु ल आय क इस मयादा को नह मानता था। इससे उसने यह ण रखा क य द
दशरथ उसक पु ी के पु को ही उ रािधकार द तभी वह अपनी पु ी दशरथ को देगा;
नह तो नह । दशरथ ने उस समय के कय महाराज क बात वीकार कर ली। कु छ इस
िवचार से भी क पूव पि य से स तान न होने ही से तो वह िववाह कया जा रहा है।
इसिलए यह तो होगा ही क उसी का पु उ रािधकारी होगा। कु छ कै के यी का प-वैभव,
उसके िपता का व र कु ल भी काम कर गया। दशरथ ऐसी ही ित ा करके कै के यी को
याह लाए।
पर तु दैव- भाव से जब स तान ई तो तीन रािनय को ई और ये राम थे–
जो ये रानी के पेट से पैदा ए थे। बड़े होने पर राम प-गुण-शील और शौय म भी सब
भाइय म े रहे। धीरे -धीरे दशरथ का सबसे अिधक मोह राम पर ही रहा और अब
दशरथ को कै के यी से क ई वह ित ा खलने लगी। वे मन-ही-मन राम ही को रा य का
उ रािधकार देने क सोचने लगे। राम के ऊपर िवशेष ीित तो इसका कारण थी ही–और
भी बात थ । राजा बाहरी वंश क लड़क के लड़के को कोसल का रा य नह देना चाहते
थे। राम का मातृ-कु ल भी कोसल ही था, मानव था, आय था, इससे उ ह राम ही यौवरा य
के यो य जंचे। य िप राम ज मतः भी सब भाइय म बड़े थे, ये ा मिहषी के पु थे। ये भी
बात राम के प म आती थी, पर तु कदािचत् उस काल तक ये पु को ही रा य िमले–
यह िनयम दृढ़ ब मूल नह आ था। कोई भी पु रा य का अिधकार यो यता के आधार
पर पा सकता था। य द आप पुराण म व णत वंशाविल को यान से देख तो आपको ात
होगा क वंशाविलय के स ब ध म पुराण म सव ही िपता के बाद पु का थान नह है,
क तु वह नाम दया है जो िपछले ि के बाद उ रािधकारी होता था। वह ि भी
सदैव िपछले ि का पु नह होता था, अिपतु भाई, भतीजा, पौ अथवा अ य
स ब धी भी हो सकता था।
जब जनकपुर म धनुष-य के बाद चार भाइय के िववाह स प हो गए, तब
ताड़कावध, धनुभग और भागव परशुराम के पराभव के वृ ा त ने राम के मह व और
गौरव को ब त बढ़ा दया। अब दशरथ ने यह दृढ़ धारणा बना ली क जैसे बने, राम को
उ रािधकार दया जाए। िववाह के कु छ दन बाद राम सीता-सिहत अपनी ससुराल
जनकपुर चले गए और कई वष वह रहे। इसके बाद जब राम अयो या लौटे तो भरत के
मामा युधािजत् भरत, श ु और उनक वधु को लेकर उनके निनहाल के कय ले गए
तथा वे ब त दन तक वह रहे। यही अवसर दशरथ ने अपनी मनोकामना पूरी करने को
ठीक समझा। उ ह ने सभी अधीन राजा , रईस , छ धारी नरपितय को अयो या म
िनमि त कया। अनेक ऋिषगण को बुलाया, के वल भरत के मामा-नाना को यह खबर
नह भेजी, न जनक ही को सूचना दी। जब राजा और राजवग पु ष, ऋिष और िव ान्
एक हो गए तो दशरथ ने उनके सम अपना ताव रखा। उ ह ने कहा–‘‘रघु से लेकर
हमारे सभी पूवज ने जा का पु वत् पालन कया है, उ ह ने सदैव जा के िहत का यान
रखा। मने भी यथासाम य जा को सब कार क सुिवधाएं द । उनके दुःख को अपना
दुःख और उनके सुख को अपना सुख समझा। मेरी इ छा है क भिव य म जा इससे भी
अिधक सुखी और समृ हो। क तु म अब वृ हो चला ।ं मेरे शरीर के अवयव िशिथल हो
गए ह, मुझे अब शाि त चािहए। अब म अपने ये पु राम को अपने थान पर िनयु
कर िव ाम चाहता ।ं राम राजोिचत सभी गुण से प रपूण है। वह धीर है, वीर है, उदार
है और धमा मा है। वह परा मी, साहसी, बलवान्, तेज वी और भावशाली है। अब य द
आप ठीक समझ तो म कल ातःकाल पु य न के शुभ योग म आपक सा ी म राम को
यौवरा य दू!ं आप मेरे इस ताव पर भली-भांित िवचार कर ल तथा अपने वत
िवचार कट कर।’’
पाठक देख सकते ह क दशरथ ने अपना ताव कै से युि और ग भीरता से
उपि थत कया था। राम के े गुण का बखान करने के साथ ही उनके ये होने क ओर
भी संकेत कया था। फर इस स ब ध म विश , वामदेव और िव ािम जैस क वीकृ ित
तथा संकेत था। उस कारण सभी राजा ने राम-रा यािभषेक का सो लास समथन कया।
िन स देह राम के िवरोध का कोई कारण भी न था। दशरथ क ित ा तो सब पर िव दत
न थी। पर तु राजनीित-िवच ण दशरथ ने सबका समथन पाकर फर पूछा–‘‘आप लोग
के वल मेरी स ता के िनिम ही यह ताव वीकार करते ह, या क आपने भी राम के
उदार गुण पर िवचार कया है?’’
तब राजा के ितिनिधय ने सवस मित से कहा–‘‘राम वा तव म स यवादी,
एक सफल ि के सब गुण से प रपूण, धमा मा, धीर, वीर, परा मी, तेज वी, साहसी,
शि मान्, उ साही, उदार, मृदभु ाषी, बुि मान्, स र , जापालक और जनर क ह व
सवगुणस प ह। वे संसार के सभी जीव को ि य ह। श ु का मानमदन करने तथा उसे
िवजय करने का उनम अद य साम य है। वे अ भुत परा मी ह। उनके समान देव, नाग,
ग धव, क र, दै य, दानव, आय आ द वंश म कोई नह है। हम सभी दय से यही चाहते
ह क राम का शी ाितशी यौवराज अिभषेक कर दया जाए। हमारे क याण के िनिम
आप राम को यौवरा य पद शी दे द।’’
राजपु ष के ये वचन सुनकर दशरथ ने कहा–‘‘आप ध य ह! आपके िवचार तु य
ह। म आपसे सहमत ।ं आजकल चै मास है, वस त का आगमन हो चुका है। चार ओर
वन-उपवन-वा टका पूण प लिवत और पुि पत ह। वृ -पादप-लताएं सभी हरी-भरी, फल-
फू ल से लदी ई ह। खेत हरे -भरे और धा य से प रपूण ह। कल पु य न है। आपक
अनुमित से ही रा यािभषेक क साम ी तुत क जाए।’’
इसका सभी ने अनुमोदन कया। तब दशरथ ने अपने गु और म ी विश से
करब होकर कहा–‘‘अब आप सब साम ी तुत कर यह अनु ान कल ही पूरा कर
दीिजए।’’ इसके बाद दशरथ ने सब मंि य को, नगर-िनवािसय तथा समागतजन का
भ वागत और आित य करने का आदेश दया। सुम दशरथ के िम , म ी और रा य
के परम िहतैषी थे। अब तक सभी राजकु मार क देख-रे ख, िश ा-दी ा उ ह के अधीन
थी। अब सुम के ारा राम को बुलाकर महाराज दशरथ ने कहा–‘‘रामच , तुम मेरे
तथा अपनी माता के ि य हो, सम त जा के ाणाधार हो। कल पु य न म म तु ह
यौवरा य-िवभूिषत करना चाहता ।ं सभी राजा-राजवग इसम सहमत ह। म तु ह
तु हारे िहत क सीख देता ।ं तुम सदैव िजतेि य रहना, बुरे सन से दूर रहना,
समुिचत रीित से जा का याय करना, सेना को स तु रखना, कोष म सदैव वण-र
भरपूर रखना, अपने कमचा रय , भृ य , दास , सेवक और दािसय को सुखी रखना।’’
इतना कहकर राजा ेमा ु बहाने लगे। फर पु को छाती से लगाकर बोले–‘‘पु ,
मने इस दीघायु से ब त अनुभव पाया। संसार का मुझे यथावत् ान है। येक बात का
मुझे पूरा अनुभव है। म अब एक ण का भी िवल ब इस काय म नह क ं गा। कल ही म
यह शुभ काय पूरा क ं गा। मनु य के िवचार सदैव एक-से नह रहते, उनम प रवतन होता
ही रहता है। इसम म अब अिधक सोच-िवचार म समय न करना नह चाहता। इसी से म
िन य ही कल यह काम पूरा क ं गा। आज रात तुम और वधू सीता उपवास करो तथा
श या पर कु श िबछाकर शयन करो। र कगण पूणतः सतक और सचेत रह तथा सुम
रात-भर जागकर वयं तु हारी र ा कर। म जानता ,ं शुभ काय म ब त िव आते रहते
ह। तु हारे भाई ननसाल गए ह। मेरी इ छा है क उनके आने से पूव ही तु ह युवराज बना
दू।ं य िप भरत तु हारा अनुयायी है, फर भी मनु य- वभाव चंचल है।’’
िपता क यह सीख िसर धार, राम उनके चरण म िसर झुका अपने आवास को
चल दए।
76. म थरा का कू ट तक

देखते-ही-देखते यह समाचार अयो या म ाप गया। नगर-जन हष म हो गए।


अयो या म मंगल-वा बजने लगे। राजमाग सज गए। नगर-भवन पर वंदनवार-कलश-
पताकाएं सुशोिभत हो ग , पु प-माला -तोरण से सम त गृह स प हो गए। मंगल-
गान, वेणुवा , शंख आ द बजने लगे। राजमाग दशक से भर गया। वारांगनाएं नृ य करने
लग । िविवध होम-पूजा और मंगल-अनु ान होने लगे। सुरिभत-सुगि धत पदाथ क ग ध
से दशाएं महक उठ । हर मुंह म राम के रा यािभषेक क चचा थी। नगर-नागर राम क
धीरता-वीरता, धम-भी ता, उ साह, उदारता, स दयता, िपतृभि , िव ा-िनपुणता
आ द क चचा करने लगे।
भोर म रा यािभषेक क तैयारी और उ सव क शोभा को कै के यी के सत-ख डे
ह य क छत से दासी म थरा ने देखा। उसने देखा–पुरवासी आन द-कोलाहल कर रहे ह।
ार- ार पर वजा-पताकाएं, पु प-मालाएं सुशोिभत ह, दशक क भीड़ और चहल-पहल
राज ार तक बढ़ गई है। राज ार पर िविवध वा बज रहे ह। उसने नीचे आ राम क धाय
से, जो पीले व से सुशोिभत थी, पूछा, “अरी, आज अयो या म यह कै सा उ सव है? बड़ी
रानी कौश या आज य अ , व , वण, र लुटा रही ह? राज ार पर यह भीड़-भ भड़
कै सा है?’’ तब राम क धाय ने बताया, ‘‘अरी मूखा, तू इतना भी नह जानती? सुना नह
तूने, आज राम का रा यािभषेक हो रहा है!’’
दासी से यह सूचना पा िवकलांगी दासी म थरा ोध से थर-थर कांपने लगी। वह
कै के यी के िप ालय क पुरानी दासी थी। कै के यी को उसने गोद िखलाया था, दूध िपलाया
था। शु क क बात वह जानती थी। आनव जाित क ी- वाधीनता से वह प रिचत थी।
मानव क कु ल-मयादा, पु ष- धानता, ी-दास व, इन सबसे उसे घृणा थी। वह बड़ी
बुि मती और तीखे वभाव क वृ ा थी। रानी के मुंहलगी थी। वह दशरथ के िव ासघात
और वचन-भंग को देख अि के समान भभक गई। उसने मन मकहा–भरत-श ु को
निनहाल भेजकर राजा ने यह अ छी युि िनकाली है। वह अब अपने वचन को पूरा
िनबाहना नह चाहता। वह ती गित से रानी कै के यी के शयनागर म प च ं ी, रानी कै के यी
अभी सो रही थी। वहां जाकर उसने रानी से कहा–‘‘अरी रानी, या आज तेरी िन ा भंग
न होगी? या तू नह जानती क तेरा भिव य आज अ धकार म डू ब रहा है? तेरे ऊपर घोर
संकट आनेवाला है। तेरे पाप का उदय आ है। उसका फल तुझे शी ही िमलने वाला है।
राजा मीठी-मीठी बात बना जाता है, तुझे पु पहार, आभूषण, र िमल जाते ह, तो तू
समझती है–राजा तेरा ही है। पर म कहती ,ं अरी अजान, तेरे साथ छल हो रहा है। कोरी
वंचना। धोखा–अरी रानी, तू धोखा खाएगी।’’
म थरा दासी क ऐसी कटु ं योि सुनकर रानी कै के यी हंस दी। उसने हंसकर
कहा–‘‘अ ब, आज या बात है, भोर ही म तू बक-झक कर रही है, कसने तुझे ु कया
है, बोल? तेरा मुंह य सूख रहा है? या कोई अमंगल आ है?’’
कै के यी क ऐसी मीठी वाणी सुनकर उसने कहा–‘‘अमंगल और कै सा होता है
भला! आज राम का यौवरा य-अिभषेक हो रहा है और तू बेखबर सो रही है; तू समझती
है, राजा तुझे ब त यार करता है, पर आज तो वह कौश या को रा यल मी दान कर
रहा है। अब समझी म, इसिलए उसने भरत को निनहाल भेज दया था। सोच तो, य द
राम राजा बन गया तो तेरा या हाल होगा? हाय, हाय, म तो इसी सोच म मरी जाती ।ं
पर तू भी तो कु छ अपना बुरा-भला सोच, अपने पु के िहत के िलए अब भी सचेत हो–
समय रहते सचेत हो!’’
धा ी के ये वचन सुनकर कै के यी ने कहा–‘‘अ ब, राम को यौवरा य िमल रहा है,
तो तू दुःख य करती है? इसम दुःख और शोक क या बात है भला? म तो राम और
भरत म भेद नह समझती। राम और भरत मेरे दो ने ह। राम का रा यािभषेक हो रहा है
तो म स ।ं यह तो शुभ समाचार है। ले, यह र हार, ये सब आभूषण, म तुझे पुर कार
म देती ।ं ’’ यह कहकर उसने स ता से अपने सब र ाभरण उतारकर म थरा पर फक
दए। पर तु कै के यी के इस वहार से म थरा और भी जल-भुन गई। उसने वे गहने पटक
दए और तमक-कर बोली–‘‘अरी मूढ़ तेरी यह कु बुि मुझे तिनक भी नह सुहाती। तू दुःख
के थान पर सुख मना रही है, सौत का पु राजा बने और तेरा पु दास! इसक तू खुशी
मनाए, ऐसी तेरी बुि है! अरी, यह राम-रा य क सूचना नह है, हम लोग क मृ यु क
सूचना है। आज राम राजा बनेगा और कौश या राजमाता बनेगी। तब तुम दासी क भांित
हाथ बांध उसके स मुख जाओगी। भरत राम का दास होगा। सीता रानी बनेगी और भरत
क ी मा डवी उसक दासी। यह सब तू अपनी आंख से देख सके गी? तुझे छोड़ और कौन
बुि मती ी ऐसे अवसर पर स हो सकती है?’’
वा तव म कै के यी राम को पु वत् यार करती थी, उसके मन म तु छता का भान
भी न था। वह अपने शु क क बात भी भूल गई थी। राजा का यार तथा अयो या का
वैभव उसे ि य था। उसने बूढ़ी धाय म थरा से ऐसे वचन सुन नरमी से कहा–“धातृमातः, तू
ेह से ऐसा कहती है। पर तु राम तो यौवरा य के सवथा यो य है। वह धमा मा है, उदार,
स यवादी और जापालक है। वह तो मुझे ही अपनी माता समझता है, फर भला भरत
और राम म अ तर या है? राम को रा य िमलना भरत ही को रा य िमलने जैसा है।’’
रानी के ये वचन सुनकर म थरा ने कहा–‘‘ठीक ही है। अभी तू नह समझेगी। पर
जब राम का पु ग ी का अिधकारी होगा और भरत और उसके पु को कोई थान न
िमलेगा तब सब कु छ तेरी समझ म आ जाएगा। अभी तो तुझे मेरी बात बुरी लग रही ह
और सौत क उ ित देखकर तू मुझे पुर कार दे रही है, पर तू यह भी तो सोच क भरत को
य मामा के यहां भेज दया गया। देश-देश के राजा को योता गया, पर तेरा िपता,
भाई और पु को नह बुलाया गया। पर जब अपने और अपने पु के सवनाश का यह सब
षड् य देखकर भी तेरी आंख नह खुलत तो मुझे या? जब राम राजा हो जाएगा और तू
भरत को ले एक कोने म दासी क भांित पड़ी रहेगी अथवा जब सौत कौश या के स मुख
तुझे हाथ बांधकर खड़ा होना पडे़गा, तब तुझे पता लगेगा क मने तेरे िहत क ही बात कही
थी।’’
म थरा के इस िवष-वमन से कै के यी का मन फट गया। धीरे -धीरे उसे उसक सभी
बात ठीक तीत होने लग । उसने धीरे -से कहा–‘‘तो अ ब, तू या कहती है क भरत का
िहत कस बात म है? म या क ं ?’’
‘‘बस, राम वन को जाए और भरत संहासन पर बैठे, यही तू कर। इसी म तेरा
और भरत तथा उसक संतान का िहत है। अरी, इन आय के प रवार म माता क या
मयादा है? ये तो िपतृमूलक प रवार ह। राम के राजा होते ही तेरा और तेरे पु भरत के
वंश का तो कह पता भी नह लगेगा। या इसीिलए तेरे िपता ने इस बूढ़े कामुक राजा को
दो सौत पर तुझे दया था? या तेरे तापी िपता क कु छ मयादा ही नह है? या तू नह
जानती क समूचे पि मी-उ री पंजाब और सुदरू पूव देश म तेरे िपता और उसके
स बि धय के रा य फै ले ह? आयावत का यह कं टक ही तेरे िपता के सावभौम होने म
बाधा है। य ही कोसल क मु य ग ी पर तेरा पु बैठेगा, आयावत म फर तेरे ही िपता
और पु के वंश का डंका बजेगा। तेरे पु का कु ल कतना समृ और लोकिव ुत होगा, यह
तो तिनक िवचार!’’
‘‘तो अ ब अब तू ही उपाय कर, िजससे मेरे पु भरत को कोसल का रा य िमले
और राम वन को जाए। बता, अब कै से हम सफल-मनोरथ ह गे।’’
म थरा ने कहा–‘‘इसम या है! राजा ने यही वचन देकर तुझे याहा था क तेरा
ही पु रा य का उ रािधकारी होगा। सो य द राजा को अपने वचन क िच ता नह है, तो
तेरा भाई आनव-नरे श युधािजत् ख गह त है। इन मानव को हम समझ लगे। कसका
साम य है जो तेरे वीर भाई से लोहा ले सके ? फर अभी तो राजा का वचन और तेरा यार
है। सो तू व ाभरण, अलंकार याग, कोप-भवन म जा, मौन हो भूिम म पड़ी रह। इस बूढ़े
कामुक राजा क या मजाल जो वह तेरे कोप को सहन करे ! फर तू खु लमखु ला उसके
बचन-भंग का भ डाफोड़ कर दे। राजा अपने को स य ित समझता है। वचन-भंग का
लांछन सहन नह करे गा। य द करे गा तो उसके िसर पर युधािजत् का ख ग है ही। कसी
को भी तेरा िवरोध करने का साहस न होगा।
‘‘राजा तेरी ब त ल लोप ो करे गा, र ाभरण देगा, तू सभी को ठु करा देना। बस
यही मांगना–भरत को रा य और राम को वनवास। भरत के रा य करने पर जा भरत से
ेम कर उठे गी और सबको भूल जाएगी। भरत िन ल होकर रा य करगे और तू भिव य म
कोसल-राजमाता कहाकर पूिजत होगी। तेरी सौत और उनके पु तेरे सेवक ह गे, फर तू
उन पर चाहे िजतना अनु ह करना।’’
‘‘ठीक है धातृमातः, अब म तेरी ही बात मानूंगी। कह, म या क ं ?’’
‘‘बस, िवल ब न कर। जैसे मने कहा, वैसे ही कर। पर सचेत रह, मतलब से
मतलब रख। राजा क बात म न भूल।’’
77. कै के यी का ी–हठ

सु दरी रानी कै के यी ने यही कया। मिलन व पहन, बाल िबखेर, िनराभरण हो,
कोप-भवन म जाकर भूिम पर लेट गई।
राजा दशरथ स थे। ण- ण पर वे आदेश दे रहे थे। विश , वामदेव,
िव ािम आ द ऋिष अिभषेक-साम ी जुटा रहे थे। राज- ासाद क पौर पर दु दुिभ बज
रही थी। रिनवास म अ -व , धन-र दान कया जा रहा था। अ यागत , अितिथय
तथा ऋिषय से राज ार पटा पड़ा था। सुम सबका यथोिचत स कार कर रहे थे। इसी
समय राजा को संदश े िमला क देवी कै के यी कोपभवन म चली गई ह।
देवी कै के यी का राजमहालय अित भ था। उसम सभी कार के सुख-साधन
उपि थत थे, वह भवन वग के समान काशवान था। सब ऋतु के अनुकूल सभी भांित
क सुख-साम ी उस िवलास-क म थी। पर तु राजा ने आकर देखा, महल सूना पड़ा है।
पु पाधार भूिम पर लुढ़क रहे ह। ग ध- धूपदान म नह जल रहे ह, मंगल-कलश इधर-
उधर लुढ़क रहे ह। व स ा सब अ त- त िछतराई पड़ी है। वह वग य भवन नरक-
तु य हो रहा है। दािसय ने भयभीत मु ा से संकेत ारा राजा को बताया क देवी कोप-
भवन म पड़ी ह।
राजा ने वहां जा कोप-भवन म पड़ी रानी को देखा और दुःखी होकर कहा–“ि ये,
कसने तेरा अिहत कया, तुझे या दुःख है? या म तेरा कु छ ि य कर तुझे स कर
सकता ?ं तूने यह अपनी ऐसी दुदशा य कर रखी है? कह, म तुझे स करने के िलए
या क ं ?’’ इतना कह राजा उं गिलय से उसके के शपाश सहलाने लगा।
फर उसने कहा–‘‘तू तो मेरी सव व है! म तुझे ऐसे दीन वेश म इस कार भूिम
पर लोटते नह देख सकता ।ं मने तो सदा तेरा िहत कया–सदा तेरी स ता का यान
रखा। अब भी तेरे िलए म सब कु छ करने को तैयार ।ं तू कथनीय कह।’’
तब रानी कै के यी ने कहा–‘‘देव, मुझे कसी ने न ोिधत कया है, न अपमािनत। म
आपसे के वल अपना ा मांगना चाहती ।ं मेरे दय म कु छ मनोरथ है, संक प है। मेरी
कु छ अिभलाषा है। म चाहती ,ं आप वचन द– ित ा कर। म अभी अपना मनोरथ आप से
क ।ं ’’
रानी के वचन सुन राजा ने हंसकर उसके बाल सहलाते ए कहा–‘‘तू तो जानती
ही है क तू मुझे कतनी ि य है। राम के बाद य द कोई मेरा ि य हो सकता है तो वह तू ही
है, अतः राम क शपथ खाकर कहता ं क तू अपना मनोरथ कह म अव य पूण क ं गा।
मेरी इस ित ा के सा ी सूय, च , देव, ऋिष, िपतृगण ह। रघुवंशी कभी अपनी ित ा
से नह टलते ह, सो तू जान।’’
कै के यी राजा के वचन सुनकर बोली–‘‘आप तापी इ वाकु वंश के िशरोमिण
नरपित ह और आपका वचन अभंग है। ऐसा ही आपने कहा है, तो म आपको मरण
दलाती ं क आपने मेरे साथ यह शत करके िववाह कया था क मेरा ही पु आपक ग ी
का उ रािधकारी होगा। इसके अित र देवासुर-सं ाम म आपने मुझे जो वचन दए थे, वे
भी आपके पास धरोहर ह। अतः अब इस कार आप अपने वचन से उऋण हो जाएं क
मेरा पु भरत राजा हो और राम आज ही वन जाएं और वहां चौदह वष वनवािसय का
जीवन तीत कर।’’
राजा दशरथ कै के यी के ये वचन सुनते ही मू छत होकर धरती पर िगर गए।
चेतना आने पर िध ार-िध ार उ ारण करते ए फर मू छत हो गए। पर तु चैत य
होकर फर बोले–‘‘अरी कु लनािशनी, तूने यह या कया? तू मेरे मनोरथ को फू लते-फलते
देख उसे समूल न कर रही है! अरी, राम ने तो अपनी माता से भी अिधक सदा तेरी सेवा
क है। मने तेरे वचन पर िव ास कया, यह मेरा ही दोष है। देख, म दीन क भांित तेरे
चरण पर िगरकर तुझसे भीख मांगता ं क तू इस भयानक िन य को बदल दे।’’
राजा क ऐसी कातरोि सुनकर रानी ने च ड ोध करके कहा–‘‘महाराज,
आपको य द वचन देकर उसका पालन करने म दुःख होता है, तो जाने दीिजए। पर अब तुम
पृ वी पर धमा मा और स यवादी नह कहलाओगे। अब तु ह सोच लो क कै से इस ल ा
के भार को सहन करोगे? अरे , इससे तो तु हारा पिव रघुकुल ही कलं कत हो जाएगा।
तु हारे ही कु ल म ऐसे ब त राजा ए ह िज ह ने ाण देकर भी वचन का पालन कया है।
सो राजन् य द तु ह यश ि य नह है और तुम अपने वचन से मुकरना चाहते हो तो तुम
ऐसा ही करो। पर तु म और मेरे पु तु हारे दास बनकर नह रहगे। म तो आज ही
िवषपान कर ाण दूग ं ी और मेरा समथ भाई तुमसे मेरा भरपूर शु क लेगा। म भरत क
शपथ खाकर कहती ं क म कसी भांित कसी दूसरे उपाय से स तु नह हो सकती। सो
तुम समझ लो।’’
ऐसे कठोर और िनमम वचन सुन राजा दशरथ अनेक िविध िवलाप करने लगे।
उ ह ने कहा–‘‘दूर देश से जो राजा आए ह, वे या कहगे! अब म कै से उ ह मुंह दखा
सकता !ं अरी, कु छ तो सोच, कु ल क ित ा और राम क ओर देख। राम से तेरा इतना
िवराग य है?’’
पर तु जैसे सूखा काठ मोड़ा नह जा सकता, उसी कार कै के यी पर इन बात का
कोई भाव नह पड़ा। उसने कहा–‘‘महाराज, आप धमा मा और दृढ़ ित ह। सारा
संसार आज तक आपको स य ित समझता है, सो आज आप उस ित ा को भंग करके
कलं कत होना चाहते ह!’’
यह सुन राजा घायल हाथी क भांित भूिम पर िगर गए। वे अनुनय करके कहने
लगे–‘‘लोग कहगे, ी के कहने से पु को वन भेज दया। हाय, म पु -रिहत ही या बुरा
था? अरी रानी, कु छ तो िवचार कर, अयो या क ओर देख, इस वंश क ओर देख, तू राम
ही को राजा होने दे। विश , वामदेव सभी क यही स मित है और जा भी यही चाहती
है। भरत भी यही पस द करे गा, तू हठ न कर!’’
पर तु रानी न मानी। महल के बाहर ब दी-भाट यशोगान कर रहे थे, वा बज रहे
थे, गिलय और सड़क पर च दन-के सर िछड़का जा रहा था। वजा-पताकाएं फहरा रही
थ और भूिम पर पड़े कराहते ए राजा से रानी कह रही थी–‘‘राजन्, तु हारा गौरव,
यश, ित ा, मान, बड़ाई सब इसी म है क स य का पालन करो। राम को आज ही वन
भेजो और भरत को अभी रा य दो।’’
78. वन–गमन

अ ततः पूवद वचन के बल पर कै के यी ने चौदह वष के िलए राम-वनवास और


भरत के िलए रा य-भोग िलया। राम को वन जाना पड़ा। सीता और ल मण ेम-वश
उनके साथ गए। दुःख, ोभ और लािन से दशरथ ने ाण यागे। भरत ने राम को लौटाने
के ब त य कए, पर सफल न ए। तब वे राम के ितिनिध- प हो रा य करने लगे।
राम दस मास िच कू ट म रहकर द डकार य चले गए तथा वहां बारह वष पंचवटी म रहे।
यहां जन थान म अग य से उनक भट ई। यह उ ह रा सा का िवकट सा मु य करना
पड़ा। अग य का इस समय दि णार य म भारी ताप था। उ ह ने अनेक रा स को
मारा था। रा स से उनके आए दन झगड़े होते रहते थे। वे बड़े तापी ऋिष थे। इनक
प ी वैदभ लोपामु ा थी तथा इनका आ म सब भगौडु का–आय का आ य- थल था।
ये दोन ही पित-प ी वेद ष थे। इ ह ने अरब सागर के जल-द यु को मारकर जल-
ापार िन कं टक कया था। राम को अग य से तथा अग य को राम से ब त सहायता
िमली।
द डकार य म रहते ए राम को सव थम िवराध रा स का िवकट सा मु य
करना पड़ा। ऋिषय ने उ ह इस तेज वी रा स से सावधान कर दया था। यह िवराध
पहले ग धव था और इसका नाम तु बु था। यह लंका म कु बेर का कोई सेनानायक था।
बाद म कु बेर से िबगड़कर यह रावण के भाव म आ रा स हो गया था तथा रावण के एक
सेनानायक के समान द डकवन म रहता था। यह तपि वय , ऋिषय , आय तथा उनक
य -िविधय का घोर श ु था। यह महाबली, अजेय यो ा था। इसके शरीर म दस हािथय
का बल था। एक बार वन म मृगया करते ए अचानक ही राम क भट इस रा स से हो
गई। यह रा स उस समय ा चम कमर म लपेट अपना आखेट कर एक शूल से ा ,
ह रण और संह का िसर लटकाए लौट रहा था। उसके आतंक और गजन से वन आतं कत
हो रहा था। य ही उसने राम, सीता और ल मण को स मुख आते देखा तो सहसा ककर
कहा–‘‘अरे , तुम कौन नवाग तुक यहां द डकवन म िनभय घूम रहे हो? तु ह तो म यहां
थम बार ही देख रहा ।ं यह या बात है–तु हारे िसर पर तो तपि वय के समान
जटाजूट है, पर क धे पर धनुष और साथ म ी य है? ी-सिहत तपि वय का इस
कार घूमना बड़े कलंक क बात है। मुझे तो तुम लोग कोई कपटी तप वी तीत होते हो।
म िवराध रा स ं और तुम जैसे पाख डी तपि वय का आखेट करना ही मेरा काय है।
आज म तुम दोना पािप का र पान क ं गा और यह सु दरी मेरी ी बनेगी।’’
यह कहकर उसने लपककर सीता को अपनी बगल म दबोच िलया और अपना शूल
हवा म घुमाता आ ची कार करता आ वन क ओर चल दया। सीता उसके अंक म जाते
ही भय से मू छत हो गई। यह देख राम एकदम ाकु ल और कं कत िवमूढ़ हो गए। वे
िवलाप करके कहने लगे–‘‘हे भाई, िजस अिभ ाय से कै के यी ने मुझे यहां वन म भेजा था,
वह आज पूरा हो गया। देखो, मेरे देखते-ही-देखते यह दुरा मा मेरी प ी का हरण कए जा
रहा है।’’
पर तु ल मण ने वीर-दप से कहा–‘‘आय, कातर न ह , म अभी इस दुरा मा को
मार िगराता ।ं ’’ इतना कह उ ह ने तीखे बाण से िवराध पर िनर तर हार करने आर भ
कए। ल मण के बाण से िव हो वेदना से ाकु ल वह रा स ोध से सीता को भूिम पर
पटक ल मण क ओर झपटा। इस पर राम ने बाण क वषा करके उसका अंग छलनी कर
दया। तब वह अपना तेजोमय शूल लेकर इन दोन भाइय पर टू ट पड़ा और दोन भाइय
को कमर से पकड़कर कांख म दबा चल दया। यह देख सीता जोर-जोर से आतनाद करने
लगी और कहने लगी–‘‘अरे रा स, तू उ ह छोड़ दे और मुझे ले चल।’’ उधर ल मण ने
उसक बा भुजा उखाड़ ली। भुजा टू टते ही ल मण उसक पकड़ से छू ट गए और तलवार
से उस पर वार करने लगे। इसी समय अवसर पाकर राम ने भी अपना छु टकारा कर उसे
एक ग े म धके ल दया तथा उसके क ठ पर पैर रखकर खड़े हो गए। ल मण ज दी-ज दी
ग े को प थर और िम ी से भरने लगे और उ ह ने उस दुदा त रा स को जीिवत ही धरती
म गाड़ दया।
इस थान के िनकट ही शरभंग ऋिष का उपिनवेश था। आवाज सुनकर शरभंग
ऋिष ब त-से तपि वय को लेकर आ गए तथा राम-सीता को अपने आ म म ले गए।
इसी वन म एक और तेज वी ऋिष सुती ण रहते थे। उनका आ म म दा कनी
नदी के तट पर था। सुती ण का आ म ब त बड़ा था। वे बड़े भावशाली थे। वहां से वे
राम को अपने आ म म ले गए। राम को उनसे ब त सहायता िमली। उ ह ने उ ह कु छ
अ छे श भी दए तथा पंचवटी म आ म बनाकर रहने क स मित दी और वह सब
तपि वय , ऋिषय ने िमलकर द डकार य के रा स के उ मूलन क योजना बनाई।
इस कार राम कभी इस ऋिष के आ म म कु छ दन रहते, कभी उस ऋिष के
आ म म तो कभी पंचवटी म अपने आ म म रहते। इस तरह रहते ए उ ह दस
वष तीत हो गए। इसी समय सूपनखा से उनक भट ई और खर-दूषण से िव ह आ।
अग य के कारण रा स ब त कु छ दबे ए रहते थे तथा अवसर पाकर अग य उन पर
आ मण करते ही रहते थे। अग य का रा स पर आतंक भी ब त था। अग य का आ म
एक अ छा-खासा सैिनक सि वेश था। ब त देव, ग धव, ऋिष अग य क सेवा म उनके
उपिनवेश म रहते, उनक पूजा करते और उनक आ ा मानते थे। राम के आने से उ ह
अपूव बल िमला। अब, जब सूपनखा से उनका िव ह आ और खर-दूषण से यु आ तो
अग य और सुती ण ऋिष के नेतृ व म जन थान के सभी ऋिषय ने राम क सहायता के
िलए यु कया था। राम ने उनक सहायता से ही जन थान को रा स से रिहत कर दया
था। उ ह के भय से रावण ने राम पर आ मण करने का साहस नह कया–चोर क भांित
सीता को हर ले जाने क योजना बनाई।
वा तव म सभी ऋिषगण सश रहते तथा यु म धीरतापूवक लड़ते थे।
आ मर ा म समथ ए िबना जन थान तथा द डकार य म वे रह भी नह सकते थे। उनके
उपिनवेश भी एक कार के छोटे-से जनपद ही थे, जहां मुख ऋिष का शासन राजा ही क
भांित माना जाता था और उ ह कु लपित समझा जाता था।
पंचवटी के िनकट िवनता के पु –ग ड़ के भाई–जटायु का छोटा-सा उपिनवेश था।
जटायु दशरथ के िम थे। जब उ ह ने सुना क राम दशरथ के पु ह तो उ ह राम से बड़ा
ेह आ और उ ह ने उनक ब त सेवा-सहायता क । उनका आ म अितशय मनोरम था।
वह एक सु दर समतल पर सु िचपूण ढंग से बसाया गया था। पास ही एक जल-कु ड था
तथा कु छ ही अ तर पर प लिवत और वृ से सुशोिभत गोदावरी थी। चार ओर ऊंचे-
ऊंचे पवत थे, िजनम अनेक गुफाएं थ । इन पवत म साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल,
आम, अशोक, ितलक, के वड़ा, च पा, च दन, कद ब, लकु च, धव, अ कण, खैर, शमी,
पलाश और गुलाब के रमणीय वृ -पादप सुशोिभत थे। सीता ने अपने म-सीकर से
स चकर इस आ म को अ य त मृद-ु मनोहर बनाया था। कुं ज म हर समय सारस, चकोर,
हंस, जलकु कुट ड़ा करते थे। वृ पर प ी चहचहाते ए कलरव करते; मोर कू कते
तथा मृग-शावक छलांग भरते थे। राम-ल मण ने िम ी क दीवार और लकड़ी के ख भे खड़े
करके , ऊपर बड़े-बड़े बांस ितरछे डाल तथा उन पर शमी क शाखाएं फै ला तथा मजबूत
रि सय से बांधकर उनके ऊपर कांस, सरक डे और प े िबछाकर उ म छायादार घर
बनाया था तथा चार ओर क भूिम को समतल कर वहां िविवध कार के फल-फू ल के
वृ रोपे थे। राम-ल मण गोदावरी म ान करते, मृगया आखेट करते, बिल-हिव-िविध
करते, पर पर कथा-वाता करते, तापसजन , ऋिषय एवं जन थान िनवािसय क सब
भांित सहायता करते, सबके साथ कौटु ि बक क भांित रह रहे थे। सभी उ ह उ कु लीन,
धीर-वीर, स न, िहतैषी मानकर उनका स कार करते थे। सीता प -पु प, फल-मूल से
आगत-समागत सभी जन का स कार और अ यथना करती–तपि वय क ि य के साथ
िहल-िमलकर रहती थी। सीता बड़ी भावुक, कोमल और मृदल ु वभाव क ी थी। सभी
तापिसयां उससे स और स तु रहती थ ।
79. हरण

एक तापसी के साथ सीता आ म के पौध म जल स च रही थी। जल स चते-


स चते वह तापसी से कह रही थी–‘‘आय , ये देव-िनमा य पु प-वृ त ही हमारे इस आ म
क स पदा ह। इसी से जब तक आयपु वन से नह लौट आते, म इन बाल-वृ को
स चती र ग ं ी।’’
तापसी ने कहा–‘‘भगवती ने ठीक ही कहा है। लो, म सरोवर से जल लाती –ं तुम
इन वृ के मूल म स चो।’’
तापसी कलश उठाकर चली तो सामने फल-मूल और आखेट िलए राम को आते
देखकर बोली–‘‘अहा, रामच आ गए।’’
राम ने सीता को जल से भरा घड़ा उठाए पौध को स चते देखा तो उनका मन
िख हो गया। उ ह ने मन-ही-मन कहा–‘‘िध , यह रा य-भार भी कै सा ग हत है,
िजसने हम वन म वास करने को िववश कया! यह वैदह े ी, जो हाथ म दपण लेने से भी थक
जाती थी, जलपूण घट िलए कब से पौध को स च रही है। पर तु यह ि या वैदह े ी तो क
से भी िवनोद क रचना करती है। देखो, ये यासे िवहग उसक छोड़ी ई जलधार म च च
डु बोकर पानी पीते ए कतने भले लगते ह! पर तु यह वन तो ी-सौकु माय को भी वन-
लता क भांित सुखाकर कठोर कर देता है। ध य है वैदह े ी क यह म-तप या!” उ ह ने
आगे बढ़कर कहा–‘‘मैिथली, तेरी तप या अभी पूरी ई या नह ?’’
‘‘अहा! आयपु ह। जय वायपु ः!’’
‘‘प र म से ा त- ला त म-सीकर से स प तेरा मुख स ः ात कमल सा
दीख रहा है। सो अब तेरी तप या म िव न हो तो आ, यहां शीतल छाया म बैठ।’’
‘‘जैसी आयपु क आ ा!’’
‘‘सीते, यह कै सा सुहावना समय है। शीत के कारण शरीर म फू त का अनुभव हो
रहा है, अब शरीर अिधक जल का योग नह सह सकता, सहसा भूिम श य- यामला हो
रही है। शरीर को अि और धूप–सुहाने लगी। इ ह दन राजा लोग िवजय-कामना से
िनकलते ह तथा सूय दि णायन आ जाते ह। िहमवान् भी अपने वा तिवक प को कट
करता है, अब तो दोपहर को भी बाहर आने म क नह होता। वृ क छाया और शीतल
जल अब अ छा नह लगता। िहम के कारण राि अिधक अंधेरी हो जाती है। शीत के
कारण घर से बाहर कोई आदमी नह िनकलता। पू णमा क राि भी अब धूिमल होती है,
वायु भी अिधक शीतल हो गई है। श य- यामला भूिम कु हरे से आ छा दत काि तहीन
तीत हो रही है। सूय के उदय होते ही सारा वन- देश दी -सा हो उठता है।
ातःकालीन सूय का काश तो म द रहता है, पर म या न म अब वह सुखकर तीत
होता है। जल शीतल हो जाने से गजराज अपनी सूंड़ जल म डालते ही बाहर िनकाल देते
ह। जल के प ी जल म बैठे ए भी जल म च च डालने का साहस नह कर सकते।’’
राम के मुख से यह वणन सुनकर सीता ने कहा–‘‘आयपु , धमा मा भरत का इस
समय या हाल होगा? वे तो आपके कारण अपनी ही राजधानी म सब राज-भोग याग
तापस-जीवन तीत कर रहे ह। रा य-मान और भोग–सब उ ह ने याग दया है। वे फल-
फू ल का िनयिमत आहार करने के कारण अित कृ श हो गए ह गे। इस शीतकाल म भी
चारी हो क ठन भूिम म सोते ह गे। वे िन य ही वेला म सब अमा यजन सिहत
सरयू तट पर जाते ह गे। उन स यवादी भरत ने तो सब कु छ याग आप ही का आ य िलया
है। लोग कहते ह क मनु य अपनी माता के गुण का अनुसरण करता है, पर तु महा मा
भरत ने तो अपने बताव से इस लोकोि को िम या िस कर दया है। हे आयपु !
धमा मा दशरथ जैसे िजनके पित और भरत जैसे िजनके साधुपु ह , वह कै के यी माता कै से
ऐसी िन ु र हो गई?’’
इसी समय कसी ने बाहर से पुकारा–‘‘अहमितिथः। कोऽ भोः!’’
राम ने सुनकर कहा–‘‘ वागतमितथये!’’
उ ह ने ार पर जाकर देखा–एक तप वी मृगचम धारण कए, द ड हाथ म िलए
खड़ा है। दृि उसक सतेज है, िसर पर जटाजूट है।
राम ने कहा–‘‘अये भगवन्! अिभवादये।’’
‘‘ वि त। मेरा का यप गो है। मने सांगोपांग वेद पढ़ा है। म धमशा , अथशा
और योगशा का भी ाता ।ं ’’
“भगवन्, यह आसन है, बै ठए।’’
अितिथ के बैठने पर राम ने कहा–‘‘मैिथिल, पा लाओ, अ य लाओ, अितिथ का
स कार करो।’’
रावण ने बैठते ए कहा–‘‘स कृ तोऽि म। पूिजतोऽि म। अहा, िहमालय के स म
ृंग पर जो कांचन-पा मृग मने देखा, उसक शोभा अकथनीय थी।’’
‘‘ या वैसे मृग अ य नह होते?’’–सीता ने उ सुकता से पूछा।
‘‘वह ह। वे म दा कनी का गंगाजल पान करते ह, बैदय ू -मिण-सा याम उनका
पृ है, पवन के समान वेग है। वे नील ीव, र शीष, कृ णपाद और ेत छद- व प ह।’’
सीता ने चम कृ त होकर कहा–‘‘भा यव त िहमशैल-पा वत देव ही उस र य
ह रण को देख सकते ह। आयपु , य न हम लोग भी चलकर वह रह।’’
राम ने हंसकर कहा–“ि ये, तूने यहां िजन मृग-शावक तथा गु म को अपना पु
बनाया है और िजन लता को तू सखी के समान यार करती है, उनसे पूछ ले।’’
रावण ने कहा–‘‘अहा, िहमवंत शैल के उस अंचल म जो योितलतार य है, वह तो
वहां कभी राि का भान ही नह होने देता।’’
‘‘ या भगवन् वह िहम शैल-िशखर पर रहते ह?’’
‘‘नह तो या? क तु अरे , यह या चम कार है! यह िव ुत् क -सी चमक कै सी
ई? अरे ! वह देखो, कांचन-पा मृग है!’’
‘‘ या सचमुच?’’
‘‘देखो-देखो, वह भागा, यह मुड़ा!’’
‘‘सचमुच! सचमुच! ि ये, ल मण से कहो–उसे पकड़े।’’
‘‘सौिम तो तीथशाला से लौटे ए कु लपित क अ यथना करने आपक आ ा से
गए ह।’’
‘‘तो म ही जाता –ं मेरा धनुष ला–बाण दे।’’
‘‘आयपु , म या क ं ?’’
‘‘इन महा मा का स कार कर!’’
इतना कह राम धनुष पर बाण का स धान कर उस कांचनमृग के पीछे दौड़ पड़े।
उ ह दृि से ओझल आ देख सीता ने कहा–‘‘अरे , िबना आयपु के यहां अके ली को तो
मुझे बड़ा भय लगने लगा, म तो कु टी म जाकर बैठती ।ं ’’
उसे उठकर जाते देख रावण ने कठोर वर से कहा–‘‘सीते, ठहर! ठहर!’’
‘‘अरे ! तुम कौन हो?’’
‘‘सु दरी, तेरी कांित वण के समान है, यह पीता बर तेरे वण गात पर खूब िखल
रहा है। तू नारी है, ी है, काि त है, क त है, अ सरा है अथवा व छ द-िवहा रणी रित
है। तेरे ने अित सु दर ह और तेरी धवल द तावली मेरे मन को भा गई है। तेरे सौ दय पर
म मोिहत ।ं तेरी यह पतली कमर तो गजब ढा रही है, तेरे तन भी कै से चु त ह! तुझ
जैसी नारी तो मने आज तक देखी ही नह । कहां तो तेरा यह देवदुलभ प, उभार और
कोमल मृदल ु गा और कहां यह दुगम वन, जहां पद-पद पर भय है। अरी तुझे तो मिण-
ासाद म, पु प से सुरिभत वा टका म, समृ नगर म रहना चािहए। तू यहां हंसक
ज तु से प रपूण वन म कहां आ फं सी है?’’
छ वेषी अितिथ से ऐसे अ ुत वचन सुन भयभीत होकर सीता ने कहा–‘‘यह तो
अितिथय का सदाचार नह है। तुम कोई छ वेशी, दुराचारी, त कर तो नह हो?’’
‘‘अरी, या तू नह जानती? िजसने देवराट् -सिहत सब देव, यम, कु बेर और पृ वी
के नृपितय को जय करके ि िव म पद ा कया है, िजसके भय से सब देव, दै य, असुर,
नाग, थर-थर कांपते ह, म वही जग यी र े रावण ,ं िजसक बहन सूपनखा का तेरे
इस वनवासी पित ने अंग-भंग कया है तथा िजसके चौदह सह भट को मार डाला है।’’
‘‘ या रावण?’’
‘‘ ,ं अब तू मेरे हाथ से बचकर कहां जाती है?’’
वह उसे पकड़ने को आगे बढ़ा। सीता ने ची कार करके कहा–‘‘आयपु , र ा करो!
सौिम , र ा करो!’’
‘‘अरी सुन, अब तू उस बिह कृ त राज िभखारी राम का यान छोड़ और मुझी
को आयपु समझ। म तुझे अपनी रािनय म सव प र थान दूग ं ा। मेरी वण लंका म–जो
समु के म य म बसी है तथा िजसक अतुलनीय शोभा ि लोकिव ुत है–चलकर मेरे
व णम ासाद म तू रह। वहां मेरे अ त:पुर क सैकड़ दािसयां तेरी सेवा करगी और तू
यथे सुख-भोग करे गी।’’
सीता ने यह सुनकर ोध से कहा,‘‘अरे पितत, कु टल, चोर, तेरा सवनाश
उपि थत है। जब तक आयपु नह आते ह, तू यहां से भाग जा।’’
‘‘तो अब तो तुझे लेकर ही जाऊंगा।’’ इतना कह उसने आगे बढ़कर सीता को
बा म उठा िलया और कु करी क भांित िवलाप करती ई तथा ‘आयपु र ा करो!
सौिम , र ा करो !’ पुकारती ई सीता को रथ म डाल रावण भाग चला। चलते-चलते
उसने पुकारकर कहा–‘‘अरे , जन थान म रहने वाले तपि वयो! सुनो, यह म र पित रावण
लंका का अिधपित इस दाशरिथ राम क भाया सीता को हरण करता ।ं राम क य द
ा धम म िच हो तो इसक र ा करे ।’’
इतना कहकर उसने वेग से रथ हांक दया। रथ के ख र वायुवेग से उड़ चले।
सीता पुकार रही थी–‘‘आयपु , र ा करो! सौिम , र ा करो! र ा करो !’’ सीता का
आतनाद सुनकर तप वी िच लाने लगे–‘‘अरे , बचाओ, बचाओ! धमा मा राम क प ी
भगवती सीता को यह कोई चोर चुराए िलए जा रहा है।’’
80. जटायु का आ मय

इसी समय कसी ने व -गजना क भांित कहा–


‘‘ठहर रे पािप , तू पराई ी को चुराकर कहां भाग रहा है?’’
रावण ने देखा–जटायु ोध से भरा दौड़ा चला आ रहा है। आकर उसने रावण के
रथ क अ तरी क व गा एक झटके के साथ पकड़ ली। अ तरी हठात् क गई।
रावण ने ोध करके कहा–
‘‘तू कौन है रे हतायु, जो मेरे बीच आता है?’’
‘‘म ग ड़ानुज जटायु ।ं यह िनि दत कम करने वाले चोर, तू कौन है?’’
‘‘इस बात से तेरा या योजन है? तू य द ाण से मोह रखता है तो मेरी राह से
दूर हो जा !’’
‘‘यह कै से? अरे म वृ ं इसी से कहता !ं पर या मेरे देखते तू चोर, पराई ी
का य अपहरण कर ले जाएगा ?’’
‘‘तू िन य ही मरना चाहता है।’’
‘‘म अभी तुझे रथ से नीचे पटकता ,ं ले संभल!’’
इतना कहकर जटायु ने टांग पकड़ रावण को रथ से नीचे ख च िलया। रथ से नीचे
िगरकर ोध से लाल होकर रावण धनुष ले जटायु पर बाण क वषा करने लगा। बाण से
घायल होने पर भी जटायु ने साहस नह छोड़ा। उसने िनह था होने पर भी रावण को
पकड़कर भूिम पर धर पटका। ब त देर तक दोन म घोर यु होता रहा। वीरवर जटायु ने
रावण का कवच फाड़ डाला, धनुष टु कड़े-टु कड़े कर दया, रथ का छ भंग कर दया और
लात-घूस से रावण को ाकु ल कर दया। इस समय अनेक तप वी भी वहां एक हो गए
थे, वे सब कहने लगे–‘‘अरे कायर चोर, यह भगवती सीता दाशरिथ राम क प ी ह। या
तू उस तेज वी राम को नह जानता, िजसने जन थान को रा स से रिहत कर दया है?
अरे पि डत, यह भी कोई परा म का काय है? तुझे अपने परा म का गव है तो तिनक
ठहर, वे दोन भाई अब आते ही ह गे।’’
इसी समय परा मी जटायु उछलकर रावण क पीठ पर चढ़कर बैठ गया और जैसे
महावत हाथी क गदन पर अंकुश छेदता है, उस तरह उसक गदन का मंथन करने लगा।
इससे ितलिमलाकर रावण ने बड़े वेग से जटायु को भूिम पर पटक दया और वीर को
अशोभनीय रीित से ख ग िनकालकर िन:श जटायु पर आघात करने लगा। ऐसे करारे
आघात खाकर जटायु ल -लुहान हो भूिम पर िगरकर छटपटाने और ‘हा राम, हा राम’
कहने लगा। अपने सुर के िम जटायु क यह दुदशा देख सीता रथ से कू दकर जटायु से
िलपटकर ‘हा तात, हा तात’ कहकर िवलाप करने लगी। उस िवलाप करती ई सीता के
बाल पकड़ घसीटता आ रावण फर उसे रथ क ओर ले गया तथा जबरद ती रथ पर
डाल फर वहां से भाग चला। सभी ॠिष कु मार, बटु क, तापसी ि यां, सभी भीत-च कत
हो ‘हा राम! हा राम !’ कहते इधर से उधर दौड़ चले।
81. अशोक वन म

सीता के के श िबखर गए। व फट गए। उसके जूड़े म लगे फू ल झड़-झड़कर पृ वी


पर िबखर गए। सीता–‘हा सौिम , हा आयपु ’ कहती जा रही थी। वह अपने अंग के
आभूषण उतार-उतारकर पृ वी पर फकती जाती थी, िजससे कदािचत् राम उ ह देख उसके
हरण क दशा को पहचान ल। जब सीता का नूपुर उनके पैर से िखसककर िगरा, तो ऐसा
तीत आ, जैसे आकाश से पृ वी पर िबजली िगरी। जब आभूषण िगरते थे, तो ऐसा
तीत होता था क आकाश से तारे टू ट-टू टकर िगर रहे ह। ऐसा तीत होता था क सीता
के दु:ख से सूय भी िन ल हो गए, वन देवता भी जैसे थर-थर कांपने लगे। वन के मृग,
संह, बाघ भी शोक िवत हो गए। पवत शोकम हो झरने के बहाने अपने आंसू बहाने
लगे। सीता–राम और ल मण कह आते दीख जाएं, इस आशा से बार-बार चार ओर
देखती जाती थी। वह रावण से िवलाप के बीच-बीच कह रही थी–‘‘अरे अधम, त कर,
दुरा मा, तुझे यह नीच काय करने म ल ा नह आती? अरे छली, कायर, तेरे इस कु ि सत
कम को तो संसार के मनु य ू र और अधम ही कहगे, तेरे परा म को िध ारगे। अरे , तुझ
पापी पर िध ार है। तूने तो अपने इस आचरण से अपने कु ल को भी कलं कत कया। अरे ,
तू तो अपने को वीर बताता था। अरे , जो कह वे दोन महा मा दशरथकु मार राह म िमल
गए, तो तू अपनी मृ यु ई जान। मुझे हरण करके तेरा कु छ भी उ े य पूरा न होगा। म तो
त काल ाण दे दूग ं ी।’’
इस कार िवलाप करती ई सीता ने जाते-जाते राह म एक पवतकू ट पर पांच
वानर को बैठे देख अपना पीत उ रीय उताकर फक दया। उसम कु छ गहने भी बांध दए।
वे वानर उस िवलाप करती ई सीता को एकटक देखते रहे।
अ तत: वह दुधष रावण सीता को लेकर िन व लंका म जा प च ं ा। वह सीता को
अ त:पुर के ार के भीतर ले गया। वह ार वण का था। उसक िखड़ कयां हाथी दांत क
थ तथा गवा चांदी के थे। वहां द दु दुिभ बज रही थी। रा सराज रावण बलपूवक
सीता का हाथ पकड़े महल क वणमयी सी ढ़य पर चढ़ने लगा। हाथी दांत और चांदी क
िखड़ कय म सोने क जािलयां लगी थ । रावण अपना महल सीता को दखाने लगा।
अनेक भवन, तालाब और बारहद रयां दखा , फर कहा–‘‘हे सीते, मेरे अधीन असं य
रा स ह। अब म और मेरा यह सारा राज-पाट और वैभव तेरे अधीन है। तू मुझे ाण से
भी अिधक ि य है। मेरे मिणमहल म हजार सु द रयां ह, उन सबके ऊपर म तुझे महारानी
बनाना चाहता ।ं समु से िघरी इस लंका का िव तार सौ योजन का है, इसे इ सिहत
सब देवता भी िवन नह कर सकते। वह देख, उस गगन पश महल म देवराट् इ ब दी
है। अब तू उस िभ ुक राम के साथ रहकर भला या करे गी? सो तू उसका यान छोड़ दे।
यह देख, मेरा पु पक िवमान सूय के समान देदी यमान है, िजसे मने अपने भाई कु बेर से
छीना है। यह अित रमणीय िवमान मन के समान गितमान् है। इस पर बैठकर तू मेरे साथ
व छ द िवहार कर। म तेरी आ ा के अधीन रहने वाला, रावण तेरा दास ।ं ’’
सीता ने तब ितनके क ओट करके कहा–‘‘हे र े , आपका यह सब कथन और
काय आपके िलए शोभनीय नह है। कै से आ य क बात है क आप जापित के वंश के
पु ष तथा महावीर होकर ऐसा कायरतापूण कु कम कर बैठे। मेरे पित रघुकुल-ितलक
ीराम ह, वे स य ित जगत् म िव यात ह, य द जन थान म उनके सामने पड़ जाते तो
अव य ही मारे जाते। आप चाहे मेरे इस अवश शरीर को बांध या न कर द, पर म
आयपु दाशरिथ को छोड़ कसी अ य पु ष को नह छू सकती।”
तब रावण ने कहा–‘‘मैिथली, म आज से बारह मास क अविध तक तेरी वीकृ ित
क ती ा क ं गा, य द इतने दन म भी तू मुझे वीकार न करे गी, तो म तेरा वध करके
भ ण क ं गा, यह तू भली-भांित सोच ले।’’
इतना कहकर उसने सीता को अशोक-वन म ले जाकर रहने क व था कर दी,
जहां उसके िलए सब सुख-साधन उपि थत कर दए गए।
82. वार वे म

लंका क िस कु नी यमिज वा ने जब दूती से यह सुना क वह मूख


अ यकु मार मदालसा के ेम म भली-भांित सुलग रहा है और यहां आने के िलए उ सुक है,
तो वह बड़ी स ई। उसने उसे आने का स देश भेज दया। फर उसने पु ी को वे याधम
क दी ा देते ए कहा–‘‘ले, अब तू भी तैयार हो जा। वे या के िलए ऐसा नगर-नायक
होना चािहए जो गु जन क बाधा से रिहत हो, अपने मन का वयं मािलक हो,
िजसका बाप राजधानी से दूर यु ोग म िनर तर त रहता हो, पु क चे ा पर
यान ही न दे सके तथा वह तन-मन से ेहा ा त हो। ऐसा ही नागर यह मूख राजकु मार
है। वे या के िलए ऐसा ही नायक सवािभलािषताथपूरक होता है। तू अब इसे अपने अधीन
कर इससे िवपुल संपि हरण करने क चे ा कर।’’
कु छ ही समय म राजपु ने मदालसा के िनवेश म वेश कया, नट-िवट-दूती और
प र क के सिहत। उसक चे ा गंवा और वेश अ भुत था। िसर पर खूब मोटी-ल बी
चोटी, पांच-पांच अंगुल के के श, ल बे कान म बड़े-बड़े सीस-प , नुक ले-छीदे दांत। उं गली
क पोर-पोर म अंगुिल- ाण, क ठ म वण का क ठ-सू , सवाग पर कुं कु म-क तूरी का
लेप, रं गीन व , नािभ तक लटकती ई पु पमाल, मोम से नम कए और िशलारस से रं गे
ए उपानत् ठौर-ठौर पर नाना रं ग के टोटका-सू के श म बंधे ए। पान का बीड़ा ठूं सने
से फू ला आ एक गाल। सुनहरे तार के काम क कनारी वाली शा टका और उ रीय, र
पुननवा के रस म रं गे ए नख। कसी क नजर न लग जाए–इसके भय से सू म बांधे ए
शंख-च , ा -नख, वण-मि डत शूकर-द त। आगे ता बूल-करं ड िलए एक दास। अगल-
बगल े -विणक, िबट कतव- धान संग। हाथ म ख ग। मदालसा ने देखा तो उसे हंसी आ
गई, पर तु वह लीला-िवलास से अंगड़ाई-सी लेती, बा मूल और उपांग क झलक
दखाती वहां से भाग गई।
यमिज वा ने उसे बैठने को पी ठका दी, ता बूल दया, पृ तूल दया। राजकु मार
ठाठ से पृ तूल पर शरीर का भार रख बैठ गया। संगी-साथी भी बैठे और अ ासंिगक ग प
मारने लगे। वे झूठी चापलूसी करने और भ ड़ी ग प मारने लगे।
मन क िवरि को िछपाकर कु नी यमिज वा ने कहा–‘‘अहा, आज तो हमारे
सह ज म का ही पु योदय आ, जो राजपु के दशन से नयन सफल ए !’’
इसके बाद तो वे यावृि के सारे भावा ही यथा म यु ए। पहले चापलूसी
फर अनुराग, णय, ठना, मान-मनौवल, िवरह–शोको छ् वास आ द हाव-भाव म
मदालसा ने माता क िसखाई ई समूची िव ा का सदुपयोग कया, िजसम यह मूख
राजकु मार फं सकर धन, र -मिण लुटाता रहे। वे या और ानी समिच होते ह। वे
िन: पृह रहकर रस हण करते ह। वे या को धन देत-े देते नायक चाहे कं गाल ही य न हो
जाए, पर तु उसक दृि उसके व के उतार लेने म ही रहती है। इस कार बड़े-बड़े
दृढ़िच पु ष के स मुख भी वे म-िवलािसनी वे या कामाधीन होने का अिभनय करती
ई पु ष को असंगत कर देती है। कभी वह संजातपुलका होकर, कभी उ वणा बनकर,
कभी जातो क पा और कभी वेदा वपु: होकर बार बार हा य-ला य करके रोकर-गाकर,
मौन-कोप करके , कभी पलंग पर धी िगरकर, कभी ि य नायक क गोद म पछाड़ खाकर
अपनी उ ग े ाव था का अिभनय कर नायक को पागल बना देती है।
कभी तो वह काम-संताप को दूर करने के िलए कुं कु म-कपूर-च दना द शीतल
पदाथ का लेप करती, कभी संताप- था कट करने के िलए धूिल-धूस रत रहती। कभी
वह ऐसी िवरह- ाकु ल था दशाती क सिखयां, चे टयां च दन-पंक और नीहार,
घनसार, कदली-दल, च का त मिण से भी उसका दाह शा त नह कर सकती थ । वह
लाप-सा करती ई कहती–‘‘अरे , हटाओ इस घनसार को, दूर करो मिणहार को, इन
कमल-दल से या? अरी सिखयो, बस करो–ये मृणाल मेरे द ध दय को शीतल नह कर
सकते।’’ और जब नागर िनकट आता तो यह उसका दृढ़ा लंगन करके रागाितशय कट
करती। कभी अपनी भुजा को मरोड़ती। कभी कहती–‘‘यह कू कने वाली कोयल, ये गूंजने
वाले भ रे , यह कु सुमारोही पवन िवधाता ने मेरे नाश के िलए ही रचा है।’’ फर नायक पर
कोपकर व नयन से उसे घूरती ई कहती–‘‘अरे िनदय-िनमम, मुझे अबला समझकर यह
बली मकरके तु मुझे आ ा त कर रहा है। इससे मेरी र ा कर! अरे , पूव ज म के सुकृत से ही
मने तुझे पाया है।’’
इस पर यमिज वा कु नी रं ग चढ़ाती। वह कहती–‘‘अहा, यह मदालसा! अरे ,
जब अतनु ने िशव पर कु सुम-शर संधान कया था, तब जो कु सुम झड़कर िगरे उ ह से मेरी
यह बेटी सुगा ी मदालसा िवधाता ने बनाई है। गौरी के लाव य का तो यह उपहास-सा
करती है। भला लाि छत शशधर से इसक मुख-छिव क या तुलना? अरे , कमल क
शोभा तो िणक है और च ुित िव म-रिहत है– फर भला मेरी मदालसा के मुख क
उपमा या है? इसके ने को कमल का म करके भ रे घेर लेते ह। वह जो वाभािवक
अ ण अधर को ब धुजीव-पु परज से रं िजत करती है तथा लाल-लाल चरण को अल क
देती है, सो के वल राग–वृि के िलए नह , वह तो उसका के वल िव यास-िवलास है।
िवधाता का चम कार तो देख क उसके संपु उ मांग को उसक ीण क ट कै से धारण
कए है। ितस पर उसका मुरज-वंशीवादन...नृ य-गीत-कौशल तो भोगी शेष भी वणन
नह कर सकता। ऐसी मेरी मदालसा है, जो न तो कु लीन क आन मानती है, न वेदवादी
ही को कु छ समझती है, पर तेरे िलए वह सूखकर कांटा हो गई। इस अनुराग क भी भला
कु छ हद है!’’ इस कार िविवध भांित उ ेिजत करके राजपु को भरमाया गया और बार–
बार उससे धन हण कया गया। उसके आने पर मदालसा दूर ही से अ यु थान देती,
ितरछी नजर से देख म द-म द मु काती, आंचल म लपेटकर उं गिलय को ठती। फर झट
अपने उपांग क छटा दखाती वहां से भाग जाती। इसके बाद दीपो वल-कु सुमधूप,
ग धाढ् य वासकागार, कोमल पयक, िवतत िवतान, अिभन दनीय मृद ु भाषण और स ेह-
स ीड- ससा वस अव रल प रहास, पेशलालाप-प रपूण-पुलकद तुरशरीरा
ि व सकलावयवा नाियका।
य कु छ काल रस-कस हण होने पर अब कु नी और नाियका म इस तरह िम या
वचन-कलह आर भ आ क िजसम राजपु उसे अ ान म कसी तरह सुन ले–‘‘अरी
अभािगनी, तूने इस राजकु मार के पीछे अप रिमत धनवान्, िवनयी और ेमी म ी-पु
को भी कु छ न िगना और म दारक र -पारखी भृत धनदाता को तूने मेरे कहने पर भी
दु कार दया! अरी मूढ़, तूने अनेक राजवग जन क ओर, जो बात क बात म मेरा घर
भर दे सकते थे, आंख उठाकर भी न देखा! ऐसी तू इस राजकु मार पर अ धी हो अनुर हो
गई। तुझ िवपरीत बुि ने महाधनदाता शौि कका य को भी अपमािनत करके लौटा
दया। उस रोगी मृत ाय बूढ़े का अितसमृ पु भी तूने हाथ से खो दया, जो अपना
सव व तुझ पर वार रहा था। इस कार तूने घर म आई ल मी को लात मारी। अरी
पािपन, यह सब तेरी ही मूखता का प रणाम है क हम इस राज-पु के पीछे लुट बैठे। देख,
उस द तव के पु ने मािलनी को कै से जड़ाऊ अलंकार दए ह–तुझे उ ह देखकर भी लाज
नह आती! उस धवल गृह को ही देख, जो अनंगदा के िलए उस आपिणक ने बनवा दया है।
या तू इतना भी नह समझती क गिणका के िलए यही आयु कमाई करने क है! अब य द
इस धनाजन-अनुकूल समय म वे या क बेटी एक पु ष को लेकर ेम के वशीभूत हो बैठे,
तो वृ ाव था म उसे िभ ा ही मांगनी होगी। या तूने वह नीित-वा य नह
सुना–‘ि तीये ना जतं धनं–चतुथ कं क र यित ?’ या तू नह जानती–‘सद्भावजाऽनु
रि निह प यं प यनारीणाम्।’ सो मने अपना देह बेचकर जो कमाया है, वह भा ड
ला दे, म तो अब तीथया ा को जाती ।ं तू अपने यार को लेकर रह !’’
बुड्ढी कु नी के इस कार िम या कलह का उपसंहार होने पर मदालसा ने रोष-
भरे वर म कहा–‘‘अरी मात:, धनलाभ ही संसार म बड़ा लाभ नह है, ि य-संयोग ही
बड़ा लाभ है। धन तो आता-जाता ही रहता है। उससे या मन क तृि होती है? अनुराग
से िस ता य को भला िवभवाजन क या चंता हो सकती है? ि य-सहवास म
ता बूलयाचन ही सबसे बड़ा लाभ है? ि य-सहवास के समान तो सकल वसु धरा का भी
मू य नह है, फर राजकु मार ने तो सब गिणका म मुझे ही वार-मु या बना दया है।
मात:, तू भोली है, इसी से तेरा यह उपदेश थ है। अब तो भला हो या बुरा, सुगित हो या
दुगित, महल म र ं या वन म, वग म या नरक म, उसी के साथ मेरा रहना, मरना, जीना
है। थ बकवाद से या योजन! और तू जो अपने आभूषण क बात कहती है, सो यह
ले–म तो अपने राजपु ही से सुभूिषत ।ं म तेरे समान लोभ के वशीभूत नह ।ं म तेरे
इस घर म भी न र ग ं ी।’’
इतना कहकर उसने सब गहने उताकर कु नी के ऊपर फक दए और गु से म
ठती ई वहां से चली गई।
परो म मूख राजकु मार ने जो यह कपट-कलह सुना तो वह रागा ध हो सोचने
लगा–‘‘अहा, ध य है, यह वारविनता ि या मदालसा, जो मेरे िलए जननी ज म थान,
बा धव, व ालंकार सभी को तृण के समान समझती है। सच है–‘मरणमिप तृणं समथय ते
मनिसजपौ षवािसता त य:।’ अब जब इस मदालसा ने माता का मोह याग घर म
रहना भी अ वीकार कर दया है तो फर इससे अिधक ि य मेरे िलए या है! म भी अपना
सव व देकर इसे ही तृ क ं गा। घर-बार, ब धु-प रवार, संसार–मेरा जो कु छ भी है, वह
मदालसा ही है। अहा, यह मदालसा च मा क करण क भांित पश ही से मन को
शीतल कर देती है। यह कतनी सु दर, कतनी कोमल, मृदल ु और ाण को आन द देने
वाली है! इसका लिलत अंगहार कतना मनोहर है! मृद ु मु कान कतनी आकषक है! इसका
यह सिवलास तरलाि िव ेप पु प-बाण का दोहद-दान ही समझना चािहए, न तो इसे धन
का ही लोभ है, न कसी पर ने ासि है। यह मु धा सीधी भी है और िश भी। कभी कसी
पु ष क ओर यह नजर उठाकर भी नह देखती। न मेरे अित र कसी क शंसा करती
है। कालोिचत इसका वेश-िव यास होता है। यह गजगािमनी मेरी ि या इस पृ वी पर
अि तीय है। इसम च वाक, हंस, नकु ल, पारावत–सभी के गुण का समावेश है। इसका
हा य मनोहर है, ऐसी दुलभ, अनुकूल, मनोहारी और सु दर ी संसार म और कौन है
भला? भाया तो के वल अ -व ारा भरणीया ही होती है, ेह-समागम के यो य तो यह
वार-विनता ही है। अजी, प रणीता म अनेक दुगुण ह। वह भाइय से अलग कर देती है, कटु
भाषण करती है, सदा घर के दुखड़े रोती रहती है और सदैव मातृकुल क ही शंसा करती
है। पित के सदा दोष िनकालती है। फर भी मूख जन उसी प ी के वश म रहते ह। पर इस
मदालसा को देखो–जैसा मृदलु इसका तन है, वैसा ही मन है।’’
और वह दन भी आ गया–जब मदालसा मां को छोड़ राजकु मार के नव-िन मत
आवास म आ रहने लगी। उसे ब मू य अलंकार राजकु मार ने भट कए, पर तु एक दन
राजकु मार के पास से जाती ई मदालसा को चोर ने लूट िलया। इसके दो-चार दन बाद
ॠणदाता ने मदालसा क देहरी पर धरना दया। राजकु मार को ॠण चुकाना पड़ा। दो-
चार दन बाद राजकु मार क वि त-कामना के िलए बिल-पूजन का आयोजन आ। इस
कार िविवध भांित से धन-हरण करने पर राजकु मार का भली-भांित ितर कार कर अ त
म यह समझा-बुझाकर क माता ब त गु से म है, अत: कु छ दन आना-जाना ब द रखो–
उसे दूर कर, दूसरे ाहक से ापार आर भ कया।
83. इ –मोचन

अब यहां हम फर ाचीन घटना क चचा करगे। पाठक जानते ह क दै य,


आ द य, देव, दानव और नाग सब पर पर दायाद-बा धव थे। एक िपता से िभ -िभ
माता क स तान थे। वे माताएं भी पर पर सगी बहन थ । तब मातृ-गो चिलत था।
इसिलए माता ही के नाम पर स तान का वंश-वृ चलता था। इसी से इन सब देव, दै य,
दानव, नाग आ द क –जो वा तव म भाई और कौटु ि बक थे–िभ -िभ जाितयां बन गई
थ । फर जब उनका िव तार आ–भू-स पि और रा य के बटंवारे का स मुख
आया, तो आपस म लड़ाई-झगड़े और यु -उ पात ए। इस भाईचारे के बंटवारे के को
लेकर इन दायाद-बा धव म बारह देवासुर-सं ाम ए, जो बड़े ही दा ण थे। ये और
े होने के नाते दै य मुख थे। पर आ द य का नेता सूय–िव णु आ द य को मुख
बनाना चाहता था। बाद म इ ने अपने काल म िव णु क अिभलाषा को काफ उ ी
कया। उसने सब आ द य क एक नई सि मिलत जाित देवसं क बना ली, वयं देवराट्
का पद हण कया तथा ाचीन सुषा नगरी को अमरावती नाम दे, आस-पास के इलाके
को देव-भूिम कहकर उस पर शासन करने लगा। इ ने भी िनर तर दै य और दानव से
यु कए, पर तु िवजय उसक कभी नह ई। कारण क देव के साधन प रिमत ही थे।
दै य और दानव का भारी िव तार और बल बल था। उधर मनु और बुध के इलावत
यागने तथा भारतवष म नवीन आय जाित थािपत करने एवं आयावत क थापना करने
से इ का यान भी इसी ओर गया। सूय–िव णु अब वृ हो चुके थे तथा उनका पु मनु
आयावत म आ बसा था। अत: अब उनक िवशेष वृि इलावत म नह रह गई थी।
वा णेय सब ॠिष-याजक हो गए थे, अत: वे लड़ाई-झगड़े से दूर ही रहते थे। वे देव के भी
िम थे और दै य-दानव के भी। दै य-दानव के याजक और कु लगु होने से वा णेय का
खास भाव था। फर भी वे दोन क यथासंभव सहायता करते ही रहते थे।
‘दायाद-बा धव’ उसे कहते थे जो रा य म िह सा ा करने का अिधकारी हो।
दायाद का अथ पु , कु टु बी और सिप ड था। देव के दायाद के हक को दै य-दानव
अ वीकार नह करते थे। पर देवता अपना िव तार चाहते थे– भु व चाहते थे। यही झगड़े
क जड़ थी। जब िहर या और िहर यकिशपु को मार दया गया और लाद से व णदेव
के साि य म देव के कौलकरार हो गए और लाद को इ पद देना भी तय हो गया,
तब एक बार देव-भूिम क रा य-सीमाएं बंध गई थ । पर तु मह वाकां ी इ इससे संतु
न था और इसी से उसने िस धु नदी पार करके पंचिस धु देश पर आ मण कया तथा
पा महासं ाम आ। इ को पंचिस धु का स ाट् मान िलया गया। पर तु इ
पंचिस धु म बसा नह , इलावत लौट गया, पंचिस धु म अपना ितिनिध ही छोड़ गया पर
ि िशरा का वध करने के कारण उसे इलावत से भागना पड़ा। सारा देवलोक ही उसका
िवरोधी हो उठा। उसके बाद न ष और रिज ने देवलोक म जो उ पात मचाए उससे देव
क शि ीण हो गई। बाद म रिज को बृह पित ने चावाक-िस ा त का उपदेश दया तो
रिज का वंश ही वै दक आय प रवार से पृथक् हो गया। इस कार ना ष से देव का िप ड
छू टा। पर देवराट् प ित चल गई। देव चुनकर अपना इ िनयत करते और वह देव को
अनुशािसत करता था।
तारकामय-सं ाम म जब लाद-पु िवरोचन का वध आ और िवजयी होकर
दै य ने िवरोचन-पु बिल को दै ये -पद पर अिभिष कया, तब दै ये बिल क आ ा
से दै य ने बैल के चमड़े का त मा लेकर सारी भूिम को आपस म बांटना ार भ कया।
इससे देव म बड़ी घबराहट फै ल गई। इ इस समय बड़ी ही िवप ाव था म था। देव का
सारा बल ही िबखर गया था। पर तु इ िव णु को साथ लेकर अनेक मुख देव के साथ
बिल क सेवा म प च ं ा और कहा क ‘पृ वी म हमारा भी भाग है। हम लोग आप ही के
दायाद–बा धव ह। इसिलए हमारी जो देवभूिम आपने जय क है, वह हम लौटा दीिजए।
यह हम आपसे याचना करते ह।’
उन दन सूय ने आय के िलए नवीन य -िविध क सृि क थी। वही य -िविध
आ द य , देव और आय म चिलत हो गई थी। यह य -िविध एक कार से देव का
सां कृ ितक िच न-सी हो गई थी तथा सूय का नाम इसी य -िविध को चिलत करने से
िव णु िस हो गया था। ‘य ो वै िव णु:’–यह देव का एक घोषण-वा य उन दन हो
गया था।
बिल ने देव क बात पर िवचार कया। अपने कु लगु शु और मि य से
परामश कया। पर तु किव शु ाचाय देव तथा िव णु का सारा ही ष जानते थे।
उ ह ने बिल को परामश दया–‘‘इस भूिम म से देव को कु छ भी भाग नह िमलेगा। देव
हमारी दै य भूिम से िनकल जाएं। आयावत म या जहां चाह चले जाएं। वे खटपटी, कु टल
और झगड़ालू ह। उनके रहने से दै य भूिम िनर तर यु - थली बनी रहेगी।’’
किव शु ाचाय बड़े भावशाली और तेज वी पु ष थे। उनका िवरोध साधारण न
था। पर तु इ भी ब त ही कु टल व धूत पु ष था। उसने अपनी क या जय ती को शु के
पास भेज दया। जय ती बड़ी चपला और सु दरी त णी थी। उसने अपने प के मायाजाल
म बूढ़े को फांस िलया। ब त वाद-िववाद और परामश के बाद यह तय आ क जहां
य िविध है–अ याधान है–अि हो है–अि – थापना है, वहां-वहां क भूिम देव को दे
दी जाए। शु य िप जय ती के प-जाल म फं से थे, फर भी उ ह ने बिल के इस िनणय
को मूखतापूण कहा और उसका बल िवरोध कया पर तु बिल ने दै यगु का अनुरोध नह
माना। इससे गु सा होकर किव उशना शु ाचाय दै यभूिम को छोड़ नािभ-भूिम शंक ीप म
चले आए। बिल को उ ह ने याग दया।
ाचीन काल म िजस ‘नािभ’ या ‘भूिम’ कहते थे, उसी को आज अरब देश कहते
ह। उन दन इस भूिम पर वािश का खानदान रहता था तथा उ ह का यहां भु व भी
था। आजकल िजस नगर को ‘अदन’ कहते ह, यही नगर उन दन वािश का मुख नगर
था तथा उसका नाम ‘आ द य नगर’ था। सं कृ त म ‘आ द य’ सूय को कहते ह और अरबी
भाषा म ‘आद’ सूय को कहते ह। यारब, एदम, एरीथस, आद–ये सब सूय ही के पयायवाची
श द ह। लाल सागर का नाम भी सूय के ही नाम पर था। सी रयन–अरबी सूय–उपासक थे।
वा तव म वे विश के वंशधर थे। अदन या आद नगर म उ ह ने आद, आ द य का एक
मि दर बनवाया था, जो सोने-चांदी क ट से बना था। इसक छत मोितय तथा हीर से
बनी थी। उन दन यह देश पूव और पि म के बीच ापार का मा यम था।
वािण य के बा य के कारण तब यह देश मालामाल रहता था। उस काल म यहां
के िनवासी ‘असुर’ और ‘फणीश’ बड़े िस नािवक थे। िम , अरब और भारत को उन
दन एक ापार, शृंखला ने जोड़ रखा था। यही कारण है क भारत से अरब या िम के
जो जल-थल-माग थे–वह इस भूिम पर िवशेष आबादी ई। शेष भाग जन-शू य रहा। उन
दन के बाद भी अरब ब त काल तक सांसा रक ापार भ डार रहा। अरब क इस
ापार- ी क तुित ब त यातनामा इितहास ने क है। इस देश म च दन, अग
आ द के सुगि धत धन से खाना पकता था तथा धन खच करने और शान-शौकत म अरब
के धनीजन संसार-भर के राजा-महाराजा को मात करते थे। उनके ासाद के कवाड़
हाथीदांत, सुवण व मिणजिड़त होते थे। अरब म उन दन वण क इतनी ब तायत थी
क उसका मू य लोहे से के वल दूना और पीतल से ितगुना था। वािश ने अपनी य -िविध
से सारे देश को ा कर रखा था। िस है क अरब के काबा आ द धम े क य -
होम क सुगि धत वायु िम देश तक प च ं ती थी। इसीिलए एले जे डर ने बेबीलोिनया
अपनी राजधानी थािपत करनी चाही थी तथा िम टन ने अपने का म अरब क
सुगि धत वायु से सागर के महकने का उ लेख कया। वािण य और राजनीित का
के थल होने से यहां भी कई बड़े देवासुर-सं ाम ए। वािश ने इसे मिहदेव का
उपिनवेश बना दया था। अरब म ाचीन कं वद ती है क लाहसा एवं बह रयन ा त म
पहले दानव वीर वास करते थे। इस ा त को अरब लोग अब भी ‘रोबाउलखेत’ कहते ह।
आज भी अरब म शहसवार और वीर िस ह।
पाठक को मरण होगा क विश भी सूय के ही पु थे। इससे वे आगे चलकर
सूयवंिशय के , अथच सभी आ द य के , कु लगु और राजम ी बन गए थे। यहां गाद म
उ ह ने िजस सूय-मि दर क थापना क थी, उसके पुजारी भी वािश लोग ही थे। विश
वयं थोड़े ही दन यहां रहे, नारद से िव ह कर वे देवलोक से चले आए– फर यहां
शु ाचाय के आ बसने पर भारत म सुदास के यहां आ गए। पर तु उनके वंशधर और
जायदाद–भूिम–स पि सब अरब ही म रही। ‘रब’, ‘ ’ सूय ही के नाम थे और उसके
पुरोिहत मग, वािश थे। योम-आह, रिववार, रिव-आह एक व रिव-आह दो, सूय ही के
दन व मास ह। रमजान मास का नाम पहले ‘रमादान’ था। यह मुसलमान का बनाया
महीना है। मग, िमिहर, मूक, मौनी, मुिन ये विश ही के वंशधर थे। अरब के मूक, मोखा,
महरा, म ा, मकरिनयत, मैरवा आ द देश और नगर के नाम भी उसी आधार पर ह।
विश को कामधेनुपित भी कहा जाता है। कामधेनु क भूिम उनक ज मभूिम और पैतृक
स पि थी। मग के य क सुग ध से समु क वायु सुगि धत रहती थी। अरब के यमन
देश म मुिनय के अनिगनत आ म, जनपद और उपिनवेश थे और वहां के
हामाहािमयारी सूय-उपासक थे।
पर तु दै य-भूिम छोड़कर जब किव उशना शु ाचाय अरब म आए तो उ ह ने
कु रिश ा त म अपना िनवास बनाया। कु रिश, कु रै शी संभवतः, किव शु ाचाय के ही
वंशधर ह। कु रै शी भाषा ही कु रान क भाषा है। यह भाषा हािमयारी भाषा से िभ है। शु
का नाम का पु ष था ही। अरब म शु का नाम पू य देव क भांित ‘अल उजाह’ िस
है। कु रै शी देश म, म ा म बाद म शु का मि दर थािपत आ, जो ‘का ’ के नाम से
िस आ। आजकल का म ा का िस ‘काबा’ यही का पु ष शु का मि दर है।
उस काल म बृह पित, मंगल आ द अनेक ह और देव क पूजा भी अरब लोग
करते थे–उनक मू तयां भी ‘का -मि दर’ म रखी गई थ तथा एक ाचीन िशव लंग भी
वहां था िजसक पूजा होती थी और िजसका नाम ‘मु ाह’ था। यह एक काले प थर का
चार फ ट ऊंचा और दो फ ट चौड़ा लंग था जो सोने क जलहरी पर रखा रहता था। इनके
अित र सूय के िम ग ड़ क , उ ैः वा घोड़े या सूयपु अि नीकु मार क , मनुपु
नृ संह क मू तयां भी वहां थ । सूय क भी एक मू त रखी गई थी िजसका एक हाथ सोने
का था। इसके अित र और भी मू तयां थ । मु ाह के उपासक खोजा थे। अल उजाह
कु रै िशय का धान देव था। इन सब मू तय को बाद म मुसलमान के पैग बर मुह मद ने
दूर करके के वल ाचीन िशव लंग ही क पूजा कायम रखी थी। ‘का ‘ के नाम पर मि दर
का नाम ‘काबा’ िस है तथा शु वार को सभी अरब-िनवासी जु मा, महान् और पिव
दन मानते ह तथा का -किवता म अरब के लोग संसार के सभी देश के मुख मािणत
ह।
पुराण से ऐसा भी मािणत है क दै ये बिल ने का यप सागर-तट से अपनी
राजधानी हटाकर अरब के िनकट एक नया नगर–‘बलासुरा’ नाम का बसाकर उसे अपनी
राजधानी बनाया था तथा यह पर उसका ऐ ािभषेक आ था और यह पर िव णु और
इ उसके पास भूिम-याचना करने आए थे तथा यह से बिल क नीित से अस तु होकर
शु अरब देश म चले गए थे। बिल क यही ाचीन राजधानी बलासुरा आजकल का
िव यात ‘बसरा’ नगर है। यह बिल को ब दी बनाया गया था। दिम क–विश –दमी
लोग का ाचीन नगर है। शाका, मनना, शोमार आ द भी ाचीन वािश के नगर ह।
वतमान बसरा नगर अित ाचीन बिल के बलासुरा नगर के वंस पर मुसलमान
के खलीफा उमर ने ई. सन् 640 के लगभग बसाया था। ब त स भव है क तब वह कोई
साधारण उजाड़ ब ती के प म रहा हो। वतमान बसरा मेसोपोटािमया या इराक का
खास नगर तथा बड़ा ब दरगाह है। यह नगर समु -तट से काफ दूर ‘श ुल-अरब’ नामक
नदी के िनकट ‘अल-अशार’ के तट पर बसा है। शतुल-अरब इतनी गहरी नदी है क चलने
वाले छोटे-बड़े सभी जहाज उसम आ-जा सकते ह। आर भ म खलीफा उमर क आ ा से
यहां के वल मुसलमानी सेना क छावनी ‘अतवा’ नामक सरदार ने–जब वह ईरािनय से
लड़ रहा था–डाली थी। यह थान तब दजला नदी से दस मील के अ तर पर वतमान नगर
से उ र-पि मी दशा म था। कहते ह, कभी इस नगर क आबादी ब त घनी थी तथा
नगर म बीस हजार नहर थ , िजनम नौकाएं चलती थ । यहां एक िस पु तकालय भी
था तथा ाचीनकाल म यह नगर िव ा और ापार का के था। मुि लम काल म यह
नगर राजनीित का भी वैसा ही के था जैसा िव ा का, तथा यहां बड़े-बड़े िस िव ान्
रहते थे ।
कालच अनेक प कट करता है। यह बलासुरा नगर भी अनेक वैभव देख चुका।
जो हो, जब िव म नृवंश के पुरखा और नेता यहां के बड़े दै य स ाट् क सेवा म एक ए
थे तथा पृ वी-िवभाजन कया गया था, िजसे सह वष से उनके वंशधर उपभोग कर रहे
ह तब से अब तक जाने कतने महापु ष ने अपने उस ाचीन अिधकार क र ा के िलए
कहां-कहां र बहाया है, इसका ठीक-ठीक िहसाब तो इितहास के पुराने पृ भी नह बता
सकते।
अ तु, अब हम फर उसी मूल घटना-च पर आते ह। जब देवराट् इ और िव णु
मुख देवगण को संग ले बिल क राजधानी बलासुरा म प च ं े तो नगर क स प ता देख
दंग रह गए। सारा नगर परकोटे के घेरे म बसा था। सब कार के र से सजे ए ऊंचे-ऊंचे
महल उस पुरी क शोभा बढ़ा रहे थे। नगर के राजपथ बड़े ही श त थे। वहां अनेक कार
के िश पी अपना-अपना कौशल दखा रहे थे। अपनी इस बलासुरा नाम क नवीन
राजधानी म बैठ दै यराट् बिल अपने समूचे दै य-सा ा य का शासन करता था। इस समय
उसने ि लोक पित क उपािध धारण क थी, य क पृ वी पर कोई दूसरा राजा इस काल
म उसक समता का न था। वह धम का ाता, कृ त , स यवादी और िजतेि य था। सब
कोई उससे िमल सकते थे। वह याय का ब त िवचार रखता था। वह शरणागत का र क
और दु का दमन करता था। वह म शि , भुशि और उ साहशि तीन से स प
था। सि ध-िव ह, यान-आसन, ध ै ीभाव और सामा य इन छ: कार क राजनीितय को
वह भली-भांित जानता था। वेद उसने पढ़ा था। वह उदार, सुशील, संयमी, अ हंसक,
शु दय, पू य का पूजन करनेवाला, सब िवषय म पारं गत, दुदमनीय, भा यवान् और
अ य त कमनीय था। अ , र , वण का उसका भ डार अटू ट था। धम-अथ-काम क वह
साधना करता था। वह महादानी था। संयम म दै ये बिल ि लोक म सव े पु ष था।
उसके रा य म न कह अधम होता था–न कोई दीन, दु:खी, रोगी, अ पायु, मूख और कु प
पु ष था।
जब उसने सुना क देवराट् इ और िव णु-जो उसके िपतामह लाद के िम
थे–देव पु ष सिहत उसके नगर म उसक सेवा म आए ह तो उसने अपने मि य को
आदेश दया क देवराज और भगवान् िव णु हमारे पूजनीय अितिथ ह, उ ह आदर के साथ
ले आओ। इस कार मि य और मुख दै य सरदार को भेजकर बिल वयं अपने ह य से
अके ला ही िनकल पड़ा और अपने समृ नगर क सातव ोढ़ी पर जा प च
ं ा। उसने
िव णु का सांगोपांग पूजन कया और इ तथा देव क अ यथना कर कहा–‘‘आपक
अ यथना करके म कृ ताथ आ।’’ उसने बार बार इ का आ लंगन कया और अपने
राजभवन के भीतर ले जाकर अ य-पा से िविधवत पूजन कया। फर कहा–‘‘इ , आज
म आपको अपने घर पर आया देखता ,ं इससे मेरा ज म सफल हो गया। मेरे सभी मनोरथ
पूरे हो गए। आपके साथ मेरे िपतामह के ये िम िव णु भी ह जो मेरे िपतृचरण से भी
बढ़कर पू य ह। अब कह, कस योजन से आना आ है। मुझे सारी बात बताइए। आप
लोग ने इन सब देव के साथ यहां आने का क उठाया है, इससे मुझे अ य त आ य हो
रहा है।’’
देवराट् इ ने कहा–‘‘दै यराज, आज आप ि लोकपित ह और आपसे े पु ष
िव म दूसरा नह है। आपके दान और मह ा क चचा सव है। आपके स मुख आकर
कोई याचक िनराश नह लौटता। आप याचक के िलए क पवृ ह आपके समान दाता
पृ वी म कौन है? आपने मेरा ि लोक का रा य छीन िलया है। अब म िनराधार और
िनधन ।ं इसिलए हमारे और आपके पू य पु ष इन िव णु तथा देव मुख सिहत म आपके
पास याचक के प म आया ं क अिधक नह तो य भूिम–वे दका–ही हम लोग को दे
दीिजए, िजससे हम देव का भी कोई ठौर- ठकाना हो तथा हमारी य -िविध कायम रहे।’’
इस पर बिल ने स होकर कहा–‘‘देवे , आप भले पधारे , आपका क याण हो।
मेरे समान ध य दूसरा कौन है क म ि भुवन क राजल मी से स प होकर देवराट् इ
और भगवान् िव णु को याचक के प म अपने घर आया देखता ।ं घर पर आए ए इ
को तो म अपनी ी, पु , महल तथा अपने को भी दे डालूंगा। आप धम और याय से जो
मांग–म दूग
ं ा।’’
इस पर इ ने िवनयावनत होकर कहा–‘‘हे दै यपित, इस समय तो आप ही देव
क र ा और पोषण कर सकते ह। अ तत: वे भी तो आपके दायाद बा धव ही ह। बारह
आ द य, यारह , आठ वसु, अि नीकु मार और िपतृजन सभी आपके बा बल का आ य
चाह रहे ह। आप सवसमथ ह–सो जैसे दै य -दानव का आप धमपूवक शासन करते ह, वैसे
ही देव का भी क िजए। के वल िजतने थान म हमारी य भूिम है, जहां-जहां हम
अि थापन कर, वह भूिम दे द। आप इतना ही अनु ह हम पर क िजए, िजससे सब लोग
कह क घर पर आए ए, देवराट् इ और िपतामह के िम िव णु का आपने स कार कर
िलया।’’ तब दै ये ने उसी ण अंजिल म जल लेकर कहा–‘‘जहां-जहां य -वेदी है, जहां-
जहां अि थापन है, जहां-जहां य होता है, वह भूिम मने देव को दी।’’ दै ये का वचन
सुन दै यगु शु उशना ने ु होकर कहा–‘‘महाराज यह अनुिचत है। मि य से भली
भांित िवचार-िवमश करके यु ायु का िवचार कए िबना आप वचन मत दीिजए। ये देव
दै यवंश-उ छेदकता ह।’’ इस पर दै ये ने कहा– ‘‘मने धम के िवचार से, याय के िवचार
से देव को वचन दे दया। मेरे दान से देव समृ ह तो म ध य ।ं मेरा वचन स य हो!’’
इस पर ु हो दै यगु शु ने त ण दै यलोक याग दया और देवराट् तथा देवगण
दै ये से वचन ले, िव णु को आगे कर वन, नगर, जनपद म आग लगाने तथा ‘यही हमारी
य -भूिम है’ कहकर आगे बढ़ने लगे। वे दल बांधकर आग लगाते जाते और–‘‘िव णु वा
वसतािमित, य ो वै िव णु:, स देवे य इमा िव ाि त िवच मे। येषािमयं िव ाि त रदमेव
थमेन पदेन य याध ता ददम तिव ाि त िवच मे। येषािमयं िव ाि तर दमेव थमेन
पदेन य याध ता ददम त र ं ि तीयेन दवमु मेनत वैवैष एत मै िव णुय ो िव ा तं
िव मते।’’
इस कार म पाठ करते जाते थे। देव के इस काय से दै य परे शान और भयभीत
हो गए। िव णु ने बिल से यह याचना क थी क–‘अि –र ायाम्’, अथात् अि गृह क
र ा के िलए भूिम चािहए। इसिलए उ ह ने सम त वन , नगर और जनपद को जलाकर
खाक करना आर भ कर दया। य - य अि बढ़ती जाती, दै य पीछे हटते जाते थे और
देव उस भूिम पर अपना अिधकार जमाते जाते थे, उस भूिम पर कृ िष करते तथा ब ती
बसाते जाते थे। शु के दै यलोक याग देने तथा देव का ऐसा उ पात मचाने से वचनब
बिल भारी धम-संकट म पड़ा। अ त म देव ने उसे ब दी बना िलया और दै य का सा ा य
िछ -िभ कर डाला। बिल के वंशज ही स भवतः वा लीक, सी रया, बलख के राजा थे।
इसी वंश म म पित श य अितरथी ए, जो महाभारत यु के िस यो ा ह तथा िज ह
पा ा य जन सोलोमन या सुलेमान के नाम से जानते ह। यह भूिम, िजसे जलाकर देव ने
ा कया, वही भूिम है िजसे पो शया के न शे म ‘प शयन सा ट-डेजट’, कहते ह। इसी
देश का नाम लट, लूट या कबीर है। प शया के ाचीन इितहास म िलखा है क वहां पहले
बड़े-बड़े नगर थे, िज ह देव ने जला दया। पुराण म इसी थान का नाम ‘न दन वन’ है।
आजकल जो जाित वहां रहती है, वह दाहे कहाती है तथा उस ा त को दािह तान भी
कहते ह। यह थान का यप सागर व ओ सस व आधुिनक पार दया के ऊपर है।
अ तु! जब बिल को ब दी बना िलया गया और दै यलोक पर फर देव ने
अिधकार कर िलया, तो देव ने जहां-जहां दै य का बल देखा, वह उनका िवनाश कर
दया। इस कार ब त दै य दै यलोक से पलायन कर गए। पीछे जब बाण महातेज ने होश
संभाला तो उसने फर दै य का संगठन कया। बाण महातेजवान् पु ष था। देवलोक म
उसके सा मु य क कसी म साम य न थी। उसने ार भ म छोटे-छोटे यु करके अपने
दै य-सा ा य को फर से वि थत कया। देव ने भी उसे नह छोड़ा। इस कार देव,
दानव, दै य, नाग, व ण एक कार से िमल-जुलकर ही भूिम पर रहने लगे। इस बीच चार
द पाल िनयु कर देव ने अपनी ि थित और दृढ़ कर ली। अब देव का संगठन दै य क
अपे ा कह उ कृ था।
पर तु रावण के अिभयान ने इस बार देव के संगठन को व त कर दया। व ण
क मृ यु के बाद देवलोक म इ ही क स ा सावभौम हो गई थी। ॠिष आय और देव
इनक उपजाितयां, जो भी िस धु और सतलज क घा टय म फै ल गई थ , सभी इ के
भाव म थ । येक आय स ाट् को इ और देव को य भाग क बिल देने पर ही स ाट्
या महाराज क पदवी िमल सकती थी। यह वा तव म एक भारी टै स था जो इस पदवी के
िलए िलया दया जाता था। उन दन िववाह तथा िवशेष य म गाय-बैल का वध होता
था। यह प रषाटी आय और देव म समान भाव से थी। इस समय आय क अनेक शाखाएं
भारत आयावत तथा उसके बाहरी कोण म फै ली ई थ , िजसम सबसे अिधक मुखता
ययाित के पांच पु यदु, तुवशु, अनु, ु और पु क थी। इनके अित र अ य जाितय
म गा धार, मूज-व त, म य, भरत, भृगु, उशीनर, चे द, िव, पांचाल, कु , सृ य,
परावत आ द शाखाएं भी धान थ । तृ सु रावी के पूव कनारे पर थे। भरत म य भारत
म थे। पु वंशी दु य त के वंशज भारत तथा वायंभुव भरत के वंशज मुनभरत कहाते थे।
आगे भारत को कौरव भी कहा गया। उशीनर, चे द, म य, सृ य का वंश ब त पीछे तक
चलता रहा। म य वंश अ य त ाचीन है। इसका संकेत हम म यपुराण से िमलता है। इस
बात के अ यंत पु माण ह क अ य त ाचीनकाल म बेबीलोन म म य नाम क एक
जाित रहती थी, िजसने जल- लय के समय मनु के प रवार क र ा क थी। भारत म
म य लोग पूव राजपूताना म आ बसे थे। उशीनर उ रीय भारत म रहते थे। बिलब धन
के बाद आय के रा य मगध तक फै ल गए थे।
िजस समय रावण ने देवराट् इ पर अिभयान कया, उस समय फारस से उ र-
पूव अफगािन तान और पामीर तक इ का रा य था तथा स पूण आयावत उ ह देव
कहकर उनक पूजा करता और उ ह य -भाग देता था। उन दन य कोरे धमानु ान न
होते थे। वे बड़ा भारी राजनीितक मह व रखते थे। य तभी कए जाते थे जब कोई बड़ी
िवजय होती थी या कोई बड़ी घटना होती थी। उस य म सब समागत समथक , िम
तथा आ जन को िवनय म ा धन बांटा जाता था। इसी को य भाग कहते थे।
सुदास इ के गहरे िम थे। दाशरा -सं ाम म सुदास क जय इ क सहायता
से ई थी तथा वृ -सं ाम म िवजय का सेहरा इ के िसर सुदास क सहायता से बंधा
था। ये तृ सु वंश के थे तथा इनका रा य रावी नदी के दोन तट पर था। इनके िपता
िवजवन महान् यु कता तो थे पर राजा न थे। सुदास इ ही क कृ पा से राजा ए थे। बाद
म उ ह ने दश राजाओ के यु म जय ा कर भारी क त पाई। िस नरपित सद यु
को भी सुदास ने परािजत कया था। विश और उनके पु पराशर तथा स ययात उनके
आि त ॠिष थे। विश क ही सहायता से सुदास ने माथुर-यादव, आनव-िशिव, गा धार-
ु , शूरसेन के म य, रीवा के तुवशु अनाय-व जन, वैकण-भेद आ द सि मिलत दस
राजा को यु म परािजत कया था। पीछे विश ही के ष से कु पित सवंत ने
सुदास को परािजत करके मार डाला। इस कार सुदास के मरने पर भारत म इ का
भाव ब त कम हो गया तथा सुदास का रा य और वंश ही न हो गया। दवोदास,
िज ह ने सुदास को गोद िलया था, संभवत: इस समय तक मर चुके थे। वे दशरथ के िम
और सहायक थे और संभवतः उ ह के कारण दशरथ क इ से भी मै ी ई थी। इ ह
दवोदास क बहन अह या थी जो गौतम के पु शर त को याही थी तथा िजसे इ से
िभचार करने के अपराध म गौतम शर त ने याग दया था और राम ने िजसका उ ार
कया था। इसी अह या के पु शतान द थे जो जनक सीर वव के पुरोिहत थे। काशी म इस
समय तदन रा य कर रहा था िजसके आि त भर ाज रहे थे तथा िजसने हैहय वीितह
को परािजत कया था। बाद म परािजत होने पर वीितह भर ाज ही के आ म म याग
म रहने लगे थे। तदन के पौ अलक पर अग य क प ी लोपामु ा क कृ पा थी।
इस कार िजस समय रावण ने देवलोक पर आ मण करके देवराट् को परािजत
कर ब दी बनाया, उस समय इ का रा य-िव तार तो अव य ही ब त था, पर तु उसक
शि खोखली हो गई थी। यही कारण था क इ को पराभूत होना पड़ा और इ िजत्
मेघनाद उसे बांधकर लंका ले गया। इससे देवलोक म बड़ी गड़बड़ी फै ल गई। उस समय सब
मुख वा णेय और आ द य, वसु, िमलकर लंका म प चं े और रावण से इ क मुि -
याचना क । रावण ने देव के साथ यह शत रखी क देव लोग रा स को भी देवता समझ,
उ ह अमर व द तथा र -सं कृ ित वीकार कर, िजससे सब देव, दै य, दानव और रा स
आय से िमलकर एक ही महाजाित हो जाएं और उनके िव ह शा त हो जाएं। पर तु ब त
वाद-िववाद के बाद भी यह स भव नह आ। अ त म यह तय आ क रा स भी य के
अिधकारी मान िलए जाएं। जब इ िजत् मेघनाद यु म आए तो देवराट् उसको अपना
रथ भेजकर उसक अ यथना कर तथा कभी भी रा स के िव श न उठाएं। िन पाय
देव ने रावण क शत वीकार कर ल । शत क वीकृ ित क सा ी के िलए लंका म देव ,
दै य , दानव और नाग के ितिनिधय को बुलाया गया और इ -मोचन क तैया रयां
होने लग ।
84. ऐ ािभषेक

िजस समय लंका म ये सब घटनाएं घ टत हो रही थ , देव, दै य, दानव, य एवं


र लंका म आ-जा रहे थे और इ -मोचन क तैयारी हो रही थी, तभी र पित रावण के
आदेश से इ जयी मेघनाद ने अ य त गु प से कै लासी का साि य ा कर िलया।
कै लासी अपने इ जयी िश य को देखकर स हो गए। उ ह ने अपना वरद ह त मेघनाद
के म तक पर रख, गंगा का पिव जल उसके म तक पर िछड़ककर कहा–“व स मेघनाद,
तूने इ को ब दी बनाकर मह कम कया है। इससे रावण का उ कष ब त बढ़ गया है। अब
म तेरा ऐ ािभषेक गंगा के इस पिव जल से करता ं और इस अवसर पर तुझे कु छ द
िवभूितयां भी देता ।ं उन िवभूितय से स प होकर तू -मन लंका को जा और रावण
से कह क अब वह इ को छोड़ दे–यही युि यु भी है। अब सौ य रावण सवजयी हो
चुका है। लोकपूिजत देव आज उसके शरणाप ह–अब और िव ह से उसे या योजन है!
पर तु, यह जो मने तेरा यहां कै लास म ऐ ािभषेक कया है, सो यह तो औपचा रक ही है।
तू रावण से कह क लंका म वह इ -मोचन से पूव तेरे ऐ ािभषेक का महत् आयोजन करे ,
िजसम सब देव, दै य, असुर, नर, नरपितगण, इ -सिहत सेवक क भांित सेवा-कम कर।
बस, इतना ही यथे होगा।”
इतना संकेत करके देवािधदेव महादेव ने हंसकर देवजयी मेघनाद क ओर
देखा। मेघनाद ने ब ांजिल, िवकार-रिहत हो कहा–‘‘मेरा यह शरीर देवािधदेव के अधीन
है।’’
“म तुझ पर स ।ं ’’–कहकर ने सािभ ाय दृि से अपने िचर कं कर न दी
क ओर देखकर कहा–‘‘अरे जा, सुमे पर उसे ले जा और सब द िवभूितयां इसे दे दे।’’
इस कार देव का संकेत पाकर गण न दी ने त ण भूतासन पर आ ढ़ हो
सुमे या ा क । सुमे पित च द ड िव ांधर ने न दी के मुख से का आदेश सुना तथा
मेघनाद का प रचय पाकर कहा–‘‘व स, म मोिहनी िव ा का अिध ाता ।ं िजसके पास
यह िव ा होती है, वह अजेय हो जाता है। इस िव ा का भाव बड़ा दुधष है। सं ेप म तू
इतना ही जान क अ म स पूण शि और अणुशि उ प होती है। उनम से ाण-
शि से उ प आ नाद िब दुमाग म जाकर तट-त व और कला समेत िव ा आ दक
म ता को ा होता है। ान और तप से िस इस िव ा का भाव दुल य ह। सो पु ,
तुझे म यह मोिहनी और प रव तनी िव ा देवािधदेव के आदेश से दूग
ं ा। अब तू सात
दन तक सप क बांबी म सप के साथ रह।’’
यह सुनकर मेघनाद उस िव ाधर को णाम कर सप क बांबी म चला गया।
अनेक सप ने उसे दंश कया पर िव ाधर के िवषहर योग से उस पर िवष का भाव नह
आ। जब वह िवष को सह गया तो िव ाधर ने द स मोिहनी िव ा म -सिहत उसे दे
दी। फर कहा–‘‘अब तू तीन दन अि वास कर, तब म तुझे प रव तनी िव ा दूग ं ा।’’ इस
पर मेघनाद ने तीन दन अि वास कया। जब वह अि को सह गया तो िव ाधर ने उस
पर काला त िसि का योग कया। उसने का कनी ी का सहवास रखकर गगनत व
बनाया, का क यु प पु का स ोिवट् वायु, का कनी पु प तेज तथा त पु
शोिणतजलत व बनाया। का कनी-पु का सवाग पृ वी-त व िनि त कया। फर रसिस
पु ष-बीज को जीव सं ा दी। अब उसने पु ष क ऊंचाई के बराबर एक छ: अंगुल मोटे
ता कटाह को चतुमुख को पर रखकर उसे गोघृत और नरतैल से भर दया। तदन तर
िस -च रच, कु मारी-गु -देव का पूजन कर, बिल-मांस अपण कर, चार ओर से बंकनाल
ारा ख दरांगार विलत कर उसे सुत कया। जब िनधूम हो, फे निनमुि ई, तब इस
मेघनाद का शरीर उसम िनपे कर, पूवव णत पृ वी, जल, आकाश, वायु, अि , इन पांच
त व तथा बीज-जीव का िन ेप कया, जल-त व डालते ही वह व र वण हो गया।
वायु-त व म शु वण, तेज से घनीभूत तथा आकाश-त व से वण-सदृश हो गया और य
ही उसम जीव ेप आ, त काल क ं ार- विन करता आ मेघनाद का तेजवान् शरीर
उसम से इस कार उठ खड़ा आ जैसे यूष म भा कर का उदय होता है। वह द -तेज,
महाकाय, महाबल-परा म, नौ हजार हािथय का बल धारण करने वाला व देह, द
पवान्, ुि पपासा-िनमु , सब भोग को भोगने म समथ, इ छा-िस मेघनाद नव- प
म िवकिसत हो गया।
उसे इस अ भुत और नवीन प रवतन प म देख और प रव तनी िव ा दे,
िव ाधर च द ड ने उसे कामचारी महाप िवमान म बैठाकर ि कू टाचल पवत पर
ि थत ि कू ट पताका नामक पुरी म अपने ये ब धु िव म-शि के पास भेज दया।
िव मशि िव ाधर ने उसे िस पु ष क भांित द भा से ा देखकर कहा–‘‘जब
तुझे मेरे भाई च द ड ने कामचारी बना ही दया; तो अब म भी तुझे कामचूड़ामिण िस
से स प क ं गा। तू अभी च पाद पवत क गुहा म जाकर सात द ौषिध िस कर ला।
पर तु, यह जान क यह सुकर नह है। उस अगम गुहा पर महादै य नमुिच का अिधकार है।
वह जरा-मरण रिहत कामचारी िस पु ष है। वह कसी श ा से न मारा जा सकता है,
न जय कया जा सकता है। पर तु वह महादानी है। िवनय से उसके िलए श ु को भी
कोई पदाथ अदेय नह है। वह िनवृ -वैर है। उसने तीन बार देवासुर-सं ाम म देवे इ
को जय कया है। उस गुहा के तल म नमुिच का ह य है जो देव-दानव सभी के िलए अगम
है। वहां अकथ र -मिणयां ह, नमुिच दै य क बारह पि यां द ौषध के भाव से नमुिच
ही के समान जरा-मरण रिहत हो उसक सेवा करती ह तथा नमुिच के दस सह धनुधर
और इतने ही अ ह। तू अपने िवनय से उसे स कर और वहां से सात द ौषध लेकर
मेरे पास आ।’’
यह सुनकर मेघनाद एकाक ही उस दु ह, दुरारोह, कामचूड़ामिण िग रशृंग पर
चढ़ने लगा। माग म उसे देख अनेक गु क, य , दै य तथा कू मा डक द श ले-लेकर
उससे यु करने आए, पर तु मेघनाद ने अपने द ा से ब त को मार भगाया, ब त
को माया-बल से स मोिहत कर दया। अ त म वह िग रगुहा के ार पर आ प च ं ा, उसक
अवाई सुन नमुिच दै य ख गह त हो उसके स मुख आकर बोला–“अरे दुराचारी, तू कै से
मेरे र क को मारकर यहां से मेरी अग य दुरारोह कामचूड़ामिण गुहा पर आया है। अब तू
मर!’’ यह सुनकर िवकार-रिहत हो मेघनाद ने िवन वाणी से कहा–‘‘हे दै यवर, मेरा यह
शरीर आपके अधीन है। मुझ अपराधी को आप िश ा दीिजए।’’ मेघनाद के ये िवनीत वचन
सुन नमुिच ने हंसकर कहा–‘‘अरे राविण, म भगवान् - कं कर तुझे जानता ।ं मने देख
िलया, तुझम अिभमान का लेश भी नह है। म तुझ पर स ।ं मेरे पास से कोई याचक
िवमुख नह जाता। तू मांग, या मांगता है?’’
तब मेघनाद ने कहा–‘‘हे दै ये , मुझे स द ौषिध दीिजए।’’ नमुिच ने
कहा–‘‘तूने अल य-अदेय व तु मांगी है। अरे सौ य, लोग तो मिण, मु ा, अ मांगते ह।
पर तु याचक को म िवमुख क ं तो मने जो ब त काल से संसार म दान-क त फै ला रखी
है, वह न हो जाएगी। आ, तू स द ौषिध हण कर!’’
इस कार उसने अपनी बारह पि य , दस सह अ और यो ा सिहत
राविण का आित य कर उसे सात द ौषिधयां द और कहा–‘‘ये औषध महा भाव ह,
इनसे तू अजर-अमर हो जाएगा, क तु म तुझ पर एक और भी अनु ह करना चाहता ।ं
आ, म तुझे ‘एकब धकण’ िव ा देता ।ं इतना कह दै यपित नमुिच कवच धारण कर तथा
हाथ म नाग-पाश ले खड़ा हो गया और मेघनाद से कहा–‘‘तू सब द ा का यो ा
अमोघवीय यो ा है। आ, जी भरकर मेरे ऊपर हार कर!’’ नमुिच दै य क यह आ ा
पाकर, उसक पदव दना कर मेघनाद ने ख ग, शूल, मु र और िविवध द श ा से
दै ये पर हार कया। पर दै ये ने सभी को िन फल कर मेघनाद को नाग-पाश म बांध
िलया। यह चम कार देख और म -सिहत ‘एक ब धकण’ िव ा से अवगत हो मेघनाद
ब त स आ तथा दै ये को णाम कर स द ौषिध ले वापस िव ाधर
िव मशि के पास लौट आया। िव मशि ने िविधवत् धातुवेध कर उसम द ौषिध
जीण कर मेघनाद का शरीर वेध कया, अघोरा और रसाङ् कु शी िव ा का रह य-म
बताया, िजससे मेघनाद अजर-अमर हो गया।
अब के गण न दी ने मेघनाद से कहा–“अरे राविण, अब तो तू िव के सब
मनु य म अस , दुधष और महातेज हो गया। अब तू मेरा भी अनु ह ा कर। कल
फा गुन कृ णप क महा अ मी है। िहमव त के दि णांचल पर वलीक शृंग है। वहां कल
के दन एक द तूणीर उ प होता है, िजसक उपलि ध के िलए वहां ब त से देव, दै य,
दानव आते ह। चल, तू अपने िव म से वह द अ य तूणीर ा कर! हमारे पास यह
कामचारी महाप िवमान है ही। इससे हम समय पर वहां प च ं सकते ह।’’ इतना कह
और मेघनाद को संग ले गण न दी वलीक िशखर पर जा प च ं ा। वहां अनेक देव, दै य,
दानव, राजािधराज अपने-अपने वाहन पर चढ़कर आए थे तथा य -वेदी रच-रचकर
म -पूत आ ितयां दे रहे थे। राविण मेघनाद ने भी एक वेदी रच, वेदपाठ करते ए य -
शाक य और बिल क िविधवत् आ ित दी, िजसे त ण अि ने कट हो हण कर िलया।
यह देख वहां आए ए सभी देव, दानव, दै य-पित संदह े और आ य से मेघनाद क ओर
देखकर पर पर संकेत से पूछने लगे–“यह कौन रमणीय कु मार है, िजसका ताप ऐसा दुधष
है क अि ने वयं कट हो इसक बिल हण क है?’’
अभी यह सब हो ही रहा था क उसी ण एक महानाग अक मात् पृ वी के िववर
से िनकला। उसका रं ग बाला ण के समान अस र वण था और उसके िवराट् शरीर का
िव तार एक योजन भूिम म था। उस महा भयानक सपराज को देखते ही ब त-से देव, दै य
भय से कांपते ए मू छत हो गए। तब िवजृ भक नामक दै य साहस करके उसके िनकट आ
उसे पकड़ने लगा। इस पर सप ने जो फू कार कया तो वह महाबली सूखे प े क भांित सौ
हाथ दूर जा िगरा। इस पर अनेक देव, दै य, असुर, िव मशील, पु ष एक साथ ही उसे
पकड़ने को दौडे।़ पर महानाग ने मुंह खोल वेग का एक ास िलया, िजससे खंच- खंचकर
तीन योजन के पशु, प ी, ाणी सभी उसके उदर म प च ं गए। ब त से देव, दै य, असुर
भी उसके पेट म चले गए। शेष जन भयभीत हो इधर-उधर जा िछपे। महानाग सब देव के
म य बैठ य -शाक य और बिल भ ण करने लगा।
अब न दी का संकेत पा, मेघनाद सप के िनकट गया। सब देव, दै य, दानवराज यह
देख धड़कते दय से इसका प रणाम देखने को आकु ल हो उठे । पर मेघनाद ने देखते ही
देखते ‘एकब धकण’ िव ा के ारा महानाग को पाश म बांध िलया। नाग ब त छटपटाया,
पर तु उसक मुि न ई। वह िजतना बल लगाता, जकड़ता ही जाता था। अ त म नाग
का मुख ब द हो गया और बार बार िशला पर िसर पटकने लगा। तब न दी का संकेत पा
मेघनाद ने नाग का पेट चीर डाला, िजसम से उसे तूणीर क उपलि ध ई। यह देव-दानव-
दै य-दुलभ अ य तूणीर पाकर मेघनाद अ य त स आ और उसके िव म से स हो,
सब देव, दै य, दानव ने उस पर पु पवषा क । पर तु कालच -दै य के अिधपित ने दूत
भेजकर कहलाया क ाण बचाना चाहता है तो वह तूणीर हम दे दे। इस पर मेघनाद ने
हंसकर दूत से कहा–‘‘अरे दूत, अपने वामी से कह क मेरे बाण से उसका शरीर ही तूणीर
हो जाएगा।’’
तूणीर िस होने पर न दी ने कहा–‘‘अब चल धनुष भी िस कर।’’ यह कह, वे
दोन हेमकू ट को उ लंघन कर उसके उ र म मानसरोवर-तट पर जा प च ं ।े वहां कालच
दै य पहले ही से आ, वेदी रच, घृत और वण-कमल से हवन कर रहा था। मेघनाद ने भी
वेदी रच, घृत और वण-कमल से वेद-पाठ कर हवन करना आर भ कर दया। तब न दी
ने कहा–‘‘हे वीर, यहां से उ र म क चक नामक बांस का वन है। उसम भयानक सप रहते
ह िजनके कारण कोई वहां प च ं नह सकता। जो प च ं ता है–पीछे लौटता नह है। तू
साहस करे तो जा और धनुष के उपयु बांस काट ला। बांस काटकर इस सरोवर म छोड़ दे
तो वे द धनुष बन जाएंग।े ’’
मेघनाद ने साहस करके क चक-वन म वेश कया और सात दन तक सप का
संहार करता रहा। अ त म उपयु बांस काट मानसरोवर म छोड़ दया। यथासमय उसे
एक द धनुष ा हो गया, िजसेे ले वह कालच दै य के स मुख आया और कहा–‘‘हे
दै ये , तुमने मुझसे यु -याचना क थी और मने भी यु -वचन दया था। आओ अब दोन
के मनोरथ पूण हो जाएं।’’ यह सुन कालच दै य ने ु हो बाण क वषा से मेघनाद को
छा िलया। दोन वीर म िवकट यु आ और भांित-भांित के श ा का योग-संहार
आ। अ त म मेघनाद ने कालच दै य का िसर काट िलया। उसके मरने पर सब दै य ने
मेघनाद क अधीनता वीकार कर उसक पूजा क ।
इस कार सब भांित कृ तमनोरथ हो मेघनाद द िवभूितय से िवभूिषत आ।
तब न दी ने कहा–‘‘हे राविण, भगवान् भूतनाथ देवािधदेव क तुझ पर कृ पा है। उनके
साद से तू िव पित बन गया; अब तो तू अपने िपता ैलो यपित रावण को भी जय कर
सकता है। फर अब िवल ब का या योजन है? जा, लंका म अपना ऐ ािभषेक कराकर
इ मोचन कर और पृ वी के सब भोग को भोग !’’
न दी के ये वचन सुन मेघनाद ने कै लास क ओर मुख करके कै लासपित पु ष को
भूिम पर िगर िणपात कया, फर िशव कं कर न दी क अिभव दना कर कामचारी
महाप िवमान पर चढ़ लंका क ओर उड़ चला–मन क गित से।
मेघनाद का लंका म भ वागत आ। देवािधदेव का साद रावण को भा गया।
उसने त ण पु मेघनाद के ऐ ािभषेक क घोषणा कर दी। देश-देशा तर म दूत भेज,
ब धु-बा धव, नर, नाग, देव, दै य, दानव–सभी को बुला भेजा। मिहदेव, जग यी र पित
का संदशे पा भू-म डल के नृवंश, नरपित अपने दलबल लेकर लंका आने लगे। भीड़भाड़
और धूमधाम ऐसी बढ़ी क रात- दन म भेद न रहा। लंका के रा स अितिथ-स कार करके
सब आगत-समागत को स करने लगे। मिहदेव रावण ने सभी क सुख-सुिवधा का पूरा
िवचार रखा। वा क तुमुल विन से दशाएं ा हो उठ । सुग ध- क हवन से सौ
योजन का वातावरण सुरिभत हो उठा। अनेक कार के भ य, भो य, ले , चू य, पानक
तैयार करने म सह सूदक जुट गए। िविवध कार के लाव, िति र, कपोत, शूकर, मृग,
मिहष, अज मार-मारकर वा द पाक तैयार होने लगे। सुगि धत म दरा क नदी लंका
म बहने लगी। इस समारोह म थम बार ही लंका म देव, दै य, नाग, असुर, य , ग धव,
आय, ा य, नर सभी जाितय के मूध य पु ष एकि त ए। कसी को कसी भांित क
असुिवधा न हो, इसका पूरा यान रखा गया। इसी अवसर पर पृ वी-भर म सावभौम
महातेज बाण भी लंका म महा ित आ।
समारोह का नेतृ व कया रावण ने। मिहदेव क ित ा-भूिम से आगत-समागत
भू-म डल के देव, दै य, नाग, दानव, मानव के ितिनिधय ने अपना दास-भाव कट
करने के िलए समारोह म सेवाएं दान क । बारह आ द य के ितिनिधय के बीच
देवराट् इ ने स समु , स तीथ , स महाकू प का जल मिण-कलश म भर मेघनाद के
मूधा पर अिभषेक कया। स - ीपपितय ने उसक पीठ के पीछे खड़े होकर उसके म तक
पर छ लगाया। नृवंश के सात सौ नरपितय ने अितरथी मेघनाद के रथ के अ क व गु
पकड़ रथ हांका। इसके बाद लोक-लोक के आगत-समागत ल -ल नृवंश के ितिनिधय
ने मिहदेव, स ीपपित, सवजयी रावण और इ दमन करने वाले अितरथी मेघनाद
मृ युंजय का जयघोष कया। उस जयघोष से पृ वी क दशाएं कि पत हो ग । भूलोक
चलायमान हो गया।
समारोह क समाि पर मिहदेव ने अपनी सारी ही स पदा याचक को लुटा दी।
रावण ने ऐसा दान दया क कसी ि लोकपित ने नह दया होगा। वण, र , मिण,
मािणक, मु ा, क तूरी, अ बर, के सर, कौषीतक, कौशेय, ह य, सौध सभी कु छ मिहदेव ने
याचक को दया। फर महातेज-महा ित िपता-पु ने सब भांित स कृ ित कर सब
स मा य अितिथय को िवदा कया। सबके बाद सह -भार र , आभरण, सह द
हाथी और सह कु मा रकाएं, दािसयां देकर देवराट् इ को ब धनमु कर देव -सिहत
लंका से िवदा कया।
85. सुलोचना

वह बाला नूतन मु धा थी।


मेघरिहत ण भा िव ुत्-सी, कु मुदब धु च रिहत यो ा-सी, म मथ-रिहत
रित-सी थी वह सुलोचना, सुल णा दानवनि दनी-मेघनाद-ि यतमा। जैसे िवधाता ने
संसार क सब रचना से अपने ह तकौशल को प र कृ त कर एक आदश र य मू त रची
थी, जो वस त क फु लवारी-सी तीत होती थी। िनद ष शु न क भांित समु वल,
दृि -मनो , िनवा य वदनकमल,िजतवीणा िणत वाणी, फु ट शरीरविन्यास,शोभनीय
अवयव-सं ेष, पीन पयोधर, सुशोभन गमन, शर द दु-सा गा -समु य, अिभनि दत
चरण-युगल, अित िवपुल जघन–जैसे काम ने सकाम हो, शरीरी हो, उसे रचा हो, जैसे
अनुराग ही का समूत आिवभाव आ हो, जैसे त ण ही उस गा लता म सब साि वक
भाव अंकु रत ए ह अ त विलत मनोभाव से द -सी उसके गा से वेद-जल ि य-
संदश े सुनकर ही झरने लगता था। कु सुमशरजालपितता-सी वह त वी बारं बार अिनमेष
दृि से ि य को जैसे पीती थी। वह त धतनु, सो क पा, पुलकवती, वे दनी, सिनः ासा
तीत होती थी, वाणी और गमन म उस भी का जो खलन होता वह उसक चा ता म
चार चांद लगता था। उस बाला क नवीन अनुरागाव था म उ छ् वास के साथ जो
कु चयुगल का उ लसन होता था, उसका स प -मनोहारी मौ य ने को पुल कत कर
देता था। वह णयभ गभीता ीिड़ता ि य का त मेघनाद को समीप पाकर भी िच गत
म मथ-पीड़ा को नह कर पाती थी। उसक िच वृि को जानकर िवहिसत सिखयां
ं य से उसके स मुख चार कार क ीित क बार-बार ा या करके उसे िखझाती थ ।
वे कहत –‘‘हे दानवनि दनी, तू य का त के िलए िवकल है! कह आ -मंजरी भी भौर
को िनम ण देती है? या चं का भी कह चकोर क अ यथना करती है? कह र भी
पारखी को ढू ंढ़ते फरते ह?’’ पर तु वह कामशरागार-िभ ा सवा गी, अ - खिलत
अ र बड़ी ही क ठनाई से कहती–‘‘अरी सिखयो, कु छ चातुय करो, कु छ य करो, आ ा त
िवप का िवपि - तीकार न कर उसे शु क उपदेश देने से या होगा? अरी, यह सुरिभ-
मास चै ि य होने पर भी अि य-सा लगता है। मृद ु पवन से वत: शोभन है, पर
िवरिहणी के िलए अशोभन। अरी, हंसी तो सभी उड़ाते ह, पर संसार म ाकु ल-मन उ मन
जन को प र ाण देने वाले थोड़े ही ह। अब म कससे क ,ं आ ासन कहां पाऊं? कसक
शरण जाऊं? मुझे तो शीतल-म द दि ण मलय समीर ब त ही पीड़ा दे रहा है। मुझसे तो
कु छ कहा ही नह जाता — इसी से िचर-मौन त यह कोयल मुझसे वैर-िनयातन कर रही
है। यह ु ितय योिन भी मेरी था बढ़ाने को ि य-िवरह-जिनत वर म कू क रही है। इन
हंस को देखो, इतराकर मेरी चाल का अनुकरण कर रहे ह और ये भ रे मेरे उ णो छ् वास
से िवद मान होकर भी अलक-कु सुम का लोभ संवरण नह कर सकते। इसी से तो कहते ह
क िवषय सभी दु या य ह। अरी, मुझे तो शरीर धारण भी भारभूत हो रहा है और ये दु
भ रे मेरे कणपूर म घुसे फू ल पर गूंज रहे ह। इ ह तो िनवारण करो। वह हार, जो मने बड़े
यार से दय पर धारण कया था, अब मेरे श ु मनोभाव से िमलकर मुझे दु:ख दे रहा है।
भला अब कु शल कहां है? उ वल, वेद-जल कपोल से झरकर तथा क ल-िमि त
अ ुजल से िमलकर ऐसा हो गया है जैसा याग म गंगा-यमुना का संगम है। कोयल क
कू क, मलय-समीर, पु ष क सुवास, पु पासुध और भ रे –ये पांच अि ह। सो म ि य-
प रर भण क लालसा से पंचाि -तप तप रही ।ं ’’
इस कार िवरह-िवद धा नवोढ़ा सुलोचना के िनकट प च ं जब का त मेघनाद ने
प रर भण दया तो उसके सब ताप दूर हो गए । िचर व रह के बाद सुखद िमलन आ ।
मेघनाद का आवास मदवन भूलोक का वग था, जहां भांित-भांित के सुख-साधन देश-
देश से संिचत थे। वहां सभी ॠतु के अनुकूल जीवन-साम ी थी। ॠतु के अनुकूल पु प,
फल, िवहंग, शीत, उ ण, ताप को सम रखने के साधन, आहार-पान के िविवध आयोजन
अ ितम थे। वहां बारह सह सुभट रा स इ िजत् मेघनाद के ह य क रखवाली करते थे
और सात सौ सु द रयां दानव-नि दनी सुलोचना क प रचया करती थ , जो कु सुम-कोमल
भी थ और व सम कठोर भी। सुलोचना के िलए जो पु पहार गूंथती थ , उसके िलए अित
हण भी कर सकती थ । इस समय मदवन वस त क फु लवारी हो रहा था। सुलोचना ने
इ िजत् ऐ ािभषेक- िस लोको र पृ वीजयी वीर पित के वागत क भारी तैयारी क
थी ।अब िचर िवरह के बाद वह सुलोचना पित-साि य म आन दिवभोर हो गई। उस
उ सुकता ने ेमाद ने से ि यदशन ि य का वागत कया। ि य के दशनमा से ही
उसक संताप शाि त हो गई इस शुभावसर पर उसने सहज भाव से अवनत-िशर हो
ि यतम को णाम कया। नैस गक ीित, अ ितब ध िवलास, रित रसायन वयः-ता य,
इन सबने िमलकर दोन को एक भूत कर दया : ‘सदृशजनसमा य: काम:।’ ेह के
अितरे क ने दोन को धृ बना दया। वे सौकु माय का उ लंघन कर िनदय वामाचरण करने
लगे, बार बार अिभलाषा करने पर भी उनक तृि नह ई। ल ा-भाव भी िवगिलत हो
गया। व मान राग के कारण दय के एक भूत होने से व ाभरण, भूषा-स ा सभी कु छ
अ त- त हो गए। ऐसा उनका सुरतो सव आ। यथोिचत प हो, य था अनुराग हो,
अम द म मथ हो, अिभराम यौवन हो, तो जीवन का यथाथ ा िमले ही िमले, फर
म मथ का अम द वेग भी अ भुत भाव रखता था। जहां अिभनय ही शोभनीय माना
जाता है–अ ीला-चरण ही स मान समझा जाता है–िन:शंकता ही जहां सौ व और
चांच य ही जहां गौरवाधान बन जाता है। जहां अंग का अभेद हो जाता है। वदेह और
परदेह का िवलय करने क इ छा क तृ ही नह होती। प रर भण परम सुखदाता होता
है। ल ा जहां अवगुण कहाता है। िववेक जहां मूखतापूण बन जाता है। जो कामाि
आर भ ही म धक् -धक् जलती है, उसक वृ ाव था का वणन कै से कया जाए! यहां न
पाि ड य काम देता है, न चातुय। सुरत रस म िनम पु ष समािध से भी परागित को ा
होता है। उसका वणन अक य है। वहां हास-िवलास, चाटु भाव सभी समा हो जाते ह।
वहां तो भगवान कु सुमायुध रितपित ही का अबाध शासन चलता है। कै सा चम कार है, यह
मृदगु ात लता-कोमलका त बाला दृढ़ पु ष ारा आ ा त होने पर भी िथत नह होती–
ह षत होती है। िन संदह े यह मनोज-मनोरथ का ही भाव है, सुरत-योग म तो जैसे दोन
का देह सायु य- प अ त ै हो जाता है। इस दया त ै भाव ही से दोन रमणी और रमण–
िभ िल ग और िभ शरीर-स पि तथा िभ गुण होने पर भी तृ णाितशय से,
ऐ यािभलाष से पर पर अनु वेश करते ह। तब कौन रमण है, कौन रमणी है?–यह भेद
अभेद हो जाता है। यह मेरा अंग-अवयव है, यह पराया–वह भेद-बोध न हो जाता है।
िन ाज पेण ि य के अंक म अ पत वपुषा कािमनी क िमलन-राि जैसे ण-भर ही म
तीत हो जाती है।
रित-तृ ेम-िवभोर हो युगल िमथुन सुलोचना और इ जयी मेघनाद ने जैसे
अपने को जाना–दोन ने ि य का त भाव से एक-दूसरे को देखा। मेघनाद ने कहा–“ि ये,
ि यतमे, मने देवािधदेव का चरम साि य ा कया, इ को दुधष शि से ब धन म
बांधा। क ठन दुरारोह, दुराचार, गु िव ाएं और िसि ा क , िजससे स प होकर
आज यह तु हारा दास मेघनाद पृ वी पर अजेय, अजर-अमर हो गया है। पर तु यह सारी
ॠि , िसि , स पदा, ी जो मने अ जत क और यह मेरा अमोघ ि व सभी तेरे
साि य-सुख के सामने एक ितनके के समान नग य, तु छ, अपदाथ हो गया। अरी
ाणव लभे, आज तुझे अपना यह देहभार अपण कर जैसे म कृ तकृ य हो गया। कह, इस तेरे
अनु ह के बदले तुझे या दू?ं अथवा कौन-सा तेरा ि य क ं ? मुझ इ -दमन के िलए कु छ
भी दुलभ नह है। कु छ भी तो अदेय नह है। अथवा अिधक लाप से या? तू कहे तो म
अपना ाण ही तुझे अपण क ं ।’’
ि य पित के ये कोमलका त वचन सुन अ ुमती सुलोचना ने कहा–‘‘हे ाण-
व लभ, अब मेरे िलए िव म मांगने को और या रह गया, जब मने अपने अंक म तु ह पा
िलया? अरे ाण, तुमने तो मेरे र के येक कण को एक नया ाण दे मेरे जीवन के येक
ण को ाण से आपूयमाण कर दया। तु हारे एक ण के साि य का मू य तो मेरा यह
सारा जीवन भी नह है। तुमने जो मुझ दासी को सब भांित आज कृ ताथ कया, सो उसका
वणन या वाणी से हो सकता है! पर म तो इसी भय से मरी जाती ं क क ह अ त र के
देवता-िपतर मेरे सुख से ई या न करने लग। हे का त, अब तो यह मुझसे कदािप न सहा
जाएगा। हमारे दय एक ह पर शरीर िभ ह। या कोई ऐसा उपाय है क म अपने इस
शरीर को तु हारे अंग म लय करके अपना अि त व खो दू?ं अरे , अब म तेरा-मेरा तो सहन
ही नह कर सकती। हे जग यी, तूने मुझे भी जय कर िलया, अब मुझे इतना दूर य रखा
है, अपने म समा ले।’’
सुलोचना के ऐसे आवेश और ेमो माद-भरे वचन सुनकर मेघनाद ने हंसते-हंसते
उसे अंक म उठाकर व से लगा िलया। उसने कहा–‘‘ ाणसखी, अब भला हम-तुम दो कहां
ह? यह मेरा अंग तेरा और तेरा अंग मेरा है। हमारा दय एक है, ाण एक है, के वल शरीर
दो ह, इसिलए क हम इनके ारा एक-दूसरे को सहवास-सुख से आ याियत करते रह।
फर मेरी-तेरी आंख ह, इसिलए क म तुझे देख,ूं तू मुझे। मेरे-तेरे कान ह, िजससे म तेरी
बीणा-झंकृत वाणी सुन,ूं तू मेरा वचन सुने। मेरे-तेरे अ य अंग-उपांग ह क िजनका लय-
िवलय कर हम योगान द का चरम सुख अनुभव कर। अरी भोली, ये अंग ही सुखोपभोग का
साधन है–य है। यह न तेरा पृथक् अंग है, न यह मेरा पृथक् । हमारा दोन का अंग अपूण
है। दोन , दोन के पूरक ह जब दोन एक होते ह, हमारे ाण को चरम सुख देते ह।’’
सुलोचना ने नयन मूंद िलए। वह ि यतम के व पर झूल गई। न कु छ कहने को
रहा, न सुनने को। वह सब कु छ पा चुक थी। सब कु छ समझ चुक थी। िव जयी मेघनाद
जैसे अपनी समूची अ जत स पि को कसी अ दैवी भाव से सजीवाव था म अपने
अंक म धारण कए अपने को और िव को भूल चुका था।
86. अशोक वन

लंका म परकोटे के बाहर चार योजन भूिम म अशोक वन था। इस अशोक वन म


एक लाख अशोक वृ थे। इस वन म बारह मास वस त रहता था। अशोक के अित र
अनेक जाित के िविवध वृ िविवध फल-फू ल से लदे थे। आम और के ले क वहां अनिगनत
जाितयां थ , जो सभी ॠतु म फल देते थे। बीच-बीच म कमनीय लता से आ छा दत
अनेक कुं ज थे। अनेक वृ सुनहले और पहले प वाले थे। उन पर बैठे प ी कलरव करते
बड़े भले लगते थे। अनेक मोर, कोयल, शुक, सा रका, सारस, हंस, च वाक पि य का
समूह ठौर-ठौर पर जलाशय और सघन कुं ज म िवहार करता फरता था। वायु से झड़-
झड़कर अनेक कार से रं ग-िबरं गे पु प ने पृ वी को ढांप िलया था। उनसे पृ वी ऐसी
मालूम होती थी, मानो रं गीन गलीचा िबछा हो। वहां व छ जल से भरे अनेक तड़ाग और
पु क रिणयां थ , िजनम बड़े-बड़े शतदल कमल िखले थे। उनके बीच हंस और च वाक
िनर तर ड़ा करते रहते थे।
वन म ही एक पवत था। उससे एक पात िगरकर मनोहर छटा दखा रहा था।
ताप का यह वाह ितरछा-टेढ़ा ऊंची-नीची भूिम पर िगरता बड़ा मनोहर तीत हो रहा
था। इस जल- पात के कारण लताएं भूिम पर सो गई थ , उस पवत के पा व ही म एक
बड़ा सरोवर था तथा अनेक कृ ि म तालाब भी थे, िजनम ब ढ़या ेतममर क सी ढ़यां
बनी थ । थान- थान पर कृ ि म वा टकाएं तथा छोटे-बड़े अनेक ह य भी बने थे। सघन
वृ के नीचे सोने क वे दयां बनी थ । बीच-बीच म खुले मैदान भी अनेक थे। सबके बीच
एक ब त ाचीन सुनहरा अशोक वृ था जो अनेक लता से िघरा था, इसके चार ओर
सोने क अनेक वे दयां बनी थ तथा अ भुत अि के समान वल त पादप चार ओर थे।
इन अलौ कक और दुलभ रमणीक वृ को देखकर बड़े-बड़े देव-दै य च कत रह जाते थे।
ऐसा िवराट् और मनोरम वन पृ वी पर उस समय दूसरा न था। सरोवर के चार ओर जो
च पा, चमेली, च दन के वृ क सघन छाया थी, उससे वहां क शीतल समीर सदैव ही
सुरिभत रहती थी।
अशोक कानन म एक ऊंची और मनोरम भूिम पर एक सु दर िवशाल सौध था, जो
कै लास पवत के समान सफे द था। उसम सह मिणज टत ख भे लगे थे। इसक सी ढ़यां
मूंग क और वे दयां वण क बनी थ । वह व छ ासाद अपनी आभा से देदी यमान था।
उसक अ ािलकाएं गगनचु बी थ । इसी ह य म अप ता भगवती सीता को लाकर रावण
ने रखा था। ह य पर पांच सौ सश रा िसय का पहरा था तथा उतनी ही रा िसयां
सीता क शु ूषा के िलए िनयत थ । इसके अित र स पूण अशोक वन क रखवाली दस
सह रा स सुभट कर रहे थे।
य िप ह य अित िवशाल और भ तथा सुखोपभोग के सब साधन से सुसि त
था, पर तु पितिवयु ा सीता को उस सब साज–शृंगार और स ा से कु छ भी योजन न
था। वह ह य का िवलास-क छोड़, उसी िवशाल अशोक वृ के नीचे उदास मिलन वेश
म, अधोमुखी भूिम पर एक पणश या पर बैठी आंसू बहाती ई शोक-िच ता और कातर
भाव से िवप जीवन के क ठन ण तीत कर रही थी। उसके िसर पर एक वेणी थी जो
पृ वी तक लटक रही थी। उसक दशा कु से िघरी ई असहाय मृगी क -सी हो रही थी।
य िप उसके च मुख क काि त से अब भी दशाएं आलो कत हो रही थ । उसके
िब बफल के समान र वण अधर, ीण क ट-भाग और कमल-से बड़े-बड़े नयन तथा
लाल-लाल चरण शोभा क खान थे, वह संयमशीला तपि वनी क भांित पृ वी पर बैठी
राम के यान म म रहती। शोकातुर होने के कारण उसक शोभा म द पड़ गई थी और
आभूषण-िवहीन उसक देह ी फ क हो गई थी। जो भी आभूषण वह इस समय अंग पर
धारण कए थी, वे भी सब मैले हो गए थे। उसे न अपने अंग-सं कार का िवचार था, न
व का। फर भी इस िवप ाव था म उसका माधुय अपूव दीख रहा था। वह कसी भांित
अपने शरीर को धारण कए ए थी।
जब सीता को अशोक वन म रहते कु छ समय तीत हो गया, तो एक दन भोर ही
म रावण अपने ी प रकर के साथ अशोक वन म प च ं ा। वह वण- करीट म तक पर
धारण कए, वण रथ पर, रथ क सम त घं टय को कं किणत करता आ अपने ह य से
िनकला। उसके पीछे सौ दािसय के हाथ म उसके सुख- थे। कसी के हाथ म ताड़ के
पंख,े कोई सोने क झारी िलए सुखपाल म बैठी थी। एक ी सोने के डंडव े ाला काशमान
छ लेकर रावण के पीछे हाथी पर बैठी थी। कु छ ि यां जलते ए ग ध- िलए, िविवध
वाहन पर सवार चल रही थ । सवारी के आगे दु दुिभ बजती जाती थी। र े क शरीर-
रि का सेवा-दािसयां गंध-मा य िवभूषण हाथ म ले झुरमुट बना र े के रथ को घेर
पांव- यादा ही चल रही थ । इस कार जैसे न से िघरा च मा सुशोिभत होता है,
उसी कार र े रावण इन पसी सु द रय के झुरमुट म दु दुिभ, नगाड़े बजवाता आ
अशोक वन प च ं ा। अशोक वन म प च ं ते ही भेरी और तूय बज उठे । सब चे रयां- हरी,
गु मपित यथा थान चैत य हो गए। सभी ने जान िलया क महाबली पृ वीजयी र े
रावण का अशोक वन म आगमन हो रहा है। सौध ह य म जाकर रावण क सवारी महल
क पौर म िव ई।
परं तप र े को आता देख सीता वायुवेग से कि पत के ले के प े के समान कांपने
लगी। उसने अपने अंग को अपने ही म समेट िलया और अ य त संकुिचत हो, भय और
शोकाितरे क से अिभभूत हो पृ वी पर बैठी रह गई।
रावण ने देखा–सीता के सब अंग मिलन हो रहे ह। वह ब त ही दुबल हो गई है।
िनर तर रोते रहने से उसके ने सूजकर लाल हो गए ह। वह मू तमती दु:ख क ितमा सी
दीख रही है। उसने सोचा–अहो, यह े कु ल क मिहला है, पर दु:ख और शोक से िनकृ
कु लो प -सी दीख रही है। वह न ाय यश, िनरादृत ा, टू टी ई आशा, ितर कृ त
आभा तथा अ धकारा छ भा, िविध-रिहत पूजा और जलरिहत नदी के समान हो रही
है। िनर तर उपवास, शोक और भय के कारण यह अितकृ श हो गई है। यह नाममा का
आहार करती है, तप ही इसका जीवन है। दु:ख ही इसका धन है।
रावण ने उसके स मुख प च ं कर कहा–
‘‘ सीद! सीद! भगवित सीते! इतना शोक न कर, अतीत क िच ता से या लाभ
होगा अब? म तेरा अनुगत र पित रावण तेरी स ता और अनुकूलता चाहता ।ं पर तू
इस तरह अपने अंग को समेटे य बैठी है? या तू अपने को न कर देना चाहती है? हे
जनकनि दनी, म भी तेरे ही समान व र कु ल का ।ं तुझे वैरी क प ी जानकर भी मने
तुझ पर बला कार नह कया। म तुझे अपने पर स देखना चाहता ।ं तिनक ने
उघाड़कर देख–यह वणलंका, इसका सब वैभव और यह लंकापित रावण, िजसके नाम से
देव, दै य, नाग, य कांपते ह, तेरी कृ पा-कोर का िभ ुक यहां उपि थत है। अब उस
िभखारी राम से तेरा या योजन है ? वह रा य तो थम ही हो चुका । अब िवन गृह
हतभा य मारा-मारा वन म फरता होगा। फर तुझे भय या है? वै रय क पराई ि य
को हरण कर लाना और उनके सहवास का सुख भोगना हम रा स क प रपाटी है। पर
तेरे साथ म बला कार तो दूर, तेरा अंग- पश भी तेरी अनुमित िबना नह क ं गा। इसिलए
शोक याग दे, मुझ पर स हो और यहां लंका म सब देव-दुलभ भोग को भोगती ई,
मेरे स पूण अवरोध क शीष थानीय होकर रह। लोक-लोका तर से जो दुलभ र मने ा
कए ह, वे सब और यह लंका का रा य म तुझे ही स पता ।ं मेरे अिधकार से परे इस पृ वी
पर िजतने नगर ह, उन सबको म अपने परा म से जीतकर तेरे िपता जनक को दे दूग ं ा। हे
सु दरी, मेरे समान यो ा अब इस पृ वी पर कौन है? देव, ग धव, य , नाग, दै य, मानुष
कोई भी तो मेरे स मुख खड़े रहने म समथ नह है। इसिलए उस एक चीर धारण करने
वाले रा य तापस राम को तू भूल जा। अब उसके तुझे दशन भी नह हो सकते। मेरे
भवन म तीन लोक क उ म ि यां ह, वे सब तेरी सेवा करगी। वग-लोक म, नरलोक म
और पृ वी पर जहां िजतना धनर है, िजतना ऐ य है, उस सबका तू मेरे साथ रहकर
भोग कर। वह बेचारा िभखारी राम न तो बल म, न ही धन और परा म म मेरी समता
कर सकता है, इसिलए तू यह जानकर– क यह यौवन णभंगुर है, इसका उपभोग मेरे
साथ कर और जीवन के लोको र भोग भोग!’’
रावण के ऐसे वचन सुनकर सीता ने अपने और रावण के बीच एक ितनके क ओट
करके कहा–‘‘महाराज लंकापित, आपक जय हो। आप ि लोक के वामी और सब
िव ा के भ डार ह। आपको ात है क म व र कु ल क क या और वधू ।ं उ कु ल म
मेरा ज म आ है और उ कु ल ही म याही गई ।ं म आय कु लवधू ।ं फर भला म
लोकिनि दत आचरण कै से कर सकती ।ं आप स म का िवचार क िजए और स न के
माग का अनुसरण क िजए। आप र पित ह। ‘वयं र ाम:’ आपका त है। आपको सव थम
ि य क र ा करनी चािहए। आपके अवरोध म ैलो य से लाई ई ब त सु द रयां ह,
आपको उ ह पर स तु रहना चािहए। हे रथी , िजन पु ष का मन चंचल रहता है
उनका अपमान-पराभव भी उसी के ारा होता है। या आपको स परामश देने वाले
स पु ष म ी नह ह अथवा आपक िवपरीत बुि ही उनका स परामश नह हण
करती? कह ऐसा न हो क आपके ही अपराध से धन-धा य से प रपूण लंकापुरी न हो
जाए। हे र े , जैसे सूय से उसक भा िभ नह है, उसी कार म भी राम से िभ नह
।ं म उ ह क भाया ,ं आपके सवथा अयो य ।ं आपका ेय इसी म है क आप मुझे
उनके पास प च ं ा द और उनक िम ता-लाभ कर ल–श ुता से िम ता अिधक लाभदायक
है।’’
सीता के वचन सुनकर रावण ने कहा–
‘‘भ े सीता, मने तेरे साथ कोई अधमाचरण नह कया। रा स-धम क मयादा के
अनुसार ही तेरा हरण कया है, य क तेरा पित मेरा वैरी है। उसने अकारण मेरी बहन
सूपनखा का अंग-भंग कया और उसक रित-याचना क अव ा क , इससे मने उसक ी
का हरण कर िलया। इसम दोष कहां है? फर म तो तुझ पर अिधक सदय ।ं मने तुझसे
बला कार नह कया, तुझसे दासी-कम नह कराया, तेरा वध भी नह कया, न तुझे
िव य कया, अिपतु इस महाह य म सादर-सय रानी क भांित रखा है और वयं म
िवजयी रावण तुझसे णय याचना करता ।ं या तू यह भी नह सोचती?’’
सीता ने कहा–‘‘ या आपने मेरे पित को यु म जीतकर मेरा हरण कया है?
आपने तो छल करके , िभ ुक बनकर, चोर क भांित मुझे चुराया है। आपने पु ष- संह
राम-ल मण क अनुपि थित म मेरा हरण कया, आपका यह काय कतना कलं कत था!
आपका यह काय न धम-स मत है, न वीरोिचत। फर म तो आपको वीकार करती ही
नह । मेरे यश वी पित रा य- नह ह। उ ह ने तो वे छा से रा य यागा है, अभी भी
वे अवध के वामी ह। अभी भी वे सात अ ौिहणी सेना के अिधनायक ह। पर तु इससे भी
या? आयपु का बल उनक सेना म नह , उनक भुजा म है। द डकार य म आपक
बहन ने वह भुजबल देखा है। अब र े य द आपक सुमित न जगी तो आप देखगे क
श ु-संहारी मेरे पित मेरे िलए लंका म अव य आएंगे। तब आप भले ही कु बेर क अलका म
जाकर िछप, चाहे और कह , कोई भी देव, दै य, नाग, य आपको उनके हाथ से बचा न
सके गा। आपक िन य ही मृ यु होगी।’’
भगवती सीता से ऐसे कठोर वचन सुनकर र े रावण ु हो गया। उसके ने
लाल हो गए, नथुन से बैल क भांित गम िन: ास छोड़ते ए उसने कहा–‘‘भ े सीते, तू
श ु-भाया है, मेरी हरण क ई स पि है, तूने मेरा ही ितर कार कया है। मने जो तुझ
एक ी को इतना मान दया, इस पर तूने िवचार नह कया। इस अपराध म तेरा तुर त
वध होना चािहए। पर तु म तुझे एक मास क अविध देता ।ं इस बीच य द तू अपना हठ
याग मेरे अधीन न होगी तो मेरे रसोइए मेरे कलेवे के िलए तेरा वध करगे।’’ इतना कह
और लाल-लाल आंख से सीता को देखता आ रावण अपने मिण-ह य म जा देव, ग धव,
दानव और य -कु मा रय के बीच बैठ म पान और िवलास करने लगा।
रावण के संकेत से रा स-कु मा रय ने सीता को ब त समझाया, लोभन दए।
धा यमािलनी एक मुखरा त णी थी। वह आंख बचाकर बोली–‘‘क यािण सीते, म तेरे ही
भले के िलए कहती ,ं महा मा रावण कु ल म व र ह। मह ष पुल य छ: जापितय म
चौथे थे, उनके पु िव वा मुिन भी जापित-तु य ही ह, र े रावण उ ह के पु ह।
उनक भाया बनने से बढ़कर सौभा य पृ वी क कसी ी का या हो सकता है? ैलो य
के अिधपितय ने अपनी-अपनी पुि यां उ ह दे अपने को ध य माना है। फर र े तुझ पर
तो ब त स ह। अब तेरा उस तप वी राम से या योजन रहा?’’
ह रजटा ने कहा–‘‘समय को देखकर ही अनुराग-िवराग होता है। फर िजसके
अनुराग क याचना देव-दै य-िवजयी र े वयं करते ह, उस ी के सौभा य क तुलना
या है? अरे , इ को िजसने ब दी बनाया, जब वह हजार देव-दै य-दुलभ रमिणय से भरे
अ त:पुर को छोड़ तेरे पास आता है तो फर तेरी समता पृ वी पर कौन ी कर सकती
है?’’
दुमुखी ने कहा–‘‘अरी, िजनके ताप के आगे सूय भी अपना तपना याग देता है,
उ ह र े का तू ितर कार करती है! तू सौभा य को लात मार दुभा य का वरण करती
है! यह भला तेरी कै सी बुि है?’’
एकजटा ने कहा–‘‘संसार का ऐसा कौन-सा सुख-साधन है, जो रावण के ह य म
नह । अरे , वह तो ि लोकपित है, उसके ऐ य क तुलना पृ वी पर भला कौन कर सकता
है? तू िभ ुक राम के पुराने अनुराग का िवचार कर रा सराज का ितर कार कर रही है!
अरी, राम तो वयं ही दुखी है। वह तुझे कै से सुखी रखेगा? अब तो उसक आशा ही छोड़।
ैलो य म आज ऐसा कौन है, जो दुल य समु –मेखला को लांघकर यहां आकर तेरी सुध
ले?’’
एक रा सी ने कहा–‘‘म तो यही नह समझ सकती क उस कृ पण राम के साथ
रहकर तू या करे गी! फर वह समु -पार आने का साहस भी भला कै से करे गा?’’
च डोदरी ने कहा–‘‘अरी, य इस कु पा के साथ माथा खपाती हो! ऐसी ि य
का तो अ त म वध ही होता है। इसके शरीर का म य भाग मुझे ही िमलेगा।’’
‘‘और कलेजा मुझ।े ’’
‘‘तो जाओ, एक भा ड म उठा लाओ। हम इसे काट-काटकर खा जाएं और म
पीकर आन द कर।’’
‘‘अभी नह , र े ने इसे अविध दी है। उसे पूरा होने दो, फर तो हम इसका
वा द मांस खाएंगी।’’
सीता ने इस पर ने म जल भरकर कहा–‘‘सिखयो, अविध क इसम या बात
है, तुम अनु ह करके अभी य न मेरा भ ण करके इस दु:ख से मेरा प र ाण कर दो।
हाय, म बड़ी ही अनाया और असती ।ं मुझे िध ार है, जो म आयपु से पृथक् होकर भी
अभी तक जीिवत ।ं जाओ-जाओ, र े को तो म अपने बाएं पैर के अंगूठे से भी नह छू
सकती। समु से िघरी होने से या? आयपु या मेरी टोह लगाने यहां तक न प च ं गे?
या गृ राज जटायु ने उ ह मेरी सूचना न दी होगी? या वे वीर सूचना देने से पूव ही
गत ाण हो गए ह गे? य द आयपु को मेरे यहां रहने का पता लगा गया तो वे समु को
भ म कर दगे। संसार को रा स से िवहीन कर दगे। आज जैसे म दन करती ,ं उसी
कार लंका म एक दन घर-घर यही क ण दन सुनाई पड़ेगा। लंका म र क धारा बह
जाएगी तथा यह पुरी मशान बन जाएगी। आज तुम सब यहां िवजयो सव मना रही हो,
पर वह दन भी आएगा जब इस नगरी क ी िवधवा के समान हो जाएगी और जो मेरे
शोक म उ ह ने ाण ही दे दए ह , तो फर अब मुझे जीवन से या योजन है! हाय, वे
वीतराग जन ही ध य ह, िजनका संसार क कसी भी व तु पर मोह नह है, िजनका कोई
ि य-अि य नह है। म अपने ि यतम से िबछु ड़ गई ं और लंकापित र े के प ले पड़
गई ।ं सो अब मेरे जीवन से या? म तो अब ाण ही दूग ं ी।’’
सीता के ऐसे पित- ेम-पगे वचन सुनकर ि जटा रा सी ने कहा–‘‘यह तो अ य त
आ यजनक और अ भुत बात म देख रही ।ं जो यह ी एक पु ष पर ऐसा उ कट मोह
और आसि कट कर रही है। ऐसी तो देव, दै य, मानुष, आय, रा स कह भी मयादा
नह है। दै य, दानव, देव, नाग और म त म तो पित-पर ा ही कु छ ऐसी नह है। ी
वत है, आ मो मुख है, पित से उस का या योजन है! वह तो उससे तिनक भी
अनुबि धत नह है, वह िजस भी ि य पु ष को चाहे, उसे ही अपने िलए वर सकती है।
ऐसा ही कु छ हम रा स म, ग धव म और य म भी है। हम लोग पित-प ी म सम
सखाभाव मानते ह सही, पर तु ऐसा नह , जैसा यह ी एक पु ष के िलए ऐसी उ मुख है।
फर आय म तो ऐसी ी दासी है, अवरोिधता है, अनुगता-अनुगािमनी है। पु ष उसका
वामी है। फर यह आया कस कार उस वामी को इस कार चाहती है; जो हो, इसका
ेम तो तु य है। य न एक ी एक पु ष को ही यार करे ? य न एक ी और एक
पु ष एक भूत होकर न रह? य न दोन का ाण से ाण का िवलयन हो।
अहा–‘‘समापो दयािन नौ,’ मुझे यही ि य है। इस मानुषी क म अ यथना करती ,ं
व दना करती ,ं इसका पु ष- ेम ध य है, ा य है, हम इस पर ोध, इससे िवराग न
करना चािहए। हम इसक रि काएं ह, इसे डराने-धमकाने से हमारा या योजन है?
र े से िनवेदन क ं गी। इस ी से भी म कहती –ं ‘‘आय, तू िनि त रह, अपनी शि
भर हम सब तेरा ि य करगी, तेरा क याण हो! तू अपना ि य हमसे कह!’’
ि जटा रा सी के ये वचन सुन सीता आ त ई। उसने कहा–‘‘भ ,े म तेरा
अनु ह वीकार करती ।ं इस र पुरी म तू ही मेरी ाणसखी है। म आज िवप ,ं पर तु
दैव-िविध से य द स प ई तो तेरे इन श द को याद रखूंगी।’’ इतना कह सीता नीचे
मुखकर मौन हो बैठी।
87. हा सीते!

मारीच को मार जब राम पीछे लौटे तो उनके स मुख आ एक िसयार ने मुंह


उठाकर िवकट रोदन कया। इस अपशकु न से आतं कत-आशं कत हो राम ज दी-ज दी
आ म क ओर आने लगे। राह म उ ह भगवान् अग य के आ म से लौटते ए ल मण
िमले। उ ह ने कहा–‘‘आय, आप भगवती सीता को अके ली छोड़ इधर कहां से आ रहे ह?’’
राम ने कहा–‘‘म एक रा स के माया-जाल म फं स गया था। देखो, वह िसयार
ऊपर मुंह उठाकर कै सा िवकट श द कर रहा है! ज दी चलो, ल मण, कह अमंगल न हो
गया हो।’’
दोन भाई त ु गित से लौट चले। आ म के िनकट आने पर उ ह ने जटायु के
आ म म ब त-से तपि वय क भीड़ देखी। तप वीजन ने उ ह सीता-हरण का दा ण
संवाद कह सुनाया। राम ने र म सने ए जटायु को देखा। जटायु ने ऊ व ास लेते ए
और मुख से र -वमन करते ए ीण वर से कहा–‘‘आयु मान् तेरी सीता और मेरे ाण
को एक बलवान् त कर रा स हर ले गया। मने शि भर िवरोध कया। मेरा पुराना
पु षाथ काम न आया; पर तु मने अपने िम दशरथ का स य पालन कया। मेरा उस
रा स से घनघोर यु आ। वह देखो, उसका छ -धनुष टू टा पड़ा है, पर म िन श था।
जब मने भगवती सीता का ची कार सुना–म सो रहा था। ची कार सुनते ही म भागा। श
लेने का अवकाश न िमला। उस पितत दुरा मा ने मुझ िनर क यह दुदशा कर दी। म कु छ
भी न कर सका। वह–‘हा दाशरिथ, हा आय-पु , हा सौिम ’ पुकारती ई ुषा सीता को
बलात् रथ म बैठाकर इसी दि ण दशा को गया है। हे राम, उसके पास वायुवेगी अ तरी
का रथ है। उसम आठ अ तरी जुड़ी ह। तुम कै से एकाक पांव- यादे उसे पा सकोगे? म तो
अब उस लोक को चला; रामभ तेरा क याण हो!’’
इतना कहकर जटायु ने र -वमन कर ाण याग दए। जटायु के ये मम-बेधी
वचन सुन और जटायु का गत ाण शरीर देख राम आंसू बहाते ए जटायु से िलपट गए।
ल मण-सिहत वे रो पड़े। वे ल मण और सब तपि वय से कहने लगे–‘‘म ऐसा पापी ,ं
िजसके कारण कोसल का रा य न आ, िपता का वगवास आ, सीता का हरण आ
और अब महाबली िग राज जटायु के भी ाण का गाहक म ही बना। आज य द म समु
म तैरने क चे ा क ं , तो समु भी सूख जाएगा। मेरे समान भा यहीन पृ वी पर और कौन
होगा िजसके कारण मेरे िपतातु य आय जटायु मृतक होकर भूिम पर पड़े ह।’’ इसके बाद वे
जटायु के शरीर को अंक म भरकर आतनाद-सा करते ए बार बार कहने लगे–‘‘हे तात,
मेरी सीता कहां है?’’ फर वे दु:ख से हतचेत हो भूिम पर िगर पड़े।
कु छ काल बाद उ ह ने चेत म आकर कहा–‘‘हे ल मण, कै से संताप क बात है क
आय जटायु सीता क र ा करते ए हत ाण ए। स न का संसार म कह अभाव नह
है। मुझे इस समय सीता-हरण का उतना दु:ख नह , िजतना जटायु-मरण का है। जाओ
भाई, अब तुम िवल ब न करो। लकड़ी एक करो, म तब तक अि िनकालता ।ं म
िविधपूवक बा धव क भांित जटायु का दाह-सं कार क ं गा।’’
उ ह ने िविधवत् जटायु का दाह-सं कार कया। फर मृग को मार, पृ वी पर कु श
िबछा,मृग-मांस कोमल घास पर रख,उससे गृ राज का ा -तपण कया। फर गोदावरी-
तट पर जा उसे जलांजिल दी। इस कार वृ जटायु का ॠिष के समान स कार कर राम
बोले–‘‘हे भाई, अब शू यागार म जाने से हमारा या योजन है? अब तो हम सीता का
अ वेषण कर उसका उ ार करना है।’’ फर उ ह ने कहा–‘‘हे भगवती गोदावरी, कहो,
या तुमने सीता को देखा है? य भाई, यह गोदावरी तो कु छ भी जवाब नह देती! कहो,
अब म राजा जनक से िमलने पर, जब वे जानक का कु शल पूछगे, तो या जवाब दूग ं ा?
अरे , मेरे साथ रा यहीन होकर, वन म जंगली फल-मूल खाकर, जो मेरे दु:ख के समय मेरे
सब दु:ख को हरती थी, वह जनक-दुलारी अब कहां चली गई? ब धु-बा धव से तो मेरा
िवयोग ही हो गया था...अब सीता से भी वंिचत होना पड़ा। चलो भाई, म दा कनी-तट,
जन- थान और वण पवत पर चलकर खोज कर। कहां ले गया वह रा स उसे? ये वन के
मृग मेरी ओर आंख उठाए या देख रहे ह? या ये कु छ मुझसे कहना चाहते ह? या ये
सीता का कु छ पता जानते ह?’’
ल मण ने कहा–‘‘आय, तात जटायु ने दि ण ही क ओर संकेत कया था। हम
दि ण क ओर ही चल तो ठीक होगा।’’
उ ह ने तब भूिम पर िगरे ए उन पु प को देखा, जो सीता के के श से झड़ गए थे।
तब राम ने कहा–‘‘ल मण, इन फू ल को म पहचान गया। ये पु प आज ात: मने ही उसे
दए थे। मेरे ही सामने उसने इ ह चोटी म गूंथा था।’’ फर वे पवत क ओर मुख करके
जोर-जोर से कहने लगे–‘‘अरे पवतो, कहो, सीता कहां है? नह बोलोगे तो अपने
अि बाण से म तु ह भ म कर दूग ं ा। गोदावरी का जल भी सुखा डालूंगा।’’
इसी समय ल मण ने कु छ घुंघ पृ वी पर से उठाकर कहा, ‘‘यह देिखए आय, ये
घुंघ टू टे पडे़ ह, ये फू ल-मालाएं भी दली-मली पड़ी ह। इधर-उधर भूिम पर र भी ब त
पड़ा है। कह वह दुदा त रा स आया को खा तो नह गया? पर तु यह टू टा आ िवशाल
धनुष कसका है? ये बड़े-बड़े मोती, टू टा आ वण कवच? अहा, यह तो तात जटायु का
उस रा स से यु आ है। यह देिखए, वण-पंख िवभूिषत बाण भी यहां टू टे पड़े ह। अव य
ही वह रा स कोई स प और बली तीत होता है। वह अव य ही खर-दूषण का ितकार
लेने आया होगा। महाराज, हमने तो समझा था, जन थान से रा स का पातक ही कट
गया, पर तु यह तो महापातक उठ खड़ा आ।’’
राम ने कहा–‘‘हे ल मण, सीता हरी गई, मारी गई या खा ली गई, जो कु छ भी
हो, अब तो रा स से मेरा वैर सौ गुणा बढ़ गया। म पृ वी से रा स के वंश को ही अब
िनमूल क ं गा। अरे , देव, दै य, ग धव, असुर, क र, रा स जो भी वह त कर हो, जीिवत
न रहेगा। मने उसे देखा है, वह धूत तप वी का भेष धरकर मेरा अ य-पा हण कर गया।
उस वंचक ने मुझे ठग िलया। म वृ को उखाड़कर समु को पाट दूग ं ा। जो सीता न िमली
तो ैलो य को न कर डालूंगा। सीता हरी गई या मारी गई, जो कु छ भी हो, म ैलो य से
उसे खोज िनकालूंगा।’’ इतना कहकर राम ने अपनी जटा खोलकर चार ओर िछतरा द ।
इस समय तक ब त-से जन थानवासी ॠिष, मुिन, तापस वहां एक हो गए थे।
महामुिन अग य ने जब राम को ोध और शोक से इस कार अिभभूत देखा, तो उ ह ने
आगे बढ़कर कहा–‘‘रामभ , आप तो सदा ही सबक क याण-कामना करते ह; फर आप
इस समय कै से ोध और शोक से अधीर हो रहे ह? हम नह जानते वह अपराधी त कर
कौन है? कसका धनुष टू टा पड़ा है। यहां अिधक पु ष के चरण-िच न भी नह ह। देव
और ग धव म कौन आपका अिहत चाहता है? भगवती सीता अव य ही कसी एक पु ष
ने हरण क है। अब आप उसे ढू ं ढ़ए। भला सोिचए तो, जब आप ही अपने ऊपर आए ए
इस दु:ख को धैयपूवक नह सहन करगे, तो फर दूसरे ािणय क या साम य हो सकती
है! आपि यां तो ािणय पर आती ही ह। ये अि के समान एक ण म पश करती और
दूसरे ण दूर हो जाती ह। यह तो संसार का वभाव है। भगवती सीता चाहे जीिवत ह या
पृ वी को याग चुक ह , आप दु:ख न क िजए। हे महा , सारा संसार आपका शंसक है,
अत: आप धैय धारण क िजए और श ु के िवनाश का य क िजए।’’ इस कार समझा-
बुझाकर सब तपि वय ने अ य त दु:िखत हो राम-ल मण को िवदा कया। ब त जन दूर
तक उनके साथ चले।
इस कार राम-ल मण दि ण दशा म आगे बढ़कर च-वन म प च ं े। यह वन
बड़ा िवशाल और रमणीय था। पर तु यह वन अ य त सघन था और इसम अनेक हं
ज तु रहते थे। यहां एक अ य त गहरी-गुहा थी। इस गुहा म एक अित भयानक रा स
रहता था। वह बड़ा बलवान् था। इस वन का वही वामी था। उसके िवकट बल और अतुल
साम य से दूर-दूर तक लोग आतं कत रहते थे। चलते-चलते एकाएक वह भयानक रा स
दोन हाथ फै लाए इन दोन भाइय के स मुख आ खड़ा आ और कहने लगा–‘‘धनुष-बाण
धारण करने वाले तुम दोन कौन हो और िबना मेरी अनुमित मेरे इस वन म कै से आए हो?
तुम सु दर हो, तु हारे क धे बैल के समान ह, तुम अव य ही मानुष तीत होते हो। म
मानुष को मार िश देव को बिल देकर नरबिल का मांस खाता ।ं सो तुम भले िमले। आज
म तु हारी बिल दे तु हारा ही वा द मांस खाऊंगा।’’
उस क प ू और िवकट रा स को देख शोक-जज रत और भूख-थकान से ला त
राम-ल मण अ य त भयभीत हो गए। पर तु ल मण ने साहस करके ख ग का हार
उसक फै ली ई भुजा पर कया। हार से उसक एक भुजा कटकर दूर जा िगरी। उस
हार से िवकल होकर वह ल मण को पकड़ने दौड़ा। तब अवसर पाकर राम ने उसे सात
बाण से ब ध डाला। फर जब वह पीड़ा से ाकु ल हो राम क ओर मुड़ा तो राम ने फु त
से पांच बाण उसके खुले मुख म ठूं स दए, जो उसके तालु को फोड़कर िनकल गए, िजससे
वह कराहता आ भूिम पर िगर गया और दीन भाव से बोला–‘‘हे वीर, तुम कौन हो?’’
राम-ल मण ने जब अपना संि प रचय दया तो वह कहने लगा–‘‘मने तु हारा
ताप और नाम जन थान म सुना था। म दनु दानव ं तथा देवराट् इ के व - हार से
पंगु होकर यहां वन म रहता था। सो आज तु हारे हाथ से मेरा अ त आ। क तु अब वैर-
भाव से या योजन है? कहो, म तु हारा या ि य क ं ?’’
रा स के ये वचन सुनकर राम ने कहा–‘‘मेरी भाया को कोई त कर हर ले गया है,
या तू उसका कु छ पता बता सकता है?’’
तब रा स ने कहा–‘‘हे राम, मेरी सुन! राजा छ: कार क सि धिव ह युि य से
अपना मनोरथ पूरा करता है। पु ष जब कालच से आ ा त होता है, तब उसे बुरी दशाएं
भी सहनी पड़ती ह। इसी के फल व प तू काि तहीन हो गया है, सो जब तक तू कसी
पु ष को िम न बनाएगा, तेरा मनोरथ पूरा न होगा। सो मेरा कहना माने तो तू सु ीव
वानर से िम ता कर ले। उसके भाई बािल ने उसे घर से बिह कृ त कर दया है और वह इस
समय ॠ यमूक पवत पर प पा सरोवर के िनकट अपने वानर प रजन के साथ रहता है। ये
दोन भाई बािल और सु ीव, बड़े बली और तेज वी ह। सु ीव िवशेषकर परा मी, िम ता
क आन रखने वाला तथा बुि मान पु ष है। िम बनकर वह तेरी भाया को खोज
िनकालने म ब त सहायक होगा। तू अि जलाकर उसक सा ी से उसे िम बना ले,
िजससे भिव य म वह तुझसे िव ोह न कर सके । तू वयं भी कभी सु ीव का अनादर न
करना, य क वह कृ त है तथा इस समय वह वयं एक सहायक ढू ंढ़ रहा है। सो तुम दोन
भाई पहले उसका अभी काय पूरा कर देना, िजससे वह कृ त ता के भार से उॠण होने
को तु हारा काय अव य करे गा। उसके वानर पृ वी के सब देश-देशा तर को जानते ह।
उनके ारा वह दुग, वन, पवत, नदी, ीप सभी जगह, जहां से भी संभव होगा, तेरी प ी
को ढू ंढ़ लाएगा। मे , पाताल कु छ भी उसके चर के िलए अग य नह है। सो हे राम, तू मेरी
मृ यु तक यहां ठहरकर मेरी औ वदैिहक या कर। फर यहां से पि म क ओर जा। वह
माग वृ -वन पितय से सुशोिभत और सुगम है, वहां ॠ यमूक पवत के अंचल म तू प पा-
सरोवर पर प च ं ेगा। वहां क भूिम कं करीली नह है, घाट समतल है, उस सरोवर म नील
कमल ब त ह। उस सरोवर म िवचरने वाले कु रं ड, हंस, कु स और च आ द प ी िनर तर
मधुर श द करते ह। वह तू वानर के यूथ देखेगा। वे कृ त वीर ह। उनम संहिव म ह।
वह िनकट तेज वी मतंग ॠिष का आ म है। मतंग ॠिष अब जीिवत नह ह; पर तु
उनक सेिवका तपि वनी शबरी वहां आ म क वािमनी है। वहां का वन मातंग नाम से
ही िस है। उस वन म बड़े–बड़े हाथी ह, िजनका मदग ध योजन-योजन िव तार से
सुरिभत रहता है। प पा के शीष थल पर ही ॠ यमूक है। वहां क चढ़ाई बड़ी िवकट है।
वहां पशमिण तथा द ौषिधयां ब त ह। इस समय उसी पवत क गुहा म िवप त
धमा मा सु ीव रहता है।’’
इस कार िहतकारी वचन कहकर दनु ने र ारा अपने ाण याग दए।
राम-ल मण ने िविधवत् उसक औ वदैिहक या क , फर वे सु ीव से िमलने को
ॠ यमूक क ओर चले। राह म िवकट वन-पवत-उप यकाएं पारकर अ य त धैयपूवक वे
ॠ यमूक के िनकट मतंग ॠिष के आ म म जा प च ं े। वहां शबरी ने उनका िविधवत्
आित य कर उ ह आ म म ठहराकर उनका म दूर कया।
ये मतंग ॠिष अ यज जाित के थे। शबरी भी उ ह क जाित क थी। पर तु दोन
ही का धम- भाव दूर-दूर तक ा था। मतंग ॠिष क ब त याित थी। वे वेद ष थे।
राम ने शबरी से कहा–‘‘माता, दनु से तेरे आ म क मिहमा सुन चुका ।ं अब उसे य
देखने क अिभलाषा रखता ।ं ’’
शबरी ने कहा–‘‘हे राम, मेरे गु पद के नाम पर इस वन का नाम ही मातंग वन है।
मतंग ॠिष ने यहां ब त य कए तथा स तीथ बनवाए। यह पर उ ह ने देवराट् का
य स कार कया था तथा देवराट् इ वयं यहां आकर ॠिषवर को देवलोक ले गए
थे। अब मेरा भी समय आ उपि थत आ है। राम, तु ह देखकर और तु हारा आित य करके
म कृ तकृ य हो गई। अब मेरी इ छा अि - वेश कर अपना शरीर यागने क है।’’ इतना
कहकर शबरी ने सब तापसजन को एक कर अ याधान कया और िविधवत् हवन करके
सबके देखते-देखते अि - वेश कया।
राम-ल मण ने शबरी क औ वदैिहक या स प कर, स तीथ म ान कर
िपतर का तपण कया और फर ॠ यमूक क ओर चले। शी ही वे प पा-सरोवर के तट
पर जा प च ं ।े वहां वन क शोभा अकथनीय थी। वृ जैसे फल-फू ल क वषा कर रहे थे।
वायु के साथ-साथ मराविलयां गूंज रही थ । पवन च दन के वृ से शीतल और सुरिभत
था। प ी म त हो चहक रहे थे। सव ॠतुराज का रा य था। राम वहां के मनोरम
वातावरण को देख िवरह-दु:ख से दु:िखत हो कहने लगे–‘‘देखो, इस मधुर ॠतु म सीता के
िबना मेरी कै सी दशा है! सीता के िबना यह सुखद वातावरण मुझे कतना क कर तीत हो
रहा है! अब न जाने वह सा वी कहां होगी?’’
राम के इस कार िवलाप को सुनकर ल मण ने कहा–‘‘आय, आप धैय धारण
क िजए। वह चोर चाहे भूलोक म हो या पाताल म, हम उसे ढू ंढ़ िनकालगे। अब हम सरोवर
म ानकर ॠ यमूक पर प च ं ना चािहए। कं कत िवमूढ़ होकर शोकसंत होने से भला
या लाभ है!’’
इस कार प पा सरोवर म ान कर जब राम ॠ यमूक पवत पर प च ं ,े तो दो
नवीन श धारी पु ष को देख सु ीव के म ी चौक े हो गए। उ ह ने सु ीव को इसक
सूचना दी। ‘हो सकता है, इन पु ष को बािल ने ही हम मारने को भेजा हो,’ इस िवचार से
उसने सोच-िवचारकर अपने पाषद हनुमान् को राम के पास स े समाचार जानने के िलए
भेजा। हनुमान् ने ॠिषवेश बना राम के पास आ उनका नाम-धाम-गो तथा उनके उधर
आने का कारण पूछा। उसने कहा–‘‘तप वी का वेश धारण करने वाले तथा धनुष-बाण
िलए वन म िवचरण करने वाले, आप कौन ह? या आप कोई रा यािधकारी ह या देव-
पु ष ह? सो कृ पाकर किहए। इस थान पर अपने भाई बािल से तािड़त वानर-राज
सु ीव रहते ह। वे हमारे वामी ह। मेरा नाम हनुमान् है। म उ ह क आ ा से आपक सेवा
म आया ।ं ’’
हनुमान् के ऐसे वचन सुन, राम का संकेत पा, ल मण ने कहा–‘‘हम महा मा
सु ीव के गुण से अवगत ह और उ ह से िमलने के िलए इस थान पर आए ह। सु ीव य द
हमसे िम ता करना चाह तो हम भी वह वीकार है। हम कोसलेश दशरथ के पु ह। ये
आय राम ह, म इनका अनुज ल मण ।ं िपता क आ ा से आय राम प ी सीता-सिहत वन
म आए थे, यहां जन थान म कसी दु ने इनक ी का अपहरण कया है। उसी को खोजते
हम घूम रहे ह। हम राह म रा स दनु ने महा मा सु ीव का प रचय दया था। तभी से हम
उनसे िमलने के िलए उ सुक ह।’’
ये बात सुनकर हनुमान् ने िवन वाणी से कहा–‘‘आपके वचन से मेरे कान तृ
हो गए। महा मा सु ीव के अ ज बािल ने उनक ी पा का अपहरण कर रा य भी छीन
िलया है तथा उ ह नगर से िनकाल दया है, िजससे वे दु:िखत हो इस पवत पर बस रहे ह।
वे आपक िम ता-लाभ कर अव य स ह गे। अब आप यहां ण-भर िव ाम क िजए,
तब तक म जाकर उनसे िनवदेन करता ।ं ’’
यह कहकर हनुमान् चले गए। उ ह ने सु ीव को राम-ल मण का प रचय दया।
वहां आने का कारण भी बताया। सुनकर सु ीव ने राम के पास जाकर भट क और अि -
थापना करके उनसे मै ी थािपत कर कहा–‘‘आज से हम एक ह, मेरा-आपका सुख-दु:ख
एक है।’’ फर दोन च दन क लता पर बैठ वातालाप करने लगे।
सु ीव क वाता सुनकर राम ने कहा–‘‘िम , तू िच ता न कर। म दुरा मा बािल
का वध कर तेरी प ी और रा य तुझे दलाऊंगा।’’
सु ीव ने कहा–‘‘िम , म भी जैसे, जहां से बन पड़ेगा, सीता का पता लगाकर
आपको ला दूग ं ा।’’
इस कार दोन वचनब हो आगे क योजनाएं बनाने लगे। तब अक मात् मरण
करके हनुमान् गुफा म जाकर वे व -आभूषण ले आए जो सीता ने हरण के समय जाते ए
वहां फके थे। आभूषण और व देख राम ाकु ल हो गए। उ ह ने ल मण से कहा–‘‘देखो
सौिम , ये कु डल, ये नूपुर या सीता ही के ह?’’
सौिम ने कहा–‘‘आय, म इन कु डल को नह जानता, य क मने कभी आया के
मुख क ओर नह देखा, म तो इन नूपुर को पहचानता ।ं जब म िन य आया क पद-
वंदना करता था, तब इ ह देखता था।’’
तदन तर सु ीव ने सारी घटना कह सुनाई।
राम ने कहा–‘‘िम सु ीव, या तुम अनुमान कर सकते हो क वह दु चोर कौन
है?’’
‘‘नह कह सकता, न म उसका थान जानता ।ं पर तु वह कह िनकट नह रहता
है, ऐसा मेरा अनुमान है। फर भी म शी ही उसका पता लगा लूंगा। आप िच ता न कर।
शोक याग द। महा माआ का दु:खी होना उिचत नह है। मुझे भी प ी-िवयोग है, पर तु म
शोक नह करता आप भी इस संकट-काल म धैय धारण क िजए। शोक से ाकु ल होकर
जो धैय छोड़ देता है, वह मूख है। शोक से मनु य बुि हीन होकर संशय म पड़ जाता है।
इसिलए आप शोक याग पु षाथ दखाइए।’’
सु ीव के ये सारग भत वा य सुनकर राम ने कहा–‘‘िम , तूने स े िम क भांित
बात कही है। िन संदह े तेरे जैसा िम िमलना दुलभ है। तू िव ास रख क मने जो वचन
दया है, वह पूरा क ं गा।’’
88. बािल–वध

सु ीव ने कहा–‘‘आप जैसा सवगुणस प िम पाकर अब मेरे िलए कु छ भी


अल य नह रहा। आपके ताप से म पूजनीय हो गया। दुरा मा बािल ने मेरी प ी को छीन
मुझे रा य से िनकाल दया है और वह सदैव मेरे वध के उपाय करता रहता है। हनुमान्
सिहत ये चार वानर ही मेरी सेवा म ह। यह बािल मेरा काल है, उसका अ त होने पर मेरा
दु:ख दूर होगा।’’
राम ने कहा–‘‘िम , तेरे इस ातृ-िव ह का कारण या है? या बािल तेरा सगा
ये ाता है?’’
‘‘नह , उसका िपता इ है। माता उसे गोद म लेकर िपता क सेवा म आई थी।’’
‘‘ क तु ये तो है ही।’’
‘‘इसी से िपता क मृ यु होने पर मि य ने उसी को अिभिष कर दया था तथा
वानर-रा य क े सु दरी तारा भी उसे दे दी गई। रा य और मिण का आन द वह भोगने
लगा और म ष े रिहत अनुज क भांित उसक सेवा करने लगा।’’
‘‘यह उिचत ही था।’’
‘‘ फर एक बार उसका पुराना वैरी मायावी दै य कह से आकर वानर-रा य म
उ पात करने लगा। ितस पर बािल मुझे संग ले उससे यु करने िनकला। पर तु वह दै य
िवकट वन म िछपकर यु करता रहा, िजससे बािल मुझसे िबछु ड़ गया। म एक वष तक
वन म बािल को खोजता रहा। फर म िनराश हो तथा यह समझकर क बािल को मायावी
ने मार डाला है, राजधानी म लौट आया।’’
‘‘ वाभािवक ही था।’’
‘‘तब मि य ने मेरा रा यािभषेक कर दया, य क रा य िबना राजा के नह
रह सकता था।’’
‘‘यथाथ है।’’
‘‘तब तारा भी अपने पु अंगद को लेकर मेरी सेवा म आ गई। मने उसे अपनी
मिहषी वीकार कर िलया और अंगद को, जो बािल का पु था, अपना ही पु मान
िलया।’’
‘‘ऐसा भी होता है।’’
‘‘पर तु कु छ काल बाद बािल अक मात् राजसभा म आ उपि थत आ और मुझे
संहासन पर आसीन देख दुवचन कहने लगा। मने उससे स तापूवक छ हण करने क
ाथना क तथा स य बात भी कह दी। पर बािल का ोध शा त नह आ। उसने छ
हणकर एक व मुझे दे रा य से िनकाल दया और तारा को भी मुझसे छीन िलया।
िन पाय म यहां असहाय-िवप रहता ।ं ’’
‘‘ क तु बािल का परा म-शौय कै सा है?’’
‘‘वह बड़ा बली है। सूय दय से पूव ही उठकर समु -तट तक जाता है। बड़े-बड़े
िशला-ख भ को भुजा म उठा लेता है। उसने अनेक दै य -दानव और रा स का दलन
कया है। उसका बल अप रसीम है। के वल मतंग ॠिष क आन मान यहां नह आता है।
इसी से मने यहां आकर शरण ली है।’’
‘‘तो िम , तू िनि त रह। म बािल-वध कर तेरी राह का कं टक दूर क ं गा।’’
‘‘ क तु िम आप मेरी बात को अपना ितर कार न समझ। म बािल के बल को
जानता ,ं क तु आपक साम य से अ ात ।ं ’’
राम ने हंसकर कहा–‘‘तो िम , तू मेरी परी ा ले!’’
‘‘िम , ये स मुख सात ताड़ एक ही वृ म ह। बािल इन सात को एक साथ ही
िहला सकता है। बाण से एक-एक को ब ध सकता है। या आप भी बाण से इनम से कसी
एक को फाड़ सकते ह?’’
राम ने होठ को दांत म दबाकर धनुष पर बाण-संधान कया और एक ही बाण से
सात ताड़ को ब ध दया। राम का यह ह तलाघव और चम कार देख सु ीव हष से
उ लिसत होकर बोला–‘‘हे िम , आप तो एक ही बाण से व पािण देवराट् का भी वध कर
सकते ह। अब म िनभय आ। मने जान िलया क आप मेरे श ु का वध कर मुझ अ कं चन
को िन कं टक करगे।’’
राम ने सु ीव को गले लगाकर कहा–‘‘िम , िच ता न करो। चलो, अब कि क धा
चल। िवल ब क या आव यकता है?’’
कि क धा प च ं सु ीव ने बािल को म लयु के िलए ललकारा। सु ीव क
ललकार सुन बािल अखाड़े म आ उपि थत आ। दोन का म लयु राम-ल मण िछपकर
देखने लगे। देखते-ही-देखते बािल ने सु ीव को पीट-पीटकर भगा दया और वयं हंसता
आ राजधानी म लौट गया। यु म िपटकर सु ीव ने खीझकर राम को उलाहना
दया–‘‘आपने मुझे थ ही िपटवाया और देखते रहे। इससे या लाभ आ?’’
राम ने कहा–‘‘एक भूल हो गई थी िम , तेरा कोई िच न न था। तुम दोन एक
जैसे ही थे। कल तू पु प-माला पहनकर यु कर।’’
दूसरे दन सु ीव बािल के राज ार पर जा फर संह-गजना करने लगा। उसक
गजना सुन अपश द बकता आ बािल बाहर िनकला। उसके ने ोध से लाल हो रहे थे।
तारा ने उसे रोकते आ कहा–‘‘आज तुम यु मत करो, सु ीव क गजना म अहंकार- विन
है। कह उसे कोई सहायता न िमल गई हो। मने अंगद से सुना है क दो धनुषधारी मानव
से उसने िम ता क है। वे उसके साथ ह।’’
पर तु बािल ने कहा–‘‘ या म श ु क गजना सुनकर घर म बैठा रह सकता ?ं
और आज तो म उसे मार ही डालूंगा। मने तो कल अनुक पा से ही उसके ाण छोड़ दए
थे।’’
थोड़ी ही देर म म लयु िछड़ गया। सु ीव भी आज ाणपण से जुट गया। जब
दोन वीर पर पर गुंथे थे, तभी राम ने एक अि बाण तानकर छोड़ा, जो बािल के क ठदेश
को फोड़ता आ उसक उरो-गुहा म धंस गया। बािल त ण मुख से खून फकता आ पृ वी
पर िगरकर छटपटाने लगा। यह देख ब त-से वानर म ी और अ य पु ष भी वहां जुट
गए। राम-ल मण उसके िनकट जा प च ं ।े
राम का प रचय बािल को सु ीव ने दया। राम के बाण ही से उसका पराभव आ
है, यह भी कहा। सुनकर दु:खी बािल ने कहा–
‘‘हे धनुषधारी, तूने दूसरे से यु करते ए मुझको िछपकर मारा है। तू परा मी
और च र वान नह है, िव ासघाती है। तू तृण से ढके ए कु एं के समान है। म तो कभी
तेरे रा य म गया नह , कभी तेरा कु छ अिन कया नह । तेरा प-वेश मुिनजन जैसा है,
धज ि योिचत है, पर तु तुझे धम का ान नह है। मुझ िनरपराधी क ह या करके तू अब
कै से स य समाज म मुंह दखाएगा? अरे महा मा दशरथ का ब त ताप मने अपने िपता
देवराट् इ से सुना है। उन महा मा दशरथ के तेरे जैसा िव ासघाती पु उ प आ?
अरे , तूने सु ीव के िहत के िलए मेरा वध कया! तू य द अपना अिभ ाय मुझसे कहता तो
म तेरी अिभलाषा तुर त पूरी करता।’’
बािल के ये वचन सुन राम ने कहा–‘‘अरे बािल, तुझे धम-अथ का यथाथ ान नह
है। जान रख क इस पृ वी पर इ वाकु -वंिशय का अबाध शासन है। तूने अपने िवनीत
छोटे भाई के ित अ यायाचरण कया–इसी से मने तुझे द ड दया। तेरे जैसे अपराधी का
वध िछपकर करने म दोष नह । हम आयजन ओट म होकर ही पशु का आखेट करते ह।
तू िनबुि भी पशु है।’’
इसी समय अंगद का हाथ थामे तारा आकर िवलाप करती ई धड़ाम से बािल के
ऊपर िगर पड़ी और बोली–‘‘हे वीर, उठो। भूिम पर य पड़े हो? अपने अनुकूल पयक पर
शयन करो। अरे ! तुमने तो धमरा य थािपत कर इस कि क धा को स प कया था। अब
इसक ी कहां रहेगी? हाय, अब म कै से इस दु:ख को सहन क ं गी? अरे , तु हारा यह पु
अंगद तु ह पुकार रहा है। तिनक इसक ओर तो देखो। अरे , तुम अपने इस ाणािधक पु
को छोड़ कहां जा रहे हो?’’
तब हनुमान् ने आगे बढ़कर कहा–‘‘हे रानी, अब इस कार शोक करने से या
लाभ है? जो मनु य वयं अपने दु:ख से दु:खी है, वह दूसरे पर या दया करे गा? तु हारा
पु अंगद तु हारे पास है, तुम शोक याग, इसका पालन करो और भिव य म िजससे
तु हारा क याण हो वही काम करो। यह जीवन-मरण तो कम के साथ लगा ही है। महाराज
सु ीव सिहत हम सब वानर और तु हारा पु अंगद तु हारी सेवा म उपि थत ह। फर तुम
अनाथ कहां ? अब इस पृ वी का पालन अंगद करे गा। अत: राजा बािल का सं कार कर
अंगद का राजितलक करो।’’
तारा ने यह सुनकर कहा–‘‘अरे हनुमान्, यह जो पु य पु ष भूिम म पड़ा है, इसके
सामने सौ अंगद भी यौछावर ह। अब अंगद इस वानररा य का वामी नह बनेगा। रा य
के वामी तो अब सु ीव ही ह। अब वही रा य संचािलत कर, िजसके िलए उ ह ने भाई का
वध कया। मेरे िलए तो अब यही थान े है, जहां वानरराज र से भरे लेटे ए ह।’’
तारा के ये वचन सुन बािल बड़े क से ास लेता आ बोला–‘‘सु ीव, जो होना
था, वह आ। अब म इस लोक से जा रहा ।ं पर मेरे इन अि तम श द को याद रखना।
यह अंगद मेरे ाण का यारा है, इसका यान रखना। अब ष े -भाव से या? तुम मेरे ि य
ाता हो–यह र -माला लो, िजसम िवजयल मी िनिहत है। तारा का यान रखना, यह
द दृि रखती है और भावी घटना के िच न को जानने म पारं गत है।’’ फर अंगद
क ओर देखकर कहा–‘‘पु , प रि थित को देखते ए, दु:ख-सुख सहन करते ए अपने
चाचा सु ीव क आ ा के अधीन रहना!’’
इतना कह बािल ने ाण याग दए। तारा मम पश आतनाद करती ई बािल के
मुख को देखकर कहने लगी–‘‘हे वानरराज, कु छ मेरा भी िवचार कया? मालूम होता है क
यह भूिम आपको मुझसे भी अिधक ि य है! अरे , िजस श या पर तुम सदा श ु को सुलाते
थे, उसी पर आज वयं सो रहे हो! आज तो म िवधवा हो गई। अब पु वती होने ही से
या? अरे , आज तुम अपने ही र पर लेटे हो! अंगद, िपता को णाम तो कर, पु !’’
इतना कह अंगद-सिहत तारा बािल के चरण म लोट गई।
89. सीता क खोज म

कि क धा म सु ीव का रा य हो गया और राम वण िग रशृंग पर रहने लगे।


वषा ॠतु आ गई थी। इसिलए अभी कु छ भी नह हो सकता था। वण पवत बड़ा ही
मनोरम था। पवत पर सफे द और काले प थर क च ान थ । अनेक कार क खिनज
धातुएं भी ब त थ । सरोवर म बड़े-बड़े कमल िखले थे। वन-िवहंग ठौर-ठौर चहचहाते थे।
िनमल जल के अनेक झरने झर रहे थे। इस समय वण पर अनेक तप वीजन के आ म-
ाम थे। वहां च दन के ब त वृ थे। उस मलय-मा त से वह थान िनर तर सुरिभत
रहता था। कि क धा वहां से िनकट ही थी।
वषा ॠतु बीत गई। शारदीय शोभा ने दशा को उ वल कर दया। राम ने
ल मण से कहा–‘‘ल मण, सु ीव तो रा य और ी पाकर उ ह म रम रहा है तथा मेरे
काय को भूल गया है। म रा य से भी िनकाला गया और मेरी ी का भी अपहरण आ।
माग दुगम है। न जाने कौन दु चोर वैदह े ी को चुरा ले गया है। वह जीिवत भी है या नह ।
अब मेरा धैय जवाब दे रहा है। म कब तक ती ा क ं ? मेरे अयो या जाने पर जनसमुदाय
उमड़ पड़ेगा, तो सीता के न रहने से म उ ह या जवाब दूग ं ा! ये वषा के चार मास मुझे सौ
वष के समान तीत ए ह। मुझ रा य को, िजसक प ी हर ली गई है, सु ीव ने भी
अनाथ के भांित भुला दया। यह उसका िव ासघात है। अपना काम बनाकर वह मूख
रनवास म आन द कर रहा है। या उसने अपना ही काम िस करने के िलए मुझसे िम ता
क थी? उसने तो वषा समा होते ही सीता क खोज का वचन दया था। पर तु ऐसा
तीत होता है क वह कामा ध अब वह बात भूल गया है। वह मि य सिहत भयानक
काम कर रहा है। तुम जाकर उसके कत को मरण करा दो और कह दो क कह उसक
भी बािल जैसी दशा न हो।’’
ल मण ने कि क धा प च ं कर अपने आने क सूचना सु ीव को भेजी। पर तु
सु ीव को अ त:पुर म सूचना प च ं ाई ही नह गई। तब ल मण ने धनुष पर बाण चढ़ाकर
ोधपूवक अंगद से कहा–‘‘अरे अंगद, जाकर अपने राजा सु ीव से कह क सौिम ल मण
राज ार पर उपि थत ह, इ छा हो तो आकर भट कर या फर म दूसरा उपाय क ं ।’’
ल मण के ये ोधपूण वचन सुनकर अंगद वयं सु ीव को सूचना देने गया। पर
वह म पीकर बेहोश पड़ा था। तब अंगद ने अपनी माता तारा से ल मण के ु होने तथा
ार पर उपि थत होने क बात कही।
कि क धा नगरी बड़ी भ थी। उसम सु ीव का राजभवन पवत जैसा ऊंचा था।
उसम ब त-से गवा और ार थे, िजनम व छ द पवन वािहत हो रही थी। ल मण
धड़धड़ाते ए महल म घुस गए। उ ह इस कार आते देख अ त:पुर क ि यां घबराकर
भागने लग । इसी समय तारा ने स मुख आकर ल मण को णाम कया। म पान तथा
राि -जागरण से उसके ने घू णत हो रहे थे। तारा को देखते ही ल मण ने धनुष नीचे कर
िलया। तारा ने न श द म कहा–‘‘राजकु मार, आप ोध को याग द। सु ीव आपका
िम है, िहतैषी है। उसके अपराध को मा क िजए। आपके उपकार को वह भूल नह
सकता। पर तु आपको जानना चािहए क कामातुर आदमी धम-अथ क बात नह िवचार
सकता। इतने दन दु:ख पाने पर अब वह कामरत हो गया है, इसिलए आप उसे मा
क िजए और मेरे साथ रनवास म पधा रए।’’
रनवास म जाकर वण-श या पर सोए तथा दािसय , प रचा रका से सेिवत
सु ीव को म के नशे म म त देख, ल मण ने कहा–‘‘हे राजन्, जो राजा बली, दयालु,
िजतेि य और स यवादी होते ह, उ ह का यश संसार म फै लता है। उपकारी िम से झूठी
ित ा करनेवाले के समान अधम और दूसरा कोई नह है। सो राजन्, तुम झूठे, कृ त और
अनाय हो। अपना काम करा लेने पर भी तुम अपना ण भूल गए। आय ने यह नह समझा
था क वे एक दुरा मा को राज दे रहे ह। अब तुम कहो क तुम अपना वचन पूरा करते हो
या रामच अपना बाण धनुष पर चढ़ाएं!’’
ल मण के वचन सुनकर भी सु ीव के मुंह से बात न फू टी। तब तारा ने ही
कहा–‘‘राजकु मार, वानरे सुगीव न कपटी है, न िव ासघाती। आप ऐसे कठोर वचन
य कहते ह? न वह आप लोग का उपकार ही भूला है। पर तु हां, काम-पीिड़त है। उसने
ब त क भोगे ह, अत: कामोपभोग म उसे समय का यान नह रहा। िव ािम ने
घृताची के ेम म दस वष बीतने पर एक ही क गणना क थी। वही दशा सु ीव क है।
पा और म आप ही क कृ पा से उसे ा ई ह। वह आपके िलए राजपाट और मुझे तथा
अंगद को भी याग सकता है। फर, आप भी इस समय िवप ाव था म ह। आपको िम
क सहायता क ब त आव यकता है। आपका काम िबना सु ीव क सहायता के नह हो
सकता। सो सु ीव आपक सहायता के िलए उपि थत है।’’
इसी बीच सु ीव को भी चैत य लाभ आ। वह पलंग से कू दकर खड़ा हो गया।
ल मण और तारा क बात उसने सुन ल । कामदेव क तीक पु पमाला तोड़कर फक दी।
फर उसने कहा–‘‘राजकु मार, ीराम ने मेरी गई ई रा य ी मुझे लौटाई है। म भला कै से
उसका उपकार भूल सकता ?ं ’’ उसने उसी समय हनुमान् को बुलाकर आ ा दी क सब
रा य -उपरा य के वानर और ॠ पित अपने-अपने यूथ सिहत दस दन के भीतर यहां
राजधानी म आ उपि थत ह । इस आ ा का जो उ लंघन करे गा उसका वध होगा। इसके
बाद वह मंि य और ल मण सिहत पाल कय म बैठ शंख विन के बीच तथा ब दीजन
ारा गुणगान सुनता आ राम क सेवा म चला।
देखते-ही-देखते चार ओर से दल-बादल वानर के यूथ वण पर आकर एकि त
होने लगे। सु ीव ने सेनापित िवनत को पूव दशा म, हनुमान् और अंगद को दि ण म और
अपने सुर सुषेण को पि म म भेजा तथा शतबली को उ र दशा म रवाना कया। सबके
साथ हजार वानर के यूथ भी गए। इस कार सारी ही पृ वी पर सीता क खोज होने
लगी।
सीता के िमलने क संभावना दि ण दशा म ही थी। इसिलए दि ण म जो दल
युवराज अंगद क अ य ता म भेजा गया, उसम महापरा मी हनुमान्, नील, अि पु ,
जा बवान्, सुहो , शरा रत, शरगु म, गज, गवा , गवय, वृषभ, ि िवद, उ कामुख तथा
अ य वीर वानर थे। वे अधोमुख मलय पवत होते ए ता पण नदी को पारकर, समु -तट
पर प चं ।े वहां से महे पवत पर चढ़े। वहां से पुि पतक ीप म गए। फर सूयवान्, वै ुत
और कं जर पवत को पार कया। अ त म वे नाग क राजधानी भोगपुरी म प च ं ।े उ ह ने
ब िवध सीता क खोज क , पर तु सीता का कु छ भी पता न चला। सभी वानर ब त
हताश ए। सु ीव ने जो अविध दी थी, वह भी बीत चली।
अंगद ने कहा–‘‘सु ीव का काय िबना कए लौट जाने से हमारे ाण नह बचगे।
हमारे िपतृ सु ीव का वभाव ब त ही कठोर है। वह अपराधी को कभी मा नह
करता। फर मेरा तो वह पहले ही िवरोधी है। ीराम के आ ह ही से उसने मुझे युवराज
का पद दया है। वह सबसे थम मेरे ही ाण लेगा।’’
हनुमान् ने कहा–‘‘युवराज, तुम तो अपने िपता के समान ही वीर हो और
वानरराज के अिधपित भी हो। पर तु इस समय हम सब सु ीव ही के अनुगत ह। सु ीव
हम पर दयालु ह, वे धम ह। इसिलए हम य से, िजस काय के िलए हम आए ह, उसे
करना चािहए।’’
अंगद ने कहा–‘‘सु ीव, कहां का धमा मा है भला? िजसने अपने बड़े भाई क ी
को घर म डाल िलया, भाई का वध करवाया और अपना काम राम से कराकर भी माद
कया, उसे ही तुम धमा मा कहते हो? म तो कभी उस कु टल के सामने न जाऊंगा। वह
िन य ही मेरा और तु हारा सबका वध करे गा। और म तो पहले ही से हताश ।ं म
कि क धा कदािप नह जाऊंगा, यहां अनशन करके ाण यागूंगा। आप सु ीव से मेरा
णाम कहना और माता पा तथा तारा से भी कु शल- णाम कहना। माता तारा को धैय
बंधाना। वह बेचारी तो मेरे िबना जीिवत ही न रहेगी। जो हो, मने तो अब ाण यागने का
ण कर िलया है।’’ यह कह अंगद कु शा िबछा भूिम पर मौन होकर बैठ गया। वानर का
एक भी अनुनय-िवनय उसने नह माना। तब दु:खी होकर सभी वानर हनुमान् सिहत अंगद
के साथ ाण देने के िवचार से कु शा िबछा-िबछाकर भूिम पर बैठ गए।
वानर इस कार मरण क ठान-ठानकर भूिम पर बैठे ही थे क उ ह ने देखा–एक
िवशालकाय गृ धीरे -धीरे पवत से उतर रहा है। वानर को वहां इस कार बैठे तथा मरण
ठान ठानते सुन वह स आ। उसने कहा–‘‘ब त उ म सुयोग है, जो-जो ि मरता
जाएगा, उसका भ ण म करता जाऊंगा। ब त दन तक भोजन क िच ता िमटी।’’
उसे देख वानर ने कहा–‘‘हाय-हाय, यह कौन कृ ता त हम जीिवत ही का ाण
लेने यहां उपि थत आ? हम न सीता का ही पता लगा सके , न वामी ही क आ ा का
पालन कर सके । हमसे तो अिधक भा यवान् गृ राज जटायु ही है िज ह ने सीता क
ाणर ा के िलए रा स के हाथ से ाण दए।’’
वानर क यह कातरोि सुनकर उस पु ष ने कहा–‘‘अरे , यह कसने मेरे भाई
जटायु का नाम िलया? कसने मेरे भाई जटायु का हनन कया? कहो, म जटायु का बड़ा
भाई स पाित ।ं म ब त वृ ।ं देवासुर-सं ाम म सूय से यु करते मेरे दोन पंख न हो
गए थे। म पंख से रिहत, वृ ाव था से जजर, अपंग, अश यहां अपने पु पा व के
आ म म रहता ।ं अब तुम कहो, कौन हो और कस अिभ ाय से यहां ाण यागने का त
ठान बैठे हो? तुम मेरे छोटे भाई जटायु के स ब ध म कु छ कह रहे थे! अब मेरे भाई का
ि य-अि य जैसा भी संदश े हो, कहो। कसने मेरे भाई जटायु के मरण क बात कही है? उसे
सुनकर तो मेरे ाण ही कांप गए ह दीघकाल से मने अपने भाई का समाचार ही नह सुना
है। भाई जटायु मुझसे छोटा, गुण और परा मी था। वह िस पु ष था, उसका नाम
सुनकर मुझे स ता ई है। पर तु तुमने कहा क जन थान म कसी दु ने उसका नाश
कर डाला है। यह दा ण घटना कै से ई, इसका सिव तार वणन मुझसे िम क भांित
करो।’’
स पाित के ये वचन सुन वानर का भय दूर आ। उ ह ने स पाित को पवत से
उतारकर पास बैठाया। तब युवराज अंगद ने कहा–‘‘हे गृ राज, वानर के राजा अ य त
तापी ॠ राज मेरे िपतामह थे। उनके दो पु बािल और सु ीव ए। म परम तेज वी
राजा बािल का पु अंगद ।ं कु छ वष पूव परम वीर दशरथा मज ी राम अपने िपता के
आदेश से धम-माग का आ य ले द डकार य म आए। उनके साथ उनके छोटे भाई ल मण
और प ी सीता भी थी, जन थान से कोई दुदा त रा स उनक प ी को बलपूवक हरण
कर ले गया है। उस आततायी को महा मा दशरथ के िम आपके ाता जटायु ने रोका था।
उ ह ने िन:श ही उस दु को रोका, उसका रथ न – कर दया और सीता को भूिम
पर लाकर सुरि त रख दया। पर तु वृ जटायु िनर होने के कारण उस पितत के हाथ
मारे गए। तब लौटकर और सब वृ ा त जानकर ी राम ने अपने हाथ से आय जटायु का
सं कार-तपण ॠिषवत् कया। तदन तर उ ह ने महाराज सु ीव से िम ता क तथा मेरे
िपता बािल को मार सु ीव को वानर का राजा बनाया। अब ी राम क सहायताथ हम
सब वानर देश-देशा तर म सीता क खोज म भटक रहे ह। पर तु अभी कु छ भी खोज नह
हो पाई है। खोज क अविध भी समा हो चुक है। अब हम िनराश हो ाण देने पर स
ह, य क वहां जाने पर भी हमारे ाण नह बचगे। इसी से हमने मरण-य करने का
िवचार कया है और उपवास- त ले यहां समु -तट पर बैठे ह।’’
वानर के ऐसे शोकपूण वचन सुन स पाित सा ुलोचन हो कहने लगे–‘‘व स
अंगद, उस चोर को म जानता ं और मेरे भाई का वध करने के कारण अब वह मेरा भी
वैरी है। पर तु वह दु चोर साधारण पु ष नह है। म दु:िखत तथा अपंग ।ं अश ।ं इस
अिभयान म म वृ तु हारी अिधक सहायता करने म असमथ ।ं हां, तु ह उस चोर का
पता बता सकता ।ं सुनो, म व णलोक से प रिचत ।ं पहले वह हमारा िनवास था।
बिलब धन और वृ -वध मेरे स मुख ही आ था। देवासुर-यु म हम दोन भाई–म और
जटायु, यु करते ए सूय देव के िनकट प च ं गए थे। तब सूय के आ मण से भाई जटायु
क र ा करते ए मेरे दोन पंख टू ट गए थे। तभी से म अपने पु के आ म म रहता ।ं
अब म तु ह एक घटना सुनाता ।ं
‘‘एक दन म ब त भूखा था। मेरा पु मेरे िलए आखेट ढू ंढ़ने गया था। ात:काल
से सायंकाल तक म बाट देखता रहा, पर तु वह नह लौटा। और जब लौटा तो खाली हाथ।
उसको इस कार देख, म भूख और ोध से ाकु ल हो खाली हाथ लौटने का कारण पूछने
लगा। तब उसने मुझे बताया क म आपके िलए आहार पाने के िवचार से महे पवत के
माग को रोककर बैठ गया था। म समु के जीव को रोकने क चे ा म िसर नीचा कये
बैठा था क मने देखा–एक कृ णवण पु ष एक सु दर बाला को बलात् िलए जा रहा है।
मने उन दोन को आपके आहार के िलए पकड़ लाने का िन य कया। क तु वह कृ णवण
पु ष मेरे माग रोकने पर हाथ जोड़कर कहने लगा–‘गृ पित, म मुिन-कु मार ।ं तुम
कृ पाकर मेरी राह छोड़ दो।’ उसक ाथना पर मने उसे माग दे दया, य क िवनय करने
वाले पु ष को म नह मारता। इसके बाद वह पु ष अपने तेज से आकाश-माग को
कािशत करता आ चला गया। वह चम कार म देखता ही रह गया। वह ी अलंकार-
िवहीना, पीत व धा रणी, अित ाकु ल हो–हा राघव, हा दाशरिथ राम, हा सौिम –
कह-कहकर िबलख रही थी। उसके के श खुले थे और वह भय से पीली पड़ रही थी। फर भी
उसके सौ दय से दशाएं काशमान हो रही थ ।
‘‘पु से यह स देश सुन मने कहा–‘य द वह ी दाशरिथ नाम को पुकार रही थी
तो अव य ही वह हमारे िम दशरथ क कु ल ी होगी, तूने उस हरणकता को पकड़ा य
नह ?’ पु ने कहा–‘ह त, म नृपे दशरथ क मै ी क बात नह जानता था। इसी कारण
उसम मेरी िच नह ई।’ सो अब म भली-भांित समझ गया क तुम उस ी क खोज म
िनकले हो और उस पितत चोर को भी म भली-भांित जानता ।ं उसका पता मुझे
आकाशचा रय और िस से पीछे लगा, िज ह ने उस हरण क ई ी को ले जाते ए
मेरे पु क भांित देखा था।’’
स पाित के ये वचन सुनकर अंगद ने कहा, ‘‘आय, अिधक का योजन नह है।
आप के वल हम उस चोर का पता बता दीिजए। फर हम उससे िनबट लगे।’’
स पाित ने कहा–‘‘सुनो, तु हारा वह चोर और मेरे भाई का ह यारा पु ष िव वा
मुिन का पु पौल य रावण है। वह धनपित कु बेर का भाई और स ीप का वामी है।
उसका बल-वीय अपार है और ैलो य को जय करके वह अब मिहदेव बन गया है। उसने
र -सं कृ ित थािपत क है। वह जैसा महारथी अजेय यो ा है, वैसा ही िव ुत वेद है।
वह धम, नीित, िव ान, कला और अथशा का महा ाता है। यहां से सौ योजन क दूरी
पर समु म एक ीप है, िजसम ि कू ट-िशखर पर वण लंकापुरी बसी है। उस नगरी के
ार, चतु पथ, दीवार, भवन वणमि डत ह, जो सूय के काश म सूय के ही समान
देदी यमान रहते ह। ऐसा तीत होता है जैसे शत-सह सूय वहां उदय हो रहे ह। यह
रा सपुरी लंका दुल य, दुधष, दुग य और दु वेश है। एक लाख रा स यो ा रात- दन
नगर- ार पर पहरा देते ह। उनका बल अमोघ है। तभी तो रावण ने देवराट् इ को ब दी
बनाया था। उसने उससे दा य-कम कराकर मु कया है। अरे , िजन देव को पृ वी का
नृवंश पूजता है, वे उसक ोढ़ी पर दासभाव से रहते ह। उसका भाई कु भकण पवत-शृंग
के समान िवशालकाय, महाभ , महोदर, महा ाण है। उसके स मुख काल भी नह ठहर
सकता है। फर उसका पु इ िजत् मेघनाद है, िजसके स ब ध म सुना है क उसे सब
द माया-शि यां ा ह। यह प रवार भूतभावन भगवान् ारा रि त है। फर
उसक सेवा म अनिगनत रा स भट ह। सो हे वानरो, तुम कै से उस श ु से पार पाओगे?’’
स पाित के ये वचन सुन सब वानर स रह गए। तब अंगद ने धीर वाणी से
कहा–‘‘आय, ऐसे धीर, वीर, तापी, िव ान् मिहदेव और स - ीपािधपित ने कै से यह
िन दनीय चौर कम कया? यह तो बड़े ही आ य क बात है। पर तु जो हो, हम ाण देकर
भी लंका जाएंगे और भु-काय करगे। आप हम वहां जाने का उपाय बताइए।’’
‘‘बताता –ं यान से सुनो! थम आकाश-माग है। आकाश-माग के सात तर ह।
थम तर पर गौरे या, कबूतर आ द अ भ ी प ी उड़ते ह। उसके ऊपर दूसरा तर है,
जहां वृ के फल खानेवाले तोता, कौआ आ द प ी उड़ते है। उससे ऊपर तीसरे तर पर
चील, च, कु रा उड़ते ह। बाज, िग मश: चौथे-पांचव तर तक प च ं ते ह। अ य त
सु दर प ी हंस उनसे भी ऊपर छठे तर पर उड़ता है। पर तु सबसे ऊंची और वेगशाली
जाित ग ड़ क है, जो सातव तर पर आकाशगमन करते ह। मेरा ज म भी ग ड़-कु ल म
आ है और हम मांसभुक् जाित के पु ष ह। हमारी दृि सौ योजन तक जाती है। य द म
आज साधनस प होता तो आकाश-माग से जाकर अनायास ही तु ह लंका का स देश ला
देता। पर तु अब तो यह दु तर है। फर भी रावण से मुझे अपने भाई का बदला लेना है। सो
य द तुमम से कोई वानर भट िवकट साहिसक हो तो म उसे समु -उ लंघन करने क सहज
िविध बता दूगं ा। समु पार होने पर लंका म जा वह सुभट कृ तकृ य हो सकता है।’’
अंगद ने कहा–‘‘आय स पाित, आप हम वह िविध बताइए िजससे यह दुल य
सागर पारकर हम लंका म प च ं सक।’’
स पाित ने कहा–‘‘अ छा, यह रह य, िजसे लंकािधपित रावण भी नह जानता
है, म बताता ।ं देखो–समु -तट से धनु को ट के अ तर पर गृ कू ट िग रशृंखला ि कू ट तक
समु -गभ म जलम चली गई है। थान- थान पर वहां िव ाम करने क सुिवधा है। जो
कोई साहसी वीर सौ योजन समु को इस भांित तैरकर उ लंघन करने क शि रखता हो
उसे इस िग र-शृंखला से ब त सहारा िमलेगा और वह अव य ही अपने िव म से समु के
पार प चं जाएगा।’’
स पाित के ये गूढ़ वचन सुन सब वानर उसे णाम कर समु -तट क ओर सीता
क खोज के िलए उ सािहत हो चल दए।
90. सागर–तरण

गृ राज स पाित ारा सीता का समाचार सुन गजना करते ए स पूण वानर ने
समु -तट पर आ डेरा डाल दया। स मुख आकाश के समान अपार सागर था। समु को
देख वे सोचने लगे–कै से इस अपार सागर को पार कया जाएगा? यह तो अ य त दु कर
काय है। इस दु तर काय के स ब ध म बात करते-करते सभी वानर िवषाद त हो गए।
जब अंगद ने यह देखा तो कहा–‘‘वीरो, िच ता न करो, िवषाद को याग दो। िवषाद म
अनेक दोष ह। अत: वह िवचारशील के िलए या य है। िवषाद से पु षाथ का नाश होता
है। परा म के अवसर पर िवषाद त होने पर परा मी पु ष के तेज का नाश हो जाता है,
िजससे वह पु ष ठीक समय पर पु षाथ से िवहीन हो जाता है। अब कहो, तुमम से कौन
शूर इस सौ योजन िव तार के समु को लांघकर सम त यूथपितय को महान् संकट से मु
कर सकता है? कसक कृ पा से हम सफल-मनोरथ होकर घर लौटने और अपने ी-ब से
िमलने क आशा कर? हमम कौन वीर समु -लंघन म समथ है, जो यह दु कर काय कर हम
अभय दान करे ?’’
युवराज अंगद के वचन सुनकर भी सब यूथपित मौन हो बैठ गए। उनके मुंह से
बोल न िनकला। तब अंगद ने उ ेिजत होकर कहा–‘‘हे वीरो, आप अजेय यो ा ह,
महापरा मी ह, उ म कु ल म आपका ज म आ है, आपका परा म िव ुत है, फर भी
आप मौन ह! यह हमारे ाण का तथा हमारे वामी क ित ा का है, इसिलए हम
इस उ ोग म ाण भी देने पड़ तो हम उनक आ ित दगे। अब तुम कहो– कसम कतनी
शि है? म तो समझता ं क हम सभी समु -लंघन म समथ ह।’’
युवराज अंगद के वचन सुनकर यूथपित वानर अपना-अपना बल िनवेदन करने
लगे। गज ने कहा–‘‘म दस योजन तैर सकता ।ं ’’ गवा ने कहा–‘‘म बीस योजन जा
सकता ।ं ’’ शरभ ने कहा–‘‘म तीस योजन।’’ ॠिष बोला ‘‘म चालीस योजन तैर जा
सकता ।ं ’’ महातेज वी ग धमादन ने पचास योजन जाने क बात कही। तब मयंक ने साठ
योजन क अपनी शि बताई। यूथपित ि िवद ने कहा–‘‘म स र योजन तैर सकता ।ं ’’
फर सुषेण वानरपित ने अ सी योजन क हामी भरी। सबके बाद ॠ राज जा बव त ने
कहा–‘‘म वृ आ। मेरा पु षाथ ीण हो गया है, पर म न बे योजन तक जा सकता ।ं ’’
इस पर महावीयवान् अंगद ने कहा–‘‘म सौ योजन तक जा सकता ,ं पर तु लौटने
म सं द ध ।ं ’’ तब जा बव त ने कहा–‘‘युवराज, तु हारी शि म जानता –ं तुम सौ या,
पांच सौ योजन तैर सकते हो; पर तु तु हारा भेजना हम अभी नह है। तुम हम सबको
आ ा देने वाले, हमारे कटकपित हो। हम सब तु हारे आ ापालक सेवक ह। वामी क
र ा करना सेवक का कम है। तु हारे ऊपर सीता क खोज का दािय व-भार है, अत: तुम
अपनी आ ा से इ ह म से कसी को भेजो।’’ इस पर दु:िखत अंगद ने कहा–‘‘ॠ े , म
नह जाऊंगा तो फर यह काय स प नह होगा। हम सभी को मरण- त धारण करना
होगा। फर आप ही हम राह बताइए। आप हमारे ये और वयोवृ ह।’’ जा बव त ने बड़े
वेग क गजना क । उ ह ने एक ओर मौन बैठे हनुमान को स बोिधत करके कहा–‘‘अरे
मा ित, तुम कै से एक ओर मौन बैठे हो? अरे , तुम सकल शा के वे ा म े , अि तीय
वीर पवनकु मार, इस समय चुप य हो? यह या तु हारे मौन का काल है? अरे मा ित,
पृ वी पर तुम-सा बली कौन है? तु हारी गमन-शि से तो ग ड़ भी पधा करते ह।
तु हारा तेज और अ ितम ताप, मेधा-शि और धैय अप रसीम है। तु हारे रहते वानर-
समाज भला शोक-सागर म कै से डू बा रह सकता है! अरे वीर, तुम या अपने बल-िव म
को िब कु ल ही भूल बैठे? तु हारे अप रसीम पु षाथ को या हम बखानना पड़ेगा? तु हारे
रहते या मुझ वृ को दु:साहस करना पडे़गा? हे वायुकुमार, अपने बल को जा त करो।
तु हारा तेज और पु षाथ अ ितम है। जब म युवा था, मने इ स बार पृ वी क प र मा
क थी। बिल-य मने देखा था, समु -म थन भी देखा। अब म वृ हो गया ।ं वह बल,
परा म और साहस मुझम नह रह गया है। इस समय इन सब वानर यूथपितय म एक
तु ह इस मह व के काय के िलए समथ हो। फर य िवल ब कर रहे हो! उठो, हम सबका
उपकार करो। अपना परा म ध य करो।’’
हनुमान् ने जा बव त ॠ राज के ये वचन सुन बार-बार क ं ृ ित क । व उतार
डाले, लंगोट कसा, सवा ग म िस दूर का लेप कया और वे बार बार अपना व देह
कु भक ारा फु लाते ए सागर-अित मण को स हो गए।
हनुमान को इस कार उ त देख सब वानर हष म हो नाचने और िच ला-
िच लाकर हनुमान् मा ित का जय-जयकार करने लगे। वे परा मी हनुमान् क बारं बार
शंसा करने और गजना करने लगे। अब सब वयोवृ वानर ारा पूिजत हो अिमततेज
हनुमान् ने सब वानर को णाम कया और कहा–‘‘म िबना िव ाम कए ही इस सौ
योजन के सागर को तैरकर पार क ं गा। यह व णालय मेरी जांघ और पंडिलय के
आघात से पीिड़त हो अपनी मयादा को याग देगा। समु के इस कार मेरे थपेड़ से ु ध
होने पर उसम िनवास करने वाले बड़े-बड़े ाह अ दर से उसके ऊपर िनकल आएंग।े म
अ य त वेगवान् वैनतेय ग ड़ क गित क भी परवाह नह करता। म समु का लंघन कर,
दूसरी ओर भूिम पर उतरे िबना ही फर लौट आने म पूण समथ ।ं मुझे नभचर-जलचर
कसी का भय नह । इस समय म उ सािहत ,ं मुझे ऐसा तीत होता है क म दस हजार
योजन जा सकता ।ं म चा ं तो समु को सोख लूं। खूंदकर पृ वी को चूण कर दू।ं जब म
जल म छलांग भ ं गा और आकाश म भी, उस समय नाना लता-वृ -पु प मेरे साथ उड़
जाएंगे। म आकाश म छाया क भांित चलूंगा। अब पृ वी पर कोई स व मुझे रोक नह
सकता। म िन य ही भगवती सीता क खोज लगाऊंगा। अब आप सब िनि त रह। हष
मनाएं। मुझसे बना तो म समूची लंका ही को िव वंस करके लौटूंगा। आज म उस िव वा
मुिन के पु स ीपपित रावण और उसके इ िजत् पु को देखूंगा। य द वह स य ही
सीता भगवती का चोर है तो िन य जानो क अब उसके जीवन क इित हो चुक ।’’
इतना कह हनुमान् मा ित ने बारं बार व -गजना क । यह देख सभी वानर गजना
करने लगे। उनक सि मिलत गजना से वातावरण विनत हो उठा। अब जा बव त ॠ े
ने स मन कहा–‘‘वीरवर, हम सब तु हारी मंगल कामना करते ह। तु हारे लौटने तक
हम तु हारे िलए मंगल-अनु ान करगे। वीरवर, तुम गु जन और वृ जन के आशीवाद से
इस समु के पार जाओगे तथा काय िस करोगे, ऐसा हमारा िव ास है। तु हारा यह
दु:सह काय पृ वी म जब तक नृवंश है, अ ितम रहेगा। संसार का कोई ाणी कभी भी
तु हारे इस परा म क मता न कर सके गा। अब तुम इस महे पवत के िशखर पर चढ़
जाओ और वह से छलांग मारो।’’
यह सुनकर धीरगित से हनुमान् पवत-शृंग पर चढ़ गए। ग धव, य , र , वानर
सभी हतचेत-से खड़े हो मा ित के इस असह िव म को देखने लगे। संह के समान अिमत-
िव म मा ित िग रशृंग पर चढ़ कु भक-रे चक ारा शरीर को पवनपू रत करने लगे। पवन
के भर जाने से उनका व देह अ त और िवशाल हो गया। पवत-गुहा म रहनेवाले
तप वी और क र भयभीत तथा आ याि वत हो अपनी ि य -सिहत इधर-उधर दौड़ने
लगे। वायुपु हनुमान् ने अपना शरीर िहला, व गजना क , अपनी बिल भुजा को
पवत पर जमाया, फर पीठ क ओर ख चकर अपनी गदन और भुजा को िसकोड़ िलया।
तब उ ह ने ने उठाकर िव तीण समु पर दृि डाली। ाण को दय म रोका और
एकबारगी ही भयानक छलांग मारी।
हनुमान् के शरीर के साथ ही पवत-शृंग पर ि थत लता-गु म-वृ सभी फल-फू ल
टहिनयां समेत समु म जा िगरे । समु -गभ से ऊपर आकर उ ह ने एक बार पीछे फरकर
वानर के यूथ को देखा, फर डु बक ली। इस कार डु बक लेते-िनकलते वे समु म आगे
बढ़ने लगे। कभी वे छलांग भरते, कभी समु -तल म घुस जाते, कभी कसी बहती ई
का प का या त ख ड का आ य लेते, कभी दोन हाथ आकाश म उठाकर के वल लात से
जल को आंदोिलत करते। उनक आकाश म फै ली ई भुजाएं ऐसी तीत होती थ , जैसे
पवत से पांच फनवाले दो सप िनकल आए ह । उनक गोल पीले रं ग क बड़ी-बड़ी आंख
सूय और च मा के समान तीत होती थ । जब मा ित जल पर लात का आघात करते
तब उनक बगल से िनकलती ई हवा बादल के समान गजती थी। जहां-जहां वे आगे बढ़
रहे थे वहां-वहां समु उठती ई तरं ग तथा फे न से भर गया। वे अपने व - थल से समु
क दुगम तरं ग को तोड़ते-फोड़ते वेग से आगे बढ़ रहे थे। उनके वेग और मेघ से उ प ई
हवा ने समु को भी डांवाडोल कर दया, िजससे कछु ए, मगरम छ आ दजलचर जीव
ाकु ल होकर इधर-उधर भागने लगे। वे एक-एक छलांग म एक योजन पार कर रहे थे।
उस जगह का समु परनाले के समान िछछला था। जलगभ म िछपी ई च ान पर ण
भर चरण रख िव ाम लेत,े फर आगे कू द जाते। चार ओर अगम जल, चार ओर उ म
लहर, चार ओर िवषम संकट, पर तु मा ित बढ़े चले जा रहे थे। जब वे वायु म छलांग
भरते तो ग ड़ तीत होते थे। उनके वेग के साथ काले-पीले मेघ भी उड़ रहे थे। हनुमान्
कभी मेघ म िछप जाते, कभी कट हो जाते।
बीच सागर म मैनाक पवत क कु छ चो टयां जल-तल को पश करती देख हनुमान्
ने ण-भर वहां िव ाम कया और फर यह कहकर क ‘रामकाज कए िबना मोिह कहां
िव ाम,’ वे आगे बढ़े। पर तु इसी ण बीच सागर म एक िवकराल जीव मुंह फाड़ उ ह
सने को लपका। उसका पवत के समान िवशाल वदन था। महासप के समान आकृ ित थी।
उसक कांटेदार महापु छ थी। उसका िवकराल मुख भी एक गुहा के समान था। हनुमान्
जब तक संभल, तब तक उस िवकाराल ज तु ने उ ह समूचा ही िनगल िलया। हनुमान
िन पाय उस महाज तु के उदर म प चं तथा दप से उसका पेट फाड़कर बाहर िनकल आए।
फर उ ह ने एक कलकारी भर आकाश म छलांग भरी और दस योजन सागर पार कर
िलया।
इस कार धैय, सूझ, साहस और कौशल से सब िव -बाधा को पार कर
हनुमान् उस ओर समु -तट पर ीप के कनारे जा प चं े। वहां तट पर उगे ए सु दर वृ
तथा समु म िगरनेवाली न दय के मुहान से उसक शोभा अपूव हो रही थी। उ ह ने एक
सुरि त पवत-शृंग पर चढ़, फल-मूल खा िव ाम कया।
91. लंका म अ वेषण

दूर तक फै ली ई सुनील जलरािश और सामने वणवण रजकण, ठौर-ठौर पर


ताल, तमाल, हंताल क सघन-िवरस म ु , िजनपर कू िजत िवहंगवृ द–यह सब देख मा ित
का सब म दूर हो गया। उनका िच स हो गया। बड़ा दु तर काय आ, पर तु अब
पद-पद पर साहस, सावधानी और परा म का अवसर था। हनुमान् वण-रजकण पर धीर
चरण रखते, अपने चार ओर सावधानी से देखते, व मुि म अपनी लौह गदा थामे आगे
बढ़ ि कू ट-िशखर पर चढ़ गए। वहां सघन वृ क झुरमुट म बैठ, पु पभारनिमत वृ क
आड़ म िछप उस अ भुत वण-लंका को िनहारने लगे। उ ह ने देखा, उस लंकापुरी के बाहर
अनेक बाग-बगीचे, वापी-तड़ाग ह, जहां सब ॠतु के फल-फू ल अिमत िव तार म लदे ह।
जहां प ी फु दक-फु दककर व छ द िवहरण कर रहे ह। तालाब म बड़े-बड़े शतदल कमल
िखले ए ह, जहां हंस और च वाक मधुर गुंजन कर रहे ह। रा स छोटे-छोटे जलाशय
और उपवन म ड़ा-िवनोद कर रहे ह। उस लंका के चार ओर अलं य खाई को भी
मा ित ने देखा, जो समु क भांित अगम थी। उ ह ने यह भी देखा क लंका क र ा-
चौक और पहरे का ब त अ छा ब दोब त है। नगर के ार पर, गवा पर, परकोट पर,
बु जय पर, असं य धनुधर रा स भट मु तैदी से पहरा दे रहे ह। कह जरा भी सि ध नह
है।
वे धीरे -धीरे पवत-शृंग से उतर नगर के िनकट प च ं े। तब उ ह ने धवल सौध-
पंि य को भली-भांित देखा, िजनके िशखर वणमि डत थे और िजनक शोभा शरद क
भांित शु -मनोरम थी। नगर म सब ओर ऊंची सतह पर बनी सफे द सड़क थ ।
अ ािलका पर िविवध रं ग क वजा-पताकाएं वायु म फहरा रही थ । घर के ार पर
कलापूण िच कारी क गई थी। उस रा सपुरी को देख महाबली मा ित आ यच कत रह
गए। उ ह ने मन-ही-मन कहा, अहो, इस रा स रावण का तो बड़ा भारी ताप है। यह
लंकापुरी तो इ क अमरावती से पधा लेती-सी दीख रही है। वे अ य त छ भाव से
चलकर पवत-शृंग के समान दुरारोह और गगन पश उ र नगर- ार पर आए। इस समय
उ ह ने एक िनरीह मुिनकु मार का वेश बना िलया और वे नगर म चुपचाप इधर-उधर
िवचरने लगे। वहां क र ा-प ित और अजेय ि थित को देख मा ित मन ही मन कहने
लगे–‘‘यह तो सवथा अजेय नगरी है। वानर और ी राम भला कै से इस सुदढ़ृ पुरी को जीत
सकते ह! यहां इन दुभट रा स से लड़कर जय पाना तो स भव ही नह तीत हो रहा है।
यु के अित र यहां तो साम-दाम से भी काय बनता नह दीख रहा है। इस लंका म
अंगद, नील, सु ीव और म के वल चार ही ऐसे वानर भट ह जो वेश कर सकते ह; सो भी
छ -वेश म। पर तु अभी तो मुझे अपना काम साधना है। सो मेरा काम रात म ही हो
सकता है। अब मुझे ऐसा कौशल करना होगा क म भगवती सीता को देख सकूं , पर कोई
मुझे देख-पहचान न सके । मुझ दूत को सकु शल यहां से संदश
े लेकर वापस लौटना भी तो है।
इसिलए युि संगत बात यह है क मुझे संघष तथा शि य से बचना ही चािहए। मुझे ी
राम के दूत व का िनवाह करना है। अिववेक दूत ारा देश-काल के ितकू ल वहार करने
से ब धा बने काम िबगड़ जाते ह।’
इन सब बात को िवचार मा ित दन िछपने तक कसी एका त थान म िछपकर
बैठ गए। जब राि का अ धकार चार ओर ा हो गया तो घर क छाया म अपने को
िछपाते, पद-श द को बचाते, रा स क दृि को चुराते, वे एक घर से दूसरे म और दूसरे
से तीसरे म जाने लगे। उ ह ने अनेक अ ािलकाएं और त भ म सुशोिभत अिल द देखे।
अनेक सतमहले सु दर िवशाल महल देखे, िजनके फश फ टक-िशला के समान थे, जहां
वण के समान भवन और बैठक बनी ई थ , िजनम सोने के गवा और कपाट थे। पर तु
कह भी उ ह सीता क झलक न दीख पड़ी। इससे वे उदास होने लगे। नगर के सभी महल
मायाकार बने थे; नगर म व थ समु ी वायु चल रही थी। ब त-सी अ ािलका म से
घं टय क रणन- विन आ रही थी। वह नगरी र ज टत व से सुशोिभत रमणी-सी दीख
रही थी। उसम बने ेत भवन उसके कणाभूषण के समान लग रहे थे। चारदीवारी पर बने
श ागार उसके तन-से तीत होते थे। देदी यमान दीपाविलय से अ धकार का नाश हो
जाने से नगरी जगमग कर रही थी। अभी हनुमान् मा ित यह सब देख ही रहे थे क
ारपािलनी रा सी लंका ने उनके स मुख आ और ख ग उनके कं ठ पर रखकर कहा–‘‘अरे
दुरा मा, तू कौन है जो चोर क भांित र े -रि त लंकापुरी म छ भाव से िवचर रहा
है? मरने से पूव अपना प रचय दे और यह बता क तूने यहां आने का साहस कै से कया?’’
उस रा सी क यह भयानक बात सुनकर मा ित ने धीर वर म कहा–‘‘महाभागे,
इस भयानक और ीजन-अशोिभत वेश म तू कौन है और कसिलए मुिनकु मार से ऐसे
अभ वचन कह रही है?’’
लंका ने कहा–‘‘म लंका नामक रा सी लंका क नगर-रि का ।ं लंका पर रात म
मेरी ही चौक रहती है। कोई देव, दै य मेरी दृि बचाकर लंका म िव नह हो सकता।
जो ऐसा करता है, उसक मृ यु िनि त है। सो तू भी अब अपने को मृ यु-मुख म ही
समझ।’’
यह सुन मा ित ने कोमल क ठ से कहा–‘‘महाभागे, म मुिनकु मार तेरी सुशोिभता
नगरी लंका को देखकर स होने आया ।ं बस, देख-भालकर लौट जाऊंगा। अब तू मुझ
पर स हो।’’ इस पर वह रा सी एकदम ु हो उठी और उसने मा ित क नाक पर
एक घूंसा मारा।
मु ा खाते ही मा ित ने भी उसके मुंह पर एक चपेटा मारा। चपेटा खाकर वह
घूमकर भूिम पर िगर गई। तब मा ित ने उसके कं ठ पर चरण रखकर कहा–‘‘अब तू मर !’’
इस पर करब ाथना कर वह रा सी बोली–‘‘हे मुिनकु मार, मेरे ाण क तू
र ा कर। मेरे ाण हरण मत कर, म तेरी शरणागत ं !’’
हनुमान् यह सुन उसका कं ठ छोड़ तुर त ही अ तधान हो गए तथा इधर-उधर
भवन म पैठ-पैठकर उ ह देखने लगे। उ ह ने देखा क कही कलक ठी रमिणय के गाने क
आवाज आ रही है, कह रा स वेदम -पाठ कर रहे ह, कही सैिनक अपने श संवार रहे
ह। अनेक रा स सु द रय के बीच रमण कर रहे थे। अनेक सु द रयां अपने पितय के साथ
रमण कर रही थ । ब त-से थान पर रा स म पी–पीकर लाप कर रहे थे। वे एक–
दूसरे पर आ ेप कर उ म क भांित आपस म झगड़ रहे थे। ब त-से रा स म िपए
अपनी ि य के अंकपाश म मद-मू छत पड़े थे। अनेक थान पर रा स अपने िम से
मधुरालाप तथा हास-िवलास कर पान-गो ी का आन द ले रहे थे। अनेक रा स सु दर थे–
अनेक कद् प; ब त के नाम कणसुखद थे, ब त के कु ि सत। कु छ रा स पिव ाचरणी भी
थे। रा स-ि यां भांित-भांित के सु दर व ाभरण धारण कए कह हास-िवलास कर रही
थ , कह मंगलगान और कह मधुपान कर अ हास कर रही थ । ि यतम और म पान म
उनका परम अनुराग था। उनक अिमत योित थी, असाधारण प था, अ ितम तेज था।
ब त-सी रमिणयां अपने ह य क छत पर अपने ि यतम क गोद म बैठी पान-िवलास
का आन द ले रही थ । इस कार मा ित ने अनिगनत ि य को देखा पर उ ह अयोिनजा
सुकुमारी जनकनि दनी सीता के कह भी दशन नह ए।
तब वे रावण के अ त:पुर क ओर चले। वहां जाकर उ ह ने देखा–वह अ त:पुर
चार ओर गहरी खाई से िघरा आ था। वह िनमल और अलौ कक सु दर भवन धवल
रि म- भा िबखेर रहा था। उसक र ा के िलए सह महाबल सुभट रा स भली-भांित
श सि त िनयत थे। उसक चारदीवारी वणखिचत थी। भूिम मिणमयी थी। च दन
आ द के सुग ध- के जलने से वह महल महक रहा था। मा ित ने युि पूवक उस दुगम
महल म वेश कया। उ ह ने देखा–जैसे गाय के यूथ म वृषभ घूमता है, उसी भांित रावण
रमणीय रमिणय से स प इस अ त:पुर म िवचरण करता है। िजस कार तारागण के
बीच च मा क शोभा होती है, वैसी ही शोभा उस समय रावण क हो रही थी। वह
राजमहल वण ार , चांदी से मढ़े िच तथा अ भुत अ त ार से सुशोिभत था।
र जिड़त रथ, अ , गजवाहन, इधर-उधर घूम रहे थे। ठौर–ठौर पर कोमल िबछौने िबछे
थे। अ तःपुर क िव त रि का राि सयां ख ग, शूल िलए मु तैद पहरा दे रही थ ।
ि यां नाच-रं ग म म त थ । उनके आभूषण क चमक और विन से वहां का वातावरण
मुख रत हो रहा था। मा ित ने र ज टत पय क पर रावण को देखा। कु छ सुदािसयां
मिणपा म भर-भरकर उसे म दे रही थ , कु छ चंवर झल रही थ । कु छ वीणा-मुरज
बजा रही थ , कु छ गान कर रही थ । महल के चार ओर तरह-तरह क पाल कयां,
लतागृह, िच शालाएं, ड़ापवत, िवलास-गृह और दन म िवहार करने के घर भी थे। वह
भवन र ाभरण तथा रावण के तेज से देदी यमान था। वहां पलंग, चौक , उपधान,
उपरि काएं आ द सभी कु छ द थ । चार ओर नूपुर क विन, करधिनय क
खनखनाहट तथा मधुर वा से वह ह य मुख रत हो रहा था। हनुमान् घूम-घूमकर महल,
अ लंद, पा व, उपा त सभी को देखने लगे। वह उ ह ने वह अ भुत पु पक िवमान देखा
जो र खिचत था। िवमान क भूिम मरकतमिण क बनी थी। उसका को ेत वण का
था। उसम र क प ीकारी करके सप, पशु, प ी, फू ल, वृ त आ द ऐसे बनाए गए थे क
िजनसे वा तिवक होने का म होता था। उस िवमान म मूंगे, वैदय ू और चांदी के प ी
बनाए गए थे। सूंड़ वाले हाथी भी िविच थे। उस िवमान म ऐसी कोई रचना न थी, जो
र से रिहत हो। उस वायुवेगी, दुधष, दुलभ िवमान पर आ ढ़ हो च वत , मिहदेव,
स ीपपित सवजयी रावण अबाध आकाश-िवचरण करता था।
िवमान का भली भांित अवलोकन कर मा ित ब त-से क को देखते-भालते एक
िवशाल क म घुस गए, जो रावण का खास गु क था। उसम मिणय क सी ढ़यां और
सोने क जािलयां लगी थ । फश के जोड़ म जो फ टक मिण लगी थी। उसके जोड़ म
हाथीदांत क प ीकारी थी। उसम िवशाल मिण त भ थे तथा छत म हीरे , मोती, मािणक
और मूंगे के जाल क चादर तनी थी। दीवार पर सोने के तार का काम था। क म
वणतार- िथत कोमल िबछौना िबछा था। वहां क रि का सु द रयां म पी-पीकर
आपस म चुहल कर रही थ । उसके कारण वह क शर कालीन शोभा धारण कर रहा था।
अब अधराि तीत हो चली थी। वे अब रावण के शयन-क म जा प च ं ।े उ ह ने देखा
क वहां एक अ भुत पलंग था, िजस पर अनेक वे दयां बनी थ । उस पर अनेक ब मू य
उ म व िबछे थे। उस पर च मा के समान एक छ लगा था। अनेक ि यां खड़ी
पंिखयां ले-ले रावण को हवा कर रही थ । रावण सो रहा था। वहां अनेक कार क
सुगि धत साम ी जल रही थी। शयन-क उनक सुग ध और सौरभ से सुरिभत हो रहा
था। सोता आ रावण जल से भरे ए वष मुख बादल क शोभा धारण कर रहा था। उसके
शरीर पर सुगि धत च दन का लेप चढ़ा था। उसके ने लाल और भुजाएं िवशाल थ , वे
पलंग पर फै ली ई इ वजा-सी लग रही थ । उनम वण के बाजूब ध बंधे थे। वह
काम प रावण उस समय बड़ा ही शोभनीय तीत हो रहा था। उस समय वह पीत
अधोव धारण कए था । उसका वृषभ क ध बड़ा गठीला था। अंगुिलय म र मु काएं
जड़ी थ । वह म के नशे म म त हो रहा था तथा वेग से सांस ले रहा था। उसक सांस के
साथ पान, पूग, के सर, क तूरी क ग ध आ रही थी। उसका सूय के समान देदी यमान
करीट वह एक ओर रखा था। उसके कान म जो हीरे के कु डल थे। उनके कारण उसका
मुख और भी दी हो रहा था। उस समय वह सोता आ रावण ऐसा तीत हो रहा था
जैसे गंगा म गजराज पड़ा सो रहा हो।
वण दीपाधार पर सुगि धत तेल के दीप जल रहे थे। पलंग के िनचले भाग मे
इधर-उधर रावण क िवधुवदनी ि यां सो रही थ , िजनके मिण-मािण य क आभा से
वह क जगमग हो रहा था। उनके कान के कु डल ऐसे चमक रहे थे जैसे आकाशा म
ताराम डल चमकता है। वे ि यां खूब म पी-पीकर, जो जहां थ , वह लीला-िवलास
करती ई सो गई थ । उनके गहने, वा य , वीणा, मुरज, मृदग ं उनके पास ही इधर-
उधर िबखरे पड़े थे। वीणा बजानेवाली वीणा ही को अंग म लपेटे सो गई थ । कोई रमणीय
रमणी वण-कलश के समान अपने ही तन को पकड़े पड़ी थ । ब त ि यां अपनी-अपनी
सहेिलय को आ लंगन कए पड़ी थ । उनक परािश से वह शयनक देदी यमान हो रहा
था। इन ि य म देश-देशा तर से हरण क गई राजक याएं भी थ , िजनक आज रात
रावण के शयन-क म सेवा क बारी थी। ब त-से ऐसे भी मह षय , दै य , ग धव और
नाग क ि यां थ , जो वतः ही कामास हो रावण क ि यां बन गई थ । पर उस क
म ऐसी एक भी ी न थी जो रावण से ेम न करती हो। वे सब पवती, कु लीना रमिणयां
उ म व ाभरण से सि ता थ , जो अपने िवलास और ड़ा से देखने वाल को उ म
कर देती थ ।
इन सब पसी षोडिशय से पृथक् एक अतीव सु दर मिण-खिचत पलंग पर एक
असाधारण सु दरी सो रही थी। यह रमणी अपनी पिन ा तथा गौरवण के कारण सबसे
पृथक् सव प र प रलि त हो रही थी। उस ी का प-लाव य अित मनोहर था। उसक
वेश-भूषा भी उसके अ तःपुर के वािम व क सूचक थी। उसे देख हनुमान् ने सोचा,
कदािचत् यही तो भगवती सीता नह है। पर तु वह ेम-िवयोिगनी िवद ध- दय सीता
यहां रावण के िवलास-गृह म कै से म पान म हो सो सकती है! िन संदह े यह सीता नह
है। मेधावी मा ित ने समझ िलया क यह र राज-मिहषी म दोदरी है। तब भगवती
अयोिनजा सीता कहां ह?
हनुमान् िचि तत होकर अ त:पुर म इधर–उधर िवचरण करने लगे। महालसा,
िन ास ि यां सूदागार म िविवध मांस-पकवान तैयार करने म लग रही थ । कोई गोरी,
कोई सांवले रं ग क थी। वे वण–पा म पृथक् –पृथक् उ म कार के म , भो य, च ,
चू य, पेय पदाथ, शूकर, मिहष, लाव, िति र, ह रण, मनु य का मांस पाक कर–कर रख
रही थ । सह वण-कलश म दरा से भरे वहां धरे थे। वहां क वायु भी मदग धा हो रही
थी। उनम ब तेरी तो काम करती करती वह सोकर झपक ले रही थ ।
इस कार मा ित ने रावण का सारा ही अ तःपुर छान डाला, पर तु कह भी
सीता का पता न लगा। तब हनुमान् िख मन अ तःपुर से बाहर आ दूसरी ओर चले। अब
वे लतागृह , िच गृह , िनशागृह म सीता क खोज करने लगे, पर सीता जब उ ह वहां भी
न िमली तो उ ह स देह आ क कदािचत् सीता जीिवत नह है। रा स ने उसे मारकर खा
डाला है। ये रा स सदैव से आय के वैरी ह। अब सीता का य द पता ही न लगा तो मेरा
लंका आना थ आ। दुल य समु को लांघना ही अकारथ गया। अब लौटकर म अपने
सािथय को या संदश े दूग
ं ा? सु ीव क दी ई अविध भी अब बीत चली है। पर तु मुझे
िनराश न होना चािहए। िनराशा ही असफलता का िच न है। उ साह ही से पु ष को
सफलता िमलती है। इससे मुझे अब अ य भी य से सीता क खोज करनी चािहए। यह
सोच अब वे गु और दुगम थान म सीता को खोजने लगे। तहखाने, भूगभ ह य, म डप,
एका त कु टी आ द म उ ह ने खोज क । वे क- ककर घर के ऊपर-नीचे, भीतर-बाहर
जा-जाकर आहट ले-लेकर सीता को खोजने लगे। उ ह ने तड़ाग, उपवन, वन, वीिथकाएं
भी देख डाल । िव ाधर नाग क ि य म भी देखा–पर सीता कह भी न िमली। तब वे
शोक और िनराशा से िथत हो भूख और थकान से िशिथल एक ठौर पर िगर पड़े।
वे सोचने लगे क सीता शोक म मर गई ह अथवा लाते ए छटपटाकर समु म
िगर गई ह अथवा रावण ु होकर उ ह खा ही गया हो अथवा दु ा रा िसय ारा
रावण क पि य ने ही ई यावश उ ह मरवा डाला हो अथवा कह उ ह िछपाकर तो नह
रखा गया है ! सा वी सीता रावण के वश म तो आ ही नह सकत । वे या तो मार डाली
ग या वयं मर ग । पर तु अब म या क ं ? कससे पूछूं ? कससे स मित लू?ं भला
श ुपुरी म मेरा कौन सहायक है? पर तु य द सीता मुझे न िमली तो म यहां से जीिवत
पीछे नह लौटूंगा । समु म जल-समािध लूंगा या अ -जल ही म तभी हण क ं गा जब
सीता को खोज लूंगा। भले ही मेरे ाण चले जाएं। सीता क खोज कए िबना य द म
लौटूंगा तो मेरी क त का ही नाश हो जाएगा। फर जीवन कस काम आएगा? पर तु अभी
तो म और भी उ ोग क ं गा। यह तक-िवतक कर हनुमान फर साहस करके उठे । वे ोध
म सोचने लगे क सीता न िमली तो म इस महाबली रावण को मारकर ही उसका बदला
लूंगा। पर तु संपाित ने कहा है क सीता लंका म है अव य।
इस कार िवचार करते-करते वे अशोक वा टका के ार पर आ प च ं े तथा
वायुवेग से उसक ाचीर पर चढ़कर भीतर कू द गए। वहां वस त के सघन वृ िवकिसत
और पुि पत हो रहे थे। लता ने आ कानन को आ छा दत कर रखा था। ॠतु-ॠतु के
फल वृ से लदे पड़े थे। उ ह देख तथा उनक मधुर ग ध-सुग ध से उनक भूख जा त हो
गई। वे वा टका म इधर-उधर घूमने लगे। उनक आहट पा वृ पर सोए प ी जाग उठे
और उड़-उड़कर इधर से उधर पंख फड़फड़ाने लगे। उ ह ने देखा–अशोक वा टका म िवकट
रा स का पहरा लगा है। वे इधर-उधर अपने को िछपाते सरोवर -पु क रिणय के तट
का आ य लेते ए आगे बढ़ते चले गए। वहां अशोक वृ पुि पत हो ऐसे शोभायमान हो
रहे थे मानो वे वणमिण से िन मत ह । उनके नीचे सोने क वे दयां बनी थ और वे ठौर-
ठौर पर िनझर जल से संिचत थे।
हनुमान् ने सोचा–स भव है यह सीता को रखा गया हो। ि य-िवयोग म वनवास
म तो उनक िच होना वाभािवक ही है। वे यहां ह गी तो सायंकािलक और
भातकालीन िन यकम के िलए अव य ही यहां पु क रणी पर आती ह गी। यहां रा स
क सतकता से भी मुझे अनुमान होता है क सीता का अव य ही यहां िनवास होगा। इन
सब बात को भली-भांित िवचार, वे एक बड़े वृ पर चढ़कर चार ओर खूब यान से
देखने लगे। तब अचानक ही उनक दृि एक धवल ासाद पर पड़ी जो गोलाकार और
ब त ऊंचा था। उ ह ने देखा–वहां यूटी दल क भांित ब त-सी रा स मू तयां इस िनशांत
काल म भी सजग ह।
वे वृ से उतर वृ क सघन छाया म अपना शरीर िछपाते ए पद-श द को
बचाते उस ह य के िनकट आए। वह ह य ब त ऊंचा था और सह ख भ पर टका था।
उसक सी ढ़यां मूंग क बनी थ और वे दयां च दन क थ । वह व छ ासाद ि ध
च - यो ा का मूत ितिब ब-सा दीख रहा था।
धीरे -धीरे अपने को िछपाते ए हनुमान् फर वृ पर चढ़ वृ -ही-वृ म ह य
के िनकट आ गए। अब उ ह ने देखा–एक मिलनवसना सु दरी, पीत भा, कृ शकाया,
ला तवदना उपवास-शोक- था िथता द ांगना-सी प भा बाला ह य से बाहर
एक अशोक वृ के नीचे अधोमुखी बैठी ल बी-ल बी सांस ख च रही है। उसके अंग पर एक
ही पीला व है। िनरलंकारा होने पर भी वह मिलनव ा राख म ढके अंगार क भांित
तीत हो रही है। उनका मुख वष मुख बादल के समान ग भीर तथा आंख भाद के मेघ
के समान झर-झर वषा करती ई ह। वह शोक और िच ता से कातर ह। उनके िसर पर
काले नाग के समान ही वेणी है जो कमर तक लटक रही है। उसको चार ओर से घेरकर
सजग श ाधा रणी रा िसयां बैठी ह, जो बड़ी, िवकरालवदना ह। उनसे िघरी ई वह
मृगनयनी बाला कु से िघरी ई असहाय मृगी-सी तीत हो रही थी। इस शोक-मू त को
देखते ही मा ित ने समझ िलया–अयोिनजा, अमोघ-शु का, जनक-तनया, राम-वधू
भगवती सीता यही है। ीराम ने जैसा प सीता का वणन कया है, वैसा ही इसका प
है। वैसा ही कोमलका त मुख है। इसक दीि से इस दशा म भी दश दशाएं दी हो रही
ह। इ मिण क ठ म पहनने से इसका क ठ नीलवण दीख रहा है, ह ठ अब भी िब बाफल
के समान लाल ह। इसका क टभाग और चरण मनोरम ह। कमल के समान ने म शील,
संकोच और वेदना प रलि त है। यह तो पूण च के समान संसार को ही ि यदशना
तीत होगी। यह संयमशीला तपि वनी के समान खुली भूिम पर बैठी है। शोकातुर होने के
कारण इसक शोभा न हो गई है। मा ित ने बारीक से सीता के व ाभरण और आकृ ित
का िनरी ण कर तथा ीराम के वणन से उसे िमलाकर देख िलया और तब उ ह ने िनणय
कया क यही वा तव म ीराम क ि य प ी जनकजा सीता ह।
92. सीता–सा मु य

इसी समय च ोदय आ। अब च यो ा के आलोक म हनुमान् ने


शोकािभभूता सीता को भारी बोझ से जल म झुक ई नौका के समान देखा। उसे घेरकर
जो रा िसयां बैठी थ , वे बड़ी िवकट, िनदय और भयानक थ । उनम कोई म दरा-पान कर
म हो बक रही थी, कोई ोध म जोर-जोर से िच ला रही थी। वे सब सीता से दूर-दूर,
उस वृ को घेरकर बड़ी सावधानी से सीता क चौकसी कर रही थ । सीता का पाित त
लंका म ब त यात हो चुका था, अतः अनेक रा िसयां इसी पर सीता क िख ली उड़ा
रही थ । कु छ उसक शंसा कर और मद पीकर अपने होठ चाट रही थ ।
हनुमान् बड़ी सावधानी से अब उन दुरा मा रा िसय क दृि बचाकर उसी वृ
पर िछपकर बैठ गए। धीरे -धीरे राि तीत होने लगी। वेद ाता याि क रा स क वेद-
विन सुनाई देने लगी। सुदरू राजमहालय से मंगल-वा का घोष सुन पड़ने लगा। ाची
म अ णोदय आ। र पित रावण िनयिमत िविध से िनवृ हो सीता को देखने अशोक-वन
म आया। वह भातकालीन आभरण देह पर धारण कर रहा था। उ वल ेत कौशेय म
उसका व -गात अ य त शोभायमान तीत हो रहा था। र े वण पालक म बैठा था,
िजसे ब ीस त िणयां क धे पर उठा रही थ । पालक के आगे-पीछे इधर-उधर सौ द
सु द रयां रावण के ग ध, ता बूल, छ , चमर और सुख-साधन िलए चल रही थ । कोई
ताड़पंखे से हवा करती चल रही थी। कोई आगे-आगे सोने क झारी म शीतल जल िलए
चल रही थी। ब त-सी ि यां आगे-आगे मुरज-तुरही और शंख- विन करती चल रही थ ।
उन सब त णी पसी बाला से िघरा आ रावण न के बीच च मा-सा तीत हो
रहा था। रावण क अवाई जान सब रि काएं सावधान हो ग । वन हरी भी सजग हो
गए और हनुमान भी भली-भांित अपने को वृ के प म िछपाकर बैठ गए। उ ह ने
भली-भांित िव जयी स ीपािधपित रावण को देखा। उस भोर के काश म भी रावण
र े के साथ अनेक दीिपकाएं थ , िजनसे उसका मु य देदी यमान हो रहा था।
सीता ने जब र पित रावण को अपने िनकट आते देखा तो वे के ले के प े के समान
भय से कांपने लग । उ ह ने अपने अंग अपने ही म िसकोड़ िलए। जांघ से पेट और भुजा
से तन को िछपा िलया। वे अ ुपू रत ने से अधोमुखी हो जड़वत् बैठी रह ।
रावण ने धीरे -धीरे उस शोकाकु ला मिलनवेशा सीता के पास आकर उसे देखा; वह
े कु ल म उ प होने पर भी मिलनवेशा होने से हीनकु लो प -सी लग रही थी। वह
न ाय यश, िनरादृता ा, टू टी ई आशा, ितर कृ त अ धकारा छ भा, िविधरिहत
पूजा अथवा जलरिहत नदी-सी हो रही थी। उपवास, शोक और भय से वह अितकृ श हो गई
थी। आहार उसका ब त कम था। तप ही उसका जीवन था। ऐसी वह पित ाणा सीता उस
र पुरी म एक िनराली ही उपमा धारण कर रही थी।
र पित रावण दया हो सीता के पास जाकर कहने लगा–“भ े सीते! मुझे देख
तूने अपने अंग समेट िलए। तू कसिलए अपने को न करना चाहती है? अरी सु दरी, तुझ
श -ु ी को म ेम करता ,ं तो तू भी मेरा आदर कर, भय याग। अरी पसी, श ु क
ि य को हरणकर उ ह भोगना हम रा स क प रपाटी है, पर मने तेरी इ छा के
िवपरीत तुझे छु आ भी नह है। इसिलए तू मुझ पर िव ास कर, भय याग। इस क ठन त
को छोड़ और उस िभखारी राम को भूल जा। तू सब ि य म िशरोमिण है, सो लंका म मेरे
मिणमहल म सब रािनय क िशरोमिण होकर रह। तेरी यह दुदशा देखी नह जाती। तेरा
यौवन अकारथ जा रहा है। मेरे ने तेरे िजस अंग पर पड़ जाते ह, वह अटक जाते ह। अब
तू यहां से छु टकारे क आशा छोड़। राम का भी मोह छोड़ और इस र पुरी के सब भोग
भोगकर मेरे साथ रमण कर। तू कहे तो मेरे अिधकार से परे इस पृ वी पर िजतने नगर-
लोक ह, वे सब जीतकर म तेरे िपता जनक को दे दूग ं ा। मेरे मिणह य म िजतने र - वण
ह, तू उन सबको जैसे चाहे लुटा दे। संसार म मुझे जीतने वाला अब कोई यो ा नह
है। देव, ग धव, नाग, य , मानव, दानव, दै य सभी तो मेरे चरण-सेवक ह। म
स ीपािधपित, सवजयी मिहदेव रावण तेरा दास ।ं तू हंसकर मुझे आ ा दे क तेरा या
ि य क ं । उस साधारण चीर धारण करने वाले राज िन कािसत दुरा मा राम से अब
तेरा या लेना-देना है! जीवन का सार यौवन है, यौवन का सार भोग, भोग का सार वैभव।
सो वे सब तुझे यहां लेाको र ा ह। व छ द द रस का पान कर।मेरे अ तःपुर म
तीन भुवन क ि यां ह। वे सभी तेरी उसी कार सेवा करगी, जैसे अ सराएं ल मी क
करती ह। स पूण लोक का ऐ य भी िमलकर मेरे ऐ य के समान नह है। सो तू अब भी
राम क रट रटे जाती है, जो तप या, बल, परा म, धन, तेज, य कसी म भी मेरी समता
नह कर सकता! सो हे भी , मुझ पर स हो जा और जीवन का भोग भोग, जीवन सफल
कर।’’
तब सीता ने तृण क ओट करके कहा-“ हे रा से , उ कु ल म मेरा ज म आ है
तथा िववाह पिव कु ल म आ है। म लोकिनि दत आचरण नह कर सकती। तू अपनी ही
ि य म मन लगा। तू मेरी याचना के यो य नह है। म पराई ी ,ं सती ,ं पित ता ।ं
तू सव है, ब है, मिहदेव है, धमाधम का ाता है, िव ुत है, सो तुझे उिचत है क तू
वधम म दृि रखकर स न के माग का अनुसरण कर! तू जैसे अपनी ि य क र ा
करता है, उसी भांित पराई ि य क र ा भी कर। या तू इतना भी नह जानता क िजस
पु ष का मन पराई ि य पर चंचल होता है–उस पापा मा का उस ी ारा अपमान ही
होता है। या तेरी लंका म स पु ष का िनवास नह ? या तू ही स पु षा के आचरण का
अनुसरण नह करता? और य द र कु ल का िवनाश ही िनकट आ गया हो, तो संभव है
इसी से तेरी बुि िवपरीत हो गई है। कामी और वे छाचारी राजा के हाथ म पड़कर तो
बड़े-बड़े समृ रा य भी न हो जाते ह। इसिलए य द तू अिववेक करे गा तो जान ले क
धन, धा य, वैभव से भरी-पूरी, तेरी यह वण लंका अव य ही न हो जाएगी। अरे , जैसे
सूय से भा िभ नह , वैसे ही म राम से अिभ ।ं तेरा यह अपार वैभव और अपार
रा य मुझे नह लुभा सकता। तेरी कु शल इसी म है क मुझे रघुपित के पास प च ं ा दे और
इस दु कम क उनसे मा मांग। इससे तेरा क याण होगा। नह तो एक दन तुझे काल के
समान ु उन दोन ाता के कोप का भाजन होना पड़ेगा। शी ही तू इ के व के
समान राघव के काल बाण से इस नगरी के रा स का संहार देखेगा। अरे , उ ह ने जो
जन थान म तेरे चौदह सह रा स का वध कया सो उसका बदला तूने चोर क भांित
िलया? कतनी ल ा क बात है!’’
सीता के ये वचन सुन, रावण के साथ िजतनी ग धव और य -क याएं थ , स
मु ा से जनकनि दनी क ओर देखने लग । कसी ने ने से और कसी ने मुख क
भावभि गमा से सीता को धैय बंधाया।पर तु रावण ोध से अधीर हो गया।उसने कहा-“
मेरे ि य और मधुर वहार का तूने इतना कठोर उ र दया! मने तुझे जो अविध धम-
मयादा से दी है, उसम दो मास और ह। इस अविध म तू य द मेरा ताव वीकार नह
करती है, तो िन य ही मेरे सूदागार के सूद मेरे कलेवे के िलए तेरे ख ड का पाक तैयार
करगे। तू उस रा य- राम क अभी रट लगा रही है, सो तू मूख ी है, जो न देशकाल के
औिच य को समझती है, न िहतािहत को।’’
इस पर धा यमािलनी नामक यि णी ने आगे बढ़कर हंसते ए रावण से कहा–‘‘हे
र े , इस दीना, मिलना, दुरारोिहणी, िव िे षणी ी से आपका या योजन है! जो ी
िजस पु ष से ेम नह रखती, उसक चाह म शरीर भ म हो जाता है। अनुरागवती ी ही
के ेम से रस– ाि होती है, सो स ीपनाथ र े , मुझ ेमभािवता पर अनु ह कर।
अ य से आपका या योजन है!’’
य -क या के ये वचन सुनकर रावण हंसकर उसके क धे पर हाथ रख उठ खड़ा
आ तथा उसी भांित ग धव, नाग, य -सु द रय से िघरा आवास को लौट गया। उसके
लौटने पर रा िसयां सीता को स परामश देने लग ।
एकजटा ने कहा–‘‘बड़े आ य क बात है क तू मूढ़, महा मा रावण क भाया
बनना अंगीकरण नह करती!’’
ह रजटा ने कहा–‘‘सुन, पुल य छ: मुख जापितय म चौथे ह। उनके पु
िव वा मुिन भी जापित तु य ही ह। उनके पु पर तप महा मा रावण र पित
स ीपपित ह जो लोकिव ुत मिहदेव ह। उनक भाया होना तो शत सह ज म के पु य
से ही होता है।’’
िवधृ ा ने कहा–‘‘कै से आ य क बात है क देवराट् इ ने िजसके चरण-चु बन
कए, उसी का यह मानवी ितर कार करती है !’’
िवकटा ने कहा–‘‘अरी, िजसने अनेक बार नाग, दै य, दानव, ग धव सबको
परािजत कया, वही सवजयी, िव पित, महा मा तेरे पास आया और तूने उसका
ितर कार कया! फर भी उसने तेरे ख ड को िनकालने का हम आदेश नह दया !’’
िवशाला ी ने कहा–“ तू हम यह तो बता क िजसक आ ा से आज लोकपित-
द पित भी कांपते ह, तू उसी क प ी बनने का सौभा य छोड़ती है, यह तेरी कै सी मित
है? िजसके भय से सूय तपना छोड़ देता है, िजसक आ ा िबना वायु नह बहता, िजसक

ं ार-मा से वृ फू ल बरसाने लगते ह, पवत से जल चूने लगता है, बादल सूख जाते ह,
तू उसी क प ी बनने के सौभा य से वंिचत रहना चाहती है! अरी, रावण मिहदेव
अ त:पुर क सभी ि य को वग य सुख देता है। उसके अ त:पुर म चुर सुख-साधन ह।
र पित िव क सारी ही स पदा का एक छ वामी है। उसके ऐ य क तुलना पृ वी
पर कौन कर सकता है? उससे पराङ् मुख हो तू उस दीन िभ ुक राम ही के नाम क रट
लगाए है? अरी, वह तो वयं ही दीन-हीन, दु:िखत है। तुझे वह या सुख दे सकता है? तू
अब उसक आशा छोड़ और हमारी सीख सुन! र े क अंकशाियनी हो देवदुलभ भोग
भोग! हम भी तेरी सेवा से स ह गी।”
सीता ने कहा–‘‘अरी रा िसयो, तुम सब धम के िवपरीत बात कहती हो। म तो
अपने पित ही क अनुगािमनी ।ं म रघुवंश क वधू और िवदेह वंश क क या ।ं म अपने
ही म सु ित ।ं सो तुम भले ही मेरा ख ड िनकाल लो, पर तु म िवपथगािमनी नह
हो सकती।”
इस पर विनता नामक रा सी ने कहा–‘‘हे सीते, तूने जो पित- ेम कट कया है,
वह ऐसी ि थित म क द ही है। पर तु तेरा पित-अनुराग शंसनीय है, वह हम
रा िसिनय के िलए नई व तु है। अरी, यहां तो ि य को िवजेता का ही सेवन करना
पड़ता है। पर तु तेरा पित-धम भी अ छा है। पर अब तेरा क याण तो इसी म है क तू
र े को स कर। वह अतुल ऐ यवान महास व है। स होकर वह तेरे पित का भी
कु छ उपकार कर सकता है। तू उसे पित वीकार कर लंका म व छ द िवहार कर ।’’
इस पर च डोदरी ने हंसकर कहा–‘‘अरी, इसे तु हारी सीख नह सुहाती। र े
क आ ा से हम इसका ख ड िनकालकर उसे िनवेदन करना पड़ेगा।’’
‘‘तब म यभाग का कोमल मांस म लूंगी।’’
‘‘और इसका भेजा म खाऊंगी।’’
‘‘अरी, ब त दन बाद हम ऐसा कोमल वा द नर-मांस खाने को िमलेगा। तब
तक लाओ, शोकनािशनी म दरा ले आओ, िजसे व छ द पान कर आज हम पानगो ी
मनाएं। हम राि -जागरण करना पड़ा है।” इतना कह सब रा िसयां गटागट म पीकर,
उ म हो-होकर नाचने और हंसने लग ।
उ ह इस कार उ म और उ ेिजत देखकर उनक यूथ वािमनी ि जटा ने उ ह
घुड़ककर कहा–‘‘अरी दु ाओ, दूर हो तुम। अपना ही मांस खाओगी तुम! यह ी य द
एक ता है, तो इसम बुरा या है? तुम य इसे दु:ख देती हो? दूर हो यहां से !’’ यह सुन
सब रा िसयां बड़बड़ाती ई वहां से चली ग ।
ि जटा क य सहानुभूित पाकर सीता दन करती ई बोली–‘‘हाय, म र पित
के अधम और अनीितमूलक कठोर श द सुनकर भी अभी तक जीिवत !ं स य है, अकाल
मृ यु कभी नह आती। मेरा यह दय भी पवत के समान कठोर है क इस िवपि म फटता
नह है। इस दुरा मा रावण क बि दनी म य द आ मघात भी कर लूं तो या दोष है!
अ तत: ये रा िसयां भी तो मेरा वध करगी। हे माया कोशले, कौन जाने, उस माया-मृग ने
उन दोन भाइय का वध कर डाला हो। हाय, माया-मृग के प म मेरे स मुख वह काल ही
आया था। हा स य त! हा महाबाहो! या आप नह जानते क रा िसय ारा म वध क
जाने वाली ,ं िजसक अविध दो मास रह गई है? पर इस अविध से ही या। हाय, मेरी
अन योपासना, धम, भूिमशयन सभी तो थ आ। मेरे अब तक कए त, तप सब थ
ए। मुझ अभािगनी के जीवन को िध ार है। मुझे आ मघात ही करना उिचत है। पर तु
यहां मुझे श या िवष कौन देगा? अथवा म अनाया ,ं जो पित से पृथक् रहकर अब तक
जी रही ।ं पर तु कामी को न दूसर के दु:ख का िवचार होता है, न अपनी वंश-मयादा का।
पर तु वह चाहे मुझे भाले से छेद दे, ख ग से टु कड़े-टु कड़े कर दे या आग म जला दे, पर म
उस दुरा मा रावण को नह वीकार कर सकती। या रघुकुलमिण वे दोन भाई जीिवत
रहते मुझे भूल जाएंगे, िज ह ने जन थान म चौदह सह रा स का वध कर डाला! लंका
भले ही समु से अलं य हो, कसी अ य का आ मण भले ही अस भव हो, पर ी रघुपित
के बाण यहां के रा स का र अव य पान करगे। म समझती ं क मेरे यहां रहने क
सूचना अभी उ ह िमली ही नह है। हाय, कौन उ ह बताएगा क म इस दुर त रावण क
कै द म ।ं आय जटायु को भी इस दुर त ने मार डाला। अरे रघुपित को बस खबर होने क
देर है, फर तो वे सारे संसार को रा सिवहीन कर डालगे। वे लंका को भ म कर दगे, समु
को सुखा डालगे और इस चोर र पित का कु ल िनवश कर डालगे। आज म दन कर रही
,ं पर तु शी ही लंका के घर-घर म क ण दन उठ खड़ा होगा। इस लंका म र क
धारा बह जाएगी। आज जो लंका उ सव से जगमगा रही है, वही लंका अपने वामी के न
हो जाने पर िवधवा के समान ीहीन हो जाएगी। पर तु हाय, कह मेरे ाणनाथ मुझ
शोकिवद धा के िबछोह म परलोक तो नह िसधार गए?
‘‘हाय, वे महा मा ध य ह, िजनका कसी व तु म मोह नह है। जो ि य-अि य
दोन से परे ह। अब तो म ि यतम से िबछु ड़ ही गई ।ं अब देखना है क इन ाण का या
होगा। अथवा ाण को यागकर सब दु:ख का अ त ही कर दूं !’’
यह िवचार कर सीता ने अपनी वेणी खोल, उसी के ारा फांसी लगाने के िलए
दृि उठाकर उस अशोक-वृ क ओर देखा तो उसे वृ के प म िछपे हनुमान् जी दीख
पड़े। उ ह देख सीता भय और आ य से जड़ हो गई। उसने सोचा, ेत वसन धारण कए,
तपाए वण ने वाला यह तेज वी पु ष कौन यहां िछपा बैठा है?
अशोक वृ पर बैठे ए मा ित ने रावण क बातचीत एवं रा िसय क डांट-
डपट तथा सीता का अनुताप सभी सुना था। अब उ ह इस बात म तिनक भी संदह े न रहा
क यही राम-प ी वैदह े ी सीता है। यह वह सीता है, िजसक तलाश म असं य वानर पृ वी
पर दशा- दशा म घूम रहे ह। आज मने इ ह पा िलया। मने श ु के बल का भी पता लगा
िलया और रा सराज रावण का भाव, वैभव और उसका पुर भी देख िलया। भगवती
सा वी सीता के मन क पिव ता भी देख ली। वे कै सी पित के िलए आतुर-आकु ल हो रही
ह! अब म कै से इनके स मुख अपने को कट क ं , कै से इ ह धैय बंधाऊं, कै से इनके ाण
क र ा हो? इन रा िसय के सामने कै से म सीता से बात क ं ! म य द अपने को कट कर
इ ह ढाढ़स न दूग ं ा तो ये अव य ाण दे दगी। फर म जब वापस ी राम क सेवा म
जाऊंगा तो कस कार सीता का स देश सुनाऊंगा? इन रा िसय का यान दूसरी ओर
लग जाए तो म कु छ क ।ं पर य द म सं कृ त म बातचीत क ं तो वे मुझे रावण का दूत
समझकर डर जाएंगी। अतः मुझे अथयु मानवी भाषा म बात करनी चािहए। कह ऐसा
न हो क ये डरकर िच ला उठ और अ -श धारण करने वाली वे काल िपणी रा िसयां
यहां आ धमक और िच ला-िच लाकर रा स ह रय को सजग कर द तथा वे उि
होकर शूल-बाण लेकर यहां िपल पड़। फर तो बड़ा िव उपि थत हो जाएगा। और य द
म पकड़ा गया तो फर राम का काम करने वाला साधक पृ वी पर दूसरा नह है। म दूत ,ं
मुझे देश-काल का िवचार कर सावधानी से काम करना चािहए। असावधानी से सब काम
िबगड़ जाते ह तथा अपने को ब त बुि मान समझने वाले दूत भी काम को िबगाड़ देते ह।
मेरा सबसे मु य काम यह है क म अपने को यथावत् भगवती सीता पर कट क ं और
उनका िव ासभाजन बनू।ं
हनुमान् मन म यह सोच ही रहे थे क रा िसयां मदो म हो तथा ि जटा क
डांट खाकर दूर चली ग । इसी समय सीता ने भी उ ह देखा। अब उ ह ने सुअवसर पा मृद-ु
म द वर म मानवी भाषा म कहा–“इ वाकु वंश म महातेज वी धम राजा दशरथ ए,
जो भूम डल म स य ित िस ह। उनके पु ी राम पृ वी के सब धनुधा रय म े
ह। वे िपता क आ ा से उनके वचन क र ा के िलए प ी और भाई सिहत वन आए थे।
उ ह ने जन थान म चौदह सह रा स का वध कया। तब खर-दूषण के मर जाने पर
रावण उनसे ष े करके मारीच क सहायता से उनक प ी सीता को हर ले गया। ी राम
ने उस सीता का पता लगाने के िलए हमारे वामी वानर के राजा सु ीव से िम ता कर
ली और उसके भाई बािल को मार उ ह रा य का वामी बनाया। सु ीव ने अपने सह
वानर को सीता क खोज म पृ वी के सब देश म भेजा है। इधर गृ राज आय स पाित के
कहने से मने सौ योजन समु पारकर इस लंका म वेश कया और अब जैसा ी राम ने
वणन कया, उसी के अनु प भगवती सीता को यहां देख रहा ।ं ’’
हनुमान् के अमृत के समान ि य वचन सुन, सीता ने मुख पर के के श हटाकर मुंह
ऊपर कर भली-भांित हनुमान् को देखा। उदयाचल के िनकलते ए सूय के समान उनका
तेज था। ण-भर को वे अवाक् रह गई। उनक आंख से अ ुधारा बह चली। यह देख
हनुमान् उनके और भी िनकट आ गए। तब सीता ने कहा–‘‘जो कु छ मने सुना, यह य द
व नह है, स य है तो म वाणी के वामी बृह पित को, व धारी इ को, वाणी के
अिध ाता अि को नम कार करती ।ं ’’
तब मा ित ने उ ह णाम करके कहा–‘‘देिव, मिलन पीता बर धारण करने वाली
आप कौन ह? आपके ने य शोका ु बहा रहे ह? देव, असुर, नाग, य , र , ग धव,
क र के कस कु ल को आपने अपने ज म से ध य कया है? आप कनक क या अथवा प ी
ह? हे मातः, आप बार बार कस महाभाग का नाम रट रही ह? जैसा आपका अलौ कक
प, तेज है तथा जैसा वेश है उससे तो आप कोई राजक या जान पड़ती ह। दु:ख से आपम
दीनता आ गई है। कह आप ी राम दाशरिथ क प ी सीता तो नह ह?’’
मा ित के ये वचन सुनकर सीता ने कहा–‘‘भ , म भूम डल के राजा म े
दशरथ क पु -वधू तथा िवदेहराज जनक क पु ी ।ं मेरा नाम सीता है। म परम तेज वी
ी रामच क प ी ।ं िववाहोपरा त बारह वष मने रा यसुख भोगा; तेरहवां वष आते
ही स य ित राजा दशरथ ने अपने पु ी रामच का रा यािभषेक करना चाहा, पर तु
उनक रानी कै के यी ने ी राम का वनवास चाहा। स य त राजा वचनब थे। फलत: ी
राम ने िपता का यह आदेश उस रा यािभषेक से भी बढ़कर माना तथा उसे पूणतया
वीकार कर िलया और तुर त राजसी व उतार तथा रा य का िच तन छोड़ मुझे अपनी
माता को स प दया। पर तु म उनके िबना कै से रह सकती थी! इससे म उनसे पूव ही वन
जाने को तैयार हो गई। सौिम ल मण भी कु श-वलकल धारण कर भाई के साथ जाने को
तैयार हो गए। इस कार हम तीन ही महाराज को स मािनत करते ए तथा दृढ़ता से
उ म त-पालन करते ए वन म आ प च ं ।े हम द डकार य म रहते थे, वह से दुरा मा
रावण मुझे हर लाया। अब उसने मेरे जीवन क अविध िनयत कर दी है, िजसम दो मास
शेष रहे ह।’’
जब हनुमान् को भली-भांित िव ास हो गया तो उ ह ने कहा–‘‘देिव, म ी राम
का दूत ं और आपक सेवा म उनका संदश े लेकर आया ।ं ी रामच ल मण सिहत
सकु लश ह और मेरे ारा आपक कु शल पूछी है। वेद और धम राम आपक कु शल
जानना चाहते ह।’’
हनुमान् के ये वचन सुनकर सीता ने ह षत होकर कहा–‘‘हे वीर, मनु य जीिवत है
तो उसे सौ वष बाद भी आन द ा होता है।’’
यह कहकर वे वह भूिम पर बैठ ग । आ मघात का िवचार याग दया। महाबा
हनुमान् ने अब उनके िनकट आ िविधवत् उनके चरण म णाम कया। तब सीता ने कु छ
स देह, कु छ भय से कहा–‘‘तुम य द रावण ही के दूत हो और कपट-वेश धारण कर मुझे
छलने आए हो तो यह अनुिचत है। पर तु य द तुम सचमुच ी राम के दूत हो तो तु हारा
क याण हो! तुम राम का गुणगान करो। स भव है मेरे मनोरथ पूरे होने का समय िनकट आ
गया हो।’’
यह कहकर जनककु मारी सीता गहरे सोच म डू ब ग । कभी वे सोचत , ‘कह यह
मेरा मनोिवकार ही न हो। पर यह तो प बोल रहा है। संभव है क यह रावण ही का चर
हो।’
सीता को इस कार सोच-िवचार करते देख मा ित ने कहा–‘‘देिव, म िन य ही
पृ वी के अि तीय परा मशील स य ती ीराम का दूत ।ं ी राम तो रात- दन आपक
रट लगाए रहते ह। अब आप शोक यािगए। शी ही ी राम अिमततेज सु ीव सिहत
आपको लेने आएंग।े म वानरपित सु ीव का म ी हनुमान् ,ं सौ योजन समु को लांघकर
और दुर त रावण के म तक पर अपना चरण रख आपका दशन करने इस नगरी म आया ।ं
िजसक शंका आपके दय म है, वह म नह ।ं आप शंका और शोक याग दीिजए।’’
तब सीता ने कु छ आशंका, कु छ भय, कु छ हष के भाव से अिभभूत हो कहा–‘‘व स,
तु हारी वाणी तो ि य है, पर तु तुम राघवे राम और ल मण क आकृ ित वणन करो,
िजससे मेरी शंका िमटे। उनके प, अंग- यंग का भी तो कु छ बखान करो, िजससे मुझे
तीित हो।’’
सीता के ये वचन सुनकर मा ित ने कहा–‘‘भगवती, सुिनए! ी राम का मुख
पू णमा के च मा के समान मनोहर है। उनके िवशाल ने प -प के समान ह। वे जैसे
पवान् ह, वैसे उदार भी ह। सूय के समान तेज वी, पृ वी के समान माशील और
बृह पित के समान ितभाशाली ह। उनका यश इ से भी बढ़कर है। धनुवद-सिहत वेद के
ाता ह। उनके क धे मोटे, भुजा िवशाल और क ठ शंख के समान है। गले क ह ी मांस से
ढक है। ने म कु छ-कु छ लािलमा है, दु दुिभ के समान उनका क ठ- वर है। शरीर सु दर
और िचकना है, वे बड़े तापी ह। उनके सभी अंग सुडौल ह, सुदढ़ृ ह। वे याम वण के ह।
उनके नख, तलवे लाल रं ग के ह। वे मधुरभाषी ह। उनके क ठ और उदर म तीन रे खाएं ह।
वे चार हाथ ऊंचे ह। शरीर म दो-दो क सं या म चौदह अंग होते ह, जो सभी पर पर सम
ह। उनक चार दाढ़ शा ीय ल ण से यु ह। वे संह, बाघ, हाथी, सांड़ के समान चार
कार क चाल चलते ह। उनके होठ, ठोड़ी और नािसका सभी श त ह। उनके माता-िपता
दोन ही उ म कु ल के ह। उनके शरीर म नौ शुभ िच न ह। वे धम, अथ और काम का
उिचत रीित से सेवन करने वाले ह। वे सदा ेमपूण वाणी बोलते ह।
“उनके छोटे भाई ल मण भी बड़े तेज वी ह। अनुराग, गुण और प म वे ी राम
जैसे ही ह। उनका रं ग वण के समान आभायु है। ऐसे ही वे राम-ल मण दाशरिथ ह,
िजनसे हमारे वामी सु ीव ने अि क सा ी म िम ता क है। म उ ह दशरथ-कु मार राम
का दूत तथा सु ीव का म ी ।ं वायु-पु हनुमान् ।ं आपके दशन का सव थम फल मुझे
ही ा आ, यह मेरा सौभा य है। अब आप शी ही ल मण सिहत राघवे राम से
िमलगी। आप शंका और शोक को याग दीिजए।”
हनुमान् के वचन सुनकर सीता को ब त सा वना िमली। वे आन द के आंसू बहाने
लग । तब हनुमान् ने ि ध वर म कहा–“ मातः, यह मेरे पास ीराम के नाम क अं कत
मु का है। इसे देिखए, आपक तीित के िलए उ ह ने मुझे दी थी।’’
मु का को देख और पहचानकर सीता आन दिवभोर हो उठ । उ ह ने कहा–‘‘अरे
सौ य, तेरी जय हो, तेरा परा म ा य है, शि अपार है, तू परम मेधावी और चतुर है।
तेरा साहस अ भुत है क रा स से भरी ई इस लंका म अके ला ही घुस आया है। तूने
असीम सागर को पार करके मुझे जीवनदान दया है। हे िनभय, स य ित , तेरी जय हो!
तेरी बात से मुझे ढाढ़स िमला। भला, भाई ल मण-सिहत ी राघवे कु शल से तो ह? अब
वे कब लयाि के समान ोध करके इस पुरी को भ म करगे? कह व स मा ित राघवे
अपने म दु:खी तो नह रहते? वे मुझे भूल तो नह गए? कब तक इस दुदशा से मेरी मुि
होगी? या भरत उनक सहायता के िलए अपनी अ ौिहणी भेजगे? वानरे सु ीव या
अपने बिल वानर सिहत उनक सहायता को आएंग?े अरे म उनके काल प बाण से इस
लंका को रा स सिहत शी न होता देखना चाहती ।ं जब महावीर राघव ने अनायास
ही रा य याग मेरे साथ वनगमन कया था, तब उ ह तिनक भी दु:ख नह आ था। अब
या मेरे न रहने पर भी वे उसी कार धैय धारण कए ए ह? म तो तभी तक जीिवत ,ं
जब तक उनके दशन क आशा है।’’
सीता के ये वचन सुनकर हनुमान ने कहा–‘‘देिव, अब तक उ ह आपका पता ात
नह था। अब वे मुझसे आपके यहां रहने का समाचार पाते ही वानर क सेनासिहत वहां
से कू च कर दगे और अपने बाण से इस अगाध समु को बांध, लंका को रा स-रिहत कर
दगे। ी राम आपके िवयोग म महादु:खी ह। उनका मन आप ही म लगा है। वे रात को भी
‘सीते, सीते,’ कहकर उठ बैठते ह। जब कभी भी वे कोई ऐसी व तु देखते ह, जो आपको
ि य थी, तभी वे आपको पुकारने लगते ह। वे आठ पहर आपको पाने म य शील ह।’’
मा ित के ये वचन सुन सीता ने कहा–‘‘हे पवनपु , भा य ही बल है। अब तुम
जाकर उनसे कहो क वे यहां आने म शी ता कर। मेरे जीिवत रहने क अविध म अब
के वल दो मास ही रह गए ह। यहां एक धमा मा पु ष भी लंका म रहता है। वह रावण का
छोटा भाई िवभीषण है। उसने र े को ब त समझाया क वह मुझे लौटा दे। उसक
क या कल अपनी माता क ेरणा से मेरे पास आ यह सब बात कह गई है। सो तुम
िवभीषण से मै ी साधना। एक और वृ सुशील रा स बुि मान् और िव ान् है। उसका
नाम अिव य है। वह रावण र े का िव त म ी तथा ि यजन है। उसने भी रा े
को समझाया है। सो तुम इन िहतैषी रा स से लाभ उठाना।’’
तब हनुमान् ने कहा–‘‘देिव, ी राम इस समय वण पवत पर िनवास कर रहे
ह। आप कह तो म आपको इसी ण वहां ले चलूं। म आपको ी राम के िनकट उसी भांित
ले जा सकता ,ं जैसे वायु य हिव को ले जाती है। पर तु आपको मेरी पीठ पर दुल य
सागर तैरना होगा। रा स से मुठभेड़ क भी आशंका है। पर तु आप साहस कर, तो मुझे
भय नह है।’’
सीता ने सोच-िवचारकर कहा–‘‘पु , यह संगत न होगा। तुझे मुझे लेकर जाते देख
रा स अव य तेरा पीछा करगे और तुझ िनर को घेर लगे। फर कै से तू यु म मेरी और
अपनी र ा करे गा? यह भी संभव है क यु करने के समय म तेरी पीठ से िगर जाऊं
अथवा आतंक से मू छत हो जाऊं। फर म वे छा से कसी पु ष का पश भी नह कर
सकती ।ं रावण के शरीर का पश तो उसके बला कार ही से आ है। इसिलए सौ य, तू
जाकर उन देव-दै यजयी परा मी राघवे को सेना-सिहत यहां ले आ। म तेरी िचरकृ त
र गं ी।’’
इस पर हनुमान् ने कहा–‘‘आपक बात युि संगत है, ी- वभाव और धम के के
भी अनुकूल है। य द म पीठ पर आपको ले भी चलूं तो यह भी संभव है क सौ योजन समु
लांघ ही न सकूं । फर आप तो पीठ पर सौ योजन समु के पार नह जा सकत । परपु ष-
पश क बात भी धमस मत है। आपक शोचनीय दशा देखकर म ाकु ल हो गया था,
इसी से मने यह िनवेदन कया था। अब आप अपना कोई िच न मुझे दीिजए, िजसे देखकर
ी राम यह समझ ल क मुझे आपके दशन हो गए।’’
हनुमान के ये सारग भत वचन सुन सीता हष-गद्गद होकर कहने लग –‘‘हे वीर,
म तुझे एक गु बात बताती ,ं उसे सुनकर ही राघवे को तीत हो जाएगा। सुन,
िच कू ट के उ र-पूव वाले भाग म जो म दा कनी नदी बहती है, वहां तपि वय के आ म
के िनकट जब म िनवास करती थी, तब एक कौवे ने मुझे च च मार दी थी, िजससे िख
होकर म रोने लगी। इस पर ु होकर उ ह ने कु श से उस कौए क दािहनी आंख न कर
दी थी। बस तुम यही वृ ा त उ ह सुना देना और मेरी बात उनसे इस कार कहना क वे
शी ही मेरे क को दूर करने के िलए य शील हो जाएं।’’ इसके बाद उ ह ने कपड़े म
बंधी चूड़ामिण खोलकर हनुमान को देते ए कहा–‘‘इसे राघवे भली-भांित पहचानते ह।
इसे देखकर उ ह तीन ि य क सुिध आएगी–माता, िपता और मेरी।’’
तब अ छी तरह सीता को आ ासन दे मा ित ने उस चूड़ामिण को अपनी उं गली
म धारणकर तथा सीता क दि णा कर उ ह णाम कर उ र दशा म थान कया।
93. परा म का संतुलन

बल परा मी मा ित ने भगवती सीता को देख िलया, उ ह आ ासन भी दे


दया, उनका संदश े और िच न भी ा कर िलया। पर तु अभी उनका काय पूरा नह
आ। उ ह ने िवचार कया क अब मुझे अपने बल से श ु के परा म का संतुलन भी करना
चािहए। पर तु यह कै से हो? इस समय उनके ाण का मू य ब त था। उ ह संदश े ीराम
को देना था। पर तु जब उ ह ने जान िलया क यु अिनवाय है तो उ ह ने यह भी िनणय
कर िलया क श ु के परा म का संतुलन भी कर लेना परम आव यक है।
मा ित का साहस असीम था। उसी के अनुसार आगा-पीछा िवचार अब वे कट
प से अशोक वन म िवचरण करने लगे। इतना ही नह , वे फू ल को तोड़कर फकने,
या रय को िबगाड़ने, फल को खाने और सरोवर को दूिषत करने लगे। यह देख अशोक
वन क रि का रा िसय ने उ ह घेर िलया। उ ह ने उसे सीता से बात करते देखा था, पर
बातचीत मानवी भाषा म ई थी, इससे वे कु छ समझ नह । अब उ ह ने उसे घेरकर
कहा–‘‘तू कौन है और कै से इस रि त-िनिष अशोक वन म घुस आया है?’’
क तु हनुमान् ने उनक बात पर कान नह दया। उ ह ने उनम से ब त से
ठठोली क , ब त को डरा दया, ब त को िखझा दया। इस पर वे श लेकर मा ित
पर आघात करने दौड़ । तब मा ित ने उनके श छीन उ ह तािड़त कर दया। वे चीखने-
िच लाने लग । इस पर वन के र क कं कर-रा स श लेकर उन पर टू ट पड़े। पर तु
उ ह ने उन सबको भी मार भगाया। अब वे अशोक वन को तेजी से न - करने और
मि दर को तोड़ने-फोड़ने लगे। उ ह ने अशोक वन का तोरण तोड़ डाला और वह रखे
प रघ को हाथ म ले वहां के सब र क रा स को मार डाला। अब वे प रघ को हवा म
घुमा-घुमाकर जोर-जोर से गजना करने लगे।
अशोक वन के इस उ पात का समाचार शी ही लंका म फै ल गया। चार ओर से
लंका-िनवासी रा स उसे देखने अशोक वन म आ जुटे। हनुमान् ने रावण के कु लदेवता का
मं दर भी तोड़ डाला तथा वहां आग लगा दी। यह सूचना पा अशोक वन के र क का
अिधपित ह त-पु जा बमाली वयं धनुष-बाण ले, र व पहन, रथा ढ़ हो, अशोक
वन म आया। उसने देखा, एक वानर कु लदेवता के भ िशखर पर प रघ हाथ म िलए
िनभय खड़ा है। उसने हनुमान् को बाण से छा दया। पर तु उ ह ने उसक सारी ही
चे ा को िवफल कर दया। हनुमान् संह ार के कं गूरे पर चढ़ गए। उ ह देखते ही रा स
क सै य ने संह ार को चार ओर से घेर िलया। जा बमाली ने नाराच बाण क मार से
मा ित को िवकल कर दया। तब हनुमान् ने संह-िव म से छलांग मारकर जा बमाली क
छाती म वही प रघ वेग से घुमाकर दे मारा, िजससे जा बमाली खून वमन करता आ
भूिम पर िगर गया। महाबली जा बमाली को इस कार िगरता देख रा स िच लाते ए
इधर-उधर भागने लगे। तब हनुमान् ने जा बमाली को पृ वी पर पटककर मार डाला एवं
उसका रथ तोड़ घोड़ को िवकला ग कर दया।
यह सूचना युवराज मेघनाद को दी गई तो उसने िव पा , दुधष, यस और
भासकण महारिथय तथा सात म ीपु के साथ सै य-सिहत राजपु अ यकु मार को
अशोक वन भेजा। हनुमान् बड़े कौशल से इस िवकट कटक के साथ यु करने लगे। कभी वे
िछप जाते, कभी दूर कट होते, कभी गजना करके हार करते, कभी अ तधान होकर
िवपरीत दशा म जा िनकलते, कभी कसी वृ या ासाद पर चढ़ जाते। अवसर पाते ही वे
रा स पर टू ट पड़ते और उनका हार बचाकर भाग जाते।
एक वानर का ऐसा लाघव, साहस तथा बल देख-सुनकर लंका म आतंक छा गया।
चार ओर से उन पर बाण-वषा हो रही थी। थान- थान पर उनके अंग से र िनकल रहा
था। पर तु वे दुमद रा स से यु करते ही जाते थे।
अ यकु मार बड़ा धनुधर था। ल यवेध का उसे बड़ा घम ड था। उसने तीन बाण
हनुमान् के म तक पर मारे । इस पर ु हो मा ित उछलकर अ यकु मार के रथ पर चढ़
गए। अनेक रा स भट के संर ण म रहते ए भी उ ह ने अ यकु मार को रथ से ख चकर
भूिम पर ला पटका। मु त भर दोन यो ा म म ल-यु आ। अ त म हनुमान ने
अ यकु मार के व को लात से र द डाला, िजससे वह छटपटाता आ मर गया।
अ यकु मार के िनधन से रा स सै य म बड़ा रोष छा गया। सब रा स सेनापित,
यो ा श क अंधाधुंध वषा करने लगे। पर तु मा ित फर अ तधान हो गए। उ ह ढू ंढ़ने
को रा स इधर-उधर दौड़ने तथा कोलाहल मचाने लगे। सारी ही लंका म वानर का आतंक
छा गया। अ यकु मार के िनधन से संत और असंयत मेघनाद वयं रथ पर चढ़ अशोक वन
म आया। मेघनाद के अिभयान से सारी ही लंका म उ ग े फै ल गया। उसके रथघोष तथा
धनुष-टंकार से बारं बार उ ेिजत रा स सै य जयघोष करने लगे। महाबली इ िजत् ने
आते ही हनुमान को बाण से ढांप िलया। वे िजधर भी जाते, उधर ही बाणा म िघर जाते।
इ िजत् का यह ह तलाघव और कौशल देख मा ित बड़े आ यच कत ए। उ ह ने देखा,
यही एक अजेय यो ा है, िजसका सा मु य नह कया जा सकता। उ ह ने समय, काल
और कू टनीित का आ य ले यु याग दया और हाथ उठाकर इ िजत् से कहा–‘‘हे वीर,
म दूत ं और अव य ।ं पर तु म अपना अिभ ाय के वल र े क सेवा म ही िनवेदन कर
सकता ।ं मने के वल आ मर ाथ यु कया है–आ मण नह कया।’’
इ िजत् ने आ ा दी क इस वानर को बांधकर र े क सेवा म ले जाया जाए।
रा स उ ह रि सय स बांधकर पीड़ा देते ए र े क सेवा म ले गए। ब त–से रा स
उन पर मु से हार कर रहे थे, पर हनुमान् िबना ितकार कए चल रह थे।
मा ित रावण क सभा म प च ं ।े पु के िनधन से रावण ोिधत और शोकपू रत
था। वह वण-कु डल पहने वण- संहासन पर आसीन था। उसका मुकुट हीर , मोितय
और मािणक क आभा से जगमगा रहा था। वह हलके रे शमी व धारण कए था और
अंग पर इ -च दन का लेप कए सु दर तीत हो रहा था। मंि य और सेनापितय से
िघरा आ रावण सूय के समान तेज का िव तार कर रहा था। वह फ टकमिण के
र ज टत संहासन पर बैठा म दराचल के िशखर-सा लग रहा था। उसके संहासन को
घेरकर नवयुवितयां आकषक शृंगार कए खड़ी थ । दुधर, ह त, महापा व और िनकु भ
ये चार सिचव उनके िनकट उपि थत थे। मा ित ने रावण को देख उसके प, परा म,
वैभव और शि क मन-ही-मन सराहना क ।
रि सय से बंधे हनुमान् को स मुख देख रोष से अिभभूत रावण ने मंि य क ओर
देखकर कहा–‘‘इस दुरा मा से पूछो क यह कौन है, कस अिभ ाय से अनिधकृ त प से
यह लंका म आया है? कसिलए हमारे अशोक वन म इतना उप व कया तथा हमारे
ि यजन को मारा?’’
रावण के ये वचन सुनते ही मा ित ने कहा–‘‘हे र े , म महा मा सु ीव का
सिचव हनुमान् ं तथा उ ह का भेजा आ आपक सेवा म दौ य काय के िलए आया ।ं
उ ह ने जो संदश
े मेरे ारा आपके पास भेजा है, वह म िनवेदन करता ।ं इ वाकु वंशी
महाराज दशरथ के पु राम धममाग का आ य ले अपनी प ी सीता और ाता ल मण
सिहत द डकार य म आए थे। वहां से उनक प ी जनकसुता सीता को कोई दुरा मा चोर
चुरा ले गया। उनक खोज करते ए दोन भाई ॠ यमूक पवत पर आए और उ ह ने
वानर के अिधपित सु ीव से िम ता कर ली। उनके िहत के िलए ीराम ने महाबली बािल
का वधकर सु ीव को वानर का अिधपित बनाया। अब हम वानर सीता क खोज म अपने
वामी क आ ा से िनकले ह। म उ ह क खोज करता आ आपक लंका म आया ।ं मने
यहां अशोक वन म भगवती सीता को देखा है। आप महामित ह। धम ह। अथ-काम को
भली-भांित समझते ह। अत: पराई ी का इस कार से हरण करके बलात् घर म रखना
आपके िलए हर तरह अशोभनीय है। आप परम नीितवान् ह, आप जानते ह क धम-िव
काम करने से अनथ ही होता है। ी राम से िवरोध करना र े के िलए िहतकर नह
होगा। इसिलए आप र -महीपित, मेरी धमानुकूल बात मान, रघुकुल वधू, भगवती सीता
को स मान-सिहत ी राम के पास भेज दीिजए। इसी म आपक भलाई तथा कु शल है। अब
अपना िहतािहत सोचने म र े ही माण ह।’’
मा ित के ऐसे वचन सुनकर भी रावण का ोध शा त नह आ। उसने मंि य
क ओर देखकर कहा–‘‘इस धृ और राजपु के वधक ा वानर का अभी वध करो !’’
रावण क ऐसी आ ा सुन िवभीषण ने हाथ बांधकर िनवदेन कया–‘‘र े , दूत
अव य है। इसने भली–भांित अपना दूत व मािणत कया है। आप धमा मा तथा तापी
स ीपपित ह। दूत-वध से आपका यश कलं कत होगा। इसिलए आप राजधम तथा
स यधम का िवचारकर इस धृ दूत के िलए कोई राजोिचत द ड का िवधान क िजए।’’
इस पर रावण ने ु वर म कहा–‘‘ क तु इस पािप ने अशोक वन म िबना
हमारी अनुमित के जाकर, वहां उप व करके एवं वहां के रा स का हनन करके दूतोिचत
काय नह कया। अत: इसका वध ही ठीक है।’’
िवभीषण ने कहा–‘‘मिहदेव स ह । इस मूख ने भीषण कम कया है। इसका
अपराध अतुलनीय है तथािप यह दूत है। दूत का वध अनुिचत है। अपराधी दूत के िलए
वध के अित र अनेक द ड-िवधान ह। यथा–अंग-भंग, ताड़न, छेदन, मु डन,
त शलाकादाह, आ द; पर दूत-वध अ ुत है–अनुिचत है। आप मिहदेव ह। धमनीित के
आचाय ह। शा ाचार को समझने, उस पर यथावत् आचरण करने तथा लोकाचार के
पालन करने म आप पृ वी म सब देव, दै य, असुर, नाग जन म अि तीय ह। इसिलए आप
के ारा इस दूत को मृ यु-द ड देना उिचत नह है।’’
तब मं ी ह त ने हाथ बांध िवभीषण के समथन म कहा–‘‘मिहदेव, ाणद ड का
भागी वह श ु है, िजसने इस तु छ को यहां भेजा है। मारने से अपयश ही ा होगा। यह
श ु का सेवक है। अत: उ ह के िहत क बात सोचना इसका धम है। यह पराधीन है,
इसिलए भी अव य है। यह जाकर आपके श ु उन दोन उ ड भाइय को े रत कर यहां
ले आए। आप देव-दै य सभी से अपराजेय ह। लंका के महाबली रा स यु के िलए उ सुक
ह। इसिलए इस ु दूत का वध कर लंका के सुभट को आप िनराश मत क िजए।’’
रावण िवभीषण और मंि य के वचन सुनकर बोला–‘‘अ छा, य द यह अव य है
तो मेरी आ ा से इस दुरा मा को बांधकर अपमानपूवक लंका क गली-गली और राजमाग-
चतु पथ पर घुमाया जाए। पीछे उसके हाथ म ब त-सा व लपेट, उसे तेल म िभगो तथा
उसम आग लगाकर इसे लंका से बाहर िनकाल दया जाए।’’
रावण क इस आ ा का तुर त पालन आ। हनुमान को इससे अपार लाभ आ।
लंका के सब घर-घाट उ ह ने देख िलए। वन, वीथी, राजमाग, ह य, दुग, प रिध भी
उ ह ने नजर म तोल िलए। मन-ही-मन वे भावी यु क योजना बना, कहां कौन थान
कस उपयोग म आ सकता है, यह िनणय करने लगे। रा स कोलाहल करते, उनका
ितर कार करते, चीखते-िच लाते, लात-मु से उ ह मारते-धके लते, नगर म घुमाने लगे।
उनके साथ शंख, घिड़याल और भेरी थ , िज ह बजा-बजाकर वे उनके अपराध क घोषणा
कर रहे थे। इसे सुन सब नागर, रा स, ी-पु ष इस एकाक अिमत परा मशील वानर
को देखने झु ड बांधे ठौर-ठौर एक होते जाते थे।
दन-भर उ ह घुमाया गया। स या होने पर उनके दोन हाथ को व से लपेट
और तेल से तर करके , उनम आग लगा, उ ह लंका से बाहर फक दया गया।
हनुमान् ने तुर त ही अपने हाथ को मु कया। अदूरदश रा स ने फर उसक
ओर यान ही नह दया। इसके बाद वे सावधानी से फर लंका म िव हो गए। फर वे
िछपते ए धीरे -धीरे रावण के मिणमहल क ड् यो ढ़य म प च ं छ वेश म ह य म घुस
गए। उनके पास तेल से भीगा आ वलनशील ब त-सा व था जो रा स ने उनके हाथ
म लपेट दया था। अब अक मात् उनके मन म एक भीषण िवचार आया। उसी को एक
उपयु थान म रख और उसके िनकट ब त-सा का एक कर उ ह ने उसम आग लगा
दी और जब मिणमहल के िनवासी थम हर क मद-मू छत िन ा का आन द ले रहे थे,
आग क लपट ने अनायास ही मिणमहल को घेर िलया। शी ही अनुकूल वायु पाकर आग
क लपट आकाश को छू ने लग । महालय म भगदड़ मच गई। कह कु छ भी व था न रही।
सव आग-ही-आग थी। उसी भगदड़ और कोलाहल म हनुमान् वहां से अ तधान हो बाहर
िनकल आए। उ ह ने देखा, लंका के जन मिणमहल क ओर दौड़ रहे ह। तब वे एक दूसरे
महल म घुस गए। यह महल म ी सारण का था। वहां भी उ ह ने उसी कौशल से आग
लगा दी। धीरे -धीरे एक के बाद दूसरा महल, ह य, सौध, अ ािलका म आग फै लती चली
गई। वायु का अनुकूल झ का खाकर वह उमड़ चली। हनुमान के उ ोग का अ त न था। वे
एक के बाद दूसरे घर अ याधान करते ए अ तधान हो जाते। ह त, महापा व, व दं ,
शुक, सारण, इ िजत्, कु भकण, हि तमुख, रि मके तु, सूपश ु आ द सेनापितय और
मंि य के महल धायं-धायं कर जलने लगे। अब तो च ड वायु का आघात खा आग क
लपट कालमेघ क भांित लंका को सने लग । ह य, महल, अ ािलकाएं, जल-जलकर टू टने
और ढहने लग । रा स ी-पु ष, बाल-वृ , ौढ़ सभी ाण का भार ले इधर-उधर ाण
बचाने को दौड़ने लगे। उसी भीड़ म िमले-जुले हनुमान् भी अपना काम करते जा रहे थे।
मिहदेव, स ीपािधप रावण का मिणमहल इस समय अि -समु बन रहा था।
मोितय -मिणय से जड़ी िखड़ कय के तोरण, र ज टत ऊंचे-ऊंचे त भ, सतख डे ासाद
और अ ािलकाएं फट-फटकर भूिमसात हो रहे थे। आग बुझाने के सभी य िन फल हो
रहे थे। सारी ही लंका म आग का समु िहलोर ले रहा था। ी-पु ष के क ण दन से
वातावरण भर गया। मरते ए, रोते-कलपते ए रा स ी-पु ष जहां-तहां भटक रहे थे।
जलते मकान म से मोती, मूंगा, वैदयू , मिण, नील गल-गलकर, िपघल-िपघलकर बह रहे
थे। लयाि क भांित आग ने समूची ही लंका को स िलया। मकान के िगरने से जो
धड़ाके हो रहे थे वे ऐसे तीत हो रहे थे, जैसे ा ड फट पड़ा हो। ठौर-ठौर पर रा स
भयभीत मु ा से कह रहे थे–‘‘यह वानर तो सा ात् काल ही है। इस कार धन, धा य,
मिण, र , वण, हाथी, घोडे़, रथ, पशु, प ी, वृ , लता-गु म, रा स, नाग, देव, दै य,
दानव से भरी-पूरी वह समृ लंका भ मीभूत हो गई। लंकावासी ी-पु ष अपने-अपने
ि यजन को खोजते ए ‘हा पु ’, ‘हा वामी’, ‘ ि ये ’, ‘हा िम ’, कहते ए उस अि -
समु म भ म हो गए। रा स के भयानक आतनाद से आकाश ा हो गया।
अब हनुमान् ने समूची लंका को धायं-धायं भ म होता छोड़ समु -लंघन का
संक प कया। वे अ र िग र क चोटी पर चढ़ गए। यह थान िनजन था। वहां उ म वन-
फल, मीठा जल एवं सघन छाया थी। उ ह ने जल िपया, फल खाए और िव ाम कया।
फर वे धीरे -धीरे नीचे आ समु गभ म पैठ गए। सागर क उ ुंग तरं ग पर उनका व काय
िथरकने लगा। महा यास कर वे सागर म उसी कार अपने साहस से आगे बढ़ने लगे, जैसे
आए थे। उ ाम आ मिन ा, असीम साहस, अद य शि और असाधारण दृढ़ संक प से
अ ततः उ ह ने उस दु तर सागर क त -भूिम पर चरण रखा। पृ वी म न देखा-सुना
हनुमान का यह अ भुत आ यजनक अिभयान स प आ!
94. अिभगमन

समु -तट पर प च ं हनुमान् ने व -गजना क , िजसे सुनकर सब वानर उ सुक हो


‘यह तो मा ित क गजना है’–कहकर समु -तट क ओर भागे। उ ह ने र व हवा म
िहला-िहलाकर अपनी उपि थित का संकेत कया य ही उ ह ने हनुमान् को समु -तीर
पर िसकता पर बैठे देखा, वे जोर-जोर से हषनाद करते ए उनके िनकट प च ं े और उ ह
घेरकर उनका कु शल पूछने लगे। मा ित ने स वदन वृ जा बवान् और अंगद को
अिभवादन करके कहा–‘‘भाइयो, िमिथलेशकु मारी सीता का मुझे दशन हो गया।’’
यह सुनते ही वानरवृ द हष से उ म हो गए। सबने िमलकर हनुमान् का अ य-
पा से स कार कया। ान, भोजन और िव ाम से िनवृ हो, सब उ ह घेरकर बैठ गए।
सभी समाचार सुनने को उ सुक हो रहे थे। मा ित ने एक-एक कर लंका क सारी ही अघट
घटनाएं कह सुना । अ त म कहा–‘‘म मैिथली सीता को असहायाव था म भयानक
रा िसय के पहरे म छोड़ आया ।ं वे अपनी वेणी भी नह गूंथती ह। उनके के श क
जटाएं बन गई ह। उपवास से वे अित दुबल हो गई ह। वे हर समय ी राम का नाम रटती
ह। सो हे वानर े ो, ीराम क कृ पा और आप सबक शुभकामना से मने वानरपित सु ीव
का यह काय िस कर दया। अब आप महानुभाव शेष काय सफल कर, य क आप हर
तरह समथ ह।’’ हनुमान् के ये वचन सुनकर यूथपित युवराज अंगद ने कहा–‘‘हे मा ित,
तुमने अनहोना काय कया है। बल और परा म म पृ वी पर तु हारे समान दूसरा नह है।
तुमने हम सभी क ाणर ा कर ली तथा मयादा रख ली। अब यह िवचार करना चािहए
क हम आगे या करना होगा।’’
हनुमान् ने कहा–‘‘सुनो, हम सब कु छ करने म समथ ह। आप य द ठीक समझ तो
हम सब लंका चल और रावण को मार लंका का िव वंस कर सीता को ी राम क सेवा म
ले चल। भावी काय म वयोवृ जा बवान् आ द क स मित पर िनभर है। आप लोग
स पूण शा और श क िव ा के ाता ह। परा मी और समथ ह। स पूण रा स का
हनन करने म तो अके ले युवराज अंगद ही यथे ह। फर महा मा नील ह, मै द ह, ि िवद
ह। पृ वी पर देव, दै य, ग धव, नाग, य इनम कौन ऐसा है जो हम वीर से ट र ले सके ?
म तो अके ला ही समूची लंका को जलाकर छार कर आया ।ं हमारे िलए रावण को मारकर
सीता का उ ार करना या क ठन है! म अशोक वन म बैठी शोकिवद धा सीता को ब त-
ब त आ ासन दे आया ं और उनके वध करने क जो अविध रावण ने िनयत क है, उसम
अब ब त कम काल शेष है।’’
मा ित के ये वचन सुनकर अंगद ने कहा–‘‘ठीक है, आप जैसे वीर के रहते हम ी
राम के स मुख चलकर यह कहना क हम भगवती सीता के दशन तो कर चुके, पर साथ न
ला सके , हमारे परा म पर लांछन ही रहेगा। इसिलए, वीरो, चलो! अभी लंका चल और
रावण को मार सीता का उ ार कर। फर स -मन अपने वामी सु ीव के पास चल।’’
युवराज अंगद के वचन सुन वानर का यूथ जोर-जोर से व -गजना करने लगा।
‘चलो, अभी चलो’–कहने लगा। पर तु अथत व के ाता जा बवान् ने धीर-ग भीर वर म
कहा–‘‘हे महाबा , तेरा यह िवचार मुझे उिचत नह जंचता। हमारे वामी सु ीव ने हम
के वल सीता क खोज क ही आ ा दी है। इसिलए हम दु साहस नह करना चािहए, युत
अब ज द हम सु ीव तथा ी राम क सेवा म उपि थत होना और जो कु छ हमने कया है,
उसका िनवेदन करना चािहए। मह वपूण काय म वे छाचा रता और उतावली नह
करनी चािहए।’’
महा ा जा बवान् के ये वचन सुन सब वानर स हो कि क धा क ओर चलने
का संक प कर महे पवत से उतर उ साह और वेग से अपनी राह लगे।
95. ि य–िनवेदन

वानर का यूथ उ साह और उमंग म भरपूर था। अब यु क उमंग उनके र म


भरी थी। काय-साफ य के ेय ने उ ह अद य कर दया था। वे अब राम को ि य संदश े
िनवेदन करने और लंका पर अिभयान करने को बेचैन हो रहे थे। वे पर पर उ साहवधक
बातचीत करते जा रहे थे। शी ही वे सु ीव के सुरि त मधुवन म जा प च ं े। सु ीव का
मामा दिधमुख वहां का र क था। उसक तिनक भी आन न मानकर वे मधुवन म उ पात
मचाने और मधुपान करने लगे। उसके उ पाद से ु हो दिधमुख ने सु ीव से िनवेदन
कया। सु ीव ने हंसकर कहा–‘‘समझ गया! वे काय िस करके आ रहे ह। तभी उ ह ने यह
साहस कया है। उ ह ने अव य ही भगवती सीता का पता लगा िलया है। उनके उ पात
उनके दय के आन द के ोतक ह। जाओ, उनसे कहो क म उनपर स ।ं उनका
अपराध मा करता ।ं अब तुम हनुमान् आ द मुख वानर को शी मेरे पास भेज दो।’’
दिधमुख ने वामी का यह भाव देखा तो मधुवन म जाकर अंगद से िवन भाव से
कहा–‘‘आप युवराज ह, हमारे वामी ह, हमारा अिवनय मा क िजए तथा मधुवन म
यथे छ िवहार क िजए–यथे छ मधुपान क िजए। अब आप और हनुमान् मुख यूथपित
महाराज सु ीव क सेवा म उपि थत ह , वानर-राज ती ा कर रहे ह।’’
इस पर अंगद ने कहा–“वीरो, य िप म युवराज ,ं तथािप आप लोग पर शासन
नह कर सकता। आप लोग ने महान् काय स प कया है। आप पर शासन करना आपका
अपमान करना है।’’
अंगद के ये वचन सुन जा बव त ने कहा–‘‘युवराज, आपके समान ऐसे वचन कोई
नह कह सकता। वामी होकर भी अपने अधीन जन से कौन इस कार क बात करे गा?
चिलए, अब हम ी राम क सेवा म चलकर ि य संदश े िनवेदन कर।’’
ी राम के िनकट प च ं कर, मा ित हनुमान् ने आगे बढ़ राम के चरण म णाम
कर िनवेदन कया–‘हे सीतापते, आपके आशीवाद से मने भगवती सीता के दशन कर िलए।
वे अपने ाण यागने के िलए उपवास कर रही ह। महाराज, म सौ योजन दुधष समु का
लंघन कर लंका म प च ं ा, जो समु के बीच दि ण म है। वहां मने अशोक वन म भगवती
सीता को पित त के कठोर िनयम का पालन करते ए देखा। वे शरीर से कु शल ह। अपने
जीवन को अि य समझकर भी वे जीिवत ह। भयानक रा िसयां उ ह हर समय घेरे रहती
ह, उ ह डराती-धमकाती ह। भगवती सीता उन रा िसय क सभी यातनाएं सहती ह। वे
एक ही चोटी करती ह। भूिम पर सोती ह। उपवास से उनका शरीर ीण हो गया है। वे
अ य त दयनीय दशा म जीवन के शेष दन य - य करके तीत कर रही ह। वे िनर तर
आप ही के यान म म रहती ह। मने उ ह आप ही के यान म रत दीनाव था म देखा है।’’
मा ित के ये वचन सुन राम ने उठकर मा ित को दय से लगाया। तब हनुमान् ने
कौए का वृ ा त सुनाकर सीता क दी ई मिण राम को दी, िजससे राम को पूरी तीित
हो गई। तब हनुमान् ने कहा–‘‘अब भगवती क जीवन-अविध म के वल एक मास ही शेष
है।ै ’’
राम ने मिण को छाती से लगाकर आंख से अ ुजल िगराते ए सु ीव से
कहा–‘‘हे िम , इस मिण को देखकर आज म शोक-सागर म डू बा जा रहा ।ं यह मिण
समु से िनकली ई है। मेरे सुर को स होकर देवता ने दी थी। उ ह ने मेरे िववाह
के अवसर पर अपनी पु ी सीता को दी। सीता इसे सदा म तक पर धारण करती थी। अब
पवनकु मार ने मुझ मृत ि को अमृत के समान यह मिण देकर मेरी िनराशा दूर क है।
पर सीता के िबना यह मिण देखकर म धैय कै से रख सकता ?ं हे िम , अब िवल ब का
या काम है? चलो, दुरा मा रावण के चंगुल म फं सी ई िवदेहनि दनी का हम उ ार कर।
हनुमान् ने बड़े साहस का काम कया है। ऐसा काम संसार म और कसी वीर ने नह
कया।। हे वीर मा ित, तुम ध य हो? भला तु हारे िसवा देव, दानव, य , ग धव, नाग से
भी अजेय रावण से रि त लंकापुरी म अपने बल के भरोसे जाकर कौन जीता लौट सकता
था? तुमने जनकनि दनी का संदश े देकर मेरी और रघुवंश क र ा क है। मेरे पास तु हारे
यो य कोई पुर कार भी तो नह है।’’ यह कहते-कहते ेम-िवभोर हो राम ने हनुमान् को
छाती से लगा िलया। फर उ ह ने शोकसंत हो सु ीव से कहा–‘‘हे िम , सीता का पता
लग गया, पर बीच म समु बाधक है। उसे पार करना दु तर है। कहो, कै से यह दु तर काय
पूरा होगा? कै से यह वानर-दल इसे पारकर लंका प चं सके गा?’’
सु ीव ने कहा–‘‘हे िम , जब सीता क खोज िमल गई और श ु के िनवास का
पता लग गया तो फर अब शोक का या काम! हम लोग अनायास ही इस सागर को
पारकर लंका को छार कर डालगे। आप शोक याग दीिजए। हे राम, शोकाकु ल और
उ साहहीन पु ष के सभी काम न हो जाते ह। इसी से वह आप त हो जाता है। ये
वानर-यूथपित सब कार समथ और महाशूर-वीर ह। आपके ि य के िलए ये आग म भी
कू द सकते ह। बस, अब हम समु पर पुल बांधने का य करना चािहए। समु पर पुल
बंधे िबना तो देवराट् इ सिहत सम त देव, दै य, क र, मानव, दानव भी लंका का कु छ
अिन नह कर सकते। पर तु पुल बंधने पर बस एक बार लंका हमारी आंख म चढ़े तो उसे
न आ और रावण को मरा ही समिझए। हमारे यो ा ि थर और अजेय ह। िवजय िन य
हमारी ही होगी। अब आप शोक याग दीिजए। शोक सब काम को िबगाड़ देता है। िजस
काम के िलए बल-िव म क आव यकता है, उसम शोक बाधक है। अत: आप शोक को
याग िव म को दय म थान दीिजए। आप सब शा के ाता तथा महा के
अिधपित ह। अत: हम अपने यो य मि य क सहायता से अव य श ु पर िवजय ा
करगे।’’
सु ीव से ऐसी युि संगत वाता सुन राम ने सािभ ाय हनुमान् क ओर देखकर
कहा–‘‘हे सौ य, सुना जाता है क लंका पर िवजय पाना तथा उसम वेश करना अ य त
दु कर है। इसिलए म जानना चाहता ं क लंका म कतने दुग ह? अपने ने से देखे ए के
समान ही म उसका िववरण प सुनना चाहता ।ं हे वीर, तूने समूची लंका का यु क
दृि से गहन अ ययन कया है। इसिलए कह क रावण क सेना कतनी है और लंका क
र ा के िलए उसने या उपाय कर रखे ह?’’
ी राम के ये वचन सुनकर हनुमान् ने कहा–‘‘हे रघुवंशमिण, लंकावासी रा स
अित स प ह। वहां बड़े-बड़े म त हाथी ह, िवशाल रथ ह। रा स भट बड़े शूर ह। वे य
से लंका क र ा रात- दन करते ह। लंका म चार िवशाल ार ह। उनम अ य त दृढ़ फाटक
लगे ह, िजनम मोटी-मोटी अगलाएं लगी ह। उन अगला पर बड़े िवशाल उपल अ लगे
ह, जो श -ु सेना को रोकने के िलए ह। लंका के चार ओर व णम चहारदीवारी है, िजसम
बीच-बीच म मिण, मूंगा और मोती लगे ह, चहारदीवारी क चार ओर ठ डे जल क बड़ी
भयानक गहरी खाई है, िजसम बड़े-बड़े मगरम छ भरे पड़े ह। उस खाई के पार ार तक
प चं ने के िलए बड़े-बड़े िव तृत माग ह, िजनम य लगे ह। उन य ारा श ु-सेना को
खाई म िगरा दया जाता है। इन सं म म एक तो बड़ा ही दुभ है। वह सोने के बने
ख भ और वे दय से सुशोिभत है। वहां ब त-सी सेना रहती है, िजसक देख-भाल
सेनापित करते ह।
‘‘रावण वयं सावधानी से सेना का िनरी ण करता रहता है। लंका पर आ मण
देव के िलए भी दु ह है। उसके चार ओर तो दुल य समु , खाई, वन, पवत और दुभघ
चहारदीवारी ह, िजसने उसे अजेय बना दया है। वहां नौका भी नह जा सकती। ऐसी ही
यह दुगम लंका है, जो ि कू ट-िशखर पर बसी है। दस-दस हजार भयंकर रा स सुभट हाथ
म शूल लेकर येक ार क रखवाली करते ह, िजनक सहायता के िलए चतुरंिगणी चमू
सदा तैयार रहती है। क तु मने सं म को तोड़ दया, लंका को जला डाला, वहां क
व था भंग कर दी और भय एवं आतंक का रा य थािपत कर आया ।ं अब तो हम समु
पार करने ही का यास करना है, फर तो लंका िवन ही समिझए। अंगद, ि िवद, मै द,
जा बवान्, पन , नल, नील, आ द महारथ वानर-यूथपित तथा वानरराज, सु ीव, इस
दुजय दुधष लंका के सब कोट, परकोट, खाई को न कर सीता का उ ार करगे। इसम
तिनक भी संदह े नह ।’’
मा ित के ये वचन सुन राम कु छ देर िवचारम रहे। फर खड़े होकर उ ह ने
ज द-ग भीर वर म कहा–‘‘हे वानरे , हम सब रा स सिहत लंका का िव वंस करगे।
सूयदेव अब म याकाश म प च ं चुके, आज उ रा फा गुनी न है। कल च मा ीण
न पर होगा। इसिलए हम आज ही िवजय-या ा करनी है। तो अभी सेना को थान क
आ ा हो!’’
96. अिभयान

सु ीव ने कू च के नगाड़े बजवा दए। सबसे आगे सेनापित नील अपने अ गामी


दल को लेकर चला। सु ीव ने कहा–“सौ य, तुम पथ- दशन करो, पथप र कार करो,
दुगम थल को ग य बनाते चलो। ऐसे माग का प रशोध करो, िजसम यथे जल-फल-मूल
आहार ा होता जाए। सि वेश क सुिवधाएं ह । शीतल जल और मधु यथे िमल सके ।
श ु माग म आहार को दूिषत न कर सके । आस-पास क दशा क सुर ा का भी यान
रखो।माग के गढ़े,गहर दुग,वन सभी का प र कार करो। थान- थान पर चौ कयां थािपत
करो। पथ- दशक के यूथ बनाओ। सावधान रहो क आगे चलने पर पीछे से श ु के
आ मण क आशंका न हो।’’ नील के यूथ शत-सह दल बनाकर अपने-अपने काय करते
आगे चले और उनके पीछे समु के समान वेगशाली वानर क अथाह सै य चली।
पवताकार गव, गवय और गवा अपने यूथ ले आगे बढ़े। सेनानायक ॠषभ वानर-सै य के
दि ण प क र ा करते चले। म गजराज के समान दुजय ग धमादन सेना के वाम
पा वर क बनकर चले। सेना के म य भाग म ऐरावत के समान हाथी पर ी राम चले।
उनके आगे-पीछे अंगर क, दाय-बाय हनुमान्, ल मण तथा युवराज अंगद चले–उनके
पीछे वानरराज सु ीव मि य और सेनापितय सिहत। सबके अ त म सेना के पृ भाग
क र ा करते महा-िव म ॠ राज जा बवान्, सुषेण और वेणदश वानर-यूथपित अपने
यूथ सिहत चले। स पूण सेना का अिधनायक सु ीव सेनापितय , गु मनायक को आ ा
देता चला। तापी नील अपने साथ जंघ, वलीमुख, ज भ और र क को िलए बड़े संयम
और चातुय से आगे-आगे राह बताते तथा पथ- दशन करते जा रहे थे। सु ीव क कठोर
आ ा थी क माग म नगर,उपवन,सरोवर और ाम क हािन न होने पाए।
इस कार वानरी सेना सारी पृ वी को ढकती चलकर स ा िग र पर जा
प च ं ी। उस समय सु ीव ने राम के सम आ िनवेदन कया–‘‘राघवे , आपक जय हो!
मुझे पृ वी और आकाश म शुभ शकु न दीख रहे ह, जो आपक मनोरथ-िसि के सूचक ह।
देिखए, सेना के पीछे अनुकूल सुखद समीर बह रहा है। िवहंग मधुर वर से कलरव कर रहे
ह, दशाएं स ह, सूय िनमल है, शु आपके पृ भाग म चमक रहा है, रािश िनमल
है। स ष-म डल काश-यु है। ि शंकु देदी यमान है। िवशाखा न देदी यमान है।
जल शीतल और मधुर हो गया है, वायु सुगि धत हो म द-म द बह रही है। ॠतु के अनुकूल
पु प से दशाएं सुशोिभत ह और स पूण वानरी सै य ूहब आपक आ ा क ती ा
कर रही है।’’
ी राम ने स मन सम त कटक को स ा िग र पर िव ाम करने का आदेश
दया। आदेश पा वानर स हो-होकर िशलाख ड पर बैठ च दन क सुग ध से सुवािसत
वायु का आन द लेने लगे। पवत-िशला पर उ प के तक , माधवी, वास ती, कु द, िच ,
िब व, मधूक, आम, पाटल, अजुन, शंशपा आ द सम त लता म ु को देख वानर का यूथ
आन द से कोलाहल करने लगा। कु छ च वाक, जलकु कुट, च आ द पि य से यु
सरोवर म जल ड़ा करने लगे। इस कार म दूरकर वानर सै य आगे चलकर
महे िग र पर जा प च ं ी। वहां से उसने थम बार उस अथाह समु के दशन कए। फर
पवत से उतर, समु -तटीय वन म आ, वानरी कटक ने सि वेश थािपत कया। समु -तट
पर पड़ाव डाले यह िवशाल सेना दूसरे समु के समान जान पड़ती थी। उसके कोलाहल ने
समु -गजन क ग भीर विन को भी अपने म लीन कर िलया था। यो यतम सेनापित
सु ीव क अ य ता म वानरी सेना तीन िवभाग म िवभ करके ठहराई गई। समुद-तट
पर आकर वायु क ेरणा से उठी ई उन उ ाल तरं ग को देखकर वानर बड़े स हो रहे
थे। जहां तक दृि जाती थी, जल-ही-जल दीख पड़ता था। समु के बीच म कह भी भूिम
नह दीख पड़ती थी। िवशालकाय जल-जीव से भरा यह समु फे न के कारण हंसता तथा
उ ाल तरं ग के कारण नाचता-सा दीख रहा था। उसम दी फन वाले सप, िवशालकाय
ित मंिगल आ द जलचर और थान- थान पर पाषाण-िशलाएं दखाई दे रही थ । वह
अगाध जलिध सवथा दुगम था। दूसरा तट न दीखने के कारण समु और आकाश पर पर
िमले ए जान पड़ते थे। असं य र से यु समु और असं य तारागण से ा आकाश
म कोई अ तर नह रह गया था। समु म उठनेवाली भयंकर लहर आपस म टकराकर जो
ग भीर श द करती थी, वह आकाश म बजते ए नगाड़ क -सी विन मालूम पड़ रहा था।
वायुवेग के कारण उस समु म इस समय बड़ा कोलाहल मचा आ था। बड़ी-बड़ी लहर
उठकर पर पर टकरा रही थ । इन लहर के कारण चंचल और उ ल े ायमान होते ए समु
का वह दृ य देख वानर-दल च कत हो रहा था।
अपनी र ा म भली-भांित सावधान वानर-सेना को नील ने बड़े कौशल के साथ
समु के उ र तट पर ठहरा दया। उसक र ा के िलए ि िवद और मै द वीर यूथपितय
को उनके यूथसिहत िनयु कया। यूथपितय को क ठन आदेश दया क वे अपने यूथ से
पृथक न ह । सं द ध पु ष को िशिवर म िव न होने द। अपने-अपने यूथ क सजग होकर
र ा कर।
97. जग यी का कामवैक य

असहिव म, दुधष मा ित के ारा अनायास ही लंका का िव वंस होते तथा


मा ित को दु तर सागर पारकर आते-जाते देख जग यी मिहदेव रावण का तेज जैसे बुझ-
सा गया। वह ोध और शोक से अिभभूत हो गया। कभी कसी िच ता को पास न फटकने
देने वाले बल, तापी रावण के मन म अक मात् ही चोर बैठ गया। उसने य पूवक लंका
क सुर ा क व था क । फर भी वैक य से उसका मन भर गया। एक अ ात भीित ने
उसे चंचल कर दया। वह सोचने लगा क ‘सीता का हरण या उिचत आ? इस दाशरिथ
से वैर बांधना या युि यु आ? या यह भी संभव है क वह राज मानव राजकु मार
इस एक ी के िलए अग य लंका तक आने का दु:साहस करे ? या उसका ऐसा ताप, तेज
और शौय है क मेरा सा मु य करने का साहस करे ? या उसे प रकर ा होगा? साधन
िमलगे? पर उसने एकाक ही जन थान के चौदह सह रा स का वध कर डाला है और
इस धृ वानर ने एकाक ही अग य लंका म आकर मेरे तेज ताप के िसर पर लात मार
लंका म अि दाह कया है। यह सब तो अिच य है, अस भा है। पर तु जो हो, म इस
श ु-प ी को छोडू गं ा नह ।’’
सीता क याद आते ही सीता क मू त उसके मानस-ने म आ उपि थत ई।
उसने सोचा–अहा, सीता के समान सु दरी ी तो ैको य म नह है। उस कमलनयनी
च वदनी सीता को मरण करके ही म कामद ध हो रहा ।ं पर तु वह मेरी श या पर
आना ही नह चाहती। ऐसी ी तो मने कोई देखी ही नह ; मेरे वैभव का उसे तिनक भी
मोह- लोभन नह । मेरे ताप से वह भािवत नह । वह तो उस िभखारी राम म ही
अितरं िजत है। यह तो मूढ़ता क पराका ा है। ि यां वभाव ही से मूढ़ होती ह। पर म तो
उस पर मोिहत ।ं कै से वह मेरी श या पर आरोहण करे , कै से म इस काय म िस मनोरथ
होऊं, समझ म नह आता। अहा, उसक क ट ीण है, िनत ब पु ह, शर के समान
उसका मुख है। वण- ितमा के समान वह सौ य है। वह गजमािमनी सीता तो मायामू त
के समान है। उसके रि म नख से यु कोमल और लाल-लाल सु दर तलव वाले चरण
को देखकर तो मेरा मन ही वश म नह रहता। अि वाला और सूय क काि त के समान
देदी यमान उसक सु दर नािसका और सु दर ने वाले िखले कमल-से मुख को देख
काम वर चढ़ता है। यह काम-ताप, जो शोक और ोध म भी मुझे नह छोड़ता, शरीर को
काि तहीन और िवकृ त करके मन को संतािपत करके मुझे जलाता जा रहा है। सो कै से इस
तप से म पार पाऊंगा? वह मृगशावक-नयनी जनक राजा क पु ी या मेरे हाथ म आकर
भी मेरे हाथ म चढ़ेगी! म जग यी ि लोकपित रावण, देव, दै य, दानव, मानव, नाग, य
सभी से पूिजत होने के बाद इसी एक मानुषी से ितर कृ त होऊंगा? नह , यह तो असहनीय
है। पर तु अब मुझसे रहा नह जाता। अविध म तो अभी एक मास शेष है। यह कै से कटेगा?
अ तत: म मिहदेव सवजयी वै वण पौल य ।ं मयादा के िवपरीत भी तो म नह कर
सकता। उस िभखारी राम को मुझे या भय है! वह साधनहीन है। वह या यहां लंका तक
आने क मूखता करे गा? वह तो इस उ ोग म ही न हो जाएगा। यह दु तर सागर, यह
दुल य लंका और ये अजेय रा स भट, इनके स मुख उस एकाक मानव क या िबसात!
पर वह अके ला वानर ही जब यहां आकर इस अ य त सुरि त लंका म इतना उ पात मचा
गया, तो फर यह भी नह कहा जा सकता क राम को यहां तक आने म सफलता नह
िमलेगी। काय-िसि के साधन अक पनीय आ करते ह।
इन सब िवचार ने रावण को अि थर कर दया। सह सु द रय तथा भोग-
सामि य से प रपूण उसका मिणमहालय अब उसके अशा त और उि मन को स न
कर सका। नृ य, पान और िवहार से उसक िच िख हो गई। हनुमान् का असम परा म
और राम क भीित एक अशुभ छाया के समान उस महा तापी वै वण रावण के स पूण
ि व पर छा गई।
उसने अपने िव ासी अमा य महापा व को बुलाकर परामश कया। महापा व ने
करब िनवेदन कया–‘‘देव, हं व य ज तु से प रपूण वन- देश म जाकर जो पु ष
मधु पाकर भी उसका सेवन न करे , उसे पान करने को िवकल न रहे, उसे मूख ही समझना
चािहए। आप जग यी ह, मिहदेव ह, पृ वी के वािमय के वामी ह। आप ई र ह, य
नह आप इस श ु-प ी सीता के साथ बला कार से रमण करते? िजस कार कु कुट
झपटकर मादा को दबोचकर रमण करता है, आप भी उसी कार अपनी इ छापू त
क िजए। इ छापू त के बाद फर भय या है? श -ु प ी दूिषत होने पर फर भला राम
उसका या करे गा? इसके अित र य द कसी भी कार का भय उपि थत आ ही तो
उसका उिचत ितकार कया जाएगा। आप िचि तत न ह , महाबली कु भकण और
तेज वी इ िजत् आपक सेवा म उपि थत ह? फर लंका म जो सह ाविध भट ह। वे कस
दन के िलए ह? हम तो देवराट् को भी कु छ नह समझते। यहां आपका श ु आया भी तो
हम उसे देखते ही मार डालगे। आप िनि त रिहए।’’
म ी महापा व के ऐसे अनुकूल वचन सुनकर रावण स तो आ, पर तु उसने
कहा–“म मिहदेव ,ं जग यी ,ं िव के दुलभ भोग का अिधपित ।ं देव, दै य, दानव
सभी ने अपनी क याएं मुझे सादर अ पत क ह। ब त नाग, दै य, य -सु द रय का मने
हरण कया है। वे सब मेरी श या पर आना अपना परम सौभा य मानती ह। सभी मेरा
अिभन दन करती ह, सभी का म वामी के समान उपभोग करता ।ं फर या कारण है
क यह एक मानवी ी मेरा ितर कार करे ? बला कार करने से सौ दय का रस या ा
होगा? अरे , ी जब तक वे छा से तन-मन पु ष को अपण न करे , तब तक उस ी का
आन द या? यह मानवी मेरे सम त ऐ य का ितर कार करती है, मेरी मयादा का िवचार
नह करती, मुझ जग यी से उस िभखारी राम को े समझती है। म यह कै से सहन कर
सकता ?ं फर वह श ु-प ी है। उस मानव ने मेरी बहन का ितर कार कया है। अब,
उसक ी मने अपने कौशल से हरण क है तो उस पर मेरा ही अिधकार है। वह मेरी
श या पर स ता से आए, मुझे अपना तन-मन अपण करे , तभी उसके पित राम के दु कम
का ितकार हो। पशु क भांित बला कार से तो मेरी ही मयादा भंग होगी। भला पृ वी क
कोई ी मुझे तु छ समझे और वह जीती रहे, यह संभव है! मेरी मयादा है, म सुकुल-
उ प वै वण पौल य ,ं मुिनकु मार ,ं स ीपािधपित मिहदेव ,ं जग यी ।ं इस
श ु-प ी को मेरी श या पर आकर वे छा से अपना शरीर और मन मुझे अ पत कर
कृ ताथ होना चािहए। नह तो अविध के बाद अव य मेरे रसोइये उसका दय मेरे कलेवे के
िलए पाक करगे। जाओ, उस मानवी को सूिचत कर दो।’’
98. राजसभा

वानर के दल-बादल समु -तट पर आ प च ं े ह, इसक सूचना चर ने रावण को


दी। रावण ने आ ा चा रत क – सब सभासद् सभा भवन म उपि थत ह । रा स
संदशे वाहक रावण का आदेश लंका के भवन म, शयन-गृह म, ड़ा- थल म, उ ान म
जा-जाकर रा स-साम त और सभासद को सुना आए। सभासद् श और व से सि त
हो, राजा ा पा कोई रथ पर, कु छ हािथय पर, कु छ पाल कय पर चढ़कर राजसभा को
चले। कु छ पैदल ही चल दए। सभासद क सवा रय से लंका के राजपथ भर गए। चहल-
पहल से, लोग क बातचीत से मुख रत हो उठे । उ ह देखने को उ सुक नागर जहां-तहां
भीड़ बनाकर खड़े हो गए। पौर-वधुएं झरोख से झांकने लग ।
र े भी सोने क जाली और मिण-मूंग से सुशोिभत रथ पर आ ढ़ हो सभा-
भवन को चला। ढाल-ख ग धारण करने वाले अनेक श ा से सुसि त रा स उसके
आगे-आगे चले। अनेक बलवान् रा स उसे दाय-बाय और पीछे से घेरकर चले। रथवाले
रथ पर, हाथीसवार हािथय पर, घुड़सवार घोड़ पर, हाथ म तोमर, गदा, शूल लेकर
रावण के साथ चले।उस समय सह भे रयां बज रही थ ,िजनसे ग भीर श द होता था।
आगे-आगे ब दीजन तुित गाते जा रहे थे। इस कार अपनी तुित सुनता रावण सभा-
भवन म जा प च ं ा। उसके वहां प च
ं ते ही तुमुल शंख विन ई। रावण के रथ पर च मा
के समान ेत छ शोभायमान था। उसके दोन ओर फ टक मिण के िन मत वण-
मंज रय से यु चंवर और पंखे झले जा रहे थे। इधर-उधर मुख रा स सुभट, सभासद्
िसर झुकाए खड़े थे। इस कार अिमताभ रावण उस अपूव सभा म जा सोने क वेदी पर,
जो फ टक मिण के फश पर बनी थी और जहां र ज टत सुनहरी काम का िबछावन िबछा
था, रखे र संहासन पर बैठ गया। इस भवन के र क छ: सौ िपशाच ने भूिम म िगर
र े को णाम कया। अ य सभासद् भी र े को णाम कर-करके चौक , आसन और
आसि दय पर बैठ गए। ये सब सभासद् येक काय क सुगम से सुगम व था करने म
कु शल और समुिचत-समयानुकूल मत देने म िनपुण थे। इसी समय रा से िवभीषण,
कु भकण और युवराज मेघनाद भी अपने-अपने े घोड़ के वणरथ पर बैठ सभा म आ
अपना नाम कह र े के चरण म णाम कर अपने आसन पर आ बैठे। रावण के आठ
मं ी भी अपने–अपने आसन पर बैठ गए।
िविवध-मिण-मािण य-हीरकज टत ब मू य व को धारण कए, अग , च दन
और पु प–माला क सुग ध से सभा-भवन को सुरिभत करते ए वे चतुर और स य
सभासद् सभा क शोभा बढ़ाने लगे। उनम न तो कोई जोर-जोर से िच लाकर बोलने वाला
था–न अस यवादी। सभी रा स अ य त परा मी और शूरवीर थे। वे सभी रावण का मुंह
ताक रहे थे। इस कार उन महाबली श धारी मेधावी सभासद के बीच म बैठ रावण
द सुषमा धारण कर रहा था।
सबके यथा थान बैठ जाने पर रावण ने कहा–
“सभासदो, संसार म उ म, म यम और अधम तीन कार के पु ष होते ह। जो
पु ष िम , िहतैिषय और स बि धय के परामश से काम करते ह वे उ म; जो अके ले ही
सब काम करते ह, वे म यम और काय के गुण-दोष क िववेचना िबना कए हठपूवक,
‘क ं गा’ इसी तरह कहकर कसी िहत-ब धु क आन न मान, काय करते ह, वे अधम
कहलाते ह।...
‘‘पु षा क भांित िन य भी तीन कार के होते ह। िजस िन य म नीित–शा
तथा म एकमत होता है वह उ म; िजसम मतभेद हो पर अ त म ब मत से िन य हो
वह म यम और िजसम म प ा करे , िवरोध-भाव कट करे , अ त तक एकमत होने पर
भी अिव त रहे, वह अधम है।
‘‘इसीिलए सभासदो और मि यो, आपको ात है क हमारा श ु राम लंका पर
अिभयान करने के िवचार से आगे बढ़ रहा है। इसिलए आप लोग िवचार करके सवस मत
िन य कर। अब कोई-न-कोई िन य कर लेना परमाव यक हो गया है। अब आप वही
सोच िजसम रा स का क याण हो तथा हमारी लंका को दु दन का मुंह न देखना पड़े।
धम, अथ और काम-िवषयक क ठनता उपि थत होने पर आप ही लोग ि य-अि य, लाभ-
हािन, सुख-दुख, िहत-अिहत का िवचार करने म पूण समथ ह। आप लोग क स मित से
ार भ कया गया मेरा कोई भी काम कभी िन फल नह गया। आप ही के सहयोग से म
दुलभ रा यल मी भोग रहा ।ं मने जो काम कया है उसके िवषय म भी म आप लोग से
पहले स मित लेना चाहता था, पर ऐसा न कर सका। अब म कहता ं क म द डकार य से
अपने वैरी दाशरिथ राम क प ी हर लाया ।ं राम से य िप मुझे भय नह है, फर भी
इस स ब ध म िवचार तो कर लेना चािहए। फर आगामी काय म क योजना बनानी
चािहए। आप ही क सहायता से मने पृ वी को जय कया है तथा देवे को ब दी बनाया
है। आप लोग अब भी मेरे सहायक ह। अब सीता का पता लगाकर दोन मानवकु मार समु
के उस पार आ प च ं े ह तथा इस पार आने का उ ोग कर रहे ह। य िप उनका यह य
हा या पद है, फर भी हम ऐसा उपाय सोच रखना चािहए, िजससे दोन भाई मारे जाएं
और सीता को लौटाना न पड़े। आपक ही योजनानुसार म काय क ं गा। म तो यही
समझता ं क वानरी सेना के िलए समु ो लंघन अ य त दु कर है। फर भी य द वह यहां
आ भी जाए तो संसार म कोई ऐसी शि म नह देखता, जो सं ाम म मुझे िविजत कर
सके ।’’
रावण के ये वचन सुन कु भकण ने रोषभरे वर म कहा–‘‘महाराज, जब आपने
सीता का हरण कया, तब हमसे स मित नह ली। यह काम अ य त अनुिचत आ। हरण से
पूव ही आपको परामश करना उिचत था। राजा के िजस काय का प रणाम-भोग जा को
भोगना पड़े, उसम उसक राय लेनी ही चािहए। जो राजा भली-भांित मंि य से िवचार-
िवमश करके काय करता है, उसे कभी पछताना नह पड़ता। पर जो िवपरीत काय मंि य
क सलाह के िबना ही कए जाते ह, उनका प रणाम सदा दोषयु होता है। जो पु ष
पहले कए जाने वाले काम को पीछे और पीछे कए जाने वाले काम को पहले करता है, वह
नीितशा से सवथा अनिभ है। ि थर बुि वाला पु ष िवचारशील और शि शाली
होता है। वह श ु के दोष को देखता रहता है तथा जहां िशिथलता पाता है, वह आ मण
करता है तथा य का भागी होता है। महाराज, आपने िबना ही िवचार कए यह ु कम
कर िलया, जो महा अिन -कारक हो सकता है। राम का बल जन थान म देख िलया गया
है। म तो यह समझता ं क आपने बलवान् श ु से अिवचारपूण दूिषत छेड़छाड़ ार भ
कर दी है, िजससे आपके िव -िव ुत सुनाम को कलं कत होने का भय उपि थत हो गया
है। य द आपक इस भूल के प रणाम व प हमारी सारी तप या, िव -िवजय क भगीरथ
य तथा र -सं कृ ित ही खतरे म पड़ जाए, स प लंका पर संकट आ पड़े और आन द म
म रा स का सवनाश उपि थत हो जाए, तो महाराज वह आप ही का दोष होगा। राजन्
मने आपके वंश और ित ा के िलए ाणा तक यु कए। आपका श ु चाहे कै सा ही
बलवान् था, मने उसे मार डाला। भले ही उसक सहायता को इ , व ण, कु बेर, म त् और
सब दै य-दानव भी आए, पर मेरे हाथ से उसक र ा न कर सके । पर तु इस
वे छाचा रतापूण दु कम म मेरा आपसे कोई सहयोग नह है। म श ु का प नह लेता,
पर तु आपक अनीित का अनुमोदन भी नह करता। अतः इस संभािवत यु म आप मुझसे
कु छ भी आशा न रखना। मेरी इ छा तो अब कु छ दन एका तवास क है। म र गुहा म
जाता ।ं आपका क याण हो!’’ इतना कहकर महातेज कु भकण वण संहासन याग उठ
खड़ा आ। इस पर रावण ने ु होकर दप से कहा–‘‘कु भकण, समु के समान मेरे वेग
और वायु के समान मेरी गित को न जानकर ही वह दाशरिथ वानर-सेना ले इस ओर बढ़ा
चला आ रहा है। इस कार पवत क गुहा म सोए ए संह और सोते ए काल के समान
उसने मुझे छेड़ा है। भयंकर सप के समान सं ाम म छू टे ए मेरे बाण को राम ने कभी नह
देखा है। इसी से उसने यह दु:साहस कया है। क तु म अपने धनुष से छू टे ए व के
समान अगिणत अि बाण से उसे भ म कर डालूंगा। िजस कार सूय उदय होते ही न
क काि त न कर देता है, उसी कार म इस वानरी कटक को देखते-ही-देखते न कर
डालूंगा। मुझे तेरी आव यकता नह है। मेरी ओर से तू र -गुहा म शा त एका तवास कर।
मुझ सहोदर से तेरा या योजन है?’’
रावण के ये वचन सुन कु भकण रावण को णाम कर, िबना उ र दए, सभा-
भवन से चला गया।
र े रावण के वचन सुन, श ु-बल से अप रिचत और नीितशा से शू य रा स
यूथपित यो ा हाथ जोड़कर िवनयपूवक बोले–‘‘महाराज! प रघ, शूल और प श आ द
श से सुसि त िवशाल अजेय सेना हमारे पास है। फर िच ता कस बात क है? इसी
सेना ारा आपने भोगपुरी के नाग को वश म कया, अलका के कु बेर को आ ा त कया,
देवे को ब दी बनाया और सुरलोक को जय कया। वर ा बलवान दानव भी आपके
सम नह ठहर सके ।यमलोक,देवलोक और आयवीय सभी तो आपक िवजय-दु दुिभय से
थरा उठे । फर इस हतवीय राम क या िबसात? हे महाराज, जब तक इ जयी मेघनाद
और अकथिव म कु भकण आपक आ ा के अधीन ह, आपको कस बात क िच ता है!’’
अब नील मेघ के समान वण वाला ह त ब ांजिल खड़ा होकर बोला–‘‘र े
क जय हो, हम लोग तो यु म देव, दै य, य , नाग, ग धव, िपशाच कसी को भी िगनते
ही नह । फर इन दो एकाक राज- मानव क या बात है! हम सब बेखबर थे। श ु के
आ मण का िवचार न भी था–इसी से वह धूत वानर हम धोखा दे गया। लंका को भ म
करके जीिवत बच िनकला। अब वह सब वानर को काल के मुंह म धके लने को ला रहा
है।’’
दुमुख, सेनानायक ने खड़े होकर कहा–‘‘हे पृ वीपित, हनुमान् का यह उ पात तो
हमारा-आपका, सबका अपमान है। आप आ ा दीिजए, म अके ला ही जाकर समु -तट पर
उस वानर-सिहत सब वानर को मृ यु क भट क ं ।’’
अब महाबली व दं सेनापित अपने भयंकर प रघ घुमाता आ बोला, ‘‘मिहदेव
स ह , म तो यह कहता ं क िजस कार हो, श ु पर िवजय पानी चािहए। मेरा मत है
क ब त से रा स, जो इ छानुसार प धारण कर सकते ह, िनभ क हो राम के पास
मानव के वेश म जाकर मानवी भाषा म कह क हम आपक सहायता के िलए आपके भाई
ने अयो या से भेजा है। इस कार सेना म जा िमल। फर अवसर पाकर श -वषा कर
वानर को मार डाल।’’
इसके अन तर र कु मार िनकु भ ने ोध म भरकर कहा–‘‘अरे वीरो, आप यह
महाराज क सेवा म उपि थत रह, म अके ला अभी जाकर उन दोन भाइय को मार उनका
दय िनकाल लाता ।ं ’’
तब भूधराकार व हनु बोला–‘‘कु मार को क देने का या काम है! इतना-सा
काम तो म अके ला ही कर लाऊंगा। दो मानव को मार लाने म मुझे कतनी देर लगेगी!”
तदन तर रभस, सूयश ु, सु , य कोप, महापा व, महोदर, अि के तु, दुधष,
रि मके तु, इ श ,ु ह त, िव पा , व दं , धू ा , दुमुख आ द रा स प रघ, प श,
शूल, ास, परशु, धनुष और ख ग लेकर अमष से ओत ोत एकबारगी ही व -गजना
करके बोले–‘‘र े महीपित मिहदेव क जय हो! महाराज क आ ा से हम आज ही
समु -तीर पर जाकर वानर सिहत दोन मानव को मार डालते ह। आप हम आ ा
दीिजए!’’
इस पर धैय और राजनीित के परम ानी, राजमयादा के ाता िवभीषण ने
उठकर रावण के स मुख आ णाम करके कहा–‘‘हे पर तप, आ ा पाऊं तो िनवेदन क ं !
जब से आप लंका म दाशरिथ राम क प ी को लाए ह, म अनेक-िवध अपशकु न देख रहा
।ं म ारा यथािविध आ ितयां देने पर भी अि विलत नह होती। उसम
िचनगा रयां िनकलने लगती ह। उसक वाला धूिमल हो जाती है। विलत अि भी धुएं
के कारण काली पड़ जाती है। अि हो शाला और वेदभवन म सांप दखाई देते ह। य -
साम ी म ची टयां दीख पड़ती ह। गजराज का मद सूख गया है। घोड़े दीन-दुबल हो गए
ह। गाय का दूध सूख गया है। गध , ख र और ऊंट के शरीर के र गटे खड़े हो जाते ह
और उनक आंख म आंसु क धार बह चलती है। कौ के झु ड िमलकर ठौर-ठौर ककश
श द करते ए भवन पर आ बैठते ह। िग भी नगर पर मंडराते ह। स याकाल म िसयार
नगर के िनकट आ अमंगल श द बोलते ह। ये सब अ य त िवप नक अपशकु न म लंका म
िन य देखता ।ं सारी जा देखती है, पर आपके मं ी आपसे इन बात को कहने म संकोच
करते ह। हे तात, जहां साम, दान और भेद इन तीन उपाय से काम िस न हो सके , वह
द ड-नीित का उपयोग करना चािहए। जो असावधान हो, दैवी कोप से पीिड़त हो, ऐसे
ही पु ष पर िवचारपूवक कया गया बल- योग उपयोगी िस होता है। पर तु राम
असावधान नह है। वह िवजय क कामना से आ रहा है। उसके पास सेना भी यथे है। वह
वयं अजेय और परा मी है। िवशाल दुल य समु को लांघने वाले रामदूत हनुमान् ही के
पौ ष पर आप िवचार क िजए। ऐसे-ऐसे न जाने कतने असम साहसी वीर उसक सेवा म
ह। इसिलए महाराज, हम राम के बल क उपे ा नह करनी चािहए और िवशालकाय
महा-उ पात करने वाले वानर जब तक लंका से दूर ह, तब तक आप इस िवशाल नािगन
सीता को लौटा दीिजए। इसी म रा स कु ल क भलाई है। आप अकारण क रार को टाल
दीिजए।’’
िवभीषण के ये वचन सुन मेघनाद ने वीरदप से कहा–‘‘हे िपतृ , भी पु ष के
समान यह आप या कह रहे ह? नीच-कु लो प ाणी भी ऐसे भी वचन नह कहता–
आप तो तापी पौल य ह, िजनका वीय जग-िव यात है। भला कह मानव और पशु भी
हम रा स क समता कर सकते ह! मने ि लोकपित इ को ब दी बनाया, ऐरावत को
दांत पकड़कर पृ वी पर पछाड़ दया। सो हम देवता और दानव कसी का भय नह है। इस
रा य- िभखारी राम क भला या िबसात है?’’
िवभीषण ने कहा–“पु , तू, श धा रय म मूध य है। हमारे कु ल का िशरोमिण है।
अिमतिव म है, पर तु तेरी आयु के समान तेरी बुि भी अभी प रप नह है। तू िहतािहत
और कत ाकत पर िवचार नह कर सकता। जो वचन तूने कहे ह–इनसे र कु ल का
अिन ही होगा। तू बाल-बुि से यह कह रहा है और काल प, यमद ड के समान भयंकर
उस दाशरिथ के परा म से अप रिचत है। मेरी यह िनि त स मित है क दाशरिथ राम क
प ी सीता को धन-र , आभूषण-व और िविभ मिणय सिहत राम को भट कर र े
इस आस संकट को टाल द तथा आन द से िनभय लंका का सा ा य भोग।’’
िवभीषण के इन वचन से रावण ु हो गया। उसने कहा–‘‘अरे ाता, श ु और
सप के साथ रहना तो फर भी िनरापद है, पर तु श ु प पाती ब धु के साथ रहना अ य त
भयानक है। म जानता ं क हमारे िवमलयश र कु ल म कु छ ऐसे कु ल-कलंक ह जो
र कु ल पर िवपि आने पर स हो सकते ह। वे अपने ही कु ल का ितर कार करते ह। ऐसे
ही दुरा मा तुम भी हो। तुम जैसे कु ल ोही से तो भय ही है। तुम श ु के शंसक और कु ल के
िन दक हो। यह जाितभय सब भय से भयानक है। आज जो अिखल िव म मेरी िवजय-
वैजय ती फहरा रही है, मेरे नाम का डंका बज रहा है, मने जो िव के कु लीन और
ऐ यवान का स मुख समर म पराभव करके जग यी क पदवी ा क है, वह सब तुझे
नह सुहाती। तू ई यालु और दुरा मा है। जैसे हाथी ान के बाद धूल उछालकर अपने
शरीर को मैला कर लेता है, वैसे ही तू भी कु ल-कलंक है। तुझ कु ल-िन दक को मृ युद ड
देना उिचत है। पर तु तू मेरा सहोदर भाई है, म तुझे के वल िध ार सिहत या य घोिषत
करता ।ं तू रा स क लंका तथा यश वी र कु ल को यागकर अभी यहां से िनकल, यही
तेरे िलए राजा ा है।’’
िवभीषण ने शा त वाणी से कहा–‘‘र े , आप िपतृतु य मेरे ये ाता और
र पित ह, इससे म आपक आ ा मानकर अभी लंका को यागता ।ं अधम- वृि होने से
आपने मुझे कठोर वचन कहे ह। हतभा य पु ष िहतकारी वचन नह सुनते। अि य और
िहतकारी बात कहने और सुनने वाले दोन ही दुलभ ह। शोक है क आप िवनाशक
कालपाश म बंध चुके ह। हतायु पु ष प य को नह देखता। ऐसा होता ही है। काल के
वशीभूत होने पर बड़े-बड़े यश वी जग यी तापी श -शा के ाता भी मूढ़वत
आचरण करते ह। आपक आ ा मानकर म जाता ।ं आप अपने इन िहतैषी रा स सिहत
लंका क र ा क िजए। आपका क याण हो!’’
इतना कहकर िवभीषण तुरंत उठकर अपनी भीम गदा हाथ म ले सभा-भवन से
चल दए। उनके पीछे ही उनके चारो मं ी भी उठकर सभा-भवन से बाहर हो गए।
99. शर यं शरणम्

“िनवेदयत-िनवेदयत! सवलोकशर याय राघवाय यदह रावण यानुजो


िवभीषण तुम र ोिभ सह भव तं शरणमागतः।’’
गदापािण िवभीषण ने राम-कटक म आकर उ वर से ये श द कहे। वानर ने
भय और संदह े से इन पांच नवाग तुक रा स को घेर िलया। वे उ ह सु ीव क सेवा म ले
चले।
िवभीषण का अिभ ाय जानकर सु ीव ने राम के पास आ िनवेदन
कया–‘‘राघवे , आपके श ु रावण का भाई िवभीषण अपने चार मंि य सिहत आपक
शरण म यहां उपि थत है। पर तु सेना के ूह, श ु-स ब धी मं णा, नीित और राजदूत
के मामले म हम सावधान रहना चािहए। यह श ु रावण का े रत गु दूत भी हो सकता
है। वह जाित से रा स, ज म से श ु का भाई है, अतः वयं श ु ही है। इसका भला िव ास
कै से कया जा सकता है? इससे मेरा मत यह है क इसका िन ह हो। इसे ब दी बना िलया
जाए।’’
राम ने कहा–‘‘हे िम , तूने सारग भत और युि पूण वचन कहे। पर तु श ु य द
शरण म आकर िवन ाथना करे तो वह भले ही ू रकमा हो, स पु ष को अपने ाण का
मोह छोड़कर उसक र ा करनी चािहए। िम भाव से आए ए इस िवभीषण को म कै से
याग सकता !ं वह कपट भी करे , तब भी नह । सब ािणय को अभय देना ही मेरा त
है। जो एक बार मेरी शरण म आकर कहे–‘म तेरा ’ं –उसे सब भय से मु करना ही मेरा
कत है। वह श ु का भाई िवभीषण हो या वयं श ु रावण ही हो, उसे मेरी ओर से
अभयदान दे मेरे पास ले आ।’’
रामा ा सुनकर सु ीव ने कहा–‘‘राघव, आप धम क शीषमिण ह। अत: आपने
अपने यो य ही कहा। अनुमान और क पना के बल पर मेरा मन भी यही कहता है क
िवभीषण शु दय है। मने उसे भली-भांित जांच िलया है। िवभीषण देश-काल को देख-
समझकर ही दोष-गुण पर िवचार कर रावण को छोड़कर आपक शरण आया है। उसके
संभाषण से भी उसका दु मनोरथ नह जान पड़ता। उसक मुख ी िवमल है, भीित और
आशंका से रिहत है। म तो यह समझता ं क बािल का मरण और आपके ारा मेरी रा य-
ित ा क वाता सुनकर ही यह लंका का रा य पाने क अिभलाषा से आया है। म तो यही
समझता ं क महा ा िवभीषण शी ही हमारा िव त िम बन जाएगा!’’
‘‘तो िम , र राज िवभीषण को मेरी सेवा म उपि थत कर!’’
राम क आ ा से सु ीव का संकेत पा हनुमान् िवभीषण और उनके चार मंि य
को ी राम क सेवा म ले आए। राम के स मुख आते ही िवभीषण ने अपने मि य सिहत
भूपात कर राघवे को सा ांग द डवत् करके िनवदेन कया–
“रावण य अनुजोऽह तेन अवमािनतोऽि म,अतः सवभूतानां शर यं भव तं
शरणमागतः। लंका मया प र य ा धनािन िम ािण चािप, मे रा यं, जीिवतं सुखािन च
भवद्गतं िह।’’
राम के ने अ ुिस हो गए। उ ह ने िवभीषण को उठाकर दय से लगाया, फर
ल मण क ओर देखकर कहा–
“ व स सौिम ,समु ा लमानय ! तेत चेमं िवभीषण र सां राजानं
महा ा मिभिषऽच।”
ल मण ने उठकर कहा –“यथा ापय याय:!”
ल मण ने िविधवत् समु -जल से िवभीषण का अिभषेक कया। सु ीव और
वानर-यूथपितय ने एक वर से कहा–“साधु,साधु!” बानर-सै य ने पुकार लगाई-“
रा से िवभीषण क जय हो!’’
‘‘अनुगृहीतोऽि म!’’ िवभीषण ने गद्गद-क ठ हो ब ा िल कहा।
राम ने बा उठाकर िवभीषण को आसन देते ए कहा–
‘‘एिह र :पते, मनोरथं मे पूरय। कथ नु व णालयं सागरम ो यं तराम।’’
राघव, घोरे ऽि म व णालये सागरे अब वा सेतुं से :ै सुरासुरैरिप ल का
नासादियतुं श या।’’
इस पर सु ीव ने कहा–‘‘अयं महो साह: नलो नाम िव कमतनयः एष सेतुं
करोतु।’’
नल ने खड़े होकर कहा–‘‘समथ ा यहं सेतुं कतुम्।’’
‘‘तद ैव वानरपु गवा: सेतुं ब तु।’’
सु ीव ने आ ा दी और सह वानर हष फु ल हो वेग से सेतु-िनमाण म जुट
गए। नल ने अ य त बुि मानी से सारी योजना तैयार क । सैकड़ वानर तो शाल,
अ कण, बांस, धव, कु टज, अजुन, ताल, ितिनश, िव व, स पण, ितलक, क णकार, आम,
अशोक आ द वृ के भारी-भारी ल े काटने-छांटने म जुट गए। सैकड़ वानर ने उन कटे
ए ल को िछछले जल म गाड़ना और दृढ़ र सी से बांधना आर भ कर दया। ब त
वानर बड़े-बड़े प थर क च ान को लुढ़काकर जल को पाटने लगे। इस कार देखते-ही-
देखते सह वानर के महदु ोग से समु पटने लगा। कु छ िश पी सूत लेकर सेतु क
नापतौल करने लगे। कु छ लोहे क शृंखला को हाथी के समान िशला म बांधने-
अटकाने लगे। समु के जल म प थर के िगरने,कारीगर के ारा ठोक-पीट करने और
हजार वानर के बोलने से समु का वातावरण कोलाहल से आपूयमाण हो गया। देखते-
ही-देखते चौदह योजन सेतु तैयार हो गया। इसके बाद तेईस योजन पुल तैयार कर सेतु को
भूगभ थ सुवेल पवत-शृंखला से िमला दया गया। इसके आगे भूगभ थ च ान के कारण
काय सुगम था, जो शी ही स प हो गया। महा ा नल के इस मह कम क ी राम ने
भू र-भू र शंसा क । सबसे थम गदा-पािण िवभीषण अपने मि य सिहत उस पार
उतरकर,भूिम पर गए। इसके बाद अंगद, हनुमान् और सु ीव से रि त महािव म राम,
ल मण और फर सब कटक।
युवराज अंगद ने फू ल, मूल, जल आ द का सुवास देख उपयु थान पर कटक क
थापना क और अब ल मण और सु ीव समय न न कर तुर त ही सेना के ूह और यूथ
क रचना म लग गए।
उस समय समु -तीर पर भंजन वायु चल रही थी। म त हाथी के समान वृ झूम
रहे थे। सुहावनी सं या के र ा बर िव पर अपनी आभा दखा रहे थे।
राम ने ल मण और सु ीव क ओर देखकर कहा–‘‘अब वह काल उपि थत हो
गया है, जब भयंकर रा स और बलवान् वानर के मांस और िधर से पृ वी आ छा दत
हो जाएगी। सब कोई सावधान रह! हम भोर ही म लंका पर आ मण करगे। अब िवल ब
का कु छ काम नह ।’’
100. रणभेरी

असंभा , अत कत, अकि पत वानर-कटक ारा दुल य समु -तरण का समाचार


सुन र े रावण हतबुि हो गया। उसने अपने शुक, सारण नामक दो मि य को
बुलाकर आ ा दी क वे श ु-सै य म जाकर राम का बलाबल देख। दोन मं ी वानर का
वेश धारण करके िशिवर म िव ए, पर तु वे चैत य-मू त िवभीषण से नह िछप सके ।
उसने उ ह पहचानकर ब दी बना िलया और राम के स मुख उपि थत कया। राम के
स मुख आ उ ह ने जीवन से िनराश हो, भयभीत वर म कृ ता िल होकर
कहा–‘‘महाराज, हम दोन र े महीपित के अनुगत सिचव ह। र े क आ ा से
आपका बलाबल देखने आए थे। स य बात हमने िनवेदन कर दी।’’
राम ने कं िचत् हंसकर कहा–‘‘तो य द तुमने हमारा स पूण बल देख िलया है और
तु हारा अिभ ाय पूरा हो गया है तो तुम जा सकते हो। पर य द कु छ देखने को रह गया हो
तो र े िवभीषण तु ह सब कु छ दखा देगा। तुम लंका जाकर लंकापित रावण से कह
देना क कल उसक दुग और तोरण से सुरि त, सु िति त लंका पर मेरा आ मण होगा।
तब म भी रा स का बल देखूंगा और उनका बाण से स कार क ं गा।’’
इतना कह राम ने दूत को मु कर दया। वे राम को णामकर लंका म आए।
उ ह ने रावण क सेवा म उपि थत होकर िनवेदन कया–‘‘देव, वानर-कटक का धान
सेनापित महासुभट नील है और उसका सहायक अिमतिव म बािलपु अंगद है। बल-
परा मी नल िजसने दु तर समु का सेतु-बंध कया है, पचास सह यो ा का अिधपित
है। सरोचन पवत का वामी महाबिल कु मुद, भीमकमा च ड, सा वेग का वामी शरभ, ये
सब चालीस-चालीस सह यो ा के यूथपित ह। पनस महासेनापित जो देव-दै य सभी
म अजेय है और वानर-सै य के म यदेश का र क है, पवत के समान िवशालकाय है। उसके
सहायक सेनानायक गव-गवय अिमतिव म ह। फर महातेज वी हर है, िजसम दस
हािथय का बल है। नील मेघ के समान बल परा मी सेनािधप धू है, जो अ वान् पवत
का वामी है। नमदा के तट का वामी जा बवान् यूथपितय का धान है, िजसके समान
नीित म ी पृ वी पर दुलभ है। फर द भ और िपतामह स मादन ह, िज ह ने संसार के
बड़े-बड़े सं ाम जीते ह। देवासुर-सं ाम म भी इ ह ने भाग िलया है। महासेनापित माथी
यु म अजेय है। गवा , के सरी िव य देश के अिधपित ह। सु ीव के दस म ी बृह पित के
समान नीित और धम के ाता ह। इस वानर-सेना म भूम डल के देव , ग धव और य
के नरपित सि मिलत है। यो ा के अ ग य मै द और ि व द ह, िजनका सा मु य पृ वी
का कोई पु ष नह कर सकता। फर लंका को अि क भट करनेवाला हनुम त मा ित है।
फर यमपु कु बेर और वा णेय भी आपसे अपना वैर चुकाने आए ह।
‘‘सु ीव को ी राम ने बािल को मारकर वानरपित बनाया है। पर आपके
संहासन पर िवराजमान रहते ही राम ने कु ल ोही िवभीषण को लंकािधपित-पद पर
अिभिष कर दया है। अब वह गदापािण िवभीषण सारे ही वानर-कटक म र पित
कहाता है। इन सब अिमतबल परा मशील यूथपितथ , यूथप और सेनापितय तथा
असं य यो ा के अित र द ा के यो ा राघवे ह, िजनके जैसा ह त-लाघव,
अ -िसि और रण-धैय पृ वी पर दूसरे नर-पु गव का नह है।
‘‘सु ीव ने बड़े ही चातुय से अपने सेनानायक के साहचय से ग ड़- ूह बनाया है,
िजसके वाम प पर ग का पु जा बवान् और उसका ाता ॠ राज धू है। महावीर
सुषेण और च पु दिधमुख दि ण प पर ह। मै द और ि िवद पृ र क ह। गज, गवा ,
गवय, शरभ और ग धमादन ये पांच यमपु च चु भाग म अवि थत ह। उदर थली म
सु ीव और िवभीषण-सिहत हनुम त-रि त महातेज राम ह। इस कार राम समु के
दि ण तीर पर पड़ाव डालकर अवि थत ह।’’
शुक, सारण के सारग भत वचन सुनकर रावण ने गरजकर कहा–‘‘को िह नाम
सप :, सवलोकभयादिप न सीतामहं द ाम्। य द देव-ग धव-दानवा अिप
मामिभयु ीर मां सतरे जेतुमहि त।’’
उसने अपनी समूची रा स सै य को स होने क आ ा दे दी। सम त मंि य
और सेनापितय को सभाभवन म बुला भेजा। लंका के येक दुग, कोट, कं गूर पर रखे
ध से बज उठे , सह तूणीर गगनभेदी िननाद करने लगे। भयानक भेरी-नाद से गगन
म डल थरा उठा। हाथी सजने लगे, घोड़ पर कवच और व चढ़ाए जाने लगे। सह
अ ारोही अ -श चमकाते लंका के राजपथ पर चार ओर से िसमट-िसमटकर आकर
जुटने लगे। सारे ही राजपथ सैिनक से भर गए। लंका म भीित, ाकु लता और आशंका
ाप गई। चार ओर उस वानर क चचा होने लगी, िजसने लंका जलाई है। अब तो
अनिगनत वानर क सेना आई है। अब या होगा? लंका के सब रास-रं ग, पानगो ी,
कारोबार, ापार ब द हो गए। धनपित अपने धन-र भूिम म िछपाने लगे। कु लवधुएं
अपने ि य पितय को यु का बाना सजा रण थली म जाता देख पछाड़ खाकर िगर पड़ ।
माता ने पु को ख गह त यु म जाते देख अ ुिवमोचन कया। सभी कहने
लगे–‘‘कै सी यह दुभागी सीता है, जो स पूण लंका के ाण का संकट आ बनी है। कै सी इस
महामित मिहदेव क दुमित ई है क इसने असं य देवा गना सु द रय के रहते इस ी
के िलए सारी ही रा स जाित पर संकट और मृ यु क छाया ला दी है।’’
इसी समय वानरी सै य म रण-भेरी बज उठी। हजार शंख , दु दुिभय तथा
भे रय के भीषण रव से लंका िहल उठी। र पित जग यी रावण कसी भय से ण-भर
को अवस हो गया।
101. र ा–कवच

महा रणनीित-िवशारद, वृ दै यपित मा यवान् ेत म ,ु ेत प रधान म धीरे -


धीरे सभा-भवन म आकर रा से रावण के स मुख खड़ा आ। हठात् मातामह को
स मुख देख र े आसन से उठ खड़ा आ। उसने वृ दै यराज को ब ा िल णाम
कया।
वृ दै यपित ने कहा–‘‘पु , जो राजा समयानुकूल श ु से सि ध-िव ह करता है,
वही िचरकाल तक पृ वी पर रा य कर सकता है। िजसक शि का ास हो रहा हो
अथवा श ु के समान ही िजसका बल हो, उसे यथाशी श ु से सि ध कर लेनी चािहए।
समतु यबल श ु क कदािप अवहेलना नह करनी चािहए। श ु से अपनी शि बढ़ी ई
हो तभी िव ह करना चािहए। इसके िवपरीत करने से अपना ही सवनाश होता है। राम के
प म वे सभी देव, ग धव, य और ॠिष ह, जो तुझसे दिलत हो चुके ह। वे सभी राम क
जय और तेरा पराभव चाहते ह। इससे पु , तू इस झगड़े क जड़ सीता को ी राम को
लौटा दे। िवषय म आसि होने से तेरा यश-तेज धूिमल हो रहा है और श ु िमलकर तेरा
अिन करना चाहते ह। तू परं तप मिहदेव है, पर म लंका म भावी अिन के ल ण देखकर
ही तेरे पास आया ।ं ’’
वृ मातामह के ये वचन सुन रावण ने गु से से भ ह चढ़ा तथा आंख िनकालकर
कहा–‘‘मातामह, आपने थ ही यहां आने का क कया, आपने श ु का समथन करते ए
जो-जो मेरे िलए अिहतकर-अि य श द कहे ह, वे मेरे कान ने सुने ही नह । है कौन यह
कृ पण राम! िपता के ारा िन कािसत, वन-वन भटकने वाला? कौन उसे समथ कहता है?
एक वानर का जो उसे सहारा िमल गया है, या इसी से? म स पूण पृ वी का िवजेता,
रा स का वामी, मिहदेव, स पूण शि य से स प ।ं देव-दै य सभी मुझसे भय खाते
ह, तो इस ु मानव क मुझसे या समता है? आपके वचन से तो ऐसा तीत होता है क
आप भी दुरा मा िवभीषण क भांित उस िभखारी राम से िमल गए ह। मेरा ताप और
यश आपको स नह है, तभी तो आप मुझे हतो साह करके यु िवरत कया चाहते ह। पर
नीितशा वे ा कोई भी िव संहासन थ पु ष को ो साहन क बजाय ऐसे अि य वचन
नह कहता। मने अपने परा म से उस श ु क प ी का धम से हरण कया है। अब या म
उस िवप राम से डरकर उसे छोड़ दू?ं यही आप मुझसे कहने आए ह! पर तु मने कसी के
सम झुकना सीखा ही नह , ऐसा मेरा वभाव है। अत: भले ही मेरे शरीर के दो ख ड हो
जाएं, म अपने िन य से नह हट सकता। राम ने जो संयोगवश हमारी उपे ा और
असावधानी का लाभ उठाकर समु पर पुल बांध िलया, इसी से आप इतने भयभीत हो
गए? पर म मिहदेव पौल य रावण आज ित ा करता ं क राम समु -पार आकर जीता
नह लौटेगा। आप देखते रिहए, कु छ ही दन म म लाख वानर से रि त राम को ल मण
और सु ीव सिहत मार डालूंगा। फर तो बस इस कु ल ोही िवभीषण को द ड देना ही शेष
रह जाएगा।’’
रावण के ये वचन सुन वृ दै य िसर झुकाए चुपचाप ब त देर तक खड़ा रहा।
फर–‘हे र पित, तेरी जय हो!’ इतना कह, धीरे -धीरे सभा-भवन से चला गया।
रावण भी कु छ देर तक िवमूढ़-सा बैठा रहा। फर उसने लंका क र ा-योजना
बनाई। पूव ार क र ा का भार ह त को, दि ण ार महापा व और महोदर को,
पि म ार मेघनाद को स पा और उ र वयं अपने हाथ म िलया। महाबली िव पा को
नगर का म य भाग दया। स पूण रि त सै य का वामी कु भकण को बनाया।
इस कार लंका क सुर ा का ब ध कर, सब योजनाओ पर िवचार-िवमश कर
वह अ त:पुर म चला गया।
102. राम– ूह

राम, ल मण, सु ीव, िवभीषण, अंगद, हनुमान् और जा बव त सिहत शरभ,


सुषेण, मै द, ि िवद, गज, गवा , कु मुद, नल, नील आ द यूथप और सेनानायक क यु -
सिमित बैठी।
राम ने कहा–‘‘ थम गदापािण र े िवभीषण अपना मत कह।’’
‘‘महाराज, मेरी आ ा से मेरे चार म ी, अनल, पनस; स पाित और मित वेश
प रव तत कर लंका म जा, वहां क सब गितिविध और व था देख आए ह। लंका के पूव
ार का र क ह त है और दि ण के महाबली महापा व और महोदर ह। पि म ार पर
इ िजत् मेघनाद िनयु है और उ र ार शुक, सारण आ द रा स सेनािधपितय और
मि य -सिहत वयं रा सराज रावण ने अपने अिधकार म िलया है। नगर के म य भाग
म शूल, मु र, धनुष आ द श से सि त महासेनापित िव पा िनयु आ है। रावण
क सेना म दस सह हाथी, दस सह घोड़े और अनिगनत यो ा ह। वे सभी अिमत
परा मी ह। वे रावण से ेम करते ह। रावण भी उनका िव ास करता है। इ ह यो ा के
बल पर रावण ने ि लोक जय कया था। म आपको भयभीत करने को यह िनवेदन नह कर
रहा ।ं व तुि थित िनवेदन कर रहा ।ं अत: अब आप समुिचत ूह रच अपने परा म को
कट क िजए।’’
िवभीषण के उपयु वचन सुन राम ने ण-भर िवचार कर कहा–‘‘पूव ार पर
सेनापित नील अपने यूथपितय को लेकर आ मण कर, बािलपु युवराज अंगद दि ण
ार पर और मा ित हनुमान् पि म ार को आ ा त कर। उ र ार पर म ल मण-सिहत
लंकापित रावण का अपने बाण से स कार क ं गा। नगर के म य भाग पर तेज वी सु ीव,
जा बवान् और रा से िवभीषण आ मण करगे। कोई भी वानर मानव प न धारण
करे गा। ‘वानर’ प ही हमारा आज का गु संकेत श द होगा। म, ल मण और अपने चार
मि य सिहत रा से र िवभीषण, बस ये सात पु ष मानववेश म यु करे गे।’’
यह व था कर राम-ल मण अपने मंि य तथा सेनापितय सिहत सुबेल पवत
क सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ गए। वहां प च ं कर उ ह ने लंका क गितिविध पर दृि
डाली। लंका पर िवहंगम-दृि डालकर राम ने कहा–‘‘यह दुरा मा रावण अपने अहं के
सामने न अपने कु लशील का िवचार करता है, न धमाधम ही का। उसने कामवश हो अपनी
मयादा के िवपरीत यह िनि दत कम कर डाला है, िजस पर उसे प ा ाप भी नह है।
पर तु अधम और इि य-दासता ही मनु य को पतन के माग पर ले जाकर उसक बुि को
कु ि ठत कर देती है। अ तु, कल सूय दय के साथ ही यह सु दर-स प लंका दुदशा ा त हो
जाएगी, िजसका स पूण दािय व लंकापित रावण पर ही होगा।’’
ी राम इतना कह मौन हो गए। उ ह ने सीता के दु:ख और अवश अव था का
यान कया। फर उ ह ने म द वर म कहा–‘‘देखो ल मण, बड़ी-बड़ी अ ािलका और
गमनचु बी ह य के वण-कलश इस अ तंगत सूय क रि म धूप म कै से चमक रहे ह।
बीच म अनेक िवशाल वा टकाएं भी ब त ह, िजनम च पा, अशोक, मौलिसरी, साख,
तमाल, ताड़, कटहल, नागके सर, हंताल, अजुन, कद ब, ितलक, क णकार आ द के पुि पत
वृ , लता से आ छा दत अपनी मनोहरता से इ पुरी अमरावती क शोभा को भी
लि त कर रहे ह। कु बेर का रथ और इ का न दन वन भी उ ान क समता नह कर
सकता। पपीहा, कोयल आ द इन उ ान को मुख रत कर रहे ह। नगर- ार ेतवण मेघ
के समान दीख रहे ह तथा राज-भवन और देव-मि दर के भ गु बज अपनी शोभा क
समता नह रखते।’’
िवभीषण ने कहा–‘‘वह सह ख भ वाला रावण का सभाभवन है, जो अपनी
ऊंचाई के कारण कै लास–सा दीख पड़ रहा है। सह महाबली रा स इस सभाभवन क
रात- दन रखवाली करते ह। यह दै य और रा स क वणमयी लंका नाना वैभव से
प रपूण है। धन-धा य, वण-र , सुरा-सु दरी, आन द-िवलास ऐसा पृ वी पर और कह
नह है।’’
अक मात् उसक दृि रावण पर पड़ी, जो वण-कं गूर पर चढ़कर राम-सै य का
िनरी ण कर रहा था। उसने रावण क ओर इं िगत करके कहा-“ यही दुजय रावण
है,िजसके दोन ओर चंवर डु लाए जा रहे ह, िजसके िसर पर िवजय-छ सुशोिभत है।
शरीर पर र च दन का लेप है, जो वणतार-खिचत व ओढ़े जलद के समान दीख रहा
है।’’
िवभीषण के ये वचन सुन सु ीव आ द वानर-नायक कौतूहल से रा सपित को
देखने लगे।
राम ने कहा–‘‘वीरो, शी ही यह रावण ारा पािलत, दुल य लंकापुरी रा स के
िधर से लाल हो जाएगी। आओ, हम उपयु थल पर चलकर सेना को ूह-ब कर।’’
इतना कहकर ी राम सब सेनापितय और यूथपितय सिहत शी ता के साथ
अपने कटक क ओर लौट पड़े।
103. सं ाम

सूय दय के साथ ही रणभेरी का गगनभेदी िननाद करती राम-सै य ने चार ओर


से लंका पर आ मण कर दया। लंका म भी यु के ध से बजने लगे। ची कार करते ए
रा स भट बड़े-बड़े श ले-लेकर कं गूर और बु जय पर चढ़ गए। देखते-ही-देखते वानर
और रा स पर पर हार करने लगे। उनके श पात, क ं ार, ललकार, ची कार से जो
कोलाहल आ, उससे लंका क पौरवधुएं और बालक भयभीत हो भूगभ म जा िछपे। ब त
ी-जन ठौर-ठौर रोने लग । सह वानर साहस कर लंका क खाई पारकर कोट-कं गूर
पर जा चढ़े, िजन पर भयानक बाण और शूल क वषा होने लगी।
अपनी सेना को भलीभांित वि थत कर, वानरराज सु ीव ने अपने सुर
महाबली सुषेण को साथ लेकर एक बार लंका के चार ओर घूमकर सब मोच का िनरी ण
कया। लंका से समु -तट तक वानर-ही-वानर दीख पड़ते थे तथा रा स सब लंका म िघर
गए थे। पर तु वे लय-काल क भांित सब कोट-कं गूर पर घूम रहे थे। चार ओर श -
वषा हो रही थी। देखते-ही-देखते असं य वानर लंका के कं गूरा पर चढ़कर उ ह ढाने तथा
वहां के र क से लोहा लेने लगे। रा स और वानर लड़ते ए पर पर िलपटे ए खाई म
िगरने लगे। लंका के वण ार और गोपुर ढहने लगे। ती गजना करते ए वानर अस
वेग से लंका पर िपल पड़े। सेनापित, वीरबा , सुबा , नल और पनस ने लंका के कोट पर
चढ़ एक बुज अिधकृ त कर िलया। सह वानर फु त से उनके चार ओर एक हो यु
करने लगे। महाबा , सभ और कु मुद भी उनक र ा के िलए उनक पीठ पर प च ं गए।
शतबली ने दि ण ार पर असम िव म दखाया तथा तारा के िपता सुषेण ने पि म ार
पर धसारा कर दया। वह बलपूवक ार भंग कर नगर के म यभाग म जा घुसना चाह रहा
था। उ म ार पर राम-ल मण थे, िजनक पीठ पर सु ीव, िवभीषण, धू डटे थे तथा
गज, गवा , गवय, शरभ और ग धमादन ने अपने-अपने यूथ को ी राम क अंग-र ा म
िनयु कया।
दोन ओर क जय-जयकार शंख और भेरी के तुमुल नाद तथा घायल क ची कार
से कान के पद फटने लगे। दु दुिभयां मेघ-गजन के समान गरजने लग । घोड़ क
िहनिहनाहट, हािथय क चंघाड़, रथ क सह घं टका से पृ वी, आकाश और समु
भी विनत हो उठे । धीरे -धीरे यु घमासान हो चला, जैसे पहले देवासुर सं ाम हो चुका
था। गदा, शि , शूल, परशु हवा म उछलने लगे। प थर, वृ आ द क मारामार चली।
िभि दपाल और शूल क चोट चलने लग । बड़े-बड़े सेनानायक घोड़ और हािथय पर
कवच धारण कए आगे बढ़ने लगे। उ ह ने ार खोल दए और स मुख यु करने लगे।
बराबर के मुख यो ा म रत हो गए। बािल-पु अंगद अिमतिव म इ िजत् से िभड़
गया। जंघ के साथ स पाित, ज बुमाली के साथ हनुमान्, श ु के साथ िवभीषण िभड़
गए। तपन के साथ गज, िनकु भ के साथ नील, घंस के साथ सु ीव और िव पा के साथ
ल मण का होने लगा। अि के तु, रि मके तु, िम और य कोप ने सि मिलत हो ी
राम को घेर िलया। मै द के साथ व मुि , ि िवद के साथ अशिन भ, सुषेण के साथ
िव ु मिण यु करने लगे। इस कार चार ओर महारिथय का ऐसा मचा क भूलोक
थरा गया। इ िजत् ने ु हो अपनी गदा का हार अंगद पर कया। अंगद ने वार बचा
अपनी गदा से एक ही हार से इ िजत् का रथ भंग कर दया और सारथी-सिहत घोड़
को मार डाला। जंघ ने स पाित को बाण से ब ध डाला। इस पर ाकु ल हो स पाित ने
जंघ को हाथ म उठाकर भूिम पर दे मारा। ज बुमाली ने रथ पर आ ढ़ हो हनुमान् पर
शि फक । शि मा ित के व म लगी। मा ित ने बल वेग से रथ पर चढ़ उसे उसी
ण मार डाला। तपन भीषण गजना करता आ नल पर झपटा और उसने बाण के
हार से नल के शरीर को छेद डाला। नल ने त ण उसक आंख फोड़कर उसे अ धा कर
दया। घंस को इसी समय सु ीव ने मार डाला। िव पा और ल मण का तुमुल बाण-
यु आ। अ त म ल मण के बाण से िव हो उसने ाण यागे। अि के तु, रि मके तु,
िम और य कोप ने बाण क मार से ी राम को घेर िलया, पर तु राम ने एक ही वार
म चार अि बाण के हार से उ ह मार डाला। मै द ने व मुि के रथ पर चढ़ उसे मु
ही से मार डाला। िनकु भ ने नील पर सौ बाण क वषा क और हंसने लगा। नील ने
उसका रथ तोड़ सारथी को मार डाला। अशिन भ ने ि िवद को अपने तीखे बाण से वेध
दया। ि िवद ने उसे आटे क भांित गूंध डाला। िव ु माली और सुषेण का भीषण गदायु
एक मु त तक होता रहा। अ त म िव ु माली मुंह से खून थूकता आ भाग खड़ा आ। इस
समय बारह योजन िव तार म लंका के चार ओर घनघोर यु हो रहा था, िजसम शि ,
गदा, तोमर, बाण, ख ग और िशला का खुला योग हो रहा था। मरे ए यो ा ,
घोड़ , हािथय क लोथ र -सागर म तैर रही थ । सूया त हो गया, पर तु दोन ही ओर
के यो ा उसी कार लड़ते रहे। सं ाम-भूिम बीभ स हो उठी।
उस दु पार अ धकार म ोधो म रा स वानर का व चीर-चीर कर वह उ ह
खाने लगे। वानर भी भयंकर कोप कर हािथय , घोड़ , रथ , वजा को िवदीण करने
लगे। इससे लोमहषक समरा गण म र क नदी बह चली। वह राि काल-राि के
समान दुरित मा हो गई। अंगद ने भीम िव म से इ िजत् का रथ तोड़ डाला, घोड़े मार
डाले, सारिथ को भी मार डाला। इस पर मायावी इ िजत् रथ से कू द अंतधान हो गया।
यह देख वानर हष से िच ला उठे । सु ीव ने अंगद को हष-गद्गद हो क ठ से लगा िलया।
पर तु इसी समय अक मात् अदृ य रहकर मायावी मेघनाद ने राम-ल मण को घेरकर
चौमुखी बाण-वषा से उ ह ढांप िलया। दोन राघव द ा से यु करने लगे, पर
इ िजत् अदृ य रहकर बाण-वषा कर रहा था। कसी अ ात दशा से बाण आ-आकर उ ह
ब ध रहे थे। इस कार राम और ल मण का संकट सि कट देख अपने दोन पु सिहत
सुषेण, अंगद, शरभ, मा ित, हनुमान्, ि िवद, मै द, नील और ॠषभ क ध, ये दस
यूथपित दोन भाइय को चार ओर से घेर उनक र ा करने लगे। पर महाबली इ िजत्
ने नौ बाण से नील को, तीन-तीन बाण से मै द और ि िवद को आहत कर दया तथा
परा मी शरभ के दय म एक बाण मारा। वेगवान् हनुमान् को िव कर अ य त परा मी
ॠषभ क ध और सुषेण तथा उनके पु को दो-दो बाण मारे तथा अंगद को अनेक बाण से
छेद डाला। वानर सै य म कोलाहल मच गया। चार ओर से िसमट-िसमटकर वानर वानर-
यूथपितय और राम-ल मण के चार ओर आ जुटे। चार ओर से बाण का च , वषा क
बौछार क तरह वानर भट को ब धने लगा। पर तु बाण कौन कहां से बरसा रहा है, यह
पता नह लगता था। राम ने दस यूथपितय को ललकारकर श ु का पता लगाने का आदेश
दया। पर तु वे सभी समथ यूथपित वानर बाण से िव त-िव त हो झूम-झूमकर पृ वी
पर िगरने लगे। राम-ल मण के भी सव देह म बाण बंध गए। उनके शरीर से झर-झर र
झरने लगा। बाण िनर तर आ-आकर बंध रहे थे। अब चार ओर से नागशर ने राम-
ल मण को फांस िलया। वे अ भुत नागबाण पाश क भांित हर ओर से उ ह जकड़ने लगे।
मा मक आघात से जजर हो, नागपाश से ब , अवश, र और बाण से भरे , दोन राघव
संह भारी-भारी ास लेते ए मू छत हो भूिम पर िगर पड़े।
यह देख िवभीषण सिहत सब वानर हाहाकार करने लगे। राम-ल मण को दस
यूथपितय सिहत मृतक मान, हष म मेघनाद ने जोर से संहगजना क , िजससे रा स
जय-जयकार करने लगे। मेघ के समान गजकर मेघनाद ने अदृ य रहते ए कहा–‘‘ये
महाबली खरदूषण के ह ता दोन मानुष ाता यहां मेरे बाण से मरे पड़े ह।’’ इतना कह,
महाबा राविण अ हास करके हंसने लगा : ‘‘अरे रा स वीरो, देखो-देखो, हमारे श से
शरिव दोन भाई मर गए। अब तुम आन द करो।’’ कू टयो ा राविण से ऐसे वचन सुन
हष म रा स ने महानाद कया। राम मर गया–यह जानकर राविण क रण े म पूजा
क । इ िजत् अ रं दम दोन भाइय को िन: पंद भूिम म पड़ा देख, उ ह मरा समझ हष से
फू ला आ लंका म चला गया। हष लास से लंका झूम उठी। घर-घर बधाइयां बजने लग ।
वीरे क बड़ाई शत-सह मुख से ई। पौरवधु ने उसपर लाजा-िवसजन कया। सूत
बि दय ने िवरद गाई। र े लंकापित ने वीर पु को दय से लगाया, आन दा ु से
उसका िशर िस कया। उस पु से पु वान् होने से अपने को सराहा।
104. हष–िवषाद

शरिव राम-ल मण को िन: प द, िन े , मृतवत् रण-भूिम म िनपितत देख,


वानरे सु ीव भय और शोक से भर गया। दोन नर-शादूल के अ गोपा ग बाण से
िछदे पड़े थे। वे अ य त म द वेग से धीरे -धीरे ास ले रहे थे। वानरे सु ीव को भयभीत,
वा पलोचन, दीन, ोध से ाकु ल देख रा समिण िवभीषण ने कहा–‘‘अलं ासेन सु ीव,
िनगृ तां वा पवेग:, एतौ महाबली महा मानौ मू छतौ िह नाम, मृ युकृतं भयं नाि त, न
कालोऽयं लै मवलि बतुम्। त मात् वारने , आ मानं पयव थापयतु, सवकायिवनाशनं
लै मु सृ य,रामपुरोगाणां च सै यानां िहतमनुिच तय।अथवा र यतां रामो
याव सं ािवपयय:। आ मानमा ासव, वकं बलं चा ासय, अहं च सै यािन सवािण पुन:
सं थापयािम।’’
इस कार सु ीव को आ ासन दे, गदापािण िवभीषण त ु गित से सेना म घूम-
फरकर वानर को बोध देने और वानर-सै य को वि थत करने लगे। वानर के यूथ
चार ओर से आ-आकर राम को घेर उनक य से र ा करने लगे। वे बड़े चौक े हो इधर-
उधर, ऊपर-नीचे बड़ी सावधानी से रा स को जांचने लगे। इसी समय वीयवान
ि थरस व राम क मू छा खुली। उ ह ने पास ही भूिम पर, िन: प द, िन ल, बाणिव ,
र लुत, ल मण को पड़े देखकर कातर होकर कहा–‘‘अब सीता को लेकर और जीिवत
रहकर म या क ं गा! इन ने से म आज अजेय ल मण को इस कार भूिम म सोता देख
रहा !ं म अब माता कौश या, कै के यी और सुिम ा से या क ग ं ा, जो पु -दशन क
लालसा से ही जी रही ह? भरत श ु को ही म या उ र दूग ं ा! अरे , ये तो आ हपूवक मेरे
साथ वन म आए थे। अब इनके िबना म अयो या कै से जा सकता ?ं अरे ल मण तू तो
अवसाद करने पर मुझे आ ासन देता था। आज मुझे आतनाद करता देख बोलता भी नह
है! अरे , जैसे तू मेरे साथ-ही-साथ वन म आया था, अब वैसे ही म तेरे साथ मृ यु क शरण
जाऊंगा। िम सु ीव, तू अंगद और सब सै य को लेकर कि क धा लौट जा। अरे िम , तूने
खूब िम ता िनभाई। िम को जो करना चािहए, वह सब तूने कया। िम का धम तूने पूरा
कर दया। अब मेरी अनुमित से तू सै य-सिहत घर लौट जा!’’
इसी समय िवभीषण सब सै य को वि थत कर वहां लौटे। उ ह ने राम को
शरिव और ल मण को भूलुि ठत देख िथत हो जल हाथ म लेकर उनके ने का माजन
कया। फर शोक से रो पड़े।
इसी समय वल त अि के समान वैनतेयग ड़ वहां प च ं ।े उ ह ने दोन भाइय
को िवश य कया, अगद कया। सुपण वैनतेय के पश करते ही उनके घाव भर गए। राम ने
ल मण को अंक म भर िलया। वानर यूथपितय को भी ग ड़ ने िवश य कया, अगद
कया। राम और ल मण सिहत सब यूथपितय को िवश य, नी ज देख वानर हष-गजना
और जय-जयकार करने लगे। हषा ुपूण लोचन से राघवे िवभीषण और सु ीव से गले
िमले। फर ग ड़देव को अंक म भर कहा–‘‘मायावी इ िजत् ने अदृ य रहकर अपूव
कौशल से हम शरिव कर दया, हम महान् संकट म पड़ गए थे। आपक महती कृ पा से
हम पुनज वन िमला। हमारे ाण आपके कृ त ह।’’ यह कह राघव ने उनका आ लंगन
कया।
ग ड़ ने कहा–‘‘अ छा आ, रावण के मनोरथ पूरे होने से पूव ही म आ प च
ं ा।
अब आपक जय हो रामभ ? म चला।’’
ग ड़ ने राम क दि णा क और चला गया। राम-कटक म इसी ण दु दुिभ बज
उठी। वानर के जयनाद से लंकापित जड़ हो गए।
105. तुमुल यु

रावण ने गजना और दु दुिभ-िननाद सुनकर कहा–‘‘यह या है? यह महानाद तो


मेरे मन म शंका उ प कर रहा है। वैरी राम-ल मण तो दोन ही पु -इ िजत् के
शराघात से मरण-शरण ए थे। फर अब शोक-काल म यह हषनाद कै सा है?’’
इसी समय सं त, दीनमुख, िववण दूत ने आकर िनवेदन कया–‘‘हे र े , वे
मायावी मानव फर से जी उठे ह। वे सब गु मपित भी उठ-उठकर वीरदप से नाद कर रहे
ह। महाराज, वानर के दल-बादल वण-लंका पर आ मण करने के िलए नये उ साह से
ूह-ब हो रहे ह। ग ड़ ने उ ह िवश य कया है, उ ह अगद कया है।’’
र पित रावण दूत से यह सुनकर िच ता और ोध से िववण हो गया। वह
भ दप, िथतेि य अिभभूत-सा हो वणासन पर ब त देर तक िवमूढ़ बैठा रहा। फर
उसने शोक-संत होकर कहा–‘‘यह तो बड़ी ही अ भुत बात है क ु मानव भी महे के
समान यु करते ह। देव, दानव, य , नाग से अव य होने पर भी इस मानव से मुझे भय
उपि थत हो गया है। ऐसा तो कभी सुना ही न था। वे अि के समान देदी यमान बाण अब
थ हो रहे ह। अब तो लंका पर संकट का भय उपि थत हो गया-सा दीख रहा है।’’
रावण के ऐसे कातर वचन सुनकर वीरे ि िशरा ने कहा–‘‘जगदी र, आप तो
ि भुवन के वामी ह। फर य ऐसा िवषाद करते ह? आप िनि त रह, म रणांगण म
जाता ।ं देखूंगा क वह राम कतना बल रखता है।’’
ि िशरा के वचन सुन रावण उद होकर क ं ृ ित करता आ बोला–‘‘जाओ, मेरे
सब श -परा म पु जाएं और उस िभखारी राम को बांधकर मेरे स मुख ले आएं। आज
मेरे रसोइए मेरे िलए उसी वैरी का मांस पकाएं।’’ यह कहकर उसने र ाभरण से पु को
पुर कृ त कया, आशीवाद दया और वे रावण क दि णा कर, अिभवादन कर, रथ म
बैठ रणांगण क ओर चले। मरगे या मारगे, यही उनका दृढ़ िन य था। वानर-सै य भी
ूह-ब स खड़ी थी। आमना-सामना होते ही तुमुल घमासान आर भ हो गया। देखते-
ही देखते भूिम र से भर गई। अभी पूरा सूय दय भी नह आ था।
पहले धू ा अपने सात गु म लेकर समरांगण म उतरा। धू ा अजेय यो ा था।
उसक सेना म मंजे ए सैिनक थे। वे सब प रघ, प श, शूल, द ड, धनुष, बाण, परशु,
शि , मु र, िभि दपाल, पाश लेकर हािथय , रथ पर चढ़, ूह बना, बरसाती नदी क
वेगवती धारा के समान वानरी सै य म घुस गए। सबके बीच म वण-कवच पहने,
मिणमाल क ठ म डाले, अिमतिव म धू ा रथ म बैठकर चला, िजसम छ: अ तरी जुती
थ । दस भारवाही शकट उसके साथ बाण से लदी चल । उसक रथ- वजा पर िग क
मू त बनी थी।
धू ा क िवजयवािहनी को इस कार वेग से आता देख मा ित ने मोचा
संभाला। उ ह ने एक कोण म पीछे हटकर अपने गु म को ूहब कया। धू ा मार
करता आ धंसा ही चला गया। अब अवसर पाकर एक बगल से हनुमान् ने तथा दूसरी ओर
से नील ने उसे धर दबोचा। जैसे सरौते के बीच सुपारी कटकर दो टू क हो जाती है, उसी
कार धू ा का ूह बीच से कट गया। दोन ख ड वानर ने घेर िलए। धू ा तिनक भी
िवचिलत ए िबना िवकट यु करने लगा। उस समरांगण म ऐसा घमासान मचा क श -ु
िम का भी यान न रहा। धू ा ने तीन दन िवकट यु कया। अ त म महावीर मा ित
और धू ा का आ। ब त देर तक दोन वीर ने गदा यु कया। अ त म उनक
गदाएं पर पर टकराकर टू ट ग । तब दोन वीर गुंथ गए। अ त म अवसर पाकर मा ित ने
धू ा का पैर पकड़कर प थर क िशला पर दे मारा, िजससे उसका भेजा फटकर िनकल
गया, िसर चकनाचूर हो गया।
धू ा को मरा देख रा स भयभीत होकर भागने लगे। वानर ने हष से जय-
जयकार कया। अब मायावी व दं दस गु म का अिधनायक आगे बढ़ा। यु ो म
व दं द ा का योग करने लगा, िजससे वानर क सेना ‘ ािह माम्- ािह माम्’
करने लगी। रथ क नेिमका, धनुष क टंकार, भेरी और मृदग ं का तुमुल नाद आकाश म
ाप गया। पाशधारी यम क भांित व दं वानर को काल प दीखने लगा। बड़े-बड़े
धैयवान् वानर उसे देखकर भागने लगे। यह देख अंगद व गजना कर उसके स मुख आए।
दोन वीर म मु त भर शूल, शि , मु र, परशु से आ। उनके चार ओर रा स और
वानर िवकट समर कर रहे थे। अ तत: वजदं अंगद के चंगुल से छू ट, दूर हट गया तथा रथ
पर आ ढ़ हो बाण-वषा करने लगा। उसने तीन दन िनर तर यु कया। अ त म अंगद से
उसका आ।
उसने काकप बाण से अंगद को जजर कर दया। अंगद ने िवषम परा म से गदा
से उसके रथ को तोड़, सारिथ और घोड़ को मार दया। िवरोध होने पर व दं भूिम पर
खड़ा आ। इसी समय अंगद ने उसक छाती म गदा का हार कया। इस पर वह झूमता
और र वमन करता आ अपनी व मुि म गदा िलए ही भूिम पर िगर गया। पर कु छ देर
म उठकर उसने अंगद क छाती पर गदा- हार कया, िजससे अंगद र वमन करने लगा।
फर अंगद के हार से उसक गदा टू ट गई। तब दोन गुंथकर लात–घूंस से लड़ने लगे।
लड़ते–लड़ते दोन ही र -वमन करने लगे। फर दोन ने ढाल-तलवार से अिस-यु कया।
लड़ते-लड़ते थककर वे घुटन के बल बैठ गए। पर दूसरे ही ण अंगद ने उछलकर उसका
िसर काट िलया। वानर हष से िच ला उठे । रा स भयभीत होकर भागने लगे।
व दं क मृ यु से संत देवा क, ि मूधा, महोदर और ि िशरा काल-भैरव क
भांित इ स गु म सेना से आवृ आगे बढ़े। ये सभी रा स राजपु महारथी यो ा थे।
इनके रथ मेघ के समान गजते ए चले। अब ऐसा यु आ क धूल से आ छा दत सं ाम-
भूिम म रथ, वजा-पताका, ढाल-तलवार कु छ भी न दीख पड़ी। अपने-पराए का यान
छोड़ यु म वानर और रा स, जो स मुख पड़ा उसी के ाण लेने लगे। यु भूिम शव से,
टू टे-फू टे रथ से, मरे -अधमरे हािथय घोड़ और यो ा से पट गई। सह भीमकमा
वानर प रघ घुमा-घुमाकर रा स का दलन कर रहे थे। सेनापित ि िशरा म असीम बल
था। वह अ ितहत गित से वानरी सै य को चीरता बढ़ा आ रहा था। बढ़ते ए वह वहां आ
प च ं ा, जहां कु मुद, नल और मै द रा स का दलन कर रहे थे। उसने कहा–‘‘अरे सारिथ,
हमारा रथ तिनक यहां रोक। म पहले इन दुमद वानर का हनन क ं ।’’ इतना कह उसने
इन तीन यूथपितय को बाण से छलनी कर दया। अपने तीन गु मपितय पर संकट देख
हनुमान् क ं ार भरकर आगे बढ़े और उ ह ने ि िशरा के रथ को हठात् रोक व गदा से
त काल ही घोड़ को मार डाला। ि िशरा रथ से कू द पड़ा। दोन वीर म थम गदा-यु ,
फर अिस-यु आ। अ त म ि िशरा त-िव त हो र वमन करता आ भूिम पर िगर
गया। अिमत परा मी हनुम त को वानर ने हष लास से अिभनि दत कया। उसने पांच
दन यु कया।
अब ोधा ध हो दुराधष देवा तक और नरा तक अिच मती नाम क लौह गदा ले
वेग से वानर क सेना म घुस पड़े। उनक गदा क मार से व ाहत शैल क भांित
अनिगनत वानर मर-मरकर भूिम पर िगरने लगे। भय से वानर क आंख फट ग , शरीर
कांपने लगा, साहस टू ट गया। इसी समय देव-दानव-दप-भंजक, महातेज अितकाय सूय के
समान देदी यमान रथ पर चढ़ आगे आया, उसे देखते ही वानर ची कार करके भागने लगे।
इस अितकाय को कालमेघ के समान रथ पर बैठे, गजन करते ए काकु थ राम ने दूर से
देखा। उ ह ने आ य से िवभीषण से पूछा–‘‘कोऽसौ धनु मान् हयशतेन यु े य दने ि थत:
पवतसकाश:?’’
िवभीषण ने कहा–‘‘एषोऽितकायो रावणानुज-सुतः देवदानवदपहा।’’
अितकाय ने वानर से यु नह कया। वह रथ को आगे बढ़ा वहां प च ं ा, जहां
राम-ल मण थे। उसने पुकारकर कहा–‘‘रथि थतोऽहम्, न ाकृ त क न योधयािम।
य याि त शि ददातु मेऽ यु म्!’’
इस पर ु होकर सौिम ल मण तुर त उसके स मुख आ अपना नाम कह धनुष-
टंकार करने लगे। सौिम के धनुष क टंकार सुन उ ह आगे बढ़ते देख, महाबली अितकाय
ने धनुष पर बाण चढ़ाते ए कहा–‘‘रे सौिम े, बाल वमिस, ग छ-ग छ, कं कालसंकाशं
मां योधियतुिम छिस?’’
सौिम ने हंसकर कहा–‘‘आ मानं कमणा सूचय, न िवकि थतुमहिस। यो पौ षेण
यु स तु शूर इित।’’
सौिम के वचन सुन अितकाय ने ु हो ल मण पर आशीिवष बाण क
अिवरल वषा कर उ ह ढांप िलया, पर तु ल मण ने उ ह अधच से काट डाला। अब
अितकाय ने खीझकर पांच बाण एक ही साथ मारे । ल मण ने उ ह काटकर घोर विलत
ा को म पूत कर अितकाय पर छोड़ा । वह महाि -दी महा कालद ड के समान
अितकाय के आयुध को िछ -िभ कर उसके करीटजु िसर म जा लगा, िजससे उसका
िसर िशर ाण-सिहत िहमवंत ृंग क भांित सहसा भूिम पर आ िगरा। दुजय महाकाय को
इस कार िछ म तक भूिम पर िगरते देख, रा स हाहाकार करते चार ओर भाग चले।
उन भागते को उद वीय वानर ने उछल-उछलकर और दबोचकर पीस डाला। जो
जीिवत बच रहे, लंका प च ं र राज के स मुख आ, भूपितत हो दन करने लगे। इस कार
सोलह दन रा स सेनानायक ने घोर यु कया।
106. महातेज कु भकण

जैसे अंशुमाली भुवनभा कर उदयाचल म चढ़ता है, उसी कार महातेज,


जग यी रावण लंका के कोट कं गूर पर चढ़कर, समर- े का िनरी ण करने लगा। उसने
एक िवषादपूण दृि लंका के अप रसं य वण राजमि दर पर डाली, जो अपनी मनोहरता
से मन को मोह लेते थे। पु प-वा टका म कनक िवहार-ह य, कमलालय म सरोवर क
रजत-छटा तथा पुि पत त रािज युवती के यौवन क भांित ने म मद दान देते थे। नगर
क हाट-बाट र से भरी-पूरी थी, जैसे िवधाता ने जगत् क स पदा सुचा वण-लंका के
पदतल म पूजा-िविध से सजाई हो। हाय, आज यह रा सपुरी ीहीन शव क भांित हो
रही है!
उ त, अटल, अचल, ाचीर पर संहिव म भट जो िनभय संह क भांित घूमते
थे, वे अब कहां ह? लंका के संह ार सब ब द ह। उनके आस-पास असं य रथ, गज, अ
और पदाितक क रे ल-पेल हो रही है। दूर तक फै ली ई बालुका म राम-सै य ऐसी दीख
रही है, जैसे आकाश म न । वह देखो, पूव ार पर सं ाम म दु नवार वीर नल, के हरी के
समान सावधान बैठा है। दि ण ार पर हाथी के समान असमबल अंगद और पि म ार
पर मा ित हनुमान् संहनाद कर रहा है और उ र ार पर ीहीन राम–कौमुदीहीन च
के समान–सु ीव, िवभीषण और ल मण के साथ आसीन ह। एक मास से इ ह ने तो मेरी
लंका को ऐसा घेर िलया है, जैसे ाध गहन कानन म संिहनी को जाल म फं सा लेता है।
शृगाल, िग , शकु िन, ान और िपशाच िनभय कोलाहल करते िवचर रहे ह। मृतक क
आंत को ख च–ख चकर पर पर लड़ रहे ह। कोई र पीकर तृ हो रहा है। मरे ए हाथी
कै से भयानक तीत हो रहे ह! कतने रथ, रथी, अ , सादी, िनषादी, शूली चकनाचूर
ख ड-ख ड पड़े ह। टू टे-फू टे िभि दपाल, वम, चम, अिस, धनु, तूण, शर, मु र और परशु
पड़े ह। तेज कर वीर के िशर ाण, मिणमय करीट और कभी उ ह धारण करने वाले िसर
लुढ़क रहे ह। हाय, हाय, जैसे कसान धान काटता है उसी भांित इस िभखारी राम ने मेरा
सब कटक काट डाला है।
उसने आंख उठाकर दूर तक फै ले ए अन त सागर को देखा, सागर म बंधे सेतु को
देखा, िजस पर बली वानर का पहरा था। रावण ने दोन हाथ फै लाकर कहा–‘‘वाह रे ,
जलदलपित, या ही सु दर िवजयमाल तूने क ठ म डाली है। अरे , अधम सागर, आज तू
भी ब धन म पड़ गया! रे जलदलपित, िध ार है तुझे! अब तू न अजय रहा न अलं य। तू
भी इस दाशरिथ राम का त दास हो गया। तूने भी दास व क बेिड़यां पहन ल । अरे
िनल , उठ! इस सेतु को तोड़-फोड़कर इस बल रपु को अतल तल म डु बोकर मेरे दय
क वाला को शा त कर। अरे , तेरे ही बल पर वण-लंका अजेय कहाने का गव करती
थी।’’
वीर दशानन के ऐसे कातर वचन सुनकर मि य ने कहा–‘‘महाराज, अब हम
रा स के र क महातेज कु भकण क सहायता लेनी चािहए। वह हमसे िख और
उदासीन हो अपनी र गुहा म कू ट थ जा बैठे ह। सो यह काल कू ट थ होकर बैठने का नह
है, वीय- दशन करने का है। आज रा स-जाित के स मुख कु ल य का संकट समुपि थत है,
यह जानकर महातेज कु भकण उदासीन नह रह सकते। वे हमसे ु होकर भी र े
िवभीषण क भांित वैरी राम के शरणाप नह ए। इससे उनका हमारे ित ेम और
आपके ित सौहाद कट है। फर वे आपके सहोदर ह। उ ह ने अपने बल ताप से देव-
दै य जय कए ह। कौन ऐसा वीयवान् पु ष संसार म है, जो स मुख समर म महातेज
तप वी कु भकण का सामना कर सके ? महाराज, आप हमारे – सब रा स के वामी ह।
आप जगदी र ह, पृ वीपित ह, महातेज के ये ाता ह। सो मंि य सिहत आप जब
उनके पास प च ं गे, तो उनका ोध िवगिलत हो जाएगा। वे श पािण हो समर-भूिम म
जाएंगे। उनके समरांगण म जाते ही हमारी पराजय जय म बदल जाएगी। उनके महत्
तेजा य हो, हम सब रा स वीर बात क बात म इन ु वानर को काट डालगे। हमारा
तो यही मत है, आगे देव माण ह!’’
मि य के ऐसे, िहतकर, सारग भत, समयोपयोगी वचन सुनकर रावण महातेज
कु भकण के पास जाने को राज़ी हो गया। उसने आ ा दी–‘‘ऐसा ही हो, सब कोई
कु भकण के पास चल। ब मू य उपानय साथ ले लो।’’ सौ वण-कलश सुगि धत म दरा,
सौ मिहष, ब त-से वणखिचत व और मिण ले मिहदेव रावण, भाई कु भकण को मनाने
मि य सिहत उनक र गुहा प च ं ा। भेरी, शंख और मृदग
ं का महानाद सुन कु भकण
र गुहा से बाहर आया। उसने र े क दि णा कर उसका पूजन कया, चरणव दना
क , फर कहा–“ राजन्, कस अिभ ाय से आपने मेरी एका त शाि त भंग क ? ऐसा या
िवषम संकट आप पर आया? आप तो वयं जग यी, सव र ह, मुझ म दकाम से आपका
या योजन है?’’
रावण ने भाई का आ लंगन कया, फर लि त-सा होकर कहा–‘‘ ाता, यह
कु ल य का संकटकाल र जाित पर आ उपि थत आ है। सीताहरण से संत राम ने सब
मुख रा स धनुधर को मार डाला है। एक मास से वह इस कार र कु ल को भ म कर
रहा है जैसे दावानल वन को भ म करता है। अब यह तेरे ु होने का काल नह है वीर। तू
ही र कु ल का र क और मेरी दि ण भुजा है। तेरे ही बल से म जग यी कहाता ।ं तेरे
बल से म लंका पर अबाध शासन करता ।ं कु ल ोही िवभीषण ने वैरी का आ य ले
र कु ल को कलुिषत कया। अब तू स हो, महातेज कु भकण, रा स क डू बती नैया को
उबार ले। उस िभखारी दाशरिथ से लंका को महाभय उ प हो गया है। हे वीरबा , अब तू
ही उस भय से लंका क र ा कर सकता है।’’
र पित जग यी रावण से ऐसे कातर वचन सुन महातेज कु भकण शोक और
ोध से अिभभूत हो अ ुपू रत नयन से हततेज र े को देख दु:खी होता आ
बोला–‘‘राजन्, मने तो पहले ही आपसे िनवेदन कया था क श ु-प ी सीता को लौटा द।
एक ी के िलए रा स के कु ल को संकट म मत डाल। पर उस समय आपने अपने
िहतैिषय क बात पर कान नह दया। आपने परम धम आ ाकारी िवभीषण को
अपमािनत कर श ु क गोद म धके ल दया और मेरी भी अवमानना क । आज उसी का
दु प रणाम आपके सामने आ रहा है। अपने िहत क बात न मानकर अपने बल के घम ड
पर आपने यह कु कम कर डाला, जो आप जैसे तापी जग यी के िलए अशोभनीय था।
आप महा , सब शा के ाता, वेदोपदे ा जगदी र ह, पर आपने प रणाम पर िवचार
ही नह कया। महाराज, जो काम देश-काल के िवपरीत कए जाते ह उनसे तो दु:ख होता
ही है। जो राजा नीितशा के िवपरीत आचरण करता तथा अपने मि य क शुभ
स मित क अवहेलना करता है, वह सदा ऐसे ही दु:ख भोगता है। पर तु जो राजा मि य
क उिचत राय को वीकार कर लेता है तथा अपने सु न को ठीक-ठीक पहचानता है,
वह कत ाकत का ठीक-ठीक िनणय कर सकता है। नीितिनपुण पु ष धम, अथ, काम
इन तीन का यथासमय उपभोग करता है। जो नृपित अपने बुि मान् िहतैषी मि य से
परामश करके समयानुसार साम, दाम, द ड, भेद और परा म इन पांच कार के योग का,
नीित-अनीित का, धम, अथ, काम का यथावत् सेवन करता है, उसे कभी भी ऐसे संकट का
सामना नह करना पड़ता। इसिलए राजा को तो अथशा ी म ी क स मित पर ही
चलना चािहए, पर तु जो म ी अिहत क बात को िहत का प देकर कहते ह, वे िन य
ही आपके और समूची र जाित के श ु ह। खेद है क लंका म ऐसे ही मि य क धानता
है। यही देख मने राजसभा से कनारा कया। अब मुझसे आपका या योजन है?’’
भाई कु भकण के ऐसे नीित वा य सुन रावण चुपचाप पृ वी क ओर देखता रहा।
उसके मुंह से एक श द भी नह िनकला। कु भकण ने फर कहना आर भ
कया–‘‘महाराज, जो राजा अपनी चंचल बुि के कारण िहतैषी पु ष को नह पहचानते,
वही राजा श ु के अधीन होते ह और जो राजा श ु क उपे ा कर अपनी र ा का
ब ध नह करते, वे ही िवपि म पड़ते ह। आपक राजमिहषी भगवती म दोदरी ने भी
यही उिचत राय दी थी। भाई िवभीषण ने भी यही कहा था और मेरी स मित भी उ ह के
अनुकूल थी, पर आपने कु छ भी िवचार नह कया। अपने हठ पर अड़े रहना ही आपने ठीक
समझा।
‘‘मिहदेव, सोिचए तो, कहां आपक कनक लंका और कहां अयो यापुरी! किहए
भाई, कस लोभ और कस कारण राम यहां आया है? मने तो सुना है–यह ु नर सरयू-
तीर बसता था, पर या वह आपका वण- संहासन पाने के िलए यहां आकर यु कर रहा
है? हे वीर, उसे आप श ु कहते ह, पर िवचार तो क िजए, इस काल प समराि को
कसने लंका म विलत कया है, र े , आप तो वयं ही अपने कम-दोष से लंका को
डु बोकर वयं भी डू ब रहे ह।’’
रावण ने िख -मन होकर कहा–‘‘कु भकण, तू मेरा इस कार ितर कार य
करता है? भा यदोष से दोषी क िन दा कोई नह करता।’’ इतना कह रावण शोक-िनम
हो बैठ गया।
यह देख कु भकण ने खड़े हो ऊ वबा होकर कहा–‘‘अथवा इन बात से अब
या? म र े का अनुगत ।ं अ भु ,ं आि त ।ं लंका का संकट मेरा भी संकट है।
रा स का य मेरा भी य है। म जग यी र े का सहोदर ।ं जो आपका श ु है, मेरा
भी है। म जब तक जीिवत ,ं र े को या िच ता है! म पृ वी के कसी वीर क आन नह
मानता। अब आप अपने भवन म िनि त आन द क िजए। म समरांगण म जाता ।ं म
आज ही राम-ल मण सिहत स पूण वानर सेना को रण म जय करके ही र े का मुख
देखूंगा। वानर के र -मांस से रा स का तपण करके राम-ल मण का गम र वयं पान
क ं , तभी म महातेज कु भकण, िव वा का पु कहाऊं। हे रा से , अब स ताप छोड़ द,
रोष को याग द, व थ ह , म आपका सब ताप ह ं गा। आपके वैरी का समूल नाश कर
डालूंगा। जो िहत वचन मने कहे, वे तो ब धु-भाव से, ातृ ेह से कहे थे। अब आप शी
श ु का दन सुनगे। राम-ल मण को अब मरा ही समिझए। राम, ल मण, सु ीव और
हनुमान् को तो म भ ण ही क ं गा।’’
इतना कह महातेज, अिमतिव म कु भकण ने र े क दि णा क और िसर
नवाकर णाम कया। रावण ने आ लंगन कर रिथ े , यम, व ण से भी अव य महाबल
कु भकण को अ , गज, रथ तथा महारथ के सह गु म दए।
िवजय क दु दुिभ और भेरीनाद से दशा को कि पत करता आ अजेय
िग रकू ट के समान महाकाय कु भकण समरांगण म िव आ।
107. जगदी र का वैक य

पृ वी पर अतुलनीय, फ टक िथत, र ज टत सभा म, जहां रं ग-िबरं गे र -


त भ पर सुनहरी छत–जैसे फणी के असं य फणा पर भूभार। मोती, प ा और हीरक
क िझलिमल झालर के चंदोव के नीचे हेमकू ट पर शृंग-समान काि तम त मिहदेव रावण
वण- संहासन पर बैठा। चार ओर ब धु-म ी, सेनापित, सभासद्। ब दनवार म गुंथे
ताजे पु प, प लव, च पा, चमेली, मौल ी, जहां क दीि नयन म चकाच ध करती थी।
चा लोचना कं करी भुज मृणाल से चंवर िहलाती-डु लाती। छ धर छ िलए स काम-
प, अनु प, मनहर–शूलपािण के अनु प शूल-ह त ारपाल ार पर स ।
शीतल, म द, सुग ध, कोमल सामु समीर िवहंग के कू िजत कलरव को वहन
करती, ाण को तृ करती वािहत।
जग यी मिहदेव लंकापित अधोमुख, भ मन, शोकसंत , मूक–मौन! अज
अ ुधारा से बुझे ए। योित वाल नयन के वल त अि - फु लंग शरिव मेघ से झर-
झर झरती जलिब दु धार-सी अ ुधार।
भूलुि ठत समरदूत, र लुत। त-िव त, भ ाण, हतजीवन, हतौज, खिलत-
वचन, ग द-वा य, जड़-कि पत, दीन पंकिल ।
‘‘कह रे कह, वीरपुंगव कु भकण के िनधन का समाचार कह!’’
‘‘महाराज, रा स म े कु भकण के साथ सह यो ा आज समर-सागर म
िवलीन हो गए। उस सव ासी काल प राम ने सबको स िलया।
‘‘तो महातेज मृ युंजय कु भकण अब पृ वी पर नह रहे? अरे , िजसके भुजबल से
देवता और दै य भी संतािपत रहते थो, उसे उस िभखारी राम ने स मुख समर म मार
डाला? तेरी यह बात तो व वत् है। भा य ने शाल को फू ल क पंखुड़ी से काट डाला। हा
वीर-चूड़ामिण, हा भाई कु भकण, कस पाप के फल व प आज मने तुझे खो दया? अरे
मेरा दि ण बा ही टू ट गया। कै से म यह शोक सहन क ं गा? यह दुर त श ु तो इस कार
तापी र कु ल का नाश कर रहा है, जैसे लकड़हारा एक-एक शाखा को काटकर सारे वृ
को समूल ही न कर रहा हो। हाय, अब कौन मेरे िवपुल कु ल को बचाएगा? अरे सविजत्,
अिमत-िव म, रा स-कु ल-र क कु भकण या सचमुच ही काल-कविलत हो गए? यह तो
अनहोनी-सी बात है। अरी अभािगनी सूपनखा, कस कु ण म तूने पंचवटी म इस काल-
सप को छेड़ा था। अरी, म तो तेरे ही दु:ख से संत हो इस दाहक अि -िशखा, जान क
गाहक को हेम गृह म लाया था। हाय-हाय कु सुम-गुि फता, दीपाविल-उ विलता मेरी यह
अि तीय वणलंका तो जैसे मशान हो गई, सुनसान हो गई। अब वीर क वािहनी यहां
कहां चलती ह। अरे , को कलक ठी र कशो रयां वीणा, मुरज, मुरली बजाकर लंका के
रमणीय उ ान म नृ य य नह करत ? लंका क वधुएं मधुर गान के थान पर दन
य कर रही ह? हा, मेरे ही पाप से!’’ इतना कह रावण ने दोन हाथ से अपनी छाती पीट
ली।
लंकापित के ये शोक-िवद ध उ ार सुन और र े को शोकािभभूत देख म ी
सारण ने ब ांजिल कहा–‘‘हे देव, दै य, नर और नागपूिजत जग यी महाराज, दास का
अिवनय मा हो। आप सा ात् जगदी र ह, महा ानी ह। आपको समझा सके , ऐसा जगत्
म कौन है? महाराज, य द व पात से िहमिशखर खि डत हो जाए, तो या उसक पीड़ा से
िहमशैल कह अधीर होता है? इस भवम डल म सुख-दुःख ाणी को पश करता ही है।
पर तु अ ानी ही इससे मोिहत होते ह।’’ रावण ने शोकसंत ने से म ी क ओर
देखकर कहा–‘‘सब जानता ,ं पर मेरा दय हाहाकार कर रहा है।’’ फर दूत क ओर
देखकर कहा–‘‘अरे , िव तार से कह। कै से मेरे वीर अजेय ाता का उस दाशरिथ ने हनन
कया?’’
‘‘महाराज, म वह अबूझ कहानी कै से क !ं जब मतवाले हाथी क भांित धनुधर ने
श -ु दल म वेश कया, तब उसक क ं ृ ित से श ु थर-थर कांपने लगे। व ाि क भांित
उनके धनुष क टंकार सुनकर श ु भागने लगे। हे महाराज, उस समय वीरे के गजयूथ
और हाथी दल के पदाघात से जो घनाकार धूल उड़ी, उससे आकाश आ छा दत् हो गया
और देखते-ही-देखते वीरवर ने बाण से समरांगण को छा दया। वषा क बौछार के समान
बाण ने छू ट-छू टकर काल-सप क भांित सह वानर को स िलया। महाराज, महातेज
महाराज कु भकण ने अपने चरण के आघात से पृ वी को कं पायमान करते ए समरांगण
म धनुष लेकर सात दन िवचरण कया तो वानरदल हाहाकार कर भाग चले।
‘‘यम और व ण से भी अव य महाबल कु भकण को इस कार अचल, अटल देख
सातव दन अंगद ने सेना-नेतृ व ले सेना को धैय दया। समा त कया। तब शत-सह
वानर-यूथ िविवध श ा ले कु भकण पर िपल पड़े। पर तु दुमद कु भकण ने उन सह
वानर को इस कार मसल दया, जैसे हाथी फू ल को कु चल डालता है। उनम से ब त को
समु म फक दया, ब त को आकाश म उछाल दया। ब त के ख ड-ख ड कर डाले,
ब त का दय िवदीण कर उनका र पान कया। वानर ाण ले भाग खड़े ए। वानर
का ऐसा भयानक य देख ोभ से हत भ हो वानरे अंगद ने ललकारा–‘‘अरे ठहरो,
ठहरो! भागते य हो? चलो, आज या तो समर म श ु का हनन करगे या वयं ु ाण
को याग वगारोहण करगे। भय करने से या!’’
‘‘अंगद के ऐसे वचन सुन, मरने क ठान, जीवन क आशा छोड़ वानर के यूथ ने
फर महातेज को घेर िलया। पर तु महाराज कु भकण ने सभी को मसल डाला और बल-
परा म अंगद के व म शूल का हार कया, िजससे अंगद मू छत हो भूिम पर िगर गया।
यह देख वानरे सु ीव ने भीमिव म से रथी को आ ा त कया। मु त-भर दोन का
परम ोभकारी यु आ। सु ीव र से लथपथ हो भूिम पर िगर गया। इसी समय
दाशरिथ ल मण ने घोर रौ ा वीरवर पर योग कया। उस अ से िव होकर यह
र िशरोमिण राम के स मुख दौड़ा। अब महाबली ल मण ने फु त से अनेक बाण से उसके
दय को छेद दया। वे बाण इस कार र े के व म घुस गए, जैसे सप बांबी म घुस
जाता है। वीरे के हाथ से गदा िखसक गई, शरीर से इस कार िधर चूने लगा जैसे पवत
से गे झरता है। तब वीरवर ने अ तक के समान ल मण पर सह भार का शूल फका। पर
ल मण ने उसे माग म ही काट डाला। यह देख कु भकण ध य-ध य कहकर बोला–‘‘अरे
रामानुज, तेरा परा म तु य है। पर म अभी दाशरिथ राम से यु चाहता ।ं ’’
‘‘वीरे के ये वचन सुन राम ने कालबाण हाथ म लेकर यु े म वेश कया।
हाय, अब आगे या क ?ं ’’
‘‘कह-कह, म सुन रहा ,ं तू वैरी राम का परा म बखान कर।’’
‘‘कै से क ?ं य ही राम ने अपना कु ल-गो कहकर धनुष-टंकार क और वीरे ने
लाल-लाल आंख कर, काल क भांित छलांग मारी, य ही उस वैरी राम ने बाण से वीरे
को ढांप िलया। दाशरिथ का ह तलाघव देख र े िवि मत हो गया। तिव त हो,
वानर को मारकर वह भ ण करने लगा। इस बीभ स- वहार से सं त हो वानर ‘ ािह
माम्, ािह माम्’ करने और भागने लगे। फर तो ऐसा यु आ क देव-दै य ति भत हो
गए। अब राम-ल मण ने फु त से शत-सह बाण से महातेज के दोन हाथ काट डाले। तब
वेदना और क से मुंह फै लाकर कु भकण दोन को खाने दौड़ा। इस पर ल मण ने उसका
मुंह बाण से भर दया। पैर भी काट डाले। इसी समय दाशरिथ ने ा धनुष पर
रखकर फका िजससे रथी का िसर कटकर चार धनुष दूर पृ वी पर जा िगरा। इसके बाद
मु त-भर कबंध ने यु कया। अ त म समरांगण म उसका भूपात आ। हे रा स-कु लपित,
र े , महातेज कु भकण के साथ सभी रा स-ितल-ितल करके कट मरे । भा यदोष से
अके ला म ही वामी को यह दा ण संदश े देने को जीिवत बच गया ।ं म महातेज मृ युंजय
महाराज कु भकण को असं य यो ा के साथ शर-श या पर सोता छोड़ यहां आया ।ं हे
महाराज, मेरा वध कराइए।’’
रावण ने गहरी सांस ख चकर कहा–‘‘ध य है वीरधारी लंका! हे वीर ाता, आज
तू िजस वीर-श या पर सो रहा है, उस पर सोने क कौन महाभाग इ छा न करे गा! क तु
हे वीरे , तेरे िबना म जीिवत कै से र गं ा? अरे वीर, एक बार उठकर श ुदल को अतल
जल म डु बा दे। देखो, यह वीरधा ी कनकपुरी वीरशू य हो गई, जैसे ी म म वन पित
पु पशू य और नदी जलरिहत हो जाती है।’’
कु छ देर आंसू बहाकर रावण ने फणी क भांित सांस भरते ए कहा–‘‘हे ाता,
तेरे परा म से मेरा वंश उ वल हो गया। अब इस काल-समर म म कसे भेजूं? कौन
रा स-कु ल का मान रखेगा? अब म ही जाऊंगा। अरे ! लंका के िवभूषण , आओ, यु -साज
सज लो। देखूंगा उस राघव को, उसम कतना बल-वैभव है। अब पृ वी रावण या राम से
रिहत होने वाली है। उठो रे रा स वीरो, उठो, देव-दै य िवजेताओ, उठो! जग यी
रा सकु मारो, आज म काल का सा मु य क ं गा।’’ इतना कहकर रावण ने वण संहासन
याग दया।
मेघ-गजन क भांित दु दुिभ बज उठी, िजसके भैरव रव से देव, दानव, नर, नाग
त हो गए। यो ा अंग पर श धारण करने लगे। व ीव घोड़े अ शाला से िनकलने
पर िहनिहनाने लगे। सुनहरी छ से सुशोिभत सह रथ घं टय क झंकार करते ए बढ़
चले। वीर िसर पर लौहावरण पहन, बड़ी-बड़ी अमोघ ढाल हाथ म िलए, सुनहरी यान
वाली तलवार कमर म बांध, शरीर को लौहकवच से आवृ कर ेणीब होने लगे। हाथ
म अंकुश िलए, भीमकाय मदम हािथय को वश म करते ए महावत सा ात् व पािण
इ क भांित तीत होने लगे। बड़े-बड़े डील के सुभट अपना िवकराल परशु क धे पर
उठाए, मृ यु को चुनौती देते-से आगे आए। रणवा के ग भीर िननाद से लंका िहल उठी।
अ - ूह उ लास से िहनिहनाने तथा गजसमूह चंघाड़ने लगा। शंख का भैरवनाद, धनुष
क कणकटु टंकार, तलवार क झनझनाहट ने कान को बहरा कर दया। वीर के पद-भार
से कनक-लंका धरती म धंसने लगी।
108. रथी का अिभगमन

अ त:पुर म जाकर लंके र ने देखा क राजमिहषी म दोदरी का के शपाश


िवशृंखल है। उसक भूषणिवहीन देह ी ऐसी हो गई है, जैसे पाला िगरने से लता
कु सुमहीन हो जाती है। उसके अ ुमय ने , िशिशर क रात म जैसे प पण होता है, वैसे हो
गए ह। शोक पी आंधी म जैसे उसके िन: ास लय-वायु से ज द-ज द िनकल रहे ह।
कं करी ने -नीर म भीगी त ह त म क ठनता से चवर वहन कर रही है।
श यागत होने पर भी मिहदेव ने िवलास नह कया, पान नह कया, नृ य म
अिभ िच कट नह क , के वल फणी क भांित गहरे -गहरे िन: ास लेता छटपटाता
रहा। तब र राजमिहषी म दोदरी ने अ ुपू रत ने से र े को देखकर कहा–‘‘हे
लंकानाथा, अब इस भांित शोकद ध होने से या होगा? हाय देखो तो, इस मिणमहालय म
कै सा िवषाद छाया है! एक-एक करके लंका वीरशू य हो गई। अब इस कालसमर म वयं
र े इस अभािगनी दासी को असहाय छोड़कर जा रहे ह। हाय, इस दुभा या सीता ने
अपने अ -ु सागर म देवदुलभ मिणमहालय सिहत र या वणपुरी को भी डु बो दया।
सुवािसत म क धारा के थान पर अब तो मिणमहालय म अ ुधार ही दीख पड़ती है।
आन द, उ लास के थान पर मिहदेव फणी क भांित दीघ ास ले रहे ह, िजनके भय से
देव, दै य, नाग, य थर-थर कांपते थे, वे जग यी वीर श या पर वैक य से पीिड़त ह।’’
रावण ने कहा–‘‘देिव, यह िनयित-िनयत भा य क रे खा है, इसे कौन िमटा सकता
है! अब तो कल का सूय देखेगा क पृ वी राम या रावण रिहत होने वाली है। अब तुम मेरा
लयंकर यु देखना!” इतना कह रावण गहरे -गहरे ास लेने लगा।
मिहषी ने पित को अपने कोमल अंग म भर िलया। उनके िसर को अ ुजलिस
कर उसने कहा–‘‘हे जगदी र, अब आप तिनक िन ाधीन ह , मन को शा त कर, अधीर न
ह , श ु का िवनाश तो कल होगा। यह राि तो आप सुख से तीत क िजए।’’
राजमिहषी के य से महाशोक रावण िन ागत आ। तब मिहषी ने मेघनाद क
धा ी भाषा को बुलाकर कहा–‘‘हे चतुरे, तू अभी जा, वीरबा पु मेघनाद से कह–
मृ यु य महातेज कु भकण को काल-समर ने स िलया, लंका वीरशू य हो गई। अब
शोकसंत मिहदेव जगदी र वयं यु साज सज रहे ह। पु िपता के िलए अपना धम
िनवाह करे , इसका यही समय है।’’
कामचा रणी भाषा तुर त मद वन क ओर चल दी, जहां रथी इ िजत्
आन द से सुरा-सु द रय का उपभोग कर रहा था। मद वन क शोभा इ क अमरावती
से भी अिधक थी। वण-महल फू ल और र से सजे थे। वहां क त भाविल र ज टत
हेममय थी। वहां र य कु सुम-वनरािज िवकिसत थी। कोयल क कु , भौर क गुंजार, िखले
ए पु प के सौरभ, प के मर्-मर् श द, शीतल-सुरिभत वायु, झरन का झर-झर श द,
उनक दूध-सी िहमधौत फे नरािश, सबने िमलकर वहां क सुषमा को अव य कर दया था।
भाषा ने जाकर देखा, मद वन के वण ार पर हाथ म धनुष-बाण िलए वामाएं
िनभय घूम रही ह। उनके तरकश के शर मिणमय फिणय के समान शोिभत ह। उ त कु च
पर कसे ए वण-कवच ऐसे लग रहे थे, जैसे वण-कमल को बाल रिव ने करण से
आ छा दत कर िलया हो। उनके ती ण कटा तो उनके बाण से भी तीखे थे। अपने यौवन
म म हिथनी-सी वे फर रही थ । उनके भारी िनत ब म वण-करधनी कं किणत हो
नूपुर क गूंज को ि गुिणत कर रही थी। मद वन के संगीत क तरं ग से वातावरण
मुख रत हो रहा था। रथी इ िजत् वहां वारांगना-कु ल के साथ व छ द लीला-िवलास
कर रहा था। लंका पर लय मेघ छा रहे ह, इस बात से वह सवथा अप रिचत था।
दानवनि दनी सुलोचना िमला ने ह रत मिणपा म लाल-लाल म दरा भरकर ि यतम
मेघनाद को देते ए कहा–‘‘िपयो वीर वामी, इस मधु के साथ इस िचर कं करी का िचर
ेम भी पान करो।’’
मेघनाद ने एक हाथ म पा िलया, दूसरी भुजा ि यतमा के क ठ म डालकर
बोला–‘‘वाह, आज तो जीवन भी इस म क भांित उ माददाता हो रहा है। यह पृ वी
कतनी सु दर है ि ये!”
‘‘के वल वीर पु ष के िलए वामी! कृ िम-क ट क भांित जीिवत रहने वाल के
िलए यही धराधाम नरक-तु य है।’’
‘‘अधम कायर क ट क बात या! आओ, हम लोग एक-एक पा इस सुवािसत
म का और पीकर इस सुरिभत वास ती वायु क भांित झूम।’’
‘‘िपयो, वीर वामी।’’
सुलोचना ने पा भरा। इसी समय धा ी भाषा ने वहां वेश कया।
वीरे धा ी भाषा को देखते ही मिणपीठ से उठ खड़ा आ। उसने धा ी के
चरण म णाम कर कहा–‘‘मात:, आज इस असमय म तू कस अिभ ाय से इस भवन म
आई है? लंका म कु शल तो है?’’
धा ी ने मेघनाद का िसर सूंघकर ने से अ ु िवस जत करते ए कहा, ‘‘पु ,
लंका म कु शल कहां? लंका के र क कु भकण सिहत सब सुभट समरांगण म उस दुजय राम
के बाण के भोग हो गए। अब तो लंका वीरशू या हो गई। देवजयी वीरबा भी मारा गया
और अब जगदी र र े वयं ही रण-साज सज, उस महाकाल के स मुख समरांगण म
जा रहे ह। मिहषी ने कहलाया है–िपता के िलए पु के कत -पालन का यही काल है।’’
धा ी क बात सुनकर मेघनाद ने कहा–‘‘यह कै सी बात? भगवित, कसने
महातेज, अिमतिव म कु भकण का वध कया? कसने मेरे अजेय चाचा वीरबा का हनन
कया? या उस राम ने ही? मने तो उसे उस दन च ड यु म मार डाला था। लंका को
अपनी ओर से िन कं टक करके ही म यहां आया था। यह तू या अ भुत-अनहोनी बात कह
रही है जननी! मुझ दास से स य बात प कह!’’
भाषा ने कहा–‘‘अरे पु , वह राम तो मायावी मानव है। वह तो मरकर भी जी
उठा और एक-एक ास से इस कार लंका के वीर को स िलया है, जैसे दावानल वन को
स लेता है। अब यह लंका वीर क क ं ार से भरी वीरधा ी नह है, अब तो मशान भूिम
हो रही है। अब यहां को कलक ठी द बाला क मधुर-तान सुनाई नह देती। अब तो
स : िवधवा के नयन-नीर लंका के राजपथ पर बह रहे ह। हे वीर चूड़ामिण, अब तू
कमर कस और जगदी र का संकट टाल। उस दुरा मा राम को भाई सिहत मारकर लंका के
अकं टक रा य को पुनज िवत कर!’’
धाय के वचन सुन ोध म भरकर इ िजत् मेघनाद ने अपने क ठ म पड़ी कु सुम-
माला को तोड़कर फक दया। कान से हीरक-कु डल ख च पद तल म र द डाले। मिणमय
पान-पा दूर फक दए। उसने संह-िव म से कहा–‘‘िध ार है मुझ!े वैरी ने वण-लंका को
आ ा त कया है और म यहां रमणी-दल म िवहार कर रहा ?ं ’’ उसने गरजकर
कहा–‘‘लाओ मेरा रथ, मेरे श और कवच! म अभी रपुदल का संहार क ं गा।’’
रथी ने त ण ही वीराभरण सजा। रथच िव ुत्-छटा दखाने लगा।अब
सु द रय म मूध या सुलोचना िमला ने अपने को उसके व पर डालकर कहा–‘‘हे
वीरमिण, तुम मुझ दासी को यहां खि डत कर कहां चले? अरे , तु हारे िवयोग म म एक
ण भी नह जी सकती। हे ाणे र, कस अपराध पर तुम आज मुझ कं करी को याग रहे
हो?’’
मेघनाद ने हंसते ए कहा–‘‘ि य, तूने िजस ेह-ब धन म मेघनाद को बांध रखा
है, उससे मु होने क साम य भला मुझ दास म कहां है! अरी सुभगे, तू िच ता न कर। म
उस िभखारी राम का ाता-सिहत समर म नाशकर शी ही लौट आऊंगा। अब तू मुझे
जाने दे।’’
इतना कह, बलपूवक ेममयी िमला के आ लंगन से छू ट रथी रथ पर चढ़ गया।
रथ घोर रव से इस कार चला, जैसे मैनाक शैल पंख फै लाकर उड़ चला हो। सुलोचना
िमला िछ लता-सी भूिम पर िगर गई।
109. मेघनाद अिभषेक

रथी मेघनाद के अिवरत धनुष-टंकार से लंका कांप उठी। समु उथल-पुथल हो


गया। र े रण-साज सज रहा था। रण-वा बज रहे थे। हाथी चंघाड़ रहे थे, घोड़े
िहनिहना रहे थे। रथी लौहवम पहने क ं ार भर रहे थे। रथ पर रं ग-िबरं गी वजाएं उड़
रही थ । रथ त ु गित से इधर से उधर जा रहे थे क मेघनाद िसर पर कनकटोप पहने,
िवकराल खा ग-शूल धारण कए, पीठ पर अभे ढाल िलए ु गित से वहां जा प च ं ा।
रा स दल म जय-जयकार होने लगा। रथी ने जगदी र के चरण म सा ांग द डवत्
कया। रावण ने पु को उठाकर छाती से लगाया। वीरे ने कहा, ‘‘िपता, यह या? मने
सुना है, मायावी राम मर कर भी जी उठा। यह तो अ भुत बात है! अब आप मुझे अनुमित
दीिजए क उस पितत को शरानल से भ म कर, भ म को वायु म उड़ा दूं या उसे बांधकर
आपके पाद-प म अ पत क ं ?’’
र े ने पु का बार बार आ लंगन करके कहा–‘‘अरे पु , अब तू ही तो र कु ल
का एकमा आधार बच रहा है। इस काल-समर म तुझे कै से भेज दू?ं अरे , भा य मेरे
ितकू ल है। भला कसी ने सुना था क जल म िशला तैरती है, मनु य मरकर भी जी उठता
है?’’
‘‘राजे र, राम तो एक तु छ नर है। आप उससे भयभीत य ह? मुझ दास के
रहते आप समरांगण म जाएं, भला यह कभी संभव हो सकता है! हे िपता, यह सुनकर
देवे हमारा उपहास करे गा। पृ वी के वीर हंसगे। मने तो राम को परा त कर छोड़ दया।
अब आप एक बार मुझे और आ ा दीिजए। म देखूं, इस बार वह कै से मेरे हाथ से बचता
है।’’
‘‘अरे पु , मने महातेज, अिमतिव म कु भकण को यु ाथ भेजा था। देख, उसका
िनज व शरीर िस धु-तीर पर पड़ा है, जैसे व ाघात से िग र- ृंग खि डत हो गया हो। फर
भी पु , समय ही जब उपि थत है तो तू जा! म तुझे स पूण रा स चमू का सेनापित
िनयु कर रहा ।ं ’’
इतना कह रा स-राज ने समु -जल ले यथािविध पु का अिभषेक कर दया।
ब दीजन गुणगान करने लगे। वीणा बजने लगी। रा सपुरी म आन द और उ साह क लहर
ा हो गई।
रावण ने भुजा ऊंची कर कहा–“राज-सु दरी लंके, शोक दूर कर? देख रा स-कु ल-
सूय उदय आ है। दु:ख-राि बीत रही है। सु भात होनेवाला है। वीरे के कोद ड टंकार
से सुरपित कांप रहा है। उसके तूणीर म पाशुपत महा भरे ह। ि ये म दोदरी, देखो-देखो
यह कौतूहल। अ र दम इ िजत् यु -साज सज रहा है। अब रा स-कु ल-कलंक िवभीषण,
द डकार य का वह िन कािसत मानव राम और तु छ वानर जीिवत न रहगे। अरे , बाजे
बजाओ, उ साह मनाओ और जय-जयकार करो!’’
कनक लंका एक बार फर वा क विन और जय-जयकार से प रपूण हो उठी।
110. देवे का औ सु य

आठ दन से इ िजत् मेघनाद का राम से घोर सं ाम चल रहा था।


देवे पुर दर अ य त औ सु य से राविण और राम के यु के प रणाम को देख
रहे थे। जब तक रावण और राविण मेघनाद जीिवत ह, तब तक देवे देवलोक म स प
नह है। उसे वह ण खल रहा था, जब लंका म बारह आ द य के ितिनिधय और पृ वी
के सब देव, दै य, नाग, असुर जन के स मुख देवराट् इ ने ब दी दशा म स समु ,
स ीथ , स महाकू प का जल मिणकलश म भर मेघनाद के मूधा पर अिभषेक कया और
स ीपपितय ने उसके पीछे खड़े होकर उसके म तक पर छ लगाया था। नृवंश के सात
सौ नरपितय ने अितरथी मेघनाद के रथ के अ क व गु पकड़ उसका रथ हांका था।
लोक-लोक के आगत-समागत, ल -ल नृवंश के ितिनिधय ने मिहदेव, स ीप-पित
सवजयी रावण और इ दमन करने वाले अितरथी मेघनाद मृ युङजय का जय-घोष कया
था। उस जयघोष से पृ वी क दशाएं कि पत हो गई थ । भूलोक चलायमान हो गया था।
ये सारी ही बात देवे पुर दर भूला न था। सब दृ य उसक आंख म शूल के
समान चुभ रहे थे। इस दुर त राविण के रहते देवलोक के सा ा य ही क नह , देव-सं कृ ित
क भी कु शल न थी। अब राम ही पर उसक आशा के ि त थी। संयोग ऐसा आ लगा क
राम ने कटक ले समु -ब धन कर असा य साधन कर िलया और लंका क सारी समृि ी
को ीहत कर दया। महातेज कु भकणसिहत रावण के पु -प रजन-प रवार को मार
डाला तो अब उसे आशा क कोर दखाई देने लगी थी। पर वह यह भी भली-भांित जानता
था क जब तक रा से रावण जीिवत है, जब तक मृ यु य, अिमत परा म मेघनाद है,
राम के ाण संकट ही म ह। राम क जय, राम के भगीरथ य बेकार ह। उसने राम को
सब संभव सहायता देने का िन य कया।
देवे हेमासन पर बैठा, चा नयनी दानवबाला पौलोमी शची वामांग म बैठी।
िसर पर मिण-मु ाखिचत राज छ । समीर न दन कानन का सुखद-मृद ु सौरभ ला रहा
था। द बाजे बज रहे थे। सुचा हािसनी र भा, उवशी, िच लेखा, सुकेिशनी, िम के शी
अ सराएं नृ य-गान कर रही थ । देव-देवे सोमपान कर रहे थे। ग धव हेम-पा म सोम
भर-भरकर दे रहे थे। कोई कं कर कुं कु म, कोई क तूरी, कोई के सर, कोई च दन और कोई
सुगि धत कु सुम-माल ला-ला अपण कर रहे थे। इसी समय देव ष नारद ने इ लोक म
वेश कया। देवे ने आनि दत होकर कहा–
‘‘ वागत देव ष, भले पधारे ! म तो बड़े औ सु य से आपक बाट देख रहा था।’’
‘‘देवराट् देवे के औ सु य का कारण या है? यह लीिजए, वेदसू मने रच
दया। इसम देवे क अ य तुित मने गान क है।’’ इतना कह नारद देव ष ने देवसू
गान कया।
सुनकर ि दव देव स हो ‘ध य-ध य’ कहने लगे।
देवे के आदेश से ग धव ने देव ष को हेमपा म मधुपान कराया, सोमपान
कराया।
सोमपान कर, मधुपान कर देव ष नारद ने हष और स तोष कट करते ए हंसकर
कहा–‘‘हां, देवे के औ सु य का कारण या है?’’
“देव ष, वह दुर त राविण, िजसका मुझ देवे को तीथ दक से ऐ ािभषेक करना
पड़ा, मेरे औ सु य का िवषय है।’’
‘‘मिहदेव पर तो दाशरिथ राम ने अिभयान कया है, अभी दूत ग धसंजीवनी ले
गया है।’’
‘‘ग धसंजीवनी से या होगा, दुर त राविण तो मरे गा नह ।’’
‘‘कै से मरे गा, उसके पास नागिस अ य तूणीर है, द धनुष है, धूज ट र कु ल
पर स ह? राविण रौ तेज से स प है।’’
‘‘तो जब तक यह दुर त राविण मरता नह , देवलोक म देवे क मयादा नह
है।’’
‘‘ क तु देवे , मृ यु य राविण देवािधदेव से द ा पा, द रणकौशल सीख,
अदृ रह, वयं अल य हो, श ु को ल य कर सकने म समथ है। स मुख यु म वह नह
मर सकता ।’’
“देव ष, ऐसा कोई उपाय नह है?’’
‘‘है देवे , धूज ट क सेवा म जाएं, धूज ट को राम पर सदय कर। कु मार का तक
के पास वैसा ही अ य नाग-तूणीर और द धनुष है, वह ा करके राम को द, तभी
मेघनाद मर सकता है।’’
‘‘देवािधदेव या राम पर यह अनु ह करगे?’’
‘‘वे रावण पर स ह। राविण उनका िश य और वरल ध पु ष है। धूज ट को
स करना क ठन है, पर तु देवे य द शैलनि दनी पावती को अनुकूल कर सक तो काम
बन सकता है।’’
“शैलनि दनी या सदय ह गी?’’
‘‘शची पौलोमी य द जाएं तो अस भव नह ।’’
‘‘तो हम दोन ही देवािधदेव क सेवा म जाते ह। आपने अ छी स मित दी।’’
‘‘और भी बात है।’’
‘‘वह या?’’
‘‘राम पादाितक है, देवे उ ह अपना द रथ लेकर मातुल को भेज द।’’
‘‘ऐसा ही होगा देवष?”
देवे के संकेत से ग धव ने देव ष वामदेव नारद को फर मधु दया, सोमपान
कराया और िवदा कया।
देवे जानता था क मेघनाद के पास नागिस अ य तूणीर और द धनुष है,
जो उसे देवािधदेव क कृ पा से ा आ है। रावण रौ तेज से स प है। धूज ट उस पर
कृ पालु ह। जब तक राम के पास भी रौ ा न हो वैसा ही नागिस अ य तूणीर न हो,
द धनुष न हो, तब तक मेघनाद को मारना श य नह है। उस द अ य नाग तूणीर
और द धनुष ही के ारा वह रौ कौशल से स प हो अदृ य रह चतुमुखी बाण-वषा
कर सकता है। वयं अल य रह श ु को ल य बना सकता है। तापी से तापी श ु को
नागपाश म बांध सकता है। राम पादाितक ह, उनके पास नाग तूणीर नह , नाग-धनुष भी
नह , तब कै से वे स मुख समर म इस दुर त मेघनाद को मार सकते ह? पुर दर ने अपना
द रथ, जो अभे और मनोरम था, सारिथ मातुल-सिहत राम क सेवा म भेजने का
संक प कर िलया। साथ ही द रौ धनुष और रौ तूणीर, जैसे भी स भव हो, राम के
िलए ा करने तथा राम पर देवािधदेव को सदय करने के िलए कृ तो म आ।
111. धूज ट के साि यम

पौलोमी शची इ ाणी ने मदन-ि या रित को बुलाकर कहा–‘‘अरी म मथ-वधू,


आज म हेमवती शैलसुता उमा क चरण-शरण म कै लास जा रही ।ं आ, तू मुझे शृंगा रत
कर दे।’’ रित ने हंसकर इ ाणी को सुवािसत तैल लगा के शिव यास कया; हीरा-मोती,
मिणखिचत भूषण, च दन, कुं कु म और क तूरी आ द सुग ध का लेप अंग-उपांग पर
कया। फर र संकिलत, आभायुत पट-व धारण कर पैर म महावर दी। शची का प
हेमकाि त के समान देदी यमान हो उठा। इस प-माधुरी को देखकर रित ने हंसते-हंसते
कहा–‘‘देिव, इस भुवनमोहन प को लेकर तुम भवन से बाहर कै से जाओगी? इस प को
देखकर तो जगत् म हो जाएगा। तु हारे अधरामृत को देख देव-दै य अमृत को भूल
जाएंगे। वेणी को देख नाग लजाकर भाग जाएंगे। उ त कु च को देख म दराचल अचल हो
जाएगा।’’
रित के ये वा य सुन चा मित शोभना शची ने अपने अवयव को ऐसे ढक िलया
जैसे भ म-रािश से अि ढक जाती है। वह गंधावृ उषा क भांित हि तद त-रिचत
गृह ार से बाहर आई।
देवे ने पौलोमी शची सिहत देव-लोक से कै लास को थान कया। िहमिग र-
ृंग पर हेमकू ट के समान धवल वज ऐरावत धीर-म थर गित से ऊ वगत होता जा रहा
था। िनर आकाश म बालो दत अ ण क वणाभा से िहम ृंग क शोभा अक य हो रही
थी। उस शोभा को िनरख देवे ने कहा–‘‘पौलोमी, फु टत कमल से जैसे मृणाल क
शोभा बढ़ती है, वैसे ही तेरे साि य म म स प ।ं ’’
शची ने हंसकर कहा–‘‘ठीक ही तो है, पा रजात-प रमल के कारण ही पवन का
आदर होता है। पर तु, अ ब से म क ग ं ी या, यह तो बताओ?’’
‘‘जैसा अवसर हो। तू तो यु प मित है। वह दु इ िजत् नामधारी रा स जैसे
मरे , वही तू कर।’’
‘‘तो धूज ट क सेवा म य ? िपतृचरण म चलकर य न िनवेदन कर? वह
तथाकिथत इ िजत् या िपतृचरण का भी सा मु य करने क साम य रखता है?’’
“ि ये, उसक साम य का अ त नह है। धूज ट को छोड़ हम और आसरा नह है।
हम धूज ट को उस दुरा मा से िवमुख करना ही होगा।’’
‘‘अ ब या मेरे कहने से सुनगी?’’
‘‘ य नह , ि भुवन म कौन है जो तेरे कटा पू रत अनुरोध को टाल सके ? फर,
अ ब तो तुझ पर बा यकाल से सदय ह।’’
‘‘कै लास पर या हम आ प च ं े? यह पवत जो याम त रािश म है, इसके उस
पार, वह जो व णम उ ुंग िहमकू ट है, वही तो कै लास है!’’
‘‘वही है ि यतमे!”
‘‘शरवन से तो यह अित मनोरम है, इसी से कै लासी शरवन को छोड़कर यहां आ
बसे ह।’’
‘‘तब या! तू तो जानती ही है क कामदहन के समय ही ने ु हो शरवन भी
भ म कर दया था। अब तो उसे अग य े मान िलया गया है। नृवंश के चरण वहां नह
पड़ सकते।’’
“देखो तो ि यतम, यह िनमल िनझर कै सी शोभा धारण कर रहा है। इसक शु
जल-रािश, याम िशला पर ऐसी तीत हो रही है, जैसे यामा वामा ने उ रांग म च दन
लगाया हो।’’
‘‘ऐसा ही है, लो आ गए हम कै लासधाम के ार पर। वह देख, ार मधुर िननाद से
आप ही खुल गया। धूज ट के कं कर इस दास के इस ऐरावत को पहचानते ह। यहां कै से
प ी कलरव गान कर रहे ह! सरोवर म प अभी, सूय दय अ छी तरह न होने के कारण,
पूरे िखले नह ह। वे कु छ मुंद-े से, कु छ िखले-से ऐसे तीत हो रहे ह, जैसे ल ावती नववधू
ने भोर म कु सुमा ण श या याग ीड़ावनत हो अपना कमलवदन ढांप िलया हो।’’
‘‘और िनमल जल म जो बाला ण क रि म रि मयां खेल रही ह, वे ऐसी तीत
हो रही ह जैसे ढीठ नायक उस ीड़ावनता ल ावती का अवगुंठन हटाने को उं गिलय से
गुदगुदा रहा हो।’’
देवािधदेव के कं कर ने ऐरावत को घेर िलया। देवे शची सिहत हाथी से उतर
शैलबाला अि बका पावती क सेवा म कं कर के बताए माग पर चलकर जा प च ं े। अ ब
वणासन पर बैठी थ , जया चंवर डु ला रही थी, िवजया छ िलए थी। महे ने इ ाणी-
सिहत महामाया अि बका के चरण म णाम कया।
अ ब ने हंसकर शची को अंक म बैठाया और िसर सूंघा। देवे क ओर कृ पा-
कटा कर कहा–‘‘देवे , देवकु ल म, देवलोक म कु शल तो है? अब फर कोई नया झंझट
तो नह आ खड़ा आ?’’
‘‘अ ब, देव ोही लंकापित रावण और दुजय राविण पर जब धूज ट का अनु ह है,
तब तक भला देवलोक और देवकु ल म कु शल कहां? देवकु ल तो उस दुर त रावण से लड़ ही
नह सकता और मुझ दास को उसके दुरा मा पु का क धे पर कलश रख तीथ दक से
ऐ ािभषेक करके ही मुि िमली। मेरा िवकराल व भी उस दुरा मा के अ य तूणीर और
द धनु के सामने िन तेज हो गया।’’
‘‘ क तु अब तो रावण का देवकु ल से कोई िव ह नह है?’’
‘‘अब, रावण और उसका वह पु , जो अब मुझ दास को कलं कत करने के िलए
इ िजत् कहाता है, जब तक जीिवत है, तब तक सब देवकु ल के साथ आपका यह दास
मृतक ही है। उसने देव ही क नह , आय क पर परा भी भंग क है। वह देव, दै य, असुर,
नाग, ग धव, समागत सभी को एक करना चाहता है। उसक य िविध भी हमारे अनुकूल
नह है।’’
‘‘उनके काय और आदश से तो देवािधदेव सहमत ह। वह और उसका पु दोन
ही देवािधदेव के कं कर ह, फर तुम मुझसे और देवािधदेव से उसके अमंगल क य आशा
करते हो!’’
अब शची ने कहा–‘‘अ ब, देवािधदेव के ही संकेत से मेरे िपता ने दानव-वंशी होने
पर भी देवे को मुझे दया। आप ही के आशीवाद क छाया म हम स प ह, िनरापद ह।
क तु आपके आशीवचन क अव ा करके उस दु सह दुरा मा ने देवे को ब दी बनाया,
देवे को समूचे नृवंश के ितिनिधय के सामने क धे पर तीथ दक रख उस अधम का
ऐ ािभषेक करना पड़ा। कै से अब आप देवकु ल का यह अपमान देख सकगी, अ ब?’’
हेमवती ने सब सुनकर कहा–‘‘पर तु सुन, तेरे अनुरोध क र ा करने क साम य
मुझम नह है। देवािधदेव रा स-कु ल-र क ह। वे आज वृषभ वज योग म कू ट थ, दुगम
गौरीकू ट पर बैठे ह। वहां तक जाना भी श य नह है। उनक एका त साधना म िव करना
भी िनरापद नह है। तू तो जानती ही है, सं ु के िन: ास से मकर वज मीनके तु काम
भ म हो चुका है!’’
‘‘तो यह तो और भी अ छा है अ ब, िव पा देवािधदेव यहां नह ह, वे िवकट
िशखर पर कू ट थ ह। अब आप ही देव का ि य कर दीिजए। हम देवािधदेव से या
योजन है! हम तो आप ही के साद से स प होना चाहते ह।’’
पौलोमी शची के ये वचन सुन हंसकर उमा ने कहा–‘‘अरी इ सखी, तू बड़ी
वाचाल है। तभी तो देवराज तुझे देख ऐसा िवमु ध होता है, जैसे ॠतुपित वन थल क
कु सुम कु तला को देखकर मोिहत होता है।’’
देवे ने उमा क स मु ा देखकर कहा–‘‘अ ब, देवकु ल के अपमान का
प र कार करो। म दास इसी आशा से आपक शरण आया ।ं माते री! जब दुर त तारक
ने मुझे परािजत कर वग ह तगत कर िलया था, तब देवकु ल-र क कु मार का तके य को
वृषभ वज ने नागिस धनुष और अ य तूणीर दया था, उसी से कु मार ने दुजय
तारक का वध कया था। वृषभ वज क कृ पा से मेघनाद के पास भी वही महा है।
इसी से वह दुर त रा स अदृ य रहकर चतुमुखी बाण-वषा करता है। उसका वध संभव ही
नह । अब अ ब, कृ पाकर मुझे कु मार का वही अ य तरकस दो, धनुष क अभे सुवण-
मि डत ढाल दो और मृ यु य ख ग दो, िजससे राम उस देव-वैरी दुर त मेघनाद का वध
कर सक।’’
देवराज इ का ऐसा अनुनय-अनुरोध सुन शरणागतव सला अि बका शैलबाला
पावती ने महामाया को आ ा दी क वह देवे क इ छा पूण करे । महामाया ने वे
जा व यमान श ा देवे को ला दए। इ ने वह कालधनुष हाथ म लेकर कहा–‘‘मुझ
दास का यह र धनुष इस द धनुष के स मुख तु छ है। यह महातेज कर ख ग और
सूयम डल के समान देदी यमान ढाल तथा कालसप क भांित नागशर से भरा अ य
तरकस पाकर म ध य हो गया! देवकु ल पुनज िवत हो गया।’’
उमा हेमवती ने कहा–‘‘देवे , तुम मेरे अ यागत हो, देवराट् हो, तु हारा िवचार
शुभ है, आय और देव का अि य म भी सहन नह कर सकती। धूज ट ु भी ह गे तो म
सहन क ं गी। तुम इन महा को ले जाकर राम को दे दो। इ ह से कु मार का तक ने
तारक का वध कया था। इ ह से तु हारे िचरश ु मेघनाद का हनन होगा। पर तु म तु ह
कह देती ं क मेघनाद क वीरता मने देखी है। यह ि पुरा र का स पूण रौ तेज धारण
करता है, ि भुवन म कोई वीर श रहते उसका वध नह कर सकता, इसिलए उससे
िनर ही वध करने का संकेत रामभ को देना। सीता का असह संताप अब मुझे भी स
नह है। रावण अब अपने ही च र -दोष से िवन होगा। जाओ देवे , लंका का सौभा य-
सूय अब अ ताचल म डू ब चुका।’’
इ ने आन दम हो उमा क व दना क । अ ब ने शची को अंक म भर िवदा
कया। देवलोक म प च ं इ ने देवसारिथ मातुिल को बुलाकर कहा–‘‘हे ब , तू अभी
मेरा द रथ लेकर लंका म चला जा। वहां राम-कटक म प च ं कर इन अ को अ य त
सावधानी से रामभ क सेवा म प च ं ाकर िनवेदन कर क इ लोक-िनवासी आपके मंगल
क कामना करते ह और ि या शैलबाला उमा आप पर स ह। इन द ा से
िनर मेघनाद का वध क िजए, शंका को मन म थान न दीिजए तथा तू भी रथसिहत
रामभ क सेवा म रह और मेरा अनुरोध िनवेदन कर क आपके िपता महा मा दशरथ
देवि य थे। उ ह ने देव के िलए यु कए थे। म श बर का वध उनक सहायता के िबना
नह कर सकता था। वा तव म श बर वध का ेय आपके िपता महा मा दशरथ ही को है।
अब रावण का वध आपके हाथ से हो, यही स पूण देवकु ल क कामना है। यह दुरा मा
रावण नृवंश क सारी ही मयादा को उलट-पलट रहा है। िनर तर बारह दा ण देवासुर-
सं ाम कर, देव ने दै यभूिम को सुरलोक बनाया है। अब पृ वी पर चार ही बल अनाय
देवि ष नृपित थे। एक वैजयंतीपुरी का ितिमर वज शंकर, िजसे पांचालपित दवोदास के
साथ आपके यश वी िपता दशरथ ने स मुख समर म हनन कया। दूसरा व चन, िजसक
एक लाख दानव-सै य को दवोदास के पु सुदास ने महासमर म समूल नाश कर मार
डाला, य िप अनेक आय राजा ने भी व चन का साथ दया था। तीसरा भेद, िजसने
व चन क मृ यु के बाद सुदास क अधीनता वीकार कर ली है। अब के वल रह गया यही
महाबली रावण, जो इन सबसे भयानक, दुजय और दुर त है। सो हे रामच , आप इसका
वध करके अनाय जाितय का समूल उ छेद क िजए। आपके इस िवकट सं ाम के प रणाम
पर ही आय और देव का अि त व िनभर है। कदािचत् इस बार यह रावण जीिवत बच
गया तो िन य ही न आयावत रहेगा, न देवलोक। ि लोक का नृवंश रा स हो जाएगा।’’
देवे का संदश े यान से सुन, द ा को सावधानी से ले, महा देवसूत
मातिल ने ब ांजिल हो देवे क दि णा कर णाम कया और द रथ पर चढ़ वह
लंका क ओर चला। सह घं टय क झनकार से उस समय वातावरण मुख रत होकर
जैसे राम का जय-जयकार कर उठा।
112. अिभसार

िवधुमुखी-सुलोचना, दानवनि दनी िमला ि यतम के जाते ही कटे वृ क भांित


पृ वी पर िगर गई। कं करी दािसय ने उसे बोध दया। पर वह िवरह-िवद धा खि डता
मािननी बाला नािगन क भांित ल बी-ल बी सांस लेती ई अ ु बहाने लगी। उसका
के शजाल अ त- त हो गया। मिणमाल उसने उतार धरी। बांसुरी, वीणा, मृदग ं , मुरज
सब नीरव हो गए। को कलक ठी गाियकाएं त ध हो ग । वािमनी के िवरह-िवद ध
दय के हाहाकार को देख मदवन क सभी मदाएं अधोमुखी हो रोने लग ।
रात ई तो उसने वस त-सी सौरभवाली सखी वास ती क ीवा म भुज-मृणाल
डालकर गहरी-गहरी उसांस लेते ए कहा–‘‘अरी सखी, देख तो यह राि कालभुजंिगनी
क भांित मुझे डंसने आई है। अरी कह तो, इस रीित रात म अ र दम कहां ह? वह तो
‘अभी आऊंगा’ कहकर गए थे। अभी तक तो आए नह । यह िवल ब तो अब सहा नह
जाता। अरी, लंका तो श ु मानव ने घेर रखी है। उसने ि लोकजयी, महातेज कु भकण को
मार डाला है। सुना है, सागर-तीर पर उस पु य पु ष का शरीर िनज व पड़ा है। अरे , यह
तो बड़ी भयानक बात है!’’
सखी ने कहा–‘‘देिव, िच ता न करो, अ र दम इ िजत् को पृ वी पर कसका भय
है? वीरवर सुरासुर-व ह, अभे ह, -वरल ध िस पु ष ह। उनसे कौन यु कर
सकता है। जब तक महारथी समर जय करके नह आते ह, तब तक हम दािसय को आप
माला गूंथने का आदेश दीिजए, अ र दम के मद-वन म आते ही िवजय-माल वीर पित के
क ठ म डाल देना।’’
कौमुदी सरोवर-सिलल म नवोढ़ा नाियका के समान अवगु ठनवती-सी लग रही
थी, मर गुंजार कर रहे थे, कोयल कू क रही थी, पु प-सौरभ-सनी वास ती वायु बह रही
थी। पर तु पित ाणा, बाला िमला क आंख म अ धकार ही छा रहा था।
उसने कहा–‘‘अरी, म तो िवरह- वाला म जल रही ।ं च मा, च दन, चांदनी
मेरे अंग-अंग म दाह कर रहे ह। हाय, ि यतम के जाते ही िव उलट गया। अरी सखी, म
नह सह सकती। तू अभी लंका चलने क तैयारी कर, िजससे म ाणे र को ा कर
सकूं ।’’
सखी ने कहा–‘‘देिव, तुम लंका म कै से जाओगी? दुल य राम-कटक ने लंका को घेर
रखा है। अनिगनत लौहवमधारी अ पािण व र वानर का लंका के ार पर पहरा है।’’
िमला ने गु से होकर कहा–‘‘अरी, समु गािमनी नदी क धारा को िवमुख करने
क साम य कसम है? म दानवनि दनी, रा स-कु लवधू ।ं जग यी मिहदेव रा सपित
रावण मेरा सुर और इ िजत् मेरा पित है। म या वैरी राम से डरकर ि य िमलन क
इ छा छोड़ दूग ं ी? देखूंगी, आज म राम का भुजबल देखूंगी। देखूंगी, कौन मुझे लंका म वेश
करने से रोकता है।’’
वण ह य म जाकर उसने वीरांगना का वेश धारण कया। के श पर मिण करीट,
भाल पर च दन क रे खा, कु च पर कवच, कमर म र ज टत कमरब द, िजससे बंधी
िवकराल कराल ख ग और पीठ पर बड़ी-सी ढाल। हाथ म उसने शूल िलया। वह बड़वा
नाम क अि नी पर सवार ई।
सौ सिखयां भी सि त । सबने ख ग कोश से िनकाल िलए। वे धनुष-टंकार
करत , पीठ पर तरकस कस, ढाल को िहलात , नूपुर क झन-झन, कं कणी क कन- कन
को अ के िहनिहनाने क विन से एकरस-सा करत डम क डम-डम से लाल-सप जैसे
नाचता है, उसी भांित अ को नचाती, समरवा बजाती, एक हाथ म शूल और दूसरे म
जलती ई मशाल िलए, लंका क ओर अ सर । राम-कटक को स मुख देख तेजि वनी
िमला ने कहा–
‘‘वीरांगनाआ, आओ, भुजबल से राम-कटक का छेदन कर हम लंका म वेश कर।
म वीरवर के िनकट जा रही ।ं हम सब दानवकु लनि दनी ह। श ु के शोिणत म डू ब मरना
या श ु का वध करना हमारा कु ल-धम है। आओ, आओ, आज हम उस िभखारी राम का
प देख ल, िजस पर रा सनि दनी पंचवटी म मोिहत हो गई थ । उस दुर त सौिम को
भी देखगी, िजसके भय से रा स-वधुएं लंका म सुख क न द नह सोती ह। आज हम उस
रा स-कु लांगार िवभीषण का दय भी शूल से िव करगी। जैसे म हिथनी निलनीदलन
करती है, वैसे ही हम दानव-बालाएं श ु का दलन करगी। आओ, हम िव ुत्-वेग से श ु-
दल पर टू ट पड़।’’
दानवनि दनी सुलोचना िमला का यह अिभभाषण सुन दानव-बाला ने दप से

ं ार भरी। वे अपने-अपने न ख ग हवा म ऊंचे उठा, समु क भांित गरजती ई आगे
बढ़ चल ।
इस वामादल क अ वािहका मािलनी हाथ म शूल िलए आगे बढ़ी। उसके पीछे
दावानल क भांित एक हाथ म शूल और दूसरे म मशाल िलए वामादल। धनुष को
टंकारती, श ा को विनत करती वे जा प च ं पि म ार पर, जहां मा ित का जा त्
पहरा था। मा ित ने दावानल के समान वामादल को आते देख ललकारा–‘‘तुम कौन हो
और इस अ धिनशा म तु हारे यहां आने का या योजन है? शी कहो। यहां मा ित जग
रहा है, जो रा स का ाण-वैरी है। कहो-कहो, तुमने यह कै सा वीरांगना का मायावेश
धारण कया है। म मा ित हनुमान् बा बल से रा स क माया का मदन करता ।ं ’’
मा ित के वचन सुन, मािलनी ने धनुष को टंकार दी और ु होकर कहा–‘‘अरे
मूढ़ तुझ नग य के मुंह कौन लगे? हम सेवक को नह मारत , इसी से तुझ अबोध को म
छोड़ देती ।ं तू जाकर अपने वामी से कह क अ र दम इ िजत् क सा वी प ी,
दानवनि दनी, िमला सु दरी, वामादल के साथ पितपद पूजने लंका म िव होती ह।
िजस यो ा म साम य हो, रोके ।’’
हनुमान् ने िवि मत होकर दानवनि दनी र वधू को आगे बढ़कर देखा, जो सौ
वीरांगना के बीच चपल अ पर अि िशखा क भांित आसीन थी। उसके करीट का
मिण मशाल के दी काश म नवो दत सूय क भांित चमक रहा था। उभारदार व पर
कसा वणखिचत वम वण-शैल-सा दीख रहा था।
हनुमान् ने सोचा–‘‘अहा, ऐसा वल त प, ऐसा दुधष तेज तो रा समिहषी
म दोदरी म भी नह है। भगवती सीता क प-माधुरी भी इसक समता नह कर सकती।
ध य है राविण मेघनाद, िजसके ेह-ब धन म यह व वंिसनी तिड ािमनी बंधी है।
उ ह ने कहा–‘‘सु दरी, मेरे वामी रामभ , दुल य सागर को िशला से बांध ल ाविध
वीर के कटक सिहत इस रा स-पुरी वण-लंका को घेरे ए ह। रा सराज रावण उनका
वैरी है। तुम अबला, इस असमय म यहां य आई हो, सो िनभय होकर कहो। या तुम
उनके अनु ह क कामना करती हो? म हनुमान्, राम का दास ।ं तु हारा जो भी अिभ ाय
होगा, म भुपद म अभी िनवेदन कर दूग ं ा।’’
इस पर दानवनि दनी िमला सु दरी ने आगे बढ़, वीणा िविनि दत वर म
कहा–‘‘हे वीर, तेरा वामी राम मेरे पित का वैरी अव य है, पर उससे यु करने का मेरा
योजन नह है। तू मेरी इस दूती को अपने साथ, अपने वामी दाशरिथ राम के पास ले
जा। वह मेरा अिभ ाय सीता-पित राम से िनवेदन कर देगी।’’
दानवी वामा अभय मु ा से श ु-दल म घुस पड़ी। हनुमान् माग दखाते आगे-आगे
चले। वानर के झु ड अि िशखा के समान उस दानवी बाला को देखने चार ओर से आ
जुटे। हाथ म भीमाकार शूल िलए, क ट पर धनुष, पीठ पर तूणीर, िसर पर च रे खां कत
मयूर-पु छ का चूड़ा, कु च युगल पर देदी यमान मिण, पीठ पर र िथत वेणी, पैर म
नूपुर। तब मातंिगनी क भांित दशा को दी करती वह दानव-बाला रघुमिण राम क
सेवा म आ उपि थत ई।
सहसा सेना म सागर-क लोल क भांित ‘जय राम’ क विन उठी। िवभीषाण ने
त भाव से राम क ओर देखकर कहा–‘‘राघवे , तिनक बाहर आकर देिखए तो, यह
या चम कार है! यह काश कै सा है? या असमय म ही उषा का उदय हो गया?’’
राम ने बाहर आ, आती ई वामा को िव मय से देखकर कहा–‘‘ि य, यह
भैरवी िपणी वामा कौन है और यहां मेरे पास आने का इसका या योजन है? या यह
भी कोई मायाजाल है? र पित रावण काम प है। तिनक भली-भांित देखो क यह या
रह य है? इस िवप काल म इस दुबल सै य क र ा तु ह कर सकते हो र े !’’
राम के वा य सुन गदापािण िवभीषण आगे बढ़े। ल मण धनुष-टंकार कर राम के
आगे आ खड़े ए। भैरवमू त सु ीव राम के पा व म खड़े हो गए। हनुमान् के साथ आकर
दूती ने राम के स मुख आ ब ांजिल िनवेदन कया–‘‘सीता-पित राम और सब गु जन के
पद म णाम करती ।ं मेरा नाम मािलनी है। म अ र दम इ िजत् क प ी, दानवबाला
िमला सु दरी क कं करी ।ं ’’
राम ने दािहनी भुजा उठाकर कहा–‘‘तुझे अभय, तू यहां आने का योजन िनवेदन
कर। कह, कस कार म तेरी वािमनी को स तु कर सकता ।ं ’’
दूती ने कहा–‘‘सीतापते, दानवनि दनी िमला सु दरी पितपद पूजने लंका म
जाना चाहती ह। आप बाहर आकर हमसे यु क िजए या हम लंका म जाने दीिजए। आपने
अपने बा बल से अनेक रा स का वध कया है, अब रा स-कु ल-वधुएं आपसे यु करना
चाहती ह। रा सराज-वधू का यही िनवेदन है। हम सब एक सौ रमिणयां ह, आप िजसे
कहगे वही अके ली यु करे गी। चाहे धनुषबाण लीिजए या कृ पाण। म लयु म भी हम
आपि नह । अब जैसी आपक िच हो, पर तु शी ता क िजए, िवल ब मेरी वािमनी को
स नह है।’’
राम ने कहा–‘‘सु दरी, म अकारण कसी से िववाद नह करता। रावण मेरा श ु
है, पर तु र कु ल-बाला और कु लवधु से मेरा कु छ वैर नह है। तेरी वािमनी
व छ दता से लंका म वेश करे । मेरी ओर से तू दानवनि दनी से कह दे क उसक
पितभि क राम शत-सह मुख से शंसा करता है। राम का ज म वीर-कु ल म आ है।
तेरी वािमनी वीर प ी एवं वीरांगना है। ध य है इ िजत् और ध य है िमला सु दरी
दै यबाला। म धनहीन, वनवासी राम तुझे तेरे उपयु साद देने यो य नह ,ं के वल तुम
सबको म आशीवाद देता ,ं तुम स रहो!’’
इतना कह ी राम ने हनुमान् से कहा–‘‘वीर मा ित, वामादल को
िश ाचारपूवक स तु कर तुर त लंका के ार पर छोड़ आओ।’’
दूती सीतापित को णाम कर चली गई। राम ने हंसते ए िवभीषण से
कहा–‘‘प याम ताव े पु वधूम्।’’
िवभीषण, राम, सु ीव ने बाहर देखा– कं क रय क क ं ार, घोड़ क िहनिहनाहट
तथा श क झनझनाहट के बीच र ज टत पताका वायु म उड़ाती ई, रथ को दुलक
चाल पर नचाती ई, अ के पैर म घुंघ छमछम बजाती ई, वह वामा-सै य राम क
सै य के बीच इस कार चली जा रही थी जैसे दो पवत के बीच पहाड़ी नदी दाव-पेच
खाती हर-हर करती बह रही हो। सबसे आगे मािलनी, कृ णवण घोड़े पर हाथ म हेमद ड
िलए, उसके पीछे वा ंकरी वीणा, मुरज, बांसुरी, मृदगं , मं दरा बजाती ई। उनके पीछे
वीरांगना से िघरी शूलपािण दै यबाला िमलासु दरी करीटधा रणी। दुजय वामादल
अथाह राम कटक पर उपे ा क दृि डालता, धनुष-टंकार करता, क ं ार करता, ख ग
चमकाता, शूल िहलाता, ितर कार सूचक अ हास करता, वीरमद म म चला जा रहा
था।
राम ने िवभीषण से कहा–‘‘िम , यह तो अ य त अ भुत है। ऐसा तो कह न
देखा, न सुना। कौन है यह वामािवभूषणा वीरबाला? इसका तेजदप अतुलनीय है।’’
िवभीषण ने हंसकर कहा–‘‘रघुमिण, कृ ता त-सम क ठन कृ पाण, जग-िव यात
कालनेिम दानव क यह इकलौती बेटी है। यह महाशि अंश से ज मी है। िव म से इस
दानवी को पराजय करना अश य है। देवपित इ को अपने अिमत िव म से बांधनेवाला
इ ददमन मेघनाद इसके पदतल म िनवास करता है। इस सु दरी ने उस महाकाल
म गजे को अपनी ेह-शृंखाला म बांध रखा है। यह वीरांगना िमला अपने ेमालाप
म उस कालाि -सम राविण को भुलाए रखती है। इसी से देवलोक म देव, नागलोक म नाग
और नरलोक म नर सुख क न द सो पाते ह।’’
‘‘स य है िम , अव य ऐसा ही है। दो बार उस दुर त राविण ने मुझे पराभव दया
है। आप िम ने य द मेरी और सौिम क ाणर ा न क होती तो म तो समा हो गया
था। सात दन से राविण काल-समर कर रहा है। अब भोर ही म फर काल-यु होगा। म
या क ं , कै से यह राविण तुर त मारा जाए? अरे , अब तो भीमबा राविण के साथ यह
भीमा भी िमल गई। अब वह दुजय जो न करे सो थोड़ा है। हे िम , इस महावीयमती
िमला से तो म भयभीत हो गया ।ं यह रणि या जो न करे , वही थोड़ा। जाओ िम ,
कृ पाकर सु ीव और ल मण को साथ ले लो। ार- ार जाकर सारी सेना का िनरी ण कर,
सबको यथायो य वि थत कर दो। महाकाल कु भकण ने ही हमारी समूची सै य को
अ त- त कर दया। अब इस अजेय स व राविण के साथ भोर म काल-सं ाम का हम
सा मु य करना है। इस िभ ुक राम क लाज तु हारे ही हाथ है, िम ! यहां म ,ं तुम सारे
मोच पर घूम आओ। श ु क गितिविध का भी पता लगाओ।’’
राम के वचन सुन गदापािण िवभीषण तुर त ल मण को साथ ले चल दए। राम
भाव से धनुष-बाण ले सावधानी से चार ओर देखने लगे।
113. देवदूत

इसी ण एक चम कार आ। पि म दशा उ वल काश से भर गई। ग भीर,


मेघगजन- विन सुन राम ने भीत होकर मन-ही-मन कहा–यह अन व गजन कै सा? यह
िबना ही दािमनी के काश कै सा?
सहसा देवसारिथ मातिल ने राम के स मुख आकर कहा–‘‘दाशरिथ राम क जय
हो, म मातिल, देवे का सूत, देवे का स देश लेकर आपक सेवा म उपि थत ।ं
दाशरिथ स ह , देवकु ल आपके अनुकूल है। हेमवती उमा भी आप पर सदय ह। वे सब
आपक जय के अिभलाषी ह। देवे ने इसी कारण मुझे भेजा है।’’
राम ने खड़े होकर कहा–‘‘आपके आगमन से तथा देवे के और अ ब उमा के
अनु ह से स प होकर म कृ ताथ आ। आपको ब त क आ होगा। देवदूत के बैठाने
यो य मेरे पास वणासन नह है, तथािप मुझ दास पर अनु ह कर इस आसन पर बै ठए।
म अ य-पा िनवेदन करता ।ं ”
इतना कह राम ने अपने हाथ से कलश उठाकर, मातिल को अ य-पा से स कृ त
कर, आसन पर बैठाया, मधुपक दया, तब देवे क कु शल पूछी और कहा–‘‘मुझ दास को
देवे क या आ ा है?’’
व थ होकर मातिल ने कहा–‘‘ वि त रामभ , यह तो तु ह ात है क देव,
आ द य और आय के चार श ुकुल थे, िजनम ितिमर वज श बर का देविम दवोदास ने
तु हारे यश वी िपता दशरथ क सहायता से िनर तर चालीस वष यु कर, उसके सौ दुग
का दलन कर हनन कया। इसके अन तर दुजय व चन को, उसक एक लाख दानव सै य
का हनन कर देवपु सुदास ने समूल नाश कर डाला। इसके बाद महािव मशाली भेद
सुदास का शरणागत हो गया। अब रह गया है के वल यह रावण, जो अपने को जगदी र
मिहदेव, जग यी कहता है। तुम जानते हो, इसके दुर त पु मेघनाद ने देवे को ब दी
कर उनसे पृ वी के नरपितय के स मुख दासकम कराया था। तभी से देवे संत ह। जब
तक यह दुरा मा मेघनाद नह मरता, तब तक देवलोक म देवराट् और देव दु:िखत ह और
जब तक जग यी रावण जीिवत ह, आय, आ द य, देव, देव ष, ष सभी का अि त व
खतरे म है। तो यही िवचार, तु हारा संकट देख, देवे धूज ट के साि य म कै लास-
िशखार पर गए थे और वहां स तामयी अ ब उमा को स कर, नागपाशयु तूणीर
और नागदमन धनुष, िजससे कु मार का तक ने वगजयी तारक का वध कया था, तु हारे
िलए मांग लाए ह। साथ ही इ ने रौ तेजपूण यह अभे ढाल और िवकराल ख ग भी
दया है। सो राघव, तुम इन द ा को हण कर, इन दुर त रा स का समूल िव वंस
कर दो। इस समय रावण हततेज है। अत: यही समय है, जब रावण सप रवार मारा जा
सकता है। अब उसके सब िवषद त झड़ चुके ह। यह दुराचारी मेघनाद शेष है, सो आज तुम
इन द ा से उसका वध करो। इन महा के कारण ही वह राविण अदृ य रहकर
च म ं ुखी बाण-वषा करता है, नागपाश म दुजय श ु को भी बांध लेता है। अब यही कौशल
तुम भी कर सकोगे। पर तु राघव, द उमा का तु ह एक गु संकेत है। उमा ने कहा है क
राविण का िनर ही वध स भव है। द ा के रहते उसका वध नह होगा। सो हे
परं तप, जैसे बने, आज तुम उसका िनर वध करो। यह रह य मत भूलो। इसके अित र
रावण से तुम िबना रथ के यु नह कर सकते थे, सो देवे क आ ा से इस द रथ
सिहत सं ाम क समाि तक म तु हारी सेवा म उपि थत ।ं अब तुम स होकर देव
का ि य करो।’’
राम ने कहा–‘‘देवे और अ ब के ित म अ कै से कृ त ता कट क ं ?’’ राम ने
धनुष हाथ म लेकर देखा और फर शोकपू रत वर म कहा, ‘‘मने वैदह े ी- वयंवर म अपने
बा बल से हर-धनु भंग कया था। क तु आज म इस धनुष को ख चने म भी असमथ ।ं ’’
इस समय ल मण और िवभीषण वहां आ प च ं े। राघवे ने उनसे देवदूत के
आगमन का समाचार कहा, देवे और हेमवती के संदश े -संकेत कहे। फर वह द धनुष
उ ह दखाया। उसे ख चने क अपनी असाम य पर िख ए।
इस पर वीर-दप से सौिम ने धनुष हाथ म ले, ण-भर ही म उसे ख च टंकारा,
िजससे दस दशाएं विनत हो ग । राम ने भाई को दय से लगाकर कहा–‘‘भाई, तू ही
अब डू बते रघुवंश का सहारा है। क तु इस रा सपुरी म अके ले रा सराज िवभीषण ही
हमारी नौका के िखवैया ह। न जाने आज सूय उदय होने पर भूतल पर कौन-सा दृ य
देखगे।”
114. समागम

लंका के संह- ार पर दु दुिभ बज उठी। असमय म संहपौर पर दु दुिभ िननाद


सुन हरी रा स के गु म भी गजना करने लगे। असमय मेघ गजना के समान गजन-तजन
सुन ार-र क का गु मपित िव पा और ारपाल का नायक तालजंघ गदा उठाकर
ार क ओर दौड़ चले। गु मपितय ने गु म को तुर त तैयार होने के आदेश दए, घोड़े
िहनिहनाने लगे, हाथी चंघाड़ने लगे, रथ का घरघर श द होने लगा। दुर त कौि तक कु त
घुमाने लगे। धनुधर ाचीर और कं गूर पर चढ़ बाण-संधान करने लगे। जनरव और गजना
से उस अधिनशा म लंका िहल उठी। जैसे अभी-अभी वालामुखी का लयंकर िव फोट
आ हो, उसी भांित िव ुत्- भा से जगमग मशाल को िलए, शूलधा रणी वामादल को
वानर-सै य से संह ार क ओर आते देख रा स-दल चल-िवचिलत हो गया।
ार के स मुख आ द डधा रणी मािलनी ने पुकारकर उ वर म कहा–‘‘अरे
भी ओ, तुम कस पर अ धकार म अपने श तान रहे हो? आंख खोलकर देखो, हम
रा स-श ु नह , रा स-कु लवधुएं ह। अ र दम वीरे इ दमन क वामांगी दानवनि दनी
िमला सु दरी पितपद पूजने लंका म आई है। भय त राम ने हम िनरापद माग दे दया
है। अरे मूढ़ो, अब झटपट तुम ार खोल दो!’’
ह रय ने ार म बड़ी-बड़ी चािभयां घुमा , च घुमाए, य चािलत कए।
लौहवम आ छा दत लंका के संह ार तुर त खुल गए। वामादल ने आन द से लंका म वेश
कया। दीपिशखा पर जैसे पतंगा टू टता है उसी कार चार ओर से पौरजन ने वामादल
को घेर िलया। कु लवधुएं मंगल विन करके पु पवृि करने लग । ब दी बाजे बजाकर
व दना करने लगे वा ंकरी और िव ाधरी वीणा, बांसुरी और मि दरा बजाकर नृ य करने
चल , अ िहनिहनाते वामादल के ख ग कोश म झनझनाते चले। र कु ल क ि यां
झरोख से और गोख से सती सुलोचना को देखने दौड़ चल ।
पित-मि दर म प च ं कर सु दरी िमला ाणपित से ऐसे िमली जैसे मिणधारी
फिण अपने खोए मिण से। अ र दम इ िजत् ने ि यतमा को दय म समेटकर हंसते ए
कहा–‘‘यह या र बीज का नाशकर िवधुमुखी दुगा िनज धाम आई है? हे देिव, आ ा हो
तो यह दास तेरे पदतल म िगरे ।’’
सुलोचना ने अपने मृणाल-भुज अ र दम के क ठ म डालकर कहा–‘‘हे ि य,
तु हारे पद- साद से यह कं करी भव िवजियनी है, क तु यह तु हारा िवयोग नह सह
सकती। दु:सह िवयोग क वाला से वह भ म हो रही है। अरे िनदयी, तुम कै से मुझे अके ली
सूनी रात म छोड़ चले आए? ओ ि यतम, िजसे मन सदा चाहता है, म उसी के पास आई ।ं
दुरारोध वषा नदी ने सागर के दय म वेश कया है।’’
‘‘तो ि ये, अब आन द क राि तीत कर!’’
िमला सु दरी ने मि दर म वेश कया। वीर-वेश यागा। ान-म न कया।
र मय अंचल का कौशेय धारण कया। पीन तन पर कं चुक कसी। कमर म मिणमेखला
धारण क । हीर का हार क ठ म पहना। दय पर मु ामाल धारण क । भाल पर
हीरकमिण- िथत मांग दी। कान म नीलमिण के कु डल पहने।
उस समय सह मिणदीप के उ वल काश म मिणमू त के समान भामयी,
दीपिशखा-सी योितमयी, कु सुम-गु छ के समान सुषमामयी और जीवन के समान ेममयी
ि यतमा दानवनि दनी सुलोचना िमला को देख रा स-चूड़ामिण मेघनाद आन द के
समु म डू बकर सुध-बुध खो बैठा। रणरं ग, वैरी राम, िवप लंका, शोकम रा से
रावण–सभी को भूल मेघनाद उस ैलो यदुलभ पसु दरी दानवे नि दनी िमला को
दय से लगा, तृ हो उसका यौवनामृत पान करने लगा। जैसे च -दशन से समु म वार
आता है, उसी भांित िवरहद धा बाला िमला भी इस कार पितपय क पर िबखर गई,
तब वह ऐसी थी जैसे शरद् के पूण च क चि का धवल सौध पर िबखरती है।
ब दी गान कर रहे थे, ग ध वयां नृ य कर रही थ , वादक िविवध वा य बजा
रहे थे। फ वारे जलरािश उछाल रहे थे, सुरिभत वस तािनल बह रहा था, वस त ॠतु वहां
मूत हो रही थी और अिन सु दरी िमला मिणपा म सुवािसत मद भर-भरकर
ाणािधक ि यतम के होठ से लगा, मृणाल भुज क ठ म डाल, व सटा, अपना अधरामृत
भी पा म लगा अधरामृत के साथ सुरामृत को िपलाती ई ाणि य पित को आन द-
सागर म झकझोर रही थी।
ऐसे सुख-सागर म डू बकर अ र दम सो गया। उषा का उदय आ। राज ार पर
दु दुिभ बजने लगी। प ी जगकर कलरव करने लगे। बि दय ने िव द-गान कया। वीरे
चूड़ामिण मेघनाद ने जगकर देखा–उसके व पर सोती ई सु दरी िमला ऐसी लग रही
थी, जैसे कसौटी पर सोने क लक र। उसने भुजपाश म भरकर ि यतमा का चु बन िलया
और कहा–‘‘उठ ि ये, यह देख, ाची म ेत रि म फै ल गई। वनकु सुम झूम-झूमकर हंसते
ए तेरा आ वान कर रहे ह। उठ दै यराज-नि दनी, आज िव म अघट घटना घटने वाली
है। आज समु को िशला से बांधने का दु कम करने वाले दाशरिथ राम को उसके ाता
सौिम के साथ मारकर, म उसका ख ड पू य िपता क सेवा म अपण कर पर तप का
ताप दूर क ं गा। उठ चा लोचने, उठ सुहािसनी! मुझे प रर भण दे, अपने यार से स प
कर!’’
सुलोचना िमला के प दमान अध मुकुिलत सुलोचन म कृ ण ता रका
झांकती-सी ऐसी दीख पड़ी, जैसे मधुलोलुप षडंि रात को पंकज म कोषब हो गया हो
और अब उषा-वेला म पंकज-कोष खुलते ही दीखने लगा हो। उसने ने ारिव द खोले, ल ा
से निमत हो, व को ठीक कया। फर म दहास करती ई ाकु ल दृि से ि यतम को
िनहारकर बोली–‘‘ या आज इतनी ज दी भात हो गया, वह सुख-राि इतनी शी
िवलीन हो गई?’’
मेघनाद ने ि या का चु बन िलया। फर उसक अलकाविलय से खेलते ए
कहा–“ ाणसखी, तू मेरे भा य का सव म फल है, मेरे ाण पी सूयका त क तेज रि म
है। अब चल, िवल ब का काम नह । जननी के पादप म णाम कर आशीवाद हण कर।
आज म िनकु भलागार म वै ानर क िविधवत् पूजा कर क ठन सं ाम म जाऊंगा। आज म
बल वैरी का आमूल नाश क ं गा।’’
इसी समय राविण ने ि जटा वे वती को स मुख आते देखकर कहा–‘‘अरी सुभगे,
आज म िनकु भला य ागार म वै ानर का पूजन कर वैरी राम का यु म हनन क ं गा।
पर तु म सव थम मातृपद-व दना करना चाहता ।ं देख तो, मिहषी या कह रही ह!
उनसे तू ही जाकर िनवेदन कर क उनका अ कं चन दास यह पु और पु वधू उनक चरण-
व दना के अिभलाषी खड़े ह।’’
ि जटा ने कहा–‘‘आयु मन्, तेरी जय हो! आज रात मिहषी ने ालय म
जागरण-उपवास करके तेरी मंगल-कामना क है और वे देव- साद ले इधर ही आ रही
ह।’’
म दोदरी ने आकर पु का िसर सूंघ उसे दय से लगाया। पु और वधू ने
सा ा ग द डवत् कया। मिहषी ने अ ुजल बहाते ए कहा–‘‘पु , श ुजयी हो, अिमत-
परा म हो!’’
मेघनाद ने कहा–‘‘मात:, मुझ दास को आशीवाद दे क आज म र कु ल-िवनाशक
पािप राम का वध कर सकूं । अ ब, तू के वल मुझे पदधूिल दे। फर म देखूं क मेरे कराल
बाण से कौन उसके ाण क र ा करता है। तेरे साद से आज म उन दोन दुरा मा
दाशरिथय को बांध लाकर िपतृ-चरण का सब संताप हरण क ं गा।’’
म दोदरी ने आंख से अ ुजल-िवमोचन कया। उसने कहा–‘‘अरे पु , अब तो तू
ही र कु ल का एकमा आधार बचा है। कै से म तुझे इस काल-समर म जाने को क ?ं अरे ,
मेरे दय-आकाश का तू ही तो पूण च है। तुझे भेजकर अ धकार म म कै से र ग ं ी? अरे ,
देवबलयु राम और दुर त ल मण के साथ कु ल ोही िवभीषण भी िमल गया। जैसे सप
अपने ही ब को खा जाता है, उसी भांित यह रा य-लोलुप िवभीषण अपने कु ल का घात
कर रहा है।’’
मेघनाद ने हंसकर कहा–‘‘अ ब, तू य उन दोन रा य वनवािसय से डरती
है? तेरे पद- साद से यह दास पृ वी म अजेय-अयो य है। फर यह तु छ नर या है?’’
‘‘अरे पु , राम मायावी है, वह मरकर भी जी उठता है। देव उसके सहायक ह,
िशलाएं उसके संकेत पर जल म तैरती ह, अि बुझ जाती है। अरे पु , उस रा स रपु ने तो
महाकाल कु भकण को भी मार डाला। महाकाल आ द राजपु भी समर- े म कटे पड़े
ह। अब म कै से तुझे काल-समर म भेजूं?’’
मेघनाद ने माता के व म िसर िछपा िलया। उसके आंसू प छकर कहा–‘‘अ ब,
घर म आग लगने पर भला कौन सुख क न द सोता रहेगा? जब श ु ने वण-लंका घेर
रखी है, तब भला म कै से यु से िवरत रह सकता ?ं भला इ िजत् के रहते रा स-कु ल
भयभीत रहेगा? मातामह दनुजे मय और मेरे सुर िव िजत् कालनेिम या सोचगे?
देवे हंसेगा। अब प ी बोलने लगे, भात म अब देर नह । अ ब, मुझे आ ा दीिजए।
अ णोदय से पूव ही म वै ानर क पूजा स प करना चाहता ।ं ’’ उसने भूिम म िगर
माता को णाम कया। म दोदरी ने कहा–‘‘जात, अब म या क !ं इस काल-समर म
शूलपािण शंकर तेरी र ा कर। जा, भगवान् वै ानर को आ ित देकर संतु कर और वधू,
तू मेरे ने को मेरे सामने रहकर शीतल कर। तुझे देखकर मेरे द ध ाण शीतल रह सकते
ह।’’
‘‘जा, सुल णा, माता क पद-व दना म। तब तक म वै ानर के साद से समर
जय कर लौटता ।ं ’’
सुलोचना सास क लाज छोड़ रोकर कहने लगी–‘‘ि यतम, शिशकला तो रिव-
तेज से ही उ वल रहती है।’’
‘‘जा ि ये, अब समय नह है, पूवाकाश म ललाई दीखने लगी। तू लंके री के साथ
जा। िवधाता ने तेरे सुलोचन अ ु बहाने क नह िसरजे। जा शुभे, काश फै ल रहा है।
अनुमित दे ि ये, म चला।’’
इतना कर राविण मुंह फे रकर चल खड़ा आ। सुलोचना ने दो पद बढ़ा, दोन हाथ
उठाकर, अ ुपू रत ने से देखते ए कहा–‘‘हे, कु लदेव लंका पर दया कर, िव ह म
रा सकु ल क र ा कर! हे वै ानर, अपने अभे कवच से शूल को परावृत कर! हे
कु लदेवी, तुम सा ी हो, इस िछ लता का आ य यही त राज है, इसे श ु का कु ठार पश
न कर सके !’’
115. वैदह
े ी–वैक य

रा च मा को छोड़ देगा, जगत् सुधांशु को देखकर तृ होगा, इस आशा म


रा स घर-बाहर आन दम लंका म घूम रहे थे। उनके हषानाद, जय-क लोल, वीणा,
मुरज, मुरिल-िननाद, वेद विन, आ लाद- तार देख; हाथी-घोड़ का, सेना का च ड
घोष, दु दुिभ का मेघ-गजन, भेरी- वर सुन-सुनकर पंजरब कु करी क भांित असहाया,
भय ता, पितिवयु ा, रामसखी सीता–िवधुमुखी–जनकनि दनी अशोक कानन म
शोकिवद धा बैठी भा य के झकझोर म उलझी अके ली अ ुपात कर रही थी। रि का
रा िसय का दल उ सव-कौतुल देखने चला गया था। राम-कटक को अकं टक पारकर
वामानल सिहत वीरांगना िमला सु दरी दै यनि दनी हठात् लंका म आई है। अ र दम
दुजय, वीरे धुरी इ िजत् आज राम-ल मण का वधकर लंका का उ ार करने िनकु भला
य ागार म वै ानर क उपासना करे गा, ये सब समाचार उस तक भी कृ त-िवकृ त हो प च ं
रहे थे। इस श ुपुरी म कौन उसका सहायक है, कौन उस सा वी के दु:ख को देखने वाला है?
उसके िलए भगीरथ य कर दुल य समु को िशला से बांध, धीर-वीर, दृढ़ ित राम
वानर-कटक लेकर आए ह। दो-दो बार महाबली दुजय राविण ने उ ह परा त कर
मृ युबाण से ब धा है। आज फर वह अजेय भीमिव म इ िजत् साि य से स प ,
वै ानर-वरल ध, राघवे के ाण का वैरी, स पूण रा स-कटक स भार स प कर
रहा है। हाय, आज तो लय ही हो जाएगी। कौन काल-समर म आज राघव-ब धु क
र ा करे गा? अरे , मुझ हतभािगनी के िलए आयपु के ाण दो-दो बार संकट म पड़ चुके ह।
अब आज या होगा, कौन जानता है! अरे , कसी ने भरत को हमारी इस िवपदा क सूचना
नह दी। अभी तक अयो या से रघु क अ ौिहणी सेनाएं नह आ । अरे , इस वीर
मेघनाद ने तो देवे को भी बांध िलया था। अब ऐसा कौन है जो रघुमिण क इस काल-
सप से र ा करे ? मने ही या कु मित क जो जीिवत रही और आयपु को यहां बुलाकर
संकट म डाल दया। हाय, अब या होगा? आज या होने वाला है? पवन से इस अशोक
वन के प े िहलिहलकर ममर श द कर रहे ह जैसे वे भी मेरे िवषाद से िहल-िहलकर
िवलाप कर रहे ह । शाखा के प ी जैसे मेरे ही दु:ख म दन कर रहे ह, कु सुमरािश
त मूल म पड़ी है, मानो वृ ने मन ताप से त होकर अपना ृंगार िछ -िभ कर डाला
है। न दयां जैसे रोती ई सागर-व पर पछाड़ खा रही ह। हाय, अब इस िवपत् सागर से
कौन रघुकुल को उबारे गा?’’
वैदह
े ी वैक य-भाव म म , अके ली बैठी अ ुपात कर रही थी। एक ही मिलन व
उसके अंग पर था। उसने घुटन को व म िछपा िलया था। िसर झुककर व पर िमल गया
था। शोकशीण उसका ीण कलेवर, ी म-शु क पाव य नदी-सा हो रहा था। इसी समय
सरमा रा सी आकर रोती ई सीता के चरणतल म बैठ गई। उन िनदय रा िसय के वृ द
म यही एक उसक सदय सखी थी। उसने कहा–‘‘महाभागे, सब दु चे टयां तु ह छोड़कर
आज महो सव देखने चली ग । वे सब म पी-पीकर म हो नृ य-गान कर रही ह। इसी से
सुयोग पा, म तु हारी चरण-व दना करने आई ।ं ’’
सीता ने अ ुपू रत दृि से सरमा को देखकर कहा–‘‘हे सखी, इस रा सपुरी म तू
ही मुझ पर सदय है। हाय, मने तो कभी व म भी कसी ाणी का अिहत- चंतन नह
कया। िपता क आ ा से जब आयपु रा य याग चुपचाप वन चल दए, तो छाया क
भांित म भी उनके पीछे चल दी। हम गोदावरी के तट पर उसी कार रहते थे, जैसे ऊंचे
वृ पर कबूतर-कबूतरी घ सला बनाकर रहते ह। िबना कसी को दु:ख दए हम क द, मूल,
फल खाकर रहते थे, दु:खात क सेवा करते थे। आयपु के साि य म तो म राजसुख को
भूल ही गई थी। हमारी पणकु टी म फू ल का सौरभ वहां के पवन को सुखद बनाता था।
मोर-मोरनी हमारी कु टी के ार पर नृ य करते थे। वन के हाथी-हिथनी और मृग-शावक
िनभय मेरे िनकट आते थे। प ी िविवध कलरव कर हमारा मनोरं जन करते थे। म फू ल क ,
फल क , पि य क , वृ क , पशु क , मृगशावक क समभाव से ीित-सिहत सेवा
करती थी, आदर और य से। सरोवर का िनमल सिलल मेरा आरसी था। आयपु िन य
ताजे शतदल कमल सरोवर से लाते थे और मेरी वेणी म अपने हाथ से गूंथते थे। हाय!
कस दुभा य से मेरे वे सु दन लु हो गए! अब या मेरे ये द ध च ु इस जीवन म उन
पादप को देख सकगे?’’
इतना कहकर वैदह े ी शराघात से िव प ी क भांित सरमा क गोद म िगरकर
रोने और छटपटाने लगी।
सरमा ने कहा–“िवधुमुखी, इस कार हताश और कातर न हो! मेरी बात सुनो,
िशलाएं सागर क लहर पर तैर रही ह। महातेज, दुरंत, दुजय, सवजयी, देव, दै य-नर-
ास कु भकण का िछ -िभ शरीर सागर-तट पर पड़ा है। रावण के सब पु , प रजन,
सुभट, गु मपित, अजेय यो ा मरण-शरण हो गए। ि भुवन िवजयी यो ा क लाश
सागर-तट पर िग और शृगाल खा रहे ह। लंका अब वीरशू य हो गई। र े रावण
शोकद ध, भ -मन ठं डी सांस लेता है। मिणमहालय के सब रास-रं ग मौन ह। लंका पर
चील और िग के मंडराने से अशुभ छाया छा रही है। अब लंका क िवधुमुखी युवितयां
मंगल-गान नह करत , वे अपने नव वैध के दुभा य म म िवलाप करती ह। लंका के
घर-घर शोक मूत प घूम रहा है। यह अब वह लोक-िव ुत लंका नह रह गई है। हे
रघुवधू, र े क आशा का आधार अब के वल यही दुर त, सविजत् मेघनाद है। यह रौ
तेज से स प , द ा से सि त, अिमत वीयव त पु ष है। इसके मरते ही र े को
तुम मृतक ही समझो और लंका का यह आज का हष लास तो बुझते ए दीपक क लौ
है।’’
सरमा के ये वचन सुन सीता आ त होकर बोली–‘‘ क तु सखी, यह दुर त रपु
दो-दो बार दोन रघुकुमार को जय कर चुका है। आज ही सुना है, वह पूण रौ तेज से
अिभभूत हो, सा ात् काल प समरांगण म जा रहा है। आज कै से इस दुर त श ु से
आयपु क र ा होगी?’’
सरमा ने कहा–‘‘देिव, मेरी बात सुनो, द ा के रहते रौ तेज स प इस
दुर त मायावी का वध अस भव है। पृ वी का कोई, देव, दै य, दानव इस अजेय का वध
नह कर सकता।’’ फर उसने सीता के कान के पास मुख लाकर म द वर म कहा–‘‘अभी
कु छ ण म यह दुर त राविण श रिहत िनकु भला य ागार म एकाक जाएगा। यही
समय है क राघवे कसी तरह वहां प च ं कर उसका वध कर डाल। अभी सूय दय नह
आ है, पर तु भात होने म देर नह है। मिण-महालय क दु दुिभयां बज रही ह। अभी
वीरे मातृपद-व दना करने जाएगा। पीछे वह िनकु भला य ागार म एकाक िनर बैठ
वै ानर को आ ित देगा। इसम उसे आधा याम समय लगेगा। अभी भी य द राघवे को
कोई यह सूचना दे दे और राघवे यह दु सह साहस कर सक तो िन य ही यह मृ युंजय
मरण-शरण हो सकता है।’’
सरमा के ये वचन सुन भय से थर-थर कांपती ई रघुवधू सीता ने धड़कते कलेजे
पर हाथ रखकर कहा–‘‘ क तु सखी, कौन वीर लंका म ऐसा है जो मेरा ि य करे ? यह गु
संदशे रघुमिण को दे? फर रघुमिण िनकु भला य ागार तक प च ं गे कै से? कहां है वह
य ागार? वहां तक प च ं ना सुकर होगा भी या नह ?’’
सरमा ने उसी भांित मैिथली के कान म मुंह सटाकर कहा–‘‘रघुवधू, लंका के उ र
कोण म एक िवकट वन है, वह एक मनोरम सरोवर है। उसी के म यभाग म यह वणलय
िनकु भला य ागार है। उस सरोवर म दुलभ नीलो पल िखले ह। रथी भगवान वै ानर
को वेद-म से अिभमि त करके उ ह उ पल क एक सह आ ितयां देगा। उस
भयंकर दुगम वन म एक सह शूलपािण रा स भट सय चौकसी करते ह। य द ी राम
उस वन म साहसपूवक िव हो सक तो मनोरथ पूरा हो सकता है। यह अवसर चूका सो
चूका।’’
सीता ने िवकल भाव से सरमा का हाथ पकड़ िलया। उ ह ने कहा–‘‘सखी, यह
स य है क यह अवसर चूका सो चूका। सो सिख, तू ही यह ाणा त उ ोग मेरे िलए करे तो
हो सकता है, नह तो नह ।’’
‘‘म ही क ं गी वैदह
े ी, तुम िनि त रहो। म तु हारा दु:ख नह देख सकती। तु हारे
भा य से रघुिम गदापािण धीर िवभीषण राम क सेवा म ह। चाह तो अनायास ही गु
प से िनरापद राघवे को या उनके ाता को िनकु भला य ागार के अगम े म ले जा
सकते ह, जो सह भट-रि त है और जहां िबना अनुमित वायु का भी वेश नह हो
सकता।’’
‘‘तो अरी, मेरी ाणदा ी सखी, एक-एक ण ब मू य है, तू अभी जा! हे द ा,
तू रघुवंश क लाज रख। तुझे वीरमिण मा ित िमल, सौभ ल मण िमल या आयपु दीख,
उनसे तेरा सा ा कार हो, तो तू अपना गु िनवेदन उ ह से कर आ!’’
इतना सुन सरमा तुर त वहां से अदृ य हो गई। रह गई वैक य-िवकल,
भा यद धा, एका कनी, ि य-िवयोिगनी वैदह े ी–आशा-िनराशा के झूले म झूलती-सी।
116. कू ट योग

उषा का उदय हो रहा था। राम-कटक सज रहा था। पर राम सब सेनािनय सिहत
ाकु ल भाव से बैठे परामश म म थे। िवभीषण, सु ीव, अंगद, जा बव त, नल, नील,
गय, ि पद, ॠ , वृषभ सभी सेनानायक, गु मपित राघवे को घेरे, आज होनेवाले काल-
समर के स ब ध म परामश कर रहे थे। लंका म यु के नगाड़े गड़गड़ा रहे थे। रा स के
जयिननाद और हष लास सुन-सुनकर वानर-सै य के मन म शंका का भूत बैठ रहा था।
राम ने कहा–‘‘िम र े , यह तो असा य साधन है। भला यह कै से स भव हो सकता है
क दुजय मेघनाद का िनर वध कया जाए? ऐसा सुयोग हम पा ही कै से सकते ह? हाय,
यह हमारा दुभा य ही समझना चािहए क सुरे का अनु ह और उमा, हेमवती का साद
पाकर भी हम उससे लाभाि वत नह हो रहे। र े , कहो, अब तु ह रघुवंश क डू बती
नाव को पार लगा सकते हो।’’ गदापािण िवभीषण ग भीर सोच म िनम हो गए। इसी
समय वानर-सै य को िवि मत करते ए मा ित सरमा को राम के स मुख ले आए। उ ह ने
कहा–‘‘यह रा सबाला आपके पादप म कु छ कू ट िनवेदन करना चाहती है।’’ राम ने
कहा–‘‘कह भ ,े म तेरा या ि य कर सकता !ं ’’
सरमा ने थम राम-ल मण को, फर िवभीषण को णाम करके कहा–‘‘धमा मा
रा सराज िवभीषण मुझे पहचानते ह, पहले ये सा ी द तो म कू ट िनवेदन क ं ।’’
िवभीषण ने कहा–‘‘म तुझे पहचानता ,ं तू सरमा कं करी है। मुझे मरण होता है,
तू अशोक वन क रि का रा सी सै य क अिध ा ी है।’’
‘‘और वैदहे ी क कं करी भी।’’
‘‘यह भी मने सुना था, भगवती से सौहाद रखने के कारण रा से क धषणा भी
पा चुक है।’’
‘‘तो राघवे स ह और कं करी के वचन पर िव ास कर। या म यहां सबके
सम कू ट िनवेदन क ं ?’’
‘‘कह भ ,े ये सब हमारे िव त सेनापित ह।’’
‘‘तो रथी मेघनाद इस ण एकाक िनकु भला य ागार म वै ानर क पूजा
कर रहा है। राघवे साहस कर तो इसी ण उसका िनर वध कर सकते ह। बस यह ण
चूके तो चूके।’’
यह सुनते ही सौिम उछलकर खड़े हो गए। उ ह ने कहा–‘‘हे क याणी, या तू
िनकु भला य ागार का माग जानती है? या तू माग बताकर अपना अनु ह शतगुण कर
सकती है?’’
‘‘गदापािण रा सिशरोमिण धमा मा िवभीषण को आपका वरद साि य ा
है। ये चाह तो आपको गु प से अग य य ागार म सश , िनर एकाक राविण के
स मुख, एक मु त म ही ले जाकर खड़ा कर सकते ह।’’
‘‘तो आय, अब िवल ब मत क िजए, अनुमित दीिजए, उषा का उदय हो रहा है।’’
राम ने आ नयन होकर कहा–‘‘भाई, िजसे देखकर देव, दै य सभी भयभीत होते
ह, िजसने देखते ही वानर-कटक से रि त हम बात क बात म शरिव कर दो-दो बार
भूपितत कया, उसके स मुख तु ह कै से जाने दू?ं िजस िवषधर के िवष से देव-नर तुर त
भ म हो जाते ह, कै से म उसक बांबी म तु ह अके ला भेजूं? अरे सौिम , सीता के उ ार का
अब कु छ योजन नह है। मने थ ही समु पर सेतु बांध श ु-िम के र से पृ वी को
रं गा। भा य-दोष से मने रा यपाट, माता-िपता, ब धु-बा धव सभी को खोया। इस मेरे
अ धकारावृ जीवन म एक जनकसुता सीता ही दीपिशखा थी, सो अदृ ने उसे भी बुझा
दया। अब एक तु ह मेरी आशा के आधार हो, तु ह म नह खोऊंगा। चलो सौिमि , वन
को लौट चल।’’
ल मण ने कहा–‘‘आय, ये कै से वचन म आपके मुंह से सुन रहा !ं लंका का
सौभा य सूय डू ब गया। लंका के जग यी सुभट के शव को िग और शृगाल खा रहे ह।
लाइए देवा , म अभी–इसी ण नराधम राविण का हनन करता ।ं ’’
िवभीषण ने अब धीर वर म कहा–‘‘राघव, सौिमि ठीक कहते ह, म उनके साथ
,ं आप िच ता न कर। सरमा का कू ट िनवेदन ब मू य है। यह भगवती क शुभिचि तका
कं करी है, इस पर संदह
े का कोई कारण नह है। यह कू ट योग हम चूकना नह चािहए।’’
‘‘िम ,’’–राम ने संत वर म कहा–‘‘जब मने िपता क आ ा से वनगमन कया
तो वीरवर ल मण त ण यौवन म सब सुख को ितलांजिल दे, वे छा से मेरे पीछे वन को
चल दए। तब माता सुिम ा ने नयना ुपात कर कहा था–‘राम, मेरे इस नयन-मिण को,
मेरे दय-धन को य से रखना!’ सो म अब इस ातृर को कै से संकट म डालूं, अथवा
प रणाम जो हो सो हो, म भी तु हारे साथ चलूं?’’
िवभीषण ने कहा–‘‘महाराज, आप कातर न ह । धैय के कु छ ण ही आते ह, जब
धैयवान क परी ा होती है। सरमा का कू ट योग ब मू य है, अब आप हम आ ा दीिजए।
ये ण थ ही जा रहे ह।’’
राम ने म तक नवा आंख से अ ु िगराए और कहा–‘‘लाओ देवा , म अपने हाथ
सौिमि का वीर-शृंगार क ं गा।’’ उ ह ने द कवच धारण कराकर, कमर म कृ पाण,
पीठ पर उमाद ढाल, हाथ म नागिस द धनुष, पीठ पर अ य तूणीर कस दया।
म तक पर लौह ाण सजा दया। सौिमि ने राघवे क दि णा करके सा ांग द डवत्
कया और कहा–‘‘आय, आशीवाद दीिजए, म आज दुधर श ु का संहार क ं !’’
‘‘भाई, जैसे पीठ दखाते हो, वैसे ही मुंह दखाना। िम र े िवभीषण मेरे
जीवन और मृ यु तु हारे ही हाथ ह। म अपना र तु ह स पता ।ं अब और या क ?ं
मातिल, सौिमि को तुम ले जाओ और ऐसे ही ले आओ, देव!’’
इतना कह राम िवकल भाव ले उि मन खड़े रहे। सौिमि और िवभीषण द
देवरथ म बैठ त ु गित से, िनकु भला य ागार म नीलप क म पूत आ ित देते ए
य दीि त, राविण का िनर वध करने चल पड़े।
117. जनरव

कनक-लंका म आन दो सव होने लगे। दु दुिभयां गड़गड़ाने लग । वीर वािहिनयां


सज-सजकर चतु पद पर एक होने लग । घर-घर बाजे बजने लगे, नत कयां नाचने
लग । ग ध वयां गान करत चतु पद को पादाघात से मुख रत करने लग । आज का
भात लंका म आशा और आन द के वाह को लेकर आया था। नाग रक पर पर स
मु ा म बात कर रहे थे। गृह थ ने अपने गृह ार फू ल से सजा दए, िखड़ कय म मंगल-
दीप रख दए। गृहा म रं ग-िबरं गी वजाएं फहराने लग । अपने सौरभ से पुरी को
आपूयमाण कर मलय-मा त पु पग ध आमोद म ा हो गया। रात-भर लंका ने जागरण
कया, य ानु ान कए, वेद विन क । वीरे कल राम को मारे गा, ल मण का भी वध
करे गा। रा स-दल वानर-कटक को मार-मारकर समु के अतल तल म डु बो देगा। लंका के
नाग रक आशा के झकोर म झूम रहे थे। राज- ासाद के ांगण म सै य सि त हो रही
थी। ध से गड़गड़ा रहे थे। हाथी, घोड़े, पैदल पंि बांधे खड़े थे। सेनानायक तालजंघ गु म
का ूह रच रहा था। िव पा नगर-र ा का िवधान रच रहा था। िखड़ कय से पौरवधुएं
पु प और लाजा-वषा कर रही थ । हाथी चंघाड़ रहे थे। घोड़े िहनिहना रहे थे। मि दर म
वेदगान हो रहा था। तोरण पर भात-राग अलाप ले रहा था। पुरजन इधर-उधर आते-
जाते बात कर रहे थे। एक ने कहा–‘‘ज दी कर िम , ाचीर पर चढ़ा जाए, िजससे आज
का यु देखने को िमल जाए। फर थान नह िमलेगा।’’
दूसरे ने कहा–‘‘अरे , अभी ठहर, अ र दम इ िजत् अभी भगवान् वै ानर क
उपासना कर रहा है। वह अभी आकर स पूण रा स- ूह का िनरी ण करे गा। देखता नह ,
तालजंघ महानायक कै सी त परता से ूह-रचना कर रहा है!’’
तीसरे ने कहा–‘‘आज िभ ुक राम का िन तार नह है। कु ल ोही महाराज
िवभीषण भी आज अपने कम-फल भोगगे।’’
चौथे ने कहा–‘‘अरे , वह मायावी राम तो मर-मरकर भी जी उठता है। देवगण
उसके प म ह।’’
‘‘तो या आ, देवराज इ के व को थ करने वाले अ र दम र राजपु
आज काल-पु ष क भांित सब देवता के य थ करगे। चलो, ाचीर पर चढ़कर
देख।”
‘‘ ाचीर पर चढ़कर या होगा! अ र दम इ िजत् तो पल-भर ही म राम को मार
डालेगा।’’
‘‘सच कहते हो। जैसे अि सूखी घास को भ म करती है, वैसे ही युवराज श -ु
संहार करता है। उस-सा यो ा पृ वी पर और नह है।’’
‘‘अरे , देखते रहो, अभी एक मु त म वह उन दोन वनवािसय को मार, अधम
िवभीषण को बांधकर ले आता है।’’
‘‘ध य है मही , मिहदेव, र पित, पौल य, जगदी र रावण र े , वह जगत्
म मिहमा का समु है। कहो भला, पृ वीतल पर और कसका ऐसा वैभव है? पर तु इस
िभखारी राम ने उस र मयी लंका को िवधवा बना दया। देखा, समु -तीर पर पवत के
समान कु भकण महाराज समर-भूिम म पड़े ह। भला इस बात क भी कोई क पना कर
सकता था?’’
‘‘अरे , तभी तो लंका के हेमकू ट के समान गगनचु बी ासाद क हाथी-दांतजड़ी
िखड़ कय और वण ार से, िनहत वीर क लानवदना रा स-वधुएं सा ुनयन समर-
े क ओर देख रही ह।’’
‘‘हां भाई, सच है। लंका क भांित वैभव इस लोक म भला कहां था? पर जगत् म
ि थर कौन है? सागर-तरं ग क भांित एक व तु आती और दूसरी जाती है। चलो भाई, चलो
देख; अब तो ाचीर पर नरमु ड दीखने लगे।’’
118. रथी –वध

अग य, सह -सह सुभट-रि त िनकु भला य ागार म रथी इ िजत्


कु शासन पर अके ला बैठा था, र कौशेय और य ोपवीत पहने। भाल पर र च दन का
लेप, क ठ म जपापु प क माल। धूपदान म ग ध जल रहे थे, एक सह घृत के दीपक
जल रहे थे। नीलो पल का ढेर लगा था। वणघट म समु -जल भरा था। स मुख वणघट
था। र -पा म पूजा-साम ी थी। रथी िनमीिलतने वेद-म पाठ कर आ ित दे रहा
था।
ुधातुर ा जैसे गोशाला म िव होता है, उसी भांित बली सौिमि ने
झपटते ए, िवकराल देवद ख ग कोश से ख च, रथी को ललकारा।
ललकार तथा श क झनझनाहट सुन रथी मेघनाद ने चौक े होकर ने
खोल, सौिमि क सौ य मू त को देखा। उसने समझा, स हो भगवान् वै ानर ने ही
य दशन देने का अनु ह कया है। उसने उठकर, दूर ही से भूतल म िगर, सा ांग णाम
कर ब ांजिल हो कहा–‘‘देव वै ानर, यह दास आज आपक आराधना कर रहा है, या
इसीिलए आपने इस प म कट होकर दास पर अनु ह कया है? हे देव, म आपको णाम
करता !ं ’’
ल मण ने कहा–‘‘सावधान राविण, म वै ानर नह –तेरा काल सौिमि ।ं म
अभी तेरा वध करता ।ं ’’
मेघनाद ने भयभीत होकर िवि मत ने से सौिमि को देखकर कहा–‘‘तू
सौिमि मानव है! कह, कस कौशल से तू इस अग य य ागार म घुसा? इसका ाचीर
दुल य है, असं य यो ा च ाविल के प म चार ओर श पािण घूम रहे ह, ार पर
दुजय यो ा का पहरा है। देव और मानव म ऐसा कौन वीर ज मा है जो अके ला इस
रि त आगार म आने का साहस कर सके ? नह -नह , आप अव य ही भगवान् वै ानर ह।
इस दास को वंचना से मु कर वर द क म राम का वध कर लंका को िन शंक क ं ।
देिखए, सेनाएं ृंगनाद कर रही ह, म अब िवल ब नह कर सकता।’’
ल मण ने कहा–‘‘अरे दुर त राविण, म तेरा काल यहां उपि थत ।ं आयुहीन जन
को काटने के िलए काल-सप धरती को फोड़कर िनकल आता है। रे देवकु ल ोही, आज म
यह तेरा हनन क ं गा।’’
सौिमि ख ग िलए आगे बढ़ा। मेघनाद ने पीछे हटते ए कहा–‘‘ठहर, तू य द
स य ही रामानुज ल मण है, तो म अभी तेरी यु -कामना पूरी करता ।ं हे वीर, तू मेरे
धाम म पहली बार आया है, इसिलए श ु होने पर भी अितिथ है, ण-भर मेरा आित य
हण कर। म तिनक वीर-साज सज लूं, अ ले लूं।’’
ल मण ने गरजकर कहा–‘‘अरे मूढ़, बाघ के जाल म फं सने पर या करात उसे
छोड़ देता है? म तेरा इसी ण िनर वध क ं गा।’’
मेघनाद ने ु होकर कहा–‘‘अरे , अधम मानव, िनर श ु पर आघात करना
वीरकु ल क मयादा नह । तूने चोर क भांित मेरे मि दर म वेश कया है। ठहर, म तुझे
चोर ही क भांित द ड दूग ं ा।’’ उसने एक ृंगपा उठाकर ल मण के िसर पर दे मारा।
िसर पर करारा आघात खाकर ल मण घूमकर भूिम पर िगर पड़े। अब मेघनाद
उनक तलवार लेने को झपटा। इसी समय भीमकाय शूल हाथ म िलए िवभीषण ने उसका
माग रोक िलया। िवभीषण को स मुख देख राविण ने ोध और घृणािमि त वर म
कहा–‘‘अहा, अब समझा क रामानुज ने कस कौशल से श ुपुरी म वेश कया। तात,
आपको िध ार है! अरे ! मिहदेव जगदी र आपका सहोदर, महातेज कु भकण आपका भाई
और यह दास आपका ातृपु इ -िवजयी। सो आपने अपने घर का ार चोर को
दखाया? या क ,ं आप िपतृतु य गु जन ह। कृ पा करके राह छोड़ दीिजए। म श ागार म
जाकर श पािण हो, अभी इस चोर रामानुज को मृ यु क गोद म सुलाकर लंका के कलंक
को दूर क ं गा।’’
िवभीषण ने कहा–‘‘तेरा अनुरोध वृथा है, म राम का अनुगत ।ं ’’
‘‘अहा, यह आपने या कहा? हाय, आप! राम के दास! अरे , कहां आप महाकु ल के
ज मधारी और कहां अधम राम! यह रामानुज कतना ु है जो िनर यो ा पर
श ाघात करता है! यह या महारिथय क था है? ह टए, मुझे श ले आने दीिजए। म
देखूंगा, इस काल के मुख म आए हतायु रामानुज को अब कौन मेरे हाथ से बचाता है? हटो,
ार छोड़ो!’’ पर तु िवभीषण ने ार नह छोड़ा। उ ह ने कहा–‘‘रावण तो अपने कम-दोष
ही से लंकासिहत र कु ल को डु बो रहा है। मने तो धमा य िलया है!’’
मेघनाद ने गरजकर कहा–‘‘तुमने धमा य िलया है? कस धम के मत से तुमने
ातृ व और जाित व को ितलांजिल दी है? अरे , अरे !’’
इसी ण हठात् सौिमि ने सावधान हो द धनुष से बाण-वषा आर भ कर दी।
मेघनाद के शरीर म बाण िछद-िछदकर र क धार बह चली। मेघनाद ने आहत पशु क
भांित ची कार करते ए कहा–‘‘अरे अधम चोर, ठहर, ठहर, रे ठहर!’’ उसने य पा , घंटा
उठा-उठाकर ल मण पर फकने आर भ कए। ल मण ने द धनुष से चौमुखी बाण-वषा
कर मेघनाद के अंग- यंग को छलनी कर दया। वह बचने को इधर-उधर दौड़ने और
िच लाने लगा। ल मण क चतुमुख बाण-वषा से चम कृ त होकर आतनाद करता आ
मेघनाद बोला–‘‘हाय-हाय, अब म ऐसे मरता ं जैसे रा च को स लेता है अथवा जैसे
संह ाध के जाल म फं सकर!’’ ल मण ने उसके दोन पैर को झटपट ब ध डाला। रथी
भूिम पर िगरकर छटपटाने लगा। अब ल मण धनुष छोड़ ख ग हाथ म ले उस पर िपल
पड़े। उ ह ने बार बार िनदय आघात करते ए कहा–‘‘मर रे अधम, मर! मर रे देव के श ु
मर! पृ वी को अशा त करने वाले, मर! मर! मर!’’ रथी राविण के अंग- यंग कटकर
िछ -िभ हो गए। वह र से लथपथ छटपटाने और ल बी-ल बी सांस लेने लगा। उसने
टू टते वर म कहा–‘‘अरे नराधम पामर, मुझे मृ यु का शोक नह । पर तुझ चोर के आघात
से मेरी मृ यु ई, इसी क ल ा है। अरे नराधम, र े जब सुनकर ोध करगे तो उनसे
तेरी र ा कौन करे गा? दानव और मानव म कौन ऐसा समथ है?’’ वह मृ यु-यातना से
हांफने लगा। कु छ ककर उसने कहा–‘‘हे िपता, िवदा! हे अ ब, िवदा! आपके चरण से
मुझ अपु क िवदा! ि ये सुलोचने, दानव-नि दनी, चा -भािषणी, ाणािधके , िवदा! िचर
िवदा!’’
उसक आंख से अ ुधारा और शरीर से र धारा अिवरल बह चली। अ त म
उसका िसर िगर गया, ने उलट गए। ाण-पखे उड़ गए।
िवभीषण शूल फक रोते ए उससे िलपट गए। रोते-रोते वे कहने लगे–‘‘अरे पु ,
रा सराज रावण के आशा त भ, म दोदरी के नयनतारे , सुलोचना िमला के ाण, तुझे
यह या हो गया? उठ व स, उठ! मने तो तुझे घुटन पर िखलाया था। अरे , एक बार उसी
भांित हंसकर बोल! ि य, म कु लांगार िवभीषण तेरा िपतृ ।ं म अभी ार खोलता ,ं तू
श लेकर लंका का कलंक दूर कर। हाय-हाय, रा स-कु ल का सूय तो म या न ही म अ त
हो गया। अरे वीरमिण, भूतल म य पड़ा है? अरे , रा स-सै य जयो लास से गरज रही है,
ृंगीनादी नाद कर रहे ह। घोड़े भैरवनाद से िहनिहना रहे ह, रा स-सुभट वीर साज सजे
तेरी ती ा म खड़े ह। उठ वीर उठ!’’
ल मण ने िवभीषण के क धे पर हाथ धरकर कहा–‘‘रा सपित, दु:ख का दमन
क िजए, वृथा शोक से या लाभ है! चिलए, अब शी आय राघवे क सेवा म प च ं
उनक आशंका दूर कर।’’
उ ह ने गदापित िवभीषण को हाथ का सहारा देकर उठाया और गु राह से जैसे
आए थे, उसी भांित दोन वहां से पलायन कर गए।
119. व पात

महीपित र े ने आज भोर ही म सभाभवन म आ र - संहासन सुशोिभत


कया। म ी, सभासद् सभी उद मन अपने-अपने आसन पर बैठे। र े ग भीर भाव से
मौन बैठा रहा। फर उसने कहा–‘‘ या वीरपु का वै ानर-य स पूण आ? रा स-सै य
या रण े को थान कर गई? पु ने राजमिहषी क तो चरण-व दना क , पर मेरे
िनकट मेरा आशीवाद लेने नह आया? म आशीवाद देता –ं वह आज श ु का हनन कर
लंका-कं टक दूर करे । पर तु म जय-िननाद नह सुन रहा ।ं हाथी नह चंघाड़ रहे, न घोड़े
िहनिहना रहे ह। यह मेरे दय म क-सी कै सी उठ रही है! सभासदो, म तो अब वणासन
पर ि थर नह रह सकता। मेरे ाण अधीर हो रहे ह। या सेना थान कर गई?’’
सारण ने अधोमुख हो कहा–‘‘शृंगी-नाद तो नह सुनाई दे रहा है। क तु यह
कोलाहल कै सा है?’’
‘‘यह तो बढ़ता ही जा रहा है। यह सेना का जयनाद नह है। अब यु के ध से
एकबारगी ही कै से बजने ब द हो गए? भेरी-नाद कहां सुनाई दे रहा है?’’
रावण ने िवकल दृि से चार ओर देखा। इसी ण एक चर आकर–‘‘हे परमे र,
हे र े र, हे मिहदेव’’ कहता, भूिम म आ िगरा।
इसके बाद दो-चार-दस-पचास-सौ।
‘‘यह या? कोई बोलता य नह ?’’ रावण ने गरजकर कहा। पर तु दूत के मुख
से बात नह फू टी। वे–‘र ा करो, र ा करो’–कहकर िसर धुनते ए भूिम म पड़े रहे।
रावण का मन हाहाकार कर उठा। उसने कहा–‘‘कोई भी कु छ नह कहता। ये सब
तो अ त ह, िनरापद ह, फर इतने कातर य ह?’’ र े मिणपीठ यागकर खड़ा हो
गया। उसने कहा–‘‘अरे कहो, या संवाद है? या वीरपु ने थान कर दया? चतुरंिगणी
सेना या श ु के स मुख प च ं चुक ?’’
दूत िसर धुनने और िवलाप करने लगे।
रावण ने कहा–‘‘अरे कहो, तुम सब इतने शोकातुर य हो? या तुम कोई
अमंगल वाता करना चाहते हो। य द अ र दम ने राम को मार डाला है, तो कहो, म सभी
को राज साद दूग ं ा।’’
एक वृ दूत ने िसर उठा, मुख म तृण दाब कांपते-कांपते कहा–‘‘हे पृ वीनाथ, यह
अधम दास अमंगल-वाता कै से कहे? हाय! वह बात कहने से पूव ही मेरी जीभ कटकर िगर
जाए।’’
‘‘अमंगल-वाता! कै सी अमंगल-वाता? अ छा शुभाशुभ जो हो, वही कह। शुभाशुभ
तो िविध का िवधान है। झटपट कह–म तुझे अभयदान देता ।ं ’’
‘‘हे जगदी र! मृ यु य, रथी , इ िजत् युवराज का िनकु भला य ागार म
कसी अ ात छली ने वध कर डाला। उनका र लुत अंग-अंग िन ाण शरीर य भूिम म
पड़ा है।’’
यह सुनते ही रावण कटे वृ क भांित भूिम पर िगर गया। सभासद ने दौड़कर
मू छत मिहदेव को उठाया। सहसा सैकड़ -सह रा स भट रोते-िच लाते छाती कू टते
सभाभवन म घुस आए।
रावण ने चैत य होकर अपने चार ओर देखा। मि वर सारण ने ब ांजिल
िनवेदन कया–‘‘हे वामी, इस समय आप शोकावेग को न सहगे तो रा स-कु लांगना के
च ुजल म पृ वी डू ब जाएगी। हे ि लोकजयी, अभी आपको भीमा से पु घाती का हनन
करना है।’’
रावण ने उ म क भांित कहा–‘‘कौन है वह वीर? कसने रणंजय पु का वध
कया?’’
‘‘महाराज, रामानुज ल मण ने छ वेश म य ागार म िव होकर यह दु कृ य
कया। रथी जब भगवान् वै ानर को वेद-म से अिभमि त कर नील कमल क
आ ित अपण कर रहा था, तभी सौिम ने हठात् िव होकर िनर महारथी का वध कर
डाला।’’
रावण ने व गजना करके कहा–‘‘अरे वीरो, यु -साज सज लो। आज म इस शोक-
वाला से िव को भ म क ं गा।’’
सहसा लय-गजन क भांित शत-सह दु दुिभयां बज उठ ।
मिहदेव म गजे क भांित लड़खड़ाता आ अ त:पुर म प च ं ा। म दोदरी रोते-
रोते िच ांगदा और सिखय -सिहत आकर उसके पैर म लोट गई।
रावण ने आहत पशु क भांित कराहकर कहा–‘‘ि ये, धैय धारण करो। अभी तुम
शू यगृह म बैठो। म इस समय रण-या ी ।ं अभी तो मुझे पु क मृ यु का बदला लेना है।
देिवयो, अभी तो मुझे रण-साज सजाकर िवदा करो, िवलाप के िलए तु ह ब त समय
िमलेगा। म तिनक उस कपटी, चोर सौिम का दय िवदीण कर उसका ह ख ड िनकाल
लाऊं। फर इस िनरथक रा य-सुख को ितलांजिल दे, एका त म बैठकर तु हारे पु का
मरण क ं गा। अरे मिहिषयो, रोती य हो? यह रोषाि या तु हारे अ ु-जल से बुझ
जाएगी? आज तो िग र ृंग ही चूण हो गया। च मा के ख ड-ख ड हो गए। रिवम डल का
तेज ही बुझ गया।’’
म दोदरी ने कहा–‘‘देव, रा सकु ल के अि तम न आप ही तो शेष ह। भला हम
कै से आपको उस मायावी राम के स मुख जाने द? हे महाराज, कै से हम धैय धारण कर?’’
राजमिहिषय के िवलाप से िवचिलत हो रावण ने कहा–‘‘िजसके परा म से
देवलोक और नरलोक मने जय कया, िजसके भय से अतलतल म नाग भयभीत रहते थे,
देवे सुख क न द नह सोता था, िजसके म तक पर नृवंश के छ पितय के स मुख दास
क भांित कं धे पर तीथ दक का कलश रख देवराट् ने अिभषेक कया, उस रा स-कु लदीप
का चोर सौिमि ने अ यायपूवक पशु क भांित वध कर डाला! हाय, वीरमिण िनर ही
मारा गया! मने थ ही देव, दै य, नर-कु ल को जय कया! झूठ ही जग यी नाम धराया!
पर अब िवलाप से या? इससे या पु फर से जी जाएगा? म आज अधम सौिमि का
वध क ं गा, नह तो लंका म नह लौटूंगा। अरे , मेघनाद का वध हो गया, यह सुनकर कौन
रा स जीता रहना चाहेगा? सब कोई चलो, स मुख समर म पु का श ु के र से तपण
कर।’’
रावण ने अ ुमोचन कए। मि गण ने िसर झुका िलए। सेना ने संहनाद कया।
दानवनि दनी सुलोचना िमला ने ाना द से िनवृ हो अलंकार धारण कए।
दािसय ने साधन कया। एक-एक कर उसके अंग से अलंकार िखसकने लगे। उसने
कहा–‘‘अरी सिखयो, यह या आ? मिणमय भुजब ध पहनने से मेरा हाथ य दुखने
लगा? अंग से अलंकार य िखसकने लगे? यह मेरा दािहना ने फड़का! अरी वास ती,
वीरे चूड़ामिण य ागार म वै ानर क पूजा कर रहे ह। तू अभी जाकर उनक सेवा म
मुझ दासी का िनवेदन कर क आज वे रणांगण म न जाएं। आज न जाने या हो, मेरा मन
तो डू बा जा रहा है।’’
वास ती ने कहा–‘‘देिव, तिनक सुनो तो, यह आतनाद कै सा है? कौन रो रहा है?
अरे , शत-सह क ठ रो रहे ह?’’
‘‘सुन रही ।ं सेना का क ं ार ब द हो गया, दु दुिभ क गजना िवलीन हो गई,
ृंगी-नाद नह सुनाई दे रहा। हाहाकार और रोदन- विन बढ़ती जा रही है। अरे , ये सब
पुरवासी य रो रहे ह? रथी के रहते लंका पर अब यह कौन-सी िवपि आई है। चलूं,
देखूं तो मिहषी के मि दर म या हो रहा है।’’
अधीर हो वह अधव ालंकार पहने ही सिखय सिहत, मिहषी सदन क ओर
िगरती-पड़ती चली, पीछे-पीछे सब सिखयां, जहां वातावरण घोर दन से कि पत हो
रहा था, जहां रथी के िनधन-समाचार शत-सह मुख के हाहाकार के साथ िनकल रहे
थे। पित ाणा सा वी िमला सु दरी, दानवराज-नि दनी ाणािधक पित का िनधन सुन
िछ लता क भांित मू छत हो भूिम पर िगर गई।
120. देवानु ह

ने ु िन: ास छोड़कर कहा–‘‘हेमवती ि ये, तूने यह या दु कृ य कर


डाला? मेरे अनुगत कं कर रावण और ि य राविण का अिहत करने को द ा दे दए!
अब रावण या समझेगा! महातेज बाण सुनेगा तो या समझेगा भला!’’
‘‘महादेव स ह , मुझे देविहत ि य है। देवे ने शची-सिहत कै लास म आकर
मेरी तुित क । आपको भी तो देव ि य ह। रावण और उसके पु पर आपका अनु ह है, यह
तो ठीक है, पर तु या देव-कु ल का पराभव आपको अभी है?’’
‘‘अरी शैलजा, तू इन देव के पितत जीवन को देखती नह या? िनर तर
सोमपान कर म हो अ सरा के नृ य-गान, भोग-संभोग म त रहते ह। आ मसुख ही
उनका चरम येय है। इनसे भला कभी नृलोक क भलाई हो सकती है?’’
‘‘रावण ही िव क कौन-सी भलाई कर रहा है? उनक र -सं कृ ित से आप
सहमत ह , म नह ।ं य भला वह देव-दै य, मानव-दानव सबक सं कृ ितय को
आ ा त करता है? र क शुि मुझे मा य है। म वंश-पर परा पर ा रखती ।ं आय
ने जो िपतृ-सं ा थािपत क है, िववाह मयादा बांधी है, सौर-च -म डल थािपत कए
ह, य िविध वेद-िविहत क है, कृ िष, वािण य, रा य- थापना, रा य- व था क जो
मयादाएं बांधी ह–उ ह ने तो नृवंश म स यता और नीित क मया दत सं कृ ित थािपत
क है। या रावण ने ऐसा कया है? वह दुर त तो अपने परशु ही को सव प र समझता है।
यु ही से सब बात का िनणय करता है। िवचार-भावना उसम कहां है? जन, जनपद-
र ण वह कहां कर रहा है? आप उस पर स ह, म नह ।ं फर वह पितत पर ी को
बलात्-हरण करता है, यह तो अ य त अमया दत है, अस है, ग हत है। कै से आप देव-
दै य-कु लपू य देवािधदेव उसके इस दु कृ य का समथन करते ह?’’
‘‘देवगण ही कौन-सा सुकृत कर रहे ह। इस पितत देवे को ही ले लो। इसने माता
को मारा, िपता क ह या क , यितय को कु को िखला दया, चोरी क , ूण-ह या क ,
वृ और िव प का छल से वध कया, इसके अनाचार का कु छ ठकाना है! िव णु क
शह पाकर इस दुरा मा ने महा मा बिल को बांध सारा दै य-सा ा य िछ -िभ कर
दया। अब ये देव कौन-सा सुकर काय कर रहे ह? यह धूत वामदेव नारद, अरे , इलावत का
वही भु खड़ ॠिष िजसे मने कै लास म आने क मनाही कर दी है, के वल मधु और सोम के
लालच म उस पातक इ क तुित क ॠचाएं रच रहा है!’’
‘‘पर तु ह ष विश ने भी तो इ क तुित क ॠचाएं रची थ , वे भी तो
उसका तुित-गान करते ह?’’
‘‘दास के आि त ह ना, इसी से। दवोदास और सुदास पर देवे और देव का
अनु ह हो, यही तो उनका येय था। सो पूरा आ तो उसे छोड़-छाड़ आयावत म चले
आए। िम ाव ण है, यह जान सूयवंिशय ने उसे पुरोिहत बना िलया है, पर तु म तो देवे
क चचा कर रहा ।ं ’’
‘‘वह तो देवािधदेव क तुित करता अघाता नह है।’’
‘‘तो इससे या म उसके पातक पर दृि नह दूग ं ा? िव णु ही को लो, वह दास
का िम था, पर जब इ ने दास के नेता वृ पर पंचिस धु म आ मण कर उनके दोन
अव य नगर, ह रपायु और महे ार व त कए, तब िव णु ने या दास क मदद क ?
वह देखता रहा। सो के वल इसी इ के कहने से। उसने प कह दया–‘वृ िम ो
हिन य सखे िव णो िवतरं िव म व।’ उस समय इलावत और सुषा ा त म आ द य का
ाब य होने से िव णु क ही चलती थी। दास का पराभव कर, उनक उ सं कृ ित का
िव वंस कर, उनसे चालीस वष तक सं ाम कर, इस पितत चोर ने जब उनका वंस कया
और अपने परम िहतैषी व िनमाता व ा के पु ि शीष िव प को िव ासघात करके
मार डाला, तब उस ा का कसी ने या कर िलया? उ टे सद यु, पु कु स ने सहायता
देकर इ का सावभौम रा य थािपत करा दया। य द म महातेज बाण को सहायता नह
देता, तो दै य का तो वंश ही न हो जाता।’’
‘‘सो देव-साि य म महातेज बाण स प तो है!’’
‘‘इसी कार रावण भी स प रहे। अब ये ही तो दो समथ वंश रह गए, जो
ाचीन नृवंश का ितिनिध व करते ह। इसी से म उन पर सदय ।ं रावण जो आय-अनाय
का भेद िमटाकर समूचे नृवंश क एक वै दक सं कृ ित थािपत करना चाहता है, सो बुरा
या है? पृ वी के वामी ये आ द य ही रहगे? दै य-दानव का, नाग का, ाचीन वंश ही
न हो जाएगा? म कदािप ऐसा न होने दूग ं ा। आ द य ने इलावत म देवलोक थािपत कर
िलया और भारतवष म आयावत। अब वे समूचे भारतवष ही को आयावत बनाना चाहते
ह। जानती हो, अग य ने द डकार य म उपिनवेश थािपत कया है। आयावत के
बिह कृ त आय वहां आ-आकर उसे स प कर रहे ह।’’
‘‘तो देव, इसम हािन या है? आय क सं कृ ित वि थत है, मया दत है।’’
‘‘पर वही वै दक सं कृ ित नह कही जा सकती। वेद क ॠचाएं के वल आय ही ने
नह रची ह। उसम दास और एल का भी उतना ही भाग है, िजतना आय का। इ ने
दास पर आिधप य जमाकर उनक मिहदेव क पर परा भंग कर दी। दास के रा य म
शासन और यजन मिहदेव करते थे। इ ने इस व था को भंग कर दया। यितय ने
उसका िवरोध कया तो उ ह मरवाकर उनका मांस कु को िखला दया और सव अपनी
पूजा चिलत क ।’’
‘‘पर तु रा स क सं कृ ित म तो नरमांस-भ ण का चलन है!’’
‘‘य -बिल का चलन तो इसी इ ने दास-पराभव के बाद कया था। नर-बिल
का भी दािय व उसी पर है। रावण ने तो बा पर परा को सि मिलत कर सबका
सम वय कया है। उसने कोई नई पर परा तो नह थािपत क !’’
‘‘आप देवािधदेव ह। देव-दै यपूिजत ह, फर आप देवराट् पर सदय य नह ह?
देव का िहत-अिहत य नह िवचारते ह?’’
‘‘म तो सभी पर सम-भाव रखता ।ं कहो, या देवे क भांित रावण ने अथवा
मेरे ि य िश य राविण ने भी कोई दु कम कया है?’’
‘‘यह जानक -हरण या दु कम नह ?’’
‘‘और सूपनखा के रा य म रहकर उसी का बबरतापूवक अंग छेद करना दु कम
नह है? कहो तो, सूपनखा ने कौन-सा अपराध कया था? उसने तो वैध वयंवर का
ताव कया था।’’
‘‘पर तु एक ी ती राम ने उस कामचा रणी को वीकार नह कया।’’
‘‘तो उस महा ित वंश क राजपु ी के ताव का उपहास य कया? ल मण
के पास जाने का संकेत य कया? ताव करने पर ल मण ने उस रा सबाला का अंग-
भंग य कया? यह सब तो अ य त ग हत आ।’’
‘‘पर इसम सीता का या अपराध था? सीता का हरण य आ?’’
‘‘म तो उसका अनुमोदन नह करता। पर रावण को इसके िलए दोषी भी नह
मानता।’’
‘‘तो देव दाशरिथ राम भी महावंशो व है, वह मानवे है। सीता के िलए उसका
लंका पर अिभयान या य ही है।’’
‘‘सो वह और रावण पर पर िनबट। देवी ने य उस पर अनु ह कया?’’
‘‘के वल देवे के अनुरोध से और सीता का दु:ख समझकर।’’
‘‘िजससे वह कपटी देवे अकं टक हो देव सिहत आन द से सोमपान करे ,
यौवनो म अ सरा के नृ य-गीत म म त रहे, आय के य भाग का भोग करे और
मनमाने दु कम करे !’’
‘‘देव, स ह , सोमपान तो देवािधदेव भी करते ह। वह िवजया सोम ला रही है,
वणकलश म भरे , ऊनी छ म छानकर।’’
ने हंसकर उमा क ओर देखा। िवजया ने सोम-पा उनके स मुख रखा। उमा ने
पा म सोम लेकर धूज ट को देते ए कहा–‘‘उस दास सोमपायी देवे पर अब तो
देवािधदेव का अनु ह होना ही चािहए।’’
धूज ट ने सोमपान करते ए कहा–‘‘ि ये, िजसे तेरा अनु ह ा है, उसे कसका
भय है? तू देवे और दाशरिथ पर सदय है तो रह। पर म रावण पर कृ पा क ं गा। म अभी
लंका जाऊंगा।’’
इतना कह, और एक पा सोमपान कर, वृषभ वज कै लासी अपना िवकट शूल
उठाकर चल दए।

उमा ण-भर त ध रह , फर उ ह ने कु मार का तक को बुलाकर कहा–‘‘पु , तू


मेरी आ ा से देवकाय कर। देवे के अनुरोध से म उस पर सदय ई थी। मने दाशरिथ राम
को द ा दे दए थे, िजनसे वह महाबली दुजय रावण का हनन कर सके । अब कै लासी
वयं रावण पर अनु ह कर शूलपािण हो लंका गए ह। व स, तू अभी देवलोक जाकर इ
को इस देवा य से सावधान कर दे। देवे से कह क पु के मरने पर रावण का आ य
पाकर, पु -शोक-िवद ध, समर म लयाि विलत कर देगा। देवे वयं , म त्,
य और आ द य को साथ ले समर-भूिम म दाशरिथ क सहायता करे । य द देवे
अनुरोध करे , तो पु , तू भी उसके साथ जा। म दाशरिथ राम क िवजय क इ छु क ।ं ’’
कु मार ने हंसकर उमा को णाम कया और कहा–‘‘अ ब, यह दास आपक आ ा
के अधीन है। जैसा आपका आदेश है, म वही क ं गा। म दाशरिथ राम और देवे पुर दर
क ीित के िलए अभी सुरलोक जाता ।ं आप स ह !’’
121. सीदतु देव:!

‘रथमानय तु पु षा:, अ ाहं युगा ता द यसि भैबाणै: राघवं ल मणं च


हिन यािम येषां ाता हत:, येषां च तनय:, तेषाम रपोवधैना ुमाजनं करोिम। अ
काका गृ ा ाऽपरे मांसािशन:, तां तपयािम सवान् श ुमांसै:। क यतां मे रथः शी ं,
आनीयतां धनु:, येऽ िश ा रा सा: अनु या तु मां, अनु या तु माम्।’’
‘‘हि तमानीयताम्!’’
“हयैयु ो रथः था यताम्!’’
‘‘धनु वयताम्!’’
‘‘हा हा, व स, िज वे ं कथम वं ल मण य वशंगत:? ननु ु वं
काला तकाविप िभ ा:। अरे , अ मे यो लोका:, कृ ा पृ वी, एके ने िजता हीना
शू येव ितभाित। हा पु , यौवनं, रा यं लं कां च, र ांिस, मातरं , मा भाया िवहाय
गतोऽिस? वीर, मम नाम मृत य वया ेतकायािण कायािण, तद िवपरीत िह वतसे।
हा, हा, हा, हा! सुपा व, महाबल, अहं यु ऽे तब परा मं ु िम छािम।’’
‘‘यदिभ िचतं भवते!’’
“रथी अक पन, तव खलु थमो रथा:।’’
‘‘बाढम्!’’
तब शत-सह -गु म-गु मपित, भट-सुभट, भीमदशन, िवकटिव म, भीमनाद
करते ए, अपने-अपने वाहन पर बैठ ख ग, प श, शूल, गदा, मुशल, हल, शि ,
ती णधार, कू टमुदगर ् ले-लेकर मे दनी को चरण क धमक से कं पाते ए लंका से बाहर
चले। उस समय मृदग ं , पटह, शंखा, कलह के साथ वीरनाद से लंका कांपने लगी।
इसी ण, शूलपािण बाघा बर धारण कए रा स-सै य के स मुख आ खड़े
ए। सहसा रा स-चमू क गित क गई। रावण ने देखा तो श याग, रथ से उतर,
ब ा िल वा पानुनयन देवािधदेव क प र मा क । ने कहा–
‘‘एष रावण:?’’
‘‘अहं रावणो नाम। येन यु े सदानवगणा: श ादयो: सुरा: िन जता:। भ : श :,
कि पतो िव नाथ:, म दत: सूयपु :। हा देव, भा यद धोऽहम । परमामष धू ा :
सवशा भूतां वरोः अक पनः, बु कु भकणः। एते परसै यानां जेतार:,
िन यमपरािजता: वीरा: रामेणाि ल कपणा ससै या ते हता:। हतो मेघनादो महाकाय:।
कु भिनकु भौ, कु भकणा मजावुभौ। हतभा योऽहं रावणो नाम जीवािम, हा, हा, हा, हा!’’
शूलपािण ने अ ुिवमोचन कया। वरद ह त ऊंचाकर कहा–
‘कथं नाम रावण वै वणानुजो धैयमपा य पु वधसंत : वै ल वशं गत:!’’
‘‘ सीदतु देव:, काले स बोिधतोऽि म, एषाोऽहं भव छ दसमनुवत। न ममैव,
कु ल यािप मे भवान् भु:।’’
‘‘स यगाह, धौतक मषा गो रावण, अ म दृि ि यो िह।’’
‘‘अनु हीतोऽि म!’’
‘‘ए ेिह पु , खेदमपनय।’’
‘‘कृ तसाहसोऽि म, आ ापयतु भवान् कमनुित ािम?’’
‘‘पु , वा पवेग तु मां बाधते।’’
‘‘कथं, देवोऽिप वा पमु सृजित?’’
‘‘भवतु, भवतु!’’
‘‘ सीदतु भवान्!’’
‘‘पु , कायम गु तमम्, ा ो रामो रणाितिथ:।”
‘‘तोषिय ये शरै :।’’
‘‘तद् गृहाण मे शूलम्।’’
‘‘स प ोऽि म। य ि थतो रामोऽ तत् मशानं भिव यित।’’
‘‘भवतु, भवतु!’’
शूलपािण धूज ट अ तधान ए। शूिलद शूल को म तक पर पश कर रावण ने
व गजना क । देवािधदेव क िवभूित से स प रावण क समूची सेना गरज उठी। जय-
िननाद, भेरी-नाद, ृंगी-रव से आकाश आ ोश-सा करने लगा।
122. सुसंवाद

सूय के समान देदी यमान ऐ रथा अपनी सह वण-घि टका क रनकार से


दशा को विनत करता आ राम-कटक म िव आ। रथ म अख ड वज देख राम-
कटक म हष क लहर दौड़ गई। मातिल ने अ को ललकारते ए वीर-गजना करके
कहा–‘‘अरे , वीर वजो, जाओ, रामभ से िनवेदन कर दो, दुर त दुजय राविण इ िजत्
मर गया!’’
‘‘दुर त राविण मर गया!’’
‘‘दुर त राविण मर गया!’’
‘‘दुर त राविण मर गया!’’
शत-सह , ल -ल क ठ से ये वर जय-िननाद के साथ हवा म तैरते ए वहां
प चं गए, जहां राघवे राम अ य त िवकल भाव से िशलाख ड पर बैठे–‘हा सौिमि , हा
सौिमि ’ कह रहे थे। जय-िननाद के साथ िवजय-दु दुिभ भी बज उठी। हषाितरे क से उद
हो राम ने कहा–‘‘ या कहा, या कहा! सौिमि आ गए? कहां ह सौिमि , वे सकु शल तो
ह? अरे , वे अ त तो ह?’
शत-सह वानर भट ने कहा–
‘‘राविण दुर त मर गया!’’
‘‘देवता का ास मर गया!!’’
‘‘मृ यु य मेघनाद मर गया!’’
राम ने कांपते ए दोन हाथ उठाकर अ ु से धुंधली आंख से सु ीव, हनुमान्,
जा बव त और अंगद को देखकर कहा–‘‘ या यह व है या स य है? दुर त दुजय
इ िजत्...?’’
‘‘मर गया! मर गया!!’’ शत-सह क ठ ने कहा। राम ने देखा– वण के समान
तेजवान् इ का द रथ अख ड वजा फहराता, सह घं टय को रणकारता आकर क
गया। िवभीषण और सौिमि र म लथपथ रथ से उतरकर राघवे क ओर चले। राम ने
दोन हाथ फै लाकर दौड़ते ए कहा–‘‘यह म या सुन रहा ?ं वीर, या अघट घटना हो
गई? तेरे शरीर से झरझर र झर रहा है। र पित िम िवभीषण का शूल भी टू टा आ है।
अव य ही तुमने क ठन यु कया।’’
ल मण ने राम क प र मा कर राघव के चरण पर मेघनाद का कटा आ िसर
रख दया। उ ह ने कहा–‘‘हे रघुकुलमिण, इन चरण के ताप से यह दास जयी आ।
दुजय मेघनाद मारा गया। िवषधर फणी को कु चल दया गया। देव अब िनभय ए। रघुकुल
क लाज रह गई।’’
राम ने रोते ए, ल ावनत ल मण को छाती से लगाकर बारं बार उसका िसर
सूंघते और गाढ़ा लंगन करते ए कहा–‘‘ध य वीर ध य, ध य सौिमि ध य, तेरी जननी
सुिम ा ध य, तेरे कारण म तेरा ये ाता भी ध य आ। तेरा यश अमर रहेगा।’’
राम ने फर िवभीषण को अंक-पाश म बांधकर कहा–‘‘साधु र े , असुकरं कम
क तवधनं कृ तम्। तु ोऽि म रामणे ह िवनाशेन िजतिम युपधारयािम।’’
सहसा लंका संहनाद से िहल उठी। राम ने आतं कत होकर कहा–‘‘अरे , यह या
आ? या लय होने वाली है? यह लयनाद कै सा है? यह ण- ण म िबना अ के
िव ुत् कै सी चमक रही है? लंका जैसे भूक प से बारं बार कांप रही है। घनी धूल के बादल
उड़-उड़कर सूय को ढांप रहे ह।’’
िवभीषण ने भय से पा डु मुख होकर कहा–‘‘रघुमिण, रा सपित रावण पु शोक
से भ म हो रहा है। वह यु -साज सज रहा है। वीर के पद-भार से पृ वी कांप रही है। यह
रा स सै य गरज रही है। अब कै से इस िवकट संकट से ब धु ल मण और कटक क र ा
होगी? यह देिखए-रा स गु मपित लयनाद क भांित शृंगीनाद कर रहे ह। अि -वणवाले
वण- वज रथ िनघ ष करते ए बाहर आ रहे ह। चतुरंिगणी सेना के ूह सज रहे ह।
लंका के वीर इस कार श पािण हो लंका से िनकल रहे ह, जैसे बांबी से काला सप
िनकलता है। उ उद रिथय का सेनानायक है। व पािण इ के समान परा मी
वा कल गजसेना का नायक है। महावीर अितलोमा अ ारोिहय का नायक है। भीमाकृ ित
िवडाला पादाितक का अिधपित है। महादुमद दुमद पताकावाहक है। महाराज, यह
उ च डा रा स-सेना लंका म यु -स हो रही है। अब हम भी त परता से तैयार हो
जाना चािहए। आज लय-यु म जग यी जगदी र रा से रावण का आपको
सा मु य करना है।’’
राम ने िच ताकु ल होकर कहा–‘‘तो िम , शी ही सब सेनानायक को यहां बुला
लाओ। अब इस दास क र ा देव ही करगे।’’ िवभीषण ने ज़ोर से शृंगी-नाद कया। अंगद,
नील, हनुमान, जा बव त, गयंद, गवा , सु ीव आ द सब वानर-सै य-सेनानी, गु मपित
आ-आकर राम को घेरकर बैठ गए।
राम ने कहा–‘‘वीरगण, आज रावण पु -शोक िव वल हो काल-समर करे गा। तुम
सब ि भुवनजयी शूर हो। यु -साज सज इस िवपद् म राम क र ा करो। िम ो, अब तो
लंका म एक रावण ही रथी बचा है। तु ह ने अपने बा -बल से समु को बांधा है। तु ह ने
अिमतिव म कु भकण का वध कया। तु हारे ही ताप से अजेय मेघनाद मारा गया।
हाय! रघु-वधू अब भी रावण के कारागार म ब द है। वीरो, अब रावण को मार उसका
उ ार कर मेरे कु ल और मान क र ा करो।’’
राम क आंख म आंसू भर आए। सु ीव ने राम क आंख म आंसू देखकर
कहा–‘‘रघुमिण, म आप ही के ताप से राजसुख भोग रहा ।ं सो महाराज, आज या तो म
रावण को मा ं गा या वयं म ं गा। आप िच ता य करते ह?’’
सह -सह उ कापात क भांित व विन सुन सारी वानर-सै य त ध हो गई।
राम ने भाव से पूछा–‘‘अब यह कौन-सी नई िवपि आई? अरे वीरे ो, श ले-लेकर
स हो जाओ!’’
इस पर मातिल ने हंसकर कहा–“दाशरिथ, स ह । आपक सहायता के िलए
वयं व पािण देवे ऐरावत पर आ ढ़ हो आए ह। उनके साथ कु मार का तक, सहदेव,
सब , म त्, आ द य और ग ड़ ह।’’
राम ने सस म कहा–‘‘हे रा सराज िवभीषण, हे वानरे सु ीव, चलो, आगे
बढ़कर देवे क अ यथना कर। अ य-पा से उ ह स कृ त कर।’’
राम, ल मण और सब वानर-यूथपित सेनापितय ने सु ीव और िवभीषण को संग
लेकर देवे और कु मार का तके य का अ य-पा से स कार कर उनक पूजा क । फर राम-
ल मण ने ब ांजिल हो देवे और कु मार क प र मा कर कहा–
‘‘अपने पूव पु ष के सुकृत से इस दास को इस िवपि म देव-पदा य ा आ
है। इससे मेरा कु ल िति त आ। म ध य आ!’’
देवे ने हंसकर कहा–‘‘हे रघुमिण, तुम देवि य हो, अब रथ पर रणस ा से
सजकर बैठो। आज जग यी रावण काल-समर करे गा। उसम म म त और देव-सै य
सिहत तु हारे पृ क और कु मार सब सिहत तु हारे अ भाग क र ा करगे।’’
वानर-सै य ने जय-िननाद से गगनम डल को क पायमान कर दया। जुझा बाजे
बजने लगे। सम त वानर-सै य ूहब खड़ी हो गई।
123. अ पािण रावण

वालामुखी के लावे के समान वल त वाह क भांित रा स-सै य लंका संह ार


से बाहर िनकली–हज़ार दु दुिभयां गड़गड़ाती, शंख-शृंगीनाद करती, जय विन से मे दनी
को कं पाती, हय-दल के पदाघात से उड़ी धूल से सूयम डल को अ धकारावृ करती ई–
लय वाला-सी मृ यु क कराल-िज वा-सी।
राम ने असंयत होकर िवभीषण से कहा–‘‘हे लंके र, यह लय-मेघ के समान
च ड रा स सै य आ रही है। पु शोक-द ध रावण इस च ड सेना म कौन-सा है, इस
वीरवािहनी के नायक कौन-कौन ह, सो अनु ह करके मुझे बताओ।’’
िवभीषण ने कहा–‘‘राघव, कटक के आगे-आगे बाल रिव के समान जो तेज वी
पु ष वणखिचत पवत के समान द गज हाथी पर आ रहा है, वह धीर-वीर मातुिल
अक पन है, जो लंका का धान म ी है। इसके पीछे संह क वजावाले रथ पर आ ढ़
नील मेघ के समान अितरथी महोदर है। वण के साज से सि त चपल अ पर जो यो ा
भारी शूल लेकर चल रहा है, वह व है। इसके वाम पा व पर काले अ पर सवार
ि शुलधारी ि िशरा है। मेघ के समान व प वाला, िवशाल हाथी पर धनुष-बाण िलए
कु भ चल रहा है और उसके पीछे वणरथ पर जो सह घं टयां बजाता आ रहा है, यह
अपराजेय िनकु भ महारथ है। उसके दाय भाग म अ पर सवार अि के समान तेज वी
पु ष, जो धनुष-बाण िलए है, नरा तक है। धनुधर म अ ग य और भयंकर भूत से
परावृत, र ज टत रथा ढ़, मि य और सेनानायक से रि त, पवत के समान अचल,
ब दीजन-वि दत, िजसके मुकुटमिण धूप म रिवरि म क भांित देदी यमान ह, और िजसके
म तक पर च मा के समान ेत छ लगा है, वह र पित मिहदेव जग यी रावण है।’’
राम ने कहा–‘‘रा सराज रावण का तेज तो अप रसीम है। इसक अंग-सुषमा
देवता से भी अिधक शोभायमान है, और इसके पाषद भी बड़े तेज वी तीत होते ह।
कौन कहता है क लंका वीर से शू य हो गई है!’’
‘‘राघव, िजस कार महातेज रावण इन भयानक आकृ ित वाले भूत से िघरा है,
उसी कार इसक अ तरा मा भी कलुिषत है। यही कारण उसके बल परा म के भंग होने
का है।’’
राम ने वानर-कटक के ूह पर एक िवहंगम दृि डाली। दोन सै य पर पर िनकट
होने लग । दोन सै य वीर-दप से गरज रही थ । राम अिवचल भाव से ूह म खड़े थे।
उनके पीछे ल मण, हनुमान्, जा बव त और िवभीषण थे। इसी ण सु ीव दुधष वेग से
उछलकर रावण के ूह म घुस गया और अपनी व गदा घुमाते ए रावण के िनकट प च ं ,
फु त से धनुष क नोक से रावण के म तक पर से मुकुट िगरा दया। रा स सै य ने इस
ह तलाघव को ल य नह कया। सु ीव ने ललकारकर कहा–“अरे रा स के वामी, यह
वानर का राजा सु ीव तेरे म तक पर चरण रखकर यहां उपि थत है। कह, या तू ी
राम क चरण-शरण आता है?’’
रावण ने ोधावेिशत होकर कहा–‘‘अरे सु ीव, ठहर, तुझे अभी अ ीव करता
।ं ’’ इतना कह उसने झपटकर सु ीव को पकड़कर भुजा म मसल डाला। पर तु सु ीव ने
उसके चंगुल से िनकलकर रावण को रथ से ख च िलया। फर कू दकर उसके व पर लात
मारी। रावण ने सु ीव का पैर पकड़ उसे िसर से ऊपर घुमाकर दूर फक दया। इतने म
सह रा स श ले-ले सु ीव पर टू ट पड़े। सु ीव पर यह महासंकट आया देख वानर-
सै य म आतंक फै ल गया। राम का संकेत पा तुर त ही जा बवान्, हनुमान्, अंगद, नल,
नील, गय द, गु मपित रा स को चीरते ए वानरे के िनकट जा प च ं े और उसे घेर
अपने कटक म ले आए।राम ने सु ीव को छाती से लगाकर कहा–‘‘वीरिशरोमिण, तूने यह
कै सा दु साहस कया, मुझसे िबना ही परामश कए? राजा को ऐसा साहस नह करना
चािहए। भिव य म ऐसा न करना। तेरे िवपि म पड़ जाने से तो म िसि से िवमुख हो
जाऊंगा। य िप तेरा बल अ मेय है, फर भी तुझे ाण-संकट हो जाता तो तेरे अभाव म
वयं म भी जीिवत न रहता।’’
सु ीव ने लि त होकर कहा–‘‘राघव, दुरा मा रावण को स मुख देख, म संयत न
रह सका।’’
इसी ण दोन सेनाएं आमने-सामने आ ग । रा स-सै य ने पवत के समान अचल
वानर-सै य को देखा। वानर ने कालमेघ के समान रा स-सै य को देखा। दोन सेना के
तुमुल नाद से पृ वी कांपने लगी। काल सप के समान बाण छू टने लगे। उ ह ने आकाश-
म डल को छा िलया। दोन ओर से भट ख ग-शैल-शि -शूल ले-लेकर एक-दूसरे पर िपल
पड़े। एक मु त के भीतर ही रणभूिम र से भर गई। िम -श ु का भेद भी न रहा। वीर से
वीर पर पर गुंथकर लड़ने लगे। अंगद मृ यु के समान वेग से िग रशृंग के समान िवशाल
गदा लेकर नरा तक पर िपल पड़ा। दोन म घनघोर गदा-यु आ। अ त म गदा का
करारा घाव खाकर र -वमन करता आ नरा तक भूिम पर िगर गया।
नरा तक को मरते देख महोदर ने धनुष-टंकार करते ए अपना रथ आगे बढ़ाया।
ि िशरा भी शूल हाथ म ले उसके पा म चला। उसके साथ ही व भी।इन तीन
महारिथय को आता देख हनुमान् क ं ार करते आगे आए। महोदर ने मा ित को बाण से
ढांप िलया, पर तु मा ित ने हठपूवक आगे बढ़ गदा से उसके घोड़ और सारिथ को मार
उसका िसर चूण कर दया। महोदर को रथ से िगरते देख ोध से फु फकारता आ ि िशरा
महाकाल के समान शूल ले हनुमान् पर टू ट पड़ा। मु त भर हनुमान् और ि िशरा म
लोमहषक यु आ। अ त म मा ित ने उसे अ से िगराकर उसका िसर चूण कर दया।
तब कु भकण के दोन पु कु भ और िनकु भ रा स के गु म को साथ लेकर च ड यु
करने लगे। वानरे ने उ िननाद करते ए इन रा स वीर से तुमुल सं ाम कया।
कालभैरव क भांित वे पर पर एक-दूसरे को मार-मारकर भूिम पर ढेर करने लगे। वे ले-ले,
दे-दे क क ं ृ ित कर िनदय वार करने लगे। कु भ ने अिमत िव म कट कया। उसने अंगद
को बाण से ब धकर ाकु ल कर दया। तब सु ीव ने कनक-भूषण ती ण बाण क वषा
करके उसके उदर को चीर डाला। वह घोर नाद करता आ भूिम पर िगरकर छटपटाने
लगा। िनकु भ ने भाई को इस कार िगरता देखा तो वह ोध से जलता आ भयंकर
िवशाल प रघ लेकर सु ीव पर टू ट पड़ा। उस भीम प रघ क मार से सु ीव झूमकर धरती
सूंघने लगा। तब बली मा ित भयंकर संहनाद कर अपनी गदा घुमाते िनकु भ पर झपटे।
दोन ने एक ही काल म एक-दूसरे क छाती पर गदा का हार कया। िनकु भ का वम फट
गया और उसक छाती से खून क धार बह चली। तब मा ित ने उसे पृ वी पर िगराकर
पैर से र ध डाला। इस कार िनकु भ को मरते देख अक पन ने रथ आगे बढ़ाया। ॠ राज
जा बव त ने अक पन से िवकट समर कया। दोन महारिथय के को दोन सै य के
भट च कत होकर देखने लगे। सहसा ॠ राज ने अक पन का िसर िशर ाण सिहत काट
डाला। यह देख वानर गजना करने लगे। राम-कटक म दु दुिभ बज उठी। इस हषनाद से
अधीर रावण उद हो समरांगण म आगे बढ़ा।
अपने महारिथय का इस कार िवनाश होते देख रावण ने अमष म भरकर
सारिथ से कहा–‘‘अरे , आज पु इ िजत् के हत हो जाने पर इ लंका म आया है! तिनक
देख तो, वह कधर है? हमारा रथ वहां ले चल।’’
सारिथ ने वायुवेगी रथ आगे बढ़ाया। रावण माया को चलाता, इ के ूह को
िछ -िभ करता आ देवे क ओर बढ़ता चला गया। हठात् कु मार का तके य ने अि रथ
म बैठकर रावण का माग रोक िलया। कु मार को स मुख देख रावण रथ रोक, हाथ जोड़कर
बोला–‘‘देवकु मार, यह दास तो भगवान् का कं कर है। देवािधदेव ने मुझे रौ तेज से
स प कया है। आपको म कै से वैरी-दल के साथ देख रहा ?ं नराधम राम पर आपका
इतना अनु ह य है? छली सौिमि ने अधमपूवक मेरे पु का िनर वध कर अपने हीन
कु ल को कलं कत कया है। आज म उसी कपटी यो ा का वध क ं गा। कृ पा कर राह छोड़
दीिजए।’’
कु मार ने हंसकर कहा–‘‘र पित, आज म देवकायरत ।ं तू मुझे यु करके
आ ा त कर।’’
तब रावण ने क ं ार कर, कु मार पर आ ेया छोड़ा। कु मार का तक शरजाल म
िछप गए।
इ ने पुकारकर कहा–‘‘हे शि धर, रावण रौ तेज से प रपूण है। देखो, म अभी
उसका दप दलन करता ।ं ’’ इतना कह देवे ने सह ग धव को रावण पर आ ेया
वषा करने क आ ा दी। रावण ने दुधष वेग से द ा का िनवारण कर ऐरावत के
म तक पर तोमर का हार करते ए कहा–‘‘अरे िनल , तेरी ही कु टलता से मेरे पु का
वध आ। अब तूने पु के वध होने पर लंका म आने का साहस कया। पर आज तू मेरे हाथ
से ल मण क र ा नह कर सकता।’’
इतना कहकर ोध से अधीर हो अपना िवकराल परशु ले रावण रथ से कू द पड़ा
और उसने ऐरावत को परशु क मार से िथत कर दया। ऐरावत भूिम पर िगर गया। तब
इ ने हाथी से कू दकर रावण पर व का हार कया। इसी समय मातिल इ का रथ ले
आया। रावण भी रथ पर आ ढ़ आ। दोन भयानक महा को धनुष पर चढ़ाकर छोड़ने
लगे।
इसी ण रावण क दृि दूर े म यु रत सौिमि ल मण पर पड़ी। वे कभी रथ
पर चढ़कर और कभी रथ से उतरकर यु कर रहे थे। ल मण को देखते ही रावण ने गजना
क । उसने कहा–‘‘अरे पुर दर, देवकु ल कलंक, दास, आज म तुझसे अब और यु नह
क ं गा। आज उस कपटी पामर सौिमि को मा ं गा। तू इस पृ वी पर एक दन और
िन व जीिवत रह।’’
वह भैरव-नाद करता आ आगे बढ़ा। यह देख िवडाला का व चीर मा ित
हनुमान् रावण के स मुख आ गदा घुमाने लगे।
रावण ने अनवरत बाण मा ित पर छोड़कर कहा–‘‘हट रे बबर, माग छोड़कर दूर
हट!’’
‘‘अरे पामर, परदारारत, लोभी, चोर, तिनक ठहर तो!’’ हनुमान् ने गदा घुमाकर
रथ पर हार कया। रथच भंग हो गया। इसी समय सु ीव भी उद का वध कर वहां आ
प चं ।े
रावण ने घृणा से हंसकर कहा–‘‘अरे , तू अभी अपनी ातृवधू तारा को फर से
िवधवा करने इसी कु ण म मरने को यहां आ प च ं ा! ठहर, अथवा तुझे छोड़ता ,ं हट,
माग छोड़ दे। अभी म उस पितत सौिमि को मा ं गा।’’
‘‘अरे अधम , म अभी तुझे मारकर िम -वधू का उ ार करता ।ं ’’ सु ीव ने वेग
से शूल फका, साथ ही हनुमान् ने गदा का व - हार कया। रावण का रथ भंग हो गया,
पर तु सारिथ तुर त दूसरा रथ ले आया। रथ पर चढ़कर रावण ने अनेकिवध म िस
बाण से सु ीव और हनुमान् को वेध डाला। सु ीव और हनुमान मू छत होकर भूिम पर
िगर गए। रावण गजन-तजन करता आ ल मण के स मुख चला। ल मण को दूर से ही
देखकर रावण ने कहा–‘‘अरे अधम सौिमि , इतनी देर म तू मुझे िमला! कह कहां है तेरा
र क राम, इ और का तके य, ातृह ता सु ीव, कु ल-कलंक िवभीषण? बुला उन सबको
अपनी र ा करने के िलए। अपनी जननी सुिम ा को मरण कर ले। आज मेरे रसोइए तेरे
ही मांस से मेरा भोजन बनायगे। आज म तेरा दय बिहन सूपनखा को खाने को दूग ं ा।’’
ल मण ने धनुष टंकारते ए कहा–‘‘रा सराज, तू पु शोक से अधीर हो रहा है।
आ, तुझे अभी तेरे पु के पास प च
ं ाकर शोकरिहत करता ।ं ’’
इतना कह ल मण ने ती ण शर से रावण का िशर ाण उड़ा दया। रावण ने भी
रणम हो बाण छोड़े। दोन द ा का योग करने लगे। दोन एक-दूसरे के श को
काटते रहे। दोन यु -िवशारद, दोन महा ाण, महा के यो ा, दोन महारथ ु
काल क भांित समरांगण पर छा गए।
अब ल मण ने सात बाण धनुष पर चढ़ाकर रावण क वजा काट डाली। इसी
समय रावण क दृि िवभीषण पर पड़ी। उसने त काल िबजली क भांित दीि मती
महाशि उस पर फक । पर तु ल मण ने उसे बीच म ही तीन बाण से काट डाला। इस
कार ल मण के हाथ िवभीषण क र ा होते देख रावण ोध से सप क भांित फु फकारने
लगा। उसने कहा–‘‘अरे सौिमि , तेरे ह तलाघव क शंसा करता ।ं तुझम शि धर
का तके य से भी अिधक साम य है। पर आज तू जीिवत नह बच सकता। ले रे पु -घाती,
मर!’’
इतना कह, उसने रौ तेज से आपू रत जा व यमान अ घंट भैरव-रव वल त
रौ शि को ोध से कांपते ए ल मण पर फका। वह शि िबजली क भांित ल मण
क मू ा म जा लगी। उसके लगते ही ल मण कटे ए वृ क भांित झूमते ए रथ से भूिम
पर जा िगरे । वानर-सै य हाहाकार करने लगी। यूथ के यूथ वानर यो ा ने ल मण के
शरीर को घेर िलया। राम ने दूर से ल मण को िगरते देखा तो धनुष फक, ‘हा सौिमि ’
कहते ए दौड़ पड़े। रावण बादल क भांित गजना करता आ, िवजय दु दुिभ से देव और
दशा को क पायमान करता आ लंका को लौट गया।
124. िवश यासंजीवनी

उस दन काल-समर म राम के अित र कसी भांित सु ीव, किप वज हनुम त


और र पित िवभीषण, देवकु मार का तके य और व पािण इ ; ये ही पांच अ त बचे थे।
िवभीषण ने भगीरथ य से घूम-घूमकर सा वना देकर वानर को एकि त कया। वे
सब राम के चार और बैठकर िवलाप करने लगे।
अंगद, नील, ि िवद, शरभ, जा बवान्, सुषेण, मै द, नील, योितमुख आ द वीर
िशरोमिण शरिब , त-िव त भूिम पर अचेत पड़े थे। िवभीषण ने परा मी वीर
िशरोमिण सुषेण को सैकड़ बाण से िव पड़े सप क भांित भारी-भारी सांस लेते देखा।
उ ह चेताकर कहा–“बड़ी स ता क बात है क आपका जीवन बच गया।’’
‘‘हनुमान तो जीिवत ह?’’
‘‘हनुमान् अ त ह।’’
‘‘बड़ी बात है। य द हनुमान् जीिवत ह, तो सारी ही वानर-सै य बच गई
समिझए।’’
‘‘ क तु सौिमि ...” िवभीषण के ने म जल भर आया, क ठ अव हो गया।
‘‘ या, नह रहे?’’
‘‘अभी जीिवत ह, पर तु मुमूषु–
‘‘तो मुझे आप सौिमि के िनकट ले चिलए।” सुषेण बड़े क से उठकर िवभीषण
के सहारे चलकर वहां आए, जहां रणांगण म सौिमि बेसुध पड़े थे। ी राम ल मण के
िन ल, र लुत शरीर को बा म समेटे बैठे थे। उ ह ने अ ुपू रत ने से िवभीषण को
देखकर िवलाप करते ए कहा–‘‘अयं मे ाता समर ाघी शुभल णो ल मण:। इमं ाणै:
ि यतरं वीरं शोिणता प यत: पयाकु लो मे मन:। य द ाता मे पंच वमाप :, कं मे ाणै:
सुखेन वा! हा, ल तीव मे वीय, यतीव धनु: वसीदि त सायका:। देश-े देशे कल ािण,
देशे च बा धवा:। तं देश नैव प यािम य ाता सहोदर:। हा, क तु रा येन ल मणेन
िबना? कथ व या यहं व बां सुिम ां? हा! हा!’’
सुषेण ने यान से सौिमि को देखकर कहा–
‘‘न-न ल मीवधनो ल मण: पंच वमाप :। ना य व ं िवकृ तम्, न च
याम वमागतम्। नरशादूल! इमां वै ल का रण बु ं यज!’’
इतना कह उ ह ने हनुमान् क ओर देखा और कहा–
‘‘हे वीर, यह तेरे परा म का काल उपि थत है। तू परा म कर, महोदय पवत पर
जा। उसके ग धमादन नामक दि ण देवशृं ग पर िवश या संजीवनी महौषध है। वह रात
को विलत रहती है। औषध क दीि के कारण वहां कभी राि नह होती। वह
भगवान् अि का पुनीत धाम है। उसे तू ला और सौिमि सिहत वानर यूथपितय को
ाणदान दे!’’
हनुमान् ने ने म जल भरकर राम के चरण छु ए, प र मा क ।
पवनकु मार हनुमान् तुर त ही वेग से संजीवनी बूटी लाने को चल दए और सु ीव
सिहत िवभीषण ल मण तथा अ य त वानर क य से र ा करने लगे। पीिड़त और
िथत वानर िवभीषण के धैय-वचन और संजीवनी बूटी का माहा य सुन आशा और
आशंका से अिभभूत हो हनुम त का आसरा ताकने लगे।
िवभीषण िच ता करके ि ितज क ओर िनहारने लगे। इसी समय हनुमान्
संजीवनी बूटी लेकर आ गए। रा से ने उ ह क ठ से लगा िलया। सुषेण क य -िविध से
िवश या संजीवनी ारा ल मण सिहत सभी वानर िवश य होकर नी ज हो गए। एक बार
फर आशा और आन द क लहर वानर-सै य म ाप गई। राम ने हनुमान् को दय से
लगाकर अ ुपात कया। वानरे को ऐसा तीत आ, जैसे सब सोकर जगे ह ।
अब सब वानर चैत य हो ोध और हष म भरकर ज़ोर-ज़ोर से हषनाद करने और
रा स से बदला लेने क िवकट चे ाएं करने लगे। सु ीव और िवभीषण ने भगीरथ य
से सब कटक को वि थत कया। सब राम को घेर भावी यु क योजना पर िवचार
करने बैठे। वानर-सै य म यु के ध से बज उठे । उ ह ने फर लंका के चार ओर अपने सुदढ़ृ
मोच बांध िलए।
125. सि ध–िभ ा

‘‘सारण, वैरी रात-भर तो शोकातुर रहे। उनके क ण दन से लंका क ाचीर


कांप गई, पर तु अब यह कै सा आन दो लास आकाश को िवदीण कर रहा है? या मूढ़
सौिमि फर जी उठा?’’ रावण ने िवष ण-वदन हो म ी सारण से हताश भाव से कहा।
सारण ने ब ांजिल होकर कहा–‘‘जगदी र, इस माया-संसार म अदृ क माया
कौन समझ सकता है?’’
‘‘ठीक है, अदृ बल है। अरे , उस मायावी राम ने अिवराम सागर को अपने
कौशल से बांध डाला। िजसक माया से जल म िशला तैरती है, जो समर म मर-मरकर
बारं बार जी उठता है, उसके िलए असा य या है? पर इस बार कै से वह पु घाती जी
उठा!’’
सारण ने िख होकर िसर नीचा करके कहा–‘‘मिहदेव, महोदय शैलकू ट के
ग धमादन क िवश या-संजीवनी औषध के भाव से िभषक् सुषेण ने ल मण सिहत सब
वानर यूथपितय को ाणदान दया है। अब उसी उ लास म राम-कटक आन द नाद कर
रहा है।’’
‘‘पर तु यह तो अ य त चम का रक वाता है। सुदरू पवतराज के अगम िशखर से
इतने अ पकाल म कौन वीर महौषध लाया?’’
‘‘मा ित को छोड़ और कौन यह दु साहस काय कर सकता था? महाराज, जैसे
िहमा त म भुजंग तेज से पूण हो जाता है, उसी कार द यौषध के भाव से सौिमि -
सिहत सब वानर-कटक ओज से ओत- ोत हो रहा है।’’
रावण ने िवषाद से गहरी सांस छोड़ी। फर कु छ देर चुप रहकर उसने कहा–‘‘तूने
ठीक कहा सारण, अदृ ही बल है। मने स मुख समर म देव-मनु य सभी को परा त कर
कल िजस-िजस रपु का वध कया, वह फर जी उठा! मृ यु ने अपना धम भुला दया। अब
परा म कस काम का? म समझ गया, रा स-कु ल का सौभा य-सूय अ त हो गया। अरे ,
शूलीसम भाई कु भकण और अजेय इ िजत भी जब काल-कविलत हो गए, तब अब मेरा
ाणधारण वृथा है।’’ इतना कह रावण शोक-सागर म डू बकर बैठा रह गया। सारण के मुंह
से भी बात नह िनकली। रावण ने फर डू बते वर म कहा–‘‘जा सारण, तू वैरी राम से
जाकर कह क जगदी र रावण वैरी राम से यह िभ ा मांगता है क वह सात दन तक
वैर-भाव यागकर सै य-सिहत िव ाम करे । राजा अपने पु क अ येि या यथािविध
करना चाहता है। तू जाकर उससे कहना–‘हे वीर, तेरे बा बल से वीरयोिन लंका अब
वीरशू या हो गई है। तू वीर कु ल म ध य है, अदृ तेरे अनुकूल है और र कु ल िवपि म है।
सो तू वीर धम का पालन कर।’ जा सारण, अब तू िवल ब न कर।’’
बािलसुत अंगद ने आकर राम क सेवा म िवनय क –
‘‘देव! जगदी र, जग यी, मिहदेव पौल य रावण का मि - वर सारण
सम त मि य एवं मुख राज-सभासद के साथ िशिवर ार पर उपि थत होकर चरण-
दशन क ाथना करता है। जैसी आ ा हो, यह दास जाकर उसे िव ािपत करे ।’’
राम ने ससं म कहा–‘‘युवराज, मि वर को आदर-सिहत यहां ले आ।’’
सारण ने स मुख आकर ब ांजिल िनवेदन कया–
‘‘राजपदयुगल क म तथा ये राज सभासद् और सिचव व दना करते ह।’’
राम ने आसन देकर कहा–“रा स-मि वर, यह द र राम तु हारे वामी क
या सेवा कर सकता है?’’
सारण ने कहा–‘‘देव, रा सकु लपित मेरे वामी ने आपसे यह िभ ा मांगी है क
आज से सात दन तक आप वैर-भाव यागकर सै य-सिहत िव ाम क िजए। राजा अपने
पु क सि या यथािविध करना चाहता है। वीर सदैव ही श ु का स कार कया करते ह।
महाराज, आपके बा बल से वीरयोिन वण-लंका अब वीर-शू या हो गई है। अदृ आपके
अनुकूल है और रा सकु ल िवपि त है। इसिलए आप श ु का मनोरथ पूरा क िजए।’’
“मि वर, तु हारा वामी मेरा परम श ु है। फर भी म उसके दु:ख से दु:खी ।ं
िवपद् म श ु-िम मेरे िलए समान ह। तुम लंका को लौट जाओ। म सै य सिहत सात दन
तक अ नह हण क ं गा।’’ राम ने शालीनता से उ र दया।
म ी ने कहा–‘‘रघुमिण, आप ध य ह! हे महामते, आपको ऐसा ही उिचत है।
कु ण म जग यी का आपसे वैर आ, अदृ बल है।’’
इतना कह, राम क दि णा कर, रा स-म ी सारण ने सब मि य और
सभासद के साथ राम-ल मण क व दना क और चला गया। सात वानर गु मपितय ने
कटक- ार तक जाकर रा स-म ी को सस मान िवदा कया।
राम ने वानर गु मनायक से कहा–‘‘वीरगण, अब आप भी वीर-वेश याग सात
दन िव ाम क िजए। पर तु िम वर िवभीषण और सु ीव को इस सुयोग म सम त सेना
का िनरी ण करके उसे भली-भांित ूहब कर लेना चािहए। सात दन बाद पु -शोक-
द ध रावण ाण पर खेलकर काल क भांित हम पर टू टेगा।युवराज अंगद, तू एक सह
यो ा को लेकर िम -भाव से रा सराज के िनकट समु -तट पर जा। सावधान रह वीर,
मन म श ु-िम का िवचार न करना। सौिमि को इस भय से नह भेजता ं क कदािचत्
रावण को उ ह देखते ही रोष आ जाए। इससे तू ही जा। तेरे तापी िपता ने एक बार रावण
को परािजत कया था, अब तू इस िश ाचार से उसे स तु कर।’’
अंगद ने वीकार कया। सु ीव ने कहा–‘‘राघव, रा स रावण अब हत तेज हो
गया है, उसका अ त िनकट है, तथािप हम सब कटक को पूण वि थत कर लगे।’’
126. िचतारोहण

लंका का पि मी ार व -िननाद से खुला। एक लाख रा स वणद ड हाथ म


िलए बाहर आए। येक के हाथ म रे शमी पताका थी। वे राजपथ के दोन ओर पंि ब
चलने लगे। सबसे आगे हािथय क पीठ पर दु दुिभ थी। मेघ-गजना के समान उनका
ग भीर रव दग त म ा हो रहा था, उनके पीछे पैदल सेना क कतार बढ़ । उनके पीछे
घोड़े और हािथय पर धुनधर। शोक विन म क ण वा बज रहे थे। असं य रा स वीर
वणवम पहने, वण वज िलए, भारी-भारी ख ग कमर म लटकाए, िसर नीचा कए,
श को पृ वी पर टेकते ए आगे बढ़े जा रहे थे।
इनके पीछे दानवपु ी सु दरी सुलोचना िमला काले घोड़े पर वीर-वेश म सवार
आई। पीछे कं करी चमर डु ला रही थी। उसके पीछे एक सह चेटी, दासी कं करी,
पा का, पैदल, अ ु बहाती नंगे पैर काले वेश म चल । दािसयां कौिड़यां और खील
फकती जा रही थ । गाियका क ण गीत गाती जाती थी।
सागर-तीर पर, जहां अन त नील नीर के इस ओर दूर तक वणबालुका का
समतल मैदान सूय क धूप म चमक रहा था, वहां महती िचता रची गई। उसम मन
च दन, अग और ग ध-पलाश के ढेर लगे ए थे। रा सवीर नंगी तलवार ले पंि ब खड़े
हो गए। पुरोिहत वेदम -पाठ करने लगे। सुपूिजत शव िचता पर रखा गया। सुलोचना
ललाट म िस दूर-िब दु लगाकर गले म पु पमाला पहनकर िचता पर आ बैठी। रा स-
पि यां हाहाकर कर उठ ।
सामने शत-शत िचताएं दूर तक िसकता-सागर पर रची ई थ । सबके बीच म
महाकाय कु भकण क िचता थी। महाकाय, अक पन, अितकाय, महोदर, व , ि िशरा,
कु भ, िनकु भ, िनरांतक, उद , वा कल, अितलोमा, िवडाला , दुमद आ द महा ाण
रा स, कभी िजनके नाम से पृ वी के वीर थराते थे, अपनी-अपनी िचता म चुपचाप
अन त िन ा म सो रहे थे। अपने-अपने पितय के पादप को गोद म िलए रा स कु लवधुएं
सहगमन को स बैठी थ । िचता को घेरकर चे टयां, दािसयां, बि दिनयां उ सग होने
को तैयार खड़ी थ । सभी के शरीर पर सौभा य के िच न थे।
सह चे टय ने वणपा म भर-भरकर च दन, अग , क तूरी, घृत, के सर, पु प
िचता पर िबखेरे। डफ, ढोल, मृद ग, करताल, झांझ और शंख बज उठे ।
रावण ेत व धारणकर मि य सिहत आगे आया। अंगद, इ और का तके य
कु मार ने रावण के साथ आगे बढ़ संवेदना कट क । द बाजे बजने लगे। वृ ा सुहािगन
ने सुलोचना के म तक पर पुनीत जल का संचन कया।
सुलोचना ने आभूषण उतार सिखय और चे टय को देते ए कहा–
‘‘अरी यारी सहच रयो, आज अचानक ही मेरी जीवन लीला समा होती है।
कल तक मुझे इस बात का पता ही न था। तुम सब अब दानवलोक म लौट जाना। अरी
वास ती, िपता से सब कु छ कह देना और माता से...’’ एकाएक उसक बोली ब द हो गई,
सब ि यां हाहाकार कर उठ । कु छ ठहरकर िमला ने कहा–‘‘अरी, माता से कहना, जो
अदृ म था, वह हो गया। उ ह ने मुझे िज ह स पा था, उ ह के साथ म जा रही ।ं ’’
वेदपाठी वृ रा स का दल वेदपाठ करता आ आगे आया। मंगलवा बजने
लगे। रा स-ि यां मंगल-गीत गाती ई िचता के चार ओर घूमने लग । रा स बाण से
पशु को मार-मारकर िचता म चार ओर रखने लगे।
रावण ने आगे बढ़कर कहा–‘‘अरे मेघनाद, मने आशा क थी क तुझे रा यभार दे
महाया ा क ं गा। पर तु अदृ ने कु छ और ही रचना कर डाली। वण- संहासन क जगह
तुझे आज पु -वधू-सिहत इस अि रथ पर बैठा म देख रहा ।ं हाय, इसीिलए मने तेरा
देवसाि य कराया था? इसीिलए मने ाराधना क थी? हा पु ! हा वीर े !!’’
जग यी रावण जगदी र िसर धुनता आ भूिम पर िगर पड़ा। अमा य ने,
वृ जन ने उसे उठाया। रावण ने िचता म अि दी। सहसा िचता जल उठी। इसी समय
शत-शत िचता म अि दे दी गई। लयाि क भांित उन शत-शत िचता से अि क
लपट उठने लग । दासी, चेटी, सिखयां ाणो सग करने के िलए िचता म कू द-कू दकर
भ म होने लग । बाज क गड़गड़ाहट, ब दीजन के जय-जयकार, आतजन के िवलाप
और यो ा के ची कार से समु -तट उस समय लयकाल के अि -समु क भांित
भयानक हो उठा।
विनवेग से आकाश फटने लगा। दस हजार घड़ क दु ध-धार से अितरथी क
िचता बुझाई गई। फर सब िचता क भ म-रािश सागर म िवस जत कर लंकापित
रावण लुटे ए पिथक क भांित अधोमुख आंसू बहाता रा स , रा स-पि य सिहत सूनी
और हाहाकार से भरी लंका म लौट आया।
127. वध

रा सपुरी सात दन तक िवषाद म रोती रही। सह रा स-िशि पय ने वीरे


क िचता पर गगन पश चै य वण क ट से रचा। सात दन भी बीत गए। रावण ने
िस धु म प रजन -सिहत ानकर अशौच यागा। अब वह अ ुनीर को ोध और अमष क
आग म जलाता आ रणसाज सजने लगा। लंका म फर दु दुिभ गड़गड़ा उठी। ृंगी-नाद
होने लगा। रावण अपने रथ पर बैठ म दोदरी आ द अ त:पुर क सब ि य को पछाड़
खाती रोती-कलपती छोड़, िवषधर सप के समान फु फकार मारता आ बि दय और
यो ा से परावृत समरांगण म आ प च ं ा।
सात दन-रात अनवरत राम-रावण का अ ितम, अव य सं ाम होता रहा। अ त
म रावण ने राम का सा मु य कया।
राम ने देखा तो धनुष-टंकार कया। मातिल द रथ ले आया। िवभीषण आ द
महारथी राम को चार ओर से घेरकर चले। राम ने कहा–‘‘मे िचरम-भीि सत: परा म य
कालोऽयं स ा :। चातक य कांि तं धमा ते मेघदशनिमव। अि मन् मु त न िचराद्
अरावणमरामं वा जगद् यथ।”
इतना कहकर राम ने सारिथ से कहा–‘‘हे देवसारिथ, अब चलो रा सराज के उस
ेत छ के स मुख।”
रावण ने भी जब राम के रथ को देखा तो ोध से लाल-लाल आंख करके धनुष
उठाया।
राम ने पुकारकर अपना नाम-गो उ ारण करके कहा–‘‘मया िवरिहतां दीनां
वैदह े वा शूरोऽहिमित म यसे! ीषु शर यिवनाथासु परदारािभमशनं कापु षकम
कृ वा शूरोऽहिमित म यसे! िभ मयाद, िनल , चा र े वनवि थत, शूरोऽहिमित म यसे!
त या य़ ग हत यािहत य कमण: मह फलं ा ुहीदानीम्?
‘‘रे दुमते, शूरोऽहिमित चा मानमवग छिस, सीतां चौरवद् पकषत ते नाऽि त
ल ा। द ् यािस, अ वां सायकै ती णै: मृ युमुखे नयािम। अ ते म छरै ि छ ं िशरो
ादा पकष तु।”
ी राम ने एकबारगी ही अिवरल बाण वषा से रा से को ढांप दया। असं य
वानर-यूथ, यूथपित गु मनायक, भट-सुभट ने रावण के रथ को चार ओर से घेरकर उस
पर िविवध श ा क वषाकर रथ को ण-मा म जजर कर डाला। इस भयानक
आ मण से भ दय रावण िवचिलत हो गया। जब तक वह धनुष पर बाण-संधान करे ,
तब तक ी राम ने दस पैने बाण उसके दय म मारे । रावण झूमता आ मू छत हो रथ
पर िगर पड़ा। सूत ने यह देखा, तो वह रथ का ख मोड़ यु - े से भाग खड़ा आ।
िवजय-गव-म वानर-सै य जयनाद करती ई भागते रा स का िनदय-संहार करने
लगी।
पर तु रावण तुर त ही सावधान हो गया। उसने गु से से लाल होकर सूत से
कहा–‘‘अरे , तूने िबना ही मेरी आ ा के मेरा रथ श ु के सामने से कै से हटा दया? अरे
अनाय, तूने तो मेरे कु ल को ही दाग लगा दया। मेरा िचरकालोपा जत यश, वीय, तेज,
यय सभी न कर दया। चल, चल, शी मेरा रथ श ु के स मुख ले चल–आज पृ वी
रामरिहत या रावणरिहत होने वाली है।”
सूत ने कहा–‘‘देव, म न भयभीत ,ं न मूढ़ ,ं न म श ु के भाव म ,ं न म ,ं
न आपक मिहमा से असावधान ।ं मने तो आपक िहत-कामना से, आपके यश क र ा
करने क भावना से, स मन यह िहतकर काय कया था, आपके िव ाम को िवचार कर
तथा रथ और अ क सुर ा के िलए आव यक समझकर। मने वे छा से रथ नह
हटाया।’’
‘‘तो चल-चल ज दी कर, अब म धीरज नह रख सकता।’’
राम ने जब रावण का वण-शैलोपम रथ फर अपनी ओर आते देखा तो उ ह ने
द ऐ धनु हाथ म िलया। उसक टंकार से दस दशाएं गूंजने लग । इ ने दि ण प
संभाला, कु मार का तके य ने वाम। पृ भाग पर ल मण, मुखा पर गदापािण िवभीषण
सु ीव, हनुम त, नील, नल, गय, गय द, जा बव त आ द सौ मुख, गु मपित वानर सुभट।
अब राम-रावण का सु िस िचर मरणीय िनणायक यु होने लगा। दोन रथ अचल
पवत के समान एक-दूसरे के सामने डटे थे। दोन ही अजेय वीर द ा का अ भुत
योग संहार कर रहे थे। इस अ भुत यु को देखने के िलए रा स और वानर भट भी
स हो गए। कालसप क भांित वल त नाराच, िशितप छू ट रहे थे, पर पर टकराकर
टू ट रहे थे। ल -ल सुभट जड़वत् अचल रह यह अभूतपूव यु देख रहे थे। अब राम ने
अवसर पाकर चार कालबाण से रावण के रथ के घोड़ को मार िगराया। वायुवेगी अ
के मरने से ोधसंत रावण ने बाण से राम को ब ध डाला। राम ने िनर तर बाण-वषा
करके रावण का रथ जजर कर दया। वानर सुभट ने एकबारगी ही रथ पर टू टकर रथ
चूर-चूर कर डाला। इसी समय पांच बाण मार राम ने रावण के सारिथ को मार िगराया।
इस पर वानर-सै य गरज उठी। रा स के दय िहल गए। अब रावण हाथ म अपना लोक-
िस िवकट परशु लेकर रथ से कू द पड़ा। राम ने भी गदा संभाली। अब दोन का अ भुत
अतु य तुमुल होने लगा। दोन वीर यु ु म हािथय क भांित पर पर गुंथ गए।
श -ु िम कहने लगे-इस राम-रावण के तुमुल सं ाम क तुलना यह राम-रावण यु ही है।
इसी ण सुअवसर जान इ के संकेत से राम ने फर द धनुष उठाया। रथ को
हण कया और सात आशीिवष बाण एक साथ ही छोड़ दए। वे बाण रावण के क ठ को
फोड़ उसम ही अटक गए। पर रावण मरा नह , िगरा नह ।
तब राम ने देवसारिथ मातिल से कहा–‘‘यै तु बाणै: मया मारीचो िनहत:, खर
सदूषणो िनहत: त इमे मम सायका: सवऽिप म दतेजस: ा यियका:।’’
मातिल ने अ को संभालते ए कहा–‘‘राघव, अजानि व कमनुवतसे, य महद्
बाणं द ममोघं भगवानृिषरग य: ादाद् त मै हर!’’
राम ने वह अमोघ कालबाण हाथ म ले, उसे अिभमि त कर फु त से कान तक
धनुष को ख चकर छोड़ दया। वह वल त अमोघ शर रावण के दयदेश को िवदीण
कर पार िनकल गया। व के समान दुधष उस शर को व -बा राम ने कृ ता त के
समान वेग से फका था। वह अमोघ व शर रावण के मम थल को िवदीण कर उसके
ाण का संहार करता आ पृ वी म धंस गया। रावण का िधरा शरीर िबजली से मारे
ए शैल-िशखर क भांित भूिम म िगर गया।
महा ाण, महावीय, अिमततेज, जग यी, जगदी र रावण को इस कार
भूपितत देख इ ने हष म हो हठात् शंख विन क । एकबारगी ही शत-सह शंख बज
उठे । रा स अनाथ क भांित श याग यु भूिम ही म बैठकर दन करने लगे। वानर-
सै य बार-बार हषनाद से पृ वी को क पायमान करने लगी, सकड़ दु दुिभयां गड़गड़ा
उठ । देव, मनुज, गंधव, य , नर, वानर ने राम पर पु पवृि क । सबने राम का रथ घेर
िलया। राम क आ ा से यु त ण ब द कर दया गया। इ बारं बार ‘साधु-साधु’ कहने
लगा। म ण ने िवजय के बाजे बजाए। तभी ल मण, िवभीषण, सु ीव, हनुमान्, अंगद
आ द सु ि िश ने राम क एक हो िविधवत् अचना क ।
िव वि दत देवदै यिजत् बड़े भाई को िनहत, िन जत रण म सोते देख शोक-संत
िवभीषण िवलाप करने लगा–‘‘हा हा, वीरिव ा त, वीण, नयकोिवद महाहशयनोपेत कं
िनहतो भुिव शेष?े य मया पूवमी रतं त काम-मोहपरीत य तव न िचतम्। आ द यो भूमौ
पितत:, च मा तमिस म :, शा तोऽि :, िन मो वसाय:!’’
राम ने िवभीषण को आकर सा वना दी। उ ह ने कहा–‘‘नैव िवन ा: शो य ते, ये
िनपति त रणािजरे ते वृि माशंसमाना:।’’
िवभीषण ने शोको ार छोड़ते ए भी कहा–“एष महातपा वेदा तपारग ा शूर
एत य ेत य य कृ यं त े सादात् कतुिम छािम।”
राम ने वा पपू रत ने से िवभीषण को देखा, फर कहा–‘‘मरणा तािन वैरािण,
एष यथा तव ममाऽिप तथा। यताम य सं कार:!’’
और इसी ण रावण क अ त: पुरवािसनी, मृगलोचनी, मृदल ु गा ा, सुवामा शत-
शह अ नं सु द रयां, जो पृ वी भर के देव, दै य, दानव, य , ॠ , ग धव, नर,
नागराज क सुकुमारी कु मा रयां, राजपुि यां रावण क अंकशाियनी वयंवरा थ , वे सब
राज-मिहषी म दोदरी और िच ा गदा को आगे कर शोक-िव वला, बारं बार भूिम पर
पछाड़ खात ‘हा आयपु , हा नाथ’ का आतनाद करती ई रण थली क र -
म ािमि त पंक को अपने िसर पर उड़ात , मुि के िशनी, मिलना गी वहां आ,
जग यी, परमे र, स ीपपित, रा सराज रावण को भूिम पर र लुत िन ाण पड़ा
देख िछ लता क भांित उसके अंग पर िगर ग ।
ब त ने तो उसे उठाकर अंक म रख िलया। ब त रोती ई उसके चरण पर िसर
धुनने लग । ब त उसके क ठ म िलपट ग । कसी ने उसक तिव त भुजा को दय से
लगाया, ब त-सी उसे मृतक देखकर मू छत ही हो ग । कतनी ही उसका मुख देख-
देखकर रोते-रोते बेहोश हो गई। म दोदरी ने िवलाप करते ए कहा-“ ैलो यमा य
ि या वीयण चाि वतमिवष ं वां कथं वनगोचरो मानुषो जघान?’’
िच ांगदा ने कहा–“अथवा राम पेण कृ ता त: वयमागत:!’’
‘‘हा, मे सं ा ा पि मा दशा वैध दाियनी। या मया म दया न कदािचदिप
स बु ा। अरे , िपता मे दानवराज, भता मे जग यी जगदी र:, पु ो मे श िवजेता, इ यहं
ग वता। यदा म तनय इ िजघुिध ल मणेन श त:, तदा तु अिभहता ती , अ तु
िनपाितताऽि म। नय मामिप, न व त ये वया िवना। अरे क मा वं मां िवहाय कृ पतां गत:।
मैिथलीमा तां दृ ् वा स देवरो मे यद वी स यवाक् –अयं रा समु यानां िवनाश:
समुि थतः। त चनं न ुतं वया, निवभीषणेनािभिहतं च कृ तं वया। मारीचकु भकणा यां
वा यं, मम िपतु तथा न कृ तं वीयम ेन वया, त येदं फलम्। िधग तु य ददं मम दयं
विय प वमाप े न सह धा िभ ते।’’
म दोदरी इस कार िवलाप करती ई मू छत हो िछ लता-सी रावण के व
पर िगर गई। उस समय ऐसा तीत आ क स या के लाल जलद म िबजली क ध गई।
राम ने आदेश दया–‘‘सं कार: यताम, ीगण: प रसा ताम् !’’ और राम ने
धनुष रख दया।
उपसंहार

चौरासी दन तक लंका का घोर सं ाम होता रहा।अ त म पु -प रजन-सिहत


रा सपित रावण मारा गया। राम जयी ए। यु फा गुन मास म आर भ आ और रावण
का वध वैशाख कृ ण चतुदशी या अमावस को आ। रावण के मरने पर राम ने िवभीषण
को लंका तथा रा स का वामी बना दया। पर तु िवभीषण और उसके सहयोगी
लंकावािसय ने रा स-धम याग, आय-माग हण कया। जो इससे सहमत नह ए
उ ह ने लंका याग दी।
कु ल िमलाकर तेरह मास सीता लंका म रह । अब सीता को संग लेकर राम पु पक
िवमान म बैठ दलबल-सिहत कि क धा म लौटे। वहां कु छ दन सु ीव का आित य हण
कर द डक वन म प च ं ,े जहां अग य- मुख सभी ॠिषय -तापिसय ने राम क अ यथना
क । िवभीषण, सु ीव, हनुमान् आ द मुख जन अब भी राम के साथ थे।
उधर भरत ने चौदह वष क वनवास-अविध पूण ई जान सुम त सिचव को
प रकर ले राम को अ यथना-सिहत अयो या ले आने को द डकार य भेजा था। वहां
जाकर सुमंत को पता चला क अ ात चोर ने रघु-वधू सीता को चुरा िलया है और राम-
ल मण उ ह को वन-वन खोजते कि क धा क ओर गए ह। तब सुम त ने कि क धा को
दूत भेजा। उसने लौटकर कहा क लंकापित रावण ने सीता का बलात् हरण कया है और
राम क सहायताथ सब वानर-कटक लेकर सु ीव ने लंका पर अिभयान कया है। यह
सूचना पाते ही कोसल के धीर-वीर वृ म ी आंसू बहाते ती गित से अयो या लौटे।
अयो या म आकर उ ह ने सीताहरण का दा ण समाचार भरत को सुनाया, िजसे सुनकर
अयो या के राजमहल हाहाकार से भर गए। अयो या शोक-सागर म डू ब गई। भरत को यह
देखकर बड़ी लािन ई क आय राम ने इस िवप काल म मुझे सूचना नह दी। वे
रघुवंिशय क चतुरंग चमू लेकर, त ु गित से कू च पर कू च करते दि णापथ पर चल दए।
पर तु वे द डकार य तक तब प च ं पाए जब क राम लंका को िवजय कर वहां प च ं चुके
थे। भरत को चतुरंग चमू-सिहत आया सुन रामभ ने अग य- मुख सब ॠिषय , वानर
और रा से िवभीषण-सिहत आगे बढ़ भरत का अिभन दन कया। सब भाई ेमा ु
िगराते िमले। िचर िवयोग के दा ण दु:ख का अ त आ। वैदह े ी सिहत राम-ल मण ने
माता और गु जन क पदव दना क । माता ने दोन पु को ेमा ु िगराते दय से
लगाया। सीता को यार से आशीवचन कहे।
अब राम, विश , वामदेव, इ , अग य, िवभीषण, सु ीव, सुती ण आ द
नरपित व र और नृवंश के नेता क सभा द डकार य म जुड़ी। उ रापथ आयावत
और दि णावत के सब ितिनिध नेता, देवलोक और मृ युलोक के ितिनिध, दि ण के
ीपसमूह के अिधपित, नागकु लपित द डकार य म आकर इस महती सभा म बैठे। पृ वी
के रा य का यथावत् िवभाजन आ। रावण का सा ा य िछ -िभ हो गया। िवभीषण
को लंका का राजराजे र तथा स ीप का संर क वीकार कया गया। देवलोक और
आयावत के रा य क नई सीमाएं िनधा रत और तब से दि णार य तक समूचा ही
भारतवष–आयावत घोिषत कर दया गया। विश और िव ािम ने परामश कर आय
क इस सि मिलत जाित का नये िसरे से संगठन कर गुण-कम देख उ ह चार वण म
िवभािजत कर वण-मयादा क ॠचाएं तुत क और वे सब वेदांग वीकार कर ली ग ।
अब वेद िनि त प से आय क सां कृ ितक ा या का धम ंथ वीकार कया गया। चार
वण बन जाने से सब छोटे-बड़े, मूख और िव ान्, वामी और सेवक पर पर पृथक् समूह का
ितिनिध व करते ए भी समि प से आय कहलाने लगे। िविजत को, अनाय को,
पितत को भी शू सं ा दे आय व क जाित-मयादा म बांध िलया गया। आय , देव तथा
आयतर म मै ी स ब ध थािपत हो गए। आय का सौ व सबने वीकार कया तथा
विश आय के सबसे बड़े धमनेता वीकार कर िलए गए। उ ह क य िविध आय ने
वीकार क । के वल देवगण ने न वण-मयादा वीकार क , न प रवार था, न िपतृमूलक
कु ल-पर परा, न विश क य -िविध। उनके धम-नेता नारद ष वामदेव ही रहे और उ ह
क वामिविध देव ने वीकार क । पर तु दोन म स ाव कायम हो गया।
सब व था कर रामभ िम -प रजन के साथ भरत को आगे कर नि द ाम म
आए और ठीक चौदहव वष क समाि पर चार भाइय ने जटा कटाकर तप वी वेश
याग राजोिचत वेश तथा राज-प र छद धारण कए। फर िम , पुरोिहत और ॠिषय
सिहत अयो या म आकर राम ने धूमधाम से रा यािभषेक कराया। स पूण आयावत,
देवलोक और ीप- ीप के राज ितिनिधय ने रामािभषेक म भाग िलया। राम समूचे
आयावत के एक छ च वत स ाट् , घोिषत कर दए गए। सीता जनकनि दनी आय क
राजमिहषी बन ।
सब समारोह स प होने पर राम ने दान-मान से सं कृ त कर देव, मानव, दानव,
नम, नाग, असुर, र , य , वानर, ॠ , दै य ितिनिधय , राज षय , यितय ,
चा रय , वेदपा ठय , भट , सुभट , िम बा धव को िवदा कया। सेवक को संतु
कया और अयो या म रामरा य संचािलत कया।
मथुरा के शासक लवणासुर ने राम का शासन वीकार नह कया। वह यादव-
नरे श भीमसा वत का ितिनिध था। वह रा सधम तथा नरभ ी था। इसिलए राम ने
श ु को उस पर चढ़ाई के िलए भेजा। श ु ने घोर यु कर लवणासुर को मार डाला।
रामच ने श ु ही को मथुरा के रा य पर अिभिष कर दया। यादव-नरे श भीम श ु
के भय से सुदरू दि ण म हट गया। श ु बारह वष मथुरा क ग ी पर रहे।
काला तर म राम के दो पु ए–कु श और लव; ल मण के अंगद और च के तु;
भरत के त और पु कर; श ु के सुबा और श ुघाती।
इसी समय के कय देश के आनव राजा–भरत के मामा युधािजत् को मारकर ग धव
ने उसका रा य छीन िलया। यह सुन राम ने भरत को चतुरंग चमू दे ग धव पर चढ़ाई के
िलए भेजा। भरत ने ग धवराज को परािजत कर ग धव देश और के कय देश पर अिधकार
कर िलया। राम ने भरत को वहां का राजा बनाया। समय पाकर भरतपु पु कर ने
पु करावती नगरी बसा अपनी राजधानी बनाई। ये दोन ाचीन महानगर अब तक
पेशावर और त िशला के नाम से िव यात ह।
राम ने और भी रा य को जय करके उ ह पु -प रजन म बांट सूयवंश क अनेक
नई ग यां थािपत क । राम ने ये पु कु श को अपना युवराज घोिषत कया तथा
िव य के दि ण म कु श थली म कु शावती नगर बसाकर उसे वहां का रा यपाल बना
दया। लव को उ र कोसल क राजधानी ाव ती म थािपत कया, जो ग डा या
बहराइच िजले म है। लव ने लवपुर नगर बसाया, जो लाहौर के नाम से िस आ।
ल मण के पु अंगद और च के तु को कारापथ के अ तगत अंगद नगर तथा च ावती के
रा य दए, जो म ल देश म िहमाचल उप यका म थे। सुबा को मथुरा तथा श ुघाती को
िव दशा, जो अब भेलसा कहाता है, का रा य िमला। इस कार राम ने अपने भाइय और
अपने तथा भाइय के आठ पु को पृथक् -पृथक् रा य बांट दए, जो सब अयो या क
मु य ग ी के अधीन थे।
ी राम ने सु ीव, िवभीषण और श ु को िमलाकर के वल अपने बा बल से
यारह राजा का अिभषेक कया। अंग, बंग, म य, ृंगवेरपुर, काशी, िस धु, सौवीर,
सौरा दि ण कोसल, कि क धा और लंका राम क िम शि यां थ । इस समय तक
आय के इितहास म राम से बढ़कर ापक, भावशाली सावभौम स ाट् नह आ था।
रामरा य म आय का भाव सारे नृवंश पर छा गया और आय क जाित सारी पृ वी पर
े जाित वीकार कर ली गई। गोदावरी के दि ण तथा आय के बल रा य थािपत हो
गए। प पा, मलय, महे तथा लंका सुदरू दि ण के सब ीप-समूह म रामनाम क
मिहमा तथा आय का बल भाव थािपत हो गया।
राम के बड़े पु कु श को दि ण कोसल तथा अयो या रा य िमला। अवध के दो
भाग करके राम ने ाव ती लव को दी और अयो या कु श को। बड़े होने के कारण उ ह
दि ण कोसल भी िमला जो िव य म था। कु श राम क मृ यु के बाद कु शावती म रहने लगे
थे। इससे अयो या उजाड़ होने लगी, तब वहां के िनवािसय क ाथना पर वे फर
अयो या म चले आए। कु श का िववाह कसी त क नाग क पु ी कु मुदावती से आ था।
दुजय नामक एक असुर से यु करते ए कु श क मृ यु ई। इनका पु अितिथ बड़ा तापी
था। उसने िपतृह ता को मारा। इनके वंशधर पा रपा के छोटे भाई सह ा ने दूसरा
रा य थािपत कया। पा रपा के तीन पु शल, दल, बल एक-दूसरे के पीछे राजा ए।
बल के वंश म रा य चला। िहर यनाभ इसी वंश म ए, िज ह ने जैिमनी से योग सीख
या व य को िसखाया। इनके पौ ‘पर’ के पीछे इस वंश का रा य न हो गया। दूसरी
शाखा म सह ा क छ: पी ढ़यां चल , िजसके अि तम राजा ुतायुध महाभारत सं ाम
म लड़े थे।
लव ाव ती के नरे श बनाए गए थे। इनका वंश दीघकाल तक चला। लव के पौ
राजा ुविस धु के दो िववाह ए। थम क लंगपित क पु ी मनोरमा से, दूसरा उ ैनपित
युधािजत् क पु ी लीलावती से। राजा ुविस धु आखेट करते ए संह ारा मारा गया
और मि य ने मनोरमा के पु बालक सुदशन को राजा बनाया। इस पर क लंग और
उ ैन-नरे श अपने-अपने दौिह के प म लड़ने को तैयार हो गए। ृंगवेरपुर म भी यु
आ, िजसम क लंग नरे श मारा गया और मनोरमा बालक सुदशन को लेकर याग आ
भार ाज के आ म म शरणाप ई। युधािजत् उ ैनपित ने अपने दौिह श ुिजत् को
राजा बना दया। भार ाज के आ म म रहकर सुदशन बड़ा िव ान् हो गया। कु छ दन
बाद काशी के राजा सुबा क पु ी शिशकला का वयंवर आ। शिशकला सुदशन का गुण
सुन चुक थी। उस पर मु ध थी। उसने चुपके से उसे बुला भेजा। वयंवर म युधािजत्,
श ुिजत्, का रवपित, भ शर, संहराज, मािह मतीपित, पांचालराज, काम प, कणाटक,
िवदभ, के रल, चोल आ द के राजा एकि त थे। युधािजत् ने आपि क क सुदशन कह का
मुकुटधारी राजा नह है। अत: वह वयंवर म सि मिलत नह हो सकता, पर के रल नरे श ने
उसका प लेकर कहा क वह ुविस धु का बड़ा पु है, अत: माननीय राजपु ष है। पर
युधािजत् ने कड़ा िवरोध कया। यह देख अनेक राजा उसके पाि ड य और सदाचार को
देख सुदशन के प म हो गए। वयंवर म शिशकला ने जयमाला भी सुदशन ही के क ठ म
डाली। इस पर युधािजत् और श ुिजत् यु पर स हो गए। राजा सुबा और सुदशन के
प वाले राजा से युधािजत् और श ुिजत् क सि मिलत सै य का भारी यु आ, िजसम
युधािजत् और श ुिजत् मारे गए। सुदशन शिशकला को याह कर ाव ती के राजा बने।
यह वंश महाभारत तक चला। महाभारत-सं ाम म इस वंश का बृह ल मारा गया था,
पर तु वह रा य आगे तक चलता रहा। बु कालीन इितहास िस अयो या-नरे श
सेनिजत् इसी वंश म ए।
ल मण और श ु के पु के रा य ब त ज दी टू ट गए। ापर युग म सूयवंश
दबा रहा। च वंश क िवशेषता रही। सारे संसार म लव का वंश ही सवािधक काल तक
अख ड चला।
िवभीषण ने रा स-धम यागा और आय-धम म दीि त ए। कृ त ता व प जब
राम के पु का ज म आ तब उसने कु श के नाम पर िशवदान ीप का नाम कु श ीप रख
दया, जो अब अ का का महा ीप कहाता है। िवभीषण ने रावण के सारे अवरोध को
अपने अ त:पुर म दािखल कर िलया। म दोदरी ने भी पु -वधू सुलोचना का अनुसरण न
कर कु ल ोही िवभीषण क मिहषी बनना वीकार कर िलया। पर तु िवभीषण के वंश का
ताप-सूय शी ही अ त हो गया। उसके उ रािधकारी कमज़ोर रहे। रा स का सारा ही
आ थक और राजनीितक ढांचा िबखर चुका था। रा स और दै य के मुख के और
रा य न हो चुके थे। िवभीषण कु लघाती था, इससे वह लंका म िति त न रह सका।
राम-यु म ाय: सभी रा स यो ा मर चुके थे। जो बचे भाग गए। लंका क कला-कौशल,
सं कृ ित, समृि सब कु छ िवलीन हो गई। िवलाप करती ई िवधवाएं िवभीषण को िवष-
दृि से देखती थ । लंका म कोई उसका क याणकामी न था। थोड़े ही दन बाद िवभीषण
क मृ यु हो गई। उसके बाद लंका रा य के वल लंका के छोटे-से ीप तक सीिमत रह गया।
राम-रावण के इस महायु म लगभग स पूण दै य-दानव, नागवंशी राजा और
राज ितिनिध रावण क सहायताथ आए थे। रावण स ीपपित था, जो उस काल लंका के
चार ओर फै ले थे। आज क भौगोिलक ि थित य िप बदल चुक है, पर तु वे ीप आज
आ ेिलया, जावा, सुमा ा, मेडागा कर, अ का आ द नाम से िस ह। ऐसे बल श ु
को मारना आसान न था। ितिमर वज श बर और व चन क समाि के बाद रावण का यह
िनधन ऐसा था, िजसने स पूण अनाय बल तोड़ दया था। इसी से राम का नाम और यश
इन ीप म फै ल गया और भूम डल म राम िव यात हो गए। लोग मिहदेव और जगदी र
क भांित रावण के थान पर राम क ही पूजा करने लगे। च पा, क बोिडया, थाईलै ड,
वमा म भी राम- ताप ाप गया। यूरोप क जाितयां कसी-न- कसी राम- भािवत
ाचीन जाित से ही स बि धत ह। अत: यूरोप के मुख देश–जैसे इं लै ड, पेन, वीडन,
नाव, कै डीनेिवया, ीस और इटली भी राम- भाव से मु न रह पाए। इस कार आज
के सब देश म इस आयनेता िवजेता मयादापु षो म राम का कसी-न- कसी प म
सां कृ ितक िम ण है।

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